परिच्छेद १०६.
(१)
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
🔆🙏कीर्तनानन्द में भी, श्रीरामकृष्ण का नरेन्द्र के प्रति विशेष प्रेम🔆🙏
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में उत्तर-पूर्ववाले लम्बे बरामदे में गोपी-गोष्ठ तथा सुबल-मिलन-कीर्तन सुन रहे हैं । नरोत्तम कीर्तन कर रहे हैं । आज फाल्गुन शुक्लाष्टमी है, रविवार 22 फरवरी, 1885 ई. । भक्तगण उनका जन्म-महोत्सव मना रहे हैं । गत सोमवार, फाल्गुन शुक्ल द्वितीया के दिन उनकी जन्मतिथि थी । नरेन्द्र, राखाल, बाबूराम, भवनाथ, सुरेन्द्र, गिरीन्द्र, विनोद, हाजरा, रामलाल, राम, नित्यगोपाल, मणि मल्लिक, गिरीश, सींती के महेन्द्र वैद्य आदि अनेक भक्तों का समागम हुआ है । कीर्तन प्रातः काल से ही चल रहा है । अब सुबह आठ बजे का समय होगा । मास्टर ने आकर प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण ने पास बैठने का इशारा किया ।
[ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ দক্ষিণেশ্বর-মন্দিরে উত্তর-পূর্ব লম্বা বারান্দায় গোপীগোষ্ঠ ও সুবল-মিলন কীর্তন শুনিতেছেন। নরোত্তম কীর্তন করিতেছেন। আজ রবিবার, ২২শে ফেব্রুয়ারি ১৮৮৫ খ্রীষ্টাব্দ, ১২ই ফাল্গুন, ১২৯১, শুক্লাষ্টমী। ভক্তেরা তাঁহার জন্মমহোৎসব করিতেছেন। গত সোমবার ফাল্গুন শুক্লা দ্বিতীয়া তাঁহার জন্মতিথি গিয়াছে। নরেন্দ্র, রাখাল, বাবুরাম, ভবনাথ, সুরেন্দ্র, গিরীন্দ্র, বিনোদ, হাজরা, রামলাল, রাম, নিত্যগোপাল, মণি মল্লিক, গিরিশ, সিঁথির মহেন্দ্র কবিরাজ প্রভৃতি অনেক ভক্তের সমাগম হইয়াছে। কীর্তন প্রাতঃকাল হইতেই হইতেছে, এখন বেলা ৮টা হইবে। মাস্টার আসিয়া প্রণাম করিলেন। ঠাকুর ইঙ্গিত করিয়া কাছে বসিতে বলিলেন।
SRI RAMAKRISHNA was sitting on the northeast verandah outside his room at Dakshineswar. It was about eight o'clock in the morning. Many devotees, including Narendra, Rakhal, Girish, Baburam, and Surendra, were present. They were celebrating the Master's birthday, which had fallen on the previous Monday. M. arrived and saluted him. The Master signed to him to take a seat near him.
कीर्तन सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हो गये हैं । श्रीकृष्ण को गौएँ चराने के लिए आने में विलम्ब हो रहा है । कोई ग्वाला कह रहा है, 'यशोदा माई आने नहीं दे रही हैं ।' बलराम (बलाई) जिद करके कह रहे हैं, 'मैं सींग बजाकर कन्हैया को ले आऊँगा ।' बलराम (बलाई) का प्रेम अगाध है !
[কীর্তন শুনিতে শুনিতে ঠাকুর ভাবাবিষ্ট হইয়াছেন। শ্রীকৃষ্ণের গোচারণে আসিতে দেরি হইতেছে। কোন রাখাল বলিতেছেন, মা যশোদা আসিতে দিতেছেন না। বলাই (Balai-बलराम) রোখ করিয়া বলিতেছে, আমি শিঙ্গা বাজিয়ে কানাইকে আনিব। বলাই-এর অগাধ প্রেম।
Narottam was singing kirtan. Sri Ramakrishna was in partial ecstasy. The subject was Krishna's meeting with His cowherd friends in the meadow. Krishna had not yet arrived. The cowherd boys were restless for Him. One of them said that Mother Yasoda was preventing Krishna from coming. Balai said in a determined voice that he would bring Krishna with the sound of his horn.
कीर्तनकार फिर गा रहे हैं । श्रीकृष्ण बंसरी बजा रहे हैं । गोपियाँ और गोप बालकगण बंसरी की ध्वनि सुन रहे हैं और उनमें अनेकानेक भाव उठ रहे हैं ।
[কীর্তনিয়া আবার গাহিতেছেন। শ্রীকৃষ্ণ বংশীধ্বনি করিতেছেন। গোপীরা, রাখালেরা, বংশীরব শুনিতেছেন, তাহদের নানাভাব উদয় হইতেছে।
Balai's love for Krishna knew no bounds. The music went on. The cowherd boys and girls heard Krishna's flute and were filled with spiritual emotion.
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठकर कीर्तन सुन रहे हैं । एकाएक नरेन्द्र की ओर उनकी दृष्टि पड़ी । नरेन्द्र पास ही बैठे थे । श्रीरामकृष्ण खड़े होकर समाधिमग्न हो गये । नरेन्द्र के घुटने को एक पैर से छूकर खड़े हैं ।
[ঠাকুর বসিয়া ভক্তসঙ্গে কীর্তন শুনিতেছেন। হঠাৎ নরেন্দ্রের দিকে তাঁহার দৃষ্টিপাত হইল। নরেন্দ্র কাছেই বসিয়াছিলেন, ঠাকুর দাঁড়াইয়া সমাধিস্থ। নরেন্দ্রের জানু এক পা দিয়া স্পর্শ করিয়া দাঁড়াইয়াছেন।
Suddenly Sri Ramakrishna's eyes fell on Narendra, who was sitting very near him. He stood up and went into samadhi; he stood there touching Narendra's knee with his foot. Regaining consciousness he took his seat again. Narendra left the room. The music went on.
श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ होकर फिर बैठे । नरेन्द्र सभा से उठकर चले गये । कीर्तन चल रहा है ।
[ঠাকুর প্রকৃতিস্থ হইয়া আবার বসিলেন। নরেন্দ্র সভা হইতে উঠিয়া গেলেন। কীর্তন চলিতেছে।
श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम से धीरे धीरे कहा, 'कमरे में खीर है, जाकर नरेन्द्र को दे दो ।'
[শ্রীরামকৃষ্ণ বাবুরামকে আস্তে আস্তে বলিলেন, ঘরে ক্ষীর আছে নরেন্দ্রকে দিগে যা।
Sri Ramakrishna whispered to Baburam: "There is kshir in the room. Give Narendra some."
क्या श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र के भीतर साक्षात् नारायण का दर्शन कर रहे हैं ?
[ঠাকুর কি নরেন্দ্রের ভিতর সাক্ষাৎ নারায়ণদর্শন করিতেছিলেন!
Did the Master see Narendra as the embodiment of God?
कीर्तन के बाद श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आये हैं और नरेन्द्र को प्यार के साथ मिठाई खिला रहे हैं ।
[কীর্তনান্তে শ্রীরামকৃষ্ণ নিজের ঘরে আসিয়াছেন ও নরেন্দ্রকে আদর করিয়া মিঠাই খাওয়াইতেছেন।
After the kirtan Sri Ramakrishna returned to his room. Tenderly he began to feed Narendra with sweets.
गिरीश का विश्वास है कि ईश्वर श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए हैं ।
[গিরিশের বিশ্বাস যে, ঈশ্বর শ্রীরামকৃষ্ণরূপে অবতীর্ণ হইয়াছেন।
It was Girish's belief that God Himself had been born in the person of Sri Ramakrishna.
गिरीश - (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - आपके सभी काम श्रीकृष्ण की तरह हैं । श्रीकृष्ण जैसे यशोदा के पास तरह तरह के ढोंग करते थे ।
[গিরিশ (শ্রীরামকৃষ্ণের প্রতি) — আপনার সব কার্য শ্রীকৃষ্ণের মতো। শ্রীকৃষ্ণ গোবর্ধনগিরি ধারণ করেছিলেন, আর নন্দের কাছে দেখাচ্ছেন, পিঁড়ে বয়ে নিয়ে যেতে কষ্ট হচ্ছে!
GIRISH (to the Master): "Your ways are like Krishna's. He too pretended many things to His mother Yasoda."
श्रीरामकृष्ण - हाँ, श्रीकृष्ण अवतार जो हैं । नरलीला में उसी प्रकार होता है । इधर गोवर्धन पहाड़ को धारण किया था, और उधर नन्द के पास दिखा रहे हैं कि पीढ़ा उठाने में भी कष्ट हो रहा है !
[MASTER: "True. It was because Krishna was an Incarnation of God. When God is born as a man He acts that way. You see, Krishna easily lifted the hill of Govardhan with His hand, but He made Nanda believe that He found it very hard to carry a footstool."
गिरीश – समझा । आपको अब समझ रहा हूँ ।
[গিরিশ — বুঝেছি, আপনাকে এখন বুঝেছি।
GIRISH: "Yes, sir, I have understood you now."
