Saturday, November 23, 2013

6. ओजस की आध्यात्मिक उर्जा ( ‘ The Spiritual Energy of Ojas ‘) ( स्वामी तथागतानन्द की रचना ' The Value Of Brahmcharya' पर आधारित)

' यौनशक्ति का ओजस शक्ति में उदात्तीकरण'
ओजस-प्रभामंडल ही मानव-जाति के किसी सच्चे मार्गदर्शक “नेता” (आध्यात्मिक शिक्षक) की पवित्र पहचान होती है। ओजस उन पवित्र व्यक्तित्व-सम्पन्न महापुरुषों का असंदिग्ध संकेत-चिन्ह (signpost) है जिनकी मिठास हमें बरबस ही अपनी ओर बिना किसी स्पष्ट कारण के ही आकर्षित कर लेती है। गृहस्थों के लिये ब्रह्मचर्य का अर्थ है, गृहस्थ जीवन में अपने जीवन साथी के साथ पूर्ण वफ़ादारी निभाते हुए, अपनी धर्मपत्नी के सिवा दुनिया के अन्य सभी स्त्रियों को अपनी माता के रूप में देखना ! महामण्डल के गृहस्थ युवा कर्मी को अपने दैनन्दिन जीवन में इस ब्रह्मचर्य (यम-नियम) का अनुपालन अवश्य करना चाहिये। इसमें सफलता से साधक योग के उच्च सोपानों पर चढ़ता है तथा  उसे आत्मा की प्रसुप्त शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। उसके मन की चंचलता समाप्त होती है तथा यौनशक्ति का ओजस शक्ति में उदात्तीकरण हो जाता है।
'राज-योग' नामक ग्रन्थ में अध्यात्मिक प्राण का संयम (The Control Of Psychic Prana)   के विषय पर प्रवचन देते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- “ सबसे नीचे वाला चक्र ही समस्त समस्त शक्ति का अधिष्ठान है, और उस शक्ति को उस जगह से उठाकर मस्तिष्क में स्थित सर्वोच्च चक्र पर ले जाना होगा। योगी दावा करते हैं कि मनुष्य-देह में जितनी शक्तियाँ हैं, उनमें ‘ओज‘ सबसे उत्कृष्ट कोटि की शक्ति है। यह ओज मस्तिष्क में संचित रहता है। जिसके मस्तक में ओज जितने अधिक परिमाण में रहता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान और आध्यात्मिक बल से बली होता है। एक व्यक्ति बड़ी सुन्दर भाषा में सुन्दर भावों को लोगो के समक्ष रखता है, परन्तु लोग आकृष्ट नहीं होते। और दूसरा व्यक्ति न सुन्दर भाषा बोल सकता है, न सुन्दर ढंग से भाव व्यक्त कर सकता है, परन्तु फिर  लोग उसकी बात से मुग्ध हो जाते हैं। वह जो कुछ कार्य करता है, उसीमें महाशक्ति का विकास देखा जाता है। ऐसी है ओज की शक्ति ! (वि० १/८१)“
जो लोग ईश्वर का साक्षात्कार या आत्मा कि अनुभूति करना चाहते हैं, उनके लिये ब्रह्मचर्य कि शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। उन्हें मन, वचन कर्म से पवित्रता में पूर्णतया अवस्थित रहना चाहिये, उनका ह्रदय और मन बिल्कुल शुद्ध रहना आवश्यक है।
 स्वामीजी ब्रह्मचर्य के ऊपर जोर देते हुए आगे कहते हैं, " यह ओज, थोड़ी-बहुत मात्रा में,सभी मनुष्यों में विद्द्यमान है। शरीर में जितनी शक्तियाँ क्रियाशील हैं, उनका उच्चतम विकास यह ओज है। यह हमें सदा याद रखना चाहिये कि सवाल केवल रूपान्तरण का है- एक ही शक्ति दूसरी शक्ति में परिणत हो जाती है। आज जो शक्ति पेशियों में कार्य कर रही हैं, वे ही कल ओज के रूप में परिणत हो जायेंगी। योगीयों का यह दावा है, कि मनुष्य में जो शक्ति काम-क्रिया, काम-चिन्तन आदि रूपों में प्रकाशित हो रही है, उसका दमन या नियंत्रण करने पर वह सहज ही आध्यात्मिक शक्ति या ‘ओज’ में परिणत हो जाती है। और हमारे शरीर का सबसे नीचेवाला केन्द्र, ‘ मूलाधार ’ ही इस शक्ति का नियामक होने के कारण योगी इसकी ओर विशेष रूप से ध्यान देते हैं। वे सारी काम-शक्ति को ओज में परिणत करने का प्रयत्न करते हैं।"(१/८१-२) 
'राजयोग -शिक्षा' में ओजस पर दिए गये प्रवचन में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " ओजस् उसे कहते हैं, जो एक मनुष्य को दूसरे से भिन्न बनाता है। जिस मनुष्य में विपुल ओजस् होता है, वह जननेता होता है। ओजस् प्रबल आकर्षण-शक्ति प्रदान करता है। 


 

ओजस् का निर्माण नाड़ीय प्रवाहों से होता है। इसकी विचित्रता यह है कि उसका निर्माण उस शक्ति द्वारा बड़ी सरलता से होता है, जिसकी अभिव्यक्ति यौन शक्ति में होती है। यदि यौन केन्द्रों की शक्तियों का व्यर्थ में क्षय और अपव्यय न हो, (भाव की स्थूलतर अवस्था ही क्रिया है) तो उनको ओज में परिणत किया जा सकता है।
शरीर के दो प्रमुख नाड़ीय प्रवाहों का उद्गम मस्तिष्क से होता है, वे सुषुम्णा के दोनों और से नीचे, मस्तिष्क के पृष्ठ भाग में अंग्रेजी के अंक ‘8’ के आकार में परस्पर काटती हुई नीचे जाती है। चेतन और अवचेतन मन इन्हीं दो नाड़ीयों के माध्यम से कार्य करती है। लेकिन जब अतिचेतना परिपथ के निचले छोर में पहुँच जाती है, तो नाड़ी-प्रवाह को उपर जाने तथा परिपथ पूरा न करने देकर, उसे रोक देती है, तथा मूलाधार से ओजस के रूप में सुषुम्णा मार्ग से उपर जाने के लिये विवश करती है। सुषुम्णा का द्वार स्वभावतः बन्द है। लेकिन इस ओजस का मार्ग बनाने के लिये उसे खोला जा सकता है। जब ओजस सभी चक्रों को पार करता हुआ सहस्रार (या पीनियल ग्रंथि : मस्तिष्क का एक भाग, जिसके बारे में विज्ञान यह निर्णय नहीं कर पाता कि उसका क्या काम है) में पहुँच जाता है, तन मनुष्य न तो शरीर रह जाता है, न मन। वह सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है।(४/९९-१००)

 

स्वामीजी ने अध्यात्मिक प्राण का संयम के विषय पर बोलते हुए प्रारम्भ में ही, बिना गुरु के सानिध्य में प्राणायाम करने से सावधान करते हुए कहा था, " यद्दपि मेरु-रज्जू (spinal cord) मेरुदण्ड (vertebral column) से संलग्न नहीं है, फिर भी वह मेरुदण्ड के भीतर है। टेढ़ा होकर बैठने से वह अस्त-व्यस्त हो जाती है।” इसलिये वक्ष, ग्रीवा और मस्तक -सदा एक रेखा में ठीक सीधे रखने होंगे। जिस प्राणायाम में साँस भीतर रोकनी पड़ती है, उसका अधिक अभ्यास अच्छा नहीं है। अनियमित रूपसे साधना करने पर (बिना गुरु के साधना करनेपर) तुम्हारा अनिष्ट भी हो सकता है।" (१/७८,८०) 
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने अपने बाल्य-सखा श्री प्रियनाथ सिन्हा से वार्तालाप के क्रम में, विद्यार्थियों के लिये भारत के प्राचीन आदर्श, गुरु-गृहवास की प्रथा एवं ब्रह्मचर्य के साथ पाश्चात्य विज्ञान युक्त वेदान्त, को आधुनिक शिक्षा-पद्धति में जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं - “ पहले हमें गुरु-गृहवास और उस जैसी अन्य शिक्षा-प्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा। आज हमें आवश्यकता है वेदान्त-युक्त पाश्चात्य विज्ञान की, ब्रह्मचर्य के आदर्श, विवेक, श्रद्धा तथा आत्मविश्वास की।” (८/२२९) 
किन्तु उन विवाहित या गृहस्थ युवाओं को, जो भावी मार्गदर्शक नेता (Hero- या जन-नायक!) बनकर महामण्डल के चरित्र-निर्माण आन्दोलन को भारत के गाँव गाँव तक पहुँचा देने के व्रती बनना चाहते हों, उन्हें सावधान करते हुए स्वामीजी पुनः कहते हैं, " केवल कामजयी स्त्री-पुरुष ही इस ओज को मस्तिष्क में संचित कर सकते हैं। इसीलिये ब्रह्मचर्य को ही सदैव सर्वश्रेष्ठ नैतिक-सद्गुण या धर्म माना गया है। मनुष्य स्वयं अनुभव करके देख सकता है कि ‘ if he is unchaste ‘ अगर वह व्यभिचारी या कामुक हो, तो उसकी सारी आध्यात्मिकता नष्ट हो जाती , चरित्र-बल और मानसिक तेज चला जाता है। इसी कारण, देखोगे, संसार में जिन जिन सम्प्रदायों में बड़े बड़े धर्मवीर पैदा हुए हैं, उन सभी सम्प्रदायों ने ब्रह्मचर्य पर विशेष जोर दिया है। इसी लिये तो निवृत्ति-मार्गी या विवाह त्यागी संन्यासीयों की उत्पत्ति हुई है। इस ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से - तन-मन-वचन से -- पालन करना नितान्त आवश्यक है। ब्रहचर्य के बिना राजयोग की साधना बड़े खतरे की है; क्योंकि उससे अन्त में मस्तिष्क का विषम विकार (उसका दिमाग खराब भी हो सकता है) पैदा हो सकता है । यदि कोई राजयोग का अभ्यास करे और साथ ही अपवित्र जीवन-यापन करे (अर्थात अपने जीवन साथी के प्रति वफ़ादार नहीं हो), तो वह भला किस प्रकार योगी होने की आशा कर सकता है? “ (१/८१-८२)
लाखों गृहस्थ, भगवान में गहरा और स्थायी विश्वास उत्पन्न करने के लिये ईमानदारी से कुछ न कुछ प्रयास अवश्य करते हैं। एक सार्थक और शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त करने के लिये, आध्यात्मिकता का विकास करने के लिये प्रतिदिन संघर्ष करते हैं। जब हम भगवान के साथ घनिष्ट सम्बंध स्थापित कर लेते हैं, तभी आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होती है। इसीलिये, प्रत्येक दम्पति को, पारिवारिक जीवन के किसी विशेष चरण में (हो सके तो कम से कम सेवानिवृत होने के बाद), दुनियावी प्रेम-सम्बंध का उदात्तीकरण (sublimation) करके, अपने प्रपंची जीवन से निर्लिप्त होकर, भगवान के साथ आध्यात्मिक-घनिष्टता को विकसित करने पर अपना ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिये। जब किसी दम्पति के जीवन में ऐसी प्रतिबद्धता दिखाई देती हो, वैसे विवेक-शील दम्पतियों को आत्मसंयम  (ब्रह्मचर्य continence) का पालन करने की सलाह दी जा सकती है।
श्रीरामकृष्ण उन गृहस्थ दम्पतियों की प्रशंसा किया करते थे, जो दो-तीन बच्चे हो जाने के बाद अपने काम-इच्छा का नियंत्रण करते हैं, और एक-दूसरे को बहन-भाई की दृष्टि से देखते हैं। अपवित्र विचार की शक्तियों का सामना करने के लिये, तथा मन को शुद्ध विचारों से परिपूर्ण रखने के लिये, वे अपने कुछ भक्तों को ईश्वर का नाम (?) जपने का परामर्श देते थे।
कार्ल जुंग अपनी पुस्तक ‘ मॉडर्न मैन इन सर्च ऑफ़ सोल ‘ (Modern Man in Search of a Soul या आत्मा की खोज में आधुनिक मनुष्य ) में आत्मसंयम के विषय में अपना मत व्यक्त करते हुए कहते हैं, “३५-४० वर्ष की उम्र हो जाने के बाद, हमलोगों को सांसारिक भोगों से मुख मोड़ कर सांस्कृतिक उन्नति पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये- जिसका अर्थ होता है, अन्तर्निहित आत्मा की खोज में लग जाना।“
इस प्रकार हम समझ सकते हैं, कि ब्रह्मचर्य या आत्मसंयम की आवश्यकता केवल योगियों के लिये  ही नहीं, बल्कि उन सभी गृहस्थ लोगों के लिये भी है, जो स्वस्थ और सुखी जीवन जीना चाहते हों। यद्दपि जो लोग आध्यात्म-मार्ग के जिज्ञासु (सत्यार्थी) उनके लिये तो यह सबसे अधिक मूल्यवान  है।
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