Saturday, September 8, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [17] ' स्वामी विवेकानन्द तथा आज के हमलोग '(स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज),

क्या प्रत्येक मुष्य को विश्वास की दृष्टि से देखना सम्भव है ?
(अचानक आविर्भूत होना, 'असत-कार्यवाद' सम्भव नहीं !)   
'प्रचार-तन्त्र' में बहुत से लोग विश्वास करते हैं, तथा जानते हैं कि प्रचार-माध्यम कितना प्रभावशाली होता है! चाहे वह सच्ची हो या झूठी, कोई भी बात-बार-बार सुनते रहने से, उसका एक प्रभाव मन के उपर अवश्य पड़ता है। बार बार एक ही बात को सुनते रहने से, मनोवैज्ञानिक नियम के अनुसार मन के भीतर उसकी एक छाप अवश्य पड़ जाती है। हमलोग सोंचते हैं कुछ भी थोप देना अच्छा नहीं होता। हमलोग कहा करते हैं कि आज का युग विज्ञान का युग है या तर्कवाद (rationalism) का युग है। हम में से कोई इस कथन को अस्वीकार नहीं करता। आज के समाज में विज्ञान का कोई स्थान नहीं है- ऐसी बात हमलोग मुँह से निकाल भी नहीं सकते। कुछ लोग कहते हैं, प्राचीन समय की सभी बातें अच्छी थीं,फिर कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं,कि  प्राचीन युग की सारी बातें बुरी थीं। किन्तु हमलोग इन दोनों दलों में से किसी के साथ सहमत नहीं हैं। जो लोग प्राचीन युग की समस्त बातों को अच्छी या बुरी होने का दावा करते हैं, वह दावा बहुत उचित प्रतीत नहीं होता। 
प्राचीन युग में ऐसी बहुत सी चीजें थीं जो अच्छी थीं, जिसको आधार बना कर कई नई वस्तुओं का आविष्कार हुआ है, मनुष्य ने बहुत उन्नति की है। इसीलिये प्राचीन युग में जो अच्छा था, उसको ग्रहण करके नये युग के लिये उपयोगी बनाकर हमलोगों को आगे बढ़ना होगा। यही बुद्धिमान मनुष्य की पहचान है। और आमतौर पर मनुष्य इसी प्रकार प्रगति करता है। किन्तु आगे बढ़ने के क्रम में गलतियाँ भी हुआ करती हैं, और यह स्वाभाविक भी है। नेताजी कहते थे- 'भूल करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।' इसीलिये कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि हमलोग अपने जन्मसिद्ध अधिकार को प्रयोग में लायेंगे, और गलती करते ही रहेंगे। कई राजनैतिक दलों में भी हमलोग ऐसा होते देखते हैं। वे निरंतर गलती पर गलती करते जा रहे हैं, और निरंतर कह भी रहे हैं, हमलोगों से यह गलती हो गयी है। जो लोग राजनैतिक इतिहास से परिचित हैं, वे इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं। हो सकता है, वे इसे वैज्ञानिक पद्धति या अत्यन्त उदारता का परिचायक समझते हों। किन्तु ऐसी सोच को सही नहीं ठहराया जा सकता। हमलोगों से गलती हो जाने की सम्भावना है, क्या हमलोग इसी को ढाल बनाकर निरंतर गलतियाँ करते रहेंगे ? और निरंतर कहते भी रहेंगे- ' हमसे गलती हो गयी !' ? 
वैज्ञानिक विश्लेष्ण तो यही कहेगा कि जो व्यक्ति निरंतर गलती करता जा रहा है, वह भविष्य में जो कुछ करेगा या वर्तमान में जो कुछ कर रहा है वह सब गलत ही होगा। इस तर्क को स्वीकार करने से बहुत अधिक गलती  करने की संभावना नहीं होगी। यदि हम चाहें तो इस बात को जाँच कर देख भी सकते हैं। यदि देखने की दृष्टि हो, तो देखेंगे कि कोई राष्ट्र या किसी विचारधारा को मानने वाले लोग -बीच बीच में दो एक गलती करने के बाद भी प्रायः सही कार्य ही किये थे, तो समझना होगा कि वही कौम या वही विचारधारा अधिक निर्भरयोग्य है। हमलोगों की जो सनातन विचारधारा है, उसमें देख पाते हैं कि उसके ध्वजा-वाहक लोग प्रायः सबकुछ ठीक किये हैं, बीच बीच में उनसे एक-आध गलती भी हो गयी है।
और वह गलती भी किस प्रकार की थी ? उनके विचारों में तो किसी प्रकार का गलती नहीं थी, किन्तु समय के प्रवाह में उसके रूपायन में बीच बीच में एक-आध गड़बड़ी हो गयी है। हमलोगों की जो प्राचीन विचारधारा है, उसका विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि वे बिलकुल आधुनिक हैं। 
जबकि कुछ विचारधारायें तो ऐसी प्रतीत होती हैं, मानों वे गलतियों की ही संकलन (summation) हों। इसीलिए उस विचारधारा की कोई विश्वसनीयता (guarantee) नहीं है। फिर भी उस विचारधारा के मानने वाले लोग यह दावा करते हैं कि वे लोग ही मानव-जाती के सच्चे मार्गदर्शक हैं। कोई भी चिंतनशील व्यक्ति इस झूठे दावे को निगल नहीं सकता। किन्तु किसी बात को भी यदि लगातार कहते रहा जाय, तो चाहे वह बात सही हो गलत -उसकी एक छाप मन के उपर पड़ ही जाती है। एक दूसरा कमजोर तर्क भी लगातार दिया जाता है कि-' मनुष्य गलतियाँ कर कर के ही सीखता है'। यह तर्क बहुत मनोरम और स्वादिष्ट प्रतीत हो सकता है, किन्तु ऐसी स्वादिष्ट चीजें (कि नाम लेते ही मुँह में पानी आ जाये ) बहुत काम की नहीं होती हैं।