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
🙏'माँ', समाधि मन्दिर में अकेली बैठी हुई तुम कौन हो ?🙏
[दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का जन्म-महोत्सव]
[জন্মোৎসবে নববস্ত্র পরিধান, ভক্তগণকর্তৃক সেবা ও সমাধি ]
श्रीरामकृष्ण छोटे तखत पर बैठे हैं । दिन के ग्यारह बजे का समय होगा । राम आदि भक्तगण श्रीरामकृष्ण को नवीन वस्त्र पहनायेंगे । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "नहीं, नहीं ।" एक अंग्रेजी पढ़े हुए व्यक्ति को दिखाकर कह रहे हैं, "वे क्या कहेंगे !" भक्तों के बहुत जिद करने पर श्रीरामकृष्ण ने कहा, “तुम लोग कह रहे हो, अच्छा लाओ, पहन लेता हूँ ।”
[ঠাকুর ছোট খাটটিতে বসিয়া আছেন। বেলা ১১টা হইবে। রাম প্রভৃতি ভক্তেরা ঠাকুরকে নববস্ত্র পরাইবেন। ঠাকুর বলিতেছেন — “না, না।” একজন ইংরেজী পড়া লোককে দেখাইয়া বলিতেছেন, “উনি কি বলবেন!” ভক্তেরা অনেক জিদ করাতে ঠাকুর বলিলেন — “তোমরা বলছ পরি।”
Sri Ramakrishna was sitting on the small couch. It was about eleven o'clock. Ram and the other devotees wanted to dress him in a new cloth. The Master said, "No, no." Pointing to an English-educated man, he said, "What will he say about it?" At the earnest request of the devotees he said, "Well, since you insist, I shall have to agree."
भक्तगण उसी कमरे में श्रीरामकृष्ण के भोजन आदि की तैयारी कर रहे हैं । श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र को जरा गाने के लिए कह रहे हैं । नरेन्द्र गा रहे हैं –
निविड़ आँधारे माँ तोर चमके ओ-रूपराशि।
ताई योगी ध्यान धरे, होये गिरिगुहावासी।।
अभय -पद -कमले प्रेमेर-ई बिजली खेले ।
चिन्मय मुखमण्डले शोभे, अट्ट- अट्ट- हासि।।
महाकाल रूप धरि , आँधार बसन परि।
महासमाधिमन्दिरे माँ के तुमि गो एका बसि।।
अनन्त आँधार कोले , महानिर्वाण हिल्लोले।
चिरशान्ति परिमल , अविरल जाय भासि।।
महासमाधिमन्दिरे माँ के तुमि गो एका बसि।।
(भावार्थ) - "माँ, घने अन्धकार में तेरा रूप चमकता है । इसीलिए योगी पर्वत की गुफा में निवास करता हुआ ध्यान लगाता है । तुम्हारे अभय चरणकमलों में प्रेम की जो बिजली चमकती हैं, वही तुम्हारे चिन्मय मुखमण्डल पर हास्य बन कर शोभायमान है । अनन्त अन्धकार की गोदी में, महानिर्वाण के हिल्लोल में चिर शान्ति का परिमल लगातार बहता जा रहा है । महाकाल का रूप धारण कर, अन्धकार का वस्त्र पहन, माँ, समाधिमन्दिर में अकेली बैठी हुई तुम कौन हो ? "
ভক্তেরা ওই ঘরেতেই ঠাকুরের অন্নাদি আহারের আয়োজন করিতেছেন।ঠাকুর নরেন্দ্রকে একটু গান গাইতে বলিতেছেন। নরেন্দ্র গাহিতেছেন:
নিবিড় আঁধারে মা তোর চমকে ও রূপরাশি ৷
তাই যোগী ধ্যান ধরে হয়ে গিরিগুহাবাসী ৷৷
অনন্ত আঁধার কোলে, মহার্নিবাণ হিল্লোলে ৷
চিরশান্তি পরিমল, অবিরল যায় ভাসি ৷৷
মহাকাল রূপ ধরি, আঁধার বসন পরি ৷
সমাধিমন্দিরে মা কে তুমি গো একা বসি ৷৷
অভয়-পদ-কমলে প্রেমের বিজলী জ্বলে ৷
চিন্ময় মুখমণ্ডলে শোভে অট্ট অট্ট হাসি ৷৷
The devotees were arranging the Master's meal in the room. He asked Narendra to sing. Narendra sang: "In dense darkness, O Mother, Thy formless beauty sparkles; Therefore the yogis meditate in a dark mountain cave. From the Lotus of Thy fear-scattering Feet flash Thy love's lightnings; Thy Spirit-Face shines forth with laughter terrible and loud! In the lap of boundless dark, on Mahanirvana's waves upborne, Peace flows serene and inexhaustible. Taking the form of the Void, in the robe of darkness wrapped, Who art Thou, Mother, seated alone in the shrine of samadhi?"
नरेन्द्र ने ज्योंही गाया, 'माँ, समाधि मन्दिर में अकेली बैठी हुई तुम कौन हो ? - उसी समय श्रीरामकृष्ण बाह्यज्ञान-शून्य होकर समाधिमग्न हो गये । बहुत देर बाद समाधि भंग होने पर भक्तों ने श्रीरामकृष्ण को भोजन के लिए आसन पर बैठाया । अभी भी भाव का आवेश है । भात खा रहे हैं, परन्तु दोनों हाथ से भवनाथ से कह रहे हैं, "तू खिला दे !" भाव का आवेश अभी है, इसीलिए स्वयं खा नहीं पा रहे हैं । भवनाथ उन्हें खिला रहे हैं ।
[নরেন্দ্র যাই গাইলেন, ‘সমাধিমন্দিরে মা কে তুমি গো একা বসি!’ অমনি ঠাকুর বাহ্যশূন্য, সমাধিস্থ। অনেকক্ষণ পরে সমাধিভঙ্গের পর ভক্তেরা ঠাকুরকে আহারের জন্য আসনে বসাইলেন। এখনও ভাবের আবেশ রহিয়াছে। ভাত খাইতেছেন কিন্তু দুই হাতে। ভবনাথকে বলিতেছেন, “তুই দে খাইয়ে।” ভাবের আবেশ রহিয়াছে তাই নিজে খাইতে পারিতেছেন না। ভবনাথ তাঁহাকে খাওয়াইয়া দিতেছেন।
As Narendra sang the line, "Who art Thou, Mother, seated alone in the shrine of samadhi?", Sri Ramakrishna went into deep samadhi and lost all outer consciousness. After a long time, when he was regaining partial consciousness, the devotees seated him on the carpet and placed a plate of food before him. Still overcome with divine emotion, he began to eat the rice with both hands. He said to Bhavanath, "Feed me." Because of his ecstatic mood he could not use his own right hand. Bhavanath began to feed him.
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
🔆🙏"नदे टलमल करे , गौर प्रेमेर हिल्लोले रे।" 🔆🙏
[ নদে টলমল টলমল করে,গৌর প্রেমের হিল্লোলে রে।]
[See how all Nadia is shaking, Under the waves of Gauranga's love!]
श्रीरामकृष्ण ने बहुत कम भोजन किया । भोजन के बाद राम कह रहे हैं, "नित्यगोपाल आपकी जूठी थाली में खायेगा ।"
[ ঠাকুর সামান্য আহার করিলেন। আহারান্তে রাম বলিতেছেন, ‘নিত্যগোপাল পাতে খাবে।’
Sri Ramakrishna could eat very little. Ram said to him, "Nityagopal will eat from your plate."
श्रीरामकृष्ण - मेरी जूठी थाली में ? क्यों ?
[শ্রীরামকৃষ্ণ — পাতে? পাতে কেন?
MASTER: "Why from my plate? Why?"
राम - क्यों क्या हुआ ? भला आपको जूठी थाली में क्यों न खाये ?
[রাম — তা আর আপনি বলছেন! আপনার পাতে খাবে না?
RAM: "Why not?"
नित्यगोपाल को भावमग्न देखकर श्रीरामकृष्ण ने एक-दो कौर खिला दिये ।
[নিত্যগোপালকে ভাবাবিষ্ট দেখিয়া ঠাকুর তাহাকে দু-একগ্রাস খাওয়াইয়া দিলেন।
Nityagopal was also in an ecstatic mood. The Master put a morsel or two into his mouth with his own hand.
अब कोन्नगर के भक्तगण नाव पर सवार होकर आये हैं । उन्होंने कीर्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण के कमरे में प्रवेश किया । कीर्तन के बाद वे जलपान करने के लिए बाहर गये । नरोत्तम कीर्तनकार श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हैं । श्रीरामकृष्ण नरोत्तम आदि से कह रहे हैं, "इनका मानो नाव चलानेवाला गाना !" गाना ऐसा होना चाहिए कि सभी नाचने लगें । इस प्रकार के गाने गाने चाहिए – "नदे टलमल करे , गौर प्रेमेर हिल्लोले रे।"
(भावार्थ) - " ओ रे ! गौर-प्रेम की हिलोर से सारा नदिया शहर झूम रहा है ।’
[কোন্নগরের ভক্তগণ নৌকা করিয়া এইবার আসিয়াছেন। তাঁহারা কীর্তন করিতে করিতে ঠাকুরের ঘরে প্রবেশ করিলেন। কীর্তনান্তে তাঁহারা জলযোগ করিতে বাহিরে গেলেন। নরোত্তম কীর্তনিয়া ঠাকুরের ঘরে বসিয়া আছেন। ঠাকুর নরোত্তম প্রভৃতিকে বলিতেছেন, “এদের যেন ডোঙ্গা-ঠেলা গান। এমন গান হবে যে সকলে নাচবে! “এই সব গান গাইতে হয়: " নদে টলমল টলমল করে,গৌর প্রেমের হিল্লোলে রে।"
Some devotees from Konnagar arrived by boat. They entered Sri Ramakrishna's room singing kirtan; afterwards they went out to take some refreshments. Narottam was in the room. The Master said to him and the other devotees: "The music of the Konnagar devotees was dull. Music should be so lively as to make everyone dance. One should sing a song like this: " See how all Nadia is shaking, Under the waves of Gauranga's love! "
(नरोत्तम के प्रति) - "उसके साथ यह कहना होता है –
जादेर हरि बलते नयन झरे , तारा , दूभाई ऐसेछे रे।
जारा मार खेये प्रेम याचे , तारा , दूभाई ऐसेछे रे।।
जारा आपनि केँदें जगत काँदाय, तारा, दूभाई ऐसेछे रे।
जारा आपनि मेते जगत माताय , तारा, दूभाई ऐसेछे रे।
जारा आचण्डाले कोल देय , तारा, दूभाई ऐसेछे रे।
(भावार्थ) – “ओ रे ! 'हरिनाम कहते ही जिनके आँसू झरते हैं, वे दोनों भाई (गौरांग और नित्यानन्द ^ ) आये हैं । ओ रे ! जो मार खाकर प्रेम देना चाहते हैं, वे दो भाई आये हैं । ओ रे, जो स्वयं रोकर जगत् को रुलाते हैं, वे दो भाई आये है । ओ रे ! जो स्वयं मतवाले बनकर दुनिया को मतवाला बनाते हैं, वे दो भाई आये हैं। ओ रे! जो चण्डाल तक को गोदी में उठा लेते हैं, वे दो भाई आये हैं !!”
