Wednesday, June 4, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (15)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
 [ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ] 



 
श्री श्री माँ सारदा  



नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||


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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्
 
  ' विवेकानन्द - वचनामृत '
१५.
नाहमग्रे कदापि स्यामन्ये सन्तु पुरः सदा। 
त्यागेSस्मि प्रथमो नित्यं त्यागः श्रेयान् मतं ध्रुवम्॥  



1. * ' You have to put yourselves last, and others before you' always.
[THE NECESSITY OF RELIGION: Jnana-Yoga]


2. ** But when the question of sacrifice comes, say-'Myself first.' For ' sacrifice in the past has been the Law, it will be, alas, for ages to come.'  

* " नीतिशास्त्र सदा कहता है, 'मैं नहीं, तू'। इसका उद्देश्य है--' स्व नहीं, निः-स्व '। हमारे शास्त्रों का कहना है, कि इंद्रियों के माध्यम से असीम सामर्थ्य अथवा असीम आनन्द को प्राप्त करने के क्रम में मनुष्य अपने जिस निरर्थक व्यक्तित्व (अहं M/F) की धारणा से चिपटा रहता है, उसे छोड़ना पड़ेगा। 'You have to put yourself last, and others before you.' तुमको (जहाँ तुम्हारे त्याग से दूसरों का कल्याण होता हो-जैसे टिकट लेने के लिये लाईन में खड़ा होते समय) दूसरों को आगे करना पड़ेगा और स्वयं को पीछे।  
हमारी इन्द्रियाँ कहती हैं- 'Myself first' ' अपने को आगे रखो ', पर नीतिशास्त्र कहता है- 'अपने को सबके अन्त में रखो।' इस तरह नीतिशास्त्र का सम्पूर्ण विधान (all codes of ethics) त्याग पर ही आधारित है। उसकी पहली मांग है कि भौतिक स्तर पर अपने व्यक्तित्व (M/F) का हनन करो, निर्माण नहीं। (दादा ने उपाय बताया था-खाली समय में सिग्नेचर करो और फाड़ कर डस्टबिन में फेंकते रहो) क्यों ? तुमतो स्वरूपतः असीम आत्मा हो, किन्तु भ्रम के कारण स्वयं को नाशवान शरीर मानकर असीम शक्ति को व्यक्त करने की कोशिश कर रहे हो, उसकी अभिव्यक्ति इस भौतिक स्तर पर नहीं हो सकती, ऐसा असम्भव है, अकल्पनीय है।     
अहंता का पूर्ण उच्छेदन ही नीतिशास्त्र का आदर्श है। नैतिकता का समग्र क्षेत्र, ध्येय और विषय व्यक्ति ('काचा आमी' का ) उच्छेदन है, न की उसका निर्माण। किन्तु जब किसी व्यक्ति को यह कहा जाता है कि तुम अपने व्यक्तित्व की चिंता मत करो, उसका हनन करो - तो वह उसके विनष्ट होने के भय से काँप उठता है।"

२/१९१ धर्म की आवश्यकता 
