Wednesday, July 28, 2010

[37] " अद्वैतवाद कई बार खण्डित हुआ है.


" भेद और अभेद - ये दोनों अचिन्त्य हैं "
{यह जो सभी प्राणी अपने अपने आहार के पीछे दौड़े चले जा रहे हैं, और महाकाल (जरासन्ध) सब कुछ को अपना ग्रास बना लेने हेतु इन सबों के पीछे लगा हुआ है,किन्तु उसकी ओर किसी की दृष्टि नहीं जाती है. ..सचमुच सबकुछ कितना क्षणभंगुर है ! मनुष्य को इस जगत की नश्वरता के प्रति जाग्रत करा देने वाले सर्वग्रासी ' महाकाल ' पर किसी की दृष्टि नहीं जाती!!} 
इसी कारण इस विश्व सृष्टि के पीछे का यही रहस्य है! व्यास-देव (महर्षि वेदव्यास) ने वेद उपनिषदों से महावाक्यों को चुन-चुन कर व्यास-सूत्र की रचना किये हैं, उन्होंने जिस ब्रह्मसूत्र की रचना की है।
  आचार्य-शंकर ने उसके ऊपर भाष्य लिखा है.जिसको शंकर-भाष्य के नाम से जाना जाता है| ब्रह्म-सूत्र के ऊपर आचार्य शंकर ने जो भाष्य लिखा था उसी के ऊपर अद्वैतवाद (वेदान्त) प्रतिष्ठित हुआ है. इस अद्वैतवाद के प्रतिष्ठित होने के बाद ( यह अष्टम शताब्दी की बात है.) अष्टम शताब्दी से लेकर " श्री चैतन्य महाप्रभु " के आविर्भूत होने तक से यह अद्वैतवाद कई बार खण्डित हुआ है|अद्वैतवाद के बाद द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद आदि अनेक वाद, श्री चैतन्य महाप्रभु **के आविर्भूत होने तक आठ-नौ प्रकार के वाद की सृष्टि हुई है. 
{** श्री कृष्ण-चैतन्य महाप्रभु का संक्षिप्त परिचय :  
श्री श्री चैतन्य महाप्रभु सन १४८६ में फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के दिन बंगाल के नवद्वीप में अवतीर्ण हुए. इनके पिता का नाम श्री जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शची देवी था. इनका नाम विश्वंभर रखा गया. माता ने इनका नाम निमाई रखा. इन्होंने एक पाठशाला खोली थी. पहली पत्नी के मरने के बाद, इनका दूसरा विवाह विष्णुप्रिया के साथ हुआ. निमाई ने गया में ईश्वर पूरी से दीक्षा ग्रहण किया.गया से लौटने के बाद गृहस्थी तथा पाठशाला के प्रति इनकी तीव्र वितृष्णा दिखायी देने लगी. नवद्वीप में पण्डित श्रीवास का आँगन संकीर्तन का मुख्य स्थान हुआ. संकीर्तन में प्रायः उनकी समाधी अवस्था तथा शरीर में दिव्य और अलौकिक प्रेम के लक्षण दिखाई देने लगे. साधारण लोग इस दिव्य भाव को उन्माद य़ा पागलपन कह कर उपहास करने लगे. एक दिन शांतिपुर के अद्वैताचार्य ने संकीर्तन के समय भाव में निमग्न निमाई की अपने इष्ट (श्रीकृष्ण) रूप में पूजा की. उस समय के समाज में श्री अद्वैताचार्य की विशेष मान्यता थी. उसी समय से भक्त लोग निमाई को गौरांग महाप्रभु के नाम से पुकार कर अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने लगे.   
जिस प्रकार चुम्बक के आकर्षण से लोहे के टुकड़े अपने आप चले आते हैं, उसी प्रकार गौरांग महाप्रभु के दिव्य लक्षणों से आकर्षित हो विभिन्न स्थानों से भक्त वैष्णवगण आने लगे. इनके अनन्य पार्षद श्री नित्यानन्द भी आ गये. भक्त वैष्णवगण नित्यानन्द को बलराम तथा गौरांग महाप्रभु को श्री कृष्ण का अवतार मान कर उपासना करने लगे. माता शची देवी नित्यानन्द को अपने प्रथम पुत्र विश्वरूप के समान प्यार करने लगी. वे इन्हें निताई कहने लगी. भक्तगण भी इन्हें निताई अथवा नित्यानन्द के नाम से पुकारने लगे.
नित्यानंदजी और हरिदासजी ने नगर में नाम-संकीर्तन का प्रचार कार्य चालू किया. वे रास्ते में जाते हुए हर व्यक्ति के चरणों में प्रणाम कर उनसे कृष्ण नाम जप करने की भिक्षा माँगने लगे. यह कार्य सहज नहीं था. कोई व्यंग करता था तो कोई गाली-गलौज तथा उपहास करता था. कुछ इनके प्रति श्रद्धा भी प्रदर्शित करते थे.
एकदिन  वे नवद्वीप के कुख्यात दस्यु जगन्नाथ एवं माधव (जगाई-मधाई ) के पास जोर-जोर से नाम-कीर्तन करते हुए पहुँचे.  उस समय दोनों शराब के नशे में थे. क्रोध में आकार मधाई ने नित्यानंद के सिर पर प्रहार कर दिया.नित्यानन्द के सिर से खून की धारा बह निकली. चारों तरफ भीड़ जम गयी. इसी समय गौरांग महाप्रभु भी वहाँ पहुँच गये. इनको क्षमा कर दिये, और नित्यानन्दजी ने करुणावश कहा- " आज तक तुमने जो कुछ पाप किये हैं वह सब मैंने ग्रहण किया. श्री कृष्ण की कृपा से तुम्हें दुर्लभ प्रेम की प्राप्ति हो|"  तब से जगन्नाथ और माधव दोनों पारं वैष्णव हो गये. इस प्रकार के ह्रदय परिवर्तन से लोगों को महाप्रभु की अलौकिक क्षमता पर विश्वास गहरा हो गया. इनके नाम पर नवद्वीप में गंगा जी का ' जगाई- माधाई घाट ' आज भी प्रसिद्ध है. 
उस समय नवद्वीप का शासक एक मुसलमान काजी था.वह उच्च स्वर से संकीर्तन को हिन्दू शास्त्र विरोधी कार्य कह कर बन्द करवा दिया, किन्तु जब महाप्रभु ने उसे नाम कीर्तन का माहात्म्य बताया, तो वह काजी भी परम वैष्णव बन गया. उसका समाधी आज नवद्वीप में ' काजी की समाधी ' नाम से प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में है.
गया से आने के एक वर्ष बाद महाप्रभु ने अपने मन में प्रेम-धर्म के प्रचार के लिये सन्यास लेने का विचार किया. और माता से अनुमति भी प्राप्त कर ली. एक दिन आधी रात के समय, विष्णुप्रिया को सोती हुई छोड़ कर अपने घर से सन्यास लेने के लिये, काटवा के प्रसिद्ध सन्त श्री केशवभारती के पास पहुँचे. सन्यास लेने के समय महाप्रभु की उम्र चौबीस वर्ष की थी. केशव भारतीजी ने गंगाजी के किनारे विरजा होम करवा कर सन्यास प्रदान किया. 
सन्यास लेने के बाद इनका नाम श्रीकृष्ण चैतन्य भारती पड़ा. पर वे चैतन्य महाप्रभु के नाम से ज्यादा परिचित हुए. सन्यास के बाद उन्होंने जगन्नाथपूरी में रहने का निश्चय किया.राज पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदान्त के अनुसार शिक्षा देने वाले प्रसिद्ध विद्वान् थे. महाप्रभु ने वेदान्त की आलोचना करते हुए भगवत-प्रेम की प्राप्ति करने को परम पुरुषार्थ एवं श्री भगवान (अवतार) को सच्चिदानंदमय प्रमाणित किया. महाप्रभु से इस प्रकार की अपूर्व व्याख्या सुन कर सार्वभौम आश्चर्य चकित हो गये.
