Monday, August 10, 2015

" खण्डन- भवबन्धन, जग-वन्दन, वन्दी तोमाय "

श्रीश्रीरामकृष्ण -आरात्रिक भजन 

(मिश्र बहार -ताल फेरता )

 
खण्डन- भवबन्धन, जग-वन्दन, वन्दी तोमाय ।

निरंजन, नररूपधर,  निर्गुण, गुणमय ।१।


हे भवबन्धन को खण्डन करने वाले, जगत के वन्दनीय , मैं तुम्हारी वन्दना करता हूँ। तुम निरंजन हो, नर-रूप धारण किये हो, निर्गुण होकर भी गुणमय हो । ]
मोचन-अघदूषण, जगभूषण, चिदघनकाय ।

ज्ञानांजन-विमल-नयन, वीक्षने मोह जाय ।२।

 
[तुम मनुष्य को दूषित करने वाले पाप से मुक्त करते हो, जगत के भूषणरूपी हो, ज्ञानस्वरूप हो, ज्ञानरूपी अंजन से तुम्हारे नेत्र विशुद्ध हैं, तुम्हारे उन नेत्रों की ओर देखने मात्र से ही मोह दूर भाग जाता है । ]
भास्वर भाव-सागर, चिर-उन्मद प्रेम-पाथार ।

भक्तार्जन-युगलचरण, तारण-भव-पार ।३।

 
[तुम ज्ञानमय भाव-समुद्र हो, सदा मतवाले प्रेम-महावारिधि हो, तुम्हारे जो युगल चरण हैं, वे भवसागर के पार उतार देते हैं, वे भक्तों के द्वारा ही प्राप्त करने योग्य हैं । ]
 ज्रीम्भित-युग-ईश्वर, जगदीश्वर, योगसहाय ।

निरोधन, समाहित-मन, निरखि तव कृपाय ।४।

 [तुम युगावतार के रूप में प्रकट हुए हो, जगदीश्वर हो, योग के सहायक हो, तुम्हारी कृपा से देखता हूँ, मेरी इन्द्रियाँ निरुद्ध और मन समाधिमग्न हुआ है। ]
भंजन दुःखगंजन, करुणाघन, कर्मकठोर ।
प्राणार्पण जगत-तारण कृन्तन कलिडोर ।५।

 
[ तुमने दुःख के उत्पातों को दूर किया है, तुम दया की मूर्ति हो और दृढ कर्मवीर हो, तुमने जगत के उद्धार के लिये अपने प्राणों का अर्पण कर दिया है, कलियुग के बन्धनों को छिन्न कर दिया है। ]
वंचन-कामकांचन, अतिनिन्दित इन्द्रियराग ।

त्यागीश्वर, हे नरवर ! देहो  पदे अनुराग ।६।

 
[तुमने कामिनी और कांचन को छोड़ा है और इन्द्रियों के आकर्षण को बहुत ही तुच्छ माना है, हे त्यागीश्वर, हे नरवर, मुझे श्री चरणों में प्रेम दो !]
निर्भय, गतसंशय, दृढनिश्चय-मानसवान ।

निष्कारण-भकत-शरण,  त्यजि जाति-कूल-मान ।७।

  [तुम भयरहित हो, तुममें कोई सन्देह नहीं रहा, तुम दृढ़निश्चय तथा उदार चित्तवाले हो। तुम जाति या कुल का विचार न करके बिना कारण ही भक्तों को शरण देते हो। ]
सम्पद तव-श्रीपद, भव गोष्पद-वारी यथाय ।

प्रेमार्पण, समदरशन, जगजन दुःख जाय ।८।

 
[तुम्हारे चरणकमल ही मेरी संपत्ति हैं, जिनकी तुलना में यह संसार गाय के एक खूर से दबी जमीन के छोटे से गड्ढे में आने वाले जल जैसा है। तुम प्रेम के दाता हो, समदर्शी हो, तुम्हारे दर्शन से जगत-निवासियों के सभी दुःख दूर हो जाते हैं।
नमो नमो प्रभु ! वाक्यमनातीत, मनोवचनैकाधार।

ज्योतिर ज्योति, उजल हृदिकन्दर तूमि तमोभन्जन हार ।९।

 
[वाणी और मन से परे होकर भी वाणी और मन के एकमात्र आधार रूपी हे प्रभो ! तुम्हें बार बार नमस्कार ! तुम ज्योति की भी ज्योति हो, हृदय रूपी गुफा में उजाला करनेवाले तथा अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करनेवाले हो। ]
धे धे धे, लंग रंग भंग, बाजे अंग संग मृदंग ।