 (लन्दन में दिया हुआ व्याख्यान) उसके कुछ प्रमुख अंश :-' what there is after the body is dissolved'  मनुष्य यह जानना चाहता है कि शरीर के विनष्ट हो जाने के बाद क्या होता है ? फिर वह प्रकृति की विशाल दृश्यावली के पीछे काम करने वाली शक्ति को भी समझना चाहता है। इसे देखकर यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य इन्द्रियों की सीमा से बाहर जाना चाहता है। इस व्याख्या को रहस्यात्मक रूप देने की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे तो यह बिल्कुल स्वाभाविक लगता है कि धर्म की पहली झाँकी स्वप्न में मिली होगी। 
कैसी अद्भुत है स्वप्न की अवस्था ! स्वप्नावस्था में जब शरीर प्रायः मृत सा हो जाता है, तब भी मन के समस्त जटिल क्रिया-कलाप चलते रहते हैं। अतः इसमें क्या आश्चर्य यदि मनुष्य हठात यह निष्कर्ष निकाल ले कि इस शरीर के विनष्ट हो जाने पर भी इसकी क्रियाएँ जारी रहेंगी ? स्वप्नावस्था में मनुष्य का कोई नया अस्तित्व नहीं हो जाता, बल्कि वह जाग्रतावस्था के अनुभवों का ही स्मरण करता है। मनुष्य का मन कुछ खास क्षणों में इन्द्रियों की सीमाओं के ही नहीं, बुद्धि की शक्ति के भी परे पहुँच जाता है। उस अवस्था में वह उन तथ्यों का साक्षात्कार करता है, जिनका ज्ञान न कभी इन्द्रियों से हो सकता था और न चिन्तन से ही। ये तथ्य ही संसार के सभी धर्मों के आधार हैं। सभी वर्तमान धर्मों का दावा है कि मन को कुछ ऐसी अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिनसे वह इन्द्रिय तथा बौद्धिक अवस्था का अतिक्रमण कर जाता है। और उसकी इस शक्ति को वे एक अनिवार्य तथ्य के रूप में मानते हैं। 
हममें से किसी ने कभी एक 'आदर्श मानव' (Ideal Human Being) को देखा नहीं है, फिर भी हम से कहा जाता है, कि उसकी सत्ता में विश्वास करो। हममें से किसी ने अभी तक किसी ने 'आदर्शतः पूर्ण मानव' ( ideally perfect man) को देखा नहीं है, फिर भी उस आदर्श में विश्वास किये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।
 सभी धर्मों का यह निर्णय है कि एक कोई 'आदर्श अमूर्त सत्ता' (Ideal Unit Abstraction) अवश्य है जो किसी विधान या सत या सार-तत्व के रूप में अवतरित होता रहता है। प्रत्येक मनुष्य अपने लिये कोई न कोई अपरिमित शक्तिवाला आदर्श रखता ही है -चाहे उका रूप कैसा भी हो! प्रत्येक मनुष्य के सामने, वह जो भी हो, जहाँ भी हो-एक अपरिमित शक्तिवाला आदर्श रहता ही है। Every human being has an ideal of infinite pleasure. प्रत्येक मनुष्य के सामने सुख का प्रतिक कोई न कोई आदर्श (सुख-धाम) रहता ही है। हम निरंतर उस आदर्श तक अपने को उठाने का प्रयास करते रहते हैं। 