अन्त में महाप्रभु ने सार्वभौम को अपना षट्भुज रूप दिखाया. इस घटना के बाद से सार्वभौम अपने इष्ट के रूप में महाप्रभु की पूजा करने लगे. अद्वैतवादी राज पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य की इस प्रकार की स्वीकृति से (अद्वैतवाद एक बार पुनः खण्डित हुआ) और एक ही श्लोक की महाप्रभु ने १८ तरह से व्याख्या करते हुए भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता को प्रमाणित कर दिया. फिर वे रामेश्वर की ओर अग्रसर हुए. भ्रमण करते हुए महाप्रभु श्री रंगमंदिर में पहुँचे. वहाँ एक भक्त ब्राह्मण संकृत का ज्ञान कम होने से भी रोज मन्दिर में बैठ कर गीता के १८ अध्याय का पाठ करता था, पर उसके अशुद्ध उच्चारण को देख कर साधारण लोग उसका उपहास करते थे. पर पाठ के समय भावावेश में उसके नेत्रों से अश्रु की धारा बहती रहती थी. एक दिन महाप्रभु ने उससे पूछा कि आप गीताजी का अर्थ समझ पाते हैं य़ा नहीं? 
ब्राह्मण ने उत्तर दिया- 
" मुझे गीताजी के श्लोकों का अर्थ कुछ भी समझ में नहीं आता है. पर जब मैं गीताजी का पाठ करता हूँ तब मुझे श्रीकृष्ण, अर्जुन को कुछ उपदेश दे रहे हैं, ऐसा दृश्य बिल्कुल स्पष्ट दिखायी  पड़ता है. श्रीकृष्ण के मधुर रूप को देख कर भावावेश में मैं रोता रहता हूँ |" 
महाप्रभु उसको अपने बाँहों में भर कर बोले- " भाई तुमको मूर्ख कौन कहेगा ? गीताजी का भावार्थ तुमने ही ठीक समझा है. तुम्हारा गीताजी का पाठ ही ठीक है ! "
साधारणतः लोग शब्दों की विभिन्न प्रकार की व्याख्या और पाण्डित्य प्रदर्शन में अपना समय व्यतीत करते हैं. जबकि हमारे शास्त्रों का प्रमुख उद्देश्य " ईश्वर-लाभ " (भगवत्प्राप्ति ) है! 
सके लिये सदगुरु से आवश्यक साधना की पद्धति को प्राप्त होने के बाद उसी में डूब जाना चाहिये. तभी लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है.लक्ष्य की प्राप्ति ( ईश्वर-प्राप्ति ) होने तक विश्राम नहीं लेना चाहिये!
दो वर्ष तक विभिन्न स्थानों में भ्रमण करने के बाद महाप्रभु रथ यात्रा के पहले पूरी पहुँचे.रथ के आगे संकीर्तन में महाप्रभु को मधुर प्रेमावेश में नृत्य करता देख कर  उत्कल राज प्रतापरूद्र भी सर्वदा के लिये महाप्रभु के भक्तों में सम्मिलित हो गये.
एक दिन नित्यानंदजी को बुलाकर मह्प्रभु ने कहा- " मैंने सर्वदा के लिये गृह-त्याग कर सन्यास ले लिया है.तुम भी यदि मेरी तरह अवधूत-वृत्ति से इधर-उधर भटकते रहो तो संसारी गृहस्थ लोगों का उद्धार कैसे होगा ?
