Sunday, June 29, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (25)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
२५. 
आधुनिक मनुष्य को त्याग- वैराग्य की बातें समझाना अत्यन्त कठिन है !


(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
[In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं।]

 
श्री श्री माँ सारदा और आप , मैं ...या कोई भी ... 



नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||



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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

' विवेकानन्द - वचनामृत '  
२५.
मुक्तिर्हेया न मुक्तेहा भक्तिः किञ्चिद्विलम्बताम्। 
सर्वमुक्तिं कामयेsहमुदार श्रुतिसम्मताम् ॥ 

1. Enjoyment is trash.

2. ' Whenever we struggle to get a little enjoyment, a mass of misery falls upon us.' 

3. ' I have given up all hope for my own salvation.' 

4. Devotion may wait a little. 

5. ' There is no time to care for name, or fame, or Mukti, or Bhakti. we shall look to these some other time.' 

6. What I desire is salvation of all, as contemplated in the Vedas. (Rig Veda.
10.12.4)

7.  ' There is no Mukti on earth to call my own.' 

8. ' Do you think, so long as one Jiva endures in bondage, you will have any liberation ?

9. ' There is a class of Vedantists who hold such a view.' 

१. विषय-भोग में सुख खोजना कूड़ेदान में पनीर ढूँढ़ने जैसा है।

२. " जब कभी हम थोड़ा सा सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, तभी दुःख का पहाड़ हमारे सिर पर टूट पडता है।" 


३. 'मैं अपने स्वयं की मुक्ति के लिए (किसी से सहायता पाने की ?)  सब उम्मीद छोड़ दी है ! '  

४. भक्ति थोड़ा इंतजार कर सकती है !  

५. "  आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! नाम के लिये समय नहीं है, न यश लिये, न मुक्ति के लिये, न भक्ति के लिये समय है; इनके बारे में फिर कभी देखा जायेगा। " 

६. जैसा कि वेदों में कहा गया है; मेरी भी यही कामना है कि- " सभी लोग मुक्त हो जायें !

७. इस पृथ्वी पर कोई मुक्ति ऐसी नहीं जो मुझे अपने लिये चाहिये ! 

८.  तू क्या समझता है कि एक भी जीव (पशु-मानव) के बन्धन में रहते हुए तेरी मुक्ति होगी ? 

९. एक श्रेणी के वेदान्तीयों का ऐसा ही मत है --वे कहते हैं " व्यष्टि की मुक्ति, मुक्ति का वास्तविक स्वरूप नहीं है। समष्टि की मुक्ति ही मुक्ति है। ' 

आधुनिक मनुष्य से वैराग्य की बात कहना अत्यन्त कठिन है : मेरे बारे में अमेरिका के लोग कहते थे, कि मैं उस देश से आकर यहाँ वैराग्य का उपदेश दे रहा हूँ, जो मृत है और जिसे पाँच हजार वर्ष पूर्व ही दफना दिया गया है। इंग्लैण्ड के दार्शनिक भी शायद मन ही मन ऐसा ही सोचते हों ? पर यह भी सत्य है कि धर्म का यही एकमात्र पथ है ! इन्द्रिय-विषयों को विषवत् जानकर उनको त्याग दो, और विरक्त जाओ। ईसा मसीह ने क्या कहा है ? " मेरे निमित्त जो अपने जीवन का त्याग करेगा, वही जीवन को प्राप्त करेगा !" बार बार उन्होंने यही उपदेश दिया है कि -'पूर्णता की प्राप्ति के लिये त्याग ही एकमात्र साधन है।' [ केवल किसी बाहरी वेशभूषा को धारण कर लेना ही संन्यास नहीं है। ' एषणात्रयस्य त्यागः सन्यासः'- पुत्र-दारा ऐषणा, वित्त ऐषणा और लोक ऐषणा। इन तीनों ऐषणाओं से अनासक्त हो जाना ही संन्यास है।] ऐसा समय आता है, जब अन्तरात्मा इस लम्बे विषादमय स्वप्न से जाग उठती है, बच्चा मिट्टी के खिलौनों से खेलना छोड़कर अपनी माता की गोद जाने के लिये अधीर हो उठता है। उसे कभी न कभी यह अनुभव अवश्य हो जाता है कि --
न जातुः कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा   कृष्णवर्त्मेव   भूय    एवाभिवर्धते ॥
(श्रीमद्भा ९/१९/१४; मनु॰ २/९४)
 -वासना के उपभोग से कभी वासना की निवृत्ति नहीँ होती, वरन जैसे आग में घी डालने से अग्नि नहीं बुझती, बल्कि और अधिक भड़क उठती है। यही बात सभी प्रकार के बौद्धिक आनन्दों, इन्द्रिय-विषय भोगों, तथा उन सभी प्रकार के सुखों जिसकी कल्पना मानव मन कर सकता हो- के लिये सत्य है। ये सभी ऐषणायें मिथ्या हैं, सभी माया के अधीन हैं। सभी कारण-कार्य बंधन के अधीन हैं, जिसके परे हम नहीं जा सकते। हम उसके अन्दर भले ही अनन्त काल तक दौड़ते फिरें, पर उसका अन्त नहीं पा सकते, और जब कभी हम थोड़ा सा सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, तभी दुःख का पहाड़ हमारे सिर पर टूट पडता है। कितनी भयानक अवस्था है यह ! जब इस पर मैं विचार करता हूँ, तब मुझे प्रतीत होता है कि यह कथन- ' सब कुछ माया है', मायावाद ही एकमात्र सही व्यख्या है।
जीवन का सार अन्तर्निहत-पूर्णता की ओर अग्रसर होना : किन्तु अज्ञेयवादी कहते हैं- जीवन जैसा है, बस उसका वैसे ही उपभोग करते रहो। किन्तु जीवन का अर्थ है - मनुष्य जीवन के सर्वोच्च आदर्श, उस पूर्णता की ओर यह अन्वेषण; जीवन का सार ही है क्रमशः पूर्णता की ओर अग्रसर होते रहना। किन्तु उस सर्वोच्च आदर्श, उस अन्तर्निहत-पूर्णता की ओर अग्रसर होने में- हमें अन्तःप्रकृति और बाह्य प्रकृति के विरुद्ध कितना कठोर संघर्ष करना पड़ता है ? उन समस्त आन्तरिक और बाह्य परिवेश के शिकंजे (दबाव-presser) को छिन्न-भिन्न करके, मनुष्य अपने तीनों महत्वपूर्ण उपादानों [components '3H' शरीर, मन और 'H' (Heart)] को इतना पूर्ण विकसित कर सकता है कि उसका यथार्थ दिव्य-स्वरूप (या यथार्थ 'मैं') प्रस्फुटित हो जाय- क्या मनुष्य-जीवन की सर्वाधिक गौरव-पूर्ण उपलब्धि यह नहीं है?
[गुरु-तत्व ही भगवत्-तत्व है जो कभी नहीं मरता। गुरु मरे और चेला रोया -कहे कबीर दोनों ने खोया,  जो असत है उसकी तो सत्ता ही नहीं है, और जो सत है उसका कभी आभाव ही नहीं हो सकता - जैसे हाँथी के गले से माला गिर जाती है तो उसे पता नहीं चलता, वैसे ज्ञानी कब शरीर रूपी उपाधि का त्याग करते हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता।