हमारे चारो ओर अनेकानेक कार्य हो रहे हैं, (प्रातः काल सूरज निकलता है, कमल खिल जाता है, वर्षा का पानी मिट्टी पर गिर कर सुख जाता है...) उनमें से अधिकांश कार्य असीम शक्ति अथवा असीम आनन्द के आदर्श तक पहुँचने के निमित्त ही किये जा रहे हैं। किन्तु कुछ सत्संगी, बहुत थोड़े से लोगों को (जो नियमित पाठचक्र में जाते रहते हैं) शीघ्र ही यह पता चल जाता है, कि अनन्त शक्ति लाभ (स्वर्ग का राजा इन्द्र बनने और असीम आनन्द का भोग करने) के निमित्त जो प्रयास अपनी इच्छा से वे कर रहे हैं, उनकी प्राप्ति इन्द्रियों के द्वारा नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में उन्हें इन्द्रियों की सीमा का ज्ञान हो जाता है। वे समझ जाते हैं कि ससीम शरीर-मन से असीम आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती।  देर-सबेर मनुष्य को इस सत्य का ज्ञान हो ही जाता है, कि सीमित माध्यम से असीम की अभिव्यक्ति असम्भव है, और तब वह परिमित माध्यम से अनन्त को व्यक्त करने का प्रयास करना त्याग देता है। २/१९५ प्रयास का यह परित्याग ही, नैतिकता की पृष्ठभूमि है।
[ किसी को यह मालूम हो जाय कि खीर में छिपकिली गिर गयी है, तो क्या कोई उस खीर को खायेगा ? ठीक उसी प्रकार - विषयों से मिलने वाला विषय-सुख विष के ही समान है। विषय-सुख विष के ही समान है को सिद्ध करने के लिये, पाणिनि के एक सूत्र - शव्युवमघोनामतद्विते (तद्यथा श्वा= कुक्कुरो, युवा= युवको, मघवन= इन्द्र)  इमे त्रयः समानमेव विषय­लोलुपाः कामुकाः स्वार्थान्धाश्च। पा.सू. ६-४-१३३) का सन्त तुलसीदास ने अद्भुत प्रयोग किया हैपाणिनीय व्याकरण के अनुसार, श्वन, युवन और मघवन- ये तीनों समानरूप रूप से विषयलोलुप, कामी और स्वार्थी  हैं; व्याकरण में इन तीन शब्दों के रूप भी एक सरीखे होते हैं । हालांकि पाणिनि ने इन्द्र को श्व (कुत्ते ) की श्रेणी में रखने के इरादे से उनका सूत्र नहीं लिखा था पर तुलसीदास ने पाणिनि के ही मुख से इन्द्र का तिरस्कार कराकर अपने रचना चातुर्य का अद्भुत परिचय दिया है।-लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥ 
एक कवि राजमहल में प्रवेश करने पर देखता है, राजा के मालिन की युवा पुत्री  माला बनाने में इतनी बेसुध है कि काँच, मणि और स्वर्ण के दानों को एक ही धागे में पिरो रही है ! तीनों को अलग अलग श्रेणी में बाँट कर उसकी माला क्यों नहीं बनाती ? वह पूछता है - 
 काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे ग्रथ्नासि बाले किमु चित्रमेतत्?  
 हे राजा के मालिन की बेटी, तुम इन काँच, मणि और स्वर्ण के दानों को एक ही सूत्र की विचित्र माला में क्यों पिरोती हो? उस मालिन की बेटी ने कहा -
अशेषवित्पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह॥
 क्योंकि कुत्ता, युवा या इंद्र कोई भी क्यों न हो, विषयों से मिलने वाला सुख तो बहुत बड़ो विपत्ति में डालने वाला ही होता है। मनुष्य को छप्पन भोग में जो सुख मिलता सूअर को विष्ठा खाने में वही सुख मिलता है।  मनुष्य को विषयों में जितना सुख मिलता है, उससे लाखों गुना तीव्र सुख इन्द्र को स्वर्ग में प्राप्त होता है, पर है तो विष के ही समान। यही सोच कर मैं इन तीनों- काँच, मणि और स्वर्ण को एक ही श्रेणी में रख कर माला बना रही हूँ!]
