Sunday, June 15, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (19)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 

(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
[In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं।] 

श्री श्री माँ सारदा और आप , मैं ...या कोई भी ... 


नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||
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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

' विवेकानन्द - वचनामृत '

१९.
ईशावास्यमिदं सर्वमलोकं तत् कथं भवेत् । 
यतः सर्वप्रपञ्चोSयं ब्रह्मैवास्ति न चेतरत्॥ 

1. All this is the abode of God.
2. ' The world is not zero, it has a certain reality, 
3. ' because all this manifestation is verily Brahman and nothing else. 

1. All this is the abode of God.  ' ईश्वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यांजगत्।' ईशावास्योपनिषद् के ऋषि ने बहुत पहले ही घोषणा की थी-  यह सारा जगत् ईश्वर का है, अकिंचन से लेकर सारा ब्रह्मांड, जगत् जीवन-उसी ईश का आवास है। अतः उस जगत् का त्याग करके, यानि मानसिक स्तर पर त्याग-भाव रखकर जीवनयापन करो। किसी के धन आदि पर तुम दृष्टि न डालो।
 सब तरफ ईशावास्य ही है। भगवान इस जगत के कण कण में विद्यमान है। जब सब कुछ परमात्मा का ही है तो फिर उसे अपना समझ कर भोगने की बात ही कहाँ रह गई ? और जिसका इस प्रकार का “अहंभाव” समाप्त हो जाता है वह स्वयम् ईश्वर का हो जाता है | जो मान लेता है कि जीवन के समस्त भोग, जीवन के समस्त रस, जीवन का समस्त आनन्द, जीवन का समस्त अमृत उस ईश्वर का है तो फिर न कुछ भोगने को शेष रहता है और न ही त्याग करने को। उस स्थिति में वह कुछ करता नहीं – न त्याग न ही भोग, उस स्थिति में तो जो कुछ होता है वह प्रारब्धवश अनिच्छा या परेच्छा से घटित होता है 
"ईशावास्यमिदं सर्वं" का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में कण-कण में प्रभु का अंश देखना अति प्राचीन विचार है। इसी अनुभूति से उतपन्न - प्रेम भारत की संस्कृति ,भारत की सोच, भारतीय आध्यात्मिकता का एक ऐसा 'प्राणतत्त्व' है, जिसकी अनुभूति पर बाद में पाकिस्तान में जा बसने वाले शायर इकबाल को भी लिखना पड़ा ' सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा !' 
भारत अकेला ऐसा देश है जिसने अपने लुटेरों अपने नागरिकों के हत्यारों और हमलावरों को भी न सिर्फ प्यार से देखा अपितु उन्हें अपनाया भी ! भारत पूरी दुनिया में अकेला ऐसा देश भी है, जिसने अपनी सर्वाधिक सामर्थ्य के दिनों में भी स्वार्थवश कभी भी किसी भी राष्ट्र पर पहले हमला नहीं किया! इस समस्त जगत को ईश्वर से व्याप्त देखने वाला पुरुष ही समतावादी होता है।
2. ' The world is not zero [वि० सा० ख ६/२५३ Eng.volume 8/3 मूलतः यह प्रवचन स्वामी जी की एक प्रमुख अमेरिकन शिष्या कुमारी एस० ई० वाल्डो द्वारा लेखबद्ध किये गये थे। जिस समय स्वामी सारदानन्द अमेरिका में थे, (१८९६) उन्होंने उनकी नोटबुक से इनकी प्रतिलिपि कर ली थी। कुछ प्रमुख अंश ] 
 ज्ञानयोग पर प्रवचन
(हरिः) ॐ तत् सत् ! ॐ का ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रहस्य का ज्ञान प्राप्त कर लेना है। ज्ञानयोग का उद्देश्य वही है जो भक्तियोग और राजयोग का है, किन्तु प्रक्रिया भिन्न है। यह योग दृढ़ साधकों के लिये है; उनके लिये है जो न तो रहस्यवादी, न भक्तिमान, अपितु बौद्धिक हैं। वह तो इस उपलब्धि में निहित है कि हम यथार्थतः क्या हैं और यह कि हम भय, जन्म तथा मृत्यु से परे हैं। आत्मा का साक्षात्कार ही सर्वोत्तम श्रेयस् (highest good) है। 
यह संसार 'प्रकृति का विकास और ईश्वर की अभिव्यक्ति है'। यह ब्रह्म या निरपेक्ष की हमारी वह व्याख्या है, जिसे हम माया या नाम-रूप के माध्यम से देखने के बाद व्यक्त करते हैं। 'संसार शून्य (The world is not zero) नहीं है, उसमें कुछ वास्तविकता है।' संसार (स्थूल शरीर) केवल इसीलिये 'प्रतीयमान' होता है कि इसके पीछे ब्रह्म का 'अस्तित्व' (अस्थि) है। 
‘वृहदारण्यक उपनिषद्’ (२.४.१४) में प्रश्न किया गया है कि “ विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” जो ज्ञाता है (आत्मा) उसे किस प्रकार जाना जायेगा ? वेदान्त कहता है, " हम वह (विज्ञाता) हैं, किन्तु कभी उसे विशेषतया जान नहीं सकते, क्योंकि 'वह' कभी ज्ञान का विषय नहीं हो सकता।" आधुनिक विज्ञान भी कहता है कि 'वह' कभी जाना नहीं जा सकता। फिर भी समय-समय पर हम उसकी झलक पा सकते हैं। 
संसार-भ्रम एक बार टूट जाने (निधन=समाधी) के बाद, वह हमारे पास पुनः लौट आता (व्युत्थान)  है, किन्तु तब हमारे लिये उसमें कोई वास्तविकता नहीं रह जाती। हम उसे एक मृगतृष्णा के रूप में ही ग्रहण करते हैं। इस मृगतृष्णा के परे पहुँचना ही सभी धर्मों का लक्ष्य है। किन्तु बहुत कम लोग इस पर्दे (माया) के पीछे प्रवेश कर पाते और परम सत्य की उपलब्धि कर पाते हैं। क्योंकि विवेक-वैराग्य के महत्व को नहीं समझ पाते हैं, इसीलिये आचार्य शंकर मनुष्य को मानसिक-व्यायाम करने के लिये प्रतिदिन मोह-मुद्गर भांजने की सलाह देते हुए लिखते हैं -
यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्ता पृच्छति कोऽपि न गेहे॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
जब तक मनुष्य धन कमा-कमा कर परिवार के जमा करता रहता है, तभी तक उसके कुटुंब-परिवार भी उससे प्रेम करते हैं ! किन्तु जब शरीर बूढ़ा और जर्जर हो जाता है, कोई उसका हाल पूछने भी नहीं आता। इसको समझो और धर्म-पूर्वक धन कमाकर परिवार का पालन-पोषण तो करो किन्तु सदा भज 
गोविन्दम् भज गोविन्दम्...कहते रहो ! 