मेरा अनुरोध है कि तुम विवाह करो. तुम्हारे द्वारा आदर्श गृहस्थ धर्म की स्थापना हो. गृहस्थ लोग तुम्हें अपनी दो पत्नियों के साथ भी 
आदर्श जीवन व्यतीत करते देख कर अपना जीवन भी उसी तरह व्यतीत करेंगे. मनुष्य के कल्याण के लिये तुम्हें गृहस्थ आश्रम में रहते हुए वैष्णव धर्म का प्रचार करना पड़ेगा. " 
तबतक नित्यानंदजी सन्यासी के समान अवधूत रूप में रहते थे पर उन्होंने सन्यास ग्रहन नहीं किया था. महाप्रभु के निर्देश से पूरी से वापस लौट कर नित्यानंदजी ने विवाह किया. खड़दह (प.बंगाल) में उन्होंने अपना अधिक समय व्यतीत किया.( खड़दह के प्रसिद्ध श्यामसुंदर के मन्दिर की कहानी नवनी दा पहले ही कह चुके हैं.) 
काशी में उस समय अद्वैतवादी सन्यासी संप्रदाय में स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती प्रधान माने जाते थे. काशी सदा से शास्त्र अध्यन का केन्द्र रहा है. उनकी विद्वता से प्रभावित हो कर विभिन्न स्थानों से, विद्यार्थी वेदान्त तथा अन्य शास्त्रों का अध्यन करने आते थे. महाप्रभु द्वारा नाम-संकीर्तन में भावावेश में किये गये नृत्य को उन्होंने सन्यासी के आचरण के प्रतिकूल कहा. 
सन्यासी होते हुए भी वेदान्त का अध्यन न कर महाप्रभु केवल नाम जप और संकीर्तन करते हैं, यह कार्य उन्हें अच्छा नहीं लगा. पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने विभिन्न शास्त्रों से प्रमाणित किया कि, मनुष्य जीवन का प्रधान लक्ष्य भगवत्प्रेम की प्राप्ति (ईश्वरलाभ करना है)!
और उसकी प्राप्ति की मुख्य साधना है- " नाम जप तथा नाम-संकीर्तन " (जैसे हमलोग खण्डन भवबन्धन आदि आरात्रिक गाते हैं) ! महाप्रभु के पास से वेदान्त-सूत्र य़ा ब्रह्मसूत्र की इस प्रकार व्याख्या सुन कर प्रकाशानंद जी महाप्रभु के शिष्य बन गये. इस परिवर्तन से काशी में भी महाप्रभु का नाम स्थापित हो गया.
काशी से भ्रमण करते हुए महाप्रभु नीलाचल पूरी पहुँचे. पूरी आने के बाद शेष १८ वर्ष उन्होंने वहीं बिताये. उत्तर और दक्षिण भारत की धर्म और संस्कृति  की मिलनभूमि है- नीलाचल पूरी. जहाँ के दारुब्रह्म श्री जगन्नाथ जी का दर्शन एवं महाप्रसाद का सेवन करके सारे भारतवर्ष के लोग अपने को धन्य समझते हैं. इसी नीलाचल से महाप्रभु धीरे-धीरे सारे भारतवर्ष (उत्तर-दक्षिण) में प्रसिद्ध हो गये. (नीलाचल पूरी में महामण्डल का केन्द्र है? उसको मजबूत करना होगा.)
पूरी में महाप्रभु गंभीरा नामक मठ में रहते थे. अपने भक्त हरिदास को प्रखर धूप में भी नाम जप मग्न देख कर छाया करने के लिये महाप्रभु ने मौलश्री (बकुल) की एक टहनी को जमीन में लगा दिया. थोड़े ही समय में उसने एक विशाल वृक्ष का आकार धारण कर लिया. आज भी पूरी में वह, ५०० वर्ष प्राचीन वृक्ष- 'सिद्ध बकुल वृक्ष ' के नाम से प्रसिद्ध है. 
महाप्रभु के गृहस्थ भक्तों में श्री अद्वैताचार्य, श्री नित्यानन्द, राघव पण्डित, श्रीवास आदि द्वारा वैष्णव धर्म का प्रचार हुआ.