[दोनों भाई ^ ****जै निताई -निमाई !!:---जब-जब भारत वर्ष में भक्ति की महिमा का वर्णन किया जाता रहेगा, तब-तब श्री गौरांग महाप्रभु [अर्थात चैतन्य महाप्रभु (18 फरवरी, 1486-1534)] और श्री नित्यानन्द प्रभु [निताई प्रभु-(1474 -1599)] का उल्लेख किया जायेगा, जो कि भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रणेताओं में से एक हैं। ‘गौरांग’ का अर्थ है ‘स्वर्ण जैसा’ , जो कि चैतन्य महाप्रभु का हि दूसरा नाम है और ‘निताई’, नित्यानन्द प्रभु का हि लघु नाम है। अतः निताई प्रभु की दया के बिना न तो गौरांग महाप्रभु को समझा ही जा सकता है न हि उनकी कृपा पाई जा सकती है । प्रभु निताई और गौरांग महाप्रभु एक-दूसरे के चिरकालिक सखा और सहयोगी रहे हैं । शायद ही कभी ऐसा अवसर आया होगा जब निताई प्रभु के नाम के साथ गौरांग महाप्रभु का नाम नहीं लिया गया होगा। निताई प्रभु गौरांग महाप्रभु के सखा और शिष्य दोनों ही थे । उन्होंने अपना सारा जीवन भक्ति के प्रचार-प्रसार और गौरांग महाप्रभु की सेवा में व्यतीत कर दिया । नित्यानन्द प्रभु चैतन्य महाप्रभु के प्रथम शिष्य थे। इन्हें निताई भी कहते हैं। नित्यानंद जी को गौरांग महाप्रभु के बड़े भाई का दर्जा प्राप्त हुआ , दोनों के शरीर भिन्न होने पर भी एकात्म ही थे। श्री गौरांग ने इन्हें गृहस्थ धर्म पालन करने तथा बंगाल में कृष्णभक्ति का प्रचार करने का आदेश दिया। यह गौड़ देश लौट आए। अंबिका नगर के सूर्यनाथ पंडित की दो पुत्रियों वसुधा देवी तथा जाह्नवी देवी से इन्होंने विवाह किया। इसके अनंतर नवनीदा के जन्मस्थान खड़दह ग्राम में आकर बस गए और श्री श्यामसुंदर की सेवा स्थापित की।]
"फिर यह भी गाना चाहिए –
गौर निताई तोमरा दूभाई , परम दयाल हे प्रभु !
आमि ताई सुने ऐसेछि हे नाथ ;
तोमरा नाकि आचण्डाले दाओ कोल ,
कोल दिये बल हरीबोल।।
(भावार्थ) – “हे प्रभो, गौर निताई, तुम दोनों भाई परम दयालु हो । हे नाथ, यही सुनकर मैं आया हूँ, सुना है कि तुम चण्डाल तक को गोदी में उठा लेते हो, और गोदी में उठाकर उसे हरि नाम करने को कहते हो ।"
[নরোত্তমের প্রতি) — “ওর সঙ্গে এইটা বলতে হয় —
যাদের হরি বলতে নয়ন ঝরে, তারা, দুভাই এসেছে রে ৷
যারা মার খেয়ে প্রেম যাচে, তারা, দুভাই এসেছে রে ৷
যারা আপনি কেঁদে জগৎ কাঁদায়, তারা, দুভাই এসেছে রে ৷৷
যারা আপনি মেতে জগৎ মাতায়, তারা, দুভাই এসেছে রে ৷
যারা আচণ্ডালে কোল দেয়, তারা দুভাই এসেছে রে ৷৷
“আর এটাও গাইতে হয়:
গৌর নিতাই তোমরা দুভাই, পরম দয়াল হে প্রভু!
আমি তাই শুনে এসেছি হে নাথ;
তোমরা নাকি আচণ্ডালে দাও কোল,
কোল দিয়ে বল হরিবোল।”
And along with it these lines: Behold, the two brothers (^Gauranga and Nityananda.) have come, who weep while chanting Hari's name, The brothers who, in return for blows, offer to sinners Hari's love. . . .
And these too: Gaur and Nitai, ye blessed brothers! I have heard how kind you are, And therefore I have come to you. . . ."
(२)
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
🔆🙏श्री रामकृष्ण अपने जन्मोत्स्व के दिन भक्तों के साथ वार्तालाप करते हुए 🔆🙏
अब भक्तगण प्रसाद पा रहे हैं । चिउड़ा मिठाई आदि अनेक प्रकार के प्रसाद पाकर वे तृप्त हुए । श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, "मुखर्जियों को नहीं कहा था । सुरेन्द्र से कहो, बाऊलों (गवैयों) को खिला दें ।"
[এইবার ভক্তেরা প্রসাদ পাইতেছেন। চিঁড়ে মিষ্টান্নাদি অনেকপ্রকার প্রসাদ পাইয়া তৃপ্তিলাভ করিলেন। ঠাকুর মাস্টারকে বলিতেছেন, “মুখুজ্জেদের বল নাই? সুরেন্দ্রকে বল, বাউলদের খেতে বলতে।
”The devotees were taking the prasad. It was a sumptuous feast. Sri Ramakrishna said to M.: "Haven't you invited the Mukherjis? Ask Surendra to feed the musicians."
श्री बिपिन सरकार आये हैं । भक्तों ने कहा, "इनका नाम बिपिन सरकार है ।" श्रीरामकृष्ण उठकर बैठे और विनीत भाव से बोले, "इन्हें आसन दो और पान दो ।" उनसे कह रहे हैं, "आपके साथ बात न कर सका, आज बड़ी भीड़ है ।"
[শ্রীযুক্ত বিপিন সরকার আসিয়াছেন। ভক্তেরা বলিলেন, “এঁর নাম বিপিন সরকার।” ঠাকুর উঠিয়া বসিলেন ও বিনীতভাবে বলিলেন, “এঁকে আসন দাও। আর পান দাও।” তাঁহাকে বলিতেছেন, “আপনার সঙ্গে কথা কইতে পেলাম না; অনেক ভিড়!”
Bepin Sarkar arrived. The devotees introduced him to the Master. Sri Ramakrishna sat up and said to the devotees, "Give him a seat and some betel-leaf." He said to Bepin humbly: "I am sorry not to be able to talk to you. There is a great crowd today."
गिरीन्द्र को देखकर श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम से कहा, "इन्हें एक आसन दो ।" नित्यगोपाल को जमीन पर बैठा देखकर श्रीरामकृष्ण ने कहा, "उसे भी एक आसन दो ।"
[গিরীন্দ্রকে দেখিয়া ঠাকুর বাবুরামকে বলিলেন, “এঁকে একখানা আসন দাও।” নিত্যগোপাল মাটিতে বসিয়াছিলেন দেখিয়া ঠাকুর বলিলেন, “ওকেও একখানা আসন দাও।”
Pointing to Girindra, Sri Ramakrishna said to Baburam, "Give him a carpet." Nityagopal was sitting on the floor. The Master asked a devotee to give him a carpet too.
सींती के महेन्द्र वैद्य आये हैं । श्रीरामकृष्ण हँसते हुए राखाल को इशारा कर रहे हैं, "हाथ दिखा लो।"
[সিঁথির মহেন্দ্র কবিরাজ আসিয়াছেন। ঠাকুর সহাস্যে রাখালকে ইঙ্গিত করিতেছেন, “হাতটা দেখিয়ে নে।
”Physician Mahendra of Sinthi arrived. The Master, smiling, asked Rakhal by a sign to have the physician examine his pulse.
रामलाल से कह रहे हैं, "गिरीश घोष के साथ दोस्ती कर, तो थिएटर देख सकेगा ।" (हँसी)
[শ্রীযুক্ত রামলালকে বলিতেছেন, “গিরিশ ঘোষের সঙ্গে ভাব কর, তাহলে থিয়েটার দেখতে পাবি।” (হাস্য)
Turning to Ramlal, the Master said, "Be friendly with Girish Ghosh; then you will get a free ticket to the theatre."