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृध्दो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
जैसे जैसे शरीर बूढ़ा होता जाता है, सारे अंग भी शिथिल होते जाते हैं, सिर के बाल झड़ जाते हैं, सारे दाँत टूट जाने पर मुख-तुंडा (पोपला) हो जाता है। वृद्ध हुए तब दंड उठाया, किंतु न छूटी आशा-माया॥6॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...
 
[जो वर्षमें बदलता है, वही महीनेमें बदलता है, वही दिनमें बदलता है, वही घण्टेमें बदलता है, वही मिनटमें, सेकेण्डमें बदलता है । सिवाय बदलनेके संसारमें और कुछ तत्व ही नहीं है‒‘सम्यक् प्रकारेण सरति इति संसारः’, गच्छति इति जगत्‌’ । जो हरदम बदलता है, उसको तो आप स्थायी मानते हैं और जो कभी बदलेगा नहीं, कभी बदल सकता नहीं, उसकी प्राप्तिको कठिन मानते हैं । जो निरन्तर रहता है, कभी बदलता नहीं, उसकी प्राप्ति कठिन है तो फिर सुगम क्या है ? वह तो स्वतः-स्वाभाविक है, सिर्फ उधर दृष्टि करनी है । 
यह जो, ‘संसार है’ ऐसा दीखता है, संसार का यह ‘है’-पना क्या  है ? अगर संसारका है तो फिर बदलता क्या है ? सत्‌का तो अभाव होता नहीं और संसारका अभाव प्रत्यक्ष हो रहा है । अवस्थाका, परिस्थिति का, घटनाका, देशका, कालका, वस्तुका, व्यक्तिका, इन सबका परिवर्तन होता है‒यह प्रत्यक्ष हमारे अनुभवकी बात है । स्थूल-से-स्थूल बात बतायें कि आप यहाँ नहीं आये तो भी प्रकाश वैसा ही था और आप आ गये तो भी प्रकाश वैसा ही है । आप आयें या चले जायँ, प्रकाशमें क्या फर्क पड़ता है ? ऐसे ही आप कभी दरिद्री हो जायँ, कभी धनी हो जाँय, कभी बीमार हो जायँ, कभी स्वस्थ हो जायँ, कभी आपका सम्मान हो जाय, कभी अपमान हो जाय, पर आपके होनेपनमें क्या फर्क पड़ता है ?
आपका जो होनापन है, सत्ता-स्वरूप है, उसमें आप स्थित रहो‒‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (गीता १४/२४) । तात्पर्य है कि आपकी सत्ता निरन्तर रहनेवाली है । अगर आपकी सत्ता नहीं रहेगी तो चौरासी लाख योनियाँ कौन भोगेगा, नरक कौन भोगेगा, स्वर्ग आदि लोकोंमें कौन जायेगा ? आपकी सत्ता निरन्तर ज्यों-की-त्यों है। उसमें कोई परिवर्तन हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं । विचार करें, आपके होनापनमें कौन-से करणकी सहायता है ? किस कारककी सहायतासे आपका होनापन है ? आपका होनापन करण-निरपेक्ष है । अपने होनापन में रहते हुए भी आप उससे चिपकते हैं, जो 'नहीं' है । वास्तवमें उससे कभी चिपक सकते नहीं । -परमपूज्य रामसुखदास ] 
सच्चे विवेकी (rationalist) को आगे बढ़ना चाहिये और अपने विवेक की सुदूरतम सीमाओं तक निर्भयतापूर्वक उसका अनुसरण करना चाहिये। मार्ग में कहीं रुक जाने से काम नहीं बनेगा। जब हम 'नेति नेति' कर के अस्वीकार करना प्रारम्भ करें, तो जब तक हम उस परम वस्तु पर न पहुँच जायें जिसे अस्वीकार किया या हटाया नहीं जा सकता -- जो कि यथार्थ 'मैं' है, शेष सब हटा ही देना चाहिये। 
द्वा  सुपर्णा   सयुजा   सखाया   समानं  वृक्षं  परिषस्वजाते ।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाक शीति ।
समाने   वृक्षे  पुरुषो  निमग्नो  नीशया  शोचति   मुह्यमान: ।
जुष्टं  यदा  पश्यत्यन्यमीशमस्य  महिमानमिति   वीतशोक: । 
(मु० उप० ३.१/१-२)

 एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे थे। शिखर पर बैठा हुआ पक्षी शान्त, महिमाशाली, सुन्दर और पूर्ण था। नीचे बैठा हुआ पक्षी बार बार एक टहनी से दूसरे पर फुदक रहा था और कभी मधुर फल खाकर प्रसन्न तथा कभी कड़वे फल खाकर दुःखी होता था। एक दिन जब उसने सामान्य से अधिक कटु फल खाया तो उसने उपरवाले शान्त तथा महिमान्वित पक्षी की ओर देखा और सोचा, " उसके सदृश हो जाऊँ तो कितना अच्छा हो !" और वह उसकी ओर फुदक कर थोड़ा बढ़ा भी। किन्तु जल्दी ही वह उपर के पक्षी के सदृश होने की अपनी इच्छा को ही भूल गया; और पहले की तरह मधुर या कटु फल खाता एवं सुखी तथा दुःखी होता रहा। 
उसने फिर से उपर देखा तो उस शिखर पर बैठे शान्त और महिमाशाली की दयाद्र दृष्टि को देखकर मुग्ध हो गया, वह फुदक कर उस सुन्दर और पूर्ण शान्त पक्षी के थोड़ा निकटतर पहुँच गया। फिर तो बार बार ऐसा ही होने लगा, और अन्ततः वह उपर के पक्षी के बहुत समीप पहुँच गया। उसके पंखों की चमक से वह (नीचे का पक्षी) चौंधिया गया और वह उस चमक को आत्मसात सा करने लगा। अन्त में उसे यह देखकर बड़ा विस्मय और आश्चर्य हुआ कि वहाँ तो केवल एक ही पक्षी है और खुद ही सदा से उपर  वाला पक्षी ही था। किन्तु इस तथ्य को वह केवल अब समझ पाया ! वह आवाक रह गया ! 