जो व्यक्ति थोड़ा भी विचारशील होगा, वह कभी यह स्वीकार नहीं कर सकता कि निरंतर गलती पर गलती करते जाने से किसी दिन सचमुच सत्य प्रकट हो जायेगा। यह बात सुनने में अच्छा लगता है, कि जो पहले से नहीं था, वह किसी समय हठात आविर्भूत हो जायेगा। हमलोग स्वयं को वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाला मनुष्य कहते हैं। एक तरफ तो हम अपने को तर्कबुद्धिपरक (rationalistic) मनुष्य मानने का दावा करते हैं, दूसरी ओर किसी वस्तु के हठात प्रकट होने में विश्वास भी करते हैं। कहते हैं-जो नहीं था,वह हठात आविर्भूत हो गया। ऐसा होना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से या वेदान्तिक दृष्टिकोण से- किसी भी प्रकार संभव नहीं है। ऐसे तत्व को सांख्य-वेदान्त की परिभाषा में इसे - ' असत्-कार्यवाद ' कहा जाता है। अर्थात जो वस्तु कार्य-कारण में किसी भी प्रकार से निहित नहीं था- वह अचानक आविर्भूत हो गया।
[असत-कार्यवाद कहता है- असत, अर्थात अस्तित्वहीन (non-existent) वस्तु एक समय में सत हो गया या प्रकट हो गया-यह हो ही नहीं सकता। असत-कार्यवाद सही नहीं है। जो नहीं था, उसके भीतर से कुछ बाहर प्रकट हो गया-यह बात अतर्कसंगत है। जो था, वही नये रूप में प्रकट हो गया-यह हो सकता है।हमारे देश के दर्शन-शास्त्रों में ' सत-कार्यवाद ' एवं ' असत-कार्यवाद ' नाम से दो प्रकार की तात्विक बातों का उल्लेख है। सत-कार्यवाद कहता है, जो वस्तु पहले किसी अन्य रूप में थी, उसका रूपान्तर हो सकता है। कोई सद्वस्तु, अर्थात कोई वस्तु यदि पहले से अस्तित्व में रहे, तो उसका कार्य, अर्थात कारण का विकास होकर अन्य एक वस्तु में रूपान्तरित हो सकता है। ]
इसके सम्बन्ध में स्वामीजी एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं- ' हमलोग कभी असत्य से सत्य पर नहीं पहुँचते हैं, भ्रम से सत्य पर नहीं पहुँचते हैं। हमलोग सत्य से ही सत्य पर पहुँचते हैं, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य पर पहुँचते हैं।' यही बात सही है। सत्य का भी एक विकास होता है। किन्तु मिथ्या कभी सत्य में परिणत नहीं हो सकती है। फिर भी अक्सर हमलोग में से कई मनुष्य ऐसा कहते रहते हैं कि, जो पहले नहीं था-वह प्रकट हो गया या बन गया। आमतौर पर इसीको आविर्भाव (emergence) कह दिया जाता है, किन्तु ऐसा होना असत्य या अवैज्ञानिक है
क्योंकि दूसरे रूप में हम यह मान रहे हैं कि, शून्य से किसी वस्तु की उत्पत्ति होती है। अभाव (शून्य) से भाव (जीवन या अस्तित्व- existence) कभी उत्पन्न नहीं हो सकता। यह असंभव है। गीता में भी यह बात कही गयी है- " नासतो विद्यते भावः।" शून्य से कोई वस्तु कभी उत्पन्न नहीं हो सकती है। हाँ, यह हो सकता है कि कोई एक वस्तु पहले थी, जो बाद में कुछ और ही वस्तु में रूपान्तरित हो गयी। (जैसे दूध से दही बन जाना संभव है, या दही से मक्खन का प्रकट होना संभव है।) किन्तु जो पहले से नहीं था, वह हठात आविर्भूत हो गया-ऐसा नहीं हो सकता, यह बिलकुल असंभव बात है। 
किन्तु हमलोग, अक्सर अतर्कसंगत (nonsensical या मूर्खतापूर्ण) बातों का ही प्रचार करते रहते हैं। जैसे जल नहीं था, हाईड्रोजन और ऑक्सीजन था। उनको एक विशेष परिमाण में, विशेष अवस्था में एक रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से पानी में रूपान्तरित हो गया। किन्तु हममें से कई लोग इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं, कि ' जल नहीं था, जल अस्तित्व में आ गया !' यह भी एक प्रकार का आविर्भाव (चन्दन की लकड़ी से अनल के प्रकट होने जैसा) ही है। हम सभी लोग इस प्रकार की व्याख्या से कम-ज्यादा परिचित है। किन्तु जल का उपादान पहले से था, और केवल उतना ही नहीं, एक विशेष परिमाण, अवस्था, दबाव, और ताप में उन उपादानों को मिलाने की आवश्यकता होगी, तभी जल प्राप्त किया जा सकेगा। 
हमलोगों के भीतर भी ठीक वही बात है। हमलोगों की दृष्टि में सत्य का अस्तित्व था ही नहीं। इसी कारण हम  क्रमिक ढंग से गलती करते जा रहे थे। और इसी प्रकार क्रमिक ढंग से (serially) गलती करते करते, एक दिन हमलोगों की धारणा में अचानक सत्य प्रकट हो जायगा ! यह बिलकुल लीकहीन या असत्य कल्पना है। किन्तु आज के हमलोग, (अपने को आधुनिक मानने वाले मनुष्य ) जिस अवस्था में हैं, वह बिल्कुल ऐसी ही अवस्था है।
हमलोग कई प्रकार की अव्यवहारिक कल्पनाओं, अवैज्ञानिक बातों की 'वैज्ञानिक' व्याख्या देते हुए भूतिया खेल दिखाने की चेष्टा करते हैं, अतिप्राकृत (supernatural) घटनाओं के औचित्य (Feasibility) का प्रचार करते हैं। इधर हमलोग यह भी कहते हैं कि हमलोग मैजिक (जादू-टोना) आदि बातों पर विश्वास नहीं करते। लेकिन, वास्तव में हमलोग केवल राजनैतिक या सामाजिक ही नहीं-धार्मिक मैजिक दिखलाने की भी चेष्टा कर रहे हैं। हमलोगों के कुछ दार्शनिक तत्व हैं। उसी के सहारे हमलोग जादुई छड़ी को घुमाते हुए कहते हैं- 'आबरा का डाबरा-छू !'- ये देखो आ गया ! और आज के समाज की समस्या यह है कि हम तथाकथित शिक्षित-वर्ग भी- धर्म,समाज, अर्थनीति सभी क्षेत्रों में केवल -नेताओं के हाथ की सफाई, देखने की प्रत्याशा में ही बैठे हुए हैं।