नरेन्द्र हाजरा महाशय से बरामदे में बहुत देर तक बातचीत कर रहे थे । नरेन्द्र के पिता के देहान्त के बाद घर में बड़ा ही कष्ट हो रहा है । अब नरेन्द्र कमरे के भीतर आकर बैठे ।
[নরেন্দ্র হাজরা মহাশয়ের সঙ্গে বাহিরের বারান্দায় অনেকক্ষণ গল্প করিতেছিলেন। নরেন্দ্রের পিতৃবিয়োগের পর বাড়িতে বড়ই কষ্ট হইয়াছে। এইবার নরেন্দ্র ঘরের ভিতর আসিয়া বসিলেন।
Narendra had been talking a long time with Hazra on the porch. Since his father's death Narendra had been having financial worries. He entered the room and took a seat.
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
[हाजरा, गिरीश, मणि और नरेन्द्र की मनःस्थित !]
[হাজরা, গিরিশ, মণি ও নরেন্দ্রের মানসিক অবস্থা]
[The mental state of Hazra, Girish, Mani and Narendra!]
卐🙏नरेन्द्र आत्मा का स्वरुप है, आकारहीन सिंह -गर्जन है, अखंड के घर का है,
लेकिन जगत में आकर उसे भी शक्ति (अवतार) को मानना पड़ेगा !卐🙏
[নরেন্দ্র আত্মার স্বরূপ, নরেন্দ্রের উঁচুঘর, অখণ্ডের ঘর।]
[Narendra is the form of the soul, a voice without form (M/F)
and belongs to the realm of the Indivisible Brahman.]
["नरेन्द्र आत्मा का स्वरुप है , वह अविभाज्य 'ब्रह्म' के देश का है, लकिन जगत 'शक्ति' का राज्य है, यहाँ आकर शक्ति को मानना ही पड़ेगा !!" (परिच्छेद -74) ]
["নরেন্দ্র অবিভাজ্য ব্রহ্মের রাজ্যের অন্তর্গত।"- কিন্তু পৃথিবীটা 'শক্তি'র রাজ্য, এখানে এসে শক্তিতে বিশ্বাস করতে হয়!!" (অনুচ্ছেদ-৭৪)]
["Narendra belongs to the realm of the Indivisible Brahman." but the world is the kingdom of 'Shakti', one has to come here and believe the power!!" (Paragraph -74)]
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र के प्रति) - तू क्या हाजरा के पास बैठा था ? तू विदेशी है, और वह विरही ! हाजरा को भी डेढ़ हजार रूपयों की आवश्यकता है । (हँसी)
[শ্রীরামকৃষ্ণ (নরেন্দ্রের প্রতি) — তুই কি হাজরার কাছে বসেছিলি? তুই বিদেশিনী সে বিরহিণী! হাজরারও দেড় হাজার টাকার দরকার। (হাস্য)
MASTER (to Narendra): "Were you with Hazra? Both of you are in the same boat. You know the saying about the two friends: 'You are away from your country and he is away from his beloved.' Hazra, too, needs fifteen hundred rupees (laughter.)
"हाजरा कहता है, 'नरेन्द्र में सोलह आना सतोगुण आ गया है, परन्तु रजोगुण की जरा लाली है । मेरा विशुद्ध सत्व, सत्रह आना ।' (सभी की हँसी)
[“হাজরা বলে, ‘নরেন্দ্রের ষোল আনা সত্ত্বগুণ হয়েছে, একটু লালচে রজোগুণ আছে! আমার বিশুদ্দ সত্ত্ব সতের আনা।’ (সকলের হাস্য)"
Hazra says: 'Narendra has acquired one hundred per cent sattva, though still there is in him a pink glow of rajas. But I have one hundred and twenty-five per cent pure sattva.' (All laugh.)
"मैं जब कहता है, "तुम केवल विचार करते हो, इसीलिए शुष्क हो, तो वह कहता है, 'मैं सूर्य की सुधा पीता हूँ, इसीलिए शुष्क हूँ ।'
[“আমি যখন বলি, ‘তুমি কেবল বিচার কর, তাই শুষ্ক।’ সে বলে, আমি সৌর সুধা পান করি, তাই শুষ্ক।’"
I say to Hazra, 'You indulge in reasoning only: that is why you are so dry.' He retorts, 'No, I am dry because I drink the nectar of the sun.'
"मैं जब शुद्धा भक्ति की बात कहता हूँ, जब कहता हूँ कि शुद्ध भक्त रुपया-पैसा, ऐश्वर्य कुछ भी नहीं चाहता !
तो हाजरा (Hazraअपनी मनःस्थिति के अनुसार) कहता है, 'उनकी कृपा की बाढ़ आने पर नदी तो भर जायेगी ही, फिर गढ़े-नाले भी अपने आप ही भर जायेंगे । शुद्धा भक्ति भी होती है और षडैश्वर्य भी होते हैं । रुपये-पैसे भी होते हैं ।"
.[“আমি যখন শুদ্ধাভক্তির কথা বলি, যখন বলি শুদ্ধভক্ত টাকা-কড়ি ঐশ্বর্য কিছু চায় না; তখন সে বলে, ‘তাঁর কৃপাবন্যা এলে নদী তো উপচে যাবে, আবার খাল-ডোবাও জলে পূর্ণ হবে। শুদ্ধাভক্তিও হয়, আবার ষড়ৈশ্বর্যও হয়। টাকা-কড়িও হয়।”
"Speaking of pure bhakti, I say to Hazra, 'A real devotee does not pray to God for money or riches.'
Hazra replies (according to his own state of mind) : 'When the flood of divine grace descends, the rivers overflow; and further, the pools and canals are filled. By the grace of God one gets not only pure devotion but also the six super-natural powers, and money too.'"
श्रीरामकृष्ण के कमरे में जमीन पर नरेन्द्र आदि अनेक भक्त बैठे हैं, गिरीश भी आकर बैठे ।
[ঠাকুরের ঘরের মেঝেতে নরেন্দ্রাদি অনেক ভক্ত বসিয়া আছেন, গিরিশও আসিয়া বসিলেন।
Narendra and many other devotees were seated on the floor. Girish entered the room and joined them.
श्रीरामकृष्ण (गिरीश के प्रति) - मैं नरेन्द्र को आत्मा स्वरूप मानता हूँ । और मैं उसका अनुगत हूँ। गिरीश - क्या कोई ऐसा है जिसके आप अनुगत नहीं भी हैं ?
[শ্রীরামকৃষ্ণ (গিরিশের প্রতি) — আমি নরেন্দ্রকে আত্মার স্বরূপ জ্ঞান করি; আর আমি ওর অনুগত।
MASTER (to Girish): "I look on Narendra as Atman. I obey him."
श्रीरामकृष्ण (हँसकर) - उसका है मर्द का भाव (पुरुषभाव) और मेरा औरत-भाव (प्रकृतिभाव) । नरेन्द्र का ऊँचा घर, अखण्ड का घर है ।
[শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে) — ওর মদ্দের ভাব (পুরুষভাব) আর আমার মেদীভাব (প্রকৃতিভাব)। নরেন্দ্রের উঁচুঘর, অখণ্ডের ঘর।
MASTER (smiling): "He has a manly nature and I have the nature of a woman. He is a noble soul and belongs to the realm of the Indivisible Brahman."
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
श्री रामकृष्ण और नरेंद्र - पाण्डित्य और शास्त्र
[শ্রীরামকৃষ্ণ ও নরেন্দ্র — পাণ্ডিত্য ও শাস্ত্র ]
[श्रीरामकृष्ण तथाकथित पण्डित नहीं थे, वे बिना पुस्तक पढ़े ही पण्डित थे]
[শ্রী রামকৃষ্ণ তথাকথিত পন্ডিত ছিলেন না, তিনি বই না পড়েও পন্ডিত ছিলেন! ]
[Sri Ramakrishna was not a so called Pandit, He was scholar without reading books .]
卐🙏`वेदान्तडिण्डिमः ~"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या !" 卐🙏
गिरीश तम्बाकू पीने के लिए बाहर गये ।
[গিরিশ বাহিরে তামাক খাইতে গেলেন।
Girish went out to have a smoke.
नरेन्द्र (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - गिरीश घोष के साथ वार्तालाप हुआ, बहुत बड़े आदमी हैं । आपकी चर्चा हो रही थी ।
[নরেন্দ্র (শ্রীরামকৃষ্ণের প্রতি) — গিরিশ ঘোষের সঙ্গে আলাপ হল, খুব বড়লোক (মাস্টারের প্রতি) — আপনার কথা হচ্ছিল।
NARENDRA (to the Master): "I had a talk with Girish Ghosh. He is indeed a great man. We talked about you."
श्रीरामकृष्ण - क्या चर्चा ?
[শ্রীরামকৃষ্ণ — কি কথা?
MASTER: "What did you say about me?"
नरेन्द्र - आप लिखना-पढ़ना नहीं जानते हैं, हम सब पण्डित हैं, यही सब बातें हो रही थी । (हँसी)
[নরেন্দ্র — আপনি লেখাপড়া জানেন না, আমরা সব পণ্ডিত, এই সব কথা হচ্ছিল। (হাস্য)
NARENDRA: "That you are illiterate and we are scholars. Oh, we talked in that vein!" (Laughter.)
मणि मल्लिक (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - आप बिना पढ़े पण्डित हैं ।
[মণি মল্লিক (ঠাকুরের প্রতি) — আপনি না পড়ে পণ্ডিত।
MANI MALLICK (to the Master): "You have become a pundit without reading a book."
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि के प्रति ) - सच कहता हूँ, मुझे इस बात का जरा भी दुःख नहीं होता कि मैंने वेदान्त आदि शास्त्र नहीं पढ़े । मैं जानता हूँ, वेदान्त का सार >है - 'ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है’ । फिर गीता का सार क्या है ? गीता का दस बार उच्चारण करने पर जो होता है, अर्थात् त्यागी, त्यागी !
