Tuesday, January 28, 2014

केवल पूर्णता प्राप्त व्यक्ति को ही दायित्व-ज्ञान होता है।



विद्या और पाण्डित्य (Learning and wisdom ) बाह्य आड्म्बर हैं, और बाह्य भाग केवल चमकता भर है; किन्तु सब शक्तियों का सिंहासन हृदय होता है। ज्ञानमय, शक्तिमय तथा कर्ममय आत्मा का निवास-स्थान मस्तिष्क में नहीं वरन हृदय में है। शतं चैका च हृदयस्य नाड्यः -हृदय की नाड़ियाँ १०१ है, कठ०।मुख्य नाड़ी का केन्द्र जिसे सहानुभूति नाड़ीग्रन्थि ' Sympathetic Ganglia '  कहते हैं, हृदय के निकट होता है; और यही आत्मा का निवास दुर्ग है। जितना अधिक तुम हृदय का विकास कर सकोगे, उतनी अधिक तुम्हारी विजय होगी। इसमें कोई सन्देह नहीं।
मस्तिष्क की भाषा तो कोई कोई ही समझता है, परन्तु हृदय की भाषा, ब्रह्मा से लेकर घास क तिनके तक सभी समझ सकते हैं। परन्तु अपने देश में तो हमें, ऐसे लोगों को जाग्रत करना है, जो मृतप्राय हैं। इसमें समय लगेगा, परन्तु यदि तुममें असीम धीरज और उद्द्योगशक्ति है, तो सफलता निश्चित रूप से प्राप्त होगी।
अनेकानेक अतीत जन्मों के फलस्वरूप जिसके ह्रदय में जैसा संस्कार गठित हुआ है, उसे तदनुसार उपदेश दो। ज्ञान, योग, भक्ति और कर्म --इनमें से चाहे जिस भाव को मूल आधार बनाओ, किन्तु अन्यान्य भावों की भी साथ ही साथ शिक्षा दो। ज्ञान के साथ भक्ति का सामंजस्य करना होगा, योगप्रवण स्वाभाव के लोगों को युक्ति-विचार के साथ सामंजस्य करना होगा, और कर्म मानो सभी पंथों का अंगस्वरूप है। जो जहाँ पर है, उसे वहाँ से ठेलकर आगे बढ़ाओ। धर्म-शिक्षा विनष्टकारी न होकर सर्वदा सृजनकारी ही होनी चाहिये।
जब तुम ज्ञान की शिक्षा देते हो तो तुम्हें ज्ञानी होना होगा, और जो अवस्था शिष्य की होती है, तुम्हें मन ही मन ठीक उसी अवस्था में पहुँचना होगा। गम्भीरता के साथ उदारता का अर्जन करो, किन्तु उसे खो मत दो।अन्यान्य योगों में भी तुम्हें ठीक ऐसा ही करना होगा। ज्ञान की उपलब्धि इस भाव से करो कि ज्ञान को छोड़कर मानो कुछ है ही नहीं; उसके बाद भक्तियोग, राजयोग और कर्मयोग को भी लेकर इसी भाव से साधना करो. तरंग को छोड़कर समुद्र की ओर जाओ, तभी तुम स्वेच्छानुसार विभिन्न प्रकार के तरंगो का उत्पादन कर सकोगे। तुम अपनी मनरूपी सरोवर को संयत रखो, ऐसा किये बिना तुम दूसरों के मनरूपी सरोवर का तत्व कभी न जान सकोगे। 
मनुष्य की प्रत्येक प्रवृत्ति (आदत) उसकी अतीत कर्मसमष्टि की उस त्रिज्या (radius) की परिचायक हैं, जिस पर मनुष्य को चलते रहना चाहिए।  सभी अर्धव्यास केन्द्र में ले जाते हैं।  किसीकी प्रवृत्ति को पलट देने का नाम तक मत लो, उससे गुरु और शिष्य दोनों को हानि पहुँचती है।  .…हम अनन्तस्वरुप हैं-- हम सभी किसी भी प्रकार की सीमा के अतीत हैं। अतएव हम परम निष्ठावान मुसलमान के समान प्रखर और सर्वाधिक घोर नास्तिक के समान उदार भावापन्न हो सकते हैं। सच्ची सहानुभूति के बिना हम कभी भी सम्यक शिक्षा नहीं दे सकते। 
 इस धारणा को छोड़ दो, कि मनुष्य एक दायित्वपूर्ण प्राणी है; केवल पूर्णता प्राप्त व्यक्ति को ही दायित्व-ज्ञान होता है। सब अज्ञानी व्यक्ति मोह-मदिरा पीकर मत्त हुए हैं, यह उनकी स्वाभाविक अवस्था नहीं है। तुम लोगों ने ज्ञान-लाभ किया है--तुम्हें उनके प्रति अनन्त धैर्यसम्पन्न होना होगा। उनके प्रति प्रेमभाव छोड़कर अन्य किसी प्रकार का भाव मत रखो; वे जिस रोग से ग्रसित होकर जगत को भ्रान्त दृष्टि से देखते हैं, पहले उस रोग का निदान करो, उसके बाद उनकी सहायता करो, जिससे उनका रोग मिट सके और ठीक ठीक देख सकें।
शनैः पन्थाः,  सब अपने समय पर होगा। बूँद-बूँद करके घड़ा भरता है। कोई बड़ा काम होता है, जब नींव पड़ती है या मार्ग बनता है, जब दैवी शक्ति की आवश्यकता होती है- तब एक या दो असाधारण मनुष्य विघ्न और कठिनाइयों के पहाड़ को पार करते हुए चुपचाप और शान्ति से काम करते हैं। जब सहस्रों मनुष्यों का लाभ होता है, तब बड़ा कोलाहल मचता है और पूरा देश प्रशंसा से गूँज उठता है। परन्तु तब तक वह यंत्र तीव्रता से चल चूका होता है और कोई बालक भी उसे चलने का सामर्थ्य रखता है, या कोई मुर्ख उसकी गति में वृद्धि कर सकता है।
किन्तु यह अच्छी तरह समझ लो कि एक या दो गाँवों का..... (जनिबिगहा,फुलवरिया,आदि का) जो उपकार हुआ है, ……तथा वे ही दस-बीस कार्यकर्ता --नितान्त पर्याप्त हैं, और यही वह केन्द्र बनता है, जो कभी नष्ट होने का नहीं। यहाँ से लाखों मनुष्यों को समय पर लाभ पहुंचेगा। अभी हमको आधे दर्जन सिंह चाहिये, उसके बाद सैकड़ों गीदड़ भी उत्तम काम कर सकेंगे। भागलपुर में केन्द्र खोलने के लिये जो तुमने लिखा है, वह विचार --विद्यार्थियों को शिक्षा देना इत्यादि --निःसन्देह बहुत अच्छा है, परन्तु हमारा संघ दीन-हीन, दरिद्र, निरक्षर किसान तथा श्रमिक समाज के लिये है, और उनके लिये सबकुछ करने के बाद जब समय बचेगा, केवल तब कुलीनों की बारी आयेगी। प्रेम के द्वारा तुम उन किसान और श्रमिक लोगों को जीत सकोगे। इसके पश्चात वे स्वयं थोड़ा सा धन संग्रह करके अपने गाँव में ऐसे ही संघ (विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर-पाठचक्र) बनाएँगे, और धीरे धीरे उन्हीं लोगों में शिक्षक (मानवजाति का मार्गदर्शक नेता) पैदा हो जाएंगे। कुछ ग्रामीण लड़के और लड़कियों को विद्या के आरम्भिक सिद्धान्त (मनः संयोग) सिखा दो, और अनेक उच्च भाव उनकी बुद्धि में बैठा दो। इसके बाद प्रत्येक ग्राम के किसान रुपया जमा करके अपने अपने ग्रामों में एक एक संघ स्थापित करेंगे। 
उद्धरेदात्मनात्मानम--'अपनी आत्मा का अपने उद्द्योग से उद्धार करो। ' यह सब परिस्थितियों में लागू होता हैहम उनकी सहायता इसीलिये करते हैं, जिससे वे स्वयं अपनी सहायता कर सकें।  किसान और श्रमिक समाज मरणासन्न अवस्था में हैं, इसलिये जिस चीज की आवश्यकता है, वह यह कि धनवान उन्हें अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त करने में सहायता दें और कुछ नहीं। फिर किसानों और मजदूरों को अपनी समस्याओं का सामना और समाधान स्वयं करने दो। इन उग्र दुर्भिक्ष, बाढ़, रोग और महामारी के दिनों में कहो तुम्हारे काँग्रेस वाले कहाँ हैं ? क्या यह कहना पर्याप्त होगा कि ' राजशासन हमारे हाथ में दे दो ?' और उनकी सुनेगा भी कौन ? धनवान श्रेणी के लोग दया से गरीबों के लिये जो थोड़ी सी भलाई करते हैं (फ़ूड सेक्योरिटी बिल आदि), वह स्थायी नहीं होती और अन्त में दोनों पक्षों को हानि पहुँचाती है। परन्तु तुम्हें सावधान रहना चाहिये कि ग़रीब किसान-मजदूर और धनवानों में परस्पर कहीं वर्ग-संघर्ष (class-strife ) का बीज न पड़ जाय।  यह ध्यान रखो कि धनिकों के प्रति दुर्वचन न कहो- स्वकार्यमुद्धरेत्प्राज्ञः --ज्ञानी मनुष्य को अपना कार्य अपने उद्द्योग से करना चाहिये।