गाईछे छन्द भकतवृन्द, आरति तोमार ।।

जय जय आरति तोमार, हर हर आरति तोमार,शिव शिव आरति तोमार ।१०।
[भक्तगण छन्दों में आबद्ध तुम्हारी आरती का संगीत गा रहे हैं, जिसमें धे धे धे लंग -रंग-भंग रव से अंगों के साथ साथ मृदंग बज रहे हैं। तुम्हारी आरती की जय हो, तुम्हारी आरती पापों का हरण करनेवाली तथा परमकल्याणदायिनी है।]
  जय जय आरति तोमार । हर हर आरति तोमार । शिव शिव आरति तोमार ।।
 
।।जय श्री गुरु महाराज जी की जय ।।
 - स्वामी विवेकानन्द

 

श्री रामकृष्णप्रणामः 

ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे ।
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥

धर्म के प्रतिष्ठाता एवं सकल धर्मस्वरूप, सब अवतारों में श्रेष्ठ, हे रामकृष्ण, तुम्हें प्रणाम है ! 
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 श्रीरामकृष्ण वचनामृत के लेखक श्री 'म' कहते हैं - " अवतार एक सूर्य के सदृश्य होते हैं, तथा उनके लीला पार्षद या उनके नजदीकी शिष्य लोग सूर्य की किरणों के सदृश्य होते हैं। स्वयं ठाकुर ने ही स्वामीजी को अपनी प्रशंसा में  इन छन्दों को लिखने के लिये प्रेरित किया था, ताकि समस्त संसार उसे सुन सके और उन्हें जान सके ! 
म (अन्तेवासी से ) - देखकर नहीं, जरा अपनी स्मृति पर जोर डालकर इन्हें गाओ तो !
अन्तेवासी (धीमे स्वर में ) -
खण्डन- भवबन्धन, जग-वन्दन, वन्दी तोमाय ।