[वेदान्त का सार>`वेदान्तडिण्डिमः ' -- वेदान्त का दुन्दुभि-घोष, यानि वेदान्त का सार है -- "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या"-----इससे यह सिद्ध होता है कि 'ब्रह्म' का नाम (श्रीगुरुमुख सुना हुआ अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण का नाम) सत्य है, जगत् मिथ्या है। ’ ]
[শ্রীরামকৃষ্ণ (নরেন্দ্রাদির প্রতি) — সত্য বলছি, আমি বেদান্ত আদি শাস্ত্র পড়ি নাই বলে একটু দুঃখ হয় না। আমি জানি বেদান্তের সার, ব্রহ্ম সত্য জগৎ মিথ্যা। আবার গীতার সার কি? গীতা দশবার বললে যা হয়; ত্যাগী ত্যাগী।
MASTER (to Narendra and the others): "Let me tell you this: really and truly I don't feel sorry in the least that I haven't read the Vedanta or the other scriptures. I know that the essence of the Vedanta is that Brahman alone is real and the world illusory. And what is the essence of the Gita? It is what you get by repeating the word ten times. Then it is reversed into 'tagi', which refers to renunciation.
"शास्त्र का सार श्रीगुरुमुख से जान लेना चाहिए । उसके बाद साधन-भजन । एक आदमी को किसी ने पत्र लिखा था । पत्र पढ़ा भी न गया था कि खो गया । तब सब मिलकर ढूँढ़ने लगे । जब पत्र मिला, पढ़कर देखा, लिखा था - 'पाँच सेर सन्देश और एक धोती भेज दो ।' पढ़कर उसने पत्र को फेंक दिया और पाँच सेर सन्देश और एक धोती का प्रबन्ध करने लगा । इसी प्रकार शास्त्रों का सार जान लेने पर फिर पुस्तकें पढ़ने की क्या आवश्यकता ? अब साधन-भजन ।" ^*
[“শাস্ত্রের সার গুরুমুখে জেনে নিতে হয়। তারপর সাধন-ভজন। একজন চিঠি লিখেছিল। চিঠিখানি পড়া হয় নাই, হারিয়ে গেল। তখন সকলে মিলে খুঁজতে লাগল। যখন চিঠিখানা পাওয়া গেল, পড়ে দেখলে পাঁচ সের সন্দেশ পাঠাবে আর একখানা কাপড় পাঠাবে। তখন চিঠিটা ফেলে দিলে, আর পাঁচ সের সন্দেশ আর একখানা কাপড়ের যোগাড় করতে লাগল। তেমনি শাস্ত্রের সার জেনে নিয়ে আর বই পড়বার কি দরকার? এখন সাধন-ভজন।”১
The pupil should hear the essence of the scriptures from the guru; then he should practise austerity and devotions. A man needs the letter he has received from home as long as he has not learnt its contents. After reading it, however, he sets out to get the things he has been asked to send. Likewise, what need is there of the scriptures if you know their essence? The next thing is the practice of spiritual discipline."]
अब गिरीश कमरे में आये हैं ।
[এইবার গিরিশ ঘরে আসিয়াছেন।
Girish entered the room.
श्रीरामकृष्ण (गिरीश के प्रति) - हाँ जी, मेरी बात तुम लोग सब क्या कह रहे थे ? मैं खाता-पीता और मजे में रहता हूँ ।
[শ্রীরামকৃষ্ণ (গিরিশের প্রতি) — হাঁ গা, আমার কথা সব তোমরা কি কচ্ছিলে? আমি খাই দাই থাকি।
MASTER (to Girish): "Hello! What were you saying about me? I eat, drink, and make merry."
गिरीश - आपकी बात और क्या कहूँगा आप क्या साधु हैं ?
[গিরিশ — আপনার কথা আর কি বলব। আপনি কি সাধু?
GIRISH: "What should we have been saying about you? Are you a holy man?"
श्रीरामकृष्ण - साधु वाधु नहीं । सच ही तो मुझ में साधु-बोध नहीं है ।
[শ্রীরামকৃষ্ণ — সাধু-টাধু নয়। আমার সত্যই তো সাধুবোধ নাই।
MASTER: "No, nothing of the sort. Truly I do not feel I am a holy man."
गिरीश - मजाक में भी आप से हार गया ।
[গিরিশ — ফচকিমিতেও আপনাকে পারলুম না।
GIRISH: "I am not your equal even in joking."
श्रीरामकृष्ण - मैं लाल किनारी की धोती पहनकर जयगोपाल सेन के बगीचे में गया था । केशव सेन वहाँ पर था । केशव ने लाल किनारी की धोती देखकर कहा, 'आज तो खूब रंग दीख रहा है ! लाल किनारी की बड़ी बहार है !' मैंने कहा, 'केशव का मन भुलाना होगा, इसीलिए बहार लेकर आया हूँ ।"
[শ্রীরামকৃষ্ণ — আমি লালপেড়ে কাপড় পরে জয়গোপাল সেনের বাগানে গিছলাম। কেশব সেন সেখানে ছিল। কেশব লালপেড়ে কাপড় দেখে বললে, ‘আজ বড় যে রঙ, লালপাড়ের বাহার।’ আমি বললুম, ‘কেশবের মন ভুলাতে হবে, তাই বাহার দিয়ে এসেছি।’
MASTER: "I once went to Jaygopal Sen's garden house wearing a red-bordered cloth. Keshab was there. Looking at the red borders Keshab said: 'What's this? Such a flash of colour today! Such a display of red borders!' I said, 'I have to cast a spell on Keshab; hence this display.'"
अब फिर नरेन्द्र का संगीत होगा । श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से तानपूरा उतार देने के लिए कहा । नरेन्द्र बहुत देर से तानपूरे को बाँध रहे हैं । श्रीरामकृष्ण तथा सभी लोग अधीर हो गये हैं । विनोद कह रहे हैं, "आज बाँधना होगा, गाना किसी दूसरे दिन होगा !” (सभी हँसते हैं ।)
[এইবার আবার নরেন্দ্রের গান হইবে। শ্রীরামকৃষ্ণ মাস্টারকে তানপুরাটি পাড়িয়া দিতে বলিলেন। নরেন্দ্র তানপুরাটি অনেকক্ষণ ধরিয়া বাঁধিতেছেন। ঠাকুর ও সকলে অধৈর্য হইয়াছেন। বিনোদ বলিতেছেন, বাঁধা আজ হবে, গান আর-একদিন হবে। (সকলের হাস্য)
Narendra was going to sing again. Sri Ramakrishna asked M. to take down the tanpura from the wall. Narendra was a long time tuning it. The Master and the devotees became impatient. Binode said, "He will tune it today and sing another day." (Laughter.)
श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं और कह रहे हैं, “ऐसी इच्छा हो रही है कि तानपूरे तोड़ डालूँ । क्या 'टंग टंग' - फिर 'ताना नाना तेरे नुम्' होगा ।"
[শ্রীরামকৃষ্ণ হাসিতেছেন আর বলিতেছেন, “এমনি ইচ্ছে হচ্ছে যে তানপুরাটা ভেঙে ফেলি। কি টং টং — আবার তানা নানা নেরে নূম্ হবে।”
Sri Ramakrishna laughed. He said: "I feel like breaking the tanpura to pieces! What is this? Only Tong — tong'! Then he will practise: 'Tana-nana-nere-num'!" (The sound of a stringed instrument.)
भवनाथ - जात्रा संगीत के प्रारम्भ में ऐसी ही तंगी मालूम होती है ।
[ভবনাথ — যাত্রার গোড়ায় অমনি বিরক্তি হয়।
BHAVANATH: "Everybody feels annoyed like this before a musical performance begins."
नरेन्द्र (बाँधते बाँधते) - न समझने से ही ऐसा होता है ।
[নরেন্দ্র (বাঁধিতে বাঁধিতে) — সে না বুঝলেই হয়।
NARENDRA (still tuning): "If you don't understand it."
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) - देखो, हम सभी को उड़ा दिया !
[শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে) — ওই আমাদের সব উড়িয়ে দিলে।
MASTER (smiling): "There! He explains away our complaints!"