मनुष्य नीचे वाले पक्षी के समान है, लेकिन यदि वह अपनी सर्वश्रेष्ठ कल्पना के अनुसार किसी मनुष्य देहधारी सर्वोच्च आदर्श (अवतार-वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण) तक पहुँचने के प्रयत्न में निरन्तर लगा रहे; तो एक समय ऐसा आयेगा, जब वह भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि वह सदैव-'अजर-अमर-अविनाशी' आत्मा ही था, अन्य सब जितनी भी घटनायें उसके जीवन में घटित हो रही थीं- सब मिथ्या या स्वप्न था ! 
जड़ नश्वर पदार्थ (अहं) या मैटर को ही मैं मानने की सत्यता और विश्वास (सम्मोहन) से अपने को पूर्णतया पृथक कर लेना ही ज्ञान है। ज्ञानी (भक्त) को अपने मन में निरन्तर जपते रहना चाहिये - - (हरिः) ॐ तत् सत् ! (श्रीरामकृष्ण या) ॐ ही एकमात्र वास्तविक सत्ता है । यह तात्विक एकता - (अर्थात शारीरिक दृष्टि से मैं श्रीरामकृष्ण का दास हूँ, किन्तु तत्वतः जो वे हैं-वही मैं हूँ !) ज्ञानयोग की नींव है। उसे ही अद्वैतवाद (द्वैत से रहित) कहते हैं। वेदान्त दर्शन की यह आधारशिला है, उसका आदि और अन्त है। " केवल ब्रह्म (श्रीरामकृष्ण) ही सत्य है, शेष सब मिथ्या और मैं (तत्वतः वही) ब्रह्म हूँ!"
ज्ञानयोगी को अवश्य ही उतना प्रखर अवश्य होना चाहिये, जितना कि संकीर्णतम संप्रदायवादी किन्तु उसका हृदय उतना ही विस्तीर्ण भी होना चाहिये जितना कि आकाश। उसे अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिये, उसे अपने बौद्ध या ईसाई धर्म का पालन करते हुए, इतनी शक्ति भी रहनी चाहिये कि वह स्वयं को सचेतन रूप से इन विभिन्न विचारों में विभक्त करते हुए परस्पर के प्रति चिरंतन सद्भाव में दृढ़ रह सके। (क्योंकि अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण रखने के लिये प्रारम्भ में ब्रह्म के किसी मूर्त रूप पर एकाग्रता (मनःसंयोग) का अभ्यास करना अनिवार्य होता है। - इसलिये प्रारम्भ में सबों को अपने अपने धर्म या किसी भी धर्म के सर्वोच्च आदर्श के मूर्त रूप के प्रति विद्वेष छोड़कर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिये। ) 
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3. ' because all this manifestation is verily Brahman and nothing else.
वि० सा० ख० ६/१६२ शिष्य स्वामी निर्मलानन्द के साथ वेदान्त शास्त्र की चर्चा कर रहा है। कुछ प्रमुख अंश -- स्वामी जी - " अरे, तुलसी के साथ क्या विचार-विमर्श हो रहा था? 
शिष्य - महाराज, तुलसी महाराज कह रहे थे कि वेदान्त का ब्रह्मवाद केवल तू और तेरे स्वामीजी जानते हैं। हम तो जानते हैं - कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । ईश्वर को व्यक्तिविशेष बताकर बात का प्रारम्भ करके धीरे धीरे वेदान्तवाद की नींव को सुदृढ़ प्रमाणित करना  उद्देश्य ज्ञात होता है। महाराज, उपनिषद् दर्शन आदि में क्या यह बात है कि ईश्वर कोई सर्वशक्तिमान व्यक्तिविशेष है ? लोग किन्तु वैसे ही ईश्वर में विश्वास रखते हैं। 
स्वामीजी - जीव में अविद्या प्रबल है; ईश्वर विद्या और अविद्या की समष्टिरूपी माया को वशीभूत करके विराजमान है और स्वाधीन भाव से उस स्थावर-जंगमात्मक जगत को अपने भीतर से बाहर निकाल रहा है। परन्तु ब्रह्म उस व्यष्टि-समष्टि अथवा जीव और ईश्वर से परे है। ब्रह्म का अंशांश भाग नहीं होता। समझने के लिये उनके त्रिपाद, चतुष्पाद आदि की कल्पना मात्र की गयी है। जिस पाद में सृष्टि-स्थिति-लय का अध्यास हो रहा है, उसी को शास्त्र में 'ईश्वर' कहकर निर्देश किया गया है। अपर त्रिपाद कूटस्थ है, जिसमें द्वैत कल्पना का आभास नहीं, वही ब्रह्म है। इससे तू ऐसा न मान लेना कि ब्रह्म जीव-जगत से कोई अलग वस्तु है। 
विशिष्टाद्वैतवादी कहते हैं, ब्रह्म ही जीव-जगत के रूप में परिणत हुआ है। अद्वैतवादी कहते हैं, ' ऐसा नहीं, ब्रह्म में जीव-जगत अध्यस्त मात्र हुआ है। जीव-जगत ब्रह्म का परिणाम नहीं है, विवर्त है।'  अद्वैतवाद का कहना है कि जगत केवल नाम-रूप ही है। जब तक नाम-रूप है, तभी तक जगत है। ध्यान-धारणा द्वारा जब नाम-रूप लुप्त हो जाता है, उस समय एकमात्र ब्रह्म ही रह जाता है। उस समय तेरी, मेरी अथवा जीव-जगत  स्वतंत्र सत्ता का अनुभव नहीं होता। उस समय (अहं को नहीं आत्मा को ) ऐसा अनुभव होता है, " मैं ही नित्य-शुद्ध-बुद्ध शाश्वत चैतन्य अथवा सच्चिदानन्द ब्रह्म हूँ!- जीव का स्वरुप ही ब्रह्म है। ध्यान-धारणा द्वारा नाम-रूप का आवरण हटते ही यह भाव प्रत्यक्ष अनुभव में आता है-बस इतना ही। यही है शुद्ध अद्वैतवाद का असल सार। 
शिष्य - तो फिर ईश्वर सर्वशक्तिमान  व्यक्तिविशेष ( almighty Person) है -यह बात फिर कैसे सत्य हो सकती है ? 
स्वामीजी - मनरूपी उपाधि को लेकर ही मनुष्य है; ( क्योंकि मन की चहारदिवारी जहाँ तक है, वहीं तक मनुष्य के सोचने की सीमा है, उसकी सीमा से परे निकलने का उपाय उसने किसी सद्गुरु से नहीं सीखा है) इसीलिये मन के द्वारा ही उसे सभी विषय समझना पड़ रहा है। परन्तु जो कुछ सोचता है, वह सीमित होगा ही। इसलिये अपने व्यक्तित्व के अनुरूप किसी ईश्वर की कल्पना करना, जीव का स्वतः सिद्ध स्वाभाव है, क्योंकि मनुष्य अपने सर्वोच्च आदर्श को मनुष्य के रूप में ही सोचने का सामर्थ्य रखता है।
इस जरा-मृत्युपूर्ण जगत में आकर मनुष्य जब दुःख की ताड़ना से 'हा हा हतोsस्मि रोदिति विष्णुशर्मा' के जैसा 'हाय-हाय यह जरा-मृयु तो मुझे भी मार डालेगी ' सोचकर अश्रुपात करने लगता है; तब वह किसी ऐसे व्यक्ति का आश्रय लेना चाहता है, जिस पर निर्भर रहकर वह चिन्ता मुक्त हो सके। परन्तु ऐसा ससीम आधार है कहाँ;  जो हमे जरा-मृत्यु भय से मुक्त कर सके ? तब उसे समझ में आता है कि वह सर्वव्यापी आत्मा ही उसका एकमात्र आश्रयस्थल हो सकती जिसका स्वयं कोई आधार नहीं है!!
[तब वह भी शंकराचार्य के समान ब्रह्मभाव-को उपनीत हो जाता है-" आनीदवातं स्वधया तदेकं" -प्राणनार्थक 'अन' धातु का 'आनीत्' यह रूप है ( अवातम् ) वायुरहित। बिना वायु का वह एक ब्रह्म विद्यमान था, केवल वह अकेले ही नहीं था , किन्तु स्वधा भी उसके साथ थी। क्योंकि स्व = निज सत्ता | जो निज सत्ता को धा = धारण किये हुये विद्यमान हो , उसे स्वधा कहते हैं; को समझकर प्रार्थना करता है  -" निरालम्बो लम्बोदर जननी कामयामी शरणम ! कहकर माता पार्वती देवी दुर्गा की शरण में जाने की कामना करता है।" ] 
पहले पहल मनुष्य इस सत्य को समझ नहीं सकता। विवेक-वैराग्य आने पर ध्यान-धारणा करते करते धीरे धीरे यह बात समझ में आती है परन्तु कोई किसी भी भाव की साधना क्यों न करे, सभी जाने-अनजाने में अपने भीतर स्थित उस ब्रह्मभाव को ही जगा रहे हैं। हाँ आलम्बन अलग अलग हो सकते हैं। 
जिसका ईश्वर के सगुण होने में विश्वास हो, उसे उसी भाव  पकड़ कर जप-ध्यान आदि करना चाहिये। एकान्तिक भाव आने पर इसीसे समय आने पर ब्रह्मरूपी सिंह उसके भीतर जाग उठता है। ब्रह्मज्ञान ही सब जीवों का एकमात्र लक्ष्य है, किन्तु उसे पाने के अनेक पंथ -अनेक मत हैं। जीव का परमार्थिक स्वरुप ब्रह्म होने पर भी मनरूपी उपाधि (देह को अहं मानना)  में अभिमान रहने के कारण, वह तरह तरह के सन्देह, संशय, सुख-दुःख आदि भोगता है। परन्तु अपने स्वरुप की प्राप्ति लिये आब्राहमस्तम्ब सभी गतिशील हैं। 
जब तक 'अहं ब्रह्म' तत्व प्रत्यक्ष न होगा, तब तक इस जन्म-मृत्यु की गति के पंजे से किसी का छुटकारा नहीं है। मनुष्य-जन्म प्राप्त करके आवा-गमन या जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की ( या सत्य को जानने की) इच्छा  प्रबल होने तथा किसी सच्चे महापुरुष की कृपा प्राप्त होने पर ही मनुष्य की आत्मज्ञान की आकांक्षा बलवती होती है; नहीं तो काम-कांचन में लिप्त व्यक्तियों  के मन की उधर प्रवृत्ति ही नहीं होती। लेकिन वैसे सन्त दुर्लभ हैं, भगवन्त दुर्लभ नहीं हैं ! 