साधारणतः दीक्षा की दो परम्परायें प्रचलित हैं. एक है त्यागी शिष्यों की ' शिष्य-प्ररम्परा ' (जैसे रामकृष्ण-विवेकानन्द भावधारा य़ा गुरु-शिष्य परम्परा) और दूसरी गृहस्थ महात्माओं की वंश परम्परा. गृहस्थ वैष्णवों की वंश परम्परा के आचार्य कुलगुरु कहलाते हैं. साधारण गृहस्थ लोग {जिनमे साधारण बोध (common sens ) कम रहता है? } इनके आदर्शों को आसानी से अनुसरण कर सकते हैं.
महाप्रभु के इस प्रकार त्यागी(निमाई) और गृहस्थ (निताई) वैष्णवों के द्वारा प्रेम-धर्म का प्रचार कार्य बहुत शीघ्रता से हुआ. 
(उसी प्रकार श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के द्वारा कहे गये महावाक्य - " ईश्वर ही वस्तु और सब अवस्तु है! " एवं " शिवज्ञान से जीव सेवा " पर आधारित नूतन प्रेमधर्म को पहले पूरे भारतवर्ष में;  फिर सम्पूर्ण पृथ्वी पर शीघ्रता से फैला देने के लिये मानव-प्रेमी स्वामी विवेकानन्द ने ठाकुर के त्यागी और गृहस्थ दोनों संतानों के लिये क्रमशः दो महावाक्य दिये| 
सन्यासियों के लिये-  " आत्मनोमोक्षार्थम जगत हिताय च "  एवं गृहस्थों (समाज के अभिभावकों  जैसे बासूदा, उषादा, रनेनदा...आदि) के लिये -" Be and Make " " मनुष्य बनो और बनाओ! "
इस प्रकार श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव के त्यागी और गृहस्थ भक्तों के सम्मिलित प्रयास( चरित्र निर्माण कारी आन्दोलन) के माध्यम से ठाकुर के  दोनों महावाक्य -" ईश्वर ही वस्तु और सब अवस्तु है! "एवं " शिवज्ञान से जीव सेवा " - सम्पूर्ण भारत में फ़ैल जाएगी!}
श्री चैतन्य महाप्रभु ने ' रागानुगा भजन ' भजन की पद्धति का प्रचार किया. उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा और न किसी ' विशिष्ट मतवाद ' पर आधारित मन्दिर आदि की स्थापना की. अपने उपदेशों को उन्होंने आठ श्लोकों में वर्णित किया है जो " शिक्षा-अष्टक" श्लोक के नाम से प्रसिद्ध है. वेदों में परमात्मा को सत चित आनन्दमय कहा गया है. महाप्रभु का जीवन मानो सत चित आनन्द का साकार विग्रह है. उनका कहना था- ईश्वर परम करुणामय एवं मंगलमय हैं, उनका प्रेम हर जीव पर समान रूप से है, मायाबद्ध जीव का उद्धार करना उनका मुख्य कार्य है.
