Saturday, June 12, 2010

[25] " प्रेमिक महाराज तथा आन्दुल काली-कीर्तन समिति "


" प्रेमिक महाराज के पिता स्वामीजी की मातृदेवी के दीक्षा-गुरु थे "
पुनः आन्दुल की ओर लौटता हूँ. आन्दुल के महेन्द्रनाथ भट्टाचार्य ' प्रेमिक महाराज ' के नाम से प्रसिद्ध थे. किन्तु हमलोगों के स्कूल में कुछ समय तक वे भी संस्कृत के हेड पण्डित रहे थे. वे एक प्रसिद्ध  तान्त्रिक थे. उनके गुरु भी तान्त्रिक थे. तन्त्र की साधना का अधिकांश भाग आन्दुल में अपने ही पैत्रिक परम्परा में किये थे, और उसी साधना के फलस्वरूप श्यामा संगीत की एक नयी धारा की शुरुआत करते हुए एक नये ढंग से असाधारण गीतों की रचना की थी. 
 ये समस्त रचनाएँ बंगलादेश की प्राचीन श्यामा संगीत परम्परा से कुछ स्वतन्त्र हैं. इसमें कृष्ण विषयक वैष्णव पदावली से शुरू करते हुए, नाना संगीत धाराओं के निकट काली कीर्तन के एक नयी संगीत की धारा दृष्टिगोचर होती है. 
पहले बंगाल में दो धाराओं की कीर्तन परम्परा थी. वे भी अति सुन्दर था. किन्तु प्रेमिक महाराज ने एक नयी धारा का निर्माण किया था. इसमें शाक्त कीर्तन परम्परा के साथ तान्त्रिक परम्परा भी मिली हुई है.
इसीलिये यह (श्यामा संगीत न हो कर) कालीकीर्तन के नाम से प्रसिद्ध हुई है. एवं उनके द्वारा आविष्कृत यह कालीकीर्तन चारों ओर एक नयी चेतना जगाने में सफल हुई थी. उनके साथ हमलोगों के आचार्यदेव शिरीषचन्द्र का परिचय हुआ था, आपस में मिलना जुलना हुआ करता था. एवं उनका एक दल कलकत्ता के किसी भाग में रहता भी था,और वे लोग बीच बीच में ठाकुर के पास जाया भी करते थे. वचनामृत में एक जगह में लिखा है कि काली-कीर्तन का जो दल जाता था एक दिन उसमे एक विशिष्ट व्यक्ति भी गये थे, हलाकि उनके नाम का उल्लेख नहीं है. अनुमान किया जाता है कि वे प्रेमिक महाराज ही थे. किन्तु वहाँ पर स्पष्ट रूप से उनके नाम का उल्लेख नहीं है. 
बेलूड़ मठ स्थापित हो जाने के बाद ठाकुर के प्रथम आविर्भाव दिवस के अवसर पर स्वामीजी कि इच्छा हुई कि आन्दुल के प्रेमिक महाराज का कालीकीर्तन होना चाहिये. वे स्वयं आन्दुल जाकर इसके लिये निमंत्रण कर आये.मन में प्रश्न उठता है कि निमंत्रण देने के लिये वे स्वयं आन्दुल क्यों गये थे? 
 थोड़ा प्रयास करने से इसका उत्तर पाया जा सकता है. स्वामीजी के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त ने लिखा है, आन्दुल-मौड़ी निवासी श्रीताराप्रसन्न भट्टाचार्य से उन्होंने सुना है कि शिमुलिया के दत्त वंश के कुलगुरु उन्हीं लोगों (प्रेमिक महाराज के) के वंश के थे. इसीलिये आन्दुल-मौड़ी शिमुलिया के दत्त परिवार का गुरु-पीठ है. 
श्रीताराप्रसन्न के प्रपितामह (' प्रेमिक महाराज ' नाम से प्रसिद्ध महेन्द्रनाथ भट्टाचार्य के पिता) माधवचन्द्र भट्टाचार्य - स्वामीजी, महेन्द्रनाथ और भूपेन्द्रनाथ दत्त के मातृदेवी के दीक्षागुरु थे. शायद पारिवारिक गुरुपीठ और विशेषकर मातृदेवी के गुरुगृह में गठित कालीकीर्तन गोष्ठी की मर्यादा को ध्यान में रखने के कारण ही स्वामीजी स्वयं जाकर निमंत्रण करना उचित समझे होंगे.
इसीलिये प्रेमिक महाराज का परिवार और स्वामीजी का परिवार एक आध्यात्मिक सूत्र से बंधा हुआ था. उस समय से लेकर अभी एक सौ वर्ष से भी अधिक वर्ष हो गया है, बेलूड़ मठ में ठाकुर के जन्मोत्सव पर प्रतिवर्ष आन्दुल का कालीकीर्तन ही आयोजित हुआ करता है. 
आन्दुल के काली-कीर्तन समिति के साथ मैं तो बहुत दिनों पूर्व से जुड़ा हुआ नहीं हूँ, हाँ १५-२० वर्ष से हुआ होगा, प्रेमिक महाराज के जन्मोत्सव में जब मुझे बुलाते हैं, तो जाना पड़ता है, बोलना पड़ता है. एक बार इनलोगों को महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों में काली-कीर्तन सुनाने के लिये निमन्त्रण देकर बुलवाया गया था, तब मैं बहुत असुविधा में पड़ गया था. उस समय उनलोगों ने, प्रेमिक महाराज का थोड़ा परिचय देते हुए उनके द्वारा रचित जो विभिन्न गीत रचे गये हैं, उन गीतों में जो अन्तर्निहित भाव हैं, वे स्पष्ट होते हों ऐसा कुछ लिख देने का अनुरोध किया. उस समय उन गीतों के विषय-वस्तु को लेकर थोड़ा अधिक ही कल्पना और चिन्तन करना पड़ा था, और सम्पूर्ण प्रसंग को लिख कर देना पड़ा था. जीवन नदी के हर मोड़ पर-२६  jnbb -पेज ५२
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