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
[ In dense darkness, O Mother, Thy formless beauty sparkles]
🔆🙏नरेंद्र के गीत -'निबिड़ आंधारे माँ तोर चमके अरूप-राशि'और श्री रामकृष्ण🔆🙏
[नरेंद्र के गीत - "माँ, घने अन्धकार में तेरा निराकार-रूप चमकता है"
और श्री रामकृष्ण की प्रेमोन्मत्तता -अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी मन -
शांत सरोवर और तरंगायित सरोवर। ]
[নরেন্দ্রের গান ও শ্রীরামকৃষ্ণের ভাবাবেশ —
অন্তর্মুখ ও বহির্মুখ — স্থির জল ও তরঙ্গ ]
नरेन्द्र गाना गा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण छोटे तखत पर बैठे सुन रहे हैं । नित्यगोपाल आदि भक्तगण जमीन पर बैठे सुन रहे हैं।
1. अन्तरे जागीछो ओ माँ अन्तर यामिनी ,
कोले करे आछे मोरे दिवस यामिनी।
तोबु सदा दूरे भ्रमितेछि आमि।
संसार सुख कोरेछि बरन ,
तोबु तुमि मम जीवनस्वामिनी।।
ना जानिया पथ भ्रमितेछि पथे ,
आपन गरबे असीम जगते।
तबु स्नेहनेत्र जागे ध्रुवतारा , तव शुभ आशिस आसिछे नामिनी ।।
(भावार्थ) - (१) "ओ माँ, अन्तर्यामिनी, तुम मेरे हृदय में जाग रही हो, रात-दिन मुझे गोदी में लिये बैठी हो ।"
2 . गाओ रे आनन्दमयीर नाम।
ओरे आमार एकतन्त्री प्राणेर आराम।
(२) "गाओ रे आनन्दमयी का नाम, ओ मेरे प्राणों को आराम देनेवाली एकतन्त्री ।”
3. "निबिड़ आंधारे माँ तोर चमके अरूप-राशि।
ताई योगी ध्यान धरे होय गिरिगुहा- वासी।।"
(३) "माँ, घने अन्धकार में तेरा निराकार -रूप चमकता है ! अर्थात- " माँ , घने अँधकार में तेरा निराकार सौन्दर्य निखर उठता है । इसीलिए योगी पहाड़ की गुफा में रहकर ध्यान करता रहता है।"
[নরেন্দ্র গান গাহিতেছেন। ঠাকুর ছোট খাটটিতে বসিয়া শুনিতেছেন। নিত্যগোপাল প্রভৃতি ভক্তেরা মেঝেতে বসিয়া শুনিতেছেন।
১। অন্তরে জাগিছ ও মা অন্তর যামিনী,
কোলে করে আছ মোরে দিবস যামিনী;
তবু সদা দূরে ভ্রমিতেছি আমি ॥
সংসার সুখ করেছি বরণ,তবু তুমি মম জীবনস্বামীনি ॥
না জানিয়া পথ ভ্রমিতেছি পথে, আপন গরবে অসীম জগতে।
তবু স্নেহনেত্র জাগে ধ্রুবতারা,তব শুভ আশিস আসিছে নামি ॥
২। গাও রে আনন্দময়ীর নাম।
ওরে আমার একতন্ত্রী প্রাণের আরাম।
৩। নিবিড় আঁধারে মা তোর চমকে ও রূপরাশি।
তাই যোগী ধ্যান ধরে হয়ে গিরিগুহাবাসী ৷৷
[Narendra began to sing. Sri Ramakrishna was seated on the small couch. Nityagopal and the other devotees were on the floor.Narendra sang:
1. O Mother, Thou my Inner Guide, ever awake within my heart!
Day and night Thou boldest me in Thy lap.Why dost Thou show such tenderness to this unworthy child of Thine? . . .
2. O my lute of a single string!Sing the blessed Mother's name,For She is the solace of my soul. . . .
3. In dense darkness, O Mother, Thy formless beauty sparkles; Therefore the yogis meditate in a dark mountain cave. . . .
श्रीरामकृष्ण भावविभोर होकर नीचे उतर आये हैं और नरेन्द्र के पास बैठे हैं । भावविभोर होकर बातचीत कर रहे हैं ।
[ঠাকুর ভাবাবিষ্ট হইয়া নিচে নামিয়া আসিয়াছেন ও নরেন্দ্রের কাছে বসিয়াছেন। ভাবাবিষ্ট হইয়া কথা কহিতেছেন।
In an ecstatic mood Sri Ramakrishna came down and sat by Narendra's side. He began to talk, still in ecstasy.
श्रीरामकृष्ण - गाना गाऊँ ? नहीं, नहीं (नित्यगोपाल के प्रति) तू क्या कहता है ? उद्दीपन के लिए सुनना चाहिए । उसके बाद क्या आया और क्या गया !
[শ্রীরামকৃষ্ণ — গান গাইব? থু থু! (নিত্যগোপালের প্রতি) — তুই কি বলিস উদ্দীপনের জন্য শুনতে হয়; তারপর কি হল আর কি গেল।
MASTER: "Shall I sing? Fie! (To Nityagopal) What do you say? One should listen to singing to awaken the inner spirit. Nothing matters afterwards.
“उसने आग लगा दी, सो तो अच्छा है । उसके बाद चुप । अच्छा, मैं भी तो चुप हूँ, तू भी चुप रह। "आनन्द-अमृत" में मग्न होने से वास्ता !
[“আগুন জ্বেলে দিলে; সে তো বেশ! তারপর চুপ। বেশ তো, আমিও তো চুপ করে আছি, তুইও চুপ করে থাক।" “আনন্দ-রসে (Elixir) মগ্ন হওয়া নিয়ে কথা।
He has kindled the fire. That is nice. Now all is silence. That's nice too. I am silent; you be silent too. The thing is to dive into the Elixir of Bliss.
"गाना गाऊँ ? अच्छा, गाया भी जा सकता है । जल स्थिर रहने से भी जल है, और हिलने-डुलने पर भी जल है ।"
[“গান গাইব? আচ্ছা, গাইলেও হয়। জল স্থির থাকলেও জল আর হেললে দুললেও জল।”
"Shall I sing? Well, I may. Water is water whether it is still or in waves."
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
🔆🙏नरेन्द्र को शिक्षा - "भाई, द्वैत से परे रहो "🔆🙏
[নরেন্দ্রকে শিক্ষা — “জ্ঞান-অজ্ঞানের পার হও” ]
[ " Brother, go beyond duality. "]
नरेन्द्र पास बैठे हैं । उनके घर में कष्ट है, इसीलिए वे सदा ही चिन्तित रहते हैं । वे साधारण ब्राह्मसमाज में आते-जाते रहते हैं । अभी भी सदा ज्ञान-विचार करते हैं, वेदान्त आदि ग्रन्थ पढ़ने की बहुत ही इच्छा है । इस समय उनकी आयु तेईस वर्ष की होगी । श्रीरामकृष्ण एकदृष्टि से नरेन्द्र को देख रहे हैं ।
.[নরেন্দ্র কাছে বসিয়া আছেন। তাঁর বাড়িতে কষ্ট, সেই জন্য তিনি সর্বদা চিন্তিত হইয়া থাকেন। তাঁহার সাধারণ ব্রাহ্মসমাজে যাতায়াত ছিল। এখনও সর্বদা জ্ঞানবিচার করেন, বেদান্তাদি গ্রন্থ পড়িবার খুব ইচ্ছা, এক্ষণে বয়স ২৩ বৎসর হইবে। ঠাকুর নরেন্দ্রকে একদৃষ্টে দেখিতেছেন।
Narendra was seated near the Master. He was constantly worried about his financial difficulties at home. He was now twenty-three years old. Sri Ramakrishna looked at him intently.
श्रीरामकृष्ण (हँसकर नरेन्द्र के प्रति) - तू तो 'ख' (आकाश की तरह) है, परन्तु यदि टैक्स* न रहता ! (सभी की हँसी) (*अर्थात् घर की चिन्ता ।)
[শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে, নরেন্দ্রের প্রতি) — তুই তো ‘খ’ (আকাশবৎ); তবে যদি টেক্সো (Tax অর্থাৎ বাড়ির ভাবনা) না থাকত। (সকলের হাস্য)
MASTER (to Narendra, smiling): "Undoubtedly you are 'Kha'. But you have to worry about 'taxes'; that's the trouble."By "taxes" the Master meant Narendra's financial difficulties at home.
"कृष्णकिशोर कहा करता था, मैं 'ख' हूँ । एक दिन उसके घर जाकर देखता हूँ तो वह चिन्तित होकर बैठा है, अधिक बात नहीं कर रहा है । मैंने पूछा, 'क्या हुआ जी, इस तरह क्यों बैठे हो ?' उसने कहा, 'टैक्सवाला आया था, कह गया, यदि रुपये न दोगे, तो घर का सब सामान नीलाम कर लेंगे । इसीलिए मुझे चिन्ता हुई है ।' मैंने हँसते हँसते कहा, "यह कैसी बात है जी, तुम तो 'ख' (आकाश) की तरह हो । जाने दो, सालों को सब सामान ले जाने दो, तुम्हारा क्या ?"
[“কৃষ্ণকিশোর বলত ‘আমি খ’। একদিন তার বাড়িতে গিয়ে দেখি, সে চিন্তিত হয়ে বসে আছে; বেশি কথা কচ্ছে না। আমি জিজ্ঞাসা করলুম, ‘কি হয়েছে গা, এমন করে বসে রয়েছ কেন?’ সে বললে, ‘টেক্সোওয়ালা এসেছিল; সে বলে গেছে টাকা যদি না দাও তাহলে ঘটিবাটি সব নীলাম করে নিয়ে যাব; তাই আমার ভাবনা হয়েছে।’ আমি হাসতে হাসতে বললাম, ‘সে কি গো, তুমি তো ‘খ’, আকাশবৎ। যাক শালারা ঘটিবাটি নিয়ে যাক, তোমার কি?’
MASTER: "Krishnakishore used to say that he was 'Kha'. One day I visited him at his home and found him worried. He wouldn't talk to me freely. I asked him: 'What's the matter? Why are you brooding like this?' Krishnakishore said: 'The tax-collector came today. He said my pots and pans would be sold at auction if I didn't pay my taxes. That's what I am worrying about.' I laughed and said: 'How is that? You are surely 'Kha', the akasa. Let the rascals take away your pots and pans. What is that to you?'
“इसीलिए तुझे कहता हूँ, तू तो 'ख' है - इतनी चिन्ता क्यों कर रहा है ? जानता है, श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, 'अष्टसिद्धि में से एक सिद्धि के रहते कुछ शक्ति हो सकती है, परन्तु मुझे न पाओगे ।' सिद्धि द्वारा अच्छी शक्ति, बल, धन ये सब प्राप्त हो सकते हैं, परन्तु ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती ।
[“তাই তোকে বলছি, তুই তো ‘খ’ — এত ভাবছিস কেন? কি জানিস এমনি আছে, শ্রীকৃষ্ণ অর্জুনকে বলছেন, অষ্টসিদ্ধের একটি থাকলে কিছু শক্তি হতে পারে, কিন্তু আমায় পাবে না। সিদ্ধাই-এর দ্বারা বেশ শক্তি, বল, টাকা, এই সব হতে পারে, কিন্তু ঈশ্বরকে লাভ হয় না।
(To Narendra) "So I am saying that you are 'Kha'. Why are you so worried? Don't you know that Sri Krishna said to Arjuna, 'If you have one of the eight siddhis, you may get a little power, but you will not realize Me.' By siddhis one may acquire powers, strength, money, and such things, but not God.
