Thursday, September 13, 2012

$$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [20] 'शिक्षा की चर्चा '- पुनः एक बार ! शिक्षा : समस्त रोगों की रामबाण औषधि है,

 'सच्चा मूर्ति-पूजक '
'आइये, पुनः एक बार शिक्षा के ऊपर चर्चा करें!' - सुनने से हो सकता है,आप कुपित हो जायें। शिक्षा के उपर तो कई बार चर्चा हो चुकी है, एक बार फिर से करने की क्या जरुरत है? किन्तु भाइयों, इसके सिवा अन्य कोई उपाय नहीं है। चाहे किसी भी विषय पर चिंतन करें, यही दिखाई देता है कि-समस्या चाहे जो भी हो, उसके जड़ में शिक्षा भी अवश्य सम्मिलित है। इसीलिये हमलोग स्वामी विवेकानन्द के मुख से भी सुनते हैं," केवल शिक्षा! शिक्षा ! शिक्षा ! यूरोप के बहुतेरे नगरों में में घूमकर और वहाँ के गरीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर, अपने गरीब देशवासियों की याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ? उत्तर में पाया कि शिक्षा से!"७/३११ 
उन्होंने जिस समय यह बात कही थी, तब भारत पराधीन था; तथापि लगभग उसी समय ५० वर्ष पूर्व ही भारतवर्ष में यूरोपीय मॉडल पर आधारित विश्वविद्यालयों की स्थापना हो चुकी थी। किन्तु,उस शिक्षा में शिक्षित लोगों को,बड़े क्षोभ के साथ स्वामी विवेकानन्द जी को 'अपच के मरीज' (Dyspepsia patients) कहना पड़ा था। उसी समय उन्होंने कहा था, " विगत ५० वर्षों में हमारे विश्वविद्यालयों से एक भी मौलिक चिन्तन करने में समर्थ व्यक्ति नहीं निकल सका है।" शिक्षा की जैसी स्थिति उस समय थी, तथ्यात्मक रूप से देखें तो यही प्रतीत होगा, कि आज तक उसमें कोई बदलाव नहीं आ सका है। आज भी भारतीय शिक्षा नीति लगभग वैसी ही बनी हुई है । 
भारत में सभी के लिये शिक्षा-' नयी सर्व-शिक्षा नीति '(Education for all) के उपर एक प्रतिवेदन देते हुए २ फरवरी 1835 ई० को ब्रिटेन के संसद में, लार्ड मेकाले ने कहा था " इस शिक्षा का उद्देश्य, एक ऐसे नये राष्ट्र का निर्माण करना है-'जो जन्मजात रूप से तो भारतीय होगा, किन्तु संस्कृति की दृष्टि से बिल्कुल अंग्रेज होगा।' हम एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था लागु करने जा रहे हैं, जिसका तात्कालिक मुख्य उद्देश्य,मनुष्य-निर्माण करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन को और अधिक मजबूती से चलाने के यंत्र (device) रूप में कुशल किरानियों की जमात का निर्माण करना होगा।" और अघोषित रूप में आज भी हमलोगों की शिक्षा-पद्धति का उद्देश्य-'मनुष्य निर्माण' नहीं है; बल्कि सरकारी प्रशासन-तन्त्र चलाने वाले ' इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस' (I.A.S) रूपी टाई-कोट धारी 'सुपर-किरानी' या 'सिविल-सर्वेन्ट ' का निर्माण करना बना हुआ है।
