Friday, September 14, 2012

$$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना-[21] ' चरित्र-निर्माण में शिक्षा की भूमिका '' शिक्षा : समस्त रोगों का रामबाण ईलाज है,

'समाज-सेवा के तीन स्तर '
श्रीरामकृष्ण की एक प्रसिद्द उक्ति है- " जावत बाँची तावत सीखी " ( जीवन के अंतिम क्षण तक सीखने की चेष्टा करनी चाहिये।) 'शिक्षा' उस संयम का (मनःसंयम आदि ५अभ्यास का) नाम है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी 'इच्छाशक्ति' के विकास और प्रवाह को नियंत्रित करके उसे फलप्रद बनाने में (मिथ्या अहं को हटाकर आत्मविशास आदि चरित्र के २४ गुणों को अभिव्यक्त करने में) सक्षम हो जाता है। आज हमारे समाज की जो असहनीय परिस्थिति बन गयी है, वह हमलोगों के द्वारा ही बनाई गयी है। हमलोगों ने जैसी शिक्षा प्राप्त की है, उसी शिक्षा ने हमारी इस वर्तमान परिवेश का निर्माण किया है। कोई मनुष्य, किस प्रकार अपना सुन्दर 'चरित्र-गठन ' करके, अपना और दूसरों का कल्याण करने में सक्षम (नेता-समाजसेवी) बन सकता है-- छात्रों को उसका उपाय बता देना ही शिक्षा का अभीष्ट है। 
अतः शिक्षा के अन्तर्गत ' पारस्परिक-सम्बन्ध ' (Correlation) और ' पारस्परिक-श्रद्धा ' (Mutual respect) के उपर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। ये दोनों गुण स्वार्थ-हीनता से प्राप्त हो सकते हैं। नैतिकता का दूसरा नाम ही स्वार्थहीनता है। (अतः मॉरल-एजुकेशन या नैतिक-शिक्षा का अर्थ हुआ, निःस्वार्थपर बनने की शिक्षा।)  स्वार्थ से प्रेरित होकर जो भी कार्य  किया जायेगा, वह कभी नैतिक नहीं हो सकता। क्योंकि जैसे ही व्यक्ति अपने स्वार्थ को प्रश्रय देना चाहेगा, तत्काल बराबरी या प्रतिस्पर्धा (competition) का प्रश्न भी उठ खड़ा होगा। और इसके फलस्वरूप उसकी सम्पूर्ण शक्ति संघर्ष और घृणा में बर्बाद होने लगती है। इसलिये जो शिक्षा उपरोक्त दोनों विषयों का ध्यान नहीं रखती हो, वह शिक्षा-व्यवस्था व्यर्थ है। यथार्थ शिक्षा हमलोगों के चलने, बोलने, कार्य करने, इत्यादि समस्त हावभाव को ' मानवोचित-ढंग ' से निर्देशित करेगी। यथार्थ शिक्षा (इच्छाशक्ति का संयम) ही हमारी समस्त शक्तियों (मानसिक -वाचिक -दैहिक) को सही दिशा -चरित्रवान मनुष्य बनने की दिशा में निर्देशित रख सकती है। 
उपयुक्त शिक्षा (५ दैनन्दिन अभ्यास का प्रशिक्षण) ही हमलोगों के चरित्र-निर्माण में सहायक होती है।क्योंकि यथार्थ शिक्षा की बुनियाद एक सकारात्मक सोच (Positive thinking) पर आधारित होती है। और वह बुनियादी सिद्धान्त यह है, कि यदि हमलोग अपने मन के ऊपर अधिकार रखने में समर्थ मनुष्य नहीं बन सके, तो हम अपने मन में उठने वाले विचारों को अपनी प्रयोजनीयता और इच्छानुसार चित्त पर बने विवेकपूर्ण 'गहरी लकीर' (Rut) से होते हुए निरन्तर प्रवाहित भी नहीं रख पायेंगे। 
मनुष्योचित-चरित्र गठित हो जाने के बाद ही कोई व्यक्ति अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति सही रूप में जागरूक हो सकता है। हर समय केवल अपने अधिकार की बात सोंचते रहने से कोई परिवार, समाज या देश सुचारू रूप में नहीं चल सकता। कर्तव्य की परवाह किये बिना किसी को भी उसका उचित अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता है। हमारे मानवोचित या विवेकपूर्ण कर्तव्य के द्वारा ही समाज में नैतिक-मूल्यों की स्थापना हो सकती है। [ गीता ३/१०-११ में भगवान स्वयं कहते हैं -
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।