२. ' माया और भ्रम ' 
(लन्दन में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिये भाषण का प्रमुख अंश' २/४३) 
 प्रायः तुम सभी ने 'माया' शब्द अवश्य सुना होगा। आम तौर पर इस शब्द का व्यवहार, हाँलाकि जो  सही नहीं है - मरीचिका, भ्रान्ति अथवा इसी प्रकार के अर्थ में किया जाता है। किन्तु 'मायावाद' उन स्तम्भों में से एक है, जिन पर वेदान्त की स्थापना हुई है, अतः उसका ठीक ठीक अर्थ समझ लेना आवश्यक है। मैं तुम लोगों से तनिक ध्यानपूर्वक सुनने का अनुरोध करता हूँ, क्योंकि मुझे भय है कि कहीं तुम माया के सिद्धान्त को गलत न समझ बैठो। 
वैदिक साहित्य में 'माया' की प्राचीनतम धारणा भ्रान्ति के अर्थ में ही पायी जाती है। किन्तु उस समय मायावाद-तत्व का उदय नहीं हुआ था। हम वेद में एक ऐसा वाक्य पाते हैं -
 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरुप ईयते'-
 अर्थात ' इन्द्र ने माया द्वारा मानो नाना रूप धारण किये। ' यहाँ पर 'माया' शब्द जादुई शक्ति (magic) अथवा उसी प्रकार के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। किन्तु बाद में प्रश्न उठाया गया कि ' हम इस जगत के रहस्य को क्यों नहीं जान पाते हैं ? ' और उसका जो उत्तर दिया गया है, वह बड़ा ही अर्थगंभीर है : नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति ॥ यजुः १७।३१॥ - ' हम वास्तव में सत्य को जानना नहीं चाहते, केवल व्यर्थ की बातें करते हैं, हम तो इन्द्रिय-भोगों से ही सन्तुष्ट हैं और वासनाओं के पीछे दौड़ते रहते हैं, इसलिये हमने ही मानो सत्य को कुहरे ढक रखा है।' यहाँ पर माया शब्द का प्रयोग बिल्कुल नहीं हुआ है। पर उससे यही भाव प्रकट होता है कि हमारी अज्ञानता का कारण कुछ कुहरे के आवरण जैसा है, जो इस सत्य और हमारे बीच आ गया है। इसके बहुत समय बाद, अपेक्षाकृत आधुनिक उपनिषद में माया शब्द पुनः दिख पड़ता है, हम श्वेताश्वतरोपनिषत् में पढ़ते हैं-
 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनं तु महेश्वरम् ।' ४-१०
-अर्थात माया को ही प्रकृति समझो और माया के शाशक को स्वयं मायापति ईश्वर जानो। 
आचार्य शंकर के पूर्ववर्ती दार्शनिकों ने इस माया शब्द को कई प्रकार से तोड़-मड़ोड़ कर प्रयोग किया है। बौद्धों ने भी मायावाद में थोड़ा हेर-फेर किया है, किन्तु बौद्धों के हाथों में यह बहुत कुछ 'बाह्य शून्य वाद' या आदर्शवाद (Idealism) के रूप में परिणत हो गया था; जिसके अनुसार इन्द्रिय-ग्राह्य सम्पूर्ण जगत हमारे मन की कल्पनायें हैं, उसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। जैसे कोई कहता है -अमुक लड़का बड़ा आदर्शवादी है। इन दिनों माया शब्द को इसी अर्थ में प्रयोग किया जाता है।
हिन्दू जब कहते हैं कि 'संसार माया है', तो साधारण मनुष्य यही समझता है कि संसार एक भ्रम है। इस प्रकार की व्याख्या का कुछ आधार है; क्योंकि बौद्ध दार्शनिकों की एक श्रेणी के बौद्ध बाह्य जगत के अस्तित्व को ही शून्य मानते थे। किन्तु वेदान्त में माया का जो अन्तिम विकसित रूप- ' विवर्तवाद' है;  वह न तो बाह्य शून्य वाद (Idealism) है, न यथार्थवाद (Realism या पदार्थवाद, materialism या देह वाद) है, जिसके अनुसार जगत हमारे मन की अनुभूति मात्र नहीं है, वरन देह की यथार्थ सत्ता है- चुट्टी काटने से दर्द तो होता है ? इसी मत को भौतिकवाद (जड़वाद या चार्वाक मत) कहते हैं।
आचार्य शंकर द्वारा प्रतिपादित 'विवर्तवाद', जो वेदान्त के अनुसार माया का अन्तिम विकसित रूप है, वास्तव में कोई सिद्धान्त नहीं है। वह न तो आदर्शवाद  (Idealism) है, न भौतिकवाद (Realism) है। वह तो तथ्यों का ही सहज वर्णन मात्र है कि -वस्तुतः हम क्या हैं और अपने चारों ओर हम क्या देखते हैं?
 [ब्रह्म जगत के रूप में परिणत हो गया है, पर उस रूप में नहीं जिस प्रकार दूध से दही बन जाता है; बल्कि ब्रह्म ही जगत के रूप में भास रहा है। चेतन ही जड़ के रूप में भास रहा है, शक्ति (energy) ही पदार्थ (matter) के रूप में भास रहा है, अविनाशी आत्मा ही नश्वर शरीर के रूप में भासता है।]
जैसा मैंने पहले कहा था, जिन ऋषियों के मुख से वेद निसृत हुए हैं, उनका मन आध्यात्मिक सत्यों की खोज में ही निरन्तर एकाग्र रहता था। जिस प्रकार अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आँख ही दिखाई देती थी, जहाँ उसको लक्ष्य-भेद करना था, वे ऋषि भी दृष्टिगोचर जगत के अन्तस्तल में पहुँचने के लिए व्यग्र थे। कोई इन्द्रियातीत वस्तु मानो उन्हें अपना साक्षात्कार करने के लिये पुकार रही थी, वे मानो और  अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। 
आज जिसे हम आधुनिक विज्ञान कहते हैं, उपनिषदों में यत्र-तत्र उन्हीं विषयों के ब्योरों को प्रतिपादित किया गया है, जो भ्रमात्मक लगने पर भी उनके मूल तत्व बिल्कुल विज्ञान-सम्मत हैं। उदाहरणार्थ, आधुनिक विज्ञान का ईथर अर्थात आकाशविषयक नवीन सिद्धान्त, उपनिषदों में आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा अधिक विकसित सिद्धान्त के रूप में विद्द्यमान है। किन्तु वह एक मूल सिद्धान्त तक ही सीमित था, जब उन्होंने आकाश तत्व के कार्यों की व्याख्या करने की चेष्टा की, उसमें कई गलतियां थीं। वह सर्वव्यापी प्राण-तत्व, जगत के समस्त जीवन जिसकी विविध अभिव्यक्तियाँ है, वेदों के ब्राह्मण भाग में पाया जाता है। 
जीवन अन्य ग्रहों से संक्रमित होकर पृथ्वी पर आता है: संहिताओं में, उस प्राण या जीवनी-शक्ति की स्तुति एक लम्बे मंत्र द्वारा की गयी है। शायद तुम लोगों में से कुछ को यह जानकर आनन्द हो कि इस पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ आधुनिक यूरोपीय वैज्ञानिकों का जो 'बिग बैंग थ्योरी' (आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान के अनुसार, इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति अत्यन्त उच्च घनत्व और तापमान की अवस्था (extremely high density and temperature) में हुए उस बड़े धमाके के बाद पदार्थ में बड़ी तेजी के साथ जो विस्तार होने लगा वही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण है।) या 'बड़ा धमाका सिद्धान्त' है -बहुत कुछ उसी से मिलता जुलता सिद्धान्त वैदिक दर्शन में भी पाया जाता है। यहाँ इस प्रकार का एक मत प्रचलित है, जिसे तुम सभी निश्चित रूप से जानते होगे, कि जीवन अन्य ग्रहों से संक्रमित होकर पृथ्वी पर आता है। कतिपय वैदिक दार्शनिकों का भी यह निश्चित मत है कि पृथ्वी पर जीवन इसी प्रकार चन्द्रलोक से संक्रमित होकर आता है। 
मूल तत्वों के सम्बन्ध में हम देखते हैं कि वैदिक ऋषि व्यापक और सामान्यीकृत सिद्धान्तों की व्याख्या करने में अतिशय साहसी और आश्चर्यजनक रूप से निर्भीक (bold) थे। जब प्राचीन काल में बाह्य जगत का आकाश तत्व ब्रह्माण्ड-रहस्य का भेद खोलने में समर्थ नहीं हुआ, तो वे समझ गए कि बाह्य जगत में जगत-कारण या सत्य की खोज करना व्यर्थ है। उसी प्रकार आधुनिक विज्ञान भी प्रयोग शाला के माध्यम से इस ब्रह्माण्ड रहस्य का भेद खोलने में असमर्थ होकर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सका; क्योंकि ईथर का सिद्धान्त नाकाम हो गया। हमारे ऋषियों ने जब यह समझ लिया कि यह सर्वव्यापी प्राण-तत्व भी ब्रह्माण्ड-रहस्य का भेद खोलने में असमर्थ है, तो उसका विस्तृत अनुशीलन की चेष्टा भी व्यर्थ है। क्योंकि ब्योरे ब्रह्माण्ड के सिद्धान्त की मौलिकता में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। मेरे कहने  तात्पर्य कि ब्रह्माण्ड-उतपत्ति का सिद्धान्त खोजने में हिन्दू ऋषि भी आधुनिक वैज्ञानिकों की तरह ही, एवं कभी कभी तो उनसे भी अधिक साहसी थे। उन्होंने भव्यतम सामान्यीकृत आध्यात्मिक सत्यों का आविष्कार किया, और उनके कुछ महावाक्य तो अब भी परिकल्पनाओं के रूप में ही विद्यमान हैं, जिन्हें वर्तमान विज्ञान अभी तक परिकल्पना के रूप में भी नहीं कर सका है। 
उदाहरणार्थ, वे केवल आकाश तत्व पर पहुँचकर ही रुक नही गये, वरन और बढ़ कर उन्होंने मन को भी और अधिक सूक्ष्मतर आकाश में वर्गीकृत किया। फिर उसके भी परे उन्होंने उससे भी और अधिक  विशिष्ट वर्ग के लिये आरक्षित (rarefied ether) को प्राप्त किया। पर वह भी ब्रह्माण्ड-रहस्य का भेदन न कर सका, उससे समस्या का समाधान नहीं हुआ। अन्त में वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि, ' बाह्य जगत के बारे में चाहे कितना भी ज्ञान क्यों न प्राप्त हो जाये, उससे ब्रह्माण्ड-रहस्य का भेद नहीं खुल सकता।' किन्तु भौतिक विज्ञानी को देहाभिमान अधिक होता है, इसीलिये वे कहते हैं -' अरे, हमने अभी ही तो कुछ प्राकृतिक नियमों को जानना शुरू किया है, जरा कुछ हजार वर्ष और प्रतीक्षा करो, देखोगे हमें समाधान मिल जायेगा। [और हाल ही में उन्होंने 'भगवान कण' (बोसॉन) को प्रयोग शाला में खोज निकालने का दावा किया है। ']
मन की ससीमता: किन्तु वेदान्तवादी निश्चित रूप से जानते हैं, कि अनन्त ईश्वर (असीम) को प्रयोगशाला में चिमटे से पकड़ कर नहीं देखा जा सकता। इस लिये वे कहते हैं-नहीं, यह मन जिसकी सहायता से हम सबकुछ जानते हैं,जो इतनी तीव्र गति से दौड़ता है कि एक क्षण में चन्द्रमा पर पहुँच जाता है, फिर भी यह चेतन नहीं है, स्वयं प्रकाशित नहीं है- जड़ है। अतः मन में अपनी सीमा से बाहर जाने की शक्ति नहीं है। मन देश, काल और निमित्त (causation कारणत्व या  कारण-कार्य-संबंध) की चहार दिवारी (संचित -क्रियमाण-प्रारब्ध) के बाहर नहीं जा सकता। जिस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के  बाहर नहीं कूद सकता, उसी प्रकार देश और काल के नियम ने जो सीमा खड़ी कर दी है, उसका अतिक्रमण करने की क्षमता किसी में नहीं है। देश-काल-निमित्त सम्बन्धी रहस्य को खोलने का प्रयत्न ही व्यर्थ है, क्योंकि इसकी चेष्टा करते ही इन तीनों की सत्ता स्वीकार करनी होगी।
हमारा सम्पूर्ण जीवन एक विरोधाभास है :  फिर जगत के अस्तित्व की व्याख्या क्या होगी?  ' इस जगत का अस्तित्व नहीं है', 'जगत मिथ्या है' --इसका अर्थ क्या है? इसका यही अर्थ है कि उसका निरपेक्ष अस्तित्व नहीं है। मेरे, तुम्हारे और प्रत्येक व्यक्ति के मन के अनुसार इसका केवल सापेक्षिक अस्तित्व है। हम पाँच इन्द्रियों के माध्यम से इस जगत को प्रत्यक्ष करते हैं, किन्तु यदि हमारे पास एक और इन्द्रिय होती तो हम इस जगत को और अधिक प्रत्यक्ष रूप में देख पाते। फिर यदि हमारे पास इससे भी अधिक इन्द्रिय होती, तो यह जगत हमें और भी कुछ अलग रूप में दिखाई देता। इसीलिये, इस जगत का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है- इसकी अपरिवर्तनीय, अचल, अनन्त अस्तित्व नहीं हैकिन्तु इसको अस्तित्वशून्य (non-existence) या असत् भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह तो विद्यमान है और हम किसी गुलाम की भाँति इसी जगत में और इसीके माध्यम से कार्य करने को बाध्य हैं। इसलिये यह जगत न तो असत् न सत् है, यह सत् (existence) और असत् (non-existence) का मिश्रण है। अमूर्तता (abstractions कपोल कल्पना) से लेकर जीवन के सामान्य दैनिक स्थूल कार्यों तक विश्लेषण करने पर हम देखते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन एक विरोधाभास है,-  सत् और असत् का मिश्रण है। 
ज्ञान के क्षेत्र में भी यही विरोधाभास दिखायी पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य यदि जानना चाहे, तो समस्त ज्ञान प्राप्त कर सकता है; पर दो-चार पग चलने के बाद ही उसे एक ऐसी अभेद्द्य दीवार दिखने में आती है, जिसको लाँघ जाना उसके वश के बाहर हो जाता है। उसके सभी कार्य एक परिधि के अन्दर घूमते रहते हैं, और वह इस चक्र (जन्म-मृत्यु) से बाहर नहीं जा सकता। जिन रहस्यों (मृत्यु की समस्या आदि) का समाधान ढूँढ़ना उसे सबसे प्रिय और अनिवार्य लगता है, उसे उसका समाधान ढूँढ़ने के लिये दिन-रात उकसाते रहते हैं, उसका आह्वान करते रहते हैं, उनका समाधान ढूँढ़ने में वह असमर्थ है, क्योंकि वह अपनी बुद्धि के परे नहीं जा सकता। फिर भी उस मृत्यु-रहस्य का भेदन करने की अदम्य इच्छा उसके मन को हमेशा कुरेदती रहती है। जीवन की वर्तमान आवश्यकतायें उसे समझती हैं कि इस इच्छा का दमन और संयमित करने में ही उसकी भलाई है। हमारे हृदय का प्रत्येक स्पन्दन प्रत्येक निःश्वास के साथ हमें स्वार्थी होने का आदेश देता है।
आद्य शक्ति पराम्बा भगवती दुर्गा (विवेक-शक्ति): पर दूसरी ओर, कोई पराशक्ति (आद्य शक्ति पराम्बा भगवती दुर्गा) है, जो कहती है कि एकमात्र निःस्वार्थपरता ही जीवन के समस्त शुभों का साधन है। जन्म से ही प्रत्येक बालक आशावादी होता है; वह केवल सुनहले स्वप्न देखता है। यौवन में तो वह और भी अधिक आशावादी हो जाता है। मृत्यु, पराजय अथवा अधोगति नाम की भी कोई चीज है, यह बात किसी युवक के समझ में आनी कठिन है। फिर बुढ़ापा आता है और जीवन एक विनाश की राशि मात्र हो जाता है। सुनहले स्वप्न हवा में उड़ जाते हैं, और मनुष्य निराशावादी हो जाता है। प्रकृति के थपेड़े खाकर हम बस इसी प्रकार दिशाविहीन व्यक्ति की भाँति एक छोर से दूसरे तक दौड़ते रहते हैं। 
भगवान बुद्ध राजमहल की विलासिता में अपने जीवन के उद्देश्य को ही भूल गये: यहाँ मुझे भगवान बुद्ध की जीवनी 'ललित विस्तार' का एक प्रसिद्द गीत याद आता है। वर्णन इस प्रकार है कि बुद्ध ने मनुष्य-जाति के उद्धारक (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) के रूप में जन्म लिया, किन्तु जब राजमहल की विलासिता में अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये कुछ स्वर्गदूत आये, और उनको जगाने के लिये एक गीत गया। जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है - ' हम जीवन-नदी के प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं, हम निरन्तर परिवर्तित हो रहे हैं- कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है। किसी नदी की निरंतर-प्रवाह के समान हमारा जीवन भी विराम नहीं जानता-अविरत चलता ही रहता है।' तब फिर उपाय क्या है ? जिसके पास प्रचूर धन-दौलत है, वह तो आशावादी हो जाता है, कहता है-' बुढ़ापे के बाद क्या होगा ? इस पर सोचने के लिये भी मत कहो, भय उत्पन्न करनेवाली दुःख की बातें मत कहो, संसार के दुःख-कष्ट की बातें मत सुनाओ।' उसके पास जाकर यदि कहो- 'all is well' (सब कुछ ठीक है!), तो वह कहेगा, ' सचमुच, मैं तो मजे में हूँ; देखो कितने आलीशान भवन में रहता हूँ, यहाँ मुझे भूख या गर्मी-सर्दी का कोई भय नहीं-टी.वी. पर कपिल शर्मा शो देखकर मजे में रहता हूँ ! अतएव मेरे सम्मुख ऐसे भयावह चित्र मत लाओ।' पर दूसरी ओर कितने ही ऐसे लोग हैं, जो शीत और अनाहार के कारण मर रहे हैं। उनके पास यदि जाकर कहो-'आल इज वेल !', तो वे तुम्हारी बात सुनेंगे भी नहीं। जो स्वयं जीवन भर दुःख-कष्ट सहते आ रहे हैं, वे भला दूसरों के लिये कैसे खुश रहने की कामना कर सकते हैं ? बस, इसी प्रकार हमलोग आशावाद और निराशावाद के मध्य झूलते रहते हैं। 
सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं, यह जानकर भी हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं?  इसके बाद मृत्यु की समस्या रूपी भयावह तथ्य सामने  दिखाई पड़ता है--सारा संसार मृत्यु की ओर चला जा रहा है; सभी मरते हैं। हमारी सभी प्रगति, हमारा मिथ्याभिमान (vanities,अहम्मन्यता), हमारे समाज-सुधार, हमारी विलासिता, हमारे ऐश्वर्य, हमारा ज्ञान -इन सबका एक ही अन्त है, मृत्यु! इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नहीं है। नगर पर नगर बसते हैं, फिर उजड़ जाते हैं। साम्राज्य पर साम्राज्य उठते हैं और पतन के गर्त में समा जाते हैं, ग्रह-नक्षत्र आदि चूर-चूर होकर धूल में मिल जाते हैं, और वायु के झोंको से विभिन्न ग्रहों में बिखर जाते हैं। अनादि काल से इसी प्रकार चलता आ रहा है। प्रत्येक वस्तु को मृत्यु में जाकर समाप्त हो जाना पड़ता है। मृत्यु ही सबका का अन्त (लक्ष्य?) है। वही जीवन का लक्ष्य है, सौन्दर्य का लक्ष्य है, ऐश्वर्य का लक्ष्य है, शक्ति का लक्ष्य है, और तो और, धर्म का भी वही लक्ष्य है। साधु और पापी दोनों मरते हैं, राजा और भिखारी दोनों मरते हैं-सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। फिर भी जीवन के प्रति यह प्रबल आसक्ति विद्यमान रहती है। हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं, क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते? यह हम नहीं जानते। और यही माया है।
माता कितनी ही चेष्टा क्यों न करे, ममत्व-बन्धन को तोड़ नहीं सकती: माता बड़े यत्न से सन्तान का लालन-पालन करती है। उसका सारा मन-प्राण, सारा जीवन मानों उसी बच्चे में केन्द्रित रहता है। बालक बड़ा हुआ, युवावस्था को प्राप्त हुआ, और मुमकिन है कि दुश्चरित्र बन गया। और पशु जैसा बनकर प्रतिदिन अपनी माता को मरने-पीटने लगा, किन्तु माता फिर भी उसी पुत्र से चिपकी रहती है। जब उसके मन में पुत्र के दुर्व्यवहार का विचार उठता है, तो उसे वह अपने स्नेह के आवरण में ढँक लेती है। वह थोड़ा सोचती भी है कि यह स्नेह नहीं है, यह कोई अज्ञात शक्ति है, जिसने उसके स्नायुओं पर अधिकार कर रखा है। वह इसे दूर नहीं कर सकती। वह कितनी ही चेष्टा क्यों न करे, इस बन्धन को तोड़ नहीं सकती। और यही माया है।  
'जादुई गोल्डन फ्लीस ' या लॉटरी के द्वारा कड़ोड़पति बनने के सपने देखना : हम सभी जादुई सुवर्ण लोम (गोल्डन फ्लीस- Golden Fleece) की खोज में दौड़ते रहते हैं। [ग्रीक पौराणिक कथा के अनुसार कोल्चिस का टापू जहां गोल्डन फ्लीस की रखवाली एक ड्रैगन करता है; जिसे मारकर, आर्गोस का असली उत्तराधिकारी जेसन ने अपने इच्छित खजाने- 'जादुई गोल्डन फ्लीस ' की चोरी कर अपने साम्राज्य को पुनः प्राप्त किया था। किन्तु समुद्री यात्रा के दौरान चालक दल के सभी सदस्यों को पराजित करने के लिये जेसन को अपने सम्पूर्ण, कौशल, गति और चालाकी का उपयोग करना पड़ता है।] सभी सोचते हैं कि वह खजाना - 'जादुई गोल्डन फ्लीस ' हमें ही मिलेगा। प्रत्येक समझदार आदमी यह जानता है कि उस जादुई स्वर्ण लोम को प्राप्त होने की सम्भावना दो कड़ोड़ में से किसी एक व्यक्ति को ही है। तथापि प्रत्येक मनुष्य उसके लिये कठोर संघर्ष करता है। बस यही माया है! (जैसे एक रूपये की लॉटरी का टिकट खरीद कर, दो कड़ोड़ की लॉटरी का पहला इनाम प्राप्त करने की सम्भावना दो कड़ोड़ में से किसी एक व्यक्ति को ही है। फिर भी जानबूझकर, पढ़ा लिखा आदमी भी लॉटरी के द्वारा कड़ोड़पति बनने के सपने देखता है, सोचता है कौन जाने शायद उसीको मौका मिल जाय?) बस यही माया है !
पृथ्वी पर सबसे आश्चर्य की बात क्या है?: हमारी इस पृथ्वी पर मृत्यु स्टॉकिंगहॉर्स की तरह किसी न किसी बहाने हमें दबोचने के लिये दिन-रात हमारा पीछा कर रही है, यह देखने के बाद भी हम सोचते हैं कि हम सदा जीवित रहेंगे। राजा युधिष्ठिर से यक्ष ने सातवाँ प्रश्न पूछा था - " इस पृथ्वी पर सबसे आश्चर्य की बात क्या है?"  युधिष्ठिर ने उत्तर दिया --- ' हमारे चारों ओर प्रतिदिन लोग मर रहे हैं, फिर भी जो जीवित हैं, वे समझते हैं कि वे कभी मरेंगे ही नहीं। संसार में प्रत्येक जीव को मरते देख कर भी व्यक्ति इस भ्रम में जीता है कि उसकी मृत्यु कभी नहीं होगी।" बस, यही माया है। 
[ यक्ष ने छठा प्रश्न पूछा , अच्छा अब बताओ गृहवासी का मित्र कौन है ? ' युधिष्ठिर ने कहा --
' गृहवासी की मित्र उसकी पत्नी है। '  पत्नी ही काम को आंदोलित करती है। और पत्नी ही उसे मर्यादित करती है। पत्नी ही अर्थोपार्जन में नियोजित करती है और पत्नी ही लोभ का निराकरण कर संतोष करना सिखाती है। जिस पुरुष की पत्नी उसकी मित्र नहीं है , उसका कोई मित्र नहीं हो सकता। फिर भी लोग एक पत्नी-व्रत नहीं रहते, या तलाक ले लेते हैं। -यही माया है !] 
विरोधाभास पुरानी गठिया की बीमारी के समान:  हमारी बुद्धि में, हमारे ज्ञान में, यही क्यों हमारे जीवन की प्रत्येक घटना में ये जबरदस्त विरोधाभास दिखायी पड़ते हैं। सुख दुःख का पीछा करता है और दुःख सुख का। एक सुधारक उठता है और किसी राष्ट्र के दोषों को दूर करना चाहता है। पर इसके पहले कि वे दोष दूर हों, हज़ार नये दोष दूसरे स्थान में उत्पन्न हो जाते हैं। यह बस एक ढहते हुए पुराने मकान के समान है। तुम उस मकान के एक भाग की मरम्मत करते हो, तो उसका कोई दूसरा भाग ढह जाता है। 
भारत में हमारे समाज-सुधारक आजीवन जबरन विधवा-वेश धारण रूपी दोष के विरुद्ध आवाज उठाते हैं और विधवा-विवाह प्रचलित करने की चेष्टा करते हैं। पश्चिम में, अविवाहित रहना बड़ी बुराई है। एक ओर अविवाहितों की सहायता करो, ताकि उनके कष्ट दूर हों। दूसरी ओर विधवाओं की सहायता करो, ताकि उनके कष्ट दूर हों। 
यह तो बस पुरानी गठिया की बीमारी के समान है -उसे सिर से भगाओ, तो कमर में आ जाती है; कमर से भगाओ, तो पैर में उत्तर आती है। सुधारक उठते हैं और शिक्षा देते हैं कि विद्या, धन, संस्कृति कुछ इन-गिने हाथों में ही नहीं रहनी चाहिये; और वे इनको सर्वसाधारण तक पहुंचा देने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हो सकता है, कुछ लोगों में इन  उपायों से अधिक खुशहाली आ भी जाय, लेकिन जैसे जैसे व्यक्ति अधिक सुसंस्कृत होता जाता है, वैसे वैसे शारीरिक ख़ुशी कम होती जाती है। सुख का ज्ञान अपने साथ दुःख का ज्ञान भी लाता है। तब फिर हम किस मार्ग का अवलम्बन करें? हम लोग जो कुछ थोड़ा सा सुख भोगते हैं, दूसरे स्थान से उतने ही परिमाण में दुःख भी उत्पन्न  होता है। बस यही नियम है-सब वस्तुओं पर यही नियम लागू होता है। जो युवक हैं, जिनका खून अभी गरम है, वे शायद इस तथ्य को स्पष्ट रूप से न समझ पायें, पर जिन्होंने धूप में बाल पकायें हैं, अपने जीवन में आँधी और तूफान के दिन देखे हैं, वे इसे सहज ही समझ लेंगे।-और यही माया है ! 
इस जगत में जो कुछ हो रहा है, उसके तथ्यात्मक वर्णन का नाम माया है: दिन-रात ये बातें घट रही हैं, पर इनका ठीक ठीक समाधान करना असम्भव है। ऐसा भला क्यों होता है? इस प्रश्न का उत्तर पाना सम्भव नहीं, क्योंकि प्रश्न ही तर्कसंगत नहीं है। जो बात घट रही है, उसमें न 'कैसे' है, न 'क्यों', हम बस जानते हैं कि वह है और हमारा उसमें कोई हाथ नहीं। अतः इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ हो रहा है, उसके तथ्यात्मक वर्णन का नाम माया है। सधारणतया लोग यह बात सुनकर भयभीत जाते हैं। हमें साहसी होना पड़ेगा। तथ्यों को छिपाने के लिए उस पर परदा डालना रोग का प्रतिकार नहीं है। कुत्तों द्वारा पीछा किये जाने पर जिस प्रकार खरगोश अपने मुँह को टाँगों में छिपाकर अपने को सुरक्षित समझ बैठता है, उसी प्रकार हमलोग भी आशावादी होकर ठीक उस खरगोश के समान आचरण करते हैं। पर यह कोई उपाय नहीं है। दूसरी ओर, जिनके पास प्रचूर मात्रा में भोगने के लिये धन-दौलत है, वे इस मायावाद के सम्बन्ध में बड़ी आपत्तियां उठाते हैं। इस देश (इंग्लैण्ड-अमेरिका) में निराशावादी होना बहुत कठिन है। सभी मुझसे कहते हैं--' वाह, संसार का सारा कारोबार कितने शानदार ढंग से चल रहा है, संसार कितना प्रगतिशील है !' किन्तु वे अपने जीवन को ही सारे संसार का जीवन समझ बैठते हैं। 
पुराने प्रश्न उठते हैं- ईसाई धर्म को ही दुनिया का एकमात्र सच्चा धर्म होना चाहिए; क्यों ? इसलिये कि ईसाई धर्म मानने वाले सभी राष्ट्र समृद्धिशाली हैं। किन्तु ऐसा दावा अपने-आप में विरोधाभासी है, क्योंकि ईसाई राष्ट्रों की समृद्धि गैर-ईसाई देशों के दुर्भाग्य पर निर्भर करती है। गैर-ईसाई देशों का खून चूसे बिना ईसाई राष्ट्र इतने समृद्धिशाली नही बन सकते थे। यदि सारी पृथ्वी ही ईसाई धर्म को मानने लग जाये, तब तो भक्ष्य-स्वरूप शिकार करने योग्य कोई गैर-ईसाई राष्ट्र न रहने के कारण ईसाई राष्ट्र स्वयं दरिद्र हो जायेगा। अतः यह युक्ति अपना ही खण्डन कर लेती है। पशु वनस्पति खाकर जीवित रहते हैं, मनुष्य पशुओं पर, और सबसे ख़राब बात तो यह कि मनुष्य एक दूसरे पर जीवित रहते हैं, बलवान अपने से दुर्बल मनुष्यों का शोषण करके जीवित रहता है। बस, ऐसा ही सर्वत्र हो रहा है। और यही माया है।
इसका समाधान तुम क्या करते हो ? हम प्रतिदिन नयी नयी युक्तियाँ सुनते हैं। कोई कोई कहते हैं कि अन्त में सब कुछ अच्छा हो जायेगा। थोड़ी देर के लिये इस तर्क  स्वीकार कर भी लें, तो प्रश्न उठेगा कि जगत कल्याण के लिये ऐसा शैतानी उपाय क्यों अपनाया जाना चाहिये ? इस पैशाचिक रीति को छोड़ कर क्या स्वयं अच्छा मनुष्य बनो और दूसरों को भी अच्छा मनुष्य बनने में सहायता करो -' बनो और बनाओ'-पद्धति द्वारा जगत का कल्याण नहीं हो सकता ? वर्तमान मनुष्यों के भावी वंशज भविष्य में सुखी होंगे, किन्तु गैर-ईसाई राष्ट्रों को इस समय इतना भीषण दुःख-कष्ट (इराक वार) भोगना क्यों जरुरी है? इसका समाधान नहीं है। यही माया है।
इससे भी अधिक दोषयुक्त धारणा तो यह है कि शुभ का परिमाण क्रमशः बढ़ता जा रहा और अशुभ क्रमशः घटता जा रहा है। अतएव एक समय ऐसा आयेगा कि जब अशुभ घटते घटते अन्त में बिल्कुल शून्य हो जायेगा और केवल शुभ ही बच रहेगा। ऐसा कहना तो बड़ा सरल है, किन्तु क्या यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अशुभ परिमाण में सचमुच घटता जा रहा है? क्या शुभ का परिमाण बढ़ने के साथ साथ, अशुभ की भी क्रमशः वृद्धि नहीं हो रही है ? उदाहरणार्थ, एक जंगली (आदिवासी) मनुष्य को लो। वह मन का संस्कार करना (मनःसंयोग) नहीं जानता, एक अक्षर तक नहीं पढ़ सकता। लिखना किसे कहते हैं, उसने कभी सुना तक नहीं। किन्तु यदि उसे कोई गहरी चोट लगती है, तो वह शीघ्र ही चंगा हो उठता है। परन्तु हमें थोड़ी सी खरोच भी लगती है, तो हम मर जाते हैं। मशीनों के उपयोग से चीजें सुलभ और सस्ती होती जा रही हैं, उनसे उन्नति और विकास के मार्ग की बाधाएं दूर होती जा रही हैं, पर साथ ही, एक के धनी होने के लिये लाखों लोग पिसे जा रहे है, जब कोई राष्ट्र धनी हो रहा होता है, तो अन्य देशों में हजारों लोग दरिद्र से दरिद्रतर होते जा रहे हैं, और असंख्य मानव-समूह को गुलाम बनाया जा रहा है। संसार की रीति ही ऐसी है। 
पाशविक प्रकृति वाले मनुष्य इन्द्रियों में जीवित रहते हैं, यदि उसे पर्याप्त भोजन न मिले, तो वह दुःखी हो जाता है। यदि उसका शरीर अस्वस्थ हो जाय, तो वह अपने को अभागा समझता है। इन्द्रियों में ही उसके सुख और दुःख दोनों का आरम्भ और अन्त होता है। जैसे जैसे वह उन्नति करता जाता है, जैसे जैसे उसके सुख की सीमा-रेखा विस्तृत होती जाती है, वैसे वैसे उसका दुःख भी, उसी अनुपात से, बढ़ता जाता है। जंगल में रहने वाला आदिवासी ईर्ष्या के वश में होना, कचहरी में जाना, नियमित रूप से कर अदा करना, समाज द्वारा वहिष्कृत होना-क्या है; नहीं जानता। वह नहीं जानता कि मनुष्य की दानवी-प्रवृत्ति ने भोले-भाले मनुष्यों को गुलाम बना लेने, उन पर भीषण अत्याचार करने के लिये कैसे कैसे मनोवैज्ञानिक उपायों को आविष्कृत कर लिया है? वह नहीं जानता कि असार ज्ञान से सम्पन्न, गर्वीला मानव किस प्रकार अन्य किसी पशु की अपेक्षा सहस्र गुणा अधिक दुष्ट राक्षस कैसे बन जाता है? ठीक इसी प्रकार हम ज्यों ज्यों इन्द्रियपरायणता से ऊपर उठते जाते हैं, त्यों त्यों हमारी सुख अनुभव करने की शक्ति बढ़ती जाती है, और उसके साथ ही साथ दुःख अनुभव करने की शक्ति भी बढ़ती रहती है। हम जितने ही उन्नत होंगे, हमारे सुख और दुःख की वीथियाँ और भी अधिक बढ़ती जायेंगी। और यही माया है। 
शुभ और अशुभ, ये दो एकदम विभिन्न, पृथक सत्तायें नहीं हैं: इस प्रकार हम देखते हैं, कि माया संसार की व्याख्या करने निमित्त कोई सिद्धान्त नहीं है। वह संसार की वस्तु-स्थिति का वर्णन मात्र है--विरोधाभास ही हमारे अस्तित्व का आधार है। सर्वत्र हमें इन्हीं आश्चर्यजनक विरोधाभासों के माध्यम से गुजरना पड़ेगा। जहाँ शुभ है, वहीं अशुभ भी है; और जहाँ अशुभ है, वहीं अवश्य कुछ शुभ भी है। जहाँ जीवन है, वहीं मृत्यु भी छाया की भाँति उसका अनुसरण कर रही है। जो हँस रहा है, उसी को रोना पड़ेगा; और जो  है, वह भी हँसेगा। इस कठोर सच्चाई का प्रतिकार नहीं हो सकता। हम भले ही ऐसे स्थान की कल्पना करें, जहाँ केवल शुभ रहेगा, अशुभ नहीं, जहाँ केवल हम हँसेंगे, रोयेंगे नहीं। पर वस्तु-स्थिति तो यही है कि इस प्रकार होना असम्भव है, क्योंकि शर्त समान रूप से सर्वत्र विद्यमान हैं। जहाँ हमारे भीतर हँसाने की शक्ति विद्यमान है, वहीं फिर रुलाने की भी शक्ति निहित है। जहाँ सुख उत्पन्न करनेवाली शक्ति विद्यमान है, वहीं अश्रु छलका देनेवाली शक्ति भी वहीं छिपी हुई है।
अतएव वेदान्त दर्शन आशावादी भी नहीं है और निराशावादी भी नहीं है। वह तो दोनों वादों को अभिव्यक्त करता है, सारी घटनायें जिस रूप में होती हैं, वह उन्हें बस उसी रूप में ग्रहण करता है। उसके मतानुसार यह संसार शुभ और अशुभ, सुख और दुःख का मिश्रण है; एक को बढ़ाओ, तो दूसरा भी साथ साथ अनिवार्य रूप से बढ़ेगा। केवल सुख का संसार अथवा केवल दुःख का संसार हो नहीं सकता। इस प्रकार की धारणा ही स्व-विरोधी कथन है। 
जगत की वस्तु-स्थिति का ऐसा विश्लेषण करके वेदान्त ने इस महान रहस्य को उद्घाटित किया है कि शुभ और अशुभ, ये दो एकदम विभिन्न, पृथक सत्तायें नहीं हैं । इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है-जिसे केवल शुभ या केवल अशुभ कहा जा सके। एक ही घटना, जो आज शुभजनक प्रतीत हो रही है, कल अशुभजनक मालूम पड़ सकती है। एक ही वस्तु, जो एक व्यक्ति को दुःखी करती है, दूसरे को सुखी बना सकती है। जो अग्नि बच्चे को जला देती है, वही भूख से मरते व्यक्ति के लिये स्वादिष्ट भोजन भी पका सकती है। जिस नाड़ी-ग्रन्थि के द्वारा दुःख की अनुभूति हमारे अन्दर पहुँचता है, सुख का संवेदन भी उसी के द्वारा भीतर आता है।