जिसके मन में स्त्री, पुत्र, धन, नाम-यश प्राप्त करने का संकल्प है, उनके मन में ब्रह्म को जानने की इच्छा कैसे हो ? और वह किसी सच्चे महापुरुष को पहचाने कैसे ? उसे तो आशाराम जैसे क्षद्म सन्त ही मिलते हैं। जो व्यक्ति अपना सब कुछ त्यागने को तैयार है, जो सुख-दुःख, भले-बुरे के चंचल प्रवाह में धीर-स्थिर, शान्त तथा दृढ़चित्त रहता है, वही आत्मज्ञान (सत्य का ज्ञान) प्राप्त करने में अविराम श्रम करने को तत्पर होता है। और वही ' निर्गच्छति जगज्जालात् पिंजरादिव केसरी ' --महाबल से जगद्रूपी जाल को तोड़ कर माया की सीमा (मन की चहार दिवारी) को लांघकर सिंह की तरह बाहर निकल जाता है। किन्तु पूर्ण वैराग्य न आने तक , या त्याग न होने तक , अर्थात भोग-स्पृहा के प्रति आसक्ति का - पूर्ण त्याग न होने तक यह सिंहत्व प्राप्त नहीं होता । इस (भेंड़त्व का त्याग और)  सिंहत्व की प्राप्ति (जो शक्ति का वाहन बना दे ) बच्चे के हाथ का लड्डू तो है नहीं, जिसे भुलावादेकर या छीन कर खा सकते हो ?  
शिष्य - परन्तु साधना करते करते धीरे धीरे त्याग तो आ सकता है न ? 
स्वामीजी - जिसे धीरे धीरे आसक्ति का त्याग करना आता हो, उसे आये। परन्तु तुझे क्यों बैठे रहना चाहना चाहिये ? अभी से नाला काटकर जल लाने में लग जा ! (नेति नेति करते हुए मिथ्या देहाध्यास के अहंकार के आरी को काट कर हृदय में अन्तर्निहित दिव्यता -प्रेम के झरने को निचले खेत तक स्वतः पहुँच जाने दो।) श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "  हो रहा है, होगा, सब आलसी लोगों की भाषा है। " तीव्र प्यास लगने पर क्या कोई बैठा रह सकता है ? या पानी कहाँ मिलेगा इसके लिये दौड़-धूप करता है ? प्यास नहीं लगी, इसलिये बैठा है ज्ञान की इच्छा अभी तक प्रबल नहीं हुई है, इसीलिये स्त्री-पुरुष लेकर गृहस्थी कर रहा है !  सदा विवेक-प्रयोग किया कर--' यह शरीर, घर, जीव-जगत सभी सम्पूर्ण मिथ्या है --स्वप्न की तरह है, सदा सोचा कर कि यह शरीर एक जड़-यंत्र मात्र है। इसमें जो सच्चिदानन्द स्वरुप आत्मा है, वही तेरा वास्तविक स्वरुप है। 
मन (अहंकार ग्रस्त सूक्ष्म शरीर ) रूपी उपाधि ही आत्मा का प्रथम और सूक्ष्म आवरण है। उसके बाद देह में आसक्ति उसका स्थूल आवरण बना हुआ है। निष्कल, निर्विकार, स्वयंज्योति वह पुरुष इन सब मायिक आवरणों से ढका हुआ है, इसलिये तू अपने स्वरुप को जान नहीं पाता। रूप-रस की ओर दौड़ने वाले इस मन की गति को अन्दर ओर लौटा देना होगा। मन को मारना होगा। देह तो स्थूल है। यह मरकर पंचभूतों में मिल जाती हैं, परन्तु संस्कारों की गठरी मन (सूक्ष्म-शरीर) शीघ्र नहीं मरता। बीज की भाँति कुछ दिन रहकर फिर वृक्ष के रूप परिणत होता है, फिर स्थूल शरीर धारण करके जन्म-मृत्यु के पथ में आया-जाया करता है। जब तक आत्मज्ञान नहीं हो जाता, तब तक यही क्रम चलता रहता है। इसीलिये कहता हूँ- (अष्टांग) ध्यान, धारणा और विवेक के बल पर मन को सच्चिदानन्द-समुद्र में डुबो दे। मन के मरते ही सभी गया समझ। बस फिर तू  ब्रह्मसंस्थ हो जायेगा। 
शिष्य - महाराज, इस उद्दाम उन्मत्त  मन को ब्रह्म में डुबो देना बहुत ही कठिन है।  
[ (मर्कटस्य सुरापानं तत्र वृश्चिकदंशनम् । तन्मध्ये भूतसंचारो यद्वा तद्वा भविष्यति ॥ बंदर ने शराब पी, उसे बिच्छु ने काटा, उपर से उस में भूत प्रविष्ट हुआ, फिर सर्वथा अनिष्ट ही होगा (होने में क्या शेष बचेगा , राक्षस बना देगा ?)] 
स्वामीजी - वीर (हीरो) के सामने कठिन या असम्भव नाम की कोई चीज़ होती है क्या ? कापुरुष लोग ही ऐसी बातें कहा करते हैं। "वीराणामेव करतलगता मुक्तिः न पुनः कापुरुषाणाम् — Mukti is easy of attainment only to the hero — but not to cowards." केवल शूरवीर (हीरो) लोगों के लिये ही मुक्ति हाथ पर रखे आँवले को प्राप्त करने जैसा आसान है- कोई कायर उसे कभी प्राप्त नहीं कर सकता। अभ्यास और वैराग्य के बल से संयत कर ! गीता ६/३५ में कहा है- "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।  
सूक्ष्म-शरीर या मन का उपादान है चित्त। यह चित्त या 'मन-वस्तु' ( जिससे मन बना है The Chitta or mind-stuff) मानो एक शान्त निर्मल सरोवर है। जब उसके ऊपर रूप-रस आदि विषयों के ढेले गिरते हैं, उसके आघात से उसमें जो तरंग उठ रही है, उसी का नाम है मन। इसीलिये मन का स्वरुप संकल्प-विकल्पात्मक या प्रश्न करने वाला है। उस संकल्प-विकल्प से ही वासना उठती है। उसके बाद वह मन ही क्रियाशक्ति (will इरादा) के रूप में परिणत होकर स्थूल देहरूपी यंत्र के द्वारा कार्य करता है। फिर कर्म भी जिस प्रकार अनन्त है, कर्म का फल भी वैसा ही अनन्त है। अतः लाखों असंख्य कर्मफल रूपी तरंग में मन सदा झूला करता है। उस मन को वृत्तिशून्य बना देना होगा। उस मन को पुनः एक स्वच्छ पारदर्शी सरोवर में परिणत करना होगा, जिससे उसमें फिर वृत्ति रूपी एक भी तरंग बाकी न बचे। चित्त-वृत्तियों का निरोध होते ही- मन (अहं) मर जायेगा, और आत्मा का परमात्मा के साथ योग हो जायेगा। तभी ब्रह्म-तत्व प्रकट होगा। शास्त्रकार उसी स्थिति का आभास इस रूप में दे रहे हैं - भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ मुण्डक उप॥ आदि --समझा ? 