केवल स्वयं को लेकर व्यग्र रहने के लिये कोई मनुष्य धरती पर नहीं आया है।हमलोग सभी के लिये हैं और प्रत्येक व्यक्ति दूसरों का हित करने के लिये है। (परस्परम्  भावयन्तः श्रेयः good? परम् the highest? अवाप्स्यथ shall attain.) प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्यों को समाजबद्ध प्राणी के रूप में सृष्टि करने के बाद कहा था- परस्पर की सहायता एवं मनोभावों के आदान-प्रदान के माध्यम से हम लोग स्वार्थी न बनकर समाजकेन्द्रित, देशकेन्द्रित और विश्वकेन्द्रित होने की शिक्षा प्राप्त करते हैं।  
पूरे राष्ट्र या विश्व का कल्याण करने के लिये अनेकों चरित्रवान मनुष्यों की सहायता आवश्यक है। बहुत से लोगों के (शरीर-मन-हृदय '3H' ) की शक्ति के एकत्र होने पर महान कार्य सम्पन्न होता है। इस तरह की संघ-शक्ति वैसे पशुओं में भी दिखाई देती है, किन्तु उनकी दलबन्दी केवल आत्मरक्षा के लिये है, परस्पर के हीत के लिए नहीं। ब्रह्मा की व्यवस्था में कोई भौगोलिक सीमा-रेखा नहीं है, इन शब्दों के भीतर हम विश्वमानवता की झंकार सुनते हैं। ]
हमलोगों का पहला कर्तव्य है, दूसरों का सुख, दूसरों के कल्याण के बारे में सोचना। इसीके माध्यम से हम समाज के प्रति जागरूक बनते हैं। समाज के कल्याण के प्रति जागरूक बनने से ही हमलोग अपना अधिकार अर्जित कर सकेंगे। यदि काम करने ही नहीं गये, तो वेतन कैसे मिलेगा ? उसी प्रकार यदि परस्पर के प्रति कोई कर्तव्य-बोध ही नहीं रहे तो, हमें अधिकार कौन देगा ? मेरा जो कर्तव्य है, उसका पालन यदि मैं नहीं करूँ, तो मुझे अधिकार क्यों मिलना चाहिये ? कर्तव्य-बोध की शिक्षा नहीं प्राप्त होने से, हमारा चरित्र-निर्माण नहीं हो सकता। यदि हमलोग सचमुच अपने समाज और देश का निर्माण करना अपना दायित्व समझते हों, तो हममें से प्रत्येक को दूसरों के लिये अपने स्वार्थ का त्याग करना सीखना होगा और सर्वप्रथम स्वयं एक चरित्रवान ' मनुष्य' बनना पड़ेगा। 
मानव-कल्याण या समाज-सेवा के विभिन्न स्तर हैं। अन्नहीन को अन्न का दान करना, जिसके सिर पर छत नहीं है, उसके लिये आवास का निर्माण कर देना, ये सभी बहुत अच्छे कार्य हैं। किन्तु यह कार्य हमारे अन्दर (धर्म) कर्तव्य-बोध जाग्रत होने के बाद कर्म करने का पहला सोपान है। इसके बाद का, दूसरा सोपान होगा, मनुष्य को उसकी मानसिक संपदा (उच्च भावों, या विवेक-प्रयोग की शक्ति) से समृद्ध करना। फिर समाज-सेवा का उच्चतम स्तर है, उसको उसकी अध्यात्मिक संपदा का प्रति जाग्रत कर देना। यही सबसे बड़ी समाज- सेवा है। 
हम लोगों के पास जो अत्यन्त दुर्लभ किन्तु स्वाभाविक संपदा (त्रय दुर्लभमं) है, उसके बारे में कुछ नहीं जानने से हम उसे व्यर्थ में गवाँ देंगे। जब हमलोग अपनी अध्यात्मिक संपदा का आविष्कार कर लेंगे, तब हम इस बात को जान लेंगे कि, हम सभी लोगों का अस्तित्व अलग अलग नहीं है, बल्कि हमसभी लोगो के भीतर एक आन्तरिक एकत्व का सूत्र (आत्मा) पिरोया हुआ है। (जैसे रंग-बिरंगे फूलों की माला में धागा पिरोया होता है) इस समझ के प्राप्त होते ही हमलोग अध्यात्मिक दृष्टि से एकात्मता-बोध (अध्यात्मिक संपदा) अर्जित कर लेंगे। इसीलिये हमारी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है-' Heart ' या ह्रदय का विकास।  या सर्वोच्च स्तर की समाज-सेवा है - मनुष्य की ' अध्यात्मिक-दृष्टि ' को जाग्रत कर देना।  इसके बाद एक सीढ़ी नीचे उतर कर पहले उच्च-भावों से या पवित्र-विचारों से अपने मन को परिपूर्ण कर लेना होगा। इसी को मन की शक्ति 'Head' का विकास या ' मन को प्रशिक्षित करना ' कहते हैं।