अशुभ को दूर करना चाहो, तो साथ ही तुम्हें शुभ को भी दूर करना होगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। मृत्यु को दूर करने के लिये जीवन को भी दूर करना पड़ेगा। मृत्यु-रहित जीवन और दुःख-रहित सुख ये दोनों परस्पर-विरोधी हैं, इनमें से कोई भी अकेला प्राप्त नहीं किया जा सकता; क्योंकि इनमें से प्रत्येक एक ही वस्तु की विभिन्न अभिव्यक्ति है। कल जो शुभप्रद नजर आता था, आज वह वैसा नजर नहीं आता। जब हम बीते जीवन पर नजर डालते हैं, और भिन्न भिन्न समय के अपने आदर्शों की आलोचना करते हैं, तो इस बात की सत्यता हमें तुरन्त दीख पड़ती है। एक समय था, जब शक्तिशाली घोड़ों के जोड़े हाँकना ही मेरा आदर्श था। अब वैसी भावना नहीं होती। बचपन में सोचता था, कि यदि मैं अमुक चॉक्लेट बना सकूँ, तो पूर्ण सुखी हो जाऊँगा। बाद में मैं सोचता था यदि मुझे एक पत्नी और बच्चे हो जाते और पर्याप्त धन हो जाता तो मैं पूर्ण सन्तुष्ट हो जाता। अब लड़कपन की ये सब बातें सोचकर हँसी आती है। 
तीक्ष्ण बुद्धि वाले कुछ शीघ्र समझ जाते हैं और मन्द बुद्धिवाले कुछ देरी में: वेदान्त कहता है कि एक समय ऐसा अवश्य आयेगा, जब हम पीछे नजर डालेंगे और उन आदर्शों पर हँसेंगे, जिनके कारण अपने इस क्षुद्र व्यक्तित्व का त्याग करते हममें भय का संचार होता है। सभी अपने अपने शरीर की रक्षा करने में व्यस्त हैं। कोई भी उसे छोड़ना नहीं चाहता। हम सोचते हैं कि इस देह की अनियत समय तक रक्षा कर लेने से हम अत्यन्त सुखी होंगे; पर समय आने पर हम इस बात पर भी हँसेंगे। अतएव, यदि सच्चाई यही है, इसी निराशाजनक विरोधाभास की अवस्था में जीना हमारी मजबूरी है- जो न तो सत् है न असत् है, न दुःख है न सुख है, बल्कि दोनों का मिक्स्चर है; तो फिर वेदान्त अथवा अन्य दर्शनशास्त्र या धर्म आदि की क्या आवश्यकता है ? और खास कर के, शुभ कर्म आदि करने की क्या आवश्यकता है? यही प्रश्न मन में उठता है। 
क्योंकि यदि हम अशुभ किये बिना शुभ नहीं कर सकते, और सुख उत्पन्न करने का प्रयत्न करने पर भी दुःख बना ही रहने वाला है; तो लोग तुमसे पूछेंगे ही-कि 'शुभ कर्म करने की आवश्यकता फिर क्यों है ? इसका उत्तर पहले तो यह है कि पहले तो, हमें दुःख को कम करने के लिये कर्म अवश्य करना चाहिये, क्योंकि सुखी होने का यही एकमात्र उपाय है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी, देर-सबेर इस बात की सच्चाई को समझ ही लेते हैं। तीक्ष्ण बुद्धि वाले कुछ शीघ्र समझ जाते हैं और मन्द बुद्धिवाले कुछ देरी में। मन्द बुद्धिवाले कड़ी यातना (थर्ड डिग्री टॉर्चर) भोगने के बाद इसे समझ पाते हैं, तो तीक्ष्ण बुद्धि वाले थोड़ी ही यातना भोगने के बाद।
'mud pies' का त्याग : विरोधाभास-पूर्ण जीवन में सम रहना: दूसरा कारण (until we awake from our dreams and give up this building of mud pies.) यह, की यद्द्पि हम जानते हैं कि यह संसार कुत्ते की टेंढ़ी पूछ के समान है, जो कभी सीधा नहीं होगा; अर्थात ऐसा समय कभी न आयेगा, जब इस संसार से दुःख सदा के लिये हट जायेगा और केवल सुख ही सुख भरा रहेगा, फिर भी हमें -' बनो और बनाओ ' यही कार्य करना होगा। क्योंकि इस विरोधाभास-पूर्ण जीवन से बाहर निकलने का यही एकमात्र उपाय हैजब तक हम अपने अपने सपनों से जाग नहीं जाते और बच्चों के समान मिटटी का रसगुल्ला बनाना बन्द नहीं कर देते, (अर्थात 'mud pies'- देह को 'मैं' मानने का भ्रम या देहासक्ति या पारंपरिक सेक्स त्याग नहीं कर देते) तब तक ये ' शुभ और अशुभ (विद्या-अविद्या)' दोनों शक्तियाँ इस ब्रह्माण्ड को हमारे लिये अवश्य जीवित रखेंगी। विरोधाभास पूर्ण जगत में साम्य बनाये रखने का पाठ हमें आज नहीं तो कल सीखना ही पड़ेगा, और यदि हम स्वयं को 'बनो और बनाओ'-आन्दोलन से नहीं जोड़े रखें, तो इसमें बहुत समय, लम्बा समय लग जायेगा। 
असीम को ससीम बनने के लिये उपाधि को स्वीकार करना पड़ेगा: जर्मनी में इस सिद्धान्त--"Infinite has become the finite"- 'असीम ही ससीम' या सीमित हो गया है - के आधार पर दर्शन की एक प्रणाली खड़ी की गयी है। इंग्लैण्ड में इसी तरह का प्रयास अब भी चल रहा है। इन सभी दार्शनिकों के मत का विश्लेषण करने से यही पता चलता है कि अनंत, इस ब्रह्मांड में खुद को व्यक्त करने की कोशिश कर रहा है, और एक समय आएगा कि जब अनंत ऐसा करने में सफल हो जायगा। बहुत ठीक, हमने असीम (Infinite) स्वरुप प्रकाश (manifestation), अभिव्यक्ति (expression) आदि शब्दों का प्रयोग किया है। किन्तु ससीम किस प्रकार असीम को पूर्ण रूप से व्यक्त कर सकता है ? इस कथन का न्यायसंगत मौलिक आधार क्या है? दार्शनिक इस प्रश्न का उत्तर अवश्य जानना चाहेगा। निरपेक्ष और अनंत केवल उपाधि (limitation-परिमितता) को स्वीकार करके ही यह जगत बन सकता है। जो कुछ भी इन्द्रिय, मन और बुद्धि के माध्यम से जानने योग्य होगा उसे स्वतः ही सीमाबद्ध होना पड़ेगा, अर्थात 'उपाधि' (नाम-रूप परमहंस) को स्वीकार करना पड़ेगा। अतएव ससीम (देह-मन-बुद्धि) का असीम होना हास्यास्पद (absurd) है, ऐसा हो नहीं सकता।
Beat a Retreat (अन्तर्मुख होना वैराग्य है): दूसरी ओर वेदान्त यह कहता है, ' यह ठीक है कि निरपेक्ष या असीम अपने को ससीम रूप में व्यक्त करने की चेष्टा कर रहा है, किन्तु एक समय ऐसा आयेगा, जब वह समझ जायेगा कि असीम आनन्द को ससीम इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त करना असम्भव है, इस प्रयत्न को ही न्यायविरुद्ध जानकर उसे पीछे लौटना पड़ेगा; अर्थात अन्तर्मुख होना पड़ेगा। यह पीछे लौटना (या इन्द्रिय विषयों से मन को खींच लेना) ही धर्म का यथार्थ प्रारम्भ है, जिसका अर्थ है वैराग्य !
आधुनिक मनुष्य से वैराग्य की बात कहना अत्यन्त कठिन है: मेरे बारे में अमेरिका के लोग कहते थे, कि मैं उस देश से आकर यहाँ वैराग्य का उपदेश दे रहा हूँ, जो मृत है और जिसे पाँच हजार वर्ष पूर्व ही दफना दिया गया है। इंग्लैण्ड के दार्शनिक भी शायद मन ही मन ऐसा ही सोचते हों ? पर यह भी सत्य है कि धर्म का यही एकमात्र पथ है ! इन्द्रिय-विषयों को विषवत् जानकर उनको त्याग दो, और विरक्त जाओ। ईसा मसीह ने क्या कहा है? " मेरे निमित्त जो अपने जीवन का त्याग करेगा, वही जीवन को प्राप्त करेगा !" बार बार उन्होंने यही उपदेश दिया है कि -'पूर्णता की प्राप्ति के लिये त्याग ही एकमात्र साधन है।' ऐसा समय आता है, जब अन्तरात्मा इस लम्बे विषादमय स्वप्न से जाग उठती है, बच्चा मिट्टी के खिलौनों से खेलना छोड़कर अपनी माता की गोद जाने के लिये अधीर हो उठता है। उसे कभी न कभी यह अनुभव अवश्य हो जाता है कि --
न जातुः कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा   कृष्णवर्त्मेव   भूय    एवाभिवर्धते ॥
(श्रीमद्भा ९/१९/१४; मनु॰ २/९४)
-वासना के उपभोग से कभी वासना की निवृत्ति नहीँ होती, वरन जैसे आग में घी डालने से अग्नि नहीं बुझती, बल्कि और अधिक भड़क उठती है। यही बात सभी प्रकार के बौद्धिक आनन्दों, इन्द्रिय-विषय भोगों, तथा उन सभी प्रकार के सुखों जिसकी कल्पना मानव मन कर सकता हो- के लिये सत्य है। ये सभी ऐषणायें मिथ्या हैं, सभी माया के अधीन हैं। सभी कारण-कार्य बंधन के अधीन हैं, जिसके परे हम नहीं जा सकते। हम उसके अन्दर भले ही अनन्त काल तक दौड़ते फिरें, पर उसका अन्त नहीं पा सकते, और जब कभी हम थोड़ा सा सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, तभी दुःख का पहाड़ हमारे सिर पर टूट पडता है। कितनी भयानक अवस्था है यह ! जब इस पर मैं विचार करता हूँ, तब मुझे प्रतीत होता है कि यह कथन- ' सब कुछ माया है', मायावाद ही एकमात्र सही व्यख्या है। [ (गुरु-तत्व ही भगवत्-तत्व है जो कभी नहीं मरता। गुरु मरे और चेला रोया -कहे कबीर दोनों ने खोया,  जो असत है उसकी तो सत्ता ही नहीं है, और जो सत है उसका कभी आभाव ही नहीं हो सकता - जैसे हाँथी के गले से माला गिर जाती है तो उसे पता नहीं चलता, वैसे ज्ञानी कब शरीर रूपी उपाधि का त्याग करते हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। रामसुख दास के अनुसार गीता का सार)केवल किसी बाहरी वेशभूषा को धारण कर लेना ही संन्यास नहीं है। ' एषणात्रयस्य त्यागः सन्यासः' - पुत्र ऐषणा, वित्त ऐषणा और लोक ऐषणा। इन तीनों ऐषणाओं से अनासक्त हो जाना ही संन्यास है।]  
सतीत्व राष्ट्र की जीवन-रेखा है। हिन्दुओं ने अपने देश में सतीत्व के ऊच्च स्तर को बनाए रखने के लिये 'बाल-विवाह' को स्वीकृति दी थी; किन्तु इससे हमारे लड़के-लड़कियाँ शारीरिक रूप से दुर्बल होन लगें। फिर भी मैं अस्वीकार नहीं कर सकता कि बाल-विवाह ने हिन्दू जाति को सतीत्व-धर्म से विभूषित किया है। क्या तुमने इतिहास में नहीं पढ़ा कि किसी राष्ट्र की मृत्यु का पहला चिन्ह उसकी नारियों में फैलता व्याभिचार या असतीत्व है? जब किसी राष्ट्र में व्याभिचार प्रविष्ट कर जाता है, तो समझना कि उस राष्ट्र का विनाश निकट आ गया है। इन दुःखजनक प्रश्नों का समाधान कहाँ मिलेगा ? यदि माता-पिता अपनी सन्तान के लिये वर-वधु का निर्वाचन करें, तो यह दोष कम हो सकता है। The daughters of India are more practical than sentimental. भारत की बेटियाँ भावुक होने की अपेक्षा अधिक व्यवहारिक होती हैं। किन्तु उनके जीवन में फिर कविता बहुत कम रह जाती हैं। (जो युवा फ़िल्मी चक्कर में पड़कर स्वयं पति और पत्नी का निर्वाचन करते हैं, तो इससे भी उन्हें कोई अधिक सुख नहीं मिलता है।) भारतीय नारियाँ जो अपने माता-पिता की आज्ञा से विवाह करती हैं, साधारणतः अधिक सुखी हैं। पति-पत्नी के बीच कलह अधिक नहीं होता, तलाक लेने की नौबत नहीं आती। दूसरी ओर, अमेरिका में जहाँ स्वाधीनता अधिक है, सुखी परिवार बहुत कम देखने में आते हैं। दुःख यहाँ, वहाँ सभी जगह है। इससे क्या सिद्ध होता है ? यही कि इन सब आदर्शों के द्वारा शाश्वत सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। हम सभी सुखी होने के के लिये उत्कट संघर्ष कर रहे हैं, पर एक ओर थोड़ा सुख प्राप्त होने के पहले ही दूसरी ओर दुःख भी आकर खड़ा हो जाता है। 
' पूर्ण बनो और पूर्ण बनाओ ' :  तो क्या हमें कोई शुभ कर्म नहीं करना चाहिये ? अवश्य करना चाहिये, पहले की अपेक्षा अधिक उत्साह के साथ करना चाहिये। किन्तु निष्काम भाव से ' पूर्ण बनो और पूर्ण बनाओ' करने पर इतना होगा कि हमारी धर्मान्धता और कट्टरता नष्ट हो जाएगी। धर्मान्ध अधिक कार्य नहीं कर पाता। वह अपनी शक्ति का तीन चौथाई व्यर्थ ही नष्ट कर देता है। जो धीर, प्रशान्त चित्त, व्यवहारिक आदमी कहे जाते हैं, वे ही कर्म करते हैं। यह जान लेने से कि वस्तुस्थिति ऐसी ही है, हमारी तितिक्षा बढ़ जायेगी और कार्यक्षमता में वृद्धि हो जायेगी। दुःख और अशुभ दृश्य देखकर भी हमारा सन्तुलन डिग नहीं पायेगा। (जैसा नारद को पानी लाने गये और आधा घण्टा में बालबच्चेदार होकर सब नष्ट हो गया जैसा सपना) उदहारण के लिये यदि सभी मनुष्य इस प्रकार अपने आत्मस्वरूप में अचल हो जायें, तो पशु भी क्रमविकास करते हुए मनुष्यत्व में उन्नत होंगे और वनस्पतियों (potato man) की भी यही दशा होगी। पर केवल एक बात निश्चित है - यह प्रबल जगत प्रवाह रूपी नदी प्रबल वेग से समुद्र (पूर्णत्व-प्राप्ति) की ओर बह रही है, और ऐसा समय आयेगा, जब नदी के सभी जलकण उस अनन्त सागर में समा जायेंगे (सभी पूर्ण बन जायेंगे)। अतएव, एक बात तो निश्चित है, कि यह जीवन - अपने समस्त दुःखों और क्लेशों, अपने आनन्द हास्य और क्रन्दन के साथ, सभी वस्तुयें- मैं, तुम, वनस्पति और पशु, जीवन का कण-कण, जिस किसी का अस्तित्व है; सभी उस लक्ष्य की ओर प्रबल वेग से प्रवाहित हो रहे हैं, प्रश्न केवल समय का है -आगे या पीछे, सभी उसी पूर्णता अनन्त सागर में, मुक्ति या ईश्वर को अवश्य प्राप्त हो जायेंगे। 
जीवन से तुम क्या समझते हो ? (Essence of life is going towards 'Perfection') :मैं पुनः दुहराता हूँ कि वेदान्त का दृष्टिकोण न तो आशावादी है और न निराशावादी ही। वह ऐसा नहीं कहता कि संसार केवल शुभ ही शुभ है, या यह भी नहीं कहता कि सब कुछ अशुभ ही अशुभ है। यह कहता है कि हमारे जीवन में अशुभ का मूल्य, शुभ के मूल्य से कम नहीं है; शुभ का मूल्य भी अशुभ के मूल्य से अधिक नहीं है। दोनों एक दूसरे से बन्धे हुए हैं। संसार इसी का नाम है, यह समझकर तुम धैर्यपूर्वक कर्म करो। पर क्यों ? क्यों हम कर्म करें ? यदि घटनाचक्र ही इस प्रकार का हो, तो हम क्या कर सकते हैं ? हम अनीश्वरवादी (agnostics) क्यों न बन जायें? आजकल के अज्ञेयवादी भी तो कहते हैं कि  समस्या का कोई समाधान नहीं है; वेदान्त की भाषा में कहेंगे कि इस मयापाश से छुटकारा नहीं है। अतएव चार्वाकी लोग कहते हैं, सन्तुष्ट रहो और जीवन का भोग करो। ऐसा दृष्टिकोण भी बिल्कुल गलत है, एक भयंकर भूल है, अतार्किक भ्रम है। और वह यह है -जीवन से तुम क्या समझते हो ? क्या तुम इसका अर्थ केवल पंचेन्द्रियों में आबद्ध जीवन को ही मनुष्य-जीवन समझते हो ? यदि यही सोचते हो तो फिर, पशु और मनुष्य में क्या अन्तर रह जाता है? 
किन्तु मुझे विश्वास है कि यहाँ उपस्थित लोगों में एक भी ऐसा नहीं है, जिसका जीवन केवल पंचेन्द्रिय-ग्राह्य विषयों को भोगने तक ही सीमित हो। इसका तात्पर्य यह हुआ कि इस मनुष्य-शरीर में जन्म लेने का गौरव या महत्व पशु (या उद्भिज) - शरीर में जन्म लेने की अपेक्षा और भी कुछ अधिक है। मनुष्यों में दूसरों के सुख-दुःख को अपने ह्रदय में अनुभव करने की क्षमता है, विवेक-विचार करने की क्षमता है, अपनी आकांक्षाओं (aspirations) को प्राप्त करने की क्षमता है। ये सभी विशेषतायें मनुष्य-जीवन के अभिन्न अंग हैं। और उस सर्वोच्च आदर्श, उस अन्तर्निहत-पूर्णता की ओर अग्रसर होने में- हमें अन्तःप्रकृति और बाह्य प्रकृति के विरुद्ध कितना कठोर संघर्ष करना पड़ता है ? 
 उन समस्त आन्तरिक और बाह्य परिवेश के शिकंजे (दबाव-presser) को छिन्न-भिन्न करके, मनुष्य अपने तीनों महत्वपूर्ण उपादानों [components '3H' शरीर, मन और 'H' (Heart)] को इतना पूर्ण विकसित कर सकता है कि उसका यथार्थ दिव्य-स्वरूप (या यथार्थ 'मैं') प्रस्फुटित हो जाय- क्या मनुष्य-जीवन की सर्वाधिक गौरव-पूर्ण उपलब्धि यह नहीं है?
किन्तु अज्ञेयवादी कहते हैं- जीवन जैसा है, बस उसका वैसे ही उपभोग करते रहो। किन्तु जीवन का अर्थ है - मनुष्य जीवन के सर्वोच्च आदर्श, उस पूर्णता की ओर यह अन्वेषण; जीवन का सार ही है क्रमशः पूर्णता की ओर अग्रसर होते रहना। जीवन को परिभाषित करते हुए अन्यत्र स्वामीजी ने कहा है - ' एक अनन्त शक्ति अपने आप को अभिव्यक्त करने की चेष्टा कर रही है, किन्तु बाह्य परिवेश का दबाव और अंतःप्रकृति का शिकंजा उसे निरन्तर दबाये रखना चाहती है; उस दबाव और शिकंजे को छिन्न-भिन्न करके पूर्णत्व को प्रकट करने चेष्टा जो करता रहता है, वही जीवित है, बाकी तो मृत से भी अधम हैं।" हमें उसी पूर्णत्व को प्राप्त करना होगा। अतएव हम जीवन भर अज्ञेयवादी ही नहीं बने रह सकते और संसार जिस रूप में प्रतीत हो रहा है, उसे उसी रूप में ग्रहण करके सन्तुष्ट नहीं रह सकते। अज्ञेयवादी तो जीवन को पूर्णता प्रदान करने वाले तीनों प्रमुख उपादानों को परिष्कृत करने का प्रयत्न छोड़कर, अवशिष्ट पाशविक भोगों को ही सर्वस्व समझते हैं। और अनीश्वरवादियों का दावा है, कि मनुष्य इस सर्वोच्च आदर्श तक नहीं पहुँच सकता, अतः इस अन्वेषण को ही त्याग देना चाहिये। और साधारण मनुष्यों के इसी स्वाभाव, जगत की इसी वस्तुस्थिति को माया कहते हैं।