नीतिशास्त्र सदा कहता है, 'मैं नहीं, तू'। इसका उद्देश्य है--' स्व नहीं, निः-स्व '। हमारे शास्त्रों का कहना है, कि इंद्रियों के माध्यम से असीम सामर्थ्य अथवा असीम आनन्द को प्राप्त करने के क्रम में मनुष्य अपने जिस निरर्थक व्यक्तित्व (अहं M/F) की धारणा से चिपटा रहता है, उसे छोड़ना पड़ेगा। 'You have to put yourself last, and others before you.' तुमको (टिकट लेने के लाईन में खड़ा होते समय) दूसरों को आगे करना पड़ेगा और स्वयं को पीछे। हमारी इन्द्रियाँ कहती हैं- 'Myself first' अपने को आगे रखो', पर नीतिशास्त्र कहता है- 'अपने को सबके अन्त में रखो।' इस तरह नीतिशास्त्र का सम्पूर्ण विधान (all codes of ethics) त्याग पर ही आधारित है। उसकी पहली मांग है कि भौतिक स्तर पर अपने व्यक्तित्व (M/F) का हनन करो, निर्माण नहीं। (दादा ने उपाय बताया था-खली समय में सिग्नेचर करो और फाड़ कर डस्टबिन में फेंकते रहो) क्यों ? तुमतो स्वरूपतः असीम आत्मा हो, किन्तु भ्रम के कारण स्वयं को नाशवान शरीर मानकर असीम शक्ति को व्यक्त करने की कोशिश कर रहे हो, उसकी अभिव्यक्ति इस भौतिक स्तर पर नहीं हो सकती, ऐसा असम्भव है, अकल्पनीय है।     
अहंता का पूर्ण उच्छेदन ही नीतिशास्त्र का आदर्श है। नैतिकता का समग्र क्षेत्र, ध्येय और विषय व्यक्ति (काचा आमी) उच्छेदन है, न की उसका निर्माण। किन्तु जब किसी व्यक्ति को यह कहा जाता है कि तुम अपने व्यक्तित्व की चिंता मत करो, उसका हनन करो - तो वह उसके विनष्ट होने के भय से काँप उठता है। उपयोगितावादी (The Utilitarian) हमें 'असीम' -या अतीन्द्रिय लक्ष्य को पाने के प्रति किये जाने वाले प्रयत्नों को छोड़ देने की सलाह देते हैं, क्योंकि उनकी नजर में अतीन्द्रियता (अतिचेतन अवस्था में पहुँचने के लिये मनःसंयोग का अभ्यास करना) अव्यवहारिक है, निरर्थक है। पर साथ ही वे यह भी कहते हैं, कि नैतिक नियमों का पालन करो, समाज का कल्याण करो।  
आखिर क्यों हमें गरीब मेधावी-छात्रों या बीमार लोगों की मदत करनी चाहिये? Ethics itself is not the end, but the means to the end. समाज-सेवा या नीतिशास्त्र हमारा साध्य नहीं है, परन्तु साध्य को पाने का साधन है। यदि असीम सुख भोगना ही मानव जीवन का चरम उद्देश्य है, तो क्यों न मैं दूसरों को कष्ट पहुँचाकर भी स्वयं सुखी रहूँ ? हम क्यों दूसरों की भलाई करें ? क्यों हम दूसरों को नहीं सताएँ ?
 कुछ गार्जियन लोग ऐसा कहते हैं कि यदि मेरा बेटा अभी से ही आध्यात्मिक होने लगे या चरित्र-निर्माण करने लगे, तो बड़ा होकर उसे सांसार के व्यावहारिक सम्बन्धों को निभाने (दुनियादारी निभाने-टेबल के नीचे से पैसा कमाने ?) में कठिनाइयाँ हो सकती हैं। कन्फ़्यूशियस के जमाने में भी कहा जाता था, 
' पहले हम इस लोक की चिंता करें, जब इससे फुर्सत मिलेगी-तब दूसरे लोकों की चर्चा करेंगे।' पर यदि अधिक आध्यात्मिकता या चरित्र-निर्माण कर लेने से हमारी दुनियादारी बुद्धि कुन्द हो जाएगी, तो जरुरत से अधिक दुनियादारी पर ध्यान देने या अत्यधिक प्रैक्टिकल (चार्वाक-परस्त) बन जाने से इहलोक और परलोक दोनों बिगड़ जायेंगे (इहलोक में भी जेल जाना पड़ेगा और परलोक में भी नरक भोग पहले मिलेगा। अत्यधिक दुनियादारी हमें पूर्णतः भौतिकवादी (चार्वाक-पन्थी) बना डालेगी। मनुष्य का उद्देश्य प्रकृति नहीं है, -वरन कुछ उससे उपर की वस्तु है। 