{अपने दिव्य प्रेम से वे भक्तों को १००० माइल से भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं.स्वामी विवेकानन्द के आह्वान पर  महामण्डल के युवा- शिविर में भागलेने से भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस देव की कृपा दृष्टि युवा शिविरार्थी भाइयों पर अवश्य पड़ती है, और वे चरित्र-निर्माण के पथ पर अग्रसर हो जाते हैं. इस सत्य को हम-आप अपने व्यक्तिगत जीवन में आये परिवर्तन को देख कर समझ सकते हैं.} 
भगवान के साथ मनुष्य का नित्य सम्बन्ध है. वह ईश्वर का नित्य दास है. इस नित्य-सम्बन्ध को साधक (केवल चरित्रवान दीक्षाप्राप्त साधक) नामस्मरण (गुरु-प्रदत्त मन्त्र का स्मरण), विग्रह सेवा (T की छवि की पूजा ) मन में ठाकुर-माँ -स्वामीजी की लीला के स्मरण-मनन से साधक ' मनुष्य ' बन कर - " ब्रह्म अवलोक धिषनम पुरुषं विधाय मुदमाप देवः " का अर्थ जान लेने के बाद वह- प्रेम भक्ति धर्म (दिव्यप्रेम का ) अधिकारी (नेता) बनकर य़ा
" giver will kneel down and pray "and 
" reciever will standup and parmit " 
का अर्थ जानकर अपने को गुरु य़ा नेता रूपी ईश्वर (T) का नित्य दास मानने लगता है.} 
चाहे सन्यासी हो अथवा शूद्र य़ा ब्राह्मण, जिन्होंने श्री कृष्ण प्रेम की प्राप्ति की हो- (सिया-राममय जगत में मनुष्य को ही अपना इष्ट समझता है) - वही गुरु (नेता) हो सकता है. इसी कारण मुसलमान कुल में पालित होने पर भी ' हरिदासजी ' नामजप से जगत्पूज्य हो गये.
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान के ' रसो वै सः ' स्वरुप (God is LOVE ) को अपने जीवन से प्रकाशित किया. भगवान (महामण्डल के नेता) की लीला मधुरतम है. शब्द तथा मन के द्वारा इसका वर्णन (कल ही से चैतन्य महाप्रभु के " अचिन्त्य-भेदाभेद वाद " पर चर्चा हुई और आज (२५-७२०१० को) हावड़ा स्टेसन के सर्वोदय बुकस्टाल में प्रो. रामसिंह तोमर,हिन्दी भवन, विश्भारती, शान्तिनिकेतन द्वारा लिखित पुस्तक मेरे हाथ में कैसे आ गयी ?) विश्वास पूर्वक सब समय नाम स्मरण एवं संकीर्तन की जगह केवल महामण्डल का कार्य करने से भक्तगण ठाकुर की कृपा का अनुभव कर सकते हैं.
इस परम तत्व को उन्होंने " अचिन्त्य- भेदाभेद " नाम से कहा है.सच्चिदानंदमय भगवान की लीला " अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल " का युवा प्रशिक्षण शिविर पूर्ण -साधना पथ है.}
भगवान की लीला मधुरतम है. उनकी लीला में विरह और मिलन दोनों सत्य हैं. शब्द और मन के द्वारा इसका वर्णन और इसकी धारणा करना असम्भव है. विश्वासपूर्वक सब समय नाम स्मरण एवं संकीर्तन से भक्तगण उनकी कृपा अनुभव कर सकते हैं. इस परम तत्व को उन्होंने " अचिन्त्य- भेदाभेद " नाम से कहा है. सच्चिदानंदमय की लीला पूर्ण है. उनकी उपासना ही मनुष्य जीवन का प्रधान कर्तव्य है. इस सहज मार्ग का प्रदर्शन श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन में दर्शाया. ( श्री श्री विजयकृष्ण भक्त संघ पोस्ट -रघुनाथपुर, जिला- पुरुलिया, पश्चिम बंगाल पिन कोड- ७२३१३३ द्वारा प्रकाशित पुस्तक साधना पथ नामक पुस्तक के अंश से साभार लिया गया )                   
               श्रीचैतन्य ने स्वयं लिख कर किसी वाद की रचना नहीं की है; किन्तु उन्होंने जो उपदेश दिये हैं, अपने भावों को जिस प्रकार से अभिव्यक्त किया है, उन सबको आधार मानकर उनकी शिष्य-परम्परा ने उनसबको ग्रथित किया है, एवं इस प्रकार से संग्रहित करके उनके भाव को - " अचिन्त-भेदाभेद " भाव कहते हैं. कितना अपूर्व भाव है, भेद और अभेद - ये दोनों अचिन्त्य हैं. अब इस अचिन्त-भेदाभेद से भी शंकर का अद्वैतवाद एक पुनः खण्डित हुआ| फिर उसकी पुनर्प्रतिष्ठा भी हुई.