निरंजन, नररूपधर,  निर्गुण, गुणमय ।१।


हे भवबन्धन को खण्डन करने वाले, जगत के वन्दनीय , मैं तुम्हारी वन्दना करता हूँ। तुम निरंजन हो, नर-रूप धारण किये हो, निर्गुण होकर भी गुणमय हो । ]
'म'-- आओ देखें स्वामीजी यहाँ क्या कह रहे हैं, " जो ब्रह्म निर्गुण निराकार हैं, अर्थात  सभी गुणों से परे हैं, वही ब्रह्म सभी गुणों के साथ श्री रामकृष्ण के इस मानव शरीर में आविर्भूत हुए हैं! "
वे आगे कहते हैं, " जो कोई भी मनुष्य उनके श्रीचरणों की शरण में चला आयेगा, वह निश्चित रूप से इस भवसागर से पार हो जायेगा।" फिर भवसागर से जो पार करा दे, ऐसी शक्ति भला स्वयं भगवान के सिवा और किसमें हो सकती है? 
 वे उसमें दो विशेषणों को और जोड़ देते हैं - " दृढ़निश्चय मानसवान " और " निष्कारण भकत- शरण" अर्थात जब दृढ़ निश्चयी मन समाधि में लीन हो जाता है, तब उस समय भी भक्तों के लिये वे ही निःस्वार्थ शरण स्थल के रूप में उपस्थित रहते हैं ! " इस प्रकार के विरोधाभासी गुण केवल भगवान में ही होना सम्भव है। इसीलिये अवतार वरिष्ठ श्री रामकृष्ण की प्रशंसा में यह भजन लिखा गया है।"
 इस आरती में स्वामी जी कहते हैं - " ठाकुर ही परस्पर विरोधी सभी धर्मों के मिलन-बिन्दु (मीटिंग पॉइन्ट) हैं, उनकी यही विशेषता उन्हें अन्य समस्त अवतारों और पैगंबरों से श्रेष्ठ बना देती है ! फिर अन्तेवासी की ओर देखते हुए एम पूछते हैं - ' नमो नमो के बाद क्या है ? '
अन्तेवासी - 'नमो नमो प्रभु ! वाक्यमनातीत, मनोवचनैकाधार।' अर्थात वाणी और मन से परे होकर भी वाणी और मन के एकमात्र आधार रूपी हे प्रभो ! तुमको बार बार नमस्कार है !
" देखो भगवान (ठाकुर) ने स्वयं मानव शरीर धारण किया है, इसीलिये वे सभी पुरुषों में महानतम हैं, मन वाणी से परे हैं इसीलिये - नरवर हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जो अस्तित्व अविभाज्य, अखण्ड सच्चिदानन्द - सत-चित-आनन्द ब्रह्म हैं, जो मनुष्य के मन-वाणी से अगोचर है, वे ही अभी श्री रामकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं। वे ही अपनी शक्ति की सहायता से इस विश्व-ब्रह्माण्ड की रचना करने, उसका पालन करने पुनः उसे विघटित करने की लीला कर रहे हैं! " जब कोई साधक मनःसंयोग करने से पहले इन दो छन्दों - 
' निर्भय, गतसंशय, दृढनिश्चय-मानसवान । 
निष्कारण-भकत-शरण,  त्यजि जाति-कूल-मान ।७। '
और 
' नमो नमो प्रभु ! वाक्यमनातीत, मनोवचनैकाधार। 
ज्योतिर ज्योति, उजल हृदिकन्दर तूमि तमोभन्जन हार ।९।'  
का गान कर लेगा, तो बाद के सभी छन्दों को समझने का अधिकार उसे प्राप्त हो जायेगा। कोई भी साधक जो निर्जन में (अर्थात जहाँ केवल ठाकुर-माँ-स्वामीजी की चर्चा होती है -जैसे महामण्डल शिविर में) में रहते हुए आरती के इन प्रशंसात्मक पंक्तियों का गायन करेगा, वह ठाकुर को समझने में सक्षम हो जायेगा ! (तुम्हीं ब्रह्म रामकृष्ण, तुम्हीं कृष्ण तुम्हीं राम ! का मर्म समझ कर ब्रह्मविद् हो जायेगा। )
अन्तेवासी - एक बार अमेरिका में स्वामी जी से किसी ने पूछा था कि आप अपने गुरु श्री रामकृष्ण के सम्बन्ध में कुछ कहिये। किन्तु वे इतने महान थे कि स्वामी जी उनके ऊपर कुछ कहने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे, बहुत कोशिश करने के बाद उन्होंने कहा था -'श्री रामकृष्ण इज लभ ' ठाकुर मूर्तिमान प्रेम थे ! आगे चलकर महापुरुष महाराज (स्वामी शिवानन्द) जी कहते थे कि स्वामी जी को वास्तव में ठाकुर के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहना था, उसे उन्होंने भजन की इन पंक्तियों में ही बहुत सुंदर ढंग से कह दिया है।   
एम - " क्यों नहीं ? ये सभी शब्द दिव्य महापुरुषों के शब्द हैं। जो एकमात्र पुरुषोत्तम हैं -नरवर हैं, सभी मनुष्यों में महानतम हैं, वे ही मानवजाति के सच्चे नेता (विष्णु) हैं, इस नरवर को निहारो ! ईसा मसीह ने भी अपने विषय में इसी प्रकार कहा था - स्वामी जी ने इस स्तवन में उसी पैग़म्बर के शब्दों को भेंट के रूप में संकलित किया है। 
जिस व्यक्ति (नरेन्द्रनाथ) ने कभी काशीपुर उद्दान बाड़ी में ठाकुर के अंतिम दिनों में उनकी अवस्था को देखकर कहा था - " यदि वे (ठाकुर) इस समय कहें कि वे अवतार हैं, तो मैं विश्वास कर लूंगा। " उसी व्यक्ति ने आगे चलकर स्वयं इस भजन की रचना की थी। कुछ लोग केवल इन पंक्तियों को रट कर याद कर लेते हैं, किन्तु वे इस भजन के छन्दों पर मनःसंयोग नहीं करते।
यदि तुम इन दो छन्दों पर ध्यान करो, तो तुम्हें ईश्वरलाभ हो जायेगा-तुम श्री रामकृष्ण के सच्चे स्वरूप को जान लोगे। चूँकि स्वामी जी ने स्वयं इस भजन को लिखा था, इसीलिये आज कितने ही लोग इस आरात्रिक भजन को सुनकर लाभान्वित हो रहे हैं ! संसार भर में (पाश्चात्य देशों में भी ) कितने ही मठों और आश्रमों में इस बंगला भजन को ठीक इसी रूप में गाया जाता है।"  

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