"एक और बात । ज्ञान-अज्ञान से परे रहो । कई कहते हैं, अमुक बड़े ज्ञानी हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं है । वशिष्ठ इतने बड़े ज्ञानी थे परन्तु पुत्रशोक से बेचैन हुए थे । तब लक्ष्मण ने कहा, 'राम, यह क्या आश्चर्य है ! ये भी इतने शोकार्त हैं !' राम बोले, 'भाई, जिसका ज्ञान है, उसका अज्ञान भी है, जिसको आलोक का बोध है, उसे अन्धकार का भी है, जिसे सुख का बोध है, उसे दुःख का भी है, जिसे भले का बोध है, उसे बुरे का भी है । भाई, तुम दोनों से (duality) परे चले जाओ, सुख-दुःख से परे जाओ, ज्ञान-अज्ञान से परे जाओ ।’ इसीलिए तुझे कहता हूँ, ज्ञान-अज्ञान दोनों से परे चला जा ।"
[विष- अमृत, जीवित- मृतक व सुख- दुख जिनके लिये सब समान हैं ; वे 'प्रभु के दास' सदा प्रभु के गुणानुवाद व महिमा ही गाते रहते हैं ।---संत जगजीवन साहब]
[“আর একটি কথা — জ্ঞান-অজ্ঞানের পার হও। অনেকে বলে অমুক বড় জ্ঞানী, বস্তুতঃ তা নয়। বশিষ্ঠ এত বড় জ্ঞানী, পুত্রশোকে অস্থির হয়েছিল; তখন লক্ষ্মণ বললেন, ‘রাম এ কি আশ্চর্য! ইনিও এত শোকার্ত!’ রাম বললেন — ভাই, যার জ্ঞান আছে, তার অজ্ঞানও আছে; যার আলোবোধ আছে, তার অন্ধকারবোধও আছে; যার ভালবোধ আছে, তার মন্দবোধও আছে; যার সুখবোধ আছে, তার দুঃখবোধও আছে। ভাই, তুমি দুই-এর পারে যাও, সুখ-দুঃখের পারে যাও, জ্ঞান-অজ্ঞানের পারে যাও। তাই তোকে বলছি, জ্ঞান-অজ্ঞানের পার হও।”
"Let me tell you something else. Go beyond knowledge and ignorance. People say that such and such a one is a jnani; but in reality it is not so. Vasishtha was a great jnani, but even he was stricken with grief on account of the death of his sons. At this Lakshmana said to Rama: 'This is amazing, Rama. Even Vasishtha is so grief-stricken!' Rama said: 'Brother, he who has knowledge has ignorance as well. He who is aware of light is also aware of darkness. He who knows good also knows bad. He who knows happiness also knows misery. Brother, go beyond duality, beyond pleasure and pain, beyond knowledge and ignorance.' (To Narendra) So I am asking you to go beyond both knowledge and ignorance."
(३)
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
卐🙏गृहस्थ तथा दानधर्म । मनोयोग तथा कर्मयोग卐🙏
श्रीरामकृष्ण फिर छोटे तखत पर आकर बैठे हैं । भक्तगण अभी भी जमीन पर बैठे हैं । सुरेन्द्र उनके पास बैठे हैं । श्रीरामकृष्ण उनकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देख रहे हैं और बातचीत के सिलसिले में उन्हें अनेकों उपदेश दे रहे हैं ।
[ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ আবার ছোট খাটটিতে আসিয়া বসিয়াছেন। ভক্তেরা এখনও মেঝেতে বসিয়া আছেন। সুরেন্দ্র তাঁহার কাছে বসিয়া আছেন। ঠাকুর তাঁহার দিকে সস্নেহে দৃষ্টিপাত করিতেছেন ও কথাচ্ছলে তাঁহাকে নানা উপদেশ দিতেছেন।
Sri Ramakrishna went back to his small couch. The devotees were seated on the floor. Surendra sat by his side. The Master cast an affectionate look on him and began to give him advice.
श्रीरामकृष्ण (सुरेन्द्र के प्रति) - बीच बीच में आते जाना । नागा कहा करता था, लोटा रोज रगड़ना चाहिए, नहीं तो मैला पड़ जायेगा । साधुसंग सदैव ही आवश्यक है ।
[শ্রীরামকৃষ্ণ (সুরেন্দ্রের প্রতি) — মাঝে মাঝে এসো। ন্যাংটা বলত, ঘটি রোজ মাজতে হয়; তা না হলে কলঙ্ক পড়বে। সাধুসঙ্গ সর্বদাই দরকার।
MASTER (to Surendra): "Come here every now and then. Nangta used to say that a brass pot must be polished every day; otherwise it gets stained. One should constantly live in the company of holy men.
[ (22 फरवरी, 1885) श्रीरामकृष्ण वचनामृत- 106 ]
卐🙏गृहस्थ को कामिनी- कांचन में आसक्ति का त्याग करना चाहिए卐🙏
"कामिनी कांचन का त्याग संन्यासी के लिए है, तुम लोगों के लिए वह नहीं । तुम लोग बीच-बीच में निर्जन में जाना और उन्हें व्याकुल होकर पुकारना । तुम लोग मन में त्याग करना ।
[“সন্ন্যাসীর পক্ষে কামিনী-কাঞ্চন ত্যাগ, তোমাদের পক্ষে তা নয়। তোমারা মাঝে মাঝে নির্জনে যাবে আর তাঁকে ব্যাকুল হয়ে ডাকবে। তোমরা মনে ত্যাগ করবে।
"The renunciation of 'woman and gold' is for sannyasis. It is not for you. Now and then you should go into solitude and call on God with a yearning heart. Your renunciation should be mental.
"भक्त, वीर हुए बिना भगवान् तथा संसार दोनों ओर ध्यान नहीं रख सकता । जनक राजा साधन-भजन के बाद सिद्ध होकर संसार में रहे थे । वे दो तलवारें घुमाते थे – ज्ञान और कर्म ।"
[“বীরভক্ত না হলে দুদিক রাখতে পারে না; জনক রাজা সাধন-ভজনের পর সিদ্ধ হয়ে সংসারে ছিল। সে দুখানা তলোয়ার ঘুরাত; জ্ঞান আর কর্ম।”
"Unless a devotee is of the heroic type he cannot pay attention to both God and the world. King Janaka lived a householder's life only after attaining perfection through austerity and prayer. He fenced with two swords, the one of Knowledge and the other of action."
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं –
एई संसार मजार कूटी।
आमि खाई दाई आर मजा लूटी।।
जनक राजा महातेजा तार किसे छीलो त्रुटि।
से जे येदिक -ओदिक दूदिक रेखे खेयेछिलो दूधेर बाटि।।
(भावार्थ) - "यह संसार आनन्द की कुटिया है । यहाँ मैं खाता, पीता और मजा लूटता हूँ । जनक राजा महातेजस्वी थे । उन्हें किस बात की कमी थी ! उन्होंने 'भगवान और संसार' दोनों बातों को सँभालते हुए दूध पिया था ।"
.[এই বলিয়া ঠাকুর গান গাহিতেছেন:
এই সংসার মজার কুটি।
আমি খাই দাই আর মজা লুটি।।
জনক রাজা মহাতেজা তার কিসে ছিল ত্রুটি।
সে যে এদিক-ওদিক দুদিক রেখে খেয়াছিল দুধের বাটি।।
The Master sang:
This very world is a mansion of mirth;Here I can eat, here drink and make merry.Janaka's might was unsurpassed; What did he lack of the world or the Spirit? Holding to one as well as the other, He drank his milk from a brimming cup!
श्रीरामकृष्ण - "तुम्हारे लिए चैतन्यदेव ने जो कहा था, " जीवों पर दया, भक्तों की सेवा और नामसंकीर्तन ।"
[“তোমাদের পক্ষে চৈতন্যদেব যা বলেছিলেন, জীবে দয়া, ভক্তসেবা আর নামসংকীর্তন।
MASTER: "For you, as Chaitanya said, the disciplines to be practised are kindness to living beings, service to the devotees, and chanting the name of God.
"तुम्हें क्यों कह रहा हूँ ? तुम 'हौस'* में काम कर रहे हो । अनेक काम करने पड़ते है, इसलिए कह रहा हूँ । (House - व्यापारी की दुकान)
[“তোমায় বলছি কেন? তোমার হৌস-এর (House, সদাগরে বাড়ির) কাজ; আর অনেক কাজ করতে হয়। তাই বলছি।
(To Surendra) "Why do I say all this to you? You work in a merchant's office. I say this to you because you have many duties to perform there.
"तुम आफिस में झूठ बोलते हो, फिर भी तुम्हारी चीजें क्यों खाता हूँ ? तुम दान, ध्यान जो करते हो । तुम्हारी जो आमदनी है उससे अधिक दान करते हो । कहावत है न - बारह हाथ ककड़ी का तेरह हाथ बीज!