लॉर्ड मेकाले ने तो बहुत गर्व के साथ लिखा था, भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था देकर जा रहा हूँ कि,यहाँ  मात्र ४० वर्षों के भीतर एक भी मूर्तिपूजक बाकी नहीं रहेगा! किन्तु,हाय रे विधि के विधान ! पाश्चात्य शिक्षा-व्यवस्था १८३५ में लागु होने के,मात्र एक ही वर्ष बाद-१८ फरवरी १८३६ ई० को बंगाल के गाँव-कामारपुकुर में एक बच्चे का जन्म होता है, जिसका नाम था गदाधर ! वे जब पाठशाला गए, तो कहते हैं- यह विद्या नहीं चलेगी! (मैं ऐसी 'चावल-केला बाँधने वाली-'अर्थकरी-विद्या' ग्रहण नहीं करूँगा!) यदि भारतवर्ष में शिक्षा के इतिहास को सही रूप में देखा जाय, तो छात्र-आन्दोलन की शुरुआत प्रथम छात्र नेता- ' गदाधर चट्टोपाध्याय ' ने यहीं कामारपुकुर गाँव में की थी। 
छात्र-असन्तोष के हजारों कारणों में से मुख्य कारण यही है कि छात्रों को सही ढंग की 'शिक्षा' नहीं मिलती।श्रीरामकृष्ण को शिक्षा के नाम पर जो कुछ देने की चेष्टा की गयी, उसका थोड़ा भी उन्होंने ग्रहण नहीं किया।और मेकाले द्वारा निर्धारित समयावधि के भीतर ही, अर्थात उन्नीसवीं शताब्दी में ही गदाधर ने दिखला दिया कि मूर्ति-पूजा करने अर्थ क्या है? और बालक गदाधर ने अपने जीवन को ही वेद-मूर्ति (श्रीरामकृष्ण परमहंस)  के रूप में गढ़ कर विश्व के मनुष्यों के समक्ष उदहारण के रूप में प्रस्तुत कर दिया था। उनके जीवन को देख-सुन कर मनुष्य आसानी से समझ सकता है कि 'शिक्षा' किसे कहते हैं, और यथार्थ शिक्षित मनुष्य कैसा बन जाता है?
 [इसके साथ ही साथ शाक्त और इस्लामी पद्धति से साधना करके-'काली और अल्ला ' के भेद को मिटा कर उन्होंने यह भी दिखला दिया कि ५ वक्त का सच्चा नमाजी किसे कहते हैं?] वे स्वयं जिस प्रकार के छात्र थे, उसी प्रकार के एक अद्भुत शिक्षक भी थे। अपनी शिक्षा सम्पूर्ण कर लेने के बाद ही उन्होंने ' शिक्षक ' का कार्य-भार ग्रहण किया था। कोई कुम्हार जिस प्रकार कच्ची मिट्टी को विभिन्न मूर्तियों के रूप में गढ़ देता है, ठीक उसी प्रकार अल्पव्यस्क तरुणों (लाटू और नरेन् जैसे) के जीवन-गठन का दायित्व अपने हाथों में लेकर, किसी कुशल मूर्तिकार के जैसा उनके जीवन को ही विलक्षण मूर्ति के रूप में ढाल दिया। केवल एक सारदामणि, और एक विवेकानन्द को गढ़ देना ही- सम्पूर्ण विश्व के शिक्षा-जगत के इतिहास में सर्वदा एक अतुलनीय उदाहरण बना रहेगा।    
आजकल प्रत्येक वर्ष ५ सितम्बर को अपने 'दार्शनिक और शिक्षाविद ' पूर्व-राष्ट्रपति डा० एस. राधाकृष्णन के जन्मदिन को हम लोग 'शिक्षक-दिवस' के रूप में मनाते हैं। उस उपलक्ष्य में शिक्षा के विषय पर काफी चर्चा होती है, इसीलिये हमलोग भी थोड़ी चर्चा कर रहे हैं। मेकाले द्वारा प्रस्तावित 'सर्व-शिक्षा अभियान' ब्रिटिश-सरकार के लिये भले उपयोगी हो सकता हो, किन्तु 'शैक्षणिक-सिद्धान्तों' (श्रवण-मनन -निदिध्यासन की भारतीय गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा) की दृष्टि से बिल्कुल निकृष्ट और सार-हीन है।