इसीलिये आज के हमलोग क्या हैं ? हमलोग अपने को सुख के भीतर रखने वाले अनेक प्रकार के वैज्ञानिक उपकरणों-बढ़िया सोसाइटी में महँगा फ़्लैट, कालबेल, टेलीविजन, कम्प्यूटर, ऐ.सी ड्राइंग रूम में जेन्टिलमैन जैसी वेशभूषा, आदि ढेरों साज-सामान से सुसज्जित करके, एक मूर्खों का समाज बन कर बैठे हुए हैं। तथा मानव-समाज को अपनी सामूहिक मूर्खता के द्वारा और भी गहरे अंधकार में ठेलते जा रहे हैं, यही तो हैं, आज के हमलोग ! इस बात पर थोड़ा गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। हम में से जो लोग, ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ प्राप्त करके ज्ञानी होने दम्भ भरते हैं, वे भी इसी प्रकार के मूर्ख हैं, बिल्कुल अज्ञानी हैं।स्वामी विवेकानन्द ने एक बार भाषण देते समय सामने बैठे श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा था- 'मूँछ वाले बच्चों की मण्डली '। मूँछे तो निकल आई हैं, किन्तु बुद्धि का विकास थोडा भी नहीं हुआ है। ' आज के 'हमलोग' भी वही 'मूँछ वाले बच्चों की मण्डली' ही तो हैं। हमलोग अपने कितने ही झूठी शान की वस्तुओं को लेकर बैठे हैं। और हममें से जो थोड़े अधिक बुद्धिमान या धूर्त  हैं, वे हमलोगों की अज्ञानता का फायदा उठाकर अपना स्वार्थ साधते रहते हैं।
हमलोग आर्थिक शोषण की बात करते हैं। किन्तु अन्य एक दूसरी चौकड़ी भी है, जो अपनी बुद्धि से हमारा शोषण कर रही है, किन्तु या तो उनकी चालाकी हमलोग देख नहीं पाते या हम उसके बारे में हम बात नहीं करना चाहते। या देखने के बाद भी इतना साहस नहीं है, कि हम उसके सामने कुछ कह सकें। क्योंकि हो सकता है, मुख खोलने से कहीं खोपड़ी न टूट जाये। किन्तु ऐसी खोपड़ी रहे या टूट जाय, क्या फर्क पड़ता है ? क्योंकि मूर्खों के स्वर्ग में रहने से भी कोई लाभ तो मिलने वाला नहीं है। इस प्रकार आज के हमलोग, मूर्खों से परिपूर्ण जगत में वास कर रहे हैं।
किन्तु हमलोग साहस के साथ अपने युवा भाइयों से कहना चाहते हैं, कि भाइयो तुम थोड़े साहसी बनो। तुम लोग अज्ञानी मत बने रहो, मूर्खों के सामान जीवन मत बिताओ। तुम लोगों के पास तो अपनी बुद्धि है, नई सोच है। तुम लोग अपनी बुद्धि से थोड़ा विचार करके देखो, तुमलोग कहाँ आ गए हो- किस अवस्था में आ पहुँचे हो, किस दिशा में जा रहे हो? थोड़ा विचार करके देखने की चेष्टा तो करो। बुद्धि पाने के लिये अपने दिमाग को किसी अन्य के पास गिरवी मत रखो। हमलोग बहुत दीर्घ काल से सब कुछ विदेशों से ही माँगते रहे हैं। यहाँ तक कि बुद्धि भी उन्ही से आयात करते आ रहे हैं ! उधर उनके अपने देश में क्या हो रहा है ? उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है। उनकी बुद्धि में भी दरार पड़ गयी है। वे अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि उनकी बुद्धि भी बहुत मौलिक नहीं है। इस समय हमलोग अपने देश में विदेशों से सामान्य बुद्धि आयात कर रहे हैं,एवं भ्रष्टाचार का विदेशों में निर्यात कर रहे हैं। 
किन्तु प्राचीन काल में हमारे देश की विदेश-नीति  क्या थी ? स्वामीजी ने भारत को कैसी विदेश-नीति अपनाने का सुझाव दिया था ? भारतवर्ष अपने बेशकीमती 'आध्यात्मिकता' के भण्डार से रत्नों (वेदों के महावाक्यों) का प्रचार विदेशों में करेगा,उसीका निर्यात करेगा, जिससे मनुष्यत्व का विकास हो,यह देश अपनी आध्यात्मिकता के बल पर ही वह विश्वविजय करेगा।लेकिन, इसके बदले हमलोग क्या कर रहे हैं? समस्त मानवप्रेम-स्वदेशप्रेम को तिलांजली देकर नकली धर्म का निर्यात करने के लिये झुण्ड का झुण्ड  बनाकर विदेश जाने में होड़ लगा रहे हैं। हमलोग अज्ञानी, अहंकारी, बेवकूफ के जैसा सोचते हैं, हम तो सबकुछ ठीक ही कर रहे हैं। इधर हमलोग स्वयं अपनी हर जरूरतों के लिये दूसरों के आश्रित  बने हुए हैं।
अभी हाल में ही तीन अनुसंधानात्मक प्रतिवेदन प्रकाशित हुए हैं। एक खोजी विवरण में, राष्ट्रसंघ का आर्थिक विश्लेषण दिया गया है। दूसरे में बतलाया गया है कि भविष्य में विश्व किस दिशा में जाने वाला है। तथा तीसरे में विश्व की जनसंख्या के बारे में कहा गया है। प्रत्येक रिपोर्ट में दिखाया गया है कि हमलोगों का भविष्य अंधकारमय है। इन प्रतिवेदनों में कहा गया है कि भारत जैसे विकासशील देशों का भविष्य बहुत बदतर होने वाला है। तो फिर हमलोग किस दिशा में जा रहे हैं ? 
जनसंख्या-रिपोर्ट में दिखलाया गया है कि २००० ई० आते आते विश्व की जनसंख्या छह सौ करोड़ हो जाएगी। और उसमें भी उसकी लगभग आधी आबादी, केवल साठ शहरों में वास करेगी। इस समय विश्व में लगभग छब्बीस बड़े महानगर हो गए हैं। इनमें पचास करोड़ लोग वास करते हैं। अभी से मात्र उन्नीस-बीस वर्ष के बाद इस प्रकार के मात्र साठ महानगरों में तीन सौ करोड़ से भी अधिक लोग वास करने लगेंगे। इस समस्या का समाधान क्या है ?   राष्ट्र-संघ द्वारा प्रकाशित अनुसंधानात्मक रिपोर्ट कहता है, कि इस समस्या के समाधान का केवल एक उपाय है, और वह है- " मनुष्यों के भीतर 'मनुष्यत्व-बोध' का विकास करना।" किन्तु क्या इस बात की ओर सबसे पहले, स्वामी विवेकानन्द ने ही हमारा ध्यान आकर्षित नहीं किया था ? 
