Saturday, November 9, 2013

“ इन्द्रिय-उच्छृन्खलता का वर्तमान संकट ”

जब किसी समाज से आध्यात्मिक चेतना का ह्रास, बहुत बड़े पैमाने पर  होने लगता है, तो वह यौन उत्पीड़न की अराजकता (sexual anarchy) का भयंकर रूप धारण कर लेता है। वर्तमान समय में (दिल्ली की निर्भया आदि) सैंकड़ो दिल दहला देने वाली घटनाओं के रूप में वही अराजकता अपने देश में भी प्रत्यक्ष दे रही है। अवचेतन मन में संचित कामुक-विकार, जब इन्द्रिय-सुखभोग को संतुष्ट करने की उत्कट लालसा के रूप में प्रकटित होता है, तो वह सम्पूर्ण समाज के नैतिक-मूल्यों तथा  बौद्धिक उर्जा को भी नष्ट कर देता है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के दिवंगत अध्यक्ष डॉ सोरोकिन [Pitirim Alexandrovich Sorokin (1889-1968) कहते हैं-  " सभ्यता का मूल है- ' परिवार-व्यवस्था' उनका टूटना; युवाओं का क्षीण शरीर और दुर्बल मन, तथा उनकी रचनात्मक शक्तियों में ह्रास - आदि लक्षण इस बलवे के किसी अन्य बगावत (या आतंकवाद) की अपेक्षा कम खतरनाक नहीं होने का प्रमाण है।”  
प्रारंभिक जीवन में डॉ सोरोकिन रूस के एक शैक्षिक और राजनीतिक ऐक्टिविस्ट थे, उन्होंने अपने जीवन के अनुभव से यह जाना था, कि “ कोई भी ‘ऐन्द्रिक संस्कृति’, (केवल इन्द्रिय सुख-भोग को ही सत्य समझकर जीने वाली संस्कृति) आदर्शवादी उत्कृष्ट सिद्धान्तों एवं संयम को त्याग देने के फलस्वरूप, उसी अनुपात में नैतिक रूप से दिवालिया भी हो जाती है। उसके उजड़े घरों और डावाँडोल पारिवारिक परिस्थितियों में पले बढ़े किशोर और युवा, अपनी अनियंत्रित इन्द्रिय लालसाओं को तृप्त करने की आत्म विनाशकारी प्रवृत्तियों से संचालित होकर, जघन्य से जघन्य अपराध करने पर भी उतारू हो जाते हैं।”  

सोरोकिन को साम्यवाद के विरुद्ध अभियान में शामिल समझकर, रूस की सरकार ने फाँसी की सजा घोषित करके, उन्हें १९१८ में ही कारागार में डाल दिया था। किन्तु बाद में लेनिन ने समाजशास्त्र में उनकी मास्टर डिग्री एवं शैक्षिक जगत में अति उच्च स्थान को देखते हुए,एक विशेष आदेश के द्वारा, उन्हें कारागार से मुक्त कर दिया था।1923 में डॉ सोरोकिन रूस छोड़, संयुक्त राज्य अमेरिका में जाकर बस गये थे। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के तात्कालिक अध्यक्ष ने 1930 में व्यक्तिगत रूप से  सोरोकिन को  40 साल की उम्र में वहाँ एक पद स्वीकार करने का अनुरोध किया था। आगे चलकर उन्होंने ही हार्वर्ड-विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना की थी।
"टेलीविजन प्रसारण के घातक प्रभाव" के उपर चर्चा करते हुए अपनी पुस्तक ‘सेन सेक्स आर्डर’ डॉ सोरोकिन कहते हैं- “ दूर-संचार माध्यम के इस नए उपकरण (टेलीविजन) की अब तक की, लगभग एकमात्र महत्वपूर्ण उपलब्धि यही रही है, कि अश्लीलता एवं हत्याओं तथा सेक्स पर आधारित धारावाहिकों एवं  विज्ञापन के द्वारा, इसने हमारे लाखों घरों को - कामवासना और नाइट क्लबों के मादक माहौल से आवेशित (charged) कर दिया है। क्योंकि या तो ऐसे प्रसारणों के उपर कोई सेंसर ही नहीं है और यदि है भी, तो अपर्याप्त है।”
इसी पुस्तक में डॉ सोरोकिन आगे कहते हैं- “ जिस सभ्य समाज ने, यौन स्वतंत्रता या ‘sexual freedom‘  को बहुत कड़ाई के साथ परिसीमित कर लिया है, उसी समाज में उच्चतम संस्कृति विकसित हुई है। सम्पूर्ण मानव इतिहास में, ऐसा एक भी दृष्टान्त नहीं मिलता जिसमें किसी समाज ने, बहुत कड़ाई के साथ जन्म से ही अपनी स्त्रियों को 'सतीत्व-पालन' या एक ही पुरुष के प्रति वफादार रहने की शिक्षा दिए बिना,  तर्कबुद्धिपरक संस्कृति (Rationalistic Culture) की ओर अग्रसर होते रहने में सफलता पायी हो। इसके अतिरिक्त किसी ऐसे संप्रदाय का भी उदाहरण भी नहीं मिलता, जिसने  अपने समाज में पहले से चली आ रही कम कठोर ‘यौन व्यवहार’ की परम्परा को बाद में, अधिक कड़े नियमों के द्वारा परिसीमित किये बिना अपनी संस्कृति के ‘उत्कृष्ट स्तर ‘ को सर्वोच्च-स्थान पर बनाये रखने में सफलता पायी हो।”
पाश्चात्य जगत में व्याप्त भोगवादी- या ‘ऐन्द्रिक संस्कृति’, के परिणाम स्वरुप ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका में हो रहे सामाजिक विघटन के चौंकाने वाले आंकड़ों को देखने से उपरोक्त दावे की सच्चाई, और अधिक स्पष्ट हो जाती है। आज के ब्रिटेन में  प्रति वर्ष १६ वर्ष से कम उम्र के एक लाख पचास हजार (१५०,०००) बच्चों का जीवन उनके माता-पिता के तलाक के कारण प्रभावित होते हैं। अविवाहित माताओं की संख्या ब्रिटेन में ईस्वी सन १९७१ से लेकर १९८९ के बीच, चार गुना बढ़ कर, तीन लाख साठ हजार (३६०,०००) हो गयी है। ब्रिटेन में विवाहित जोड़ों का शिशु जन्म दर, १९८० में १२ % से बढ़ कर, १९९० में २८ %, तथा २००० में ३० % हो गयी है। लगभग १९ % ब्रिटिश परिवारों में माता-पिता में से कोई एक ही अभिभावक होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में,
" children bearing children " या ‘ बच्चों के द्वारा बच्चों का पालन ‘ एक वास्तविक महामारी का रूप ले चुकी है, यह एक ऐसा सार्वजानिक स्वास्थ्य का संकट है, जो आम लोगों के लिये किसी बर्ड-फ्लू या स्वाइन फ्लू (avian or swine flu) जैसी महामारी की अपेक्षा अधिक बड़े  खतरे की ओर संकेत कर रही है। अमेरिका में तलाक दर दो गुना से अधिक बढ़ चूका है ४० % से अधिक बच्चों को अपने बचपन या जवानी के किसी अंश में माता-पिता में से किसी एक ही अभिभावक के साथ रहना पड़ता है।”
भोगवाद-संस्कृति के इस ऐन्द्रिक-उच्छृन्खलता को संयमित करने, तथा मानवता कि उन्नति के लिये के लिये डॉ सोरोकिन ने  मन के  ‘अतिचेतन’ अवस्था (supraconscious ) की भूमिका को समझने और व्यवहार में लाने पर सर्वाधिक जोर दिया है। इसे नहीं समझ पाने के कारण ही आधुनिक विज्ञान ने, इस अवधारणा को अभी तक न केवल पूरी तरह से नजरअंदाज है, बल्कि असत्य भी घोषित कर दिया है। किन्तु समाज की वर्तमान पतनोन्मुख अवस्था, एवं नये नये वैज्ञानिक अन्वेषणों को (God-particle आदि) देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है, कि (इक्कीसवीं सदी में ही) आधुनिक विज्ञान को अपने इस मत को अवश्य परिवर्तित करना होगा।”

४ अप्रैल, १९५७ ई० को बोस्टन में आयोजित श्रीरामकृष्ण जयन्ती के उपलक्ष्य पर,भाषण देते हुए डॉ सोरोकिन कहते हैं- " मात्र एक मनुष्य के द्वारा ब्रह्मचर्य-पालन के अभ्यास से, इतना वृहत सामाजिक लाभ उत्पन्न होता है, कि उसके प्रभाव से समूची ऐन्द्रिक संस्कृति (sensate culture) ही नष्ट होना शुरू हो जाती है। इसी प्रकार के सशक्त ब्रह्मचर्य-अनुशीलन के सर्वोच्च आधुनिक उदहारण हैं - श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द ! “ वर्तमान समय के मनुष्य-जगत में अग्रगति की जो दो बुनियादी प्रक्रिया ( Basic Processes ) चल रही है, उसके कई लक्षणों में से एक है पाश्चात्य जगत में श्रीरामकृष्ण एवं वेदान्त आन्दोलन का इतना सफल परिणाम ! इन परिवर्तनों में पहला है, मानव-जाति के रचनात्मक केन्द्र में युगान्तरकारी परिवर्तन, जो यूरोप से स्थानातरित होकर प्रशान्त महासागर और अन्ध महासागर (pacific-atlantic) के विशाल क्षेत्र में जा पहुंचा है, जबकि दूसरा ऐन्द्रिक-संस्कृति और समाज में निरंतर विघटन के साथ-साथ नयी बौद्धिक-संस्कृति और सामाजिक-व्यवस्था के आविर्भाव एवं विकास की अभिन्न दोहरी प्रक्रिया के रूप में परिलक्षित हो रहा है।” {‘World Thinkers on Ramakrishna-Vivekananda’ (Swami Lokeshwarananda, ed.Gol Park 1983. Quote from Prabuddha Bharata,Sept 1957}
 संक्षेप में कहें तो सोरोकिन, का यह मत था कि समस्त संस्कृतियाँ दो प्रकार की विचार-धाराओं ‘ऐन्द्रिक’ और ‘आध्यात्मिक’ के मध्य स्थित आदर्शवाद के परिक्रमण-काल की अवधि में सन्तुलन के साथ बँधी हुई हैं। ‘Sensate’ या ‘ऐन्द्रिक’ भाव-धारा (dominated by material concerns) के प्रभुत्व के समय, वहाँ की संस्कृति के ऊपर ‘भोगवादी विचारधारा’ हावी रहती है; और ’Ideational’ या ‘आध्यात्मिक’ भाव-धारा (dominated by spiritual concerns.) के प्रभुत्व के समय, संस्कृति के ऊपर ‘आदर्शवादी विचारधारा’ का प्रभुत्व रहता है।डॉ. सोरोकिन की दृष्टि में- “ पाश्चात्य जगत् में सदियों से ऐन्द्रिक-संस्कृति का प्रभुत्व चल रहा है, और अब वहाँ जो सामाजिक-विघटन दिखायी दे रहा है, वह इसके माध्यम से अपने खोये हुए पुनर्संतुलन को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है।”
यदि हमलोग अपने शरीर और मन (Hand-Head) को स्वस्थ रूप में विकसित करना चाहते हैं, तो शरीर-मन की समष्टि (body-mind complex) के उच्च और आधारभूत आध्यात्मिक पहलू (higher and essential spiritual dimension)- ‘ ह्रदय ‘ (Heart) के विकास के ऊपर विशेष ध्यान देना होगा। क्योंकि ह्रदय के विस्तार को उपेक्षित रखने से हम महान भारतीय संस्कृति को विघटित होने से रोक नहीं सकते है। उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये मन पर पूर्ण नियंत्रण एवं दृढ़ संकल्प निरपवाद रूप से अनिवार्य होता है। यदि हम मनुष्य-जीवन को महिमा-मण्डित करना चाहते हों, तो हमलोगों को मनुष्य के तीनों प्रमुख अवयवों - शरीर, मन और ह्रदय (3H) के सुसमन्वित विकास के लिये, एक श्रेष्ठ जीवन-पद्धति अपनानी होगी; जो कि नैतिकता के प्रति सच्ची निष्ठा के द्वारा ही नियंत्रित हो सकती है। मन को निम्नगामी बनाने वाले आवेग, और कुछ नहीं केवल, हमारे इन्द्रिय भोगों के प्रति प्रबल आग्रह को छुपाने वाले मुखौटे भर हैं। 
सबसे अधिक प्रसन्न-चित्त और समाज के लिये सर्वाधिक उपयोगी मनुष्य ( आदर्श-मानव) वही है, जिसके तीनों प्रमुख घटक, '3H' की गतिविधियों- बौद्धिक (Head-मन), नैतिक (Heart-ह्रदय, अनुभव शक्ति), और जैविक (Hand- इन्द्रिय-युक्त शरीर) का सुसमन्वित विकास हुआ हो। इन गतिविधियों की गुणवत्ता, और उनका परस्पर संतुलन, इस प्रकार के मनुष्यों (मार्गदर्शक-नेताओं) की श्रेष्ठता को स्वतः समाज में स्थापित कर देता है।”
शरीर के उपर मन का कितना प्रभाव पड़ता है; इसका वर्णन चिकित्सक डॉ. एलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक- ‘मैन, द अननोन’ में बहुत विस्तारपूर्वक किया है। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम 28 सितंबर 2013 को लखनऊ बुक फेस्टिवल, मोती महल लॉन में आयोजित 11वें पुस्तक मेले का उद्घाटन करने आए  आए थे। उन्होंने कहा कि अच्छी किताबें रचनात्मकता बढ़ाने का काम करती हैं। उन्होंने ‘Man,the unknown’ पुस्तक के विषय में कहा,  “ इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता, इसकी विरोधाभासी नियति यही है, कि उम्र बढ़ने के साथ साथ, यह और अधिक सम-सामयिक या प्रासंगिक होती जाती है।”
कलाम ने बताया कि ‘लाइट फ्रॉम मैनी लैंप’, पहली किताब है जिसे उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में पढ़ा था। इस किताब में उन महान लोगों के बारे में लिखा है, जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। दूसरी किताब उनकी मातृ भाषा (तमिल) में लिखी है, जिसकी कविताएं जीवन का मार्गदर्शन करती हैं। डॉ. एलेक्सिस लिखित ‘मैन, द अननोन’ तीसरी किताब है। कलाम बोले ये वो किताबें हैं, जिन्हें मैंने सेकंड हैंड खरीदकर पढ़ा। उन्होंने बताया कि ‘भगवद गीता’ और ‘कुरान’ से मिली शिक्षाओं को भी उसमें साझा किया गया है। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि घर में लाइब्रेरी बनाएं और कम से कम दस अच्छी किताबें जरूर रखें। इतना ही नहीं टीवी सीरियल देखने की जगह खाने की टेबिल पर या फैमिली मीटिंग में उन किताबों के कुछ पन्ने बच्चों को पढ़कर सुनाएं ताकि उनमें संस्कार और नैतिकता पैदा हो। 
पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने बताया कि सफलता हासिल करने के चार तरीके हैं। पहला जीवन में बड़ा लक्ष्य स्थापित करें। दूसरा लगातार ज्ञान अर्जित करते रहें, जो उत्कृष्ट पुस्तकों की सहायता से प्राप्त हो सकती है। तीसरा मंत्र कड़ी मेहनत और चौथा अध्यवसाय अर्थात सफलता न मिलने तक निरन्तर उसी निष्ठा के साथ मेहनत करते रहने से सफलता मिलनी तय है। उन्होंने कहा ये वे सूत्र हैं जिनको थॉमस एल्वा एडिशन, मैडम क्यूरी, सीवी रमन और राइट ब्रदर्स ने अपनाया था । कार्यक्रम में फेडरेशन ऑफ पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स एसोसिऐशन के अध्यक्ष एससी सेठी ने कहा कि कोलकाता की तरह लखनऊ पुस्तक मेला अगर देश के चुनिंदा पुस्तक मेलों में गिना जाता है तो इसे लोकप्रिय बनाने में मीडिया का अहम योगदान है। मेले के प्रबंधक मनोज सिंह चंदेल ने बताया कि प्रवेश नि:शुल्क है। सुबह 11 बजे से रात नौ बजे तक चलने वाले इस पुस्तक मेले में किताबों पर न्यूनतम 10 प्रतिशत तक छूट खरीदारों को मिलेगी]
नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. एलेक्सिस कैरेल अपनी पुस्तक ‘मैन, द अननोन’ (‘Man, the Unknown’, Dr. Alexis Carrel) कहते हैं- वैज्ञानिक मानसिकता रखने वाले मनुष्य दो अलग अलग श्रेणी के होते हैं- पहला ‘तार्किक’ (logical) और दूसरा ‘अंतर्ज्ञानी’ (Intuitive); क्योंकि अनुभव करना और जानना - दोनो  परस्पर पूर्णतया भिन्न मानसिक अवस्थायें हैं।’  संसार के जितने भी अध्यात्मिक गुरु (या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) हुए हैं, सभी महान पुरुष अन्तःप्रज्ञा (intuition) से संपन्न थे। वैसे महापुरुष बिना तथ्यों का विश्लेषण किए, बिना तर्क-वितर्क में पड़े, जो भी बातें उनके लिये आवश्यक और महत्वपूर्ण होती हैं, वह सब कुछ जान लेते हैं। क्योंकि वे सच को सीधा सकते थे ! (अर्थात आत्मसाक्षात्कार करने में समर्थ थे !)

 
Alexis Carrel (28 June 1873 – 5 November 1944)
[‘ मैन,द अननोन ’ के लेखक नोबेल पुरस्कार विजेता चिकित्सक डॉ. एलेक्सिस कैरेल फ्रांस के एक सर्जन और जीवविज्ञानी थे। अग्रणी संवहनी 'टाँका तकनीक' (Pioneering Vascular Suturing Techniques.) का आविष्कार करने के लिए उन्हें 1912 में फिजियोलॉजी या चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने चार्ल्स ए लिन्डबर्ग के साथ मिलकर 'प्रथम छिड़काव पंप' (First Perfusion Pump) का आविष्कार करने के साथ ही साथ 'अंग प्रत्यारोपण' (Organ Transplantation) के लिए रास्ता भी खोल दिया था।]
वे आगे कहते हैं - "आज तक विश्व की मानवता, सदैव कुछ उन मुट्ठीभर असामान्य व्यक्तियों के जुनून के द्वारा ही प्रगति के पथ पर अग्रसर होती रही है, जिन्होंने अपनी बुद्धि की प्रखरता, विज्ञान के आदर्श, तथा ज्ञानदान और चारित्रिक सौंदर्य से इसे समृद्ध किया है। भीड़ के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों से, मानवता को, कभी कुछ प्राप्त नहीं हुआ है। अत्यधिक सुसंस्कृत, सभ्य, या जीवन-मुक्त (स्थितप्रज्ञ intuitive) मनुष्यों के ‘ will and intelligence’ या ‘संकल्प और बुद्धिमत्ता ’ में कोई अन्तर नहीं होता। दोनों एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये कार्य करते हैं।" 
जब किसी मनुष्य की ‘ इच्छा-शक्ति और बुद्धिमत्ता अर्थात विवेक-प्रयोग क्षमता’ एक ही दिशा में कार्यरत रहती हैं, तब उस मनुष्य के चरित्र में समस्त गुण, सारे नैतिक मूल्य स्वतः उपस्थित हो जाते हैं। किन्तु ‘दायित्व-बोध ‘ की ऐसी विशिष्टता केवल कुछ (चुने हुए) मनुष्यों की एक छोटी सी संख्या में ही पाया जा सकती है। वैसा  मनुष्य  अपने स्वार्थ और ईर्ष्या-द्वेष से छुटकारा पाने के लिए, एक ही परिस्थिति में विवेक-प्रयोग करके, कई संभव कृत्यों के बीच, वह जिसे अच्छा समझता है उसका चयन करने में सक्षम होता है।  फिर दृढ़ इच्छा-शक्ति की सहायता से, उन नियमों या अनुशासनों को खुद पर लागू करने की नैतिक जिम्मेदारी उस व्यक्ति की अपनी इसी विवेकप्रयोग-क्षमता के समतुल्य ही होती है। यह क्षमता ही उसमें कर्तव्य-बोध, दायित्व की भावना को पैदा करता है।
 यह कर्तव्य-बोध ही हमें श्रेय-प्रेय (सही-गलत) को अलग-अलग पहचानने, फिर प्रेय (गलत) को वरीयता न देकर श्रेय (सही) चयन करने के लिए अनुप्रेरित करता है केवल एक व्याख्यान-माला को सुन लेने से ही, कोई व्यक्ति श्रेय को प्रेय से अलग करने, या अश्लीलता में भी सौन्दर्य को अलग करने वाली- ‘विवेक-दृष्टी‘ को प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिये छात्रों को व्याकरण, विज्ञान, गणित, और इतिहास की शिक्षा देने के साथ ही साथ, चरित्र-निर्माण, जीवन-गठन की कला, नैतिकता और धर्म (आध्यात्मिकता) आदि को, अनिवार्य विषय के रूप में सिखाया जाना अनिवार्य होना चाहिये।
महान चिकित्सक डॉ. एलेक्सिस कैरेल अपनी पुस्तक ‘ मैन, द अननोन ’ में  कहते हैं- “ किसी भी बीमारी की स्थिति में, मन एवं शरीर दोनों का इलाज एक साथ करना चाहिये, क्योंकि दोनों एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। आप एक का इलाज करते हुए दूसरे की उपेक्षा नहीं कर सकते। आधुनिक समाज में नैतिक भावना को लगभग पूरी तरह से नजर-अंदाज कर दिया गया है। विद्यार्थियों को मन को वश में रखने या मन को एकाग्र करने कि पद्धति से कुछ भी परिचय नहीं कराया जाता है। आज का युवा वर्ग यह देखता है कि आज के समाज में नेता या किसी अमीर अधिकारी को समस्त अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। वह बिना किसी हिचक के, अपने सगे-संबन्धियों या दोस्तों के नजर में गिरे बिना, - अपनी उम्र-दराज या प्रौढ़ पत्नी को त्याग सकता है, अपने बूढ़े माँ-बाप को गरीबी भोगने पर विवश कर सकता है, जो धन और पद उसे आम-जनता के कल्याण के लिये सौंपा गया था, उसका उपयोग वह उन्हीं लोगों को लूटने के लिये कर सकता है।
भोगवादी संस्कृति के दुष्प्रभाव के कारण स्त्री-पुरुष के यौवन सम्बन्धों में नैतिकता के लिये कोई स्थान नहीं बचा है। Minister या पादरी  ने धर्म के आध्यात्मिक स्वरुप को बिल्कुल नष्ट कर दिया है, और धर्म को युक्तिसंगत दुकानदारी में बदल दिया है। वैसे पाखण्डी धर्म-गुरु व्यर्थ के खोखली नैतिकता के उपदेश देकर भी, आधुनिक युवाओं  को अपनी ओर आकर्षित कर पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं, इसीलिये वहाँ के चर्च लगभग खाली ही रहते हैं। देश को लूटने वाले चोर-बदमाश निश्चिन्त होकर अपनी समृद्धि का आनंद ले रहे हैं। अपराधी लोग, नेताओं के द्वारा संरक्षित है; और न्यायाधीशों के द्वारा उनका सम्मान किया जाता है। सिनेमा-सीरियल आदि में उन्हीं की प्रशंसा होते देखकर, आज के बच्चे उन्हीं को अपना आदर्श-नायक मान कर, खेलने के दौरान उनकी ही नकल किया करते हैं। “
 डॉ. एलेक्सिस कैरेल कई असाध्य और साधारण रोगियों को प्रार्थना के माध्यम से पूर्णत: स्वस्थ कर चुके हैं। आयुष विज्ञान के अनुसार जप-ध्यान करके भी स्वस्थ रहा जा सकता है। उनके अनुसार प्रार्थना करने से बीमार व्यक्ति भी स्वस्थ हो जाता है। सुख, समृद्धि, विद्या, बुद्धि और एकाग्रता बढ़ जाती है। यही वजह है कि हमारे यहां हर कार्य के पहले ईश्वर से प्रार्थना की जाती है। अब तो आधुनिक वैज्ञानिक भी प्रार्थना के पक्ष में बोलने लगे हैं।अमेरिका के नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ हेल्थ रिसर्च का दावा है कि मनःसंयोग और प्रार्थना करने वाले बच्चों, वयस्कों एवं बूढ़ों में निराशा, अवसाद और आत्महत्या की प्रवृति नहीं पनपती है तथा उन्हें हार्ट अटैक एवं उच्च रक्तचाप की बीमारी भी कम होती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रो. ग्रे जैकब ने तो अपने शोध में यह भी दावा किया है कि प्रार्थना करने से तनावकारी हार्मोस कम हो जाते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और मन और मस्तिष्क रोग अधिकारों से मुक्त होने लगते हैं।
‘मैन, द अननोन’ के लेखक डॉ. एलेक्सिस कहते हैं - " साहचर्य के नियमानुसार - अपराधियों या मूर्खों की संगति में रहने वाला जीवन, क्रमशः आपराधि या एक मूर्ख ही बन जाता है। कुसंग का त्याग कर, अकेले रहते हुए ब्रह्मचर्य का अभ्यास करने से ही मोक्ष की उम्मीद की जा सकती है। जो व्यक्ति (सत्यार्थी) उस परम-सत्य (ब्रह्म) का साक्षात्कार या अवलोकन करना चाहता है, उसे पहले अपने मन की वृत्तियों को शान्त करना होगा। उसका मन बिल्कुल किसी शान्त सरोवर  के स्थिर जल के जैसा होना चाहिये।"
जीवन-गठन का सरल उपाय बतलाते हुए महान चिकित्सक डॉ. एलेक्सिस कैरेल अपनी पुस्तक ‘ मैन, द अननोन ’ में  कहते हैं- "जीवन को सुन्दर रूप में गठित करने के लिये,  इच्छा-शक्ति और बुद्धिमत्ता ( या संकल्प और विवेक-प्रयोग की क्षमता) को एक ही दिशा में कार्यरत रखना होगा। मन को किसी ऐसे सर्वोत्कृष्ट वस्तु या लक्ष्य पर एकाग्र रखने का अभ्यास करना होगा- जिससे समस्त शक्तियाँ निकलती है, जो समस्त शक्तियों का केन्द्र है; जो सभी वस्तुओं का उद्गम-स्थान है। और आध्यात्मिक गुरु जिसे भगवान या ब्रह्म कहते हैं। 