 [निरन्तर विवेक-प्रयोग करते हुए अपनी बुद्धि को 'व्यवसायात्मिका बुद्धि '(अर्थात एकनिष्ठ बुद्धि) में परिणत कर लेना होगा। अस्थिर चित्त वाले सकाम व्यक्तियों के मन हजारों विषयों में फ़ैल जाते हैं, इस कारण शक्ति का वृथा क्षय हो जाता है। इसलिये हे अर्जुन,' व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। (गीता 2/41)'  सकाम व्यक्तियों की बुद्धि इस लोक तथा परलोक की अनेक प्रकार की भोग्य वस्तुओं को पाने के लिए दौड़ती रहती है। किन्तु एकमात्र ब्रह्म को अपनी आत्मा-रूप से जानने पर ही परम शान्ति मिलती है। निष्काम कर्म के द्वारा यह बात अच्छी तरह समझ लेने के बाद मन में केवल सद-विचारों (शिव-संकल्प) को उठने देने की निश्चयात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है।] इसके और एक सीढ़ी नीचे उतर कर हम लोग शारीरिक व्यायाम और पौष्टिक आहार द्वारा अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट बना कर, अपनी शारीरिक शक्ति या 'Hand' की शक्ति का विकास कर सकते हैं।
इस प्रकार ('3H'- की शक्ति) का प्रयोग करके हमलोग अपना एवं दूसरों के आभाव को दूर करने का प्रयत्न करेंगे। मनुष्य का चरित्र विवेक-प्रयोग करके मन को सर्वदा उच्च भावों या अच्छे विचारों से परिपूर्ण रखने का अभ्यास करते रहने से  कैसे गठित हो जाता है ? कोई व्यक्ति किसी विशेष परिस्थिति में किस प्रकार का आचरण करेगा, यह निर्भर करता है- उसका विवेक-प्रयोग अभ्यास किस प्रकार का है उसके उपर।  किसी निर्जन स्थान में कोई मूल्यवान वस्तु गिरी हुई देखने से, कोई व्यक्ति नजरें बचाकर उसे अपने अधिकार में लेने की चेष्टा करेगा, और कोई दूसरा व्यक्ति उसके असली मालिक को वापस करने की चेष्टा करेगा। 
हमारा मन बहुत हद तक किसी कैमरे के समान है। जिस वस्तु के सामने कैमरा रखा होगा, उसके पर्दे पर सिर्फ उसी वस्तु  का चित्र बनेगा। किन्तु मनुष्य का मन, किसी कैमरा की अपेक्षा और अधिक उन्नत कोटि का यंत्र है। क्योंकि  शब्द और रूप के आलावा मन रूपी कैमरे में किसी वस्तु के गंध, स्पर्श और स्वाद के छाप भी पड़ जाते हैं। [गुलाब के फूल को इतनी बार सूंघा हूँ की उसके विशिष्ट गन्ध की छाप मेरे चित्त में गहरी हो गयी है, अब मैं यदि गुलाब के फूल को दूर से भी देखता हूँ, या केवल स्मरण भी करता हूँ -तो वह विशिष्ट गन्ध उभर आती है। ] 
इसी प्रकार 'मन-कैमरा' की सहायता से, हमारी पंचेन्द्रियाँ निरन्तर इस जगत के सैकड़ों वस्तुओं की छाप हमारे चित्त पर डालती  रहती है। मेरे अपने विचार, कथन और कार्य की जैसी गहरी छाप मेरे मन पर पड़ेगी, उसका जितनी गहरी लकीर हमारे चित्त पर बनेगी, उतनी गहरी छाप या लकीर दूसरों के विचार, कथन और कार्य द्वारा नहीं पड़ सकती है। एक ही कार्य का अभ्यास बार बार करते रहने से हमारे चित्त के ऊपर, किसी बैल-गाड़ी के पहिये से बनी लकीर (Rut) के जैसा हमारे विचारों, शब्दों और कर्मों की लकीर भी पड़ जाती है, तथा ये लकीरें क्रमशः गहरी होती जाती हैं। और हमलोग बैल-गाड़ी में जुते बैलों के समान ही एक ही लकीर से होकर बार बार चलते रहते हैं।
इसीलिये यदि हमलोग नित्य विवेक-प्रयोग करके अपनी बुद्धि को जब केवल पवित्र विचार संग्रहित करने में दक्ष बना लेंगे (या अपनी बुद्धि को व्यवसायत्मिका बुद्धि में परिणत कर लेंगे) तो हमारे चित्त पर केवल सद-विचारों की गहरी लकीरें ही पड़ेंगी, यदि हम केवल सद-अभ्यास ही करेंगे तब हमारा चरित्र अच्छा बने बिना रह नहीं सकता! इसलिये, मुझे - अपने और प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण के लिये, पहले अपने चरित्र को अच्छा बनाना ही होगा। इसके लिये यथार्थ-शिक्षा के माध्यम से मुझे स्वयं अपना चरित्र-गठन करना होगा, और इसके लिये मुझे सद-अभ्यास (या अच्छी आदतें ) अर्जित करनी होंगी। 
इस शिक्षा को ग्रहण करने के लिये बड़े बड़े विद्यालय-भवन बनाने की आवश्यकता नहीं है। हम घर पर हों, या बाहर हों, दिन-रात हर समय अच्छी आदतों को अर्जित करने की शिक्षा प्राप्त करने से, जीवन में असफलता नहीं आयेगी। हमलोग स्वयं अपने जीवन को सुन्दर रूप में गढ़ लेंगे, तथा अपने देश-वासियों का कल्याण करने की क्षमता अर्जित करके, अपने जीवन को सार्थक बना सकेंगे।  

1 comment:

Shalini Rastogi said...

एक उत्कृष्ट व समाजोपयोगी पोस्ट !