Tuesday, June 3, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (14)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
 [ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ] 

 
श्री श्री माँ सारदा  


नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||

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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

 ' विवेकानन्द - वचनामृत '
१४. 
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नूनमुभे तु कर्मणि । 
   प्रवृत्तिः स्वार्थ बुद्ध्याश्च निवृत्तिस्तद्विसर्जने ।।


' Both Pravritti and Nivritti are of the nature of work. 

The one is Pravritti,....the natural tendency of every human being; taking everything from everywhere and heaping it around one centre, that centre being man's own sweet self.....

Nivritti is the fundamental basis of all morality and all religion, and the very perfection of it is entire self-abnegation, readiness to sacrifice mind and body and everything for another being. ' (NON-ATTACHMENT IS COMPLETE SELF-ABNEGATION)

३/५९ अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है। 
यह सम्पूर्ण आत्मत्याग ही सारी नैतिकता की नींव है। 
एके सत्पुरुषाःपरार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये, 
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थविरोधेन ये।
तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये, 
ये निघ्नंति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥ 
 (भर्तृहरि-विरचित नीतिशतकम्  – 75)

इस संसार में हमें कई प्रकार के मनुष्य मिलेंगे। कवि कहता है कि वह तीन प्रकार के लोगों का वर्ग-नामकरण सरलता से कर लेता है । प्रथम तो ‘सत्पुरुष’ या देव-मानव, जो पूर्ण आत्मत्यागी होते हैं, अपने जीवन की बाजी लगाकर दूसरों का भला करते हैं। ये सर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं। यदि किसी देश में ऐसे सौ मनुष्य भी हों, तो उस देश को फिर किसी बात की चिन्ता नहीं। परन्तु खेद है, ऐसे बहुत थोड़े होते हैं। दूसरे वे साधु-प्रकृति के मनुष्य ‘सामान्य जन' हैं, जो दूसरों की भलाई तब तक करते हैं, जब तक उनकी स्वयं की कोई हानि न हो। और तीसरे वे ‘मानुषराक्षस’ - अर्थात आसुरी प्रकृति के लोग हैं; जो अपनी भलाई के लिये दूसरों की हानि तक करने में नहीं हिचकते। भर्तृहरि ने चौथी श्रेणी भी बताई है। जिसको हम कोई नाम नहीं दे सकते। ये लोग ऐसे होते हैं कि अकारण ही दूसरों का अनिष्ट केवल अनिष्ट करने के लिये ही करते हैं। भले ही इससे उनका कोई स्वार्थ सिद्ध न हो रहा हो । 
जिस प्रकार सर्वोच्च श्रेणी के मनुष्य -‘सत्पुरुष’ (या चरित्रवान मनुष्य) अपने स्वाभाव-वश, भला करने के लिये ही दूसरों का भला करते हैं, उसके पीछे उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं होता। उसी प्रकार सब्सर निम्न स्तर के ऐसे लोग भी हैं, जो केवल दूसरों का खेल बिगाड़ने के लिये,अपनी आदतों से मजबूर होकर केवल बुरा करने के लिये ही दूसरों का बुरा करते रहते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोई लाभ नहीं होता-यह तो उनकी प्रकृति ही है। कवि कहता है कि जिनकी प्रवृत्ति सदा परहित के विरुद्ध कार्य करने की रहती है, उन्हें वह किस नाम से पुकारे ? --उसे नहीं मालूम। दुर्भाग्य से यह धरा ऐसे लोगों से मुक्त नहीं है, जिन्होंने चरित्र-निर्माण की पद्धति (आदत-रुझान-प्रवृत्ति) को सीखा ही नहीं है ।
संस्कृत में दो शब्द हैं - प्रवृत्ति और निवृत्ति। जैसे पेण्डुलम वाले घड़ी में दोलन गति होती है- प्रवृत्ति का अर्थ है किसी वस्तु की ओर प्रवर्तन (revolving towards) और निवृत्ति का अर्थ है प्रत्यागमन (revolving away)। किसी वस्तु की ओर प्रवर्तन का अर्थ है, हमारा यह ("I and mine”) संसार -यह 'मैं' और 'मेरा'।  अर्थात इस 'मैं' रूपी केन्द्र में ही, जो कुछ मिले, धन-संपत्ति, नाम-यश, उसे संगृहीत करना-उसे पकड़े रहना या सदा बढ़ाने का यत्न करना। यह प्रवृत्ति ही मनुष्य मात्र का स्वाभाविक भाव है- चहुँ ओर से जो कुछ मिले, उसे लेना और सबको एक केन्द्र में एकत्र करते जाना। और वह केन्द्र है, उसका अपना मधुर 'अहं' । जब उसकी यह वृत्ति (रुझान या tendency) घटने लगती है, जब निवृत्ति का उदय होता है, तभी नैतिकता और धर्म का आरम्भ होता है। 'Both Pravritti and Nivritti are of the nature of work.' 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति', दोनों ही कर्म के रूप हैं। एक असत् कर्म (evil work) है और दूसरा सत् (good work)। निवृत्ति ही सारी नैतिकता एवं सारे धर्म की नींव है; और इसकी पराकाष्ठा ही सम्पूर्ण 'आत्मत्याग' है; जिसके प्राप्त हो जाने पर मनुष्य दूसरों के लिये अपना तन-मन-धन, यहाँ तक कि अपना सर्वस्व निछावर कर देता है। जब कोई मनुष्य इस अवस्था में पहुँच जाता है, उसे कर्म-योग में सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सत्कर्मों ' Be and Make' से जुड़े रहने का यही सर्वोच्च फल है।  
ज्ञानी, कर्मी और भक्त, तीनो एक ही स्थान पर पहुँचते हैं, और वह स्थान है -आत्मत्याग ( self-
abnegation), जो व्यक्ति अपना जीवन दूसरों के लिये अर्पित करने को उद्द्त रहता है, उसके प्रति समग्र मानवता श्रद्धा और भक्ति से नत हो जाती है। एक भक्त अपने हृदय निरंतर साधु भाव रखते हुए, अन्त में उसी एक स्थान पर पहुँचता है, और कहता है-"Thy will be done,"-प्रभो, तेरी इच्छा ही पूर्ण हो ! यही भक्त का आत्मत्याग है। एक ज्ञानी भी अपने ज्ञान (आत्मानुभूति) के द्वारा यह देखता है, कि उसका यह तथाकथित 'देहाध्यास'-या भासमान 'अहं' केवल और केवल एक भ्रम है; फिर वह उसे बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता है। यह भी आत्मत्याग के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अतएव हम देखते हैं कि कर्म, भक्ति और ज्ञान-तीनों यहाँ पर आकर मिल जाते हैं। भक्ति-मार्ग के आचार्य जब यह सिखाते हैं, कि ' ईश्वर' जगत से भिन्न है, 'जगत' से परे है' तो उनका वास्तविक मर्म यही रहता है। जगत एक चीज है और ईश्वर दूसरी; और यह भेद बिल्कुल सत्य है। 'जगत' कहने से उनका तात्पर्य रहता है 'स्वार्थपरता'। "Unselfishness is God." - स्वार्थशून्यता ही ईश्वर है !
 गीता कहती है-'अपने जीवन में समस्त कार्य करते हुए भी किसी में आसक्त न होना। यह जान लो कि संसार में रहते हुए भी तुम संसार से नितान्त पृथक हो और यहाँ तुम जो भी कर रहे हो वह अपने लिये नहीं है- देश के लिये कर रहे हो । यदि कोई कार्य तुम अपने लिये करोगे, तो उसका फल भी तुम्हें ही भोगना पड़ेगा। इसलिये कर्मयोग हमें यह शिक्षा देता है, ' संसार को मत छोड़ो, संसार में ही रहो; जितना चे संसारी भाव ग्रहण करो। परन्तु यदि वह अपने ही भोग के निमित्त हो, तो फिर तुम्हारा कर्म करना व्यर्थ है।' पहले अहं भाव को नष्ट कर डालो, और फिर समस्त संसार को आत्मस्वरूप देखो,-'उस बूढ़े आदमी को मरना ही चाहिये' "The old man must die." यहाँ 'बूढ़े आदमी' का अर्थ है, यह स्वार्थपर भाव कि यह संसार हमारे ही भोग के लिये बना है। 
यह सोचना कि कोई कोई मेरे उपर निर्भर है तथा मैं किसी का भला कर सकता हूँ, एक दुर्बलता का चिन्ह है। यह अहंकार ही समस्त आसक्ति की जड़ है, और इस आसक्ति से ही समस्त दुःखों की उत्पत्ति होती है। हमें अपने मन को यह भली-भाँति समझा देना चाहिये कि इस संसार में कोई 'मेरे' ऊपर निर्भर नहीं है। एक भिखारी भी हमारे दान पर निर्भर नहीं है। किसी भी जीव को हमारी दया की आवश्यकता नहीं है, सबकी सहायता प्रकृति से होती है। दूसरों की सहायता करके हम जो स्वयं शिक्षा प्राप्त कर सक रहे हैं, यही तो हमारे तुम्हारे लिये परम सौभाग्य की बात है। जीवन में सीखने योग्य यही सबसे बड़ी बात है। ' हो सकता है, इसी साल तुम्हारे कई मित्रों का निधन हो गया हो। तो क्या भला संसार उनके फिर वापस आने के लिये रुक हुआ है ? अतएव अपने मन से यह विचार निकाल दो कि तुम्हें इस संसार के लिये कुछ करना है। किसी व्यक्ति के लिये अपने विषय में यह सोचना कि ' मैं तो संसार की सहायता के लिये पैदा हुआ हूँ।' यह केवल अहंकार है, निरी स्वार्थपरता है, जो धर्म की आड़ में हमारे सामने आती है। 
जनक एक बहुत बड़े राजा थे और 'विदेह' नाम से प्रसिद्द थे। 'विदेह' का अर्थ है, 'शरीर से पृथक'। यद्द्पि वे राजा थे, फिर भी उन्हें इस बात का तनिक भी अभिमान नहीं होता था कि वे एक 'शरीर' हैं। उन्हें तो सदा यही ध्यान रहता था कि वे आत्मा हैं। व्यासदेव के पुत्र बालक शुक का अपने पर ऐसा संयम था कि बिना उनकी इच्छा के संसार की कोई वस्तु उन्हें आकृष्ट नहीं कर सकती थी। जिस मनुष्य ने 'स्वयं' पर अर्थात मन (अहं) पर अधिकार प्राप्त कर लिया है, उसके उपर बाहर की कोई भी चीज अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, उसके लिये फिर किसी प्रकार की दासता शेष नहीं रह जाती। there is no more slavery for him. His mind has become free.' उसका मन स्वतंत्र हो जाता है- अर्थात इन्द्रिय-विषय उसे कभी अपनी ओर खींच नहीं सकते -उसका विषयाश्रित मन 'एस्केप वेलोसिटी' पार्थिव वस्तुओं के गुरुत्वाकर्षण से परे होकर निरंतर 'ब्रह्मनिष्ठ मन' ही बना रहता है।  
जिन लोगों ने अपने मन पर विजय नहीं प्राप्त की है, उनके लिये यह संसार या तो बुराइयों से भरा है, या अधिक से अधिक अच्छाइयों और बुराइयों का एक मिश्रण है। परन्तु यदि हम अपने मन पर विजय प्राप्त कर लें, तो यही संसार सुखमय हो जाता है। ज्योंही इस कल्पित 'अहं' का नाश हो जायगा, त्योंही वही संसार जो पहले अमंगल से भरा प्रतीत होता था, अब स्वर्गरूप और परमानन्द से पूर्ण प्रतीत होने लगेगा। यहाँ तक कि हवा भी बदलकर मधुमय हो जायेगी और प्रत्येक भक्ति भला प्रतीत होने लगेगा। यही है कर्मयोग की पूर्णता या सिद्धि।
 सारा रहस्य अभ्यास में ही है। पहले श्रवण करो, फिर मनन करो और फिर अभ्यास करो। यह बात प्रत्येक योग के सम्बन्ध में सत्य है। पहले तुम इसके बारे में सुनो और मनन करो- इस आदेश का मर्म क्या है ? यदि कुछ बातें आरम्भ में स्पष्ट न हों, तो निरंतर श्रवण एवं मनन से वे स्पष्ट होने लगती हैं। वास्तव में कभी कोई व्यक्ति किसी दूसरे को नहीं सिखाता, हममें से प्रत्येक को अपने आप को सिखाना होगा। बाहर के गुरु तो केवल उद्दीपक मात्र हैं, जो हमारे अन्तःस्थ गुरु (मन) को सब विषयों का मर्म समझने के लिये  उद्बोधित कर देते हैं। तब बहुत सी बातें हमारी स्वयं की विचार-शक्ति से स्पष्ट हो जाती है। और उनका अनुभव हम अपनी ही आत्मा में करने लगते हैं।
और यह अनुभूति ही हमारी प्रबल इच्छा-शक्ति में परिणत हो जाती है। पहले यह भावना होती है, फिर इच्छा, और उस इच्छा-शक्ति से कर्म करने की वह प्रचण्ड शक्ति पैदा होती है, जो तुम्हारी प्रत्येक नस, प्रत्येक शीरा और प्रत्येक पेशी में प्रवाहित होकर तुम्हारे सम्पूर्ण शरीर को इस निष्काम कर्मयोग का एक यंत्र बना देती हैं। और इसके फलस्वरूप हमें अपना वांछित पूर्ण आत्मत्याग एवं परम निःस्वार्थपरता प्राप्त हो जाती है। यह उपलब्धि किसी प्रकार के मत, सिद्धान्त या विश्वास पर निर्भर नहीं है। प्रश्न तो यह है कि क्या तुम निःस्वार्थ हो ? यदि तुम हो, तो चाहे कोई शास्त्र नहीं पढ़ा हो, या मंदिर में न गए हो, फिर भी तुम पूर्णता को प्राप्त कर लोगे। हमारा प्रत्येक योग बिना किसी दूसरे योग की सहायता के भी मनुष्य को पूर्ण बना देने में समर्थ है, क्योंकि उन सबका लक्ष्य एक ही है। कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग - सभी मोक्ष-लाभ के लिये सीधे और स्वतंत्र उपाय हो सकते हैं। सांख्ययोगौ पृथग् बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । गीता५/४ केवल अज्ञ ही कहते हैं कि कर्म और ज्ञान भिन्न भिन्न हैं, ज्ञानी नहीं। 

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