'To progress again, man must remake himself'. -- फिर से उन्नत मनुष्य बनने के लिए, व्यक्ति को स्वयं का पुनर्निर्माण (रीमेक) करना चाहिये चाहिए, अर्थात अपने जीवन को नये सीरे से गढ़ना चाहिये ! हमलोग यह जानते हैं, कि बिना थोड़ा कष्ट उठाये हम अपने जीवन को सुन्दर ढंग से नहीं गढ़ सकते। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही ‘संगमरमर’ और ‘मूर्तिकार’ दोनों है ! इसलिये यदि हमलोग अपने वास्तविक-चेहरे (यथार्थ-स्वरुप) को अनावृत करना चाहते हों, तो हमें अपने इन्द्रिय-जीवन से पाशविक-आसक्ति (देहाध्यास) को या ‘अहं’  को, अपने ही हथौड़े (निर्मम विवेक-प्रयोग) के भारी चोट से, चकनाचूर करना पड़ेगा।”
स्वामी विवेकानन्द लन्दन में दिए गये भाषण ‘ मनुष्य का यथार्थ स्वरुप ‘ में कहते हैं- “ मनुष्य इस पंचेन्द्रिय-ग्राह्य जगत से बहुत आसक्ति के साथ चिपके रहना चाहता है। यह आपात-प्रतीयमान व्यक्तित्व वास्तव में केवल एक भ्रम ही है ! इस भ्रमात्मक व्यक्तित्व में असक्त रहना अत्यन्त नीच कार्य है।…आत्मत्याग का अर्थ है, इस मिथ्या ‘ मैं ‘-पन या व्यक्तित्व का त्याग, मिथ्या अहं का त्याग, सब प्रकार के स्वार्थपरता का त्याग। यह अहंकार और ममता पूर्व जन्म के कुसंस्कारों के फल हैं, और जितना ही इस व्यक्तित्व का त्याग होता चला जाता है, उतनी ही आत्मा अपने नित्य स्वरुप में, अपनी पूर्ण महिमा में अभिव्यक्त होती है।
यह ‘ मैं और मेरा ‘ यथार्थ आत्मा नहीं है, किन्तु केवल एक सीमाबद्ध भ्रम है, यह जानकर हमें इस मिथ्या व्यक्तित्व को त्याग देना चाहिये। हम देखते हैं, सब लोग सुख की खोज करते हैं; पर अधिकतर लोग नश्वर, मिथ्या वस्तुओं में उसको ढूंढ़ते फिरते हैं। इन्द्रियों में कभी किसी को सुख नहीं मिलता। सुख तो केवल आत्मा में है।” (२/१-१६)
ब्रह्मचर्य-पालन उस मानसिक और शारीरिक पवित्रता को सुनिश्चित कर देता है, जो मनुष्य-जीवन के आध्यात्मिक लक्ष्य को कार्यान्वित करने के लिये नितान्त आवश्यक है। मानसिक और शारीरिक रूप से दक्ष (proficient) व्यक्ति यदि अपने आध्यात्मिक लक्ष्य अनुसरण करना चाहते हों, तो उन्हें बहुत गम्भीरता के साथ जीवन के उपर अपने विचारों के प्रभाव (impact of thought evaluation) का मूल्यांकन करते हुए, अपनी काम-उर्जा को आध्यात्मिक उर्जा, या ओजस में रूपान्तरित (sublimate) कर देने का अंतिम निर्णय लेना ही होगा।
आदि गुरु शंकराचार्य ने कहा है- हमारे विचार और चिन्तन ही हमारे जीवन को जबर्दस्त (आश्चर्यजनक) रूप से प्रभावित करते हैं। भोगवादी ऐन्द्रिक संस्कृति के साथ सम्बद्ध कामुक विचारों के प्रकोपों से ‘ मन, वचन, कर्म में निरन्तर पवित्रता ’ ही हमारी रक्षा करती है। यदि हम, ईश्वर की अनुभूति या साक्षात्कार करना चाहते हों, तो हमें अध्यात्मिक जीवन जीने की कला सीखनी होगी। और इसी एकमात्र आध्यात्मिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये हमें अपनी मूल-शक्ति (कामशक्ति) का नियन्त्रण कर उसे पूर्णतया आध्यात्मिक उर्जा में रूपान्तरित कर देना होगा। 
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