सभी धर्म मुक्ति की दिशा में अग्रसर होने का कठोर प्रयत्न कर रहे हैं संसार के सभी धर्म, चाहे बिल्कुल अधूरा हो या सर्वाधिक विकसित हों, सभी इस अन्तःप्रकृति  और बाह्य प्रकृति (माया) के बंधन - 'दबाव और शिकंजे' को तोड़ने (शम-दम) की चेष्टा कर रहे हैं। चाहे पौराणिक कथाओं या प्रतिकोपासना के माध्यम से, चाहे दार्शनिक विचारों के द्वारा हो, अथवा अवतार-चरित्र, देव-चरित्र, स्वर्गदूतों या राक्षसों, ऋषियों या पैग़म्बरों की कहानियों के माध्यम से अनुष्ठित हो -सभी धर्मों का उद्देश्य एक ही है -सभी सीमाओं के परे चले जाना। संक्षेप में कहें, तो सभी धर्म मुक्ति की दिशा में अग्रसर होने का कठोर प्रयत्न कर रहे हैं। जाने या अनजाने मनुष्य इतना तो समझ गया है, कि वह बद्ध है, जैसा (मनुष्य) वह बनना चाहता है, वैसा नहीं बन सका है, अन्तर्निरीक्षण करने पर उसे पता चलता है कि कुछ पाशविक भाव उसमें अब भी बचे हुए हैं। जिस क्षण उसने अपने चारों ओर दृष्टि घुमाई, उसी क्षण उसे यह ज्ञात हो गया- उसी क्षण उसे यह पता चल गया कि बद्ध है-अपने मन का स्वामी नहीं बन सका है। साथ ही साथ उसे यह भी अनुभव हुआ मानों उसीके भीतर कुछ है जो इस देह और मन के बंधन के भी परे किसी अज्ञात स्थान में उड़ जाना चाहता है; जिस स्थान में इन्द्रिय-मन भी नहीं जा सकते, किन्तु अब भी वह अपने को इस मन की सीमा या चहारदिवारी में कैद पाता है। 
जो लोक देवता रक्तपात और शराब  के शौक़ीन हैं वहाँ भी आम कारक मुक्ति की भावना है : संसार के सबसे निम्नकोटि  के धर्मों में भी, जिनके यहाँ अपने आत्मीयों के घरों में गुप्त रूप से उन दिवंगत पितरों एवं अन्य वैसे भूत-प्रेतों की पूजा होती है, जो रक्तपात और शराब (मुर्गा-दारू) के शौक़ीन हैं- वहाँ भी आम कारक (सामान्य उपादान या common factor) के रूप में यह मुक्ति की भावना ही होती है। जो व्यक्ति किसी लोक-देवता (मल्लू देव, साईं बाबा, या गुगुटिया माई ) आदि की पूजा करना चाहता है,  वह उन देवताओं को सब बातों में, अपनी अपेक्षा अधिक स्वाधीन देखता है। उसका ऐसा विश्वास होता है कि द्वार बन्द होने पर भी देवता लोग घर की दीवारों को भेदकर प्रकट हो सकते हैं; छत या दीवारें उनके मार्ग में बाधा नहीं डाल सकतीं। मुक्ति का यही भाव क्रमशः बढ़ते बढ़ते अन्त में सगुण ईश्वर (Personal God राम, कृष्ण, बुद्ध , ईसा, मोहम्मद अथवा श्रीरामकृष्ण) के आदर्श में परिणत हो जाता है। इस सगुण ब्रह्म को अपना एकमात्र आदर्श मानने के पीछे केन्द्रीय भाव यह है कि उसका भगवान प्रकृति के बंधन के परे है, माया के परे है ! 
 माया (प्रकृति)  के पार जाने का मार्ग प्रकृति के ऊपर विजय प्राप्त  करने में है।(The way is not with Maya, but against it) : मैं मानो अपने मनश्चक्षु के सामने भारत के उन प्राचीन आचार्यों को अरण्यस्थित आश्रम में इन्हीं सब प्रश्नों पर विचार-विमर्श करते देख रहा हूँ; वयोवृद्ध और अत्यन्त पवित्र महर्षि भी इन प्रश्नों का समाधान करने में असमर्थ हो रहे हैं, पर एक युवक उनके बीच खड़ा होकर घोषणा करता है- 
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥२।५॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ॥३।८॥'
-- श्वेताश्वतरोपनिषद् ॥ २।५, ३।८ ॥
हे अमृत के पुत्रों ! सुनो ! हे दिव्यधामवासी देवगण !! तुम भी सुनो ! मुझे मार्ग मिल गया है। मैंने उस अनादि, पुरातन पुरुष को प्राप्त कर लिया हैं, जो  समस्त अज्ञान-अन्धकार और माया से परे है । उस पुरुष को जान लेने से ही हम मृत्यु के परे जा सकते हैं। दूसरा कोई पथ नहीं ।'
यह माया हमें चारों ओर से घेरे  है और वह अति भयंकर है। फिर भी हमें माया में  से होकर ही कार्य करना पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति कहे कि , " संसार को पूर्ण शुभमय हो जाने दो (या पहले संसार  भोगों से मन  तृप्त हो जाने दो) , तब मैं मनःसंयोग करना शुरू करूँगा, और अपने मन का स्वामी बन कर आनन्द भोगूँगा।" --तो  उस व्यक्ति की योजना  उतनी ही हास्यास्पद है, जैसे गंगा तट पर खड़े होकर कोई सोचे - कि ' जब इस नदी का सारा पानी समुद्र में पहुँच जायगा , तब बिना तैरे - मैं पैदल ही चल कर इसके पार उतर जाऊँगा ! ' दोनों बातें असम्भव हैं । माया (प्रकृति)  के पार जाने का मार्ग, प्रकृति का अनुसरण करने अर्थात उसके अनुसार ढल जाने में नहीं है, वह तो प्रकृति (माया) के विरुद्ध है;  प्रकृति के ऊपर विजय प्राप्त  करने में है। मनुष्य जीवन में जितना शीघ्रातिशीघ्र हो सके - सीख लेने वाली यह दूसरी सच्चाई है। हम इस पृथ्वी पर प्रकृति के  मददगार होकर नहीं जन्में हैं, वरन हम तो प्रकृति के प्रतिद्वन्द्वी होकर जन्में हैं। हम तो बाँधनेवाले होकर भी स्वयं बँधे जा रहे हैं। 
यह मकान कहाँ से आया ? प्रकृति ने तो दिया नहीं । प्रकृति कहती है, ' जंगल में जाकर गुफा में रहो। ' मनुष्य कहता है, ' नहीं, मैं मकान बनाऊँगा और प्रकृति साथ लड़ूँगा। ' और वह ऐसा कर भी रहा है। मानव सभ्यता की प्रगति का इतिहास, तथाकथित प्राकृतिक-नियमों के विरुद्ध लगातार संग्राम का इतिहास है, और अन्त में मनुष्य ही प्रकृति पर विजय प्राप्त करता है। (गुरुत्वाकर्षण जैसे नियम को तोड़कर सशरीर चन्द्रमाँ पर पहुँच सकता है) अन्तर्जगत में जाकर देखो, वहाँ भी यही युद्ध चल रहा है, पशु-मानव और आध्यात्मिक मानव के बीच, प्रकाश (जन्म) और अन्धकार (मृत्यु) के बीच यह संग्राम निरन्तर जारी है, (हालाँकि बूढ़े लोग हमेशा बीते दिनों की बात करते हैं, क्योंकि आगे तो उनको अँधेरा या मौत नजर आती है।) और मानव (' शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ' कहने वाला वह युवक) यहाँ भी विजयी होता है। मुक्ति की अदम्य इच्छा से प्रेरित वह मनुष्य प्रकृति के बन्धनों को छिन्न-भिन्न करके अपने गन्तव्य-मार्ग को प्राप्त कर लेता है।  इस प्रकार हम देखते हैं कि वेदान्ती दार्शनिकों ने इस माया के परे- ऐसे किसी वस्तु को जान लिया है, जो माया से बद्ध नहीं है; और हम भी यदि उस वस्तु तक पहुँच सकें, तो माया हमें भी बाँध नहीं सकेगी। यह विचार किसी न किसी रूप में सभी धर्मों की सामान्य सम्पत्ति है। 
किन्तु वेदान्त  मतानुसार यह धर्म का केवल प्रारम्भ है, अन्त नहीं। जो सगुण ईश्वर इस चराचर जगत के सृष्टिकर्ता और नियन्ता हैं, जिन्हें माया अथवा  प्रकृति का भी शासक और अधिष्ठाता  कहा जाता है, उस सगुण ईश्वर का ज्ञान भी वेदान्त का अन्त नहीं है, केवल आदि है। यह ज्ञान क्रमशः बढ़ता जाता है, और अन्त में वेदान्ती देखता है कि जिसे वह अपने से बाहर खड़ा हुआ समझता था, वह उसके अन्दर ही है, और वह स्वयं वस्तुतः वही है ! जो असीम आत्मा, ससीम मन की सीमा को ही अपनी सीमा मानकर अपने को बद्ध समझ रही थी, वह जान लेती है कि वह तो सदा से मुक्त ही थी - वास्तव में आत्मा तो मुक्तस्वरूप ही है। 
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३. वेदान्त का आदर्श और उसका सन्देश: 'I have given up all hope for my own salvation.' 'मैं अपने स्वयं की मुक्ति के लिए (किसी से सहायता पाने की ?)  सब उम्मीद छोड़ दी है ! ' व्यवहारिक जीवन में वेदान्त -२.
माया के जाल से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग है-'सत्य का अनुभव करना'। मान लो, जब आत्मा ने जगत के प्रत्येक वस्तु का स्वरुप समझ लिया, और उसे यह अनुभव होने लगा कि प्रत्येक वस्तु ही ब्रह्ममय है; तब वह स्वर्ग में जाय अथवा नरक में, या और कहीं चली जाय -इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मैं पृथ्वी पर जन्मूँ अथवा स्वर्ग में जाऊँ इससे कोई अंतर नहीं होता। मेरे लिये ये सब निरर्थक हैं, क्योंकि मेरे लिये सभी स्थान भगवान के मन्दिर हैं, सभी स्थान पवित्र हैं, कारण स्वर्ग,नरक अथवा अन्यत्र मैं केवल भगवत्-सत्ता का ही अनुभव कर रहा हूँ। भला-बुरा अथवा जीवन-मरण मुझे कुछ दिखाई नहीं देते, एकमात्र ब्रह्म का ही अस्तित्व है। वेदान्त-मत में मनुष्य जब ऐसी अनुभूति प्राप्त कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है और वेदान्त कहता है - केवल वही व्यक्ति संसार में रहने के योग्य है, दूसरा नहीं। मनुष्य-देह में स्थित मानव-आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है। पशु भी भगवान के मन्दिर हैं, किन्तु मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ मन्दिर है - ताजमहल जैसा! 
मनुष्य के यथार्थ स्वरूप में कोई विधि नहीं, कोई दैव नहीं, कोई अदृष्ट नहीं। अनन्त में विधान या नियम कैसे रह सकते हैं ? पहले मुक्त बनो, तब फिर जितने व्यक्तित्व रखना चाहो, रखो। तब हम लोग रंगमंच पर अभिनेताओं के सामान अभिनय करेंगे, जैसे अभिनेता भिखारी का अभिनय करता है। उसकी तुलना गलियों में भटकने वाले वास्तविक भिखारी से करो। एक व्यक्ति भिक्षुक का अभिनय कर आनन्द ले रहा है, और दूसरा सचमुच दुःख-कष्ट से पीड़ित है। ऐसा भेद क्यों होता है ? कारण, एक मुक्त (बुद्ध) है, और दूसरा बद्ध  ! हम जब तक अपने स्वरुप का ज्ञान नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक हम लोग केवल भिक्षुक हैं। हम सम्पूर्ण जगत में सहायता के लिये चित्कार करते फिरते हैं -अन्त में काल्पनिक सत्ताओं से भी हम सहायता मांगते हैं, पर सहायता कभी नहीं मिलती; तो भी हम सोचते हैं कि इस बार सहायता मिलेगी।
स्वाधीन होओ; किसी दूसरे से कुछ आशा न करो: इस प्रकार हम सर्वदा आशा लगाये बैठे रहते हैं।बस, इसी बीच एक  जीवन-रोते, कलपते, आशा की लौ लगाये बीत जाता है, और फिर वही खेल दुबारा शुरू हो जाता है। स्वाधीन होओ; किसी दूसरे से कुछ आशा न करो। वेदान्त कहता है, इस आशा का परित्याग करो। क्यों आशा करते हो ? तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हीं सब कुछ हो। तुम पूर्णकाम आत्मा हो, तुम सम्राटस्वरुप हो, तुम भला किसकी आशा करते हो ? यह सब पागलों जैसी चेष्टा छोड़कर जगतरूपी मंच पर एक अभिनेता के समान कार्य करते चलो। इस प्रकार की अवस्था आने पर हम लोगों की सम्पूर्ण दृष्टि परिवर्तित हो जाती है। अनन्त कारागार स्वरुप न होकर यह जगत खेलने का स्थान बन जाता है। मुक्त होने पर परिवार या समाज त्याग कर जंगल अथवा गुफाओं में जाकर मर जाने की आवश्यकता नहीं। तुम जहाँ हो वहीं रहोगे, किन्तु भेद इतना ही होगा कि तुम सम्पूर्ण जगत का रहस्य समझ जाओगे। पहले की देखि हुई समस्त वस्तुएं जैसी की तैसी ही रहेंगी, किन्तु उनका एक नवीन अर्थ समझने लगोगे। 
एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है --' मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरुप में जानना।' और उसका सन्देश है कि यदि तुम अपने भाई मनुष्य की उपासना व्यक्त ईश्वर के रूप में नहीं कर सकते, तो उस ईश्वर की कल्पना भी कैसे कर सकोगे- जो अव्यक्त है ?  ८/३४  
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४. भक्ति थोड़ा इंतजार कर सकती है ! Devotion may wait a little.
५. There is no time to care for name, or fame, or Mukti, or Bhakti. we shall look to these some other time. आलमबाजार मठ के गुरुभाइयों को लिखित पत्र १८९४ ग्रीष्म ऋतू Make converts right and left, and put them into our purity-drilling machine.-' पवित्रता ड्रिलिंग मशीन (मनःसंयोग पद्धति)'  में डाल कर उन्हें धर्मान्तरित कर दो आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! नाम के लिये समय नहीं है, न यश लिये, न मुक्ति के लिये, न भक्ति के लिये समय है; इनके बारे में फिर कभी देखा जायेगा। " आवश्यकता ऐसे नेता की है-जिसमें युवाओं को संगठित करने की शक्ति हो, मेरी बात समझे ? हमें कुछ छात्र भी चाहिये -वीर युवक, समझे ? दिमाग के तेज और हिम्मत के पूरे- बुद्धिमान और बहादुर इतने जो नचिकेता  समान यम का सामना करनेवाले, तैरकर समुद्र पार करने को तैयार -समझे ?
हमें ऐसे सैकड़ों चाहिये -स्त्री और पुरुष, दोनों। जी-जान से इसीके लिये प्रयत्न करो। छात्रों को के मन को परिवर्तित करने के लिये, उन्हें हमारी पवित्रता ड्रिलिंग मशीन (मनःसंयोग पद्धति) में डाल दो। श्रीरामकृष्ण के चरित्र, उनकी शिक्षा एवं उनके सर्वधर्म समन्वय को इस समय चारों ओर फैलाते जाओ-
यही साधन है, यही भजन है, यही साधना है, यही सिद्धि है। उठो, उठो, बड़े जोरों की तरंग आ रही है, आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, स्त्री, पुरुष, चाण्डाल सब उनके निकट पवित्र हैं । आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! नाम के लिये समय नहीं है, न यश लिये, न मुक्ति के लिये, न भक्ति के लिये समय है; इनके बारे में फिर कभी देखा जायेगा। अभी इस जन्म में उनके (ठाकुर-माँ-स्वामीजी के) महान चरित्र  का,महान जीवन का, महान आत्मा का प्रचार बहुत व्यापक स्तर पर करना होगा। काम केवल इतना ही है, जहाँ-जहाँ उनका नाम जायगा, कीट-पतंग तक देवता हो जायेंगे, हो भी रहे हैं; तुम्हारी आँखें हैं- क्या इसे नहीं देखते ? होशियार -वे आ रहे हैं। जो जो उनकी सेवा के लिये --नहीं, उनकी सेवा नहीं, वरन उनके पुत्र -दिन-दरिद्रों, पापियों-तापियों, कीट-पतंगों तक की सेवा के लिये तैयार रहेंगे, उन्हीं के भीतर उनका आविर्भाव होगा। उनके मुख पर सरस्वती बैठेंगी, उनके ह्रदय में महामाया महाशक्ति आकर विराजित होंगी। 
We must electrify society, electrify the world.your work is the distribution and propagation of thought-currents. हमें आत्मसाक्षात्कार या सत्य का अनुभव करने के लिये, समाज और संसार को उत्तेजना से भर देना होगा। तुम लोगों का काम है, विचार-तरंगों का प्रसार करना। Start centres at places, go on always making converts. He who will bow before him will be converted into purest gold that very moment. 
६. वेदों में कहा गया है - मेरी कामना है कि सभी लोग मुक्त हो जायें ! What I desire is salvation of all as contemplated in the Vedas. 
 अर्चामि वां वर्धायापो घर्तस्नू दयावाभूमी शर्णुतंरोदसी मे |
अहा यद दयावो.असुनीतिमयन मध्वा नो अत्रपितरा शिशीताम ||
ऋग १०.१२.४
७. इस पृथ्वी पर कोई मुक्ति ऐसी नहीं जो मुझे अपने लिये चाहिये ! There is no Mukti on earth to call my own.  गुरुभाइयों को लिखित पत्र १८९४ (३/३००)   