Man is man so long as he is struggling to rise above nature, and this nature is both internal and external. 'मनुष्य को तभी तक मनुष्य कहा जा सकता है, जब तक वह प्रकृति से उपर उठने के लिये संग्राम करता है'; और यह प्रकृति बाह्य और आन्तरिक दोनों है। बाह्य प्रकृति को जीत लेना कितना अच्छा है, कितना भव्य है। पर उससे असंख्य गुना अच्छा और भव्य है अभ्यंतर प्रकृति पर विजय पाना। it is infinitely grander and better to know the laws that govern the passions, the feelings, the will, of mankind. ग्रहों और नक्षत्रों का नियंत्रण करने वाले नियमों (G=M/V) को जान लेना बहुत अच्छा और गरिमामय है; उससे अनन्त गुना अच्छा और भव्य है, उन नियमों (योग-सूत्र) को जानना, जिनसे मनुष्य के मनोवेग (passions), भावनायें और उत्कटेच्छायें नियंत्रित होती हैं। (इन नियमों को नहीं सिखाया जा रहा है, तभी तो दिल्ली की निर्भया और बदायूँ जैसी दिल दहला देने वाली घटनायें हो रही हैं।) इस आंतरिक मनुष्य (inner man-अनियंत्रित मन) पर विजय पाना, मानव मन की जटिल सूक्ष्म क्रिया-रहस्यों को समझना पूर्णतया धर्म के अन्तर्गत आता है। और जब भूमा या असीम की खोज करना, इन्द्रियातीत वस्तु को पाने के लिये उद्द्य्म करना, इन्द्रियों की सीमाओं से परे जाकर एक आध्यात्मिक मानव के रूप में विकसित होना--उसे उपयोगितावादी कितना भी अर्थहीन कहें; समाप्त हो जाती है, तो उस राष्ट्र का पतन होने लगता है। तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिकता ही किसी भी राष्ट्र की शक्ति का प्रधान श्रोत है। 
एक अध्यन के रूप में भी धर्म अत्यन्त आवश्यक है। 
इसमें कोई शक नहीं, कि केवल उपयोगिता के स्तर पर भी पूर्णतया स्वस्थ, नैतिक और अच्छे महापुरुष इस संसार में हुए हैं। किन्तु वैसे संसार को हिला देने वाले (world-movers) लोग, जो मानो विश्व में एक महान चुम्बकीय आकर्षण ला देते हैं, जिनकी आत्मा सैकड़ों और हजारों में क्रियाशील है, जिनका जीवन आध्यात्मिक अग्नि से दूसरों के हृदय को आलोकित कर देता है, ऐसे महामानव सदा आध्यात्मिकता की पृष्ठभूमि से ही आविर्भूत होते हैं। वह अन्तर्निहित अनन्त ऊर्जा, जिसकी अनुभूति करना प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है, उसे अभिव्यक्त करने की प्रेक-शक्ति (motive power) का स्रोत सदा ही धर्म रहा है। 
 In building up character - चरित्र-निर्माण, शिव और महत् की प्राप्ति, स्वयं तथा विश्व को शांति प्रदान करने वाली सर्वोपरि प्रेरक शक्ति धर्म ही है। धर्म का अध्यन अब पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक आधार पर होना चाहिये। सम्प्रदाय, जाति या राष्ट्र की भावना पर आधारित समस्त धर्मों का परित्याग करना होगा । हर जाति या राष्ट्र का अपना अपना अलग ईश्वर मानना और दूसरों को भ्रान्त कहना एक अन्धविश्वास है। उसे अतीत की वस्तु हो जाना चाहिये। वह समय तो आ ही गया है, (अच्छे दिन तो आ ही गए हैं !), जब कोई व्यक्ति पृथ्वी के किसी कोने (बनारस) में कोई बात कहे और सारे विश्व में वह गूँज उठे ! मात्र भौतिक संचार- साधनों से हमने सम्पूर्ण जगत को एक बना डाला है। इसलिये स्वभावतः ही आने वाले धर्म को विश्व-व्यापी (सर्वत्यागी काशी-विश्वनाथ) होना होगा ! 
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** But when the question of sacrifice comes, say-'Myself first.' For ' sacrifice in the past has been the Law, it will be, alas, for ages to come.'  