मेकाले ने सोचा था, उसकी शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद भारत से मूर्ति-पूजा बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। किन्तु हम लोगों ने देखा कि कोई शिक्षक (नेता) यदि सच्चा मूर्ति-पूजक नहीं है, तो वह शिक्षा-दान के व्रत में (लीडरशिप ट्रेनिंग देने में) सिद्धि (पूर्ण सन्तुष्टि) नहीं प्राप्त कर सकता। आप सोच रहे होंगे, यह भी क्या बात हुई ? अब थोड़ा खोल कर, स्पष्ट रूप में कहता हूँ- यथार्थ मूर्तिपूजक क्या करते हैं? वे मिट्टी की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा करके मृण्मयी मूर्ति को चिन्मयी बना देते हैं। वे बेजान मूर्तियों में भी जान डाल देते है, जो ऐसा करने में समर्थ हैं, वे ही मानव जाती के सच्चे नेता हैं, वे ही पूजनीय हैं। किन्तु, जो लोग मूर्ति को केवल प्रणाम करके, उसे मूर्ति के रूप में छोड़कर (उसमें प्राण-प्रतिष्ठा किये बिना) ही हट जाते हैं, वैसे शिक्षकों को कौन याद रखता है? [श्रीरामकृष्ण को ही क्यों याद किया जाता है ?] उसी प्रकार जो यथार्थ शिक्षक होते हैं, वे जड़पिण्ड जैसे छात्र के जीवन में भी प्राणों संचार कर देते हैं। उसको जाग्रत और पुरुज्जिवित कर देते हैं-"शिक्षाबल से आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है, और आत्मविश्वास की शक्ति से अन्तर्निहित ब्रह्म जाग उठते हैं ![শিক্ষাবলে আত্মপ্রত্যয়, আত্মপ্রত্যয়বলে অন্তর্নিহিত ব্রহ্ম জাগিয়া উঠিতেছেন" स्वामी जी यह बात २४ अप्रैल १८९७ भारती की सम्पादिका सरला घोषाल को लिखे के पत्र में कहते हैं]" 
हमलोग शिक्षा के उपर चर्चा करते समय,अक्सर शिक्षकों की तंगहाली, उनके पे-स्केल, ट्यूशन-फ़ी में बढ़ोत्तरी की प्रासंगिकता, मैचिंग ग्रांट, बड़े पैमाने पर कदाचार का दर्शन- इत्यादि बातों के उपर हम लोग अपने (बहुमूल्य विचार) या अभिमत दिया करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षकों की तंगहाली ने शिक्षा-व्यवस्था को बहुत हद तक शिथिल बना दिया है। शिक्षक वर्ग समाज से जैसा सम्मान पाने के अधिकारी हैं, वह उनको नहीं मिलता है। शिक्षण-संस्थाओं की निदेशक-मण्डली के कुछ सदस्य आज भी जमीन्दारी वाली मानसिकता से ग्रस्त हैं। और अधिकांश अभिभावक अपने उत्तरदायित्व के सम्बन्ध में,या तो अनभिज्ञ हैं या उदासीन हैं। छात्र-गण श्रद्धा-हीन हो गये हैं, वे केवल नारेबाजी या तोड़-फोड़ करने में लगे रहते हैं। जब राजनैतिक पार्टियाँ, शिक्षा-संस्थानों (जे.एन.यू-जादबपुर)के संचालक,शिक्षक या छात्र में कोई भी समुदाय को आवश्यकतानुसार अपने अपने ढंग से राजनैतिक मुहाबरा  -'जहाँ कूएँ में ही भाँग घुल गयी हो।' का कुतर्क देने के प्रति कृत-संकल्प हैं- कि जहाँ पूरे समाज की ऐसी हालत है, तो ऐसे परिवेश में केवल शिक्षक वर्ग ही, अकेले अपनी जिम्मेदारी कैसे निभा सकते हैं ?  