[“তুমি আফিসে মিথ্যা কথা কও তবে তোমার জিনিস খাই কেন? তোমার যে দান-ধ্যান আছে; তোমার যা আয় তার চেয়ে বেশি দান কর; বার হাত কাঁকুড়ের তের হাত বিচি!
"You tell lies at the office. Then why do I eat the food you offer me? Because you give your money in charity; you give away more than you earn. The seed of the melon is bigger than the fruit', as the saying goes.
"कंजूस की चीज मैं नहीं खाता हूँ । उनका धन इतने प्रकारों से नष्ट हो जाता है – मामला मुकदमा में, चोर-डकैतों से, डाक्टरों में, फिर बदचलन लड़के सब धन उड़ा देते है, यही सब है ।
[“কৃপণের জিনিস খাই না। তাদের ধন এই কয় রকমে উড়ে যায়: ১ম, মামলা মোকদ্দমায়; ২য়, চোর ডাকাতে; ৩য়, ডাক্তার খরচে; ৪র্থ, আবার বদ ছেলেরা সেই সব টাকা উড়িয়ে দেয় — এই সব।
"I cannot eat anything offered by miserly people. Their wealth is squandered in these ways: first, litigation; second, thieves and robbers; third, physicians; fourth, their wicked children's extravagance. It is like that.
"तुम जो दान, ध्यान करते हो, बहुत अच्छा है । जिनके पास धन है उन्हें दान करना चाहिए । कंजूस का धन उड़ जाता है । दाता के धन की रक्षा होती है, सत्कर्म में जाता है । कामारपुकुर में किसान लोग नाला काटकर खेत में जल लाते हैं । कभी कभी जल का इतना वेग होता है कि खेत का बाँध टूट जाता है और जल निकल जाता है, अनाज बरबाद हो जाता है; इसीलिए किसान लोग बाँध के बीच बीच में सूराख बनाकर रखते हैं, इसे 'घोघी' कहते हैं । जल थोड़ा थोड़ा करके घोघी में से होकर निकल जाता है, तब जल के वेग से बाँध नहीं टूटता और खेत पर मिट्टी की परतें जम जाती हैं । उससे खेत उर्वर बन जाता है और बहुत अनाज पैदा होता है । जो दान, ध्यान करता है वह बहुत फल प्राप्त करता है, चतुर्वर्ग फल- (चारो पुरुषार्थ) ।"
[“তুমি যে দান-ধ্যান কর, খুব ভাল। যাদের টাকা আছে তাদের দান করা উচিত। কৃপণের ধন উড়ে যায়, দাতার ধন রক্ষা হয়, সৎকাজে যায়। ও-দেশে চাষারা খানা কেটে ক্ষেতে জল আনে। কখনও কখনও জলের এত তোড় হয় যে ক্ষেতের আল ভেঙে যায়, আর জল বেরিয়ে যায় ও ফসল নষ্ট হয়। তাই চাষারা আলের মাঝে মাঝে ছেঁদা করে রাখে, তাকে ঘোগ বলে। জল ঘোগ দিয়ে একটু একটু বেরিয়ে যায়, তখন জলের তোড়ে আল ভাঙে না। আর ক্ষেতের উপর পলি পড়ে। সেই পলিতে ক্ষেত উর্বরা হয়, আর খুব ফসল হয়। যে দান-ধ্যান করে, সে অনেক ফললাভ করে; চতুর্বর্গ ফল।”
"Your giving money away in charity is very good. Those who have money should give in charity. The miser's wealth is spirited away, but the money of the charitable person is saved. He spends it for a righteous purpose. At Kamarpukur I have seen the farmers cutting channels to irrigate their fields. Sometimes the water rushes in with such force that the ridges around the fields are washed away and the crops destroyed. For this reason the farmers make holes here and there in the ridges. Since the water escapes through the holes, the ridges are not destroyed by the rush of the water. Furthermore, the escaping water deposits soft clay in the fields, which increases their fertility and gives a richer crop. He who gives away in charity achieves great results. He achieves the four fruits; dharma, artha, kama, and moksha."
भक्तगण सभी श्रीरामकृष्ण के श्रीमुख से दानधर्म की यह कथा एक मन से सुन रहे हैं ।
[ভক্তেরা সকলে ঠাকুরের শ্রীমুখ হইতে এই দান-ধর্ম কথা একমনে শুনিতেছেন।
The devotees listened with great attention to Sri Ramakrishna's words.
सुरेन्द्र - मैं अच्छा ध्यान नहीं कर पाता । बीच बीच में 'माँ माँ' कहता हूँ । और सोते समय 'माँ माँ' कहते कहते सो जाता हूँ ।
[সুরেন্দ্র — আমার ধ্যান ভাল হয় না। মাঝে মাঝে মা মা বলি; আর শোবার সময় মা মা বলতে বলতে ঘুমিয়ে পড়ি।
SURENDRA: "I cannot meditate well. I repeat the Divine Mother's name now and then. Lying in bed, I repeat Her name and fall asleep."
श्रीरामकृष्ण - ऐसा होने से ही काफी है । स्मरण-मनन तो है न ?
[শ্রীরামকৃষ্ণ — তা হলেই হল। স্মরণ-মনন তো আছে।
MASTER: "That is enough. You remember Her, don't you?
"मनोयोग और कर्मयोग । पूजा, तीर्थ, जीवसेवा आदि तथा गुरु के उपदेश के अनुसार कर्म करने का नाम है कर्मयोग । जनक आदि जो कर्म करते थे, उसका नाम भी कर्मयोग है । योगी लोग जो स्मरण-मनन करते हैं उसका नाम है मनोयोग ।
[“মনোযোগ ও কর্মযোগ। পূজা, তীর্থ, জীবসেবা ইত্যাদি গুরুর উপদেশে কর্ম করার নাম কর্মযোগ। জনকাদি যা কর্ম করতেন তার নামও কর্মযোগ। যোগীরা যে স্মরণ-মনন করেন তার নাম মনোযোগ।
"There are two kinds of yoga: manoyoga and karmayoga. To perform, following the guru's instructions, such pious acts as worship, pilgrimage, and service to living beings is called karmayoga. The duties that Janaka performed are also called karmayoga. The meditation and contemplation of the yogis is called manoyoga.
"फिर कालीमन्दिर में जाकर सोचता हूँ 'माँ, मन भी तो तुम हो !' इसीलिए शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा एक ही चीज हैं ।"
[“আবার ভাবি কালীঘরে গিয়ে, মা মনও তো তুমি! তাই শুদ্ধমন, শুদ্ধবুদ্ধি শুদ্ধ আত্মা একই জিনিস।”
"Sometimes I say to myself in the Kali temple, 'O Mother, the mind is nothing but Yourself.' Therefore Pure Mind, Pure Buddhi, and Pure Atman are one and the same thing."
सन्ध्या हो रही है । अनेक भक्त श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर घर लौट रहे हैं । श्रीरामकृष्ण पश्चिम के बरामदे में गये हैं । भवनाथ और मास्टर साथ हैं ।
[সন্ধ্যা আগত প্রায়, ভক্তেরা অনেকেই ঠাকুরকে প্রণাম করিয়া বাটি প্রত্যাগমন করিতেছেন। ঠাকুর পশ্চিমের বারান্দায় গিয়াছেন; ভবনাথ ও মাস্টার সঙ্গে আছেন।
It was about dusk. Many of the devotees saluted Sri Ramakrishna and started to go home. The Master went to the west porch. Bhavanath and M. were with him.
श्रीरामकृष्ण (भवनाथ के प्रति) - तू इतनी देर में क्यों आता है ?
[শ্রীরামকৃষ্ণ (ভবনাথের প্রতি) — তুই এত দেরিতে আসিস কেন?
MASTER (to Bhavanath): "Why do you come here so seldom?"
भवनाथ (हँसकर) - जी, पन्द्रह दिनों के बाद दर्शन करता हूँ । उस दिन आपने स्वयं ही रास्ते में दर्शन दिया । इसलिए फिर नहीं आया ।
[ভবনাথ (সহাস্যে) — আজ্ঞে, পনেরদিন অন্তর দেখা করি; সেদিন আপনি নিজে রাস্তায় দেখা দিলেন, তাই আর আসি নাই।
BHAVANATH (smiling): "Sir, I visit you once in a fortnight. I saw you in the street the other day, so I didn't come here."
श्रीरामकृष्ण - यह कैसी बात है रे ! केवल दर्शन से क्या होता है ? स्पर्शन, वार्तालाप ये सब भी तो चाहिए ।
[শ্রীরামকৃষ্ণ — সে কিরে? শুধু দর্শনে কি হয়? স্পর্শন, আলাপ — এ-সবও চাই।
MASTER: "What do you mean? What can you gain by mere seeing? Touch and talk are also necessary."
গান - এবার আমি ভাল ভেবেছি
ভাল ভাবীর কাছে ভাব শিখেছি।
যে দেশে রজনী নাই মা সেই দেশের এক লোক পেয়েছি,
আমি কিবা দিবা কিবা সন্ধ্যা সন্ধ্যারে বন্ধ্যা করেছি।
নূপুরে মিশায়ে তাল সেই তালের এক গীত শিখেছি,
তাধ্রিম তাধ্রিম বাজছে সে তাল নিমিরে ওস্তাদ করেছি।
ঘুম ভেঙেছে আর কি ঘুমাই, যোগে যাগে জেগে আছি,
যোগনিদ্রা তোরে দিয়ে মা, ঘুমেরে ঘুম পাড়ায়েছি।
প্রসাদ বলে ভুক্তি মুক্তি উভয়ে মাথায় রেখেছি,
আমি কালী ব্রহ্ম জেনে মর্ম ধর্মাধর্ম সব ছেড়েছি।