गाँव गाँव तथा घर घर में जाकर लोगों को मोहनिद्रा से जाग्रत करने के कार्य -' पूर्ण बनो और बनाओ' के कार्य में आत्मनियोग करो। यदि तुम्हारे नरक में जाने से भी दूसरों की मुक्ति होती हो, तो दूसरों के लिये मुक्ति खरीदने हेतु नरक जाने को तत्पर रहना चाहिये।  इस पृथ्वी पर कोई मुक्ति ऐसी नहीं जो मुझे अपने लिये चाहिये ! मुझे अपनी मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं है। जब तुम अपनी मुक्ति की चिन्ता करने लगोगे, तो  मानसिक अशान्ति आकर उपस्थित हो जायेगी।मेरे बच्चे, तुम्हें शान्ति की क्या आवश्यकता है ? जब तुम सब कुछ छोड़ चुके हो ? आओ ! अब तुम अपने मन से- ' शान्ति और मुक्ति की इच्छा' को भी निर्वासित कर दो। अपने लिये कुछ भी न चाहो; स्वर्ग-नरक, भक्ति अथवा मुक्ति -किसी चीज की परवाह न करो। 
और जाओ, मेरे बच्चे घर घर जा कर श्रीरामकृष्ण के नाम का प्रचार करो। दूसरों की भलाई करने से ही अपनी भलाई होती है, एवं जो व्यक्ति मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बन कर 'भक्ति और मुक्ति' का मार्ग दूसरों को दिखलाने के लिये दिन-रात परिश्रम करता है; उसे ये दोनों चीजें (भक्ति और मुक्ति) स्वतः उपलब्ध हो जाती हैं। " Take that up, forget-your own self for it, be mad over the idea." मानवजाति का शिक्षक बनने की चुनौती, उन्हें 'भक्ति और मुक्ति का मार्ग' दिखाने की चुनौती (ठाकु-नाम; मनुष्य बनो और बनाओ) को स्वीकार कर लो; अपने स्वयं को भूल जाओ, इस अद्भुत सिद्धान्त को समझकर उन्मत्त हो जाओ। जिस प्रकार श्रीरामकृष्ण तुमसे प्रेम किया करते थे, मैं तुमसे करता हूँ- तुम भी सम्पूर्ण विश्व के साथ वैसा ही प्रेम करने में समर्थ हो जाओ ! निम्न लिखित बातों को ध्यान में रखो -
१. हमलोगों ने मानवजाति के मार्गदर्शक नेता बनने की चुनौती को स्वीकार कर लिया है; अतः भक्ति, मुक्ति तथा भोग-विलास में आसक्ति हमारे लिये त्याज्य हैं । 
२. भारत का कल्याण करना, निम्नतम श्रेणी के मनुष्यों को भी 'भक्ति और मुक्ति ' का मार्ग दिखलाना हमारा जीवन व्रत है, चाहे उससे मुक्ति मिले या नरक, स्वीकार करो। 
३. जगत के कल्याण (मानवमात्र को भक्ति और मुक्ति का मार्ग दिखलाने) के लिये ही श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का आविर्भाव हुआ था। अपनी अपनी भावना के अनुसार उन्हें तुम -मनुष्य, ईश्वर, अवतार -जो कुछ कहना चाहो, कह सकते हो। 
४. जो कोई उन्हें प्रणाम करेगा, वह तत्काल कनवर्टेड (धर्मान्तरित) होकर शुद्ध स्वर्ण जैसा पवित्र बन जायेगा। इस (भक्ति और मुक्ति के) सन्देश को लेकर तुम घर घर जाओ तो सही-देखोगे कि तुम्हारी सारी अशान्ति दूर हो गयी है। डरने की जरूरत नहीं-डरने का कारण ही कहाँ है ? तुम्हारी किसी व्यक्ति से अपने लिये कुछ भी पाने की अपेक्षा-आकांक्षा तो है नहीं - अब तक तुमने, अपने चरित्र के अनुसार, श्रीरामकृष्ण के नाम का जैसा प्रचार किया है; वह ठीक है। अब संगठित होकर प्रचार करो, प्रभु तुम्हारे साथ हैं, डरने की कोई बात नहीं।    
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८. स्वामी जी : मैं अकेला क्या करूँगा बोल ? नचिकेता की तरह दस-बारह लड़के पाने पर मैं इस देश की चिन्तन-धारा और उद्द्यम (thoughts and pursuits) को नये मार्ग " Be and Make " से परिचालित कर सकता हूँ। 
- 'I want a band of young Bengal वास्तव में मैं 'रॉयल बंगाल टाईगर' के जैसे युवा बंगाली सिंह-शावकों का एक 'बलिदानी जत्था' देखने की दिली-तमन्ना रखता हूँ ! चरित्रवान, बुद्धिमान, दूसरों के लिये सर्वस्व त्यागी तथा आज्ञाकारी युवाओं पर ही मेरा भविष्य का कार्य निर्भर है। उन्हीं पर मुझे भरोसा है, जो मेरे भावों को आत्मसात कर अपना और देश का कल्याण करने में अपने जीवन को न्योछावर कर सकें। नहीं तो झुण्ड के झुण्ड कितने ही लड़के आ रहे हैं, किन्तु उनके चेहरे पर निरुत्साहता लिखी हुई है। उनके ह्रदय में उत्साह की अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं है, उनका शरीर दुर्बल और कार्य के लिये अनुपयुक्त है, और मन साहस से रहित है। क्या होगा रे इन जड़-पिण्डों से ? नचिकेता की तरह दस-बारह लड़के पाने पर मैं इस देश की चिन्तन-धारा और उद्द्यम (thoughts and pursuits) को नये मार्ग " Be and Make " से परिचालित कर सकता हूँ। 
शिष्य - महाराज, इतने युवक तो आपके पास आ रहे हैं; उनमें से आप क्या इस प्रकार का कोई युवा नहीं देखते जो 'रॉयल बंगाल टाईगर' के दल का नेतृत्व करने की क्षमता रखता हो ?  
स्वामी जी - जिन्हें अच्छा आधार समझता हूँ, उनमें से कुछ ने खुद को विवाह के बंधन में ही जकड़ा लाचार पति मान रखा है; या कुछ ने संसार में - नाम, यश, ऑफ़िसर बनकर धन अर्जित करने के चक्कर में खुद को ही बेच दिया है, जबकि कुछ बंगालियों का तो शरीर ही इतना दुर्बल है कि देखने पर कहीं से भी बाघ जैसा नहीं दीखता-'बाघ-बकरी' छाप दीखता है। इसके अतिरिक्त जो शेष रह जाते हैं, उनमें से अधिकांश तो इतने मन्द-बुद्धि या विकृत बुद्धि हैं, कि वे किसी भी उच्च भाव को ग्रहण ही नहीं कर सकते। तुम लोग मेरे भाव को ग्रहण करने योग्य हो अवश्य, किन्तु जीवन के हर क्षेत्र में उसका व्यवहारिक अनुप्रयोग करने की क्षमता तुम में भी नहीं है। इसी कारण कभी कभी मन में एक पीड़ा होती है कि दैव-बिडंबना से शरीर धारण कर के भी मैं कुछ काम न कर सका।
निःसन्देह, अभी भी मैं मैंने ऐसे युवकों को पाने की आशा को बिल्कुल त्याग नहीं दिया है, क्योंकि युगावतार श्रीरामकृष्ण परमहंस की इच्छा होने पर इन्हीं सब लड़कों में से ही कुछ ऐसे कर्मयोगी और आध्यात्मिक योद्धा निकल सकते हैं, जो भविष्य में परमहंस जी द्वारा आविष्कृत ' मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षापद्धति' को सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रचलित कर देने की मेरी योजनासूत्र- ' Be and Make' को कार्यरूप देने में 'सक्षम नेता' बन सकते हैं।    
शिष्य --  मेरा तो यह दृढ विश्वास है कि एक न एक दिन आपकी इस उदार 'जाति-पंथ निरपेक्ष' ' मनुष्य बनो और बनाओ' योजनासूत्र को भारत के समस्त युवाओं के लिये अनिवार्य बनाना ही होगा। क्योंकि मैं यह साफ देख रहा हूँ कि भारत में सभी ओर ' महामण्डल युवा प्रशिक्षण शिविर' की प्रसिद्धि फैलती जा रही है। आज सभी क्षेत्रों में देशवासियों कोई (आर.एस.एस) प्रकट में आपका नाम लेकर और कोई आपका नाम छिपाकर अपने (गाँधी-नेहरू) नाम से आप के ही उस भाव और मत का प्रचार सर्वसाधारण में कर रहे हैं!
स्वामी जी - मेरा नाम न भी लें, मेरा भाव लेना ही पर्याप्त होगा। निन्यानबे प्रतिशत साधु काम-कांचन (Lust and Wealth) का त्याग करने के बाद भी, नाम और यश (Name and Fame) के मोह में आबद्ध हो जाते हैं। तुमने तो पढ़ा होगा ? - " नाम (Fame-मान,ख्याति) की आकांक्षा ही उच्च अन्तःकरण की अन्तिम दुर्बलता (infirmity-रुग्णता) है।" महामण्डल के नेताओं को नाम-यश पाने की कामना और दूसरों को अपने से नीचा दिखाने की प्रवृत्ति (ईर्ष्या) को बिल्कुल विष्ठा की तरह त्याज्य मान कर महामण्डल के 'मनुष्य बनो और बनाओ'-आन्दोलन से जुड़े रहना होगा। जो बिल्कुल हमारे निकट रहते हैं (नीतिनिपुणाः KJN जैसे भी), वैसे लोग भी हमें भला और बुरा दोनों समझ सकते हैं। किन्तु अपने उच्च 'आदर्श और उद्देश्य' को सामने रखकर हमें सिंह की तरह काम करना होगा। 
निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मिः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम |
अद्यैव वा मरणंस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ||
' नीतिनिपुण मनुष्य चाहे निन्दा करें चाहे स्तुति, लक्ष्मी आये या चली जाय, मृत्यु आज ही हो चाहे शताब्दी के पश्चात्, जो धीर हैं वे न्यायमार्ग से एक पग भी नहीं हिलते !'
शिष्य - इस समय मुझको किसे अपना सर्वोच्च आदर्श मानकर ग्रहण करना चाहिये? (स्वामीजी का शिष्य भी निकट रहने के कारण स्वामी जी को अपना सर्वोच्च आदर्श नहीं मान सका था ? हायरे अभागा! माया सचमुच दुस्तर है !) 
स्वामी जी - इस समय तुम्हें ' महावीर ' (अर्थात ग्रेट हीरो- श्रीहनुमान जी!) के चरित्र को ही तुम्हें अपना आदर्श मानना पड़ेगा। देखो न, वे राम की आज्ञा से समुद्र लाँघकर राक्षसों की नगरी लंका पहुँच गये। जीवन-मृत्यु की परवाह कहाँ ? वे महा-जितेन्द्रिय थे और अद्भुत दूरदर्शी (sagacious) थे, तुम्हें स्वयं को उस महान आदर्श (श्रीरामचन्द्र के दास) का दास (पर्सनल सर्वेन्ट- निजी नौकर) समझते हुए, उनके ही आदेश के अनुसार ही अपना जीवन गठित करना होगा। वैसा करने पर, उनमें जितने गुण हैं, वे स्वतः तुम्हारे जीवन में भी आने लगेंगे। बिना बहस किये गुरु की आज्ञाकारिता और ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन- यही है सफलता का रहस्य ! 
वीर हनुमान एक ओर जहाँ शरीर से सेवा के आदर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीँ दूसरी ओर उनके मन में सिंह के जैसा साहस है, जो सम्पूर्ण जगत को उनकी ओर श्रद्धा के साथ सिर झुकाकर देखने को बाध्य करता है। राम के हित के लिये, अपने जीवन तक को न्योछावर करने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं हुआ। राम की सेवा के अतिरिक्त, उन्हें अपने लिये अन्य किसी पुरस्कार की कामना नहीं थी, यहाँ तक कि ब्रह्मत्व और शिवत्व- जैसे विश्व के महान देवतापद, की प्राप्ति के प्रति भी, उनमें घोर उदासीनता का भाव था। केवल रघुनाथ के उपदेश का पालन ही उनके जीवन का एकमात्र व्रत था- हमें भी अपने आदर्श के प्रति उसी प्रकार एकनिष्ठ होना चाहिये। 
खोल, मृदंग, करताल, बजाकर कीर्तन के उन्माद में नाच नाच कर पूरे देश की मानसिकता विकृत  हो चुकी है। एक तो यह जाति बदहजमी के रोगियों का दल है, उपर से इतनी उछल-कूद ? भला कैसे सहन होगी ? उच्चतम साधना, रास-लीला की नकल करने की कोशिश में, जिसकी प्रारंभिक योग्यता पूर्ण पवित्रता और कामगंधहीन प्रेम है, भागवत-कथा सुनाते समय उसी के भोंडे अनुकरण ने देश को तमस से भर दिया है। भारत के अधिकांश भागवत-वाचक के पण्डालों में देखोगे कि लड़के-लड़कियाँ फ़िल्मी गानों के धुन पर खोल-करताल बजाकर नाचते रहते हैं। दुन्दुभि-नगाड़े क्या देश में तैयार नहीं होते ? तुरही-भेरी क्या भारत में नहीं मिलती ? वही सब गुरु गम्भीर ध्वनि लड़कों को सुना। बचपन से जानने बाजे सुन सुनकर, फ़िल्मी भजन सुन सुनकर, देश स्त्रियों का देश बन गया है। इससे अधिक अधःपतन और क्या होगा ! कवि की कल्पना भी इस चित्र को चित्रित करने में हार मान गयी है। डमरू-श्रृंग (शिव के हाथ में रहने वाला डमरू और नरसिंघा) बजाना होगा, नगाड़े में में ब्रह्मरूद्र ताल का दुन्दुभि नाद उठाना होगा, जय हनुमान ! जय महावीर! की ध्वनि तथा ' हर हर बम बम' शब्द से दिग्दिगन्त कम्पित कर देना होगा। 
जिन सब गीत-वाद्यों से मनुष्य के मन में कोमल भावनायें उद्दीप्त हो जाते हैं, उन्हें थोड़े वर्षों तक बन्द रखना होगा। ख्याल ( खयाल की विषयवस्तु राजस्तुति, नायिका वर्णन, श्रृंगार रस आदि होते हैं।), टप्पा ( टप्पा गायन शैली चंचलता व लच्छेदार तान से युक्त होती है।) बन्द करके ध्रुपद गायन सुनने का अभ्यास लोगों को कराना होगा। (ध्रुपद का शब्दश: अर्थ होता हैं;  ध्रुव+पद अर्थात -जिसके नियम निश्चित हो,अटल हो ,जो नियमो में बंधा हुआ हो।) गरिमापूर्ण वैदिक छन्दों के मेघ-गर्जन से देश में प्राण-संचार कर देना होगा। सभी विषयों में वीरत्वपूर्ण कठोर मर्दानगी को पुनर्जीवित करना होगा। इस तरह के वीरोचित आदर्श का अनुसरण करने से ही, देश का और हमारा कल्याण होगा। यदि तू अकेला ही इस ' महावीर ' के आदर्श  अनुसार अपने जीवन को गठित कर सका तो तुझे देखकर हजारों लोग वैसा करना सीख जायेंगे। परन्तु खूब सावधान रहना होगा, किसी भी परिस्थिति में आदर्श से एक इन्च भी विपरीत चलने से बचना होगा। कभी साहस न छोड़ना ! खाते, सोते, पहनते, गाते, बजाते, भोग में, रोग में सदैव सर्वोच्च नैतिकता और साहस का आदर्श प्रस्तुत करना होगा, तभी तो माँ जगदम्बा आद्द्या-
शक्ति की कृपा होगी?  
शिष्य - महाराज, कभी कभी मैं न जाने कैसे अपने पूर्व-संस्कारों के समक्ष पराजित हो जाता हूँ ।
स्वामी जी - उस समय ऐसा सोचाकर - मैं तो श्रीरामकृष्ण की सन्तान हूँ ! उनके साथ जुड़ जाने  के बाद भी मेरी ऐसी दुर्बलता और साहसहीनता ? जब मन और ह्रदय में ऐसी दुर्बलता का भाव उठे, अपने स्वरूप  में डट कर स्थित हो जाओ, और कहो - " मैं तो वीरत्व (हीरोइज्म) से आवेशित हूँ - मैं स्थितप्रज्ञ(steady intellect ) हूँ, मैं ब्रह्मविद् हूँ और ब्रह्मविद् मनुष्य तो ब्रह्म ही है !"  
अपने इस सौभाग्य और महिमा के प्रति पूर्णतः चैतन्य होकर स्मरण  करो- " मैं श्रीमद् स्वामी ....नन्द जी महाराज का आश्रित हूँ, इस प्रकार मैं भी साक्षात् विवेक-सूर्य श्रीरामकृष्ण परमहंस का शिष्य  हूँ; जिन्होंने 'काम-कांचन और मिट्टी' का विवेक करके (टाका माटी, माटी टाका ) दोनों पर विजय प्राप्त कर लिया था, इस भाव को इतना आत्मसात कर लिया था कि वे धातु के सिक्के का स्पर्श तक नहीं कर सकते थे! " इस प्रकार का भाव जिसके मन में सदैव जाग्रत रहेगा, उसकी आत्मश्रद्धा कभी नष्ट नहीं होगी। जिस व्यक्ति में अपने सौभाग्य और महिमा का ऐसा अभिमान सदैव जाग्रत नहीं रहता- उसके भीतर ब्रह्मत्व की ज्योति प्रकट नहीं होती। रामप्रसाद का गाना नहीं सुना ? वे कहा करते थे - " मैं तो उस माँ भवतारिणी का बेटा हूँ, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को संचालित करती हैं,  वह मैं- ' विजय ' (तारा का बेटा,सारदा-तनय ), भला इस संसार में किससे डर सकता हूँ? ' आसुक ना जम आमरा की कम ? आमरा मायेर छेले -आमरा मायेर छेले' । इस प्रकार का गर्व- मन में सदैव जाग्रत रखना चाहिये, तब फिर ' हृदय और मस्तिष्क (Heart and Head) ' की भावुकता और साहसहीनता - तुम्हारे सामने फटकने का साहस भी नहीं कर पायेगी ! कभी भी हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को अपने मन पर अधिकार करने की अनुमति न देना ! महावीर (स्वामीजी) का स्मरण किया कर, माँ दुर्गा (माँ सारदा)  का स्मरण किया कर; देखेगा, सब दुर्बलता, सारी कापुरुषता उसी क्षण समाप्त गयी है। 
ऐसा कहते कहते स्वामी जी मठ के विस्तीर्ण आँगन में आम  वृक्ष के नीचे खाट पर आकर बैठ गये। उनकी आँखों से उस समय भी महावीर हनुमान जैसा भाव प्रकट हो रहा था। वहीं बैठे बैठे उन्होंने शिष्य से वहाँ उपस्थित संन्यासियों तथा ब्रह्मचारियों की ओर संकेत करते हुए कहा - 
" यह देख प्रत्यक्ष ब्रह्म ! इनकी उपेक्षा करके जो लोग संसारी विषयों की चर्चा करते हैं, उन्हें धिक्कार ! हाथ पर रखे आँवले की तरह यह देख ब्रह्म ! देख नहीं रहा है ? --यही, यही ! स्वामीजी ने इन बातों को इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उच्चारित किया कि वहाँ उपस्थित सभी लोग, '  चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे '-- तस्वीर की तरह स्थिर खड़े रह गये ! 
 