बिल्कुल सही बात है। किन्तु समाज का सभी वर्ग, इसी प्रकार का तर्क देने लगें- कि जब दूसरे लोग अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने लगेंगे, तो मैं भी अपने कर्तव्य का पालन करूँगा। और आज इसी प्रकार के  कुतर्क? का सहारा लेकर, समाज का कोई भी वर्ग अपने उत्तरदायित्व का पालन करने की आवश्यकता नहीं महसूस कर रहा है। और इसके फलस्वरूप समाज में किसीको भी अपना उत्तरदायित्व निभाना नहीं पड़ता है।  और इसी कारण से बिल्ली के गले में घन्टी भी, कभी  बंध नहीं पाती है। और,अधिकांशतः इसका खोज करने में ही, कि शिक्षा के क्षेत्र में विद्यमान कूव्यवस्था तथा अन्य समस्याओं के कारण और उसके लिये कौन दोषी है- या कैसा कड़ा कानून बने , 'शिक्षक दिवश' के समारोह का समापन हो जाया करता है।  
किन्तु समस्या का समाधान तो तभी हो सकेगा, जब उस मूल कारण (सच्ची शिक्षा का आभाव) को दूर करने के लिये क्या होना उचित है ? उस उपाय का आविष्कार कर लेने के बाद,जब हम में से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं जितना कर सकते हों, उतना करने में जुट जायेंगे। हमें वैसा करते देख कर दूसरे लोग भी अपना कर्तव्य पालन करने के प्रति यथेष्ट रूप से जागरूक हो जायेंगे। जब हम सभी लोग अपने-अपने कर्तव्य उचित ढंग से पालन करने लगेंगे, तभी हमें अपना उचित अधिकार प्राप्त हो सकेगा। यदि सभी लोग इस तथ्य (कारण-कार्य नियम) को समझ जाएँ, तो लगता है अधिकांश समस्यायों को बहुत हद तक सुलझा लिया जा सकता है।
 मूलतः शिक्षा एक प्रकार की द्वैत-प्रणाली (Dual process-दोहरी प्रक्रिया) है। इसमें शिक्षक का अपना (अनुकरणीय) व्यक्तित्व ही छात्रों के व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायक होता है। इसिलिये शिक्षा के क्षेत्र में सबसे मूल्यवान साधन शिक्षक हैं। किन्तु, इस पूरे शिक्षा रूपी महाननाटक में हीरो के रोल में  की शिक्षक नहीं- छात्र हैं। शिक्षा के क्षेत्र में स्पॉट लाइट छात्र के ऊपर या लोगों की नजर छात्र ऊपर ही टिकी रहती है। (शिष्य से ही गुरु की पहचान होती है ?) फिर भी, इस महत्वपूर्ण सच्चाई को- शिक्षा-क्षेत्र से जुड़े हम में से अधिकांश लोग अक्सर भूल जाते हैं।
वास्तव में समस्त शिक्षक-प्रशिक्षण (लीडरशिप ट्रेनिंग) का कार्य [महामण्डल द्वारा आयोजित वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर] एक बहुत बड़ा (immeasurable) सार्वजनिक महा-पूजनोत्सव है ! इस पूजनोत्सव में छात्र (भावी नेता) 'ईश्वर की प्रतिमा 'है,और शिक्षक पूजक हैं। पूजा करते समय पुजारी (शिक्षक) इतने प्रेम-पूर्ण स्वर में मंत्रोच्चार करेगा, कि उसके शब्द छात्र (प्रतिमा) के हृदय को स्पर्श कर लेंगे। वे कहेंगे- " हे मनुष्य-रूपी देवता, इहागच्छ, इहागच्छ ! - यहाँ आओ, यहाँ आओ। इह तिष्ठ!, इह तिष्ठ ! यहाँ बैठो, यहाँ बैठो। अत्र-अधिष्ठानं कुरु !- यहीं पर (कैम्प के रूम न ९ में) वास करो। मम पूजा गृहान !- मेरी पूजा ग्रहण करो ! " 
(पाश्चात्य शिक्षा में शिक्षित लोग तो पूछेंगे) महाशय,आपलोग कैसी बातें कह रहे हैं? कहीं आपलोग कुछ भूल तो नहीं कर रहे हैं? यदि आप गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा में आधारित प्राचीन-काल की शिक्षा-प्रणाली के उपर ही चर्चा कर रहे हों, तो आपको कहना चाहिये था- गुरु की सेवा-सुश्रुषा के द्वारा ही विद्या, प्रणिपात करके ही शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। अथवा यह कहना चाहिए था-' गुरु-दक्षिणा प्रदान करना ही विद्या-प्राप्ति का उपाय है।' किन्तु बात क्या है -जानते हैं ? (शिक्षकों-छात्रों के प्रति नजरिये में इस बदलाव का मुख्य कारण क्या है, जानते हैं ?) जिन लोगों को (ब्राह्मणों को) स्थायी रूप से पूजक के कार्य का दायित्व सौंपा गया था, वे लोग अन्ततोगत्वा (समय के प्रवाह में) केवल दक्षिणा से ही सन्तुष्ट न रहकर, भगवान के स्थान पर स्वयं को ही  रखने लगे थे। इसीलिये मुझे इतना दो, उतना दो- केवल दो-दो करने लगे थे। लेकिन, मैं क्या दे सकता हूँ, उसका कोई हिसाब करने की जरूरत भी नहीं समझते थे।
छात्रों की तरफ से देखें, तो उनका यह कर्तव्य अवश्य है, कि वे प्रणिपात, प्रश्न और गुरुसेवा, श्रद्धा और गुरु-दक्षिणा, देकर विद्या ग्रहण करेंगे। किन्तु शिक्षकों को भी छात्रों के प्रति श्रद्धा करनी होगी। प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद भी, पूजक को ही उसके सामने अपना शीश झुकाना पड़ता है। कोई भी पूजक- ऐसा सोचकर कि- 'अरे मैंने ही तो इस प्रतिमा में प्राण डाले हैं'; प्रतिमा के सिर पर पैर रखने की धृष्टता नहीं करता। क्या, दक्षिणेश्वर के शिक्षक श्रीरामकृष्ण ने -क्या यह कहते हुए अपने छात्र नरेन को दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम नहीं किया था - "प्रभु मैं जानता हूँ, कि तुम्हीं नर-रूपी नारायण हो! 'और (ऐसा कहने का सैभाग्य केवल एक सच्चे नेता को ही प्राप्त हो सकता है!) यह कार्य केवल शिक्षक ही कर सकते हैं, इसीलिये शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक ही सबसे मूल्यवान साधन हैं। 
अतएव -शिक्षा के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन 'शिक्षक'(नेता) को, ऐसा होना चाहिये जो सर्वदा पवित्र या मिलावट-रहित (ब्रह्मचर्य) अवस्था में रह सके। यदि ऐसे शुद्ध व्रतधारी शिक्षकगण हर स्थान में जा जाकर, समवेत स्वर में, इतने प्रेम से " इहागच्छ ! इहागच्छ !(ऐनुअल कैम्प में आओ,ऐनुअल कैम्प में आओ!) का आह्वान करें, कि उनकी आवाज पूरे कौम (गणदेवता-डेमोज़, Demos) के हृदय को छू ले, तो देश जाग उठेगा। और, जो 'सिद्ध' पुजारी सोये हुए देवता को 'जाग्रत' करने में समर्थ होते हैं,भारत का समाज उनको यथेष्ट सम्मान देना जानता है। किन्तु हम लोग जब अपने मन्त्र (५ अभ्यास=त्याग और सेवा) को सिद्ध किये बिना ही,'सिद्ध-गुरु' का भेष धारण करके दक्षिणा में 'सिधा' माँगने पँहुच जायें, तो वैसा होना संभव कैसे होगा ?
आजकल शिक्षा को भी एक उद्द्योग(Industry) के रूप में देखा जा रहा है। साधारण शिक्षा में लागत-पूँजी के अनुपात में मुनाफा कम होता है, इसीलिये इसकी उपेक्षा होती है। किन्तु हाल में ही 'नौकरी या रोजगार देने सक्षम ' (Job Oriented) के नाम से दी जाने वाली विशेष शिक्षा के उपर सरकार की थोड़ी विशेष  कृपा-दृष्टि हुई है। हजारो-हजार अयोग्य व्यक्ति इस गणदेवता (कौम) की महा पूजा में पुजारी के पद पर नियुक्त हो रहे हैं। कितने आश्चर्य की बात है, जो व्यक्ति मानव-मशीन की चाभी घुमाने में भी अक्षम है, वह मनुष्य के हृदय को नये साँचे में ढालने चला है। 
आन्तरिक शक्ति के (२४) गुणवाचक क्रमागत उन्नति (Qualitative evolution) को शिक्षा कहते हैं।शिक्षा की शक्ति से आत्मविश्वास जैसा गुण भी जाग्रत हो जाता है। किन्तु, इस कार्य को करने के लिए एक अभ्यस्त और कार्यकुशल वास्तुकार (architect) चाहिये। जो लोग ऐसा कर सकते हैं, वे ही समाज को बदलने में सक्षम नये भारत के शिल्पियों का निर्माण भी कर सकते हैं। अन्य किसी की उम्मीद न करके ऐसे शिल्पकारों (जो पत्थर की मूर्तियों में भी प्राण-प्रतिष्ठा कर सके,उन्हें पुरुज्जिवित कर सके ) की संख्या बढ़ने से ही देश जाग उठेगा। 
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"जो आत्मविश्वास वेदान्त की नींव है, वह किंचित भी यहाँ व्यव्हार में परिणत नहीं हुआ। भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या-बुद्धि, राज-शासन और दम्भ के बल पर मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गयी है। जनता में विद्या का प्रचार करना होगा। -शिक्षाबल से आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है, और आत्मविश्वास की शक्ति से अन्तर्निहित ब्रह्म जाग उठते हैं ! स्कूल में लड़के कुछ भी नहीं सीखते, बल्कि जो कुछ अपना है, उसका भी नाश हो जाता है। और इसका परिणाम होता है -श्रद्धा का अभाव। जो श्रद्धा वेद-वेदान्त का मूल मन्त्र है, जिस श्रद्धा ने नचिकेता को प्रत्यक्ष यम के पास जाकर प्रश्न करने का साहस दिया, जिस श्रद्धा के बल से यह संसार चल रहा है -उसी श्रद्धा का लोप ! गीता ४/४० में कहा है -'अज्ञश्च-अश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति' -अर्थात विवेकहीन (विवेक-प्रयोग न करने वाले) और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्य (doubting Thomas) का पतन हो जाता है। अब उपाय है शिक्षा का प्रचार पहले आत्मज्ञान। इससे मेरा मतलब जटा-जूट, दण्ड, कमण्डलु और पहाड़ों की कन्दराओं से नहीं,जो इस शब्द के उच्चारण करते ही याद आते हैं। तो मेरा मतलब क्या है? जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य (अज्ञानता के बन्धन (भेंड़त्व) से मुक्त (डी-हिप्नोटाइज्ड) हो जाता है,) संसार-बन्धन तक से छुटकारा पा जाता है, उससे क्या तुच्छ भौतिक उन्नति नहीं हो सकेगी ? अवश्य हो सकेगी। मुक्ति, वैराग्य,त्याग -ये सब उच्चतम आदर्श हैं, किन्तु गीता २/४० में कहा गया है -स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।[स्वल्पम्  अपि  अस्य धर्मस्य =duty त्रायते  महतः  भयात्] अर्थात इस धर्म का अर्थात कर्तव्य का -थोड़ा सा भी भाग भी महाभय (जन्म-मरण) से त्राण करता है।
 जितने भी सम्प्रदाय भारत में स्थापित हुए हैं, सभी इस बात पर सहमत हैं कि -" प्रत्येक जीवात्मा में अनन्त शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है!" चींटी से लेकर ईसा-मोहम्मद तक सभी में वह आत्मा विराजमान है। अन्तर केवल उसके प्रत्यक्षीकरण के भेद में है। "निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥ कैवल्यपाद ३ ॥ सूत्रार्थ—सत् और असत्कर्म प्रकृति के परिणाम (परिवर्तन) के प्रत्यक्ष कारण नहीं हैं, वरन् वे उसकी बाधाओं को दूर कर देनेवाले निमित्त मात्र हैं, जैसे किसान जब खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दूसरे खेत में चला जाता है, वैसे ही आत्मा भी आवरण टूटते ही प्रकट ही जाती है। उपयुक्त अवसर और उपयुक्त देश-काल मिलते ही उस शक्ति का विकास हो जाता है। इस शक्ति को सर्वत्र जा जाकर जगाना होगा। 
आधुनिक विज्ञान ने ईसाई आदि धर्मों की भित्ति बिल्कुल चूर चूर कर दी है। इसके अतिरिक्त घोर विलाशिता तो प्रायः धर्म वृत्ति का नाश ही करने पर तुली है। यूरोप और अमेरिका आशाभरी दृष्टि से भारत की ओर देख रहे हैं। परोपकार का --शत्रु के किले पर अधिकार जमाने का यही समय है। यदि भारत की नारियाँ देशी पोशाक पहने भारतीय ऋषियों के मुख से निकले हुए वेदांत के महावाक्यों का प्रचार करेंगी -तो एक ऐसी बड़ी तरंग उठेगी जो सारे पश्चमी संसार को डुबो देगी। इंग्लैण्ड पर भी हमलोग अध्यात्म के बल से अधिकार कर लेंगे , उसे जीत लेंगे। अब इंग्लैण्ड, यूरोप और अमेरिका पर विजय पाना -यही हमारा महाव्रत होना चाहिये। इसीसे देश का भला होगा। विस्तार ही जीवन का चिन्ह है , और हमें सारी दुनिया में अपने आध्यात्मिक आदर्शों का प्रचार करना होगा।" ७/३११-१४ 

[ महामण्डल के लीडरशिप ट्रेनिंग में - " शिष्य देव-प्रतिमा है और शिक्षक पुजारी"; महामण्डल का शिक्षक, मूर्ति में प्राण डालने वाला शिक्षक (नेता ) कहेगा - "माइ हेड बाउ डाउन टू द वुड बी लीडर ऑफ महामण्डल" और इस प्रकार छात्र को ईश्वरोन्मुख कर देने के बाद उस भावी नेता को स्वतः (अपने स्वरूप का या) परमात्माके वास्तविक तत्व का परिज्ञान होने लगता है! और फिर वह सदा सर्वदाके लिये जीवन्मुक्त हो जाता है। इसीलिये प्रचलित शिक्षा के साथ साथ, शिक्षक-प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी प्रतिवर्ष तैत्तिरीय० उप ० की आज्ञाके अनुसार होना चाहिये।
ठाकुर ने हाथ जोड़ कर केवल नरेन् से ही ऐसा क्यों कहा था -मैं जानता हूँ प्रभु, आप वही नारायण ऋषि हैं?.... मूर्ति पूजक शिक्षक, मन ही मन योग्य आधार की जाँच करने के बाद कहता है - "ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! " तै० उप ०; वेदान्त के महावाक्यों की शिक्षा प्राप्त करने के लिये तीन चीजों की जरूरत, होती है- प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा। यदि शिष्य का आधार (५ अभ्यास या ब्रह्मचर्य पालन की क्षमता) मजबूत न हुआ तो वह ढोंगी या विक्षिप्त भी हो सकता है।] 