इसी प्रकार हम समझ सकते हैं कि से सप्तम शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक, यह अद्वैतवाद कई-कई बार खण्डित होकर पुनः पुनः प्रतिष्ठित होता आया है ! 
(पूर्ण चन्द्र को देखकर समुद्र जैसा प्रसन्न होना चाहिये। ईर्ष्या नहीं करो, जलो मत,दूसरों को बढ़ता देखकर प्रसन्न हो जाओ। पौन्ड्रक राजा नकली हाथ लगाकर अपने कृष्ण कहने लगा। कृष्ण के घर झगड़ा क्यों नहीं है ? मैं एक से अनेक हो सकता हूँ, फिर अनेक से एक हो सकता हूँ। नारद को दिखाया कि सभी नारियों के साथ ईश्वर बैठ सकते हैं, नारद कृष्ण को साधारण मनुष्य समझने की भूल कर रहे थे।
भीम के साथ जरासंध का युद्ध २७ दिन क्यों चला ? जरासंध सब के उपर अपना प्रभाव डालता है। संसार में जो आएगा उसको बुढ़ापे से युद्ध करना ही पड़ेगा। सीढ़ी पर चढ़ते समय घुटना से रोज हराता है।जरासंध को कैसे हराएँ ? मानसिकता बनानी होगी, रीभैटल खाओ, पर ममता मत आने दो, दोनों बेटों से सामान प्रेम नहीं होगा, छोटका कैसे भी एडजेस्ट हो जाये! तो प्राण ठीक से निकलें , भजन नहीं करोगे तो ह्रदय जलता रहेगा।भजन करना सीख लेंगे तो चिंता निवृत हो जाती है। भीम को संकेत-सूत्र में जरासंध को मारने उपाय दिए,एक फूल को बीच से तोड़ कर विपरीत दिशा में फेंक दिए। माने-शरीर को संसार की सेवा में लगा दो,मन को भगवान में लगा दो. हमलोग उल्टा ही करते हैं, शरीर से गंगा में डुबकी लगाते हैं, पर मन में पति,पुत्र,पोता रहता है, उनके नाम की भी डूबकी लगते हैं। पोता-नाती से नाता नहीं जोड़ कर प्रभु में नाता जोड़ो। पुत्र के विवाह के बाद श्रीकृष्ण ने १६००० विवाह किया था। श्यामान्तक मणि से ८ तोला सोना प्रकट होता था। श्रीकृष्ण ने कहा सत्राजित तुम उस मणि को राजकोष में जमा कर दो।राजनीती ये कहती है कि सीमा से अधिक धन किसी के पास नहीं हो, जैसे आजकल टैक्स लगता है। वो नहीं माना, तो बाद में वार्ता से समझाने का तारीख दिए। इसी बीच उसके भाई प्रसेन को मार कर वो मणि एक भालू ने ले लिया। पर सत्राजित ने कलंक लगाया की श्रीकृष्ण ने ही मणि लेने के लिये मार दिया। उसी दिन श्रीकृष्ण ने कुर्सी छोड़ दिया। और खुद खोज में निकले। आज तो कोई प्रमाण होने से भी इस्तीफा नहीं देता। सारी लीला में मंथरा कारण नहीं है, सरसवती का भी नहीं है, सबकुछ ठाकुर की इच्छा है। माया को नचाने वाले भगवान श्रीराम हैं। देखा आँख ने, मुख ने चखा और पेट ने रखा। आम के मालिक ने चार डंडा मारा , मार किसको लगी पीठ को, आंसू कहाँ से निकले आँखों से, शुरुआत जहाँ से होती है, अंत में दंड भी उसको ही मिलता है। रघुवीर ही पृथ्वी के श्रेष्ठ वीर हैं, जामवंत से युद्ध अगले अवतार करूँगा। आपकी कला मैं लीला पुरुषोत्तम में देखूंगा। ]
      
     
 
 

No comments: