Monday, August 23, 2010

आत्म-बल का विकास किस प्रकार करूंगा ? [46]"पाठचक्र का तात्पर्य "


(2 H )- विकास अर्थात शारीरिक शक्ति (य़ा बाहू बल ) को विकसित करने का उपाय- ' व्यायाम ',  और मानसिक शक्ति (य़ा मनोबल) को विकसित करने के उपाय- " मनः संयोग " करना भी हमने सीख लिया; अब प्रश्न उठता है की अपने (3rd H या ह्रदय Heart) का विस्तार आत्म-बल का विकास  किस प्रकार करूंगा?
ह्रदय का विस्तार करना चाहते हों, तो उसके लिये सबसे कारगर उपाय के तौर पर जिसे हमलोगों ने जाना है, जिसे आप महामण्डल द्वारा एक ' परीक्षित सत्य ' भी कह सकते हैं - वह है, ' मन ' को केवल ' मैं ' और' मेरा ' के स्वार्थपूर्ण सीमित दायरे में नहीं रखना। 
अर्थात अपने ह्रदय को केवल अपने व्यक्तिगत कल्याण-कामना से जोड़े न रख कर थोड़ा दूसरों के ह्रदय से भी जोड़ने की चेष्टा करना. दूसरों के ह्रदय के साथ अपने ह्रदय को जोड़ लेने से क्या होगा?" अन्येर व्यथाटा आमार बूके गिये लागबे | " - दूसरों के मन की व्यथा का अनुभव कर मेरी छाती धडकने लगेगी . दूसरों का दुःख-कष्ट देख कर मेरा ह्रदय द्रवीभूत होने लगेगा; ठीक उसी प्रकार दूसरों का आनन्द भी मेरे मन में संचारित होने लगेगा ! "
यह सब किन्तु हमलोग अभी भी करते ही जा रहे हैं. हर समय ऐसा होता रहता है, केवल हमलोग उसकी तरफ ध्यान नहीं देते हैं, यह समझ नहीं पाते हैं कि, हाँ ऐसा होता है. इसीलिये यदि वही काम हमलोग ज्ञानतः (होश पूर्वक) करें, सोंच-विचार करके समझ-बुझ कर करें - ' कि नहीं मुझे अपने मन से केवल अपने व्यक्तिगत लाभ के बारे में न सोंच कर दूसरों का हित भी सोंचना होगा.' " कारन सकलेर मध्ये आमि आछि "  - एटा आसबे परे अनेक परे आसबे |  " - कारण सबों के भीतर मैं हूँ ' (सिर्फ़ ' मैं ' हूँ सिर्फ़ ' मैं '!) - ऐसा ज्ञान बाद में आयेगा, यह बोध बहुत आगे चल कर होगा ! मैं केवल इसी साढ़े-तीन हाथ के शरीर के भीतर ही आबद्ध नहीं हूँ, मैं केवल यहीं पर नहीं हूँ - मैं ही वह विश्वव्यापी ( आत्मा)हूँ (I am He )-  यह बोध बहुत बाद में आयेगा. चार महावाक्य में जो हमलोगों ने सुना था- " सर्वम खल्विदं ब्रह्म ! ""- सबों के भीतर मैं ही हूँ ! "
मैं ही तो वह ब्रह्म हूँ , अभी इस नाम-रूप में हूँ - आत्मा ने ही यह रूप धारण किया है.इस प्रकार का एक मूर्तिमान -   देह, एक मन, एक ह्रदय लेकर यह जो ' मैं ' (स्त्री य़ा पुरुष का) बन गया हूँ, कोई खास नाम-रूप धारण किया हूँ - यह भी तो ' वही ' हैं !
इसीलिये मन को विस्तृत करना होगा ( इसे विश्व-व्यापक समझना होगा )!इन सब गूढ़ तत्वों को आसानी समझने के लिये ही विभिन्न केन्द्रों में ' पाठचक्र ' कि व्यवस्था है. पाठचक्र  का अर्थ - यह नहीं कि एक व्यक्ति बैठे बैठे  पुस्तक य़ा कोई ग्रन्थ पढता रहेगा, और बाकी लोग केवल आँखें मूंद कर- य़ा आखों को खोलकर उसे सुनते रहेंगे |  
जिन पुस्तकों को पढने से और जान लेने हमारा यह विश्वास पुष्ट होता हो, कि चारों महावाक्य सत्य हैं ! उसी प्रकार के अंशों को महामण्डल पुस्तिकाओं से चुन चुन कर पढना होगा.स्वामीजी के जीवन एवं उनके संदेषों में समाहित विभिन्न दृष्टिकोण को समझने के लिये, स्वामीजी के भावों को ठीक से आत्मसात कर लेने के लिये- उसके कुछ कुछ अंशों को पहले पढ़ना चाहिये, फिर उन विषयों को आपस में चर्चा करके भलीभांति समझ लेने की चेष्टा करनी चाहिये. केवल इतना ही काफी नहीं है कि अमुक पुस्तिका से इतने पन्नों तक पढ़ लिया गया है, य़ा उस कहानी को पढ़ा गया था. 
पाठचक्र का तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है, बल्कि तथ्यों को बार बार चर्चा करके सुनना है और सुन कर समझ लेना है. तथा  प्रत्येक सदस्य को वहाँ पर बोलना भी होगा, बार बार बोलना होगा, कि उसने उन तथ्यों के बारे में क्या जाना है! पाठचक्र में बारी बारी से प्रत्येक सदस्य इन विषयों पर अपने अपने विचार रखेंगे. 
एवं साप्ताहिक पाठचक्र के दिन सभी सदस्यों से व्यक्तिगत जानकारी भी प्राप्त करना चाहिये कि विगत सप्ताह में तुमने महामण्डल के किन किन नियमों का कितना कितना पालन किया है ? नियमों का पालन करना - अर्थात प्रतिदिन सुबह में उठ कर हाथ-मुँह धो लेने के बाद जिसको जिस प्रकार की दिनचर्या का पालन करना पड़ता हो, उसे करना. निश्चित रूप से कई प्रकार की असुविधाएं रह सकतीं हैं, किन्तु उसके बावजूद भी यह देखना होगा कि कमसे कम ' व्यायाम ' हुआ है य़ा नहीं, सबों के मंगल के लिये ' प्रार्थना ' और ' मनःसंयोग ' का अभ्यास किया हूँ य़ा नहीं, सारे दिन में एक बार भी ' विवेकानन्द साहित्य ' में से कुछ न कुछ पढ़ा हूँ य़ा नहीं? ( सर्वाधिक महत्वपूर्ण - कोई भी कार्य करने के पहले मैंने ' विवेक-प्रयोग ' का अभ्यास किया है य़ा नहीं ?)
अपने ह्रदय का विस्तार करने के लिये स्वामीजी को प्रतिदिन पढना अत्यन्त आवश्यक है. मैं एक-दो व्यक्ति के बारे में जानता हूँ जो नौकरी करते हैं, वे लोग ऑफिस में जाने के बाद पहले ड्रावर  खोल कर स्वामीजी की एक पुस्तक निकालते हैं, और उसके कुछ अंश को पढने के बाद ही काम करना प्रारम्भ करते हैं. रात्रि में सोते समय उसको अक्सर एक, डेढ़, दो तक सोना पड़ता है, किन्तु चाहे जितनी रात हो जाये, रात में सोने से पहले कमसे कम और एकबार स्वामीजी की पुस्तकों को पढ़ता है. ऐसी आदत प्रत्येक में रहनी चाहिये. स्वामीजी की पुस्तकों में से रोज कुछ न कुछ पढूंगा, उसके बाद अनुसांगिक पुस्तकों को भी पढना है.महामण्डल की पुस्तिकाएँ हैं.
जब महामण्डल अपने अस्तित्व में आया-  तो सर्वप्रथम एक " लीफलेट " लिखा गया, उसके बाद एक बुकलेट आया" Aims and Objects of the Mahamandal " इसका हिन्दी अनुवाद - " महामण्डल का आदर्श एवं उद्देश्य " भी उपलब्ध है. ' मनः संयोग ' के ऊपर किताब हुआ है,  " चरित्र-गठन " के ऊपर किताब निकला है, ' चरित्र के गुण ' के ऊपर पुस्तिका निकली है, जो गुण बुरे हैं, उन दुर्गुणों का भी अपने आचरण से निकाल बाहर करना होगा, वे १२ दुर्गुण कौन कौन हैं उन्हें किस प्रकार बाहर किया जाता है हिन्दी में इसका नाम है - " नेति से ईति " , इस प्रकार की अनेक पुस्तिकाएँ प्रकाशित हुई हैं.
एक छोटी सी पुस्तिका संस्कृत भाषा में भी उपलब्ध है, इसके अतिरिक्त अंग्रेजी, हिन्दी, बंगला, उड़िया, तेलगु, मराठी, असमिया आदि आठ भाषाओँ में महामण्डल की पुस्तिकाएँ उपलब्ध हैं.इस प्रकार जो जिस स्थान में रहते हों, वे वहीं पर अपने यहाँ की भाषा में इन पुस्तकों को पढ़ सकते हैं, इसके अतिरिक्त हिन्दी भाषा में १० खण्डों में उपलब्ध ' विवेकानन्द साहित्य ' का नियमित अध्यन करना चाहिये, (प्रारम्भ में विशेष तौर पर पंचम  खंड) और स्वामीजी की जीवनी आदि का अध्यन भी प्रत्येक (भारत प्रेमी ) युवा को करना चाहिये.
हो सकता हैं कि प्रत्येक नवागंतुक सदस्य के मन में स्वामीजी के अदभुत प्रेरणादायी जीवन के सम्बन्ध में पहले से ही कोई धारणा नहीं रहे, किन्तु उनकी जीवनी को पढ़ते रहने से धीरे धीरे उनका जीवन प्रभावित करेगा और हमारा ह्रदय भी क्रमशः विस्तृत होने लगेगा.
यदि हमलोग अभी तक उनके जीवन को अपनी ' ध्येय-वस्तु ' के रूप में परिणत न कर सके हों, तो फिर महामण्डल से जुड़ने का लाभ ही क्या हुआ? यह ठीक है कि हमलोग प्रतिदिन बैठ कर स्वामीजी के चित्र य़ा मूर्ति पर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करते हैं, य़ा कोई कोई ध्यान भी करते हैं, किन्तु स्वामीजी कि जीवनी ( सत्येन्द्रनाथ मजुमदार लिखित- " विवेकानन्द चरित ")  को पढ़ते समय स्वामीजी का जो ध्यान होगा वह बिल्कुल (अनोखा) अपूर्व ध्यान होगा- उनके साथ एकात्मता का अनुभव होने लगेगा. 
ऐसा लगेगा हम मानो साक्षात् परिव्राजक स्वामी विवेकानन्द को कन्याकुमारी की ' विवेकानन्द रॉक ' तक तैर कर जाते हुए और वहाँ बैठ कर ध्यान करते जुए बिल्कुल लाइव टेलीकास्ट देख रहे हों ! कन्याकुमारी की उस शीला पर बैठ कर स्वामी विवेकानन्द ने किसका ध्यान किया था ?
१८९२ ई० में कुमारी अम्मन यानी " कुमारी देवी के मन्दिर " में बैठ कर स्वामी विवेकानन्द ने  " भारतमाता " का ध्यान किया था, भारतवर्ष के असंख्य दरिद्रों, दुःख-कष्टों में गिरे हुए मनुष्यों की मुक्ति के पथ को आविष्कृत करने की चेष्टा किये थे, प्रार्थना किये थे.
स्वामीजी जिस समय परिव्राजक अवस्था में भारतमाता की परिक्रमा कर रहे थे, उस समय तो भिक्षा मांग कर ही भोजन का प्रबन्ध करना पड़ता था, भिक्षा मांगते मांगते एकदिन किसी गरीब की कुटिया में जा पहुँचे हैं. उस घर की गृहणी भिक्षा लेकर आने लगतीं हैं, उसी समय स्वामीजी की दृष्टि घर के आँगन में घूमते उसके बच्चों पर जा पड़ती है; किसी के तन पर कपड़ा नहीं है, शरीर भी मैला-कुचैला है, सिर के केस इतने रूखे रूखे हैं मानो इन लोगों ने वर्षों से उनमे तेल नहीं डाले हैं. उन बच्चों को देख कर मन में इतना अवसाद हुआ, कि उन्होंने तय कर लिया कि अब और भिक्षा लेने कहीं नहीं जाऊंगा. वे सोंचने लगे, इन दरिद्र बालको के मुख से भी एक निवाला अन्न छीन लेने का मुझे क्या अधिकार है ?
ऐसा विचार करके स्वामीजी वहां से चले गये. चलते चलते वे विचारों में इतने खो गये कि अनमनस्क हो कर एक घने जंगल में जा पहुँचे. शरीर बिल्कुल थक चुका था, सारे दिन से कुछ भोजन नहीं मिला था, क्लान्त हो कर एक स्थान पर बैठ गये. चुप चाप बैठे हुए थे. बैठे- बैठे निश्चय कर लिये- " अब यहाँ से उठना नहीं हैं ! " हठात उनकी दृष्टि थोड़ी दूरी पर किसी दो वस्तु पर जा पड़ी अँधेरे में भी चम् चम् कर रहे थे ! जब ठीक से नजरों को गड़ा कर देखे तो पाया कि वहाँ तो एक बाघ बैठा था !
बाद में अपने गुरुभाईयों के पास इस घटना का उल्लेख करते हुए कहे थे- कि बाघ भी भूखा था और वह मुझे खा कर अपनी भूख मिटा सकता था, उधर मैं भी भूखा था, किन्तु मैं बाघ को नहीं खा सकता था; इसीलिये अच्छा होगा कि बाघ ही मुझे खा कर अपनी क्षुधा कि निवृत्ति कर ले. कम से कम किसी एक जीव कि क्षुधा की निविरित्ति तो हो जाएगी.
स्वामीजी की जीवनी को पढ़ते समय यदि हमलोग उनकी इन मूर्तियों को अपने ध्यान का विषय बना सकें- तो हमलोग स्वयं भी कितने विशाल ह्रदय वाले मनुष्य बन जायेंगे!
" यदि एक भूखे बाघ की भूख मुझे खाने से मिट जाती हो, तो फिर वैसा ही हो- "
स्वामी विवेकानन्द की बुद्धि के इस निर्णय पर विचार करने मात्र से ही, हमलोगों का ह्रदय भी कितना विस्तृत हो उठेगा ! स्वामीजी का जीवन इसी प्रकार की असंख्य घटनाओं से भ्रा हुआ है, जिनके ऊपर चिन्तन-मनन करने से हमारा ह्रदय भी अपूर्व एकात्मबोध के आनन्द से भर उठता है! 
इसप्रकार हमलोग घूमते फिरते भी ध्यान कर सकते हैं. जागते समय ध्यान होगा, सोते समय भी ध्यान होगा. स्वामीजी के जीवन पर निरन्तर चिन्तन मनन करते रहने से हमलोगों के मस्तिष्क में उनके भारी भावों के भीतर प्रविष्ट होते ही अन्य सभी हल्के भाव स्वतः बाहर निकल जायेंगे.  अपने भीतर स्वामीजी का जन्म कैसे होगा ? जिस प्रकार किसी पात्र में पहले से जल भरा हो और उसमे कुछ भारी वस्तु डाल दें तो पहले वाला हल्का जल बाहर निकल जाता है, उसी तरह हमलोगों के मन में स्वामीजी के भाव भर जाएँ और अन्य सारे हल्के विचार बाहर निकल जाएँ. यदि ऐसा हो जाये तो हमलोगों का जीवन कितना आनन्दमय हो उठेगा.
इसप्रकार का अनुचिंतन करने से जैसे पत्थर के ऊपर खुदाई कर कर के एक मूर्ति गढ़ ली जाती है, उसी तरह हमलोगों के भीतर भी विवेकानन्द जन्म लेंगे. युवाओं के मन में दिन-रात चलते फिरते यदि सिर्फ़ स्वामीजी के जीवन का ही  ध्यान बना रहे, तो भारतवर्ष में कितनी विपुल शक्ति का निर्माण होगा! और तब भारत के असंख्य मनुष्यों के अनगिनत  दुःख-कष्टों को दूर करने के लिये हमलोग कातर हो कर अन्य किसी की ओर नहीं देखेंगे. यहाँ तक कि स्वामीजी की ही तरह हमलोग भी अपने भविष्य य़ा अन्य किसी बात की चिन्ता भी न कर, यथासाध्य उनलोगों के लिये ही कार्य करते चले जायेंगे. इससे भी अधिक क्या जीवन की सार्थकता हो सकती है! स्वामीजी की उस प्रसिद्ध उक्ति को तो हममें से कई लोग जानते हैं- 
" He only lives who lives for other "
" केवल वही मनुष्य जीवित है, जो दूसरों के लिये जीता है ! "
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो केवल उदरपूर्ति, खाना-सोना डरना और वंश विस्तार करना, य़ा अन्यान्य शरीरों का भोग,  एक सांसारिक बंधन- तो यही सब करने से भी हाथ क्या लगेगा? उसके बाद जिस दिन समय (काल ) आयेगा, उस दिन तो आँखों को मूंदना ही पड़ेगा. यहाँ क्या रख कर गये ? स्वामीजी तुलसीदास के दोहे को उद्धृत किया करते थे न ?
" तुलसी जब पैदा हुए, जग हँसे तुम रोये | 
ऐसी करनी कर चलो, तुम हँसो जग रोये || "
" - तुमने जब जन्म ग्रहण किया था तो तुम रो रहे थे और जगत हँस रहा था. अब तुम ऐसे कार्य करते रहो जिससे, तुम जब यहाँ से जाओगे तो हँसते हँसते जाओगे, और तुम्हारे लिये, तुम्हें याद करके - दूसरे लोग आखों से जल बहाया करेंगे | "
उनकी यह उक्ति क्या प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सार्थक नहीं हो सकती ? हाँ, हो सकती है.यदि स्वामीजी का भाव ग्रहण करके उन्हीं के अनुसार हम भी अपने जीवन को गठित करने की चेष्टा करें, तो हममे से प्रत्येक का जीवन सार्थक हो सकता है !   
 
         
 स्वामी विवेकानंद का स्मृतिशेष
Vivekananda Rock Memorial, Kanyakumari
( भारत के मस्तक पर मुकुट के समान सजे हिमालय के धवल शिखरों को निकट से देखने के बाद हर सैलानी के मन में भारतभूमि के अंतिम छोर को देखने की इच्छा भी उभरने लगती है। समुद्र में उभरी दूसरी चट्टान पर दूर से ही एक मंडप नजर आता है। यह मंडप दरअसल विवेकानंद रॉक मेमोरियल है। 1892 में स्वामी विवेकानंद कन्याकुमारी आए थे। एक दिन वे तैर कर इस विशाल शिला पर पहुंच गए। इस निर्जन स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ। 
विवेकानंद के उस अनुभव का लाभ पूरे विश्व को हुआ, क्योंकि इसके कुछ समय बाद ही वे शिकागो सम्मेलन में भाग लेने गए थे। इस सम्मेलन में भाग लेकर उन्होंने भारत का नाम ऊंचा किया था। उनके अमर संदेशों को साकार रूप देने के लिए 1970 में उस विशाल शिला पर एक भव्य स्मृति भवन का निर्माण किया गया। 
समुद्र की लहरों से घिरी इस शिला तक पहुंचना भी एक अलग अनुभव है। स्मारक भवन का मुख्य द्वार अत्यंत सुंदर है।  लाल पत्थर से निर्मित स्मारक पर 70 फुट ऊंचा गुंबद है। भवन के अंदर चार फुट से ऊंचे प्लेटफॉर्म पर परिव्राजक संत स्वामी विवेकानंद की प्रभावशाली मूर्ति है। यह मूर्ति कांसे की बनी है जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है। यह मूर्ति इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है।
 
यह स्थान एक खाड़ी, एक सागर और एक महासागर का मिलन बिंदु है। अपार जलराशि से घिरे इस स्थल के पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर एवं दक्षिण में हिंद महासागर है। यहां आकर हर व्यक्ति को प्रकृति के अनंत स्वरूप के दर्शन होते हैं। सागर-त्रय के संगम की इस दिव्यभूमि पर मां भगवती देवी कुमारी के रूप में विद्यमान हैं।
इस पवित्र स्थान को एलेक्जेंड्रिया ऑफ ईस्ट की उपमा से विदेशी सैलानियों ने नवाजा है। यहां पहुंच कर लगता है मानो पूर्व में सभ्यता की शुरुआत यहीं से हुई होगी। अंग्रेजों ने इस स्थल को केप कोमोरिन कहा था। तिरुअनंतपुरम के बेहद निकट होने के कारण सामान्यत: समझा जाता है कि यह शहर केरल राज्य में स्थित है, लेकिन कन्याकुमारी वास्तव में तमिलनाडु राज्य का एक खास पर्यटन स्थल है।
कुमारी अम्मन मंदिर समुद्र तट पर स्थित है।तब देवी ने एक कन्या के रूप में अवतार लिया। कन्या युवावस्था को प्राप्त हुई तो सुचिन्द्रम में उपस्थित शिव से उनका विवाह होना निश्चित हुआ क्योंकि देवी तो पार्वती का ही रूप थीं। लेकिन नारदजी के गुप्त प्रयासों से उनका विवाह संपन्न न हो सका तथा उन्होंने आजीवन कुंवारी रहने का व्रत ले लिया। नारद जी को ज्ञात था कि देवी के अवतार का उद्देश्य वाणासुर को समाप्त करना है। यह उद्देश्य वे एक कुंवारी कन्या के रूप में ही पूरा कर सकेंगी। फिर वह समय भी आ गया।
वाणासुर ने जब देवी कुंवारी के सौंदर्य के विषय में सुना तो वह उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव ले कर पहुंचा। देवी क्रोधित हो गई तो वाणासुर ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। उस समय उन्होंने कन्या कुंवारी के रूप में अपने चक्र आयुध से वाणासुर का अंत किया। तब देवताओं ने समुद्र तट पर पराशक्ति के कन्याकुमारी स्वरूप का मंदिर स्थापित किया। इसी आधार पर यह स्थान भी कन्याकुमारी कहलाया तथा मंदिर को कुमारी अम्मन यानी " कुमारी देवी का मंदिर " कहा जाने लगा। 
माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु कुमारी अम्मन मंदिर में जलयात्रा पर्व पर आए थे। यहाँ मंदिर में पुरुषों को ऊपरी वस्त्र यानी शर्ट एवं बनियान उतार कर जाना होता है। सागर तट से कुछ दूरी पर मध्य में दो चट्टानें नजर आती हैं। दक्षिण पूर्व में स्थित इन चट्टानों में से एक चट्टान पर विशाल प्रतिमा पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। 
वह प्रतिमा प्रसिद्ध तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर की है। वह आधुनिक मूर्तिशिल्प 5000 शिल्पकारों की मेहनत से बन कर तैयार हुआ था। इसकी ऊंचाई 133 फुट है, जो कि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित काव्य ग्रंथ तिरुवकुरल के 133 अध्यायों का प्रतीक है.)

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