https://mallar.files.wordpress.com/2009/10/kalidas.jpg?w=450
 ( जी.एल.रायकवार एवं शंभुनाथ यादव के सौजन्य से)
[ रघुवंश महाकाव्य पर आधारित ‘सिंहाक्रमणम्’ का दृश्यांकन भारतीय कला में अत्यन्त दुर्लभ है तथा अन्यंत्र प्रकाशित होने की जानकारी नहीं है। अंकित दृश्य के आधार पर धनुर्धर (राजा दिलीप), गौ (नंदिनी) एवं सिंह की संयुक्त प्रदर्शन और भूमिका युक्त शिल्पकृति कालंजर दुर्ग से प्राप्त हुई है । प्राचीन काल में कालंजर उत्तर भारत का महत्वपूर्ण दुर्ग रहा है। कालंजर शैव तीर्थ के रूप में भी विख्यात है।  उपरोक्त चित्र में प्रसंग के अनुकूल निम्न विशेषताएं दृष्टव्य हैं  -
1. राजा दिलीप की आकृति वनवासी सदृश्य है। उनके अंगों में राजोचित अलंकरण नहीं है। अतः आश्रमवासी अभिप्रेत हैं।
2. नन्दिनी गौ के ऊपर प्रहाररत सिंह तथा भूमिष्ठ राजा दिलीप एक दूसरे के सम्मुख संभाषणरत रूपायित हैं। राजा दिलीप घुटने मोड़कर धनुष-बाण पकड़े बैठे हैं, जो उनके असहाय और अपमानित स्थिति का परिचायक है। अंततः वे सिंह का शरण ग्रहण करने के लिए विनयावनत है।
3. नंदिनी गौ का सिर अवनत है तथा नेत्र भयातुर हैं। 
4. सिंह के वक्ष पर निष्प्रभावी बाण धंसा हुआ है जो लोक मान्यता आधारित है तथा सिंह के वध के लिये राजा दिलीप की चेष्टा का परिचायक है।
उपरोक्त विशेषताओं के परिदृश्य में विवेच्य कलाकृति अद्वितीय है महाकवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य के द्वितीय सर्ग पर आधारित यह कलाकृति भारतीय कला में अद्यतन ज्ञात प्रथम कृति है। 
इस प्रसंग के मुख्य तीन पात्र-राजा दिलीप, नंदिनी एवं मायावी सिंह की भाव-भंगिमा और चेष्टाओं के माध्यम से शिल्पी ने अल्पतम अभिप्रायों से संपूर्ण कथा को साकार कर दिया है। रघुवंश, सर्ग २/३०-३१ के निम्न श्लोकों में राजा दिलीप की मनः स्थिति का चित्रण है-
 ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः।
जाताभिषंगो नृपतिर्निषंगादुद्धर्तुमैच्छत् प्रसमोद्घृतारिः।।