किन्तु जब देश के लिये जीने-मरने का प्रश्न खड़ा हो, जहाँ अपने जीवन का बलिदान चढ़ा देने वालों की लाईन लगानी हो; वहाँ वीरों को कहना चाहिये-' मैं जहाँ खड़ा होता हूँ-लाईन वहीं से शुरू होती है!' 'Myself first.' 
क्योंकि-' जो बात मैं सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट देखता हूँ--वह यह कि अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का कारण है और कुछ नहीं। Who will give the world light? जगत को ज्ञान (ब्रह्मविद्या- 'I am He' ) का प्रकाश कौन देगा ?
भूतकाल में अपने जीवन की बलि चढ़ा देना (sacrifice) ही नियम (Law धर्म) था, और दुःख है कि युगों तक ऐसा (पुष्प की अभिलाषा) ही रहेगा। पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं और वीरों को ' बहुजनहिताय, बहुजन सुखाय ' अपने जीवन की बलि चढ़ानी होगी ! (अर्थात जिन्हें स्वाधीनता-संग्राम में शहीद बनने का सौभाग्य नहीं मिला, उन्हें केवल देश के लिये जी कर दिखाना होगा।) असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों (ऋषियों या पैग़म्बरों) की आवश्यकता है।  
संसार के धर्म प्राणरहित उपहास ( हँसी ठठ्ठा - lifeless mockeries) के विषय बन चुके हैं; आज जगत को जिस चीज की आवश्यकता है--वह है चरित्र !! संसार को ऐसे 'मनुष्य' चाहिये जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलन्त प्रेम (burning LOVE) का मूर्त-विग्रह हो। मानवजाति के जिस मार्गदर्शक नेता या शिक्षक का जीवन-गठन, 'स्वार्थहीन प्रेम' का ज्वलंत उदहारण स्वरुप बन जायेगा; उसके मुख से निकले एक एक शब्द का प्रभाव श्रोताओं के उपर वज्र (thunderbolt) की तरह पड़ेगा। आज हमें ' निर्भीक शब्दों और दिलेर  कामों'  (बोल्ड वर्ड्स एंड बोलडर डीड्स)  की  आवश्यकता है। मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े शब्दों में कहा जा सकता है, और वह है --मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरुप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र उसे ('स्वार्थहीन प्रेम' का ज्वलंत उदहारणस्वरुप 'नेता' बनो और बनाओ!' ) प्रकट करने का उपाय बताना।
मुझे पूरा यकीन है, कि तुम्हारे मन से मौत का मिथ्याभय (देहाध्यास या superstition) निकल चूका है; और तुम्हारे भीतर वह शक्ति जाग्रत हो चुकी है- जो सम्पूर्ण जगत को झकझोर देगी ! और भविष्य में ऐसे दूसरे लोग भी (भी ऋषि बनेंगे) आयेँगे। Awake, awake, great ones! The world is burning with misery. Can you sleep? जागो ! जागो ! हे वीरों मोहनिद्रा से जागो; सारा जगत दुःख से जल रहा है- क्या तुम सो सकते हो ? 
हम बार-बार पुकारें जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अंतर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन को सार्थक करने के लिये,क्या इससे भी (Be and Make से भी ) कोई महान कार्य हो सकता है ? मैं जैसे ही ' बनो और बनाओ ' आन्दोलन को और अधिक तीव्रता से प्रसारित करने की बात सोचता हूँ, सारी कार्य-पद्धति मेरे समक्ष उजागर हो जाती है। मैं पहले से कोई योजना नहीं बनाता। योजनायें खुद बी खुद पैदा होती हैं, स्वतः यथार्थता में रूपान्तरित हो जाती हैं। मैं केवल कहता हूँ--जागो, जागो ! 
सस्नेह तुम्हारा, विवेकानन्द  
(७ जून १८९६, लन्दन से भगिनी निवेदिता को लिखित पत्र )

  

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