जिस प्रकार सांसारिक या भौतिक विकास के लिये इंजीनियरिंग परम आवश्यक है, उसी प्रकार मनुष्य की उन्नति  के लिये भी मनुष्य-निर्माण का इंजीनियरिंग सीखना अत्यन्त आवश्यक है। इस इंजीनियरिंग का कार्यक्षेत्र बाह्य जगत में न होकर आन्तरिक जगत में है। आज हर स्तर पर वैश्विक एकता के उपर चर्चा होती है। किन्तु जिस समय, इस प्रकार ग्लोबलाईजेसन या वैश्विक-एकता का विचार किसी के मन नहीं था, उसी समय स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ' आने वाले समय में कोई भी देश अकेला नहीं चल सकता।' बहुत प्राचीन काल से ही समाज में कोई अकेला ही रह नहीं पाया है। वेद में कहा गया है, 'जो अकेला खाता है, वह केवल पाप को ही भक्षण करता है।' कैसा अद्भुत विचार है। गीता में कहा गया है- ' जिस प्रकार धागे में गुँथी हुई मणियों की माला होती है, उसी प्रकार बहार से न दिखाई पड़ने से भी समस्त सृष्ट वस्तुओं के भीतर वे ही अनुस्यूत हैं।'
किसी ताँत से बूने कपड़े में ' ताना और बाना ' (Warp and woof ) रहता है। [बुनाई के समय जो धागा कपड़े लम्बाई में लगता है उसे ताना कहते हैं, और कपड़े की चौड़ाई में जो धागा प्रयोग होता है, उसको बाना कहते हैं, बंगला में 'टाना और पोड़न'  (টানা ও পোড়েন) कहते हैं।] लगातार ताना -बाना कसते रहने से एक कपड़ा बुन लिया जाता है, जिसके द्वारा हमलोग किसी खुले वस्तु को ढँक सकते हैं उसी प्रकार समस्त वस्तुओं के भीतर धागे के समान एक वस्तु (अविनाशी) अनुस्यूत है। वही परम वस्तु (ब्रह्म) है, जिसे सामान्य तरीके से- इन्द्रियज-ज्ञान द्वारा जाना नहीं जा सकता है; उस परम वस्तु (अविनाशी) को केवल अनुभूति (विवेकज-ज्ञान) के माध्यम से ही जाना जा सकता है।
हमलोगों की दृष्टि में दूसरों के लिये नफरत या घृणा का भाव रहता है। या हम हर किसी को हिराकत की दृष्टि से देखते हैं। हमलोग सभी भीतर यही देखना चाहते हैं, कि कहाँ कितनी कुटिलता, पाखण्ड, शत्रुता भरी हुई है। हमलोग क्या हर मनुष्य को प्रेम की दृष्टि से देख पाते हैं ? क्या हमलोग इस दृष्टि से देख पाते हैं, कि मानव-मात्र में क्या अच्छा (अविनाशी) है ? हमलोगों ने परस्पर संदेह करने की शिक्षा पायी है, इसलिये हम नहीं देख पाते, कि किस मनुष्य में कौन सी  सुन्दर और अच्छी सम्भावना छुपी हुई है,तथा उस सम्भावना को कैसे विकसित और प्रस्फुटित किया जा सकता है ? और  यही हमलोगों की मूल समस्या है। आज हमलोग जिस दुःख-कष्टों को, अवमानना और सन्ताप को भोग रहे हैं, हमारी समस्त समस्याओं की जड़ इसी में है। और इस समस्या को हमें ही दूर करना होगा
हमलोगों के भीतर अच्छा बनने की जो सम्भावना है, हमारे भीतर जो सौहार्द, मैत्री (Amity) का भाव स्वाभाविक रूप से निहित है, उसको यदि हमलोग नहीं समझ सकें। यदि हमलोग मनुष्य-मात्र में पहले से अन्तर्निहित समस्त चारित्रिक गुणों (virtues) को विकसित करने के एप्लाइड साइंस (व्यावहारिक विज्ञान) को क्रियात्मक रूप न दे सकें,  तो फिर हमारे समस्याओं के समाधान की कोई सम्भावना नहीं है। आज के जो हमलोग हैं- उनकी मूल बीमारी या समस्या यही है। और समाज में  बाकी जो भी भ्रष्टाचार,
अत्याचार, (नक्सल-आतंकवाद- हिंसा) अराजकता, दुःख, निर्धनता आदि दिख रहे हैं वे सब तो इस मूल  बीमारी के लक्षण मात्र । (यदि बीमारी के जड़ से इलाज शुरू किया जाय,'चरित्र-निर्माण' की शिक्षा दी जाये तो इसके लक्षण आदि दिखने बन्द हो जायेंगे।) 
वास्तव में हमलोगों की बुद्धि में बहुत गरीबी छाई हुई है। हमलोगों के भीतर जो हमारी सत्ता(अविनाशी आत्मा ) है, उसको हम जानना ही नहीं चाहते हैं, उसके बारे में हमलोग सुनना भी पसन्द नहीं करते हैं। यदि एक कान से सुनते भी हैं, तो दूसरे कान से बाहर निकाल देते हैं। कोई यदि उसके बारे में कहना चाहता है, तो उसका उपहास करते हैं, उसकी हँसी उड़ाते हैं। यही तो हैं-आज के हमलोग ! हमलोगों के बुद्धि की दौड़ बस यहीं तक है। क्यों? पर हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि हमने कुछ सस्ते उपन्यास पढ़ लिए हैं,(वो भी अंग्रेजी के) मानो उन्हीं पुस्तकों में समस्त ज्ञान रहा हो, या फिर सफर के दौरान सांध्य-समाचार पत्र के कुछ पन्नों को पढ़ लिया है, और सोचते हैं, हमने सब कुछ जान लिया है। 
किन्तु यह सब कहकर- हमलोग किसी चीज का (काला दंतमंजन या बिच्छु-काटने की दवा) का प्रचार नहीं कर रहे हैं। उस प्रकार के अहमक हमलोग नहीं हैं। क्योंकि हमलोग जानते हैं, कि जो अच्छे भाव हैं, वे स्वतः प्रचारित होंगे। जहाँ कहीं सम्भावना है, जहाँ प्राण-उर्जा है, उसको कोई दबा कर नहीं रख सकता! स्वामीजी हमारा आह्वान करते हैं-" उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत " - (ऐसा वाक्य सुनते ही सुषुप्त पुरुष वाक्य और वाक्यार्थ का संबन्ध न जानकर भी जाग जाते हैं।) उठो, जागो, और जो सत्यद्रष्टा या ब्रह्मज्ञ महापुरुष हैं, तुमलोग उनके सानिध्य में उपनीत होकर निर्विवाद रूप से इस सत्य की उपलब्धी करो कि तुम्हारे भीतर ही सम्पूर्ण संभावनाएँ छुपी हुई हैं; उन्हें अभिव्यक्त करो ! युवा भाइयों, आप जरा विचार करके देखिये, हमलोग वास्तव में कहीं भी मित्र को नहीं खोजते हैं। कौन कौन से लोग में हमारे शत्रू हैं- क्या हमलोग केवल उन्हीं को खोजते नहीं फिर रहे हैं ? जबकि वेद में प्रार्थना की गयी है- " हे ईश्वर, हमें ऐसी शक्ति दो कि हम सभी मनुष्यों को अपने मित्र के रूप में देख सकें।" और हमलोग ठीक इसके ठीक विपरीत शिक्षा सबों को दे रहे हैं ।  
हमलोग किसी से प्रेम नहीं करते। सभी को पराया समझते हैं। इसीलिये हर समय इस बात को लेकर शंकित रहते हैं, कि वे कहीं शत्रू बन कर हमें नुकसान पहुँचा देंगे? केवल द्वैत से ही भय होता है। जिनको अपना सझते हैं, उनसे कोई भय नहीं होता। इसीलिये दूसरों के भय से सदा शंकित रहने की अपेक्षा, सभी को अपना समझना, और पराये को भी अपना बना लेना -निःशंक हो जाने का सबसे अच्छा उपाय है। यदि ऐसा नहीं करते तो, शत्रुओं से अपने को बचाने की चेष्टा में ही सारी शक्ति नष्ट हो जायेगी। अपने को उन्नत बनाने, और अधिक विकसित करने की शक्ति फिर बाकी नहीं रहेगी। और उस शक्ति का आभाव, उसको प्रदान करने की पूंजी ही नहीं बचेगी। आज के हमलोग -ऐसी शिक्षा कहीं से नहीं प्राप्त कर पाते हैं।
किन्तु यदि हमलोग मानव-मन को उन्नत बनाने वाले विज्ञान (का प्रयोग करें, तो हमलोग अपनी सत्ता के यथार्थ स्वरुप को जान सकते हैं। समस्त चीजों के भीतर एक सत्ता या वस्तु ओतप्रोत होकर समायी हुई है। इसीलिये प्रकट रूप से (ostensibly) एक भिन्न सत्ता (M/F) प्रतीत होने से भी, वास्तव में मैं उस सत्ता (अविनाशी) के साथ एक और अभिन्न हूँ ! तथा अदृश्य रूप से होने पर भी सबों के साथ जुड़ा हुआ हूँ, क्योंकि सबों के भीतर एक ही सत्ता विद्यमान है। 
जब यही विचार क्रमशः दृढ़ होता जायेगा, तो मैं दूसरों को अपने से अलग न सोच कर, उनको शत्रु नहीं समझकर अपना जानूँगा, उनसे प्रेम करूँगा। तब हमारे हृदय में -घृणा के बदले, भय के बदले प्यार, सबों के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जायेगा। हमलोगों के भीतर ही अनन्त शक्ति विद्यमान है। उसको सही रूप में व्यवहार करना होगा, जानना होगा और उसे वास्तविकता में परिणत करके अपने जीवन से अभिव्यक्त करना होगा। इसे कार्य में उतारने के लिये हमलोगों को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा।
नजरें बदलीं तो नज़ारे बदल गए। 
कश्ती का मुख मोड़ा तो किनारे बदल गए।
हमलोग मानव-कल्याण के लिये, उसकी सुख-शांति के लिये जगत के वस्तुओं का विश्लेषण करते हैं(आणविक उर्जा आदि की खोज), किन्तु जिसके सुख के लिये, जिस मनुष्य की भलाई के लिये प्राकृतिक शक्तियों का विश्लेषण करते हैं, उस ' मनुष्य का विश्लेष्ण' कौन करता है ? मनुष्य की आंतरिक प्रकृति का, उसके मनोजगत का, उसके अंतःकरण का विश्लेषण करने की थोड़ी भी चेष्टा नहीं करते। वैसे आमतौर से हम कहते हैं, कि मनुष्य एक मननशील जीव है। कुछ लोग कहते हैं, मनुष्य एक राजनैतिक जीव है। फिर कोई कहता है, मनुष्य आर्थिक जीव है। तो क्या मनुष्य केवल एक जीव, या दो पैरों पर सीधे खड़े होकर चलने वाला एक अलग ढंग का पशु है ?  यह ठीक है, कि अलग अलग पहलु से देखने पर, मनुष्य  राजनैतिक, मननशील, या राजनैतिक जीव प्रतीत हो सकता है, किन्तु अपनी समग्रता में मनुष्य केवल इतना ही नहीं है। 
महाभारत में भी कहा गया  है, कि मनुष्य एक आर्थिक जीव है। कुरुक्षेत्र का युद्ध प्रारंभ होने की पूर्वसंध्या में लोगों ने देखा, कि अचानक युधिष्ठिर खाली हाथ विरोधी-सेना की ओर बढ़े जा रहे हैं। कई लोगों ने सोचा, हो सकता है वे आत्मसमर्पण करने जा रहे हों। किन्तु वे पितामह भीष्म आदि गुरुजनों के निकट पहुँचकर चरण-स्पर्श करके आशीर्वाद देने का आग्रह किये। आशीर्वाद देने के बाद चारों गुरु-जनों ने, एक ही वचन कहे," विश्व में सभी मनुष्य अर्थ के दास हैं, किन्तु अर्थ किसी का दास नहीं है। हमलोगों ने कौरवों का अन्न खाया है, इसीलिये हमें उनके पक्ष से युद्ध करने के लिये आना पड़ा। "
इस बात को हमारे पूर्वज अच्छी तरह से जानते थे कि बाह्य जगत का संचालन अर्थ के द्वारा ही होता है। हमारे पितर लोग इस बात को भी समझते थे, कि ' गरीब आदमी की इच्छा उसके मन में उठती हैं, और मन में ही विलीन हो जाया करती हैं।' इसीलिये सभी लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते थे, कि आमतौर पर मनुष्य आर्थिक प्राणी है। किन्तु हमलोग इतने परमुखापेक्षी हो गए हैं कि, हमें अपने पूर्वजों के सिद्धान्तों का भी पता नहीं है। हममें से कुछ लोगों ने यदि आचार्य शंकर का नाम सुना भी है, तो दूसरों की सुनी-सुनाई बातों को दुहराते हुए कहते हैं- ' शंकर ने तो जगत को बिलकुल उड़ा दिया था।' यदि उन्होंने जगत को ही उड़ा दिया था, तो अपने ज्ञान का प्रचार उनहोंने कहाँ किया था ?  
उन्होंने कहा था- वेदों में दो प्रकार के धर्मों का उल्लेख है, एक है प्रवृत्ति का धर्म और दूसरा है निवृत्ति का धर्म। एक है भोग का मार्ग, तो दूसरा त्याग का मार्ग है। दोनों मार्गों के माध्यम से यह विश्व, समाज स्थितावस्था में बना रहता है। ये दोनों मार्ग हैं, तभी तो मनुष्यों का समाज अपना संतुलन (Equilibrium) बनाये रखता है। जैसे एक हवाई जहाज अपने दोनों पंखों पर भारसंतुलन बना कर उड़ान भरता रहता है। उसी प्रकार धर्म के भी दो पक्ष हैं- 'भोग और त्याग ', इन दोनों की सहायता से मानव-समाज साम्यावस्था में रहता है। एक को भी छोड़ देने से दूसरा पक्ष या समाज चल नहीं सकता। त्यागमार्ग-विहीन समाज केवल भोग के उपर निर्भर होकर चल नहीं सकता है। उसी प्रकार सम्पूर्ण भोग-विहीन समाज भी संभव नहीं है। आवश्यकता दोनों में सामंजस्य रखने की है। इसीलिए, हमारे शास्त्रों में- 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ' ये चार प्रकार के पुरुषार्थ की बात कही गयी है; केवल एक ही पुरुषार्थ को लेकर चलने से सामाजिक व्यवस्था नहीं चल सकती। जो समाज केवल एक ही पुरुषार्थ लेकर रहता हो, उसे 'जघन्य' भी कहा गया है। किन्तु, ऐसा कहने से भी, चौथे पुरुषार्थ 'मोक्ष' के समकक्ष कोई भी नहीं है। 
इस बात में तो कुछ सन्देह नहीं कि मनुष्य एक मननशील प्राणी है। स्वामीजी कहते हैं, मनुष्य एक मननशील प्राणी है, तभी तो उसे 'मुनि' भी कहा जाता है। इस विशेषता के अतिरिक्त अन्य किसी भी दृष्टि से देखने पर मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं है। केवल एक जगह आकर अन्तर हो जाता है, तथा वह जगह पशु के लिये बिल्कुल अलंघनीय (Inextricable) है। हमलोगों की भूख, निद्रा, भय और वंशरक्षा की प्रवृत्तियाँ - पशुओं और मनुष्यों में एक सामान है, कोई अन्तर नहीं है। एक मात्र 'धर्म' की दृष्टि से मनुष्य और पशु में अलंघनीय अन्तर हो जाता है। किन्तु यहाँ धर्म का अर्थ ललाट पर तिलक लगाना, फूल-बेलपत्ता, रामनामी चादर ओढ़ना नहीं है। धर्म का अर्थ है- ' विवेक ' या मननशीलता (अन्तरात्मा की आवाज- ज़मीर)। यह विवेक ही मनुष्य को 'सत-असत' का निर्णय करने में सक्षम-'निर्णायक बुद्धि ' प्रदान करता है। तभी तो विवेकी मनुष्य, क्या अच्छा है, और क्या बुराहै, समझ-बूझ कर इसका निर्णय कर सकता है। किन्तु साधारण अर्थों में जिसे अच्छा और बुरा (आंवला-इमली का अंतर) समझा जाता है, सदसत-विवेक का अर्थ भी ठीक उतना ही नहीं है। 'सत ' का अर्थ है-जो अविनाशी हो या चिरस्थायी हो (सत्य-वस्तु)। 'असत' का अर्थ है क्षणभंगुर या नश्वर (मिथ्या-वस्तु)। कौन सी वस्तु सत (अविनाशी) है, और कौन सी वस्तु असत (नश्वर) है- जो प्राणी चिन्तन करके इस बात को जान सकता है, उसी को मननशील जीव कहा जाता है। वैदिक निरुक्तकार यास्क-मुनि मनुष्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं- " जो व्यक्ति कुछ भी सोचने-बोलने-करने के पहले थोड़ा रुककर, 'विवेक-प्रयोग' करने के बाद ही कोई कार्य करता है, उसको ही मनुष्य कहा जाता है।"
मनुष्य निश्चित रूप से एक राजनैतिक प्राणी भी है। क्योंकि राजनीती का अर्थ है, 'देश-सेवा '। राष्ट्र को संचालित करने के लिये, देश के सभी नागरिक किस प्रकार एकजूट होकर देश के कल्याण का कार्य कर सकेंगे, उसकी नीति को निर्धारित कर उसी नीति का प्रयोग करेंगे। वे जिस नीति के अनुसार कार्य करेंगे, उस नीति का निर्धारण करना भी आवश्यक है, इस दृष्टि से देखने पर मनुष्य एक राजनैतिक प्राणी भी है। लेकिन मनुष्य केवल मननशील, राजनैतिक, या आर्थिक प्राणी मात्र ही नहीं है। मनुष्य के बारे में इस प्रकार से सोचना, मनुष्य की अवधारणा को बहुत छोटा बना देगा। ऐसे सोचने से मनुष्य में जो असाधारण उदारशीलता (magnanimity) है, उसकी जो ऐश्वर्य और अतुलनीय महिमा है, उसको अनदेखा कर देना होगा। तथा इस दृष्टि से यदि मनुष्य को नहीं देखा जाय, तो उसका वास्तविक परिचय प्राप्त न हो सकेगा।
ईसाई और इस्लामी पुराणों में यह कथा आती है, कि खुदा ने जब अपनी अभूतपूर्व (बेमिसाल) रचना, ' मनुष्य ' का निर्माण कर लिया तो उन्होंने सभी फरिश्तों को बुलवा भेजा, तथा मनुष्य के सम्मान में शीश झुकाने को कहा। [क्योंकि वह अपने बनाने वाले-'ब्रह्म'को भी जान सकने में समर्थ था -यह देखकर मुदमाप देवा !] एक एक करके सभी फ़रिश्तों ने वैसा किया, किन्तु एक ने वैसा नहीं किया। जिस देवदूत ने मनुष्य के सम्मान में अपना सिर नहीं झुकाया, उसे खुदा ने कहा दूर हटो शैतान ! और वह फ़रिश्ता शैतान बन गया। कितनी अद्भुत है यह कथा ! इसीलिये जो व्यक्ति मनुष्य के सामने सिर नहीं झुकाता, उसको (इस रंगमंच से) हट जाना होगा। स्वामीजी कहते हैं, " जो मनुष्य के सम्मान में सिर नहीं झुकाता, वह शैतान है।"
यदि ईश्वर सचमुच कहीं रहते हैं, तो वे मनुष्य के भीतर ही रहते हैं। स्वामीजी कहते हैं, " तुमलोग भगवान को ढूंढ़ने कहाँ जाते हो ? उनकी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति मनुष्य के भीतर ही है। तुमलोग नदी के तट पर खड़े होकर भी, जल पाने के लिये क्या कुआँ खोद रहे हो ? सब हाथों से वे ही कार्य कर रहे हैं, सभी पैरों से वे ही चल रहे हैं। खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, सभी स्थानों में वे ही कार्य कर रहे हैं। फिर तुमलोग भगवान की खोज कहाँ कर रहे हो ? "
यदि हमलोग जीना चाहते हों, तो हमें अपने भीतर इसी बुद्धि को (ब्रह्ममय जगत की दृष्टि को) जाग्रत करना होगा। ऐसी कोई बात नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को जनेऊ पहन कर ब्राह्मण बन जाना होगा?  अपने देश के अतीत को जाने-समझे बिना, केवल उसके आचार-अनुष्ठान का यंत्रवत पालन करते जाने से ही काम नहीं चलेगा। वेद-उपनिषद आदि गड़ेरियों के गीत हैं, तथा देवी-देवता आदि कठपुतली मात्र हैं, इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, इन सब को बाहर फेंक दो, क्योंकि हमारे सभी पूर्वज लोग मूर्ख थे- ऐसी ही धारणा बनाकर, हमलोग विदेशों से ' अर्थ दो, खाद्य दो, बुद्धि दो' कहकर  भीख मांगते हैं- यही तो हैं, आज के हमलोग!
परन्तु हमलोगों के जीवित रहने का एकमात्र पथ है, अपने अतीत को जानना और उसी की बुनियाद पर अपना जीवन गठन करना। हमारा जो आधुनिक और भौतिकवादी-समाज (Materialistic society) है, उस समाज में मनुष्य की महिमा को प्रतिष्ठित करना होगा, और समस्त वस्तुओं का धर्म के माध्यम से (त्यागपूर्वक) भोग करना होगा। क्योंकि भोग तो रहेगा ही, और किन्तु त्याग भी रहेगा। इसीलिये एक जगह स्वामीजी कहते हैं, " भोग पूरा किये बिना त्याग नहीं आ सकता है ।" जिसको भरपेट खाना भी नहीं मिलता हो, उससे यदि कहें, तुमलोग सब कुछ फेंक दो-तो यह ठीक नहीं होगा। स्वामीजी कहते हैं, वे लोग अन्न माँग रहे हैं, और तुम उनको पत्थल दे रहे हो ! पहले उनके रोटी का प्रबन्ध करो, उसके बाद उनको धर्म की कथा सुनाओ। यदि हमलोग जीवित बचे रहना चाहते हों, उन्नति करना चाहते हों, तो दलगत विचारधारा की परवाह किये बिना,स्वामीजी द्वारा प्रदर्शित पथ पर चलना होगा। उनका आदर्श केवल किसी दल या मत-विशेष के लिए नहीं है। स्वामीजीने कहा था,"ठाकुर समस्त प्रकार के साम्प्रदायिक विचारों और समस्त प्रकार के विभाजनकारी बेड़ियों को  तोड़ देने के लिये ही अवतीर्ण हुए थे।" वे आगे कहते हैं,
"तुमलोगों ने जिस दिन 'म्लेच्छ ' शब्द का अविष्कार किया, उसी दिन से तुलोगों का अधोपतन शुरू हो गया है। तुमलोगों अपने चारों ओर बाड़ खड़ी कर रहे हो ? ठाकुर जाती-धर्म के नाम पर खड़ी की गयी -वर्गीकरण के इन छोटे छोटे बाड़ को ध्वस्त करदेने के लिये ही आये थे।" एक प्रसिद्द कहावत है- 
"मूर्ख ठोकर खाने के बाद सीखता है, बुद्धिमान देख कर सीखता है।" पर हमलोग-न ठोकर खा कर न देखकर, किसी भी प्रकार से नहीं सीख रहे हैं। इस प्रकार यह बात आसानी से समझी जा सकती है, कि हमलोग कितने बुद्धिमान हैं !
स्वामीजी ने हमलोगों को जो भी उपदेश दिए हैं, या विचार दिए हैं, वे सब उनहोंने स्वयं अपने मन से गढ़ कर नहीं दिए हैं। प्राचीनकाल में जितनी चीजें हमलोगों के पास थीं, उनको भलीभांति समझ-बूझ, अपनी अनुभूति से जान लेने के बाद, उन्हीं बातों को नये रूप में हमलोगों के समक्ष प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने अति दरिद्र लोगों के बीच रहकर उनके दुःख के कारण को समझा है, उसके समाधान का मार्ग खोजकर जान लिया है, तभी उन विचारों को हमारे सामने रखा है। उन्होंने जीवन्त मनुष्यों (जो दूसरों के लिये जीते हैं, केवल वे ही जीवित हैं) के इतिहास को जान लिया था। तथा ' उनके जीवन के साथ, अपने जीवन का योग ' किया था, इसीलिये उनके उपदेश कभी विफल नहीं हुए।
इसीलिये रोमा रोला कहते हैं, उनकी वाणी सुनकर विद्युत् करेन्ट का झटका सा महसूस होता है। हालाँकि श्रीरामकृष्ण के चरणों माँ बैठकर उनहोंने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया था, किन्तु उसी में लीन होकर रह नहीं सके थे। वैसा चाहने पर भी, ठाकुर उनके उस भ्रम को तोड़ दिया था। तभी तो, सबों के दुःख को दूर हटाने के लिये उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था। इसीलिये, स्वामी विवेकानन्द को हमें अपना नेता या बुद्धि-दाता मानना होगा। ऐसा न करने से हमलोगों का भविष्य सचमुच अंधकारपूर्ण हो जायेगा। केवल बाहर में बारूद-विस्फोट करने से कुछ भी हासिल न होगा, स्वयं को ही 'बारूद' (मूर्तमान निःस्वार्थता) के रूप में निर्माण करना होगा। अपने भीतर से निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त करके,'मनुष्य' के जैसा मनुष्य बनकर भारत-माता की पूजा-वेदी पर स्वयं की बली देने के लिये तैयार रहना होगा। स्वामीजी ने कहा था, " अपने भीतर निःस्वार्थपरता, त्याग, सेवा, प्रेम का बारूद भरकर युवा समुदाय के उपर फट पड़ना होगा।" केवल भाषण देने से काम नहीं चलेगा। इसी बात को स्मरण रखने के लिये कहते हैं- ' हे भारत ! मत भूलना, कि तुम माता के लिये बली प्रदत्त हो। '
स्वामीजी यहाँ श्लोग्न देने के लिये नहीं आये थे। भारतवर्ष में और विश्व में किस प्रकार, समाज में सम्पूर्ण क्रांति या आमूल परिवर्तन कैसे करना है -- स्वामीजी ने उसी विप्लव-मार्ग का दिग्दर्शन किया था। प्रत्येक युवा का हृदय प्रेम और निःस्वार्थपरता रूपी बारूद का कारखाना बन जायेगा। सम्पूर्ण मानवजाति के प्रति अकृत्रिम प्रेम ही असली बारूद है ! इसी प्रेम के बारूद से अपने हृदय को भर लेना होगा। जो युवा इतने साहसी और क्रन्तिकारी हैं, वे स्वामी विवेकानन्द के पास चले आयें। यदि क्रांति ही करना चाहते हो, तो स्वामीजी के मार्ग पर चलो। यदि तुम वैसा साहस रखते हो, तो तुम्हें मरना (मिथ्या अहंकार को मारना ) होगा। किन्तु लोगों की दृष्टि में शहीद कहलाने या वाह-वाही पाने के लिये नहीं। क्या तुम सबों की दृष्टि से ओझल रहकर, उसी त्याग के बारूद, प्रेम का बारूद, पवित्रता का बारूद, सत्य-निष्ठा का बारूद, संयम, निर्भीकता के बारूद से धीरे धीरे अपने हृदय को भर सकते हो ?
जिस समय तुमलोग ऐसा मनुष्य बनकर समाज के सामने खड़े हो जाओगे, उस समय समाज तुम्हारे सामने श्रद्धा के साथ सिर झुकाएगाऔर तब तुम्हें देखकर, तुम्हारे सामने से और समाज से समस्त अनैतिकता और कायरता किसी चोर की भाँति भागने लगेंगे। यही कार्य करना होगा, अभी इसी प्रकार का चरित्र-गठन करने की आवश्यकता है। सच्ची समाज-सेवा का यही एकमात्र पथ है।
अपने देश-वासियों के लिये यदि तुम्हारे हृदय में प्रेम है, तो मनुष्य की महिमा के सामने अपने शीश झुकाओ। मनुष्य को चलता-फिरता देवालय समझकर उन्हें प्रणाम करो। स्वामीजी कहते हैं, ' मैंने जीवन भर ईश्वर का अन्वेषण किया है, किन्तु उनको केवल मनुष्य के भीतर ही पाया है।' स्वामीजी कहते हैं, ' मनुष्य के जैसा मनुष्य बनकर सबों का दुःख दूर करो। चरित्रवान बनो। चरित्र में जिन गुणों के रहने पशु मनुष्य में और मनुष्य देवत्व में उन्नत हो जाता है, उसे ही धर्म कहते हैं। क्या धर्म केवल मन्दिर, मस्जिद या गीर्जा में होता है ? जो वस्तु (महामण्डल निर्देशित ५-अभ्यासमनुष्य को वास्तविक मनुष्य में परिणत करके उसे देवतुल्य बना देती है, उसको ही धर्म कहते हैं। दुनिया के सभी धर्म मनुष्य को पशु-स्तर से देवता में विकसित होने का मार्ग बतलाते हैं। 
अभी के विद्यार्थियों को यह समझना चाहिये कि केवल परीक्षा में पास कर जाने से ही नहीं जीवन का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता है। उच्च डिग्री हांसिल करके भी अधिकांश लोग केवल अपने लिये ही जीवित रहते हैं, दूसरों के लिये जीवित रहने से मनुष्य जीवन सार्थक होता है, यह बात समझ में नहीं आती। जो लोग दूसरों के लिये जीना चाहते हों (उच्च स्तर की समाज सेवा करना चाहते हों ?) , तो इसके लिये सुन्दर स्वास्थ्य चाहिये, सद्बुद्धि-सम्पन्न मन चाहिये, परहित करने में समर्थ प्रेमपूर्ण हृदय चाहिए। 