 उद्यत सिंह नंदिनी जी के ऊपर झपटा, नंदिनी जी चिल्लाईं। यह देखकर मृगेन्द्र, अर्थात सिंह के समान निर्भीक चाल से चलने वालेशरणागतरक्षक अर्थात शरण में आये हुए की रक्षा करने में निपुण, शत्रुओं को बलपूर्वक दंड देने वाले  राजा दिलीप ने (असहाय स्थिति में अपमान का अनुभव करके) उस शेर का वध करने के लिए, तुरंत अपने तरकस से बाण निकालने के लिए आपना दाहिना हाथ पीछे किया
वामेतरस्तस्य करः प्रहत्र्तुर्नख प्रमाभूषित कंकपत्रे।
शक्ताङ्गुलिः सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे।।
अर्थ- प्रहार करने के लिए उद्यत, नखों की कांति से प्रकाशित राजा दिलीप के दायें हाथ की अंगुलियां कंकपत्रो से सुशोभित तूणीर में स्थित बाणों के मूलप्रदेश में रखे हुये (बाण निकालने के उद्योग में) चित्रवत (जड़) स्थिर हो गया,  उनका हाथ तरकस से चिपक गया, झटका पटका, पर निकला ही नहीं।
महाकवि कालिदास कृत रघुवंश ग्रंथ का बीजांकुर राजा दिलीप की निःसंतान होने की व्यथा से प्रारंभ होता है। महाकाव्य के द्वितीय सर्ग में राजा दिलीप के द्वारा नन्दिनी गौ की सेवा, नन्दिनी गौ के द्वारा राजा दिलीप की परीक्षा और पुत्रोत्पत्ति के वर प्राप्ति का वर्णन है।  कथा के अनुसार भू-मंडल का स्वामी होते हुये भी राजा दिलीप पुत्र विहीन होने के कारण संतप्त होकर राजकाज मंत्रियों को सौंपकर तपोवन में वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचकर उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि वशिष्ठ ने तपोबल से इसका कारण जानकर राजा दिलीप को बताया कि कामधेनु की पुत्री नंदिनी गौ की आराधना करने से यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है। अपने गुरू की आज्ञा स्वीकार कर राजा दिलीप अपनी धर्मपत्नी सुदक्षिणा के साथ नंदिनी गौ की सेवा-आराधना में तत्पर हो गये। 
इस प्रकार इक्कीस दिन व्यतीत होने के पश्चात् एक दिन नंदिनी राजा दिलीप की परीक्षा लेने हेतु घने वन में चली गयी और वहां माया निर्मित सिंह से आक्रांत होकर प्राण रक्षा के लिए चिल्लाने लगी। वन की शोभा देखने में भाव विभोर राजा दिलीप नंदिनी की आवाज सुनकर सिंह को मारने के लिये अपने तूणीर से बाण निकालने लगे परन्तु उनके हाथ बाण के पंखों से चिपक गये। असहाय राजा को मनुष्य वाणी से विस्मित करते हुये सिंह ने बताया कि वह इस वन की रक्षा में नियुक्त शिव का अनुचर है तथा इस वन में बलात् प्रवेश करने वाले प्राणी उसके आहार हैं। उसके द्वारा सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने के कारण गौ उसका भक्ष्य हैं और शिव की कृपा से वह अजेय है। उसका वध करने में कोई समर्थ नहीं है। फलस्वरूप शर संधान के लिये तत्पर हाथ स्वतः बाणों से चिपक गयें हैं। 
सिंह के वचन सुनकर राजा दिलीप ने नंदिनी की रक्षा करने के दृढ़ संकल्प को दुहराते हुये उसे (नंदिनी गौ) मुक्त करने की प्रार्थना करते हुये स्वयं को उसके (सिंह के) आहार के लिए समर्पित कर दिया। कुछ अंतराल से नंदिनी ने माया का निवारण कर दिया और राजा को इच्छित वर प्रदान किया। इस कथा में गौ सेवा, गुरू भक्ति और नैतिक मूल्यों का अत्यन्त सरस श्लोकों में वर्णन है।] 
स्वामी जी भी एकाएक गंभीर ध्यान में निमग्न हो गये। अन्य सब लोग भी बिल्कुल स्तब्ध हैं; किसी के मुँह से कोई बात नहीं निकलती। स्वामी प्रेमानन्द उस समय गंगाजी से कमण्डल में जल भर कर मन्दिर में  आ रहे थे। उन्हें देखकर भी स्वामी जी -' यही है प्रत्यक्ष ब्रह्म -यही है प्रत्यक्ष ब्रह्म ' कहने लगे। इतना सुनते ही  हाथ  का कमण्डलु हाथ में ही रह गया,  एक गहरे नशे में डूब कर  वे भी उसी क्षण समाधिस्थ  हो गये।  इस प्रकार करीब १५-२० मिनट व्यतीत हो गये। तब स्वामीजी ने प्रेमानन्द जी को बुलाकर कहा - ' जा, अब श्रीरामकृष्ण की पूजा में जा। " स्वामी प्रेमानन्द को तब चेतना हुई। धीरे धीरे सभी को समाधी से व्युत्थान हुआ, धीरे धीरे सभी का मन फिर ' मैं -मेरे ' के राज्य में उतर आया और सभी अपने अपने कार्य में लग गए। स्वामीजी की  उस दिन की वह अपूर्व क्षमता देखकर सभी लोग विस्मित हो गए थे।  क्षण भर में ( नवनी दा की तरह आँखों में ऑंखें डालकर- त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि !) उन्होंने  सभी के मन को समाधी के अतल समुद्र  में डुबो दिया था। थोड़ी देर बाद स्वामीजी शिष्य के साथ टहलने चले। चलते चलते शिष्य से बोले-' देखा, आज कैसा हुआ ? सभी को समाधी लग गयी ? वे सब श्रीरामकृष्ण की सन्तान हैं न, इसीलिये ' तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो !' सुनते ही उन्हें अनुभूति हो गयी। 
शिष्य - महाराज, मेरे जैसे व्यक्ति का मन भी  समय वृित्ति-शून्य हो गया था, तो सन्यासियों का क्या कहना? आनन्द से मानो मेरा ह्रदय फटा जा रहा था । परन्तु अब उस भाव का  कुछ भी स्मरण नहीं --मानो वह सब स्वप्न ही था। 
स्वामी जी - समय आने पर अभी जो 'जगत सत्य' लग रहा है, और समाधी का अनुभव भ्रम प्रतीत हो रहा है- वह समाप्त हो जायेगा। हर क्षण ' ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ' की अनुभूति बनी रहेगी। इस  समय जी-जान से Be and Make के काम में लग जा । इन महा-मोहग्रस्त जीवों के कल्याण के लिये किसी न किसी काम में लग जा। फिर तू देखेगा, वह सब अपने आप हो जायेगा । 
शिष्य - लोक शिक्षक या नेता बनने में भय लगता है। उतना सामर्थ्य भी मुझमें नहीं है, शास्त्र में भी कहा गया है -' गहना कर्मणो गतिः । '
स्वामी जी - तो, तुझे क्या अच्छा लगता है ? 
शिष्य - आप जैसे सर्व-शास्त्र ज्ञाता  के साथ रहते हुए वेदान्त के महावाक्यों का श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा इसी शरीर में ब्रह्म-तत्व  को प्रत्यक्ष करना। इसके अतिरिक्त अन्य किसी बात में मेरा मन नहीं लगता। इसके अतिरिक्त किसी भी बात में मेरा मन नहीं लगता । ऐसा लगता है, मानो दूसरा कुछ करने का सामर्थ्य ही मुझमें नहीं है। 
स्वामीजी - जो अच्छा लगे, वही करता जा। अपने सभी शास्त्र-सिद्धान्त लोगों को सुना, इसीसे बहुत उपकार होगा। शरीर जितने दिन है, उतने दिन काम किये बिना तो कोई रह ही नहीं सकता। अतः जिस काम से दूसरों का उपकार हो, वही करना उचित है। तेरे अपने अनुभवों तथा वेदान्त के महावाक्यों से अनेक जिज्ञासुओं का का उपकार हो सकता है , और हो सके तो यह सब लिखता भी जा । उससे अनेक का कल्याण होगा। 
शिष्य - पहले मुझे अनुभव् हो, तब तो कुछ लिखूँगा। श्री रामकृष्ण कहा करते थे - 'चपरास' (badge of authority)  मिले बिना कोई उस नेता या शिक्षक की बात नहीं सुनता।
स्वामी जी -- तू जिन सब साधनाओं तथा विचार -भूमिकाओं (3H - मनुष्य-निर्माण ओर चरित्र-गठन) मे से होकर अग्रसर हो चुका है, जगत मे ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जो अभी उन्हीं स्थितियों ( 1H- देहाध्यास) मे अटके पड़े हैं, उन्हें पार कर वे अग्रसर नहीं हो पा रहे हैं। तुम्हारे अनुभव ओर चिन्तन-प्रणाली लिखे होने पर उनका भी तो उपकार होगा। मठ में साधुओं के साथ जो चर्चा करता  है, उन विषयों को लिखकर रखने से बहुतों का उपकार हो सकता है। 
जिस व्यक्ति के  साधन-भजन या आत्मानुभूति से दूसरों का उपकार नहीं होता, महा-मोह (अविद्या और देहाध्यास) में फँसे हुए जीवों (जीव रूपी मनुष्यों) का कल्याण नहीं होता, विवेक-प्रयोग और मनःसंयोग का अभ्यास सीख कर जीव (आदमी) को काम-कांचन की सीमा (देहाध्यास) से बाहर नहीं निकल कर मनुष्य (इन्सान) बनने में सहायता नहीं मिलती ; ऐसे साधन-भजन का क्या लाभ ? Do you think, so long as one Jiva endures in bondage, you will have any liberation? So long as he is not liberated — it may take several lifetimes — you will have to be born to help him, to make him realise Brahman.  तू क्या समझता है कि एक भी जीव (पशु-मानव) के बन्धन में रहते हुए तेरी मुक्ति होगी ? जीतने दिन जीतने जन्म तक उस जीव का उद्धार नहीं होगा, जब तक तुम्हारी तरह वह भी ' पशु-मानव से देव-मानव' में रूपान्तरित नहीं हो जाता, उसकी सहायता करने उसे अपने ब्रह्म-स्वरूप का अनुभव कराने के लिये,  उतनी बार तुझे भी जन्म लेना पड़ेगा। प्रत्येक जीव तो तेरा ही अंग है। इसिलिए इस ' तुव जीवभाव त्याग कर स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को भी जीव से मनुष्य बनने में सहायता करो' -- 'Be and Make !' के लिए कर्म करो।
अपनी स्त्री-पुत्रों को अपना जानकर जिस प्रकार तू उनके सभी प्रकार के मंगल की कामना करता है, उसी प्रकार जब प्रत्येक जीव के प्रति जब तेरा वैसा ही आकर्षण होगा, तब समझूँगा कि तेरे भीतर भी ब्रह्म जाग्रत हो रहा है -उसके एक मिनट भी पहले नहीं। जाति-धर्म निरपेक्ष सम्पूर्ण विश्व के मंगल की कामना जाग्रत होने पर ही समझूँगा कि तू सर्वोच्च आदर्श की ओर अग्रसर हो राहा है।
शिष्य- महाराज, यह तो बड़ी कठिन शर्त है कि सभी की मुक्ति हुए बिना व्यक्तिगत मुक्ति नहीं होगी। ऐसा विचित्र सिद्धान्त तो मैंने पहले कभी नहीं सुना है।
९. स्वामीजी - There is a class of Vedantists who hold such a view. एक श्रेणी के वेदान्तीयों का ऐसा ही मत है --वे कहते हैं " व्यष्टि की मुक्ति, मुक्ति का वास्तविक स्वरूप नहीं है। समष्टि की मुक्ति ही मुक्ति है। ' individual liberation is not the real and perfect form of liberation, but universal and collective liberation is true Mukti. , हाँ, इस मत के दोष-गुण अवश्य दिखाये जा सकते हैं।
शिष्य - वेदान्त मत में व्यष्टि -भाव (मैं देह हूँ) ही तो बन्धन का कारण है ! वही उपाधिगत चित सत्ता ( the Infinite Intelligence) काम्य कर्म (प्रारब्ध या निमित्त - desires and effects of works) आदि के कारण बद्ध सी प्रतीत होती है। विवेक-सूर्य परमहंस के आलोक मे विवेक-विचार करते करते उपाधिरहित  (bereft of all adjuncts) होने पर - निर्विषय हो जाने पर प्रत्यक्ष चिन्मय आत्मा (जो इन्द्रियातीत बुद्धि का सार है essence of transcendent Intelligence) में बन्धन रहेगा कैसे ? जिसकी जीव-जगत आदि की बुद्धि है, (Jiva and the world is a persisting reality अर्थात जो जगत को सत्य और ब्रह्म को मिथ्या मान रहा है) उसे ऐसा लग सकता है कि सभी की मुक्ति हुए बिना उसकी मुक्ति नहीं है; परन्तु श्रवण आदि के बल पर मन निरुपाधिक होकर जब प्रत्यक-ब्रह्ममय होता है, उस समय उसकी दृष्टि में जीव ही कहाँ और जगत ही कहाँ ? --कुछ भी तो नहीं रहता। उस मुक्ति तत्व को रोकने वाला कोई नहीं हो सकता ! (चेलवा को पक्का आत्मानुभूति हुआ था?)
स्वामी जी -- हाँ, तू जो कह रहा है, वह अधिकांश वेदान्तियों का सिद्धान्त है। यह निर्दोष भी है। उससे व्यक्तिगत मुक्ति रुकती नहीं, परन्तु जो व्यक्ति सोचता है कि मैं आब्रह्म समस्त जगत को अपने साथ लेकर एक ही साथ मुक्त होऊंगा, उसकी महाप्राणता ( ह्रदय के विस्तार greatness of his Heart)  का एक बार चिन्तन तो कर !!
शिष्य - महाराज, वह उदार भाव का परिचायक अवश्य है, परन्तु शास्त्र-विरुद्ध लगता है। (चेला टेंटीया बंगाली है) स्वामी जी शिष्य की बातें सुन न सके ? ? 
  बोले -" दिन-रात ब्रह्म-विषयक अनुसंधान किया कर। एकाग्र मन से ध्यान किया कर ओर शेष समय मे या तो कोई लोकहितकर काम किया कर या मन ही मन सोचाकर कि ' जीवों का अर्थात जो अभी तक मनुष्य नहीं बन सके हैं, उनका मनुष्य ' बनने और बनाने ' के कार्य मे रुचि हो,'- ताकी भारत का कल्याण हो सके। भगवान से प्रार्थना कर कि सभी की दृष्टि ब्रह्म या सत्य की खोज में निरंतर लगी रहे ! इस प्रकार लगातार चिन्तन-प्रवाह संचारित करते रहने से उन विचार-तरंगों द्वारा ही जगत का उपकार होगा। जगत-कल्याण के लिये निःस्वार्थ भाव से किया गया कोई भी सत्कर्म व्यर्थ नहीं जाता ! तेरे चिन्तन से ही प्रभावित हो, संभव है कि अमेरिका ( गुजरात या पंजाब ) के किसी व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हो जाये ?                   वार्ता एवं संलाप /३८/ वर्ष १९०१/ ६/१९४ Do you think, so long as one Jiva endures in bondage, you will have any liberation ? स्वामीजी -'I want a band of young Bengal' वास्तव में मैं - युवा बंगाल का एक बलिदानी जत्था देखने की तमन्ना रखता हूँ !  

2 comments:

Charaiveti said...

विवेकानंद दर्शनम् का अध्भुत अनुवाद पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

Charaiveti said...

विवेकानंद दर्शनम् का अध्भुत अनुवाद पढ़कर बहुत अच्छा लगा.