'नेति' 'नेति' करके इन्द्रियातीत प्रत्यक चैतन्य रूपी अपने यथार्थ स्वरुप में मन (सूक्ष्म-शरीर) को विसर्जित कर दे। इस प्रकार अपने शाश्वत चैतन्य स्वरुप में  मन को (अपने नश्वर सूक्ष्म शरीर को) बार बार डुबो डुबो कर मार डाल। तभी ज्ञानस्वरूप का बोध या स्व-स्वरूप में स्थिति होगी। जैसे ही सत्य का अहसास होगा, उस समय  दृश्य-दृष्टा-दृक अर्थात ज्ञेय, ज्ञान व ज्ञाता; सब एक हो जायेंगे।  सभी अध्यासों की निवृत्ति हो जायेगी। इसी को शास्त्रों में 'त्रिपुटी भेद' कहा है। इस स्थिति में जानने, न जानने का प्रश्न ही नहीं रह जाता। आत्मा ही जब एकमात्र विज्ञाता है, तब उसे फिर जानेगा कैसे ? आत्मा ही ज्ञान -आत्मा ही चैतन्य (Intelligence)  - आत्मा ही सच्चिदानन्द है। जिसे सत् या असत् कुछ भी कहकर निर्देश नहीं किया जा सकता, उसी अनिवर्चनीय मायाशक्ति के प्रभाव से जीवरूपी ब्रह्म के भीतर ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान का भाव आ गया है। इसे ही सामान्य जन चेतन अवस्था कहते हैं।  और वह अवस्था जिसमें  सापेक्षिक अस्तित्व का यह द्वैत भाव शुद्ध ब्रह्म में एकत्व को प्राप्त हो जाता है, उसे ही शास्त्रों में अतिचेतन अवस्था (superconscious state) कहते हैं। विवेक-चूड़ामणि ४१० में इस अवस्था का वर्णन करते हुए कहा है - यह पूरी तरह से शान्त समुद्र जैसी अवस्था जिसका कोई नाम नहीं है -  "स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम। 
जितने भी दर्शन और शास्त्र आदि निकले हैं, वे सभी ज्ञाता और ज्ञेय या आत्मा और अनात्मा (subject and object) के सापेक्षिक भूमि से ही निकले हैं। किन्तु अतिचेतन अवस्था में या इन्द्रियातीत भूमि पर अनुभूत होने वाला वस्तु (परमसत्य) कैसा है, उसे कोई भी मानवीय मन या भाषा पूरी तरह से व्यक्त नही कर सकती। इसीको ठाकुर कहते थे ' ब्रह्म आज तक जूठा नहीं हुआ है ! ' दर्शन, या विज्ञान के आविष्कार आदि केवल आंशिक रूप से सत्य हैं पूर्ण सत्य नहीं;  इसलिये वे कभी भी  अतीन्द्रिय सत्य ( transcendent Reality) की समुचित व्याख्या करने वाले माध्यम नहीं बन सकते। 
इसलिये इन्द्रियातीत भूमि पर खड़े होकर देखने से जगत की हर वस्तु मिथ्या ( unreal) प्रतीत होती है- " धर्म मिथ्या, कर्म मिथ्या, मैं मिथ्या हूँ, तू मिथ्या है, विष-ब्रह्माण्ड का सबकुछ मिथ्या है।"  फिर उस अवस्था में पहुँचने बाद ही यह अनुभूत होता है कि - " केवल मैं ही सत्य हूँ, सिर्फ मैं हूँ ! मैं ही सर्वव्याप्त आत्मा हूँ; और अपने अस्तित्व का प्रमाण मैं स्वयं हूँ ! " मेरे अस्तित्व के प्रमाण के लिये, अलग से किसी दूसरे प्रमाण की आवश्यकता कहाँ हैं ? ' मैं ' (स्वरूपतः) -जैसा कि शास्त्रों ने कहा है-" नित्यमस्मत्प्रसिद्धं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥वि ० चू ० ४०९ ॥ -निधन या समाधि में जाने वाले विद्वान को सर्वदा यह ज्ञात रहता है -कि मैं ही शाश्वत आत्मा हूँ !
 " मैंने वास्तव में स्वयं उस इन्द्रियातीत अवस्था को प्रत्यक्ष किया है, आत्मसाक्षात्कार किया है, उस परमसत्य को अपने अनुभव से जाना है। तुम लोग भी देखो और उसकी अनुभूति करो - और इस ब्रह्म-तत्व का उपदेश सभी युवाओं को सुनाओ। तब तो शान्ति पाओगे ! इस सर्वमतग्रासिनी, सर्वधर्म-समन्वयकारी ब्रह्मज्ञान का इसी जीवन में स्वयं अनुभव कर - और जगत में प्रचार कर !( " Be and Make !) स्वयं इस ब्रह्म-विद्या का प्रचारक (नेता या पैग़म्बर ) बन और दूसरों को भी (पैग़म्बर बनने) में सहायता कर ! इससे अपना तो कल्याण होगा ही, दूसरों का भी कल्याण होगा। तुझे आज सारी बात बता दी। इससे बढ़कर बात और दूसरी कोई नहीं । "  
" असल बात यह है कि ब्रह्मज्ञ (ऋषि या पैग़म्बर) बनना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है -परम पुरुषार्थ है। परन्तु कोई मनुष्य हर समय तो इन्द्रियातीत सत्य या ब्रह्म में अवस्थित तो नहीं रह सकता ? व्युत्थान होने बाद कुछ लेकर तो रहना पड़ेगा ? उस समय ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगों का कल्याण हो। इसीलिये तुम लोगों से कहता हूँ, अभेदबुद्धि से जीव की सेवा (जीवशिव-वाद) के भाव से कर्म करो। परन्तु भैया कर्म में ऐसे दाँव-घात हैं कि बड़े बड़े साधु भी आबद्ध हो जाते हैं, और फल में (नाम-यश में ) आसक्त हो जाते हैं! इसीलिये फल की आकांक्षा से शून्य होकर कर्म करना चाहिये । गीता में यही बात कही गयी है। परन्तु इतना समझ लो कि ब्रह्मज्ञान होना किसी प्रकार के कर्म पर निर्भर नहीं है, इन्द्रियातीत सत्य की अनुभूति होने में कर्म का अनुप्रवेश भी नहीं है !