[राष्ट्रसन्त तुकडोजी महाराज का एक गीत है-

 
हर देश में तू , हर भेष में तू , तेरे नाम अनेक, तू एकही है ।
  तेरी रंग भुमि यह विश्व धरा, सब खेलमें मेलमें, तु ही तो है ॥ टेक  
सागर से उठा, बादल बनके, बादल से बहा, जल हो कर के ।  
फ़िर लहर बनी नदियाँ गहरी, तेरे भिन्न प्रकार, तू एकही है ॥१॥  
चींटी से भी अणु-परमाणुबना, सब दिव्य जगत् का रूप लिया । 
 कहिं पर्वत वृक्ष, विशाल बना, सौंदर्य तेरा, तू एकही है ॥२॥ 
तेरी रंगभुमि यह विश्व धरा, सब खेलमें मेलमें, तु ही तो है ॥ टेक॥
  यह दिव्य, दिखाया है जिसने, वह है, गुरुदेवकी पूर्ण कृपा । 
तुकड्या कहे कोई न और दिखा, बस! मै और तू सब एकही है ॥३॥ 
तेरी रंगभुमि यह विश्व धरा, तेरे रूप अनेक, तु एक ही है। 
 हर देश में तू , हर भेष में तू , तेरे नाम अनेक, तू एकही है । ॥ टेक॥ ]
 
 जो जगज्जननी के इस कार्य में सहायता करेगा उस पर उनकी कृपा होगी और जो उसका विरोध करेगा वह केवल --अकारण ही दारुण वैर का आविष्कार ही न करेगा, वरन अपने भाग्य पर भी कुठाराघात करेगा। यह निश्चित रूप से जानो कि जो काम करेगा, वह मेरे सिर की मुकुट-मणि होगा। 
-----स्वामी विवेकानन्द (वि० सा ० ख० ७)  

No comments: