Wednesday, September 12, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [19] "युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द - श्रद्धया विन्दते वसु " (युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द),

॥ १।।
" जीवन-गठन या मनुष्य बनने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है !"
एक दिन बलराम मन्दिर के एक कमरे में एकत्रित बहुत से श्रोताओं के समक्ष स्वामीजी कह रहे थे, " इस देश में पुनः एक बार सच्ची श्रद्धा के भाव को जाग्रत करना होगा, हमारे सोये हुए आत्मविश्वास को जगाना होगा, तभी आज देश के सामने जो समस्यायें हैं, उनका समाधान स्वयं हमारे द्वारा ही हो सकेगा।"
किन्तु प्रश्नकर्ता इस उत्तर से संतुष्ट न होकर बोले, " केवल श्रद्धा से ही हमारे समाज के असंख्य दोष कैसे दूर होंगे? देश में जो बुराइयाँ और कुरीतियाँ हैं,उन्हें दूर करने के लिये कांग्रेस-पार्टी तथा अन्य समाजसेवी संस्थायें प्रचार और आन्दोलन कर रही हैं, तथा अंग्रेज सरकार से प्रार्थना भी कर रही हैं, क्या इससे (राजनीति से) भी अच्छा अन्य कोई मार्ग है ? श्रद्धा का इन सब बातों से क्या सम्बन्ध है ?"
स्वामीजी ने कहा, " माना कि अंग्रेज सरकार तुमको तुम्हारी आवश्यकता की वस्तुऐं (आज़ादी भी) देने को एक बार राजी भी हो जाय, पर (आज़ादी) प्राप्त होने पर उन्हें सुरक्षित और सँभालकर रखने वाले मनुष्य कहाँ हैं ? इसलिये पहले आदमी- 'मनुष्य' उत्पन्न करो। हमें अभी 'मनुष्यों' की आवश्यकता है। और बिना श्रद्धा के मनुष्य बन कैसे सकते हैं? 
वे सज्जन किन्तु, इस उत्तर से भी संतुष्ट न होते हुए पुनः एक दूसरा तर्क उठाते हुए कहा, " किन्तु बहुसंख्यक लोगों का मत ऐसा नहीं है ! " 
इस पर स्वामीजी का निर्भीक उत्तर मिला- " जिसे तुम बहुसंख्यक कहते हो, वह मूर्खों की या अति साधारण बुद्धि रखने वालों की संख्या है। सभी देशों में, जिनके पास स्पष्ट धारणा करने वाला मस्तिष्क हो, ऐसे व्यक्ति कम ही होते हैं।" (वि० सा० ख० ८-२६९-७०)
स्वामीजी के द्वारा कथित इन बातों को हमारे लिये स्मरण रखना विशेष रूप से आवश्यक है। क्योंकि हम अपने ज्ञान (डिग्री) या पद को लेकर चाहे जितना भी गर्व क्यों न करें, किन्तु  हममें से अधिकांश व्यक्ति भ्रमित हैं(muddle-headed, इन्द्रिय विषयों से सम्मोहित हो चुके हैं) हैं, तथा हममें से अधिकांश लोगों में इस 'श्रद्धा'- नामक वस्तु का नितान्त आभाव है। आज, जबकि हम लोग समस्याओं के अम्बार से बोझिल युग में वास कर रहे हैं, हमें इस सच्चाई पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिये।
आज देश के सामने असंख्य समस्यायें मुँह फैलाये खड़ी हैं। गरीबी हटाने की समस्या, शिक्षा की समस्या, जनसंख्या में वृद्धि की समस्या, साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित करने की समस्या, पिछड़ी जाति की समस्या, कानून-व्यवस्था को बनाये रखने की समस्या, राष्ट्रिय एकता की समस्या, देश की सीमाओं की रक्षा करने की समस्या, भूमि अधिग्रहण और कृषि जमीन में सिंचाई की समस्या, उत्पादन दर में वृद्धि की समस्या, नदियों के जल और वायु को प्रदूषित होने से बचाने की समस्या, विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्या, व्यक्ति-समाज-राष्ट्र का कोई स्पष्ट दर्शन और राष्ट्रीय-आदर्श नहीं होने की समस्या, भ्रष्टाचार, काला धन, नारी शक्ति का अपमान आदि और भी कई समस्यायें हमारे देश के सामने हैं। इधर इस देश में एक नयी समस्या भी दिखाई दे रही है, वृद्धावस्था की समस्या !
जीवित रहने से समस्यायें भी रहती हैं। जिसमें जीवन नहीं है, उसके लिये कोई समस्या नहीं होती है। यदि सूर्य के तापमान का कोई प्रभाव जीवन के उपर नहीं पड़ता, तो उसका तापमान घट रहा है, या नहीं?  इस बात को लेकर हम लोग चिन्तित भी नहीं होते। जीवन को विकसित तथा प्रकाशित होने में जो बाधक होता हो, जीवन की संभावना को जो संकुचित करता हो, जिसके कारण जीवन पथ पर गतिशील रहने में बाधाएँ आती हैं-उसी को समस्या कहते हैं। इसके अतिरिक्त जहाँ जीवन होता है, उसके साथ समस्यायें भी जुड़ी रहती हैं।
जीवन क्या है? इसको परिभाषित करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " एक अन्तर्निहित शक्ति अपने को अभिव्यक्त करना चाह रही है; किन्तु बाहरी परिवेश तथा परिस्थितियाँ मानो उसको दबाये रखना चाहती हैं। उन समस्त परिवेश के दबाव का अतिक्रम करके आत्मविकास करने और अन्तर्निहित दिव्यता को प्रस्फुटित करने का नाम ही जीवन है।"
॥ २।।
बचपन से ही यथार्थ शिक्षा पर जोर देना होगा !
जब हम लोग समस्या की बात सोंचते हैं, तो आमतौर पर सार्वजनिक समस्या की ही बात होती है। जैसे जनसंख्या वृद्धि की समस्या या वायु प्रदुषण की समस्या आदि, किन्तु वही समस्या धीरे धीरे सामूहिक 
समस्या में परिणत हो जाती है। जैसे गरीबी हटाने की समस्या, साम्प्रदायिक सौहार्द की समस्या, या पिछड़ी जाति की समस्या आदि। किन्तु अंततोगत्वा कोई भी समस्या सम्पूर्ण समाज को ही प्रभावित कर देती है।
इसीलिये जैसे ही हम किसी समुदाय-विशेष (पटेल-गुज्जर-मुसलमान-हिन्दू-दलित-अगड़ा-पिछड़ा ) की ओर ध्यान रख कर, अलग अलग तरीके से उन समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न करते हैं तो पता चलता है, कि उस समुदाय-विशेष की समस्या का समाधान तो हुआ ही नहीं, उल्टे उस प्रयास के कारण एक नई समस्या उत्पन्न हो गयी है। 
इसीलिये किसी समुदाय-विशेष या छोटे छोटे क्षेत्रों में व्याप्त समस्याओं का हल ढूँढने की अपेक्षा क्रमशः वृहत्तर मानव-समुदाय की समस्या (जिसकी अभिव्यक्ति समाज के विभिन्न क्षेत्रों में छोटी छोटी समस्याओं के रूप में दृष्टिगोचर होने लगती हैं।) के प्रतिकार की चेष्टा करना अधिक वैज्ञानिक तथा तर्कसंगत है। स्वामी विवेकानन्द इसी पद्धति को  अपनाने के पक्ष में थे। पूर्वोक्त समुदाय-विशेष के समस्याओं की तुलना में वयोवृद्ध लोगों की समस्या में थोड़ी नवीनता है। वृद्ध लोगों का समाज (पेंशनर-समाज) आमतौर से मानव-समाज का स्थायी समूह नहीं है। जो लोग पहले शिशु अवस्था में थे, आगे चलकर तरुण हुए, युवा हुए फिर वे ही अब वृद्ध (रिटायर्ड) हो गये हैं। उम्र के इस पड़ाव पर पहुँच कर उन्हें कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। किन्तु यह समस्या पहले इस देश -'श्रवनकुमार'  के देश  में नहीं थी। यह समस्या आधुनिक भोगवादी समाज की देन है। पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने के परिणाम स्वरूप यह समस्या आज हमारे समाज में भी प्रविष्ट हो गयी है। 
उसी प्रकार शिशु और किशोर आयुवर्ग (juvenile-जूवनाइल कोर्ट) की समस्या भी पाश्चात्य देशों, विशेष रूप से यूरोप के देशों में अब एक नया रूप धारण करती जा रही है। वहाँ के शिक्षा-शास्त्री अब इस विषय में जागरूक भी हो चुके है। वहाँ के देशों में जो समस्या इस उम्र के लोगों की आम समस्या बन चुकी है, वह समस्या हमारे देश में अभीतक केवल अनाथ या बिना माँ-बाप के बच्चों और तरुणों में ही पाई जाती थी। 
किन्तु अब हमारे देश में भी इस आयुवर्ग में उठने वाली  समस्याओं पर भोगवादी संस्कृति का प्रभाव पड़ने लगा है। किन्तु हम भारतवासी अभी तक इस समस्या को लेकर जागरूक नहीं हुए हैं। किन्तु, बालकों,
तरुणों या युवावर्ग की समस्याओं का उचित रूप से समाधान करने की चेष्टा नहीं की गयी, तो वयोवृद्ध लोगों की  समस्या भी बढ़ती ही जायेगी। इसीलिये, स्वामीजी बचपन से ही सर्वाधिक जोर यथार्थ शिक्षा-के उपर देने के लिये कहते थे।  नहीं मिल पाने के कारण, शिशु और किशोरवर्ग में आधुनिक समस्या, जो पहले केवल विदेशों में ही दिखाई देती थी, अब अपने देश में भी दिखाई देने लगी है। अब यहाँ के नाबालिग लड़के भी जघन्य अपराध कर रहे हैं ! 
पहले के माँ-बाबूजी या अभिभावक जिस प्रकार अपनी संतानों को यथार्थ मनुष्य (चरित्रवान मनुष्य) बनाने के प्रति एक स्नेहमयी दृष्टि रखते थे, आजके धन कमाने में व्यस्त मम्मी-डैडी के भीतर,अपनी सन्तानों को  उस प्रकार की यथार्थ शिक्षा देने के प्रति घोर उदासीनता दिखाई दे रही है। इस समस्या का यदि उपयुक्त समाधान समय रहते नहीं ढूँढ़ निकाला गया, तो युवावर्ग की समस्या की जड़ तक पहुंचना कभी संभव नहीं होगा। (आज के नेता बालिग होने की उम्र १६ वर्ष करना चाहते हैं) 
किसी समस्या को हल करने के दो उपाय हैं, पहला तरीका है, रोगनिवारण या- 'उपचार' (Cure) और दूसरा है, रोगनिषेध या -'निरोध' (Prevention)। रोग हो जाने के बाद उसकी चीड़-फाड़ की चिकित्सा करने, या उपचार करने की अपेक्षा समस्यायों का रोकथाम करना ही उत्तम तरीका है। जो समाज किसी समस्या के दिखाई पड़ने के पहले ही उसकी संभाव्यता का पूर्वानुमान कर लेना  जानता है, और किसी समस्य के उत्पन्न होने के पहले ही उसकी रोकथाम करने में समर्थ होता है, उस समाज में कई समस्यायें वैसे भी दिखाई नहीं देती है। वर्तमान समय में हमारे देश में जितनी भी समस्यायें दृष्टिगोचर हो रही हैं, उनमें से अधिकांश का कारण हमारे समाज एवं उसके दिशानिर्देशकों या नेताओं में व्याप्त इस दूर-दृष्टि का आभाव ही है। 
जीवन के प्रारंभ होते ही,समस्याओं का भी प्रारंभ होने लगता है। और जीवन का प्रारंभ शैशवकाल से ही हो जाता है। और यदि उसी समय से संभाव्य समस्याओं के समाधान का निरोधक उपाय (बचपन से ही यथार्थ शिक्षा देना) नहीं अपनाया गया तो कई समस्याओं से बचने का उपाय भी नहीं रह जाता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द बचपन से ही यथार्थ शिक्षा देने पर जोर दिया करते थे। स्वामी विवेकानन्द जिस प्रकार विशाल जन-समुदाय की वैश्विक समस्या का समाधान की ओर ध्यान देने के समर्थक थे, उसी प्रकार वे रोग हो जाने के बाद उपचार करने की अपेक्षा रोग होने से पहले ही उसकी रोकथाम करने के समर्थक भी थे। 
उपचार पद्धति द्वारा समस्या को सुलझाने में जो समस्या उठ खड़ी हुई है, (अब सतह पर आकर ट्यूमर जैसा दिखने लगा है), उसको चीरफाड़ करना पड़ता है। किन्तु निरोधात्मक पद्धति में किसी चीज को तोड़ना नहीं पड़ता, निर्माण करना होता है। स्वामीजी ने हमेशा निर्माण करने पर ही बल दिया है, तोड़ने पर नहीं। समस्या को तोड़ना या चीर-फाड़ करना ठीक नहीं है। जिस वर्ग के जीवन से जुड़ी हुई समस्या है, उस वर्ग के जीवन को उचित तरीके गढ़ना ही समस्या का स्थायी समाधान है। और स्वामीजी द्वारा प्रदत्त समस्त समस्याओं के समाधान का मूल सूत्र भी यही है। 
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वे कहते थे - " यदि मेरी कोई संतान होती तो मैं उसे जन्म से ही सुनाता- 'तत्वमसि निरंजनः।' तुमने अवश्य ही पुराणों में रानी मदालसा की वह सुन्दर कहानी पढ़ी होगी। उसके संतान होते ही वह उसको अपने हाथ से झूले पर रखकर उसको लोरी सुनाते हुए गाती थी- 'तुम हो मेरे लाल निरंजन अतिपावन निष्पाप, तुम हो सर्व-शक्तिमान, तेरा है अमित प्रताप।' इस कहानी में एक महान सत्य छिपा हुआ है- 'अपने को बचपन से ही महान समझो और तुम सचमुच महान हो जाओगे!" (५/१३८) 
 एक मां कैसे अपने ज्ञान से बच्चों को सही दिशा दे सकती है, इतिहास में इसका एकमात्र उदाहरण है- रानी मदालसा। इन्होंने अपने पुत्रों को परम ज्ञान का उपदेश देकर जीवन जीने की दिशा दिखाई थी। (बबुआ तू सब कुछ कर सके ल, मन से कबो हार मत मनिह! ; तूँ जे चाह लेब ऊ जरूर हो जाई ! मन जीता जगजीत !)
पुत्र से मां का मोह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन रानी मदालसा ने इस मोह से हटकर अपने चारों पुत्रों को ऎसी शिक्षा दी जिससे उनके कर्म के आधार पर उनकी पहचान हो।
वे मानतीं थी कि संसार में नाम की महिमा कुछ नहीं है। व्यक्ति को उसके नाम से नहीं बल्कि उसके कर्मो से पहचाना जाता है। जब राजा ऋतध्वज अपने पुत्रों का नामकरण करते थे तो मदालसा को हंसी आती थी। पहले तीन पुत्रों के जन्म के बाद राजा ने उनका नामकरण किया तो वे हर बार हंसी। अपने तीनों पुत्रों को मदालसा ने यही सिखाया। उन्हें शरीर व भौतिक सुखों से मोह नहीं करने की शिक्षा दी। 
उन्होंने बताया कि विद्वान वही है जो सुखों को भी दुख समझकर जीवनयापन करें। उनके तीन पुत्र हुए। बड़े का नाम विक्रांत, दूसरे का नाम सुबाहु और तीसरे का नाम शत्रुमर्दन था। मदालसा ने उन्हें ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दी।अपने लड़के को पालने में रख कर, झुलाते झुलाते यह लोरी गा कर सुनाती थीं-

शुद्धोsसि रे तात न तेsस्ति नाम
कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव ।
पंचात्मकम देहमिदं न तेsस्ति

नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतो: ॥

 हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है? 
बचपन से ही वेदान्त सुनकर तीनों पुत्रों को वैराग्य हो गया और वे जंगल में तपस्या करने चले गए। तब मदालसा का चौथा पुत्र हुआ। तब राजा ने मदालसा से कहा कि कम से कम इस पुत्र को तो सांसारिकज्ञान की शिक्षा दो जिससे हमारा राजपाट चल सके।  
उसका नाम अलर्क (पगला कुत्ता ) रखा गया।  मदालसा की शिक्षा से वह बहुत ही शूरवीर, पराक्रमी राजा हुआ।  कुछ समय बाद राजा ऋतुध्वज अपनी पत्नी मदालसा के साथ अलर्क को राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गए। हालांकि राजा के कहने पर चौथे पुत्र को धर्म, अर्थ और काम शास्त्रों की भी शिक्षा दी। लेकिन तपस्या के लिए वन में जाते समय उसे भी यही उपदेश दिया कि आत्मा निराकार है। अंतत: मां की दी हुई यही शिक्षा पाकर चौथे पुत्र को भी आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई कि तू शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। इस प्रकार यह रानी मदालसा की ही शिक्षा थी कि जिससे सुबाहु, विक्रांत और शत्रुमर्दन जैसे ब्रह्मज्ञानी और अलर्क जैसे प्रतापी राजा हुए। मदालसा भारत की एक गौरवमयी माँ थीं।]
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॥ ३।।
युवा-वर्ग सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्ति चाहता है 
जिस प्रकार सार्वजनिक और दलगत समस्याओं से वयोवृद्ध लोगों की समस्या और बाल्यकाल-किशोरों की समस्या में एक अंतर होता है, उसी प्रकार इन दोनों समस्याओं की तुलना में युवावर्ग की समस्या का भी अपना एक अलग वैशिष्ट है। युवावर्ग की समस्या के दो पहलु बिल्कुल स्पष्ट हैं। बालक और किशोर अपनी समस्याओं को लेकर स्वयं परेशान रहते हैं। वयोवृद्ध लोग भी अपनी ही समस्याओं से भारग्रस्त रहते हैं। किन्तु युवावर्ग की समस्याओं का बोझ केवल युवावर्ग को ही वहन नहीं करना पड़ता, कई बार उसका दंश समाज को भी सहना पड़ता है।
इसीलिये इसके समाधान की चिन्ता सबों के मन में उठती रहती है। सभी लोग कहते हैं कि युवा-समस्या (युथ प्रॉब्लम) के अस्तित्व का उन्हें पता है, किन्तु बहुत थोड़े से लोग ही इस समस्या के मूल कारण को समझते हैं; और इसके समाधान का उपाय ढूँढ़ पाना तो अधिकांश लोगो की बुद्धि से परे की बात है। स्वाभाविक रूप से युवाओं के अपने विचार में इस समस्या का मूल-कारण, उसका गुण-धर्म और समाधान दूसरे लोगों के विचार के साथ मेल नहीं खाते हैं। इसीलिये दृष्टिकोण में अंतर रहने के कारण समाधान के उपाय को लेकर समाज और युवावर्ग के परस्पर सहयोग के आभाव में समाधान निकालना संभव नहीं होता, और विचारों का संघर्ष प्रत्यक्ष रूप में दिखाई पड़ने लगता है। 
समस्या का मूल कारण तो जीवन (प्राण उर्जा ) ही है। और युवावस्था में जीवन -अर्थात प्राण-ऊर्जा का आवेग (Momentum) सर्वाधिक रहता है। इसीलिये युवाकाल में बाधाएँ भी अधिक आती हैं। प्राणउर्जा की अभिव्यक्ति में आने वाली बाधा को ही समस्या कहते हैं। इसलिये युवाजीवन की समस्या यदि सर्वाधिक ध्यान आकर्षित करे, तो इसमें आश्चर्य क्या है ? युवाकाल की प्राणउर्जा का प्राचुर्य युवाओं को स्वाभाविक रूप से विशिष्टता प्रदान करता है, किन्तु उसका गुस्सा या भावावेश देखकर, समाज आतंकित हो जाता है। इसीलिये समाज के सभी लोग चाहते हैं कि युवा समस्या का समाधान जल्द से जल्द होना चाहिये। 
स्वयं युवावर्ग युवा-समस्या के विषय में क्या समझता है ? युवा लोग स्वतंत्रता (Freedom) चाहते हैं। किन्तु पाते हैं कि समाज हर कदम पर उनकी स्वतंत्रता में बाधा डाल रहा है। (वेलेन्टाईन डे नहीं मानाने देता है।) वे जिसे करना चाहते हैं, उसे नहीं कर पाते, इसके कारण उनके मन में पूरी दुनिया से शिकायत उत्पन्न हो जाती है। और यही शिकायत उसके जीवन को प्रस्फुटित करने की स्वाभाविक प्रेरणा के साथ बार बार अभिव्यक्त होने लगती  है। उसकी यह अभिव्यक्ति प्रायः तोड़-फोड़ के रास्ते से होती है। अपने आक्रोश को प्रकट करने के लिये जो कुछ सामने दीखता हो, उसी को तोड़-फोड़ डालना चाहते हैं।  
युवा लोग आदर्शवादी होते हैं, उनके सामने आदर्श का एक असपष्ट सा मॉडल भी रहता है। किन्तु समाज में वे हर स्तर पर अनुचित (unjust-अन्यायपूर्ण) कार्यों को होते देखते हैं। वे देखते हैं कि कुछ व्यक्ति (जो निश्चित रूप से उनकी अपेक्षा उम्र में बड़े हैं) निश्चिन्त होकर अपना जीवन बिता रहे हैं। जबकि उनके अपने जीवन में अनिश्चयता है और जिसे वे चाहते हों उन्हें प्राप्त नहीं कर पाते, तब वे इन सभी बातों के लिये बड़े-बुजुर्ग लोगों को ही उसका जिम्मेवार मानने लगते हैं। इसीलिये वे उनका सम्मान नहीं कर पाते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि समाज की सारी व्यवस्था इन बड़े-बुजुर्गों ने ही बनाई हैं, इसलिये उनका आक्रोश समाज की हर व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने पर उतारू हो जाता है।  
किन्तु यह समस्या नूतन नहीं है, चिरस्थायी है। हाँ, इसमें कुछ नई समस्यायें अवश्य जुड़ गयी हैं- वे देखते हैं उनको रहने के लिये घर का आभाव है, शिक्षा पाने का समान अवसर उपलब्ध नहीं है, और प्रतियोगिता के कारण दिनों दिन और भी सीमित होता जा रहा है, पैसे कमाने का कार्यक्षेत्र बहुत सीमित है, खेल-कूद या मनोविनोद करने के लिये कोई स्थान (खुला -मैदान,पार्कआदि ) भी सुलभ नहीं है। यह सब देखने से उनके मन में निराशा जन्म लेती है, जिसके फलस्वरूप क्रोध उनके मन को आछन्न कर लेता है। यह आक्रोश फट पड़ने के लिये किसी प्रकार के समझ बूझ या विवेक-विचार की अपेक्षा नहीं करता। इसलिये जैसे ही कोई व्यक्ति या दल अथवा निहित स्वार्थी तत्व उनकी मनोव्यथा और अभिलाषा के प्रति थोड़ी सी सहानभूति भी प्रकट करते हैं, युवा लोग विवेक-विचार किये बिना, तुरन्त उनके समक्ष आत्मसमर्पण कर देते हैं। इसके कारण स्वार्थीतत्वों का स्वार्थ तो सिद्ध हो जाता है, किन्तु उनकी जीवनी शक्ति का प्रवाह रेतीले मार्ग में ही खो जाता है। 
युवा-समस्या के विषय में बड़े-बुजुर्ग लोगों की धारणा क्या है ? वे समझते हैं कि ये लोग बड़े उदण्ड हो गये हैं, थोड़ी  भी विनम्रता इनमें नहीं बची है, बिल्कुल असंयमी और शांति भंग करने वाले हैं। इनलोगों का एक वर्ग तो युवा-समुदाय की निन्दा करके ही चुप बैठ जाता है, वहीँ कुछ अन्य (समाज के ठकेदार) लोग  इनके उपर बाहर से अनुशासन थोप कर इन्हें बन्धनों में जकड़ना चाहते हैं। अपने जीवन को उपद्रव से बचाने के स्वार्थवश वे युवाओं को प्रलोभन देकर, या दबाव डालकर शिक्षित करना चाहते हैं, किन्तु उपर से प्रलेप चढ़ा कर उन्हें सुरुचिपूर्ण बनाने की चेष्टा करते हैं। या येन-केन-प्रकारेण उनके क्रोध को हलका करना चाहते हैं युवाओ की समस्या का समाधान करने के लिये अपनी आधुनिक उदारता का प्रदर्शन
करते हुए, बहुत हुआ तो इनके लिये आमोद-प्रमोद और खेल-कूद के लिये अधिक अवसर देने की चेष्टा (क्रिकेट मैच आदि) करते हैं, परीक्षा में पास करवा देना, उपयुक्त शिक्षा और दक्षता अर्जित किये बिना ही नौकरी दे देना, विवाह करने की बाध्यता को समाप्त कर, विपरीत लिंग के साथ अप्रतिबंधित संबन्ध बनाने की उम्र में (१८ से १६ वर्ष करके) छूट देना चाहते हैं।  

॥ ४।।
यौवन की असीम प्राण-उर्जा  
युवा-समस्या वास्तव में क्या है ? इस सच्चाई को दोनों पक्षों- (युवा और बुजुर्ग)  में से कोई भी पक्ष समझने को तैयार नहीं है, शायद इस समस्या का मुख्य पहलु भी यही है। युवा-समस्या भी प्राण-उर्जा के प्रस्फुटन की समस्या है, और युवाकाल की असीम जीवनी-शक्ति ही समस्या का रूप धारण कर लेती है। 
स्वामी विवेकानन्द की परिभाषा के अनुसार, 'जीवन' का अर्थ है- अन्तर्निहित शक्ति को प्रस्फुटित और विकसित करना ! हमने देखा है कि जीवन को विकसित करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को ही समस्या कहते हैं, इसलिये समस्या की खोज या अनुसन्धान भी प्रस्फुटन और विकास की शर्त को ध्यान में रखते हुए करना होगा। 
पूर्वोक्त अध्याय में हमने देखा है, कि युवावर्ग के अतिरिक्त बाकी लोग या तो केवल उनकी निन्दा करते हैं, या कुछ चतुर-स्वार्थी लोग भोग-सुख का प्रलोभन देकर उनकी शिकायत और क्रोध को शांत करने की चेष्टा करते हैं। यह शेषोक्त चेष्टा (प्रलोभन को क़ानूनी बना देने की चेष्टा) जीवन (प्राणउर्जा) को प्रस्फुटित
होने में बाधा पहुँचाना चाहती है। इसलिये यह कभी समाधान का पथ नहीं हो सकता। 
क्योंकि युवा-वर्ग, (अज्ञानता वश) स्वयं जिस सत्ता को प्रकट करना या जाहिर करना चाह रहा है, वह उसका 'कच्चा मैं' (मिथ्या अहं) है, उसकी वास्तविक सत्ता या उसका ' पक्का मैं ' नहीं है। कच्चा 'मैं ' को 'पक्का मैं ' रूपान्तरित करने की चेष्टा को ही विकास कहते हैं। इस विकसित सत्ता, 'यथार्थ मैं ' को - अपनी दिव्यता को अभिव्यक्त करने से वे ही अपने सच्चे जीवन के साथ जुड़ सकते हैं। और यही युवावर्ग की समस्या का सच्चा समाधान हो सकता है।
 कच्चा 'मैं' (मिथ्या अहं) का विकसित होना, मानो बीज के अंकुरित होने जैसी प्रक्रिया है। छोटा सा बीज जिस प्रकार अंकुरित होते समय कड़ी मिट्टी का भेदन करके अपने को प्रकट करता है। वह बीज जिस प्रकार अपने प्रस्फुटित होने की बाधा को बलपूर्वक भेदन करके विकसित होता है, उसी प्रकार युवाजीवन भी समाज के कठोर वातावरण को बलपूर्वक विदीर्ण करके,  विकसित हो जायेगा। इसलिये हमें समझना होगा कि युवावर्ग की समस्याओं की जड़, जीवन-पुष्प के प्रस्फुटित होने की समस्या में ही निहित है। और स्वामीजी समस्याओं के इसी पहलु की ओर हमलोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं। [स्वामीजी से एकबार किसी ने पूछा था-" Swamiji, r u a Buddhist ? तो उन्होंने थोड़ा व्यंगात्मक रूप से कहा था -"No, I am a bud-dist."
चंचलता, अस्थिरता, बड़े-बुजुर्ग लोगों के 'कथनी और करनी ' में एकता और अपनापन नहीं रहने से, प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न असहिष्णुता, समाज के समस्त दोषों, अपरिपक्कव बुद्धि के साथ कुछ कर दिखाने की आतुरता, असीम उत्साह, जोश, समाज के समस्त दोषों, अन्याय को दूर करने की इच्छा के साथ किसी अनिश्चित आदर्श के प्रति आस्था-आदि बातें युवावर्ग में देखी जा सकती हैं। युवावर्ग स्वाभाव से ही अति-
वादी होता है, जीवन के किसी भी क्षेत्र में, जहाँ बल-प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ती हो वहाँ आवश्यकता से अधिक बल लगा देना उनका स्वाभाव होता है। जो कुछ करता है उसको अती तक ले जाता है। जिससे प्रेम करता है, अत्यधिक प्रेम करता है; जिस बात से घृणा करता है,अत्यधिक घृणा करता है। यही उनका वैशिष्ट भी है, क्योंकि उनके भीतर असीम प्राण-उर्जा होती है। किन्तु यही उनकी कमजोरी का कारण भी बन जाती है। तन्दूर (oven) में आँच देते समय इतना धुआँ निकलता है, कि आँखें जलने लगती हैं, किन्तु भोजन नहीं पक सकता। जब आग पकड़ लेती है, तो धुआँ निकलना बन्द हो जाता है, और तब खाना पकाया जा सकता है। 
जीवन का यह पड़ाव, यौवन का समय ही  सही रूप में कार्य करने समय है।  किन्तु युवावस्था में धुआँ-निकलने की अवधि का अतिक्रमण कर लेना ही तो समस्या है। और इस समस्या के समाधान का अर्थ है, कर्म करने में सक्षम जीवन को उपयुक्त तरीके से गठित कर लेना। ऐसा सुगठित और उपयुक्त युवाजीवन ही समाज के सभी समुदायों के समस्त प्रकार के आहार्य को पकाने वाला ईन्धन है। इस युवावर्ग से अलग होकर समाज पर्वत के जैसा गतिशून्य होने को बाध्य है। 
' आहार्य ' का अर्थ केवल खाद्द्य पदार्थ ही नहीं है। (जैसे सत्संग या पाठचक्र भी आहार्य है।) जिस वस्तु का आहरण या ग्रहण नहीं करने से, जीवन चल ही नहीं सकता, उसी को आहार्य कहा जाता है ! कच्चे खाद्य-पदार्थ को ग्रहणीय बनाने के लिये अग्नि आवश्यक होती है। इसीलिये वेदों में अग्नि को अन्नपालक कहा गया है।
किस प्रकार की अग्नि होनी चाहिये ? सर्वदा यविष्ट (युवा श्रेष्ठ), वरणीय और तेजःसम्पन्न अग्नि होनी चाहिये ! युवा-संप्रदाय ही समाज का सभी प्रकार से अन्नपालक, अग्निस्वरूप, तेजःसंपन्न, वरणीय हैं। यह अग्नि विध्वंश करने वाली अग्नि नहीं है। कुशलता पूर्वक कर्म का निष्पादन करने के लिये इस अग्नि की आवश्यकता है। चंचलता और अस्थिरता रहने से कार्य का निष्पादन नहीं हो सकता है। जिस प्रकार युवाओं का जीवन चंचल और जोशीला होता है, उसी प्रकार अग्नि की लहलहाती हुई शिखा में सर्वग्रसिता शक्ति होती है। इसीलिये ऋग्वेद-संहिता में अग्नि का आह्वान करते हुए कहा जाता है -  
 त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि । सेमं नो अध्वरं यज ॥११॥
 हे मनुष्यो के हितैषी अग्निदेव! आप होता के रूप मे यज्ञ मे प्रतिष्ठ हों और हमारे इस हिंसारहित यज्ञ को  सम्पन्न करें॥११॥
 नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः। अग्ने दिवित्मता वचः॥२॥
 " सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव! आप सर्वोत्तम होता(यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप मे यज्ञकुण्ड मे स्थापित होकर हमारे स्तुति वचनो (डी-हिप्नोटाइज्ड करने में सक्षम ४ महावाक्यों का ) का श्रवण करें॥२॥
क्योंकि नियंत्रण में नहीं रखने से कोई भी शक्ति कार्यकर नहीं होती है। झूठी प्रशंसा या चाटुकारिता के द्वारा युवाजीवन के क्रोध को शान्त करने की चेष्टा से काम नहीं होगा। यज्ञ का अर्थ होता है त्याग के द्वारा सम्पादित कर्म। दीप्तिमान (ओजस्वी) वचनों के द्वारा अग्निस्वरूप युवा-समुदाय को, उनकी अन्तर्निहित 
शक्ति के संबन्ध में जाग्रत करना होगा।
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$$$$$॥ ५।।
"चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं"
 (हर एक आत्मा में अनन्त शक्ति है।)
स्वामी जी (श्रद्धा जागरण की चेष्टा में) क्या कह रहे हैं ?  " किन्नाम रोदिसि सखे त्वयि सर्वशक्तिः !  -हे सखे, तुम रोते क्यों हो ? तुम्हारे भीतर ही तो समस्त शक्तियाँ अन्तर्निहित हैं।"  इस सच्चाई को जान लो, और उस शक्ति अभिव्यक्त करो।" " 'लोग कहते हैं-इस पर विश्वास करो,उस पर विश्वास करो,' मैं कहता हूँ पहले अपने आप पर विश्वास करो। कहो मैं सब कुछ कर सकता हूँ। 'आत्म्वैही प्रभवते न जडः कदाचित'--जड़ की कोई शक्ति नहीं -प्रबल शक्ति आत्मा की ही है।  

["क्षीणाः स्म दीनाः सकरुणा जल्पन्ति मूढ़ा जना (जो हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड में हैं) -जो लोग देह को ही आत्मा मानते हैं, वे ही मिमियाते हुए करुण कण्ठ से कहते हैं --हम क्षीण हैं, हम दीन हैं, और यही नास्तिकता है!
प्राप्ता:स्म वीरा गतभया अभयं प्रतिष्ठां यदा--जब हमलोग अभयपद (डी-हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड) को प्राप्त हो चुके हों; तब हमलोग अभिः (भयरहित) और वीर (क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज से सम्पन्न) क्यों न हों?--रामकृष्णदासा वयम्-यही आस्तिकता है ! त्यागी हुए बिना (५ अभ्यास किये बिना) तेजस्विता नहीं आने की ! कार्य आरम्भ कर दो। 
"त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः — एकमात्र त्याग के द्वारा ही कुछ चुने हुए लोग  -'रेयर वन्स'- अमृतत्व की प्राप्ति कर लेते हैं! [ 'रेयर वन्स'- जो नियमित रूप से  महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास करते हुए इस 'BE AND MAKE' आन्दोलन से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त किये  हैं, वे ) अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं । थ्रू रिनन्सीऐशन अलोन सम (रेयर वन्स) अटेंड इमॉर्टैलिटी.] बुजदिली करोगे, तो हमेशा पिसते रहोगे ! आत्मा में भी कहीं लिंग भेद है ? स्त्री और पुरुष का भाव दूर करो, सब आत्मा हैं। 
शरीराभिमान छोड़ कर खड़े हो जाओ। छाती पर हाथ रखकर कहो --इट इज, इट इज -"अस्ति अस्ति",
नास्ति नास्ति करके तो देश गया१! "सोऽहं सोऽहं,"चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं"।  हर एक आत्मा में अनन्त शक्ति है। अरे, नहीं नहीं करके क्या तुम क्या कुत्ता-बिल्ली हो जाओगे? नहीं है ? क्या नहीं है ? किसके भीतर नहीं है ? नहीं नहीं सुनने पर मेरे सिर पर वज्रपात होता है। यह जो दीन -हीन भाव है, यह एक बीमारी है -क्या यही दीनता है ?-यह झूठी विनयशीलता है, गुप्त अहंकार है। "न लिङ्गम् धर्मकारणं, समता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्'बाहरी चिन्ह धारण कर लेना धार्मिक होना नहीं है । सभी के प्रति साम्यभाव रखना ही मुक्त पुरुषों का लक्षण है।निर्गच्छति जगज्जालात् पिञ्जरादिव केशरी—He frees himself from the meshes of this world as a lion from its cage!"  "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" दुर्बल मनुष्य इस आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। उद्धरेदात्मनात्मानम्- अपने ही सहारे अपना उद्धार करना पड़ेगा। कुर्मस्तारकचर्वणं- हम तारों को अपने दाँतों से पीस सकते हैं,त्रिभुवनमुत्पाटयामो बलात्,-तीनों लोकों को बलपूर्वक उखाड़ सकते हैं! किं भो न विजानास्यस्मान् रामकृष्णदासा वयम्— हमें नहीं जानते ? हम आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार परमहंस श्रीरामकृष्ण के दास के दास के दास हैं ।   (पत्रावली/२५ सितंबर/ १८९४)]
समस्त वेद यही शिक्षा देते हैं - निराश मत होना, मार्ग बड़ा कठिन है-छुरे की धार पर चलने के समान दुर्गम है; फिर भी निराश न होना, उठो ! जागो ! और अपने उद्देश्य को प्राप्त किये बिना विश्राम मत लो ! "
 किन्तु हम लोग क्या कर रहे हैं ? युवाओं के प्रति इस प्रकार के ओजस्वी सन्देश हम लोगों के मुख से कहाँ निकलते हैं ? उनके चंचल चित्त को और भी अधिक चंचल कर देने के लिये उनके समक्ष अश्लील गाने,
अश्लील साहित्य, हानिकारक वीडियो और टी.वी-धारावाहिक प्रस्तुत कर रहे हैं। हम 'श्रव्य-दृश्य ' (audio video) के माध्यम से जितने भी दौर्बल्य-संचारी भाव हो सकते हैं- उन सबको  युवावर्ग के सामने परोसने की चेष्टा कर रहे हैं।  
युवावर्ग की समस्या ही यही है, कि उनके पास जो कुछ है - सबल शरीर, सतेज इन्द्रिय, प्राणउर्जा, जीवनी-शक्ति, मन, बुद्धि, आवेग, इच्छा,आकांक्षा आदि; वे उनका निग्रह करना नहीं जानते हैं। उन्हें नियंत्रित करके उनका सदुपयोग करना नहीं जानते हैं, उल्टे उसका दुरूपयोग ही कर बैठते हैं। शिक्षा इन सभी शक्तियों का सदुपयोग करना सिखाती है। 
शिक्षा उसी को कहते हैं जो विवेक-प्रयोग करने के लिये मन को संयमित करना सिखाती हो। यह शिक्षा तो हम उन्हें देते ही नहीं हैं, और जो शिक्षा देते हैं, उससे वे अपनी प्राणउर्जा का दुरूपयोग करना ही अधिक सीखते हैं। उसका परिणाम क्या होता है ? हम लोग जीवन पर्यन्त - " शरीर के दास, मन के दास, जगत के दास, एक प्रशंसा भरे वचन के दास, एक अपमान जनक वचन के दास, वासना के दास, सुख के दास, जीवन के दास, मृत्यु के दास, हर वस्तु के दास बने रहते हैं।" 
दूसरों के उपर आरोप मढ़ कर इसके विषमय परिणाम से हम लोग बच नहीं सकते। स्वामीजी कहते हैं- 
" कहो, कि मैं अभी जिन कष्टों को भोग रहा हूँ, वह मेरे ही द्वारा किये हुए कर्मों के फल हैं। इसके द्वारा यही प्रमाणित होता है कि ये सारे दुःख-कष्ट मेरे ही द्वारा दूर भी किये जा सकते हैं। अनन्त भविष्य तुम्हारे सामने पड़ा है। सदैव याद रखना, तुम्हारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक कार्य संचित रहेगा, जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा किया गया कोई असत-विचार और असत कार्य तुम्हारे उपर बाघ के जैसा झपट्टा मारने को उद्दत हैं, उसी प्रकार तुम्हारा सत-चिन्तन और सत्कार्य भी हजारों देवताओं की शक्ति लेकर सदैव तुम्हारी रक्षा करने को तैयार खड़ी हैं।
 " उपाय क्या निकला ? " साधू (सत - चरित्रवान मनुष्य) बनो, वैसा बन जाने पर तुम्हारे अपवित्र विचार बिल्कुल चले जायेंगे। इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व परिवर्तित हो जायेगा। यही समाज का बहुत बड़ा लाभ है। समग्र मानव-जाति के लिये यही महत्वपूर्ण लाभ है।"
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[प्यास जो मेरी बुझ गयी होती। ज़िन्दगी फिर न ज़िन्दगी होती।  कहते हैं -  ”अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्“ यजुर्वेद 36/24 अर्थात् हम सौ वर्ष तक जियें और उससे भी अधिक समय तक दैन्य भाव से दूर रहें। "
 ॐ अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्‌।
अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहिः।।
 अथर्ववेद 12/1/54 

-अर्थात मैं (मनुष्य) स्वभावतः विजयशील हूँ, पृथ्वी पर मेरा उत्कृष्ट पद है। मैं विरोधी शक्तियों को परास्त कर समस्त विघ्न-बाधाओं को दबाकर प्रत्येक दिशा में सफलता पाने वाला हूँ। [(अहम्‌ भूम्याम्‌) मैं पृथिवी पर (उत्तरः नाम अस्मि) सर्वोत्कृष्ट प्रसिद्ध हूँ। क्योंकि मैं (सहमानः) अत्यन्त साहसी हूँ। (अभीषाट्‌ अस्मि) मैं सबसे अधिक सहनशील हूँ, (आशाम्‌-आशाम्‌ ) प्रत्येक दिशा में (विषासहिः) अच्छी प्रकार विजयी हूँ। इसीलिये  (विश्वषाट्‌) सर्वत्र विजयी हूँ। ]

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|| ६ ||
 'श्रद्धा जागरण की शिक्षा'      
शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण अंग है- ब्रह्मचर्य, संयम, सदुपयोग-बुद्धि (Utilization wit),और अनुशासन।
किन्तु इन सब का भी मूल है -श्रद्धा !  इसीलिये स्वामीजी ने श्रद्धा को जीवन की समस्त समस्याओं के समाधान का नुस्खा (formula) कहा है। वे कहते हैं-"इस श्रद्धा (अद्भुत विश्वास) का प्रचार करना ही मेरे जीवन का व्रत है।"
" तुममें से जिन लोगों ने उपनिषदों में सबसे अधिक सुन्दर -'कठोपनिषद ' का अध्यन किया है, उनको नचिकेता की कहानी अवश्य याद होगी। एक राजर्षि महायज्ञ का अनुष्ठान किये थे, दक्षिणा में अच्छी अच्छी वस्तुओं का दान करने के बदले बूढ़ी और किसी भी कार्य के लिये अनुपयुक्त गौओं का दान कर रहे थे। " यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि वर्तमान समय में, बड़े-बुजुर्ग लोगों को अनुचित कार्य करते देखने से, अपनी शक्ति का सद्कार्यों में प्रयोग करने के बजाय, युवावर्ग  अपना असन्तोष या आक्रोश व्यक्त करने लगते हैं। किन्तु स्वामीजी आगे कह रहे हैं-" और कथा के अनुसार उसी समय उनके पुत्र नचिकेता के हृदय में श्रद्धा का आविर्भाव हुआ। इस विलक्षण शब्द - 'श्रद्धा' का वास्तविक अर्थ समझ लेना, बहुत कठिन है। इस शब्द का प्रभाव और कार्यसाधकता अति आश्चर्यजनक है! जैसे ही नचिकेता के हृदय में श्रद्धा जाग्रत होती है, उसके मन में विचार उठता है- " मैं कई छात्रों की तुलना में प्रथम श्रेणी का हूँ, कई विद्यार्थियों की तुलना में मध्यम श्रेणी का हूँ, किन्तु सबसे अधम तो मैं कभी नहीं हूँ ! अतः मैं भी कुछ अवश्य कर सकता हूँ!"  जिस पल उसके हृदय में इस प्रकार की श्रद्धा का उदय हुआ, उसके आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि भी होने लगी। उस समय जो समस्या उसके मन को आन्दोलित कर रही थी, वे उसी मृत्यु-तत्व को आर-पार देख लेने के लिये कमर कस कर तैयार हो गये। 
किन्तु यमराज के घर तक पहुँचे बिना इस समस्या के समाधान का कोई उपाय नहीं था, अतः वह बालक वहीं गया। निर्भीक नचिकेता यमसदन पहुंचकर तीन दिन तक प्रतीक्षा करता रहा, और तुम जानते हो कि किस तरह उसने अपना अभिपिस्त प्राप्त  किया। " 

[१४ अप्रैल १९९२:चिदानन्द रूपः शिवोSहं,  मैं तो शरीर नहीं आत्मा हूँ! तो देखता हूँ कि इस क्षण के बाद वाले क्षण में मरता कौन है?  और सदा के लिये आत्मसम्मोहन समाप्त -सत्य का साक्षात्कार किसको हुआ? अहं नहीं आत्मा को ही हुआ !!] 
" आज हम लोगों को इसी प्रकार की श्रद्धा चाहिये। दुर्भाग्यवश भारत से इसका प्रायः लोप हो गया है, और हमारी वर्तमान दुर्दशा का कारण भी यही है। एक मनुष्य की अपेक्षा दूसरे मनुष्य में जो अंतर दिखाई देता है, उसका कारण अन्य कुछ नहीं केवल इस श्रद्धा के तारतम्य को लेकर ही है। यह श्रद्धा ही है, जो एक मनुष्य को बड़ा और दूसरे को कमजोर और छोटा बनाती है। मैं यही चाहता हूँ की ऐसी ही श्रद्धा तुम्हारे हृदय में भी प्रविष्ट हो जाये। ऐसा ही आत्मविश्वास हम सभी लोगों के लिये आवश्यक है; और इसी श्रद्धा को प्राप्त करने का महान कार्य तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।" ५/२१२-१३ 
इतना कहने के साथ साथ,श्रद्धा से च्युत कर देने वाला जो इसका बिल्कुल विपरीत भाव है, जिसके रहने से समस्या और अधिक जटिल हो जाती है - उससे सतर्क कराते हुए स्वामी जी कहते हैं- " हमारे जातीय खून में एक प्रकार के भयानक रोग का बीज समा रहा है, और वह है प्रत्येक विषय को हँसकर उड़ा देना, गाम्भीर्य का आभाव, इस दोष का सम्पूर्ण रूप से त्याग करो। वीर बनो, श्रद्धा सम्पन्न होओ, और सब कुछ तो इसके बाद आ ही जायेगा। मुझे अपने देश पर विश्वास है- विशेषतः अपने देश (बंगाल) के युवकों पर।" ५/२१३  
स्वामीजी से पूछा गया था- " हमारे देश से इस श्रद्धा का लोप कैसे हो गया ?स्वामीजी ने उत्तर देते हुए कहा था- " बचपन से ही हमलोगों को नकारात्मक शिक्षा (negative education ) दी जाती रही है। हमने यही तो सीखा है कि हम नगण्य हैं, नाचीज हैं। हमें कभी यह नहीं बताया गया कि हमारे देश में भी बड़े बड़े महापुरुषों का जन्म हुआ है। कोई भी सकारात्मक आशावादी (positive) विचार हमें सिखलाये नहीं जाते। सीना तान कर, सिर उठाकर के एक साथ हाथ पैर हिलाना (कदम से कदम मिलाकर लेफ्ट-राइट या घास -माटी, घास-माटी करते हुए चलना) भी नहीं आता। हमें इंग्लैंड के पूर्वजों की तो एक एक घटना और तिथि याद हो जाती है, परन्तु अफ़सोस अपने ही देश के गौरवपूर्ण अतीत से हम अनभिज्ञ रहते हैं। हम केवल निर्बलता का पाठ पढ़ते हैं। अतः श्रद्धा नष्ट न हो तो क्या हो ? " ८/२६९
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श्रद्धा का पाठ पढ़ाने वाला -एक नेता के बाद दूसरा नेता आएगा ही !  
" हम श्र्द्धा खो बैठे हैं, इसीलिये तुम्हारा रक्त पानी जैसा हो गया है, मस्तिष्क मुर्दार ओर शरीर दुर्बल! इस शरीर को बदलना होगा। शारीरिक दुर्बलता ही सब अनिष्टों की जड़ है और कुछ नहीं। तुम्हारा शरीर दुर्बल है, मन दुर्बल है, और अपने पर आत्मश्र्द्धा भी बिल्कुल नहीं है। ...जब काम करने का समय आता है तब तुम्हारा पता ही नहीं मिलता। 
हम सबके भीतर एक ही महिमामय आत्मा है। हमें इस पर विश्वास करना होगा। नचिकेता के समान श्रद्धाशील बनो। नचिकेता के पिता ने जब यज्ञ किया था, उसी समय नचिकेता के भीतर श्रद्धा का प्रवेश हुआ। मेरी इच्छा है -तुम लोगों के भीतर इसी श्रद्धा का आविर्भाव हो, तुममें से हर एक आदमी खड़ा होकर इशारे से संसार को हिला देनेवाला प्रतिभा सम्पन्न महापुरुष हो, हर प्रकार से अनन्त ईश्वरतुल्य हो। मैं तुम लोगों को ऐसा ही देखना चाहता हूँ। उपनिषदों से तुमको ऐसी ही शक्ति प्राप्त होगी। और वहीं से तुमको ऐसा विश्वास प्राप्त होगा।
गृही मनुष्य भी उपनिषदों का अध्यन कर सकते हैं,इससे उनका कल्याण ही होगा, कोई अनिष्ट न होगा। वेदान्त के इन सब महान तत्वों का प्रचार अवश्यक है, ये केवल अरण्य मे अथवा गिरिगुहाओं मे आबद्ध नहीं रहेंगे। वकीलों और न्यायधीशों मे, प्रार्थना-मंदिरों मे, दरिद्रों की कुटियों में, मछुओं के घरों में, छत्रों के अध्यन स्थानों में -सर्वत्र ही इन तत्वों की चर्चा होगी और ये काम मे लाये जायेंगे।"

" कितने मनोहर रीति से कठोपनिषद का आरंभ किया गया है ! उस छोटे से बालक नचिकेता के हृदय में श्रद्धा का अविर्भाव,उसकी यमसदन जाकर यमदर्शन की अभिलाषा और और सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि यमराज स्वयं उसे जीवन और मृत्यु का महान पाठ पढ़ा रहे हैं। और यह बालक उनसे क्या जानना चाहता है ? -मृत्यु का रहस्य। " ५/२२४
 " इन सब जप,पूजा आदि की जड़ कहाँ है ? यह जड़ है श्रद्धा। संस्कृत भाषा के श्रद्धा शब्द को समझाने योग्य कोई शब्द हमारी भाषा में नहीं है। मेरे मत से संस्कृत शब्द श्रद्धा का निकटतम अर्थ 'एकाग्र-निष्ठा' शब्द द्वारा व्यक्त हो सकता है। "६/१३७
"मनुष्य में धर्म और परमेश्वर के प्रति उत्कट श्रद्धा रहनी चाहिये ..एक कमरे में चोर घुस आया और उसे पता लग गया कि दूसरे कमरे में सोने का ढेर रखा है,और वह उस ढेर तक पहुँच भी सकता है, तो क्या वह वहां पहुँचने के लिये पागल न हो जायेगा ? 'ईश्वर में अटूट विश्वास और फलस्वरूप उसे पाने की तीव्र उत्सुकता का ही नाम है 'श्रद्धा।'.३/१०१
" मैं तुम लोगों से फिर एक बार कहना चाहता हूँ कि यह श्रद्धा ही मानव जाति के जीवन का और संसार के सब धर्मों का महत्वपूर्ण अंग है। सबसे पहले अपने आप पर विश्वास करने का अभ्यास करो। ऐ गरीब बंगालियों (तब बिहार-बंगाल एक था), उठो और काम में लग जाओ, तुम लोगों के द्वारा ही भारत का उद्धार होनेवाला है!"५/३३५
संकल्प-ग्रहण: स्वपरामर्श-सूत्र: द्वारा श्रद्धा जागरण  
 “मैं ॠषि-मुनियों की संतान हूँ | भीष्म जैसे दृढ़प्रतिज्ञ पुरुषों की परम्परा में मेरा जन्म हुआ है | गंगा को पृथ्वी पर उतारनेवाले राजा भगीरथ जैसे दृढ़निश्चयी महापुरुष का रक्त मुझमें बह रहा है। समुद्र को भी चुल्लू में पी जानेवाले अगस्त्य ॠषि का मैं वंशज हूँ | श्री राम और श्रीकृष्ण की अवतार-भूमि भारत में, जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं वहाँ मेरा जन्म हुआ है, फिर मैं ऐसा दीन-हीन क्यों? मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ।  आत्मा की अमरता का, दिव्य ज्ञान का, परम निर्भयता का संदेश सारे संसार को जिन ॠषियों ने दिया, उनका वंशज होकर मैं दीन-हीन नहीं रह सकता। मैं अपने रक्त के निर्भयता के संस्कारों को जगाकर रहूँगा। मैं वीर्यवान् बनकर रहूँगा। ” " ऐसा दृढ़ संकल्प हरेक भारतीय बालक को करना चाहिए।  मैं चाहता हूँ कि तूँ कठोपनिषद को कंठस्थ कर ले ! उपनिषदों में ऐसा सुन्दर ग्रन्थ और कोई नहीं है। नचिकेता के समान श्रद्धा,साहस, विवेक और वैराग्य अपने जीवन में लाने की चेष्टा कर, केवल पढ़ने से क्या होगा ? "६/१५
 " इस जीवात्मा में अनन्त शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है; चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक, सभी में वह आत्मा विराजमान है, अंतर केवल उसके प्रत्यक्षीकरण के भेद मेंकिसके  है। वरण भेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत -(कैवल्य पाद)-किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दुसरे खेत में चला जाता है। वैसे ही आत्मा भी आवरण टूटते ही प्रकट हो जाती है। 
परन्तु चाहे विकसित हुई हो या नहीं, वह शक्ति प्रत्येक जीव -ब्रह्मा से लेकर घास तक में -विद्द्यमान है। इसीलिये आत्मानुभूति करने का एक अवसर सभी को मिलता है, सभी ब्रह्म जो हैं।  इस शक्ति को सर्वत्र जा जाकर जगाना होगा। " ६/३१२  
 " अरे ये जो नशाखोर लोग आकर गाना-बजाना करके चले गये, ठाकुर की इच्छा होने पर उनमें से हर एक व्यक्ति विवेकानन्द हो सकता है। आवश्यकता होने पर विवेकानन्द का आभाव न रहेगा। कहाँ से कोटि कोटि विवेकानन्द आकर उपस्थित हो जायेंगे, यह कौन जनता है ? यह (महामण्डल) विवेकानन्द (नवनी दा का?)  का काम नहीं है रे; यह तो उनका काम है-ठाकुर का स्वयं प्रभु का। एक गवर्नर जनरल के जाने के बाद उसके स्थान पर दूसरा आएगा ही! " ८/२५५ 
সকলি তোমারি ইচ্ছা,
ইচ্ছাময়ী তারা তুমি।

তোমার কর্ম তুমি কর
মা লোকে বলে করি আমি।
পঙ্কে বদ্ধ করাও করি,
পঙ্গুরে লঙ্ঘাও গিরি কারে দাও মা ব্রহ্মপদ,
কারে কর অধোগামী ।

আমি যন্ত্র , তুমি যন্ত্রী ,
আমি ঘর , তুমি ঘরণী।
আমি রথ , তুমি রথী , 
যেমন চালাও তেমনি চলি ।।
"सिर्फ इच्छा होने से ही कोई बड़ा (नेता) नहीं बन जाता, जिसे वे उठाते हैं वही उठता है, --जिसे वे गिराते हैं वह गिर जाता है। हमलोग सार्वभौमिक धर्म का प्रचार कर रहे हैं -गुट्टबाजी करके ? ईर्ष्या गुलाम जाति का स्वभाव है, उसे उखाड़ फेंकने  चेष्टा करनी चाहिये। मुझे नाम की आवश्यकता नहीं- आइ वान्ट टू बी आ वॉयस विदाउट फ़ॉर्म ! मैं निराकार की वाणी हो जाना चाहता हूँ । " (पत्रावली /स्वामी ब्रह्मानन्द/सितंबर १८९४)


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॥ ७  ॥
$$$'मेखला'- ही ऋषियों की भगिनी (बहिन-निवेदिता) हैं। 
एकमात्र युवा-समाज (youth) ही सम्पूर्ण समाज को उन्नत करने में सक्षम है। युवाओं की युवा-शक्ति (असीम उर्जा) ही उसके संसाधन (resources ) हैं। किन्तु यही उसकी समस्याओं का मूल कारण भी है, क्योंकि सदुपयोग-बुद्धि (Utilization wit) का दुरूपयोग (misapplication) करने के कारण उनकी संयम-शक्ति (frugality) क्षीण (atrophied) हो जाती है। जबकि शक्ति (ऊर्जा) ही वास्तविक कार्यकारी शक्ति है। ओनली या पावरफुल करंट ऑफ़ वाटर कैन डू हाइड्रॉलिक माइनिंग." स्वामी विवेकानन्द ने २५ जुलाई,१८९५ थाउजेंड आइलैंड पार्क की 'देववाणी' में कहा था -"कामशक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में परिणत करो, किन्तु अपने को पुरुषत्वहीन मत बनाओ,क्योंकि उससे शक्ति का क्षय होगा। यह शक्ति जितनी प्रबल होगी, इसके द्वारा उतना ही अधिक कार्य हो सकेगा। प्रबल जलधारा मिलने पर ही उसकी सहायता से खान खोदने का कार्य किया जा सकता है। " ७/८२     
या नदी की तीक्ष्ण धारा पर बांध बना देने से उसके जल का सदुपयोग करके जल-विद्युत् का उत्पादन और सिंचाई करना संभव है। उसी प्रकार युवा-शक्ति को उपयोगी बनाने के लिये, युवाकाल में ब्रह्मचर्य और संयम (=वीर्य रक्षण) की आवश्यकता होती है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " जब तुमको कोई अभिशाप देता है, या अपमानित करता है, तो उसको सहो और उसके प्रति कृतज्ञ होओ। क्योंकि उसने मानो तुमको आत्मसंयम का अभ्यास करने के लिये, तुम्हारे सामने, यह दिखाने के लिये कि गाली देना,अपशब्द कहना या शाप देना कैसा लगता है, एक दर्पण रख दिया हो। अभ्यास करने का अवसर न मिले तो शक्ति का उद्घाटन या प्रस्फुटन भी नहीं हो सकता है। और दर्पण सामने न रहे तो हम अपना चेहरा स्वयं नहीं देख सकते हैं। "
शक्ति का दुरूपयोग करना समस्या है, और शक्ति का सदुपयोग करना समाधान है। युवा-शक्ति का दुरूपयोग होना, या दुरूपयोग होने की सम्भावना का बने रहना-ही समस्या है। और इस शक्ति का सदुपयोग करना ही समस्या का समाधान है। आत्मसंयम, अनुशासन, ब्रह्मचर्य का प्रशिक्षण देकर युवा-शक्ति का सदुपयोग किया जा सकता है।
किसी प्रश्न के उत्तर में स्वामीजी कहते हैं- " किसी एक ही वस्तु को एक प्रकार से व्यव्हार करने का नाम पाप और अन्य प्रकार से व्यव्हार करने का नाम पुण्य है। जैसे इस दीपक की ज्योति के कारण हमलोग देख पा रहे हैं, और कितने कार्य कर रहे हैं, दीपक का ऐसा सदुपयोग हो रहा है। अब इसी दीपक के ऊपर हाथ रखो, हाथ जल जायेगा।  यहाँ दीपक का व्यव्हार दूसरे ढंग से हुआ। इसीलिए व्यव्हार करने के तरीके के अनुसार ही कोई चीज भली-बुरी बन जाती है। अपने शरीर और मन की शक्तियों का सदुपयोग करने का नाम पुण्य है, एवं  दुरुपयोग करने का नाम पाप है। "
 " अपवित्र चिन्तन या कामुक-विचार और कल्पना अपवित्र कार्य करने जैसा ही दोषपूर्ण है। वासनात्मक इच्छाओं का दमन करने से सर्वोत्तम फल की प्राप्ति होती है। कामप्रवृति (libido) को आध्यात्मिक-शक्ति
(Spiritual power) में रूपान्तरित करो, किन्तु स्वयं को पौरुषहीन मत बनाओ; क्योंकि वैसा करने से केवल शक्ति की बर्बादी होती है। यह शक्ति जितनी प्रबल रहेगी, इसके द्वारा उतना अधिक कार्य सम्पन्न हो सकेगा। ब्रहचर्यवान व्यक्ति के मस्तिष्क में प्रबल शक्ति- असाधारण ईच्छाशक्ति संचित रहती है. " 
" जो श्रद्धा वेद -वेदान्त का मूल मन्त्र है, जिस श्रद्धा ने नचिकेता को प्रत्यक्ष यम के पास जाकर प्रश्न करने का साहस दिया, जिस श्रद्धा के बल से यह संसार चल रहा है "( -उसके श्रद्धा के साथ ब्रह्मचर्य और शिक्षा अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है।)- उसी श्रद्धा का लोप ?  गीता में कहा है -संशयात्मा विनश्यति -अज्ञ तथा श्रद्धाहीन और संशययुक्त पुरुष का नाश हो जाता है। इसीलिये हम मृत्यु के इतने समीप हैं। अब उपाय है - शिक्षा का प्रसार, पहले आत्मज्ञान !" ६/३१२ 

[" तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- शरीर, मन और हृदय (या आत्मा)! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन और शरीर जन्म-मृत्यु का पात्र है; पर तुम अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हो ! किन्तु बहुधा तुम सोचते हो की तुम शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ;' तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है,या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो। " १०/४०] 
श्रद्धा के बिना संसार का कोई भी कार्य उत्कृष्ट रूप से निष्पादित नहीं हो सकता। ऋग्वेद के एक सूक्त के देवता ही श्रद्धा हैं। अथर्ववेद (अथर्व. ६।१३३।४) में एक ऋषि प्रार्थना करते हैं-
 श्रद्धया दुहिता तपसोऽधिजाता
  स्वसा ऋषिणां भूतकृतां बभूव ।
   सा नो मेखले मतिमा धेहि
   मेधामथो ने धेहि तप इन्द्रियं च ।।
  
-अर्थात 'मेखला' श्रद्धा की दुहिता (पुत्री) है, जो ब्रह्मचारियों (छात्रों) के अध्यात्मिक साधना (तप) के फलस्वरूप उत्पन्न हुई है। वास्तव में यह मेखला ही ऋषियों की भगिनी (बहिन-निवेदिता) हैं। (मेखला धारण वीर्य रक्षण करने में सहायक होती है और विभिन्न रोगों से हमारी रक्षा भी करती है)।  जो उनको उत्कृष्ट मौलिक विचारों से परिपूर्ण कर वैश्विक-समाज ( Global society ) को अपने परिवार के रूप में देखने की दृष्टि - ' वसुधैव -कुटुम्बकम'  की ज्ञानमयी दृष्टि प्रदान करतीं हैं। अतेव, हे मेखले ! हमलोगों को चिन्तन-शक्ति दो, हमलोगों को मेधा (श्रुति-धारणसमर्थ बुद्धि-अर्थात महावाक्यों के श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अज्ञानता (इन्द्रिय-सम्मोहन) को नष्ट करने की शक्तिज्ञानमयी दृष्टि) प्रदान करो, हमलोगों को तप करने ( कष्ट सहने ) की शक्ति दो, हमलोगों को इन्द्रिय-संयम से उत्पन ओजस शक्ति दो !"

स्वामीजी कहते हैं- " मनुष्यों के भीतर जो शक्ति काम-प्रवृत्ति में, कामुक-चिन्तन इत्यादि रूपों में प्रकट होती है, उसको संयमित करने पर वह सुगमता पूर्वक ' ओज ' में रूपान्तरित हो जाती है। केवल कामजयी ( काम को परास्त करने वाले ) पवित्र नर-नारी ही इस ओजस-धातू (ओजस रूप में परिणत वीर्य) को अपने मस्तिष्क में संचित करने में समर्थ होते है। योगी लोग कहते हैं-  मनुष्य के शरीर में जितनी भी शक्तियाँ अवस्थित हैं, उनसब में सबसे सर्वोच्च शक्ति ओजस है। ऐसे ओजसशक्ति-सम्पन्न पुरुष जो कोई भी कार्य करते हैं, उसमें ही अलौकिक-शक्ति का आविर्भाव दिखाई देता है। "
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" इट इज ऑवर प्रिविलेज टू  बी अलाउड टू बी चैरिटेबल, फॉर ओनली सो कैन वी ग्रो.द पुअर मैन सफर्स दैट वी मे बी हेल्प्ड; लेट द गीवर निल डाउन एंड गिव थैंक्स, लेट द  रिसीवर स्टैंड अप एंड परमिट."
"हमलोग जो दूसरों के प्रति करुणा प्रकाशित कर पाते हैं, (BE AND MAKE-आंदोलन से जुड़ पाये हैं) यह हमारा एक विशेष सौभाग्य है-क्योंकि इस प्रकार के कार्यों द्वारा ही हमारी आत्मोन्नति होती है। दीन जन मानो इसीलिए कष्ट पाते हैं कि हमारा कल्याण हो ! अतएव दान करते समय दाता ग्रहीता के सामने घुटने टेके और धन्यवाद दे; ग्रहीता दाता के सम्मुख खड़ा हो जाय और अनुमति दे। सभी प्राणियों में विद्यमान प्रभु श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते हुए, उन्हीं को दान दो। जब हम कुछ भी बुराई नहीं देख पाएंगे, तब हमारे लिए जगत्प्रपंच भी नहीं रहेगा-(हमलोग डी-हिप्नोटाइज्ड हो जायेंगे!), क्योंकि प्रकृति का उद्देश्य ही है -हमें इस भ्रम से मुक्त (डी-हिप्नोटाइज्ड) करना।" ७/८२  
 [কাম-শক্তিকে আধ্যাত্মিক শক্তিতে পরিণত কর, কিন্তু নিজেকে পুরুষত্বহীন কর না, কারণ তাতে কেবল শক্তির অপচয় হয়। এই শক্তি যত প্রবল থাকবে, এর দ্বারা তত অধিক কাজ সম্পন্ন হতে পারবে। প্রবল জলের স্রোত পেলে তবেই জলশক্তির সাহায্যে খনির কাজ করা যেতে পারে।]
" जब तक मनुष्य अपनी सर्वोच्च शक्ति -' कामशक्ति ' को ओज में परिणत नहीं कर लेता, कोई भी स्त्री या पुरुष, वास्तविक रूप में अध्यात्मिक (नेता) नहीं हो सकता। अतः हमें चाहिये कि हम अपनी महती शक्तियों को अपने वश में करना सीखें और अपनी ' अदम्य इच्छाशक्ति ' के बल पर उन्हें पशुवत रखने के बजाय आध्यात्मिक बना दें। अतः यह स्पष्ट है कि पवित्रता ही समस्त धर्म और नीति की आधारशिला है !" ४/८९ 
"फिर, संसारी-विषयी लोगों का अनुभव हमें सिखाता है कि विषय-भोग ही जीवन का चरम लक्ष्य है। ये सब हमारे लिये भयानक प्रलोभन हैं। उन सबके प्रति पूर्णतया उदासीन हो जाना और उन सबसे प्रभावित होकर मन को तद्रूप वृत्ति के आकार में परिणत न होने देना ही वैराग्य है। इस प्रकार स्वयं अपने अनुभव किये हुए और दूसरों के अनुभव किये हुए विषयों से हममें जो दो प्रकार की कार्य-प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं,उन्हें दबाना और इस प्रकार चित्त को उनके वश में नहीं देना ही वैराग्य कहलाता है। किसी भी परिस्थिति में मैं मनोवेग के अधीन न होऊं -इस प्रकार के मनोबल को वैराग्य कहते हैं। और यह वैराग्य ही मुक्ति का उपाय है।" १/१२४ 
ऋग्वेद के दशम् मण्डल में श्रद्धा की स्तुति देवता रूप में इस प्रकार की गई है-

श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥५॥
अर्थात 'हम प्रातः मध्याह्न और सांयकाल में श्रद्धा का आह्नान करते हैं, हे श्रद्धे! तू हमें इस लोक में भी श्रद्धायुक्त कर। 
छान्दोग्योपनिषद् ७/१९-२० में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएं वर्णित हैं - मनुष्य के हृदय में निष्ठा आस्तिक्य बुद्धि जाग्रत कराना व मनन कराना।]
[ यज्ञोपवीत लेते समय कमर पर मेखला बाँधनी होती है। मेखला बंधन यानी व्रत बंधन, मेखला बंधन यानी जिंदगी में आने वाली मुसीबतों के साथ कमर कसकर संघर्ष करने की तत्परता रखना, मेखला बंधन यानी जीवन के दैवासुर संग्राम में आसुरी वृत्ति विजयी न हो उसके लिए सतत जागृति
यज्ञोपवीत धारण करने के बाद गुरु के पास जाने वाले को कर्तव्य की दीक्षा और जीवन की दृष्टि प्राप्त होती है। इस अर्थ में उपनयन में उपनयन का अर्थ दूसरी आँख या नई दृष्टि ऐसा भी हो सकता है।उपनयन संस्कार एक दिव्य संस्कार है। उसके द्वारा मानव को नया जन्म मिलता है। यह उसका संस्कार जन्म है। 'जन्मना जायते शूद्राः संस्कारात्‌ द्विज उच्यते'। उपनयन संस्कार अर्थात तेजस्वी जीवन की दीक्षा। यज्ञोपवीत देते समय बालक को लंगोटी पहनाते हैं। 
लंगोटी बाँधने का अर्थ है विषय-वासना पर काबू रखना। बिखरी हुई सूर्य की किरणों को बहिर्गोल काँच (Convex lens) द्वारा कागज के एक बिन्दु पर केंद्रित किया जाय तो उससे अग्नि पैदा होती है। उसी तरह विच्छिन्न, स्खलित होने वाली, बिखरी हुई- वीर्यशक्ति को बाँधा जाए, संयमित किया जाए तो उससे भी प्रचंड शक्ति निर्माण होती है। 
लंगोटी का तात्पर्य है कि जीवन में भोग को प्राधान्य न देकर त्याग को प्राधान्य देना, सुख को गले न लगाकर सादगी को आलिंगन करना। सादगी होगी तभी विद्या अर्जित हो सकेगी।'ब्रह्मचर्य और संयम ' मनुष्य के चेहरे को सुन्दर व शरीर को सुदृढ़ बनाने में चमत्कारिक काम करता है। संयम अर्थात् वीर्य की रक्षा। संयम ही मनुष्य की तंदुरुस्ती व शक्ति की सच्ची नींव है। इससे शरीर सब प्रकार की बीमारियों से बच सकता है। संयम-पालन से पाचनक्रिया एवं यादशक्ति बढ़ती है। वीर्य ही ज्ञान, वीर्य ही प्रकाश है। अर्थात् मनुष्य में जो कुछ दिखायी देता है, वह सब वीर्य से ही पैदा होता है। अतः वह प्रधान वस्तु है। 
आध्यात्मिक व भौतिक विकास की नींव ब्रह्मचर्य है। अतः परमात्मा को प्रार्थना करें कि वे सदबुद्धि दें व सन्मार्ग की ओर मोड़ें। यदि आप दुनिया में सुख-शांति चाहते हो तो अंतःकरण को पवित्र व शुद्ध रखें। जो मनुष्य वीर्य की रक्षा कर सकेंगे वे ही सुख व आराम का जीवन बिता सकेंगे और दुनिया में उन्हीं लोगों का नाम सूर्य के प्रकाश की नाईं चमकेगा।
‘हम ब्रह्मचर्य का पालन कैसे कर सकते हैं ? बड़े-बड़े ॠषि-मुनि भी इस रास्ते पर फिसल पड़ते हैं…’ – इस प्रकार के हीन विचारों को तिलांजलि दे दो और अपने संकल्पबल को बढ़ाओ। शुभ संकल्प करो।  जैसा आप सोचते हो, वैसे ही आप हो जाते हो। यह सारी सृष्टि ही संकल्पमय है ।  दृढ़ संकल्प करने से वीर्यरक्षण में मदद होती है और वीर्यरक्षण से संकल्पबल बढ़ता है। विश्वासो फलदायकः।  जैसा विश्वास और जैसी श्रद्धा होगी वैसा ही फल प्राप्त होगा ।
 ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों में यह संकल्पबल असीम होता है। वस्तुतः ब्रह्मचर्य की तो वे जीती-जागती मुर्ति ही होते हैं। स्त्री-जाति के प्रति मातृभाव प्रबल करो। 
श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे : “ किसी सुंदर स्त्री पर नजर पड़ जाए तो उसमें माँ जगदम्बा के दर्शन करो। ऐसा विचार करो कि यह अवश्य देवी का अवतार है, तभी तो इसमें इतना सौंदर्य है।  माँ प्रसन्न होकर इस रूप में दर्शन दे रही है, ऐसा समझकर सामने खड़ी स्त्री को मन-ही-मन प्रणाम करो। इससे तुम्हारे भीतर काम विकार नहीं उठ सकेगा। 

भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण को जब सीताजी के गहने पहचानने को कहा गया तो लक्ष्मण जी बोले : हे तात ! मैं तो सीता माता के पैरों के गहने और नूपुर ही पहचानता हूँ, जो मुझे उनकी चरणवन्दना के समय दृष्टिगोचर होते रहते थे। केयूर-कुण्डल आदि दूसरे गहनों को मैं नहीं जानता। " पवित्र मातृभाव द्वारा वीर्यरक्षण का यह अनुपम उदाहरण है जो ब्रह्मचर्य की महत्ता भी प्रकट करता है। ]
[जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ की रचना 'ऋग्वेद' में वर्णित एक सूक्त 'श्रद्धा ' के आधार पर हुई है-
श्रद्धां हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥-ऋग्वेदः १०-१५१-४॥
-अर्थात सब लोग हृदय के दृढ़ संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं क्योंकि श्रद्धा से ही ‘वसु’ (भौतिक
 कल्याण -धन वैभव) और आध्यात्मिक कल्याण (अमरत्व) दोनों प्रकार के ऐश्वर्य  कीप्राप्ति होती है।
आध्यात्मिक वसु है अज्ञान का नाश कर अमरत्व की प्राप्ति, अमरता की उपलब्धि का प्रधान साधन- यही ‘श्रद्धा’ ही तो है। 

कामयानी महाकाव्य वस्तुतः अपूर्ण मानव (कच्चा मैं) को परिपूर्णता (पक्का मैं ) की ओर ले जाने वाली विकास-यात्रा की दिशा व अन्तिम पड़ाव दोनों ही है। मनु भारतीय इतिहास के आदि पुरुष हैं। 'मनु' ही मानव-जाति के प्रथम पथ-प्रदर्शक या ' नेता ' हैं ! और अग्निहोत्र प्रज्वलित करने वाले तथा अन्य कई वैदिक कथाओं के नायक हैं। 
मनु अर्थात् मन के दोनों पक्ष हृदय और मस्तिष्क का संबंध क्रमश: श्रद्धा और इड़ा (मस्तिष्क में अवस्थित इन्द्रिय-केन्द्र) से भी सरलता से लगाया जाता है। इड़ा को मेघसवाहिनी नाड़ी भी कहा गया है। ऋग्वेद में इड़ा को धी, बुद्धि का साधन करने वाली; मनुष्य को चेतना प्रदान करने वाली कहा है। राम, कृष्ण और बुद्ध और श्रीरामकृष्ण भी इन्हीं (मनु) के वंशज हैं। भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा (शतरूपा) से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है। श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है-
‘काम-गोत्रजा श्रद्धानपामर्षिका’। 
श्रद्धा काम-गोत्रजा अथवा काम की संतति है। इसीलिए तो महाकाव्य का नाम ‘कामायनी’ पड़ा है। देवगण के उच्छृंखल स्वभाव, निर्बाध आत्मतुष्टि में अंतिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को नए युग की सूचना मिली। इस मन्वंतर के प्रवर्त्तक मनु हुए।  सृष्टि-रचना का मूल भी वह प्रबल ‘काम’ ही है।  नासदीय सूक्त में सृष्टि-व्युत्पत्ति की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार वर्णित हैः
कामस्तदग्रे    समवर्तताधि   मनसो   रेतः प्रथमं यदासीत्।

स  तो  बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि  प्रतीष्या  कवयो  मनीषा।

सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व ‘काम’ विद्यमान था यहां ‘काम’ का अर्थ ‘सिसृक्षा’ अर्थात् सृजन की इच्छा से है। परमात्मा ने ‘ईक्षण’ (आलौकिक इच्छा) से ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ का संकल्प लिया। यह ‘काम’ अथवा कामना सृष्टिकर्ता ब्रह्म के मन में बीज रूप में पूर्व से ही विद्यमान थी। कामायनीकार के अनुसार काम के दो स्वरुप हैं - 'संभोगात्मक तथा प्रगतिशील' और दोनों ही स्वरूप मांगलिक है। किन्तु अपने प्रथम रूप तक  ही सीमित रहने के कारण वह मनुष्य-जीवन को वात्याचक्र (बवंडर - Whirlwind cycle) के समान जीवन को भटकाता रहता है। भोगवादी काम का यही परिणाम है। देव सृष्टि के विनाश का भी यही कारण था।
दूसरी ओर काम के इस संभोगात्मक रूप का पूर्णतया परित्याग जीवन-शक्ति की इच्छा का विरोध है, विकास का बाधक है। उससे जीवन का सम्पूर्ण आनन्द समाप्त हो जाता है। इसीलिए कामायनी में राग-
विराग समर्पित काम को स्वीकार किया गया है।“
जल-प्लावन का वर्णन शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय से आरम्भ होता है। जल-प्लावन भारतीय इतिहास में एक ऐसी प्राचीन घटना है, जिसने मनु को देवों से विलक्षण, मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया। कामायनी में ‘श्रद्धा’ के माध्यम से एक सन्तुलित जीवन जीने की प्रेरणा है जहाँ न तो घोर विलासितापूर्ण सतत वासनामय ऐहिक जीवन की तलाश है और न ही एकान्तिक वैराग्य धारण करना ही अभीष्ट है। एक समन्वय का मार्ग विदुषी ‘श्रद्धा’ से प्राप्त होता है। श्रद्धा मनु को निर्भयता का पाठ पढ़ाती है। उसका प्रश्न भीरुता के कारण ही व्याख्या चाहता है-

तपस्वी ! क्यों इतने हो क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?

आह! तुम कितने अधिक हताश-बताओं यह कैसा उद्वेग।56

श्रद्धा मनु को भयभीत देखकर आश्चर्यचकित है- ‘आह! तुम कितने अधिक हताश!’ वाक्य में उसके मन में करुणा का आवेग है क्योंकि वह जानती है कि मानव तो अमरता की कृति है-

अरे तुम इतने हुए अधीर; हार बैठे जीवन का दाँव, 
जीतते मरकर जिसको वीर।

 वेद के सदृश ही श्रद्धा के ये वाक्य महान आशावादी संदेश देते प्रतीत होते हैं। श्रद्धा उन्हें पुनः प्रवृत्ति मार्ग की ओर उन्मुख करती हुई अनवरत कर्म का सन्देश देती है। कामायनी की श्रद्धा भी यथा समय मनु के मन में आशा का संचार करती प्रतीत होती है-
और यह क्या तुम सुनते नहीं, विधाता का मंगल वरदान ?
शक्तिशाल हो, विजयी बनो विश्व में गूँज रहा जय-गान।

डरो मत, अरे अमृत संतान। अग्रसर है मंगलमय वृद्धि,
पूर्ण आकर्षण जीवन-केन्द्र, खिंची आवेगी सकल समृद्धि।

 -श्रद्धा सामान्य नारी नहीं वह तो विश्व मंगला मातृ-मूर्ति के रूप में सामने आई है-

तुम देवि! आह कितनी उदार, वह मातृ-मूर्ति है निर्विकार;

हे सर्वमंगले! तुम महती, सबका दुख अपने पर सहती।

”बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,

विश्व भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।“

 मनुष्य  का चरम लक्ष्य अपने यथार्थ स्वरूप को पाना है। इसे पाने के लिए उसे जगत के आकर्षण से भागना नहीं है- निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ना है। अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को नियंत्रण में रखने का प्रशिक्षण प्राप्त करके, समस्त जागतिक कार्य निष्पादित करना है, और निरंतर लक्ष्य (नश्वर वस्तुओं में आसक्ति का पूर्ण-त्याग ) की ओर बढ़ते रहना है। अपने लक्ष्य तक पहुँचे बिना विश्राम नहीं लेना है ! यह कौशल (तकनीक) प्रसाद जी की कामायनी को भली-भाँति आती है- नायिका के रूप में ' श्रद्धा ' नायक 'मनु' की प्रतिपग सहायिका बनी, उसकी दुर्बलताओं को क्षमा करती हुई, निराशा के मध्य आशा के दीप प्रज्ज्वलित करती हुई, असफलताओं को नकार अनवरत प्रोत्साहन द्वारा जीवन का ध्येय बताने वाली मार्गदर्शिका भी है। श्रद्धा के साथ मनु का मिलन होने के बाद उसी निर्जन प्रदेश में उजड़ी हुई सृष्टि को फिर से आरंभ करने का प्रयत्न हुआ।
जीवन के जितने भी नैतिक आदर्श हैं उनका आधार मनुष्य का सत्य-स्वरूप या यथार्थ स्वरूप ही है। अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति जागरूक बने रहना ही वास्तविक धर्म है। सत्य मार्ग को उन्मुख व्यक्ति ही वास्तव में सदाचारी है। हमारे वेद सदा सत्य और ऋत के मार्ग में चलने की आज्ञा देते आए हैं।  
 ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः’ के सिद्धान्त का अनुपालन करती हुई ‘श्रद्धा’ प्रथमतः मनु को कर्म की ओर प्रेरित करके ऐहिक जीवन की प्रेरणा प्रदान करती है। लेकिन वह मानव के वास्तविक उद्देश्य को भी भूली नहीं है। इसीलिए तो मनु को कैलास पर ले जाकर उसके जीवन में सात्त्विकता और समरसता का समावेश करती है।
कामायनी में जब मनु सत्य के मार्ग में न चलने का दुष्परिणाम भोगकर मुमूर्षु दशा में पहुँचते हैं तो वह श्रद्धा ही है जो उन्हें सत्य के मार्ग की ओर पुनः प्रवृत्त करा आनन्द उपलब्ध कराती है। 'ऋत' अर्थात महत् - महा चित्त की शक्ति ही विश्व को एक नियम एक कानून-व्यवस्था (इन्द्रिय-विषयों के प्रति आसक्ति का त्याग) में स्थापित रखती है और जो अपने कर्मों से इस नियम में व्याघात पहुँचाता है उसे वह नष्ट कर देती है। मनु ने स्वेच्छाचारिता में इस नियमन को नहीं माना था। यही उसके समूचे वंश के सर्वनाश का कारण बना। श्रद्धा ऋृत की इस महान व्यवस्था से परिचित है। और सर्वत्र उसी एक सत्य की उपस्थिति पाती है-

‘श्रद्धा देवी प्रथमजा ऋतस्य’, तै.ब्रा. 3/12/1-2 
जिसके आधार से सब चल रहा हैं , सब ठहरा हैं , जिसके कारण अराजकता नहीं हैं।  बसंत आता हैं और फूल खिलते हैं। पतझड़ आता हैं और पत्ते गिर जाते हैं।  वह अदृश्य नियम , जो बसंत को लाता हैं और पतझड़ को।  सूरज हैं , चाँद हैं , तारे हैं ।  यह विराट विश्व हैं और कही कोई अराजकता नहीं ।  सब सुसंबद्ध हैं। सब एक तारतम्य में हैं।  सब संगीतपूर्ण हैं।  इस लयबद्धता का ही नाम ऋत हैं । न तो वृक्षों से कोई कह रहा हैं कि हरे हो जाओ , न ही पत्तो को कोई खीच खीच कर उगा रहा हैं ….बीज से वृक्ष पैदा होते हैं , वृक्षों में फूल लग जाते हैं ।  सुबह होती हैं , पंक्षी गीत गाने लगते हैं । सब कुछ समायोजित ढंग से हो रहा हैं ।  कही कोई संघर्ष नहीं हैं , सहयोग हैं – ऋत शब्द में यह सब समाया हुआ हैं । हर चन्द्र महीने रजस्वला होती स्त्री ‘ऋतुमती’ कहलायी जिसका सम्बन्ध सृजन की नियत व्यवस्था से होने के कारण यह अनुशासन दिया गया –  गृह्स्थों के लिये  – केवल ऋतुस्नान के पश्चात संतानोत्पत्ति हेतु युगनद्ध होने वाले दम्पति ब्रह्मचारियों के तुल्य होते हैं।
सायण भाष्य आदि में ऋत को सत्य का पर्यायवाची माना जाता है । ऋत और सत्य में अन्तर बताते हुए प्रायः सायण भाष्य में कहा जाता है कि जो मानसिक स्तर पर सत्य है वह ऋत है और जो वाचिक स्तर का सत्य है, वह सत्य है। पुराणों में अनृत (अन्- ऋत) को मृत कहा गया है । अनृत अवस्था में केवल जीवन के रक्षण भर के लिए ऊर्जा विद्यमान है, जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए नहीं । ऋत अवस्था जीवन में क्रियाशीलता लाती है, पुष्प, फल उत्पन्न कर सकती है । जीवन में जो भी कामना हो, वह सब ऋतम् का भरण करने से पूर्ण होगी। 
जब हम सोए रहते हैं तो वह अनृत अवस्था कही जा सकती है । उसके पश्चात् उषा काल की प्राप्ति होने पर सब प्राणी जाग जाते हैं । ऋग्वेद में श्रद्धा हेतु प्रशंसासूचक वाणी में कहा गया कि जिस प्रकार सूर्य की पुत्री उषा मनुष्यों के हृदय में आह्लाद उत्पन्न करती है, ठीक उसी प्रकार जिन मनुष्यों के हृदय में 'श्रद्धा-देवी' का निवास है वे लोग उसी देवी के समान सभी मनुष्यों में आह्लाद जन्य सौम्य स्वभाव उत्पन्न करते हैं। तत्त्वज्ञ ऋषि तो मनुष्य ही नहीं प्राणि मात्र में समत्व दृष्टि रखते थे। उनका तो उद्घोष थाः 
मित्र स्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
समाज में व्यक्ति यदि अधिकार की माँग रखता है तो उसके कुछ कर्तव्य भी हैं। व्यक्ति का समाज के प्रति समर्पण ही उसे स्वीकार्य है।

अपने में सब कुछ भर, कैसे व्यक्ति विकास करेगा?

यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।

औरों को हँसते देखो मनु- हँसो और सुख पाओ,

अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ!

स्वार्थ में लीन आत्मकेन्द्रित व्यक्ति उसकी दृष्टि में महनीय नहीं है। समग्र समाज की भलाई व प्रसन्नता हेतु कार्यरत व्यक्ति, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शक नेता (श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, माँ सारदा पूज्य नवनी दा ---) ही उसके लिए श्रद्धेय है-
ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः (ऋ.9/सू.73/6) 
- प्रार्थना और यज्ञ करने वाला सदाचारी होना चाहिए। नहीं तो उसकी पूजा-प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। सदाचारी लोग ही तरते हैं, दुराचारी नहीं। अज्ञानी लोग जो हितोपदेश को भी नहीं सुन सकते वे सच्चाई के मार्ग को छोड़ देते हैं, वे दुष्टाचारी इस भवसागर की लहर को नहीं तर सकते। 
वैदिक ऋषि समाज में एकता व समन्वय की अपेक्षा रखते थे। एक ऐसे आदर्श समाज की परिकल्प उनके मन में थी जहाँ सभी के संकल्प, सोच, भावनाएँ, खान-पान, मंत्र, यज्ञ-भावना एक सी हों। पारस्परिक सौहार्द और सहयोग की उदान्त भावना से सम्पृक्त समाज ही उन्हें काम्य था। 
श्रद्धा की उदात्त चेतना समूची सृष्टि से तादात्म्यीकरण की स्थिति में है। यहाँ मनुष्येत्तर पशु-पक्षी भी उसी की सत्ता के पर्याय है। सचमुच यहाँ श्रद्धा की उपस्थिति एक ऋषिका सी ही है। प्राणी मात्र पर कष्ट उसके हृदय में शर-सा प्रहार करता है। आकुलि-किलात की सहायता से मनु की पशु-बलि श्रद्धा को मर्मान्तक पीड़ा दे जाती है-
यह विराग सम्बन्ध हृदय का कैसी यह मानवता!

प्राणी को प्राणी के प्रति बस बची रही निर्ममता!

जीवन का संतोष अन्य का रोदन बन हँसता क्यों?

एक-एक विश्राम प्रगति को परिकर-सा कसता क्यों?]

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॥ ८।। 
$$$ संप्रेषण शक्ति ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है ! 
"आस्तिक्य- बुद्धि"- को ही श्रद्धा कहते हैं। (‘श्रत्’ शब्द में ‘अङ्’ प्रत्यय की युति होने पर श्रद्धा शब्द की व्युत्पत्ति है, जिसका अर्थ है- ‘आस्तिक्य बुद्धि’ या ‘विश्वास’।) 'श्रद्धा' रहने से ही ब्रह्मचर्य और संयम, उससे विवेक-प्रयोग की शक्ति, उससे 'मेधा' (श्रुति-धारणसमर्थ बुद्धि-अर्थात महावाक्यों के श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अज्ञानता (इन्द्रिय-सम्मोहन) को नष्ट करने की शक्ति), तपः शक्ति (प्रयत्न क्षमता-५ अभ्यास करने में अध्यवसाय), वीर्य और ओजस प्राप्त होते है। इसीलिये समस्त दुर्लभ गुणों की जननी 'श्रद्धा' के बिना, शिक्षा कभी सम्भव नहीं हो सकती। (श्रद्धा का शब्दिक अर्थ है- ‘सत्य धीयते यस्याम्’ अर्थात् जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है।) अशिक्षा (अज्ञानता-भोगबन्धनों से हिप्नोटाइज्ड रहना) ही समस्त समस्याओं का जनक है !  
समस्त समस्याओं का समाधान केवल उपयुक्त शिक्षा अर्जन के बल पर (महावाक्यों के श्रवण-मनन-निदिध्यासन के बल पर) ही संभव हो सकता है। स्वामीजी कहते थे " ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका समाधान - ' शिक्षा ' मन्त्र के बल पर न किया जा सकता हो ! " इन सब का मूल है - श्रद्धा। इसीलिए श्रद्धा ही समस्त समस्याओं के समाधान की मूल कुंजी है। 
युवा-जीवन ही शिक्षा अर्जित करने का सबसे उपयुक्त समय है। उपयुक्त-शिक्षा (परमहंस श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में प्राप्त होने वाली शिक्षा)  के फलस्वरूप हमलोगों की उर्जा संवर्धित होकर ओजस के रूप संचित रहती है; जिससे संयम, जीवन्तता (invigoration) और प्रयत्न (५ अभ्यास) में लग जाने की स्फूर्ति प्राप्त होती है। वैसी शिक्षा यदि नहीं मिल सकी तो, युवा-जीवन की असीम उर्जा (शक्ति) ही समस्या बन कर खड़ी हो जाती है। इस शिक्षा को अर्जित करने के लिए लगातार प्रयत्न करते रहना
पड़ता है। 
स्वामीजी ने कहा है- " प्रयत्न करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।" जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य, जीवन की असीम सम्भावना, जीवन की समस्या और समाधान आदि बातों को समझने के लिए स्वच्छ विचरण-क्षमता होनी चाहिये। यह क्षमता भी हमें यथार्थ शिक्षा द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। स्वामीजी ने कहा है-
" शिक्षा देते समय और भी एक महत्वपूर्ण विषय को हमें याद रखना होगा, हमें विद्यार्थियों को किसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए, स्वयं ही गहन चिन्तन करने को प्रोत्साहित करना चाहिए। शिक्षा इस प्रकार दी जानी चाहिए ताकि वे स्वयम (किसी प्रश्न का उत्तर खोजना ) चिन्तन-मनन करना सीख जायें। इस मौलिक-चिन्तन करने की क्षमता का आभाव ही भारत के वर्तमान पतनावस्था का कारण है। यदि लडकों को ऐसी शिक्षा दी जाये ( जिससे वे मौलिक चिन्तन करना सीख कर स्वयं उस सत्य (आत्मा) को आविष्कृत करने में समर्थ हो जाएँ जो अमर, अनंत और सर्वशक्तिमान है) तभी वे लोग मनुष्य बन सकेंगे, एवं जीवन-संग्राम में आने वाली किसी भी समस्या को स्वयं ही हल करने में समर्थ हो जायेंगे। "
" जिस प्रकार लडकों को ३० वर्ष की उम्र तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर सत्य को जानने के विज्ञान की तकनीक या कौशल सीखना होगा, उसी तरह लड़कियों को भी यह तकनीक (श्रवण-मनन-निदिध्यासन)  सीखनी होगी। आज इस प्रकार की शिक्षा देने में समर्थ योग्य शिक्षकों (लीडर्स ) को प्रशिक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती है, जिससे हजारो सिंगी जैसे गृहस्थ युवाओं को प्रशिक्षित किया जा सके।"  
किन्तु प्रश्नकर्ता  ने फिर पुछा- ' पर आज की विश्वविद्यालय की शिक्षा में क्या दोष है ?
 स्वामीजी कहते हैं - " तुमलोग अभी जिस शिक्षा को प्राप्त कर रहे हो, उसमे कुछ गुण अवश्य हैं, किन्तु उसके साथ साथ अनेकों दोष भी हैं। और ये दोष इतने अत्यधिक हैं कि इसका गुण वाला अंश नगण्य हो जाता है। इस शिक्षा का या किसी भी तरह से दी जाने वाली निषेधात्मक शिक्षा का सबसे पहला दोष तो यह है कि, उनके पास जो भी पारम्परिक ज्ञान (महावाक्य श्रवण -मनन-निदिध्यासन ) रहता है, वह सब नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है और यह मृत्यु से भी अधिक भयानक है। बालक स्कुल पहुँच कर पहले यही सीखता है कि - उसका पिता एक मूर्ख है, दूसरी बात उसका पितामह एक सनकी -पागल बुड्ढा है, तीसरा प्राचीन आचार्य-गण जितने भी हैं सारे के सारे 'ढोंगी बाबा' थे, और चौथी बात उसे यह सिखाई जाती है कि हमारे रामायण, महाभारत, उपनिषद आदि जितने भी शास्त्र हैं- उनमें केवल झूठी बातें भरी हुई हैं। और इस प्रकार वे १६ वर्ष कि उम्र को प्राप्त करने के पहले ही वे एक जीवनी-शक्ति रहित, रीढ़ कि हड्डी से रहित, 
'नहीं' की समष्टि में परिणत हो जाता है। " 
इस प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करने से यदि युवा-समस्या उत्पन्न होती हो और दिन प्रतिदिन बढती जाती हो, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? 
स्वामीजी कहते हैं- " सिर में कितनी ही बातें ठूंस दी जाती हैं, जिसको वे सारा जीवन पचा नहीं पाते, बेमतलब, अप्रासंगिक, असंगत, असंबद्ध विचार उनके दिमाग में उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं, इसको शिक्षा नहीं कहा जा सकता है। वेदों में कहे गए कुछ महावाक्यों को (वेदान्त परम्परा की श्रवण-मनन-निदिध्यासन पद्धति से) इस प्रकार आत्मसात कर लेना होगा कि, उनसे हमारा जीवन गठित हो सके, जिसे मनुष्य निर्माण हो, चरित्र गठित हो सके। यदि तुमलोग केवल पाँच ही भावों को हजम करके जीवन और चरित्र इस प्रकार गठित कर सको, तो जिस व्यक्ति ने एक पूरे पुस्तकालय की समस्त पुस्कों को रट कर कंठस्थ कर लिया हो, उसकी अपेक्षा तुम्हारी शिक्षा अधिक हुई है- ऐसा स्वीकार करना पड़ेगा। "  
यदि हमलोग केवल युवा-जीवन की समस्या ही नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अनैतिकता, भ्रष्टाचार, नारी-
अपमान, उग्रवाद, आतंकवाद आदि से उत्पन्न समस्त समस्याओं से अत्यन्त त्रस्त महसूस कर रहे हों ; तथा 
उन समस्याओं के समाधान करने के लिये व्याकुल होकर कोई उपाय ढूंढ़ रहे हों, तो यथार्थ- शिक्षा विषय में स्वामीजी द्वारा बारम्बार कथित अनेकों महान विचारों में से निम्नोक्त केवल ५ विचारों को जीवन में आत्मसात करने के लिये चयन कर सकते हैं, यथा -१. श्रद्धा (आत्मविश्वास, ब्रह्मचर्य, सत्यवादिता ) 
२. निर्भीकता (fearlessness/अभिः) ३.स्वार्थ-शून्यता (altruism, ऐल्ट्रूइज़म या परोपकारिता, दूसरों के हित के लिये जीने का सिद्धान्त ) ४. त्याग (नश्वर वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग/renunciation)
 ५. सेवा (Service)
किन्तु शिक्षा केवल शिक्षार्थी (trainee-प्रशिक्षणार्थी) के ऊपर ही निर्भर नहीं करती। " यथार्थ शिक्षा केवल वैसे व्यक्ति ही दे सकते हैं- जिनके पास देने के लिये कुछ हो, क्योंकि शिक्षा प्रदान करने का अर्थ केवल व्याख्यान देना नहीं है, और न सिद्धान्तों को प्रदान करना ही -इसका अर्थ है सम्प्रेषण। जो पुरुष अपने शब्दों में अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डाल सकता है,[सत्ता (entity-ब्रह्मत्व) काअपने जीवन का प्रभाव डाल सकता है], उसके शब्द प्रभावशाली होते हैं। परन्तु बात यह है कि उस मनुष्य का व्यक्तित्व ही असाधारण होना चाहिये। (उसे ब्रह्मविद होना चाहिये?) शिक्षण (प्रशिक्षण) में सदा कुछ देना तथा लेना रहता है - आचार्य (नेता /शिक्षक) देता है तथा शिष्य ग्रहण करता है। परन्तु, आचार्य के पास देने को कुछ होना चाहिये, तथा शिष्य के लिये ग्रहणशील होना आवश्यक है। " (एकरूप से आचार्य शिष्य की चेतना में प्रवेश करता है और शिष्य आचार्य के ज्ञान में।)   
किन्तु, शिक्षक (आचार्य/नेता) के भीतर वह संप्रेषण-शक्ति कहाँ से आयेगी ? अथर्ववेद (११-५-१७)में कहा गया है- 
' ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति । 
    आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छ्ते ॥ ' 
  
अर्थात ब्रह्मचर्य के तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करने में समर्थ होता है।  और ब्रह्मचर्य के द्वारा ही आचार्य शिष्यों के शिक्षण की योग्यता को अपने भीतर सम्पादित करता है। ब्रह्मचर्य की वृति से वह मेधावी बन कर ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने के लिये ब्रह्मचारी (शिक्षार्थी) की इच्छा करते हैं। 
[Winning battle against senses is root cause of Successful Leader. इंद्रियों के खिलाफ जंग में जीत हाँसिल कर लेना, अर्थात मन को इन्द्रिय विषयों से खींच कर,(प्रत्याहार)-अन्तर्मुखी बनाकर आत्मस्वरूप (ब्रह्म) में धारण किये रहने (धारणा) का सामर्थ्य ही सफल नेता बनने का मूल कारण है।(अर्थात राज्य का मूल 'इन्द्रिय-जय' है।)
Leader and Teacher – They are what they are (Mediocre or Vibrant of varied degree) due to one essential trait i.e. ब्रह्मचर्येण। कोई नेता या शिक्षक - औसत दर्जे का (मीडीओकर) है, या भिन्न भिन्न डिग्री में वाइब्रेंट (जोशपूर्ण -जिन्दादिल) है ? यह केवल एक अनिवार्य विशिष्टता पर निर्भर करता है - और वह है ब्रह्मचर्य !] 
जो आचार्य (मार्गदर्शक नेता) बनना चाहते हों, उन्हें सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य (सेलिबट-celibate) रूपी (चर्या)
आध्यात्मिक आचरण के साथ ब्रह्मचारी (trainee-प्रशिक्षणार्थी) की कामना करनी चाहिये। वर्तमान शिक्षा-
प्रणाली में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है। कारण के बिना कार्य नहीं होता। युवा-समस्या भी कोई आकस्मिक घटना नहीं है। जो शिक्षा  समस्याग्रस्त सम्पूर्ण युवा-समुदाय को आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित करने में सहायक हो सकती है- उस 'शिक्षा के विशेष पक्ष' की ओर इंगित करते हुए, स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- 
" मेरे विचार से तो शिक्षा का सार मन की एकाग्रता प्राप्त करना है, तथ्यों का संकलन नहीं। यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामर्थ्य बढ़ाता और उपकरण के तैयार होने पर इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। " ४/१०८ 
" मनुष्य के मन में ही समस्या का समाधान मिल सकता है। कोई कानून किसी व्यक्ति से वह कार्य नहीं करा सकता जिसे वह करना नहीं चाहता है। अगर मनुष्य स्वयं अच्छा बनना चाहेगा, तभी वह अच्छा बन पायेगा। पूरा संविधान और संविधान के पण्डित मिलकर भी उसे अच्छा नहीं बना सकते। हम सब अच्छे बनें, यही समस्या का हल है। पूर्णत्व तभी सम्भव है,जब मनुष्य स्वेच्छा से मन को परिवर्तित कर सके, पर इसमें कठिनाई यह है कि वह मन के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता। शिक्षा का आदर्श है -मनरूपी उपकरण को (साधन) को योग्य बनाना और अपने मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना। " ४/१५७  
२३ दिसंबर १९०० को श्रीमती मृणालिनी बसु को लिखित एक पत्र में कहते हैं -" विशालकाय रेल के इंजन को दूर से आते देखकर, नन्हा सा कीड़ा अपने जीवन की रक्षा के लिये रेल की पटरी से हट गया-वह क्यों बुद्धिमान है ? मशीन में इच्छाशक्ति का कोई प्रकाश नहीं है। यन्त्र कभी नियम को उल्लंघन करने की कोई इच्छा नहीं रखता। कीड़ा नियम का विरोध करना चाहता (स्वयं को डी -हिप्नोटाइज्ड करना चाहता है), और नियम के विरुद्ध जाता है, चाहे उस प्रयत्न में वह सिद्धि लाभ करे या असिद्धि; इसलिए वह बुद्धिमान है। जिस परिमाण में इच्छाशक्ति के प्रकट होने में सफलता होती है, उसी अंश में सुख अधिक होता है और जीव उतना ही ऊँचा होता है। परमात्मा की इच्छाशक्ति पूर्ण रूप से सफल होती है इसलिए वह उच्चतम है। शिक्षा क्या है ? क्या वह पुस्तक विद्या है ? नहीं ! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है ? नहीं, यह भी नही। जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। " २९ अक्टूबर १८९६ को लन्दन में अपरोक्षानुभूति (कठोपनिषद) पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं - " जिस ( शरीर रूपी ) रथ के इन्द्रियरुपी घोड़े दृढ़ भाव से संयत नहीं हैं, तथा मन रूपी लगाम मजबूती से पकड़ी हुई नहीं है, वह रथी अन्त में विनाश को प्राप्त होता है। " २/१७२ 
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[ " मेरे गुरुदेव ने यह शिक्षा मुझे सैकड़ों बार दी, परन्तु फिर भी मैं इसे प्रायः भूल जाता हूँ। विचारों की अदभुत शक्ति को बहुत थोड़े से लोग ही समझ पाते हैं। यदि कोई मनुष्य किसी गुफा के अंदर चला जाता है, और अपने को उसमें बन्द कर, किसी एक विषय -'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है' पर एकान्त में निरन्तर एकाग्रचित्त हो मनन करता रहता है, और उसी दशा में आजन्म मनन करता करता अपने प्राण भी त्याग देता है, तो उसके विचार की तरंगे गुफा की दीवारों को भेद कर चारों ओर के वातावरण में फ़ैल जाती हैं और अन्त में वे तरंगे सारी मनुष्य जाति में प्रवेश कर जाती हैं। ...... जैसे मैं तुम्हें एक फूल दे सकता हूँ, उसी प्रकार उससे भी अधिकतर प्रत्यक्ष रूप से धर्म भी संप्रेषित किया जा सकता है। और यह बात अक्षरशः सत्य है !! यह भाव भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से ही विद्यमान है और पाश्चात्य देशों में जो 'ईश्वर-दूतों (पैग़म्बरों) की गुरु-शिष्य-परम्परा' [apostolic succession-ऐपस्टोलिक  सक्सेशन, ईसा के शिष्यों (देवदूतों-ऍपोसल) की आध्यात्मिक उत्तराधिकार परम्परा] का मत प्रचलित है, उसमें भी इसी भाव का दृष्टान्त पाया जाता है। अतः प्रथम हमें (आत्मसाक्षात्कार करके) चरित्रवान होना चाहिये और यही सबसे बड़ा कर्तव्य (धर्म) है, जो हमारे सामने है। सत्य (आत्मा) का ज्ञान पहले स्वयं को होना चाहिये, और उसके बाद उसे तुम अनेक को सिखा सकते हो, बल्कि वे लोग स्वयं उसे सीखने आयेंगे।" " मैंने यह प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया कि धर्म भी दूसरे को 'दिया' जा सकता है, केवल एक ही स्पर्श तथा एक ही दृष्टि में -(त्वं प्रत्यक्षम ब्रह्माSसि कहते हुए) सारा जीवन बदला जा सकता है। " (मेरे गुरुदेव ७/२५८-६०)  
[ "..बाल्यावस्था से ही जाज्वल्यमान, उज्ज्वल चरित्र युक्त किसी तपस्वी महापुरुष (परमहंस) के सहवास में रहना चाहिए, जिससे उच्चतम ज्ञान का जीवन्त आदर्श सदा दृष्टि के समक्ष रहे. ' झूठ बोलना पाप है '- केवल पढ़ भर लेने से क्या होगा ? हर एक छात्र को पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने का व्रत लेना चाहिए, तभी ह्रदय में श्रद्धा और भक्ति का उदय होगा, नहीं तो, जिसमें श्रद्धा और भक्ति नहीं, वह झूठ क्यों नहीं बोलेगा?" ( ८/ २२८-२३२ )
जिसे सदैव इस बात का विश्वास और अभिमान है की वह उच्च कुल में उत्पन्न हुआ है, कभी दुश्चरित्र नहीं हो सकता, उसमें जो उच्च-कुल में उत्पन्न होने का स्वाभिमान और आत्मविश्वास का भाव है, वही उसके विचार और आचरण को सदैव इतना नियंत्रित रखता है कि ऐसा व्यक्ति सन्मार्ग से च्युत होने की अपेक्षा हंसते हंसते मृत्यु का आलिंगन कर लेगा. इसी तरह राष्ट्र का गौरवमय अतीत राष्ट्र को नियन्त्रण में रखता है,और उसका अधः पतन नहीं होने देता. ..जिनके पास आँखें हैं, वे जानते हैं कि हमारा इतिहास कितना उज्जवल है, और वह देश को किस प्रकार जीवित रख रहा है...पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से हमारे युवकों की बदली हुई विचारधारा और डगमग आत्मविश्वास को ध्यान में रख कर, आज उस गौरवमय  इतिहास को फिर से लिखना होगा, जिससे पाश्चात्य सभ्यता से चकित और चकाचौंध में भ्रमित हमारे युवक अपने अतीत पर गर्व करना सीखें ...हमें गुरुगृह-वास और उस जैसी अन्य शिक्षा प्रणालियों ( ३ दिवसीय, ६ दिवसीय युवा प्रशिक्षण शिविर ) को पुनः जीवित करना होगा. आज हमें आवश्यकता है वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान की, ब्रहचर्य के आदर्श, और ' श्रद्धा '-जन्य अद्भुत आत्मविश्वास की. ..वेदान्त का सिद्धान्त है कि मनुष्य के ह्रदय में ज्ञान का समस्त भण्डार निहित है- एक अबोध शिशु में भी- केवल उसको जाग्रत कर देने की आवश्यकता है, और यही आचार्य का कार्य है.' 
आचार्यों में यह सामर्थ्य रहना चाहिए कि वह अपने शिष्यों को देश-कालातीत सत्य के बारे में इस प्रकार कह सके -  " मन और बाह्य प्रकृति की प्रत्येक वस्तु ( नाम-रूप ) देश-काल में हैं और कार्य-कारण के नियम से बँधे हैं. आत्मा सब देश, सब काल, सब कार्य-कारणों से परे है. जो बँधी है, वह प्रकृति है, आत्मा नहीं| ..तुम आत्मा हो, मुक्त और शाश्वत, चिर मुक्त, चिर पवित्र. केवल पर्याप्त श्रद्धा रखो और क्षण भर में तुम मुक्त हो जाओगे. इसलिए अपनी मुक्ति घोषित करो और जो हो, वह बनो !! - सदा मुक्त, सदा पवित्र !. देश, काल, कार्य-कारण को हम माया कहते हैं '. ( १०/२५-२६)
 प्रश्न- उस इन्द्रियातीत सत्य को जानने की विशेष शिक्षा पद्धति कौन सी है ?
' हमारे मत में दो प्रणालियाँ है- एक अस्ति-भाव द्योतक या प्रवृत्ति मार्ग है और दूसरी नास्ति-भाव द्योतक या निवृत्ति मार्ग है. प्रथमोक्त मार्ग से सारा विश्व चलता है- गृहस्थ लोग इसी पथ से प्रेम के द्वारा उस पूर्ण वस्तु को पाने का प्रयत्न कर रहे हैं, यदि इस प्रेम की परिधि को अनन्त गुनी बढ़ा ड़ी जाय, हम उसी विश्व-प्रेम में पहुँच जायेंगे. दुसरे पथ में ' नेति ', ' नेति ' अर्थात ' यह नहीं ', ' यह नहीं ' इस प्रकार की साधना करनी पडती है.
इस साधना में चित्त की जो कोई तरंग ( गाली या अपमान सूचक शब्द )  मन को बहिर्मुखी बनाने की चेष्टा करती है, उसका निवारण करना पड़ता है. अंत में मन (अहम ) ही मानो मर जाता है, तब सत्य स्वयं प्रकाशित हो जाता है. हम इसीको आत्मसाक्षात्कार, समाधि या इन्द्रियातीत अवस्था या पूर्ण ज्ञानावस्था कहते हैं. यह अवस्था विषय (ज्ञेय-ठाकुर ) को विषयी ( ज्ञाता -अहम ) में लीन कर देने से प्राप्त होती है. वास्तव में यह जगत विलीन हो जाता है, केवल ' मैं ' रह जाता है- एकमात्र ' मैं ' ही वर्तमान रहता है. ' (१०/३८४) 
प्रश्न - आपने जिस अद्वैत-अवस्था के बारे में कहा है, वह क्या केवल आदर्श है, अथवा उसे लोग प्राप्त भी करते है ?
' यदि वह केवल थोथी बात हो, तब तो उसका कुछ भी मूल्य नहीं. हम जानते हैं कि यह अवस्था ऋषि-मुनियों को उपलब्ध हुई थी, और उसी पद्धति से अनुसरण करने वाले सत्यार्थी को आज भी होती है. उस इन्द्रियातीत सत्य कि उपलब्धी करने के लिये वेदों में तीन उपाय बतलाये गये है- श्रवण, मनन और निदिध्यासन. इस आत्म-तत्व के विषय में पहले श्रवण करना होगा. श्रवण करने के बाद इस विषय पर विचार करना होगा- आँखें मूंदकर विश्वास न कर, अच्छी तरह तर्क की कसौटी पर कस कर, समझ-बूझकर उस पर विश्वास करना होगा. इस प्रकार आपने सत्य-स्वरुप पर विचार करके उसके निरन्तर ध्यान में नियुक्त होना होगा, तब ( मृत्यु का सामना करते ही ) उसका साक्षात्कार होगा. यह प्रत्यक्षानुभूति ही यथार्थ धर्म है. केवल किसी मतवाद को स्वीकार कर लेना धर्म नहीं है. हम तो कहते हैं यह समाधी या ज्ञानातीत अवस्था ही धर्म है. ' (१०/३८७)
 ' लोग बचपन से ही शिक्षा पाते हैं कि वे दुर्बल हैं, पापी हैं. उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की सन्तान हैं- साहसी बनो, सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो. चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो, जब तक ध्येय तक न पहुँचो, तब तक मत रुको. ' (२/२०)
" क्या यह कभी सम्भव है कि सृष्टि आदि काल से जिस देश की सन्तान अखिल विश्व को शिक्षा देती आ रही है, केवल इसीलिए मूर्ख बन जायगी कि ( भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन या वर्तमान के कपिल सिब्बल उच्च शिक्षा को इतना महँगा कर देना चाहते थे मध्यम वर्ग उस शिक्षा से वंचित रह जाये ) लार्ड कर्जन उच्च शिक्षा बन्द कर रहे हैं ? क्या उच्च शिक्षा का अर्थ केवल भौतिक शास्त्रों का अध्यन, और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन कर लेना भर है ? 
उच्च शिक्षा का उद्देश्य है - जीवन की समस्याओं को सुलझा लेने में समर्थ व्यक्ति बन जाना। और आज के तथा कथित सभ्य देश आज भी जिन समस्याओं में उलझा हुआ है (जीव-ईश्वर-माया ) उन्ही पर गहन चिन्तन कर रहा है, किन्तु हमारे देश में सहस्रों वर्ष पूर्व ही ये गुत्थियाँ सुलझा ली गयीं हैं।
' ईश्वर रूप में सबकी उपासना करो- सारे आकार उसके मन्दिर हैं. बाकी सब कुछ भ्रम है। ' अन्तर्भेदी-दृष्टि प्राप्त कर लो '- हमेशा भीतर की ओर देखो, बाहर (शरीर-M /F ) की ओर कदापि नहीं . '(९/८९) 
' वेदान्त - ' वेद ' शब्द से बना है, और वेद का अर्थ है ज्ञान। समस्त ज्ञान वेद है और ईश्वर की भाँति अनन्त है। कोई व्यक्ति ज्ञान की कभी सृष्टि नहीं करता। क्या तुमने कभी ज्ञान का सृजन होते देखा है ? ज्ञान का अन्वेषण मात्र होता है- आवृत (सत्य) का अनावरण (उद्घाटन ) होता है। ज्ञान सदा यहीं सामने है, क्योंकि वह स्वयं ईश्वर है. अतीत, वर्तमान, अनागत इन तीनों का ज्ञान हम सब में विद्यमान है। हम उसका अनुसन्धान मात्र करते हैं और कुछ नहीं। ' (९/९०)
' थोड़ी धूम-धाम हुए बिना भगवान श्रीरामकृष्ण के नाम से लोग परिचित कैसे होंगे ? और उनसे प्रेरित कैसे होंगे ? ..अब लोग उन्हें क्रमशः जानेंगे, तभी तो देश का मंगल होगा। जो देश के मंगल के लिये ही, आविर्भूत हुए हैं, उनको जाने बिना देश का कल्याण किस प्रकार होगा ? उनको ठीक ठीक जान लेने से - ' मनुष्य ' तैयार होंगे. और ' मनुष्य ' यदि तैयार हो गये, तो दुर्भिक्ष आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है ? ' ( ८/२५१)
প্রথমে দিবার মতো কিছু সঞ্চয় কর। তিনিই প্রকৃত শিক্ষা দিতে পারেন, যাঁহার দিবার কিছু আছে ; কারণ শিক্ষাপ্রদান বলিতে কেবল কথা বলা বুঝায় না, উহা কেবল মতামত বুঝানো নহে ; শিক্ষাপ্রদান বলিতে বুঝায় ভাব-সঞ্চার। যেমন আমি তোমাকে একটি ফুল দিতে পারি , তদপেক্ষা অধিকতর প্রত্যক্ষভাবে ধর্মও দেওয়া যাইতে পারে। যে ব্যক্তি নিজের কথাগুলিতে নিজ সত্তা, নিজ জীবন প্রদান করিতে পারেন, তাঁহারই কথায় ফল হয়, কিন্তু তাহার মহাশক্তিসম্পন্ন হওয়া আবশ্যক। সর্বপ্রকার শিক্ষার অর্থই আদান-প্রদান-আচার্য দিবেন, শিষ্য গ্রহণ করিবেন। কিন্তু আচার্যের কিছু দিবার বস্তু থাকা চাই, শিষ্যেরও গ্রহণ করিবার জন্য প্রস্তুত হওয়া চাই।   
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॥ ९।।
' तूच्छं ब्रह्मपदं '
(ऐसा जीवन चाहिये जिसमें समाधि भी तुच्छ प्रतीत हो) 
स्वामी विवेकानन्द एक युवक से कह रहे हैं-  " यथार्थ जिज्ञासु के साथ दो रात तक बोलते रहने से भी, मुझे थकान का अनुभव नहीं होता, मैं आहार-निद्रा त्याग कर अनवरत बोलता रह सकता हूँ। या इच्छा होने से हिमालय की गुफा में समाधिस्त हो कर बैठा रह सकता हूँ। किन्तु केवल देश की दशा को देख कर और इसके परिणाम के बारे में सोच कर मैं अधीर हो जाता हूँ। समाधी भी तूच्छ प्रतीत होती है, यहाँ तक कि
' तूच्छं ब्रह्मपदं ' हो जाता है। तुमलोगों की मंगल कामना ही मेरे जीवन का व्रत है। "
सुकरात से लेकर अभी तक जितने भी मनीषी हुए हैं, युवा-वर्ग के लिये सभी के मुख से निन्दा ही सुनाई पड़ती है. किन्तु स्वामीजी के मुख से युवाओं के प्रति एक भी निन्दनीय बात नहीं निकली है। उनके मुख से युवाओं के लिये  केवल उत्साहवर्धक, प्रेरणादायी, ज्ञानवर्धक वचन ही निकले हैं। इस युवा वर्ग के प्रति उनमें गहरी सहनुभूति थी. " मेरा कार्य है, तुम लोगों के भीतर महान भावों को जाग्रत कर देना; यदि एक मनुष्य का निर्माण करने के लिये मुझे एक लाख बार भी जन्म लेना पड़े तो मैं उसके लिये भी तैयार हूँ। " आहा ! कैसी लोक-कल्याण की भावना है !   
" पहले भीतर की शक्ति को जाग्रत करके देश के लोगों को अपने पैरों पर खड़ा कर, अच्छे भोजन-वस्त्र तथा उत्तम भोग आदि करना वे पहले सीखें। इसके बाद उन्हें उपाय (५ अभ्यास) बता दे कि किस प्रकार सब प्रकार के भोग-बन्धनों (हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड से)  वे मुक्त हो सकेंगे। निष्क्रियता, हीन बुद्धि और कपट से देश छा गया है। क्या बुद्धिमान लोग यह देख कर स्थिर रह सकते हैं ? रोना नहीं आता ? मद्रास, बम्बई, पंजाब, बंगाल- कहीं भी तो जीवनी शक्ति का चिन्ह दिखाई नहीं देता. तुम लोग सोच रहे हो- ' हम शिक्षित हैं ! ' क्या खाक सीखा है ? दूसरों कि कुछ बातों को दूसरी भाषा में रट कर मस्तिष्क में भरकर, परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सोच रहे हो- हम शिक्षित हो गये !
धिक् धिक्, इसका नाम कहीं शिक्षा है ? तुम्हारी शिक्षा का उद्देश्य क्या है ? या तो क्लर्क बनना या एक दुष्ट-वकील बनना, और बहुत हुआ तो क्लर्की का ही दूसरा रूप एक डिप्टी मजिस्ट्रेट की नौकरी-यही न?
इससे तुम्हें या देश को क्या लाभ हुआ ? एक बार आँखें खोलकर देख- सोना पैदा करनेवाली भारत-भूमि में अन्न के लिये हाहाकार मचा है !..पाश्चात्य विज्ञान की सहायता से जमीन खोदने लग जा, अन्न की व्यवस्था कर- नौकरी करके नहीं-अपनी चेष्टा द्वारा पाश्चात्य विज्ञान की सहायता से नित्य नवीन उपाय का आविष्कार करके ! इसी अन्न-वस्त्र की व्यवस्था करने के लिये मैं लोगों को रजोगुण की वृद्धि करने का उपदेश देता हूँ।" (६/१५५)
" हमलोग क्या कर रहे हैं ? बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिये सबों को प्रचलित शिक्षा देने की व्यवस्था कर रहे हैं (लालच में दोपहर को खिचड़ी खिलाते हैं), सबों के लिये कोई छोटी मोटी नौकरी का उपाय, नहीं हुआ तो बेरोजगारी भत्ता देने की व्यवस्था कर रहे हैं। जिसके कारण समस्या का समाधान तो हुआ ही नहीं, बल्कि इस प्रकार की शिक्षा में पढ़े-लिखे लड़के भी अब ट्रेन डकैती तक कर रहे हैं, और जितने प्रकार का समाज विरोधी कार्य हो सकते हैं, उन समस्त अनैतिक कार्यों में योगदान कर रहे है।"
" लेक्चर से इस देश में कुछ भी न होगा, भाईलोग सुनेंगे, वाह-वाह करेंगे, ताली पीटेंगे, बस और उसके बाद घर जा कर भात के साथ सब हजम कर जायेंगे. पुराने जंग खाए लोहे को ...पहले आग में लाल करना करना होगा, तब कहीं हथौड़ी से पीट कर कोई वस्तु ( मनुष्य ) बनाई जा सकेगी। इस देश में ज्वलन्त जीवन्त उदाहरण दिखाये बिना कुछ भी न होगा। अनेक लडकों की आवश्यकता है, जो सारे इन्द्रिय भोगों को छोड़-छाड़ कर देश के लिये जिवनोत्सर्ग करें। पहले उनका जीवन-गठन (चरित्र - निर्माण) करना होगा, तब कहीं काम होगा। ' ( ८/२५२) ']
॥ १०।।
"मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है!" 
(जिनकी 'मृत्युंजयी-श्रद्धा' के सामने कोई भी समस्या हल हुए बिना रह ही नहीं सकती) 
स्वामीजी के लिये युवा-वर्ग कोई समस्या है ही नहीं। वे तो युवा शक्ति तो राष्ट्रिय-संपदा समझते थे। इसीलिए युवा-वर्ग को तोड़ने की कोई परिकल्पना उनके मन में नहीं थी। बल्कि उन्होंने तो युवाशक्ति को देश की उन्नति और निर्माणकारी योजनाओं में नियोजित करना चाहा था। वास्तव में युवा-समस्या के समाधान का यही सबसे उत्कृष्ट मार्ग है। जैसा श्रीरामकृष्ण कहा करते थे- ' कोलकाता को दूर ठेलना हो तो काशी की ओर अग्रसर होना पड़ता है, काशी की ओर अग्रसर रहने से कोलकाता स्वयं ही दूर होता जाता है।
इसीलिए स्वामीजी युवा वर्ग का आह्वान करते हैं- " तुमलोगों को अपने भविष्य की जीवन-गति को स्थिर करने यही उपयुक्त समय है, जितने दिनों तक यौवन का तेज बरकरार है, जब तुमलोग कर्म करने से थकते नहीं हो, जब तक तुमलोगों के यौवन का नया और सतेज भाव विद्यमान है, काम में लग जाओ, यही तो समय है। " 
भारत के पुनर्निर्माण के लिये आप क्या करना चाहते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वामीजी कहते हैं-
" यदि हम भारत को पुनरुज्जीवित करना चाहते हैं, तो हमें उसके लिए काम करना होगा। मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमें से आयेंगे। सिंहों की भाँति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे। आपके सामने है जनसमुदाय को उसका अधिकार देने की समस्या। आपके पास संसार का महानतम धर्म (वेद -उपनिषद) है, और आप जनसमुदाय को (चार महावाक्य सुनाने के बजाय) सारहीन और निरर्थक बातों पर पालते हैं। आपके पास वेद-उपनिषद का चिरन्तन बहता हुआ स्रोत है, और आप उन्हें गन्दी नाली का पानी पिलाते हैं। विश्वास कीजिये की आत्मा अमर है, अनंत है और सर्वशक्तिमान है। मैं शिक्षा को गुरु (परमहंस) के साथ सम्पर्क -'गुरुगृह वास'- (कैम्प का प्रशिक्षण) समझता हूँ। गुरु (परमहंस 
नेता नवनी दा) के व्यक्तिगत जीवन के अभाव में शिक्षा नहीं हो सकती। अपने विश्वविद्यालयों को लीजिये। उन्होंने एक भी मौलिक व्यक्ति पैदा नहीं किया। वे केवल परीक्षा लेने की संस्थायें हैं। सबके कल्याण के लिये अपने जीवन को न्योछावर कर देने की भावना का अभी हमारे राष्ट्र में विकास नहीं हुआ है।(४/२६१-६२) 
 स्वामी विवेकानन्द केवल इतना ही नहीं मानते थे, कि युवा-समुदाय राष्ट्र के लिए समस्या नहीं वरन राष्ट्र की शक्ति हैं, बल्कि वे यह विश्वास भी करते थे कि देश की समस्त समस्याओं का समाधान केवल युवाओं के द्वारा ही सम्भव होगा। 
किसी विराट समाज की किसी समस्या का कोई अकेला समाधान संभव नहीं है। राष्ट्रिय पुनरुत्थान रूपी व्यापक समस्या के निदान ने ही स्वामी विवेकानन्द की समस्त विचारों और प्रयास को निगल लिया था। वास्तव में उनका लक्ष्य था, राष्ट्रिय अभ्युदय। युवा समस्या का समाधान किसी तथाकथित युवा-कल्याण के लिये गठित ['नेहरु युवा केन्द्र' ( या -'नेहरू चच्चा केन्द्र '?) आदि] राजनितिक संगठनों द्वारा आयोजित युवा-महोत्सव आदि कार्यक्रमों के द्वारा नहीं हो सकता। राष्ट्रिय समस्या के प्रति युवाओं के लगाव के द्वारा ही इसका समाधान होना संभव है।
 इसीलिए स्वामीजी ने उस श्रद्धा सम्पन्न प्रश्न-कर्ता युवक से इसके आगे जो कहा था, उसे आज का समस्या-ग्रस्त युवा-सम्प्रदाय भी सुन सकते हैं- " मैं तो कहता हूँ, दो में से एक कार्य तो तू अवश्य कर ! - तू कुछ कर अवश्य ! यदि घर-गृहस्ती चलाना चाहता है, तो किसी  उद्द्योग-व्यापर की चेष्टा कर, या फिर हमलोगों की तरह ' आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च ( अपने मोक्ष के लिये तथा जगत के कल्याण के लिये) - यथार्थ संन्यास पथ [या गृहस्थ होकर भी नश्वर वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग करके 
महामण्डल कर्मी बन ! ' BE AND MAKE ' का अनुसरण कर।] आगे बढ़, दूसरों के लिये अपने जीवन का बलिदान देकर लोगों के द्वार द्वार जाकर यह अभय-वाणी सुना- उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ! " (६/ १०६-९)  
" क्या तुम देख नहीं पाते पूर्व के आकाश पर अरुणोदय हो गया है, सूर्य के निकलने में अब और अधिक विलम्ब नहीं है। तुमलोग इस समय कमर कस कर काम में लग जाओ, घर-संसार में फंसने से क्या होगा ? इस समय तुमलोगों का कार्य है- सम्पूर्ण देश के कोने कोने में, गाँव गाँव तक जा कर सभी लोगों यह समझा देना कि अब और आलस्य से बैठे रहने से काम नहीं चलेगा, शिक्षाहीन, धर्महीन, वर्तमान पतन के कारणों को उन्हें समझा दो और कहो- ' भाई लोग, उठो ! जागो ! और कितने दिनों तक सोते रहोगे ?' 
और सरल भाषा में उनलोगों को व्यवसाय- बाणिज्य, कृषि-कुटीर उद्योग आदि गृहस्थ जीवन के लिये अत्यावश्यक विषयों की जानकारी दो।
 यदि ऐसा नहीं करते तो तुम्हारे पढने-लिखने को धिक्कार है, तुम्हारे वेद-वेदान्त पढने को भी धिक्कार है। दूसरों के लिये थोडा सा भी कार्य करने से, भीतर की शक्ति जाग उठती है,  ह्रदय में सिंह जैसा बल आ जाता है, तुम लोगों को मैं इतना प्रेम करता हूँ, किन्तु मेरी इच्छा होती है, कि तुमलोग दूसरों के लिये काम करते हुए मर जाओ, मैं यह देख कर खुश हो जाऊं। "     
 प्रश्न- महाराज, ऐसे शिक्षक कहाँ से आयेंगे जो लड़कपन से ही इन बातों को सुनाता और समझता रहे ? '
 इसीलिए हम आये हैं, तुम सब इस तत्व को हमसे सीखो, समझो और अनुभव करो ! फिर इस भाव को नगर नगर, गाँव गाँव, पुरवे पुरवे में फैला दो. और सबके पास जाकर कहो, ' उठो, जागो और सोओ मत। सारे अभाव और दुःख नष्ट करने कि शक्ति तुम्हीं में है, इस बात पर विश्वास करते ही वह शक्ति जाग उठेगी। ' ( ६/१४) '
एक पत्र में स्वामीजी कहते हैं- " मुझे कोई भला कहे या बुरा, मैं ने इन युवाओं को संघबद्ध करने के लिये ही जन्म ग्रहण किया है। और केवल इतना ही नहीं, भारत के प्रत्येक नगर नगर में सैकड़ो युवा मेरे साथ सहयोग करने के लिये तैयार है। ये लोग दुर्दमनीय तरंगाकार में भारतभूमि के ऊपर प्रवाहित होंगे, एवं सर्वाधिक दीनहीन और पद-दलित लोगों के द्वार द्वार पर सुख-स्वाछ्न्द्य, नीति, धर्म, और शिक्षा को वहन करके पहुंचा देंगे, यही मेरी आकांक्षा और व्रत है, इसे मैं पूरा करूँगा या मृत्यु को वरन करूँगा। "
जिस श्रद्धा अर्थात अद्भुत आत्मविश्वास के बल पर नचिकेता मृत्यु के सामने जाकर, साक्षात् यमराज के सामने खड़े हो गए थे, उसी अपूर्व श्रद्धा के बल से ही स्वामी विवेकानन्द ने भी देश-कल्याण के लिये युवक संप्रदाय को गढ़ने के लिये मृत्यु का आलिंगन किया था, और भारत माता की सेवा में मृत्यु-वरण करने का अनुपम आशीर्वाद युवा-समुदाय के मस्तक पर वर्षित किया था। ऐसी ' मृत्युंजयी- श्रद्धा ' के सामने कोई भी समस्या हल हुए बिना रह ही नहीं सकती। 
 [भारत के मुनियों ने ही सर्वप्रथम मृत्यु की समस्या का ही समाधान आविष्कृत कर दिखाया था । प्राचीन युग के हमारे पूर्वज ऋषियों के मन में विचार उठा - " वे जिन्होंने मेरे बचपन में मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया, जिन्होंने  जीवनभर केवल मेरे लिये सबकुछ किया- मेरे माता-पिता; वे भी चले गये- कहाँ ? हर कोई, हर चीज चली गयी, जा रही है, और चली जायेगी। वे कहाँ चले जाते हैं ? प्रातः कालीन सूर्य जगत के लिये प्रकाश, ताप और हर्ष लाता है। वह मन्द गति से यात्रा करता है, शाम को नीचे गहराई में विलुप्त हो जाता है। 
किन्तु कमल के अद्भुत पुष्प की श्रद्धा को देखो ! उसे दृढ़ -विश्वास है, उसमें आस्तिक्य-बुद्धि है कि यही सूर्य अगले दीन पुनः प्रकट होगा ! उतना ही गरिमामय, और सुन्दर ! और दूसरे दिन सुबह, जब सूर्य की किरणें उसकी बन्द पंखुड़ीयों को स्पर्श करती हैं, तो वह प्रस्फुटित हो जाता है, खुल जाता है और सूर्य ढलने पर पुनः बन्द हो जाता है। तात्पर्य यह निकला गया कि जो लोग आते, और चले जाते हैं उनका पुनर्जन्म होता है। यह पहला समाधान था। और इसीलिए सूर्य तथा कमल धर्म के प्रथम प्रतीक हुए। 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '  का अद्भुत उदाहरण है - 'कमल और सूर्य'! 
श्रद्धावान मनुष्य के मन में पुनः प्रश्न उठा - रात्री में भी चाँद-तारे अपना प्रकाश फैलाते रहते हैं, तब वे जिनसे मैं स्नेह करता हूँ, कहाँ चले जाते हैं? निश्चय ही नीचे तमसाच्छन्न स्थान को नहीं, वरन ऊपर, शाश्वत प्रकाश के राज्य में।  यहाँ श्रद्धा के नये प्रतीक अग्नि हैं, जो अपनी ज्वालाओं की अद्भुत भास्वर जिह्वाओं से युक्त है- पूरे वन को अल्प समय में खा सकते हैं, भोजन पकाने वाली, गर्मी देने वाली, और वन्य पशुओं को दूर भगा देने वाली अग्नि की ज्वाला- यह प्राण दायक, प्राणरक्षक अग्नि और उसकी लपटें - जो सब की सब ऊपर जाती हैं, नीचे कभी नहीं। यह अग्नि ही है जो उन्हें ज्योति के स्थलों में ऊपर ले जाने वाली है।]

११.
युवा-समस्या का समाधान वैक्तिक प्रचेष्टा (५ अभ्यास ) पर निर्भर है !  
युवा समस्या कोई सामयिक समस्या नहीं है। जब तक समाज रहेगा, युवा समस्या भी रहेगी। एक युग का युवा-सम्प्रदाय दुसरे युग के युवा-सम्प्रदाय से भिन्न होता है। इसीलिए युवा-समस्या का स्थायी समाधान किसी भी समय नहीं हो सकता। यह समस्या जिस प्रकार चिरन्तन है, इसके समाधान की चेष्टा भी उसी प्रकार निरन्तर अवश्यम्भावी रूप से चलती रहेगी।
युवा समस्या के दो पहलु हैं। जिन लोगों की समस्या है, उन लोगों को ही भोगना होता है। किन्तु उनकी समस्या से समाज बिल्कुल अछूता नहीं रह सकता। यौवन का जोश और अति-उत्साह के साथ बुद्धि की अपरिपक्क्वता के  कारण समाज में भी कुछ समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन लोगों की समस्या को और भी दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।
 मौलिक या आन्तरिक समस्या तथा  गौण और बाह्य समस्या। बाह्य समस्या के अन्तर्गत शिक्षा,
अर्थोपार्जन, प्रतिष्ठा इत्यादि आते हैं। मौलिक या  आन्तरिक समस्या है यौवन की असीम प्राण-उर्जा या जवानी का जोश। जीवन के इस काल-खण्ड में असीम  प्राण-उर्जा, आवेग, भावाभिव्यक्ति, कर्म, आशा-
आकांक्षा इत्यादि अनेक विषयों का अम्बार के साथ बुद्धि की अपरिप्क्क्वता के कारण संयम और नियन्त्रण का आभाव, आन्तरिक ऐक्य या उद्देश्य की एकमुखिनता एवं स्पष्ट आदर्श और जीवन लक्ष्य का अभाव। इस उम्र की स्वाभाविक वृत्तियों के भंवर में फंसा हुआ मन और इन्द्रियों की विवशता आदि घटक ही - मौलिक या आन्तरिक समस्या के उपादान हैं।
गौण समस्या सामयिक है, इसीलिए विभिन्न समय के हिसाब से, अलग अलग देशों में, विभिन्न रूप लेते रहते हैं, किन्तु इनका समाधान अपेक्षाकृत सहज है, और निष्ठा के साथ सामाजिक प्रयत्न करने से संभव है। जबकि देश-काल की दृष्टि से विचार करने पर युवा-समुदाय की मौलिक समस्या चिरन्तन और सर्वत्र समान है। इसका समाधान उतना सहज नहीं किन्तु अधिक महत्वपूर्ण है। और एक बात, बाह्य गौण समस्याएं, समाज के सामूहिक प्रयास से समाधान होने योग्य हैं, किन्तु आन्तरिक मौलिक समस्या ( जिसका समाधान किये बिना- जड़ से युवा समस्या का समाधान नहीं हो पाता, और सार्वजनिक उन्नति और सार्वजनिक समस्याओं के निराकरण में युवा-शक्ति का सदुपयोग भी नहीं हो पाता है।) का समाधान सामूहिक सामाजिक प्रचेष्टा से हो पाना सम्भव नहीं है। सामूहिक प्रचेष्टा इस विषय में केवल सहायक हो सकती है, किन्तु इसका समाधान व्यक्तिगत प्रचेष्टा (५ अभ्यास ) के उपर निर्भर करता है।
स्वामी विवेकानन्द युवा-वर्ग द्वारा सृष्ट समस्या की ओर दृष्टिपात करने की भी जरुरत नहीं समझते थे। गौण समस्याओं के समाधान की ओर समय समय पर केवल कुछ कुछ संकेत मात्र किये हैं। किन्तु मौलिक, आंतरिक और चिरन्तन युवा समस्या के रहस्य (अज्ञानता) को उद्घाटित कर देते हैं , ताकि युवा-सम्प्रदाय का प्रत्येक युवा व्यक्तिगत तौर पर इस समस्या का समाधान करके, जीवन (इच्छाशक्ति) के यथा उपयुक्त विकास और प्रकाश के माध्यम से अपने अपने जीवन के सम्भावना को प्रस्फुटित कर सके। और युवाजीवन को नियंत्रित शक्ति की सहायता से, सार्वजनिक समस्याओं के समाधान में सक्रीय हो कर सर्व जनों के कल्याण साधन करते हुए अपने जीवन को सार्थक कर सकें, स्वामीजीने उसी का पथ दिखाया है।  
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