[लोर्ड मेकाले ने भारत में सभी के लिये शिक्षा 'Education for all ' या ' सर्वशिक्षा-अभियान ' के उपर एक प्रतिवेदन देते हुए २ फरवरी 1835 ई० को ब्रिटेन के संसद में कहा था- "मैं ने भारत की लंबाई और चौड़ाई भर में यात्रा की है, किन्तु मैंने एक भी वैसा व्यक्ति नहीं देखा जो भिखारी या चोर हो। इतने ऊंचे नैतिक मूल्यों का ऐसा धनी देश मैंने नहीं देखा है। इन लोगों की सांस्कृतिक चेतना का ऐसा विस्तार, मैंने इस देश में देखा है, कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश को गुलाम बना पाएंगे। जब तक हम इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत रूपी रीढ़ की हड्डी नहीं तोड़ देते, तब तक हम उन्हें गुलाम नहीं बना पाएंगे। इसलिए है, मेरा प्रस्ताव है कि हम पुरानी और प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को अपनी शिक्षा से बदल दे।  
" इस शिक्षा का उद्देश्य, एक ऐसे नये राष्ट्र का निर्माण करना होगा - 'जो जन्मजात रूप से तो भारतीय होगा, किन्तु संस्कृति की दृष्टि से बिल्कुल अंग्रेज होगा।'  और जब शिक्षित भारतीयों को भी ऐसा लगने लगेगा, कि यह सब विदेशी और अंग्रेजी संस्कृति उनकी संस्कृति से बड़ी और अच्छी है। तो वे  अपने आत्म सम्मान और मूल संस्कृति को खो देंगे और अपने आत्म सम्मान और संस्कृति को भूल कर हमारे गुलाम बन जायेंगे, जो हम वास्तव में उन्हें बनाना चाहते हैं।"  

कितना सही और समझदार व्यक्ति था लोर्ड मेकाले और हम आज भी कितने नासमझ बने हुए हैं? हम स्कूल जाते है इसलिए के हम बड़े होकर इंजिनियर बने, डॉक्टर बने, कलेक्टर बने और पता नहीं क्या क्या, किन्तु अगर नहीं बन पाते तो क्या नहीं बन पाते- एक इन्सान ! या एक सच्चा मनुष्य ! ६४ सालो से हम शायद इतना भी नहीं समझ पाए, कि हम आज तक आजाद नहीं हो सके हैं। वही पुरानी पाश्चात्य-शिक्षा हमें 'गोरी 'चमड़ी की ब्रिटिश सरकार के स्थान पर आज के 'भूरी' चमड़ी की सरकार का गुलाम बना देती है।]
["आजकल यूरोपीय ढंग पर उच्च शिक्षा देने की ओर लोगों का विशेष ध्यान है विदेशी विजयी यहाँ हमारी भलाई करने के लिये नहीं आये है, वे तो धन लूटने आये हैं। विदेशियों की ये शिक्षा-संस्थायें तो थोड़े मूल्य पर उपयोगी गुलाम पैदा करने के कारखाने हैं; अर्थात इन कारखानों से 'मनुष्य' नहीं - क्लर्क (मुंशी), डिप्टी मजिस्ट्रेट, बड़ाबाबु, डाकबाबू, तारबाबु आदि पैदा होते हैं।" १/३२१
इसीलिये एक एक I.A.S. के यहाँ छपा मारने पर ३०० करोड़ और सरकारी क्लर्क के यहाँ ७० करोड़ निकते हैं। केन्द्रीय मंत्री श्रीजयराम रमेश ने तो 'भारतीय ब्यूरोक्रेशी ' को दुनिया का सबसे खतरनाक ' पशु ' की उपमा दे दी है!)  (तभी तो चेन्नई में स्टालिन (डी.एम्.के.) के घर पर CBI द्वारा छापा मारने के बाद वित्त मंत्री से लेकर प्रधान-मंत्री तक को कहना पड़ता है,  मैं इस छापे की निन्दा करता हूँ। क्यों छापा मारा, इसकी जाँच करनी होगी ? और यह सुनते ही CBI अपना जाँच बंद कर देती है।]
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