सतकर्म : Good works, at the most, purify the mind. हाँ सतकर्म करते रहने (या महामण्डल = ऋषि बनो और बनाओ के निष्काम आन्दोलन) से जुड़े रहने पर चित्त-शुद्धि (चरित्र-निर्माण या मन  के असत संस्कारों की शुद्धि ) अवश्य होती है। इसीलिये आचार्यशंकर ने 'ज्ञान-कर्म समुच्चय ' के सिद्धान्त की अपने गीता-भाष्य में  इतनी तीव्र आलोचना की है । हाँ निष्काम कर्म से किसी किसी को ब्रह्मज्ञान हो  सकता है ! ( पूरि निष्ठा के साथ- देशवासियों की सेवा, सच्ची समाज सेवा है -महामंण्डल पद्धति में अन्नदान-विद्यादान-ज्ञानदान यज्ञ या युवा प्रशिक्षण शिविर के -' शिव ज्ञान से जीव सेवा ' में सक्रीय सहयोग देना)  यह भी एक उपाय अवश्य है, किन्तु (महामण्डल द्वारा की जाने वाली समाज-सेवा का ) उद्देश्य है ब्रह्मज्ञान या 'ऋषित्व' की प्राप्ति ! इस तथ्य को भली भाँति समझ लो कि 'विवेक-विचार का मार्ग' ( path of discrimination = ज्ञानयोग) तथा अन्य सभी मार्गों से साधना करने का उद्देश्य है - ब्रह्मज्ञता (realisation of Brahman अथवा पैग़म्बरी का चपरास=ऋषित्व) प्राप्त करना। 
शिष्य - महाराज, ज्ञानयोग और कर्मयोग तो स्पष्ट हो गया, अब भक्तियोग और राजयोग  उपयोगिता बताकर मेरी जिज्ञासा शान्त कीजिये। 
स्वामीजी - उन सब पथों में साधना करते करते भी किसी किसी को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। भक्ति-मार्ग के द्वारा धीरे धीरे उन्नति होकर फल देर में प्राप्त होता है -परन्तु यह मार्ग सरल अवश्य है। किन्तु योग (अष्टांग योग या राजयोग) में अनेक विघ्न हैं। सम्भव है कि 'मनःसंयोग' का अभ्यास मन सिद्धियों (psychic powers-मानसिक शक्तियाँ) में चला जाय और इस प्रकार तुम्हें अपने असली स्वरूप (जिसके भय से सूर्य तपता है, ऋतुओं में परिवर्तन होता रहता है) को जानने से भटका दे। एकमात्र ज्ञान-मार्ग ही त्वरित फल देने वाला, तथा अन्य समस्त धर्ममतों (creeds) में सर्वाधिक तर्कपूर्ण है, इसीलिये यह मार्ग सर्व काल में और सभी देशों में समान रूप से सम्मानित है। परन्तु इस 'नेति नेति'-मार्ग या विवेक-विचार पथ में चलते चलते भी मन ऐसे तर्क-जाल में निबद्ध हो सकता है, जिससे निकल पाना अत्यंत कठिन हो। इसीलिये इसके साथ ही साथ जप-ध्यान का अभ्यास भी करते रहना चाहिये। हमें विवेक-विचार (यम-नियम का पालन) और एकाग्रता (आसन -प्रत्याहार-धारणा) का अभ्यास करते करते ध्यान के बल पर उद्देश्य तक अथवा ब्रह्म-तत्व (अतीन्द्रिय अवस्था) में पहुँचना होगा। इस प्रकार-  (महामण्डल पुस्तिका मनःसंयोग-पद्धति  के अनुसार)  साधना करने से गन्तव्य स्थल पर ठीक-ठाक (प्राणायाम के चक्कर में पड़कर पागल हुए बिना ) पहुंचा जा सकता है। यही मेरी सम्मति में सरल तथा शीघ्र फलदायक मार्ग है। 
शिष्य - अब मुझे 'अवतारवाद' ( अर्थात किसके नाम का जप और किसके रूप का ध्यान किया जाय?) के विषय में कुछ बताइये ।  
स्वामी जी - जान पड़ता है, तू एक ही दिन में  सभी कुछ मार लेना चाहता है !
शिष्य - महाराज,  मन का सन्देह एक ही दिन में मिट जाय तो बार बार आपको तंग भी न करना पड़े। 
स्वामी जी - वैसे  'पुरुषोत्तम' लोग जिनकी कृपा से उस आत्मा का ज्ञान,  जिस आत्मा की इतनी महिमा शास्त्रों में की जाती है- एक मुहूर्त में प्राप्त होता है; वे ही सचल तीर्थ -अवतार पुरुष है ! वे जन्म से ही ब्रह्ज्ञ हैं और ब्रह्म तथा ब्रह्मज्ञ में कुछ भी अंतर नहीं है - "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति - ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।"  (मुण्डक उपनिषद् ३।२।९) मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि आत्मा को मन (अहं) के द्वारा जाना नहीं जा सकता- क्योंकि यह आत्मा ही ज्ञाता है (इसलिये आत्मा ही परमात्मा को जान सकता है अहं नहीं) । इसीलिये मनुष्य का जानना उसी अवतार तक है --जो सदा आत्मसंस्थ हैं ! मानव-बुद्धि ईश्वर के संबन्ध में जो सबसे उच्च भाव ग्रहण कर सकती है, वह अवतार को जानने तक ही है। उसके बाद और जानने का प्रश्न नहीं रहता। उस प्रकार के ब्रह्मज्ञ जिनको जन्म से ही अपने ब्रह्मत्व का ज्ञान हो- कभी कभी ही इस धरती पर जन्म लेते हैं; और बहुत थोड़े से लोग ही उन्हें समझ पाते हैं। वे ही शास्त्र-वचनों के प्रमाण-स्थल हैं; भवसागर  के आलोकस्तम्भ (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता)  हैं !
 इन अवतारों  के सत्संग तथा कृपादृष्टि से एक क्षण में ही हृदय का अंधकार दूर हो जाता है--और एकाएक ब्रह्मज्ञान का स्फुरण हो जाता है। क्यों होता है, अथवा किस उपाय से होता है, इसका निर्णय नहीं किया जा सकता, परन्तु होता अवश्य है। मैंने वैसा होते देखा है। श्री कृष्ण ने आत्मसंस्थ होकर गीता कही थी। गीता में जिन जिन स्थानों में 'अहं' शब्द का उल्लेख है, वह 'आत्मपर' जानना। ' मामेकं शरणं व्रज ' -- ' मेरी शरण आ जाओ !' का अर्थ है --तुम स्वयं ' आत्मसंस्थ बनो '  "Be established in the Atman" और दूसरों को भी आत्मसंस्थ बनने में सहायता करो ! " Be and Make !" यह आत्मज्ञान ही गीता का  अन्तिम लक्ष्य है ! योग आदि का उल्लेख उसी आत्म-तत्व की प्राप्ति की प्रासंगिक व्याख्या है।
जिन्हें यह आत्मज्ञान नहीं होता वे 'आत्मघाती' हैं । वे मिथ्या रूप-रस आदि इन्द्रिय-विषयों में आसक्त होकर स्वयं की ही फाँसी लगाकर हत्या कर देते हैं। (तुलसी वे कैसे जीयें जिन्हें जरावे पाँच?) तू भी तो मनुष्य है - दो दिनों के तुच्छ भोग की उपेक्षा नहीं कर सकता ? क्या तू भी जायस्व-म्रियस्व के दल में जायगा ? जो घोर अज्ञान में ही जन्म लेते और मरते रहते हैं ? निरन्तर विवेक-प्रयोग करते रहो-'श्रेय' "beneficial" को ग्रहण करो -और 'प्रेय' "pleasant" का त्याग कर दो। फिर सिंहनाद करते हुए इस आत्मतत्व की महिमा चाण्डाल आदि --सभी को सुना। सुनाते सुनाते तेरे हृदय की वक्रता भी सीधी हो जायेगी, तेरी बुद्धि भी निर्मल हो जायेगी। "तत्वमसि — Thou art That, "सोऽहमस्मि — I am That", "सर्वं खल्विदं ब्रह्म — All this is verily Brahman" आदि महावाक्यों का सदा उच्चारण कर (जप-ध्यान) और हृदय में सिंह की तरह बल रख। भय क्या है ? भय ही मृत्यु है --भय ही महापातक है। नररूपी अर्जुन को भय हुआ था, इसीलिये नारायण श्री कृष्ण ने आत्मसंस्थ होकर उन्हें गीता का उपदेश दिया; फिर भी उपदेश सुनने से क्या अर्जुन भय चला गया था ? नहीं, अर्जुन जब कृष्ण के विश्वरूप (Universal Form) का दर्शन कर आत्मसंस्थ हुए--तभी वे ज्ञानाग्नि-दग्धकर्मा (bondages of Karma burnt) बने और उन्होंने युद्ध किया।
[' तत्वमसि श्वेतकेतो ' (छान्दोग्य उपनिषद : ६.८.७.) - हे श्वेतकेतु, तुम वही (ब्रह्म ) हो !" Thou art That, "सोऽहमस्मि — [सः+अहम+अस्मि, वह आत्मा ही मैं हूं। ’ यानी वह परमात्मा मैं (जीवात्मा) हूं- अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ।जो वह पुरुष (आदित्य मण्डलस्थ) है वह मैं हूं॥ ईशा० उप०:१६॥ मैं देह नहीं, देही हूं। सहज रूप में देही की प्रेरणा से देह जो कर रहा है, कह रहा है या विचार कर रहा है वह ईश्वरीय सत्ता से हो रहा है। I am That",सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन॥ निरालम्बोपनिषद:९॥ — यह विश्व ही 'ब्रह्म' है, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ! वस्तुत: ज्ञानी और भक्त की स्थिति में कोई अन्तर नहीं होता । भेद इतना ही है, ज्ञानी ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ कहता है और भक्त ‘वासुदेव: सर्वमिति’ अथवा सन्त तुलसी दास की भाषा में वह कहता है –सिय राममय सब जग जानी। करऊँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।। ' निरावलम्ब, 'अर्थात ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य के अधीन जो नहीं होता, वही 'मोक्ष' का अधिकारी होता है। ] 
शिष्य - महाराज, आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद (after realisation)  भी क्या कर्म रह ही जाते हैं ? 
स्वामी जी - ज्ञान-प्राप्ति के बाद साधारण लोग जिसे कर्म कहते हैं, वैसा कर्म नहीं रहता। उस समय कर्म  'बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय' हो जाता है। आत्मज्ञानी की सभी बातें केवल जीव-कल्याण के लिये होती हैं। हमलोगों ने श्री रामकृष्ण (नवनी दा) को बहुत निकट से देखा है - "देहस्थोऽपि न देहस्थ: — In the body, but not of it!" [देहस्थोsपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद्यथोत्थितः। भागवत
११.११.८] देह में रहते हुए भी वे देह के होकर नहीं रहते ! ऐसा भाव ! वैसे पुरुषों के कर्म के उद्देश्य के संबन्ध में केवल यही कहा जा सकता है -- "लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् (ब्रह्म-सूत्र २,१.३३) जो कुछ वे करते हैं, वे लोक में रहकर लीला करने जैसा होता है। 
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