किसी भी प्रकार के कार्य को दो प्रकार की बुद्धि से किया जा सकता है,' स्वार्थ- बुद्धि और परार्थ-बुद्धि ' स्वार्थबुद्धि से करने पर कोई भी कार्य बुरा -और परार्थबुद्धि से करने पर कोई भी कार्य अच्छा है। अतः कर्म करने के पीछे जो मनोभाव रहता है, उसको बदलने (Innovate) की जरूरत है। इसको ही कर्म-योग कहा जाता है। केवल कर्म में कौशल बरतना ही योग है। जो कुछ कर रहा हूँ, उसी कार्य को करूँगा, किन्तु दृष्टिकोण बदल जायेगा। ये बातें यदि तुमलोगों के विचार से ठीक लगे, उचित लगे, तो विवेकानन्द के पास आओ। उनके उपदेशों के अनुसार कार्य करो, उनको थोड़ी श्रद्धा दो, उनसे प्यार करो-इतना होने से ही काम बन जायेगा।  
कार्ल मार्क्स ने १८५३ ई० में एक पत्र में लिखा था , " भारतवर्ष के बारे में सोचने से बहुत दुःख होता है। क्योंकि, भारत ने अपना अतीत तो खो दिया है, किन्तु नया कुछ भी नहीं पाया है। इस शून्यता के भीतर से देखने पर भारतवर्ष का भविष्य कुछ समझ में नहीं आ रहा  है।" और ठीक उसी साल १८५३ में ही १७ वर्ष के किशोर गदाधर अपने बड़े भैया के साथ, पहली बार कोलकाता में पदार्पण करते हैं। और कोलकाता में सद्बुद्धि की एक हवा बहने लगती है। अतीत लगभग अस्पष्ट है, तब भी जितना बचा हुआ है, रणकृष्ण--विवेकानन्द उसी को बचाने के लिये-उसीको ही पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिये अवतीर्ण हुए थेइनके उपर श्रद्धा रखने का अर्थ है, भारतवर्ष को पुनरुज्जीवित करना, उससे प्यार करना, और उसी के साथ-साथ सबों के कल्याण का प्रावधान करना। इतना सब समझ लेने के बाद भी क्या हमलोग यह सोच सकते हैं कि अभी भारत के लिये स्वामीजी की कोई आवश्यकता नहीं है, क्या हमलोग जिस प्रकार के मनुष्य हैं, वैसे ही बने रहेंगे ? जो लोग मनुष्य की व्यथा से व्यथित होकर उनके वास्तविक कल्याण का मार्ग दिखला देते हैं, यदि उनके उपर श्रद्धा नहीं रखेंगे तो किनके उपर रखेंगे ?
इसीलिये तो सम्पूर्ण विश्व स्वामीजी के प्रति श्रद्धा रखता है। जैसे १९०२ ई० में स्वामीजी का देहान्त हो जाने के मात्र १२ वर्ष के भीतर, १९०६ से १९१४ ई० के मध्य ही स्वामीजी का 'कर्मयोग', 'भक्तियोग', 'राजयोग', 'ज्ञानयोग' का रुसी भाषा में अनुवाद हो गया था। उसी प्रकार हाल के दिनों में चीन में गीता, रामायण का अनुवाद हो रहा है, स्वामीजी के उपदेशों पर सेमिनार हो रहे हैं। चीन की सरकार ने वहाँ के शिक्षाविदों को इस बात का उत्तरदायित्व दिया है कि सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यन करके, उनका विश्लेषण करके यह पता लगायें की,धर्म में कोई सार-वस्तु है या नहीं ? तथा मनुष्य के कल्याण में धर्म की भी कोई भूमिका हो सकती है या नहीं ?  चीन के मनीषी लोग अभी दुनिया के सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यन करके उसका सार निकालने के लिये उनका विश्लेषण कर रहे हैं। इसको ही वैज्ञानिक विश्लेषण कहते हैं। जिस प्रकार धर्म के नाम पर दुनिया में बहुत अनर्थ हो चूका है, उसी प्रकार विज्ञान के द्वारा भी कई कल्याण के कार्य होने के साथ साथ बहुत अनर्थ भी हुआ है। इस समय यह देखने की जरूरत है कि, धर्म सामान्य मनुष्यों के किसी काम में आयेगा या नहीं ?
हमलोगों के लिये भी सभी धर्मों को विज्ञान की कसौटी पर जाँच-पड़ताल करके देखने का समय आ गया है, क्या सचमुच वेदों के चार महावाक्य सम्पूर्ण विश्व को पुनरुज्जीवित करने में समर्थ हैं ? इसे जाँच करके देखने की आवश्यकता आज के विश्व में सर्वाधिक है। केवल पाश्चात्य देशों का अनुकरण करते रहने से ही नहीं होगा। जैसे एक शिक्षित व्यक्ति श्रीरामकृष्ण के निकट आकर लगभग प्रति दिन कहता था, गीता-टीता इन सब में कुछ भी नहीं है। उसके बाद अचानक एक दिन आकर कहने लगा, गीता तो बहुत अच्छी और मनुष्य का उपकार करने वाली पुस्तक है। उसके इतना कहते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा, ' लगता है किसी गोरे साहब ने तुमसे ऐसा कह दिया है ?' हमलोग भी ठीक वैसा ही कर रहे हैं।
जैसे ही अमेरिका-इंगलैंड के लोग यह कह देंगे, कि नहीं, भारत के सभी वेद-शास्त्रों में अच्छी बातें कही गयीं हैं, उनमे अच्छे उपदेश दिए गए हैं। (अब तो अन्तर्राष्ट्रीय योग-दिवस भी मनाया जा रहा है, यूनाइटेड नेशन में दीवाली मनाई जा रही है! ) कम से कम अब तो भारत को यह कहने में शर्म नहीं आनी चाहिए कि  हाँ, धर्म अच्छी चीज है, गीता,वेद, उपनिषद सभी सुन्दर ग्रन्थ हैं, इन सभी शास्त्रों में मनुष्य के कल्याण की बातें कही गयीं हैं। यही हमलोगों की मानसिक दरिद्रता है, इस मानसिक कंगाली को दूर कर देना होगा। यदि हमलोग अपनी इस आन्तरिक कंगाली को दूर हटा कर उन महान विचारों (चार महावाक्यों) को अपने जीवन में अभिव्यक्त न करें, तो हमलोगों का भविष्य बहुत अंधकारपूर्ण हो जायेगा।
हमारा देश, जिसको हमलोग 'माँ ' कहते हैं, जिसने हमलोगों का लालन-पालन किया है, उस माँ के लिये क्या हमलोगों का कोई कर्तव्य नहीं है ? क्या हमारे उपर भारत-माता का कोई ऋण नहीं है ? हमारी भारत माँ सबसे अधिक प्रसन्न कैसे होंगी ? जब हमलोग स्वयं इस भारतमाता की गोद में बड़े होकर स्वस्थ सुन्दर मनुष्य जैसा मनुष्य बन सकें; और उनकी जो संतानें गरीब और दुखी हैं, उनके आँखों के अश्रु यदि पोंछ सकें। यह कार्य राजनीती करके नहीं किया जा सकता है। यह कार्य केवल यथार्थ मनुष्य बनकर ही किया जा सकता है। जिस मनुष्य में आत्मविश्वास होगा, निर्भयता रहेगी, त्याग और सेवा का भाव रहेगा, अन्य मनुष्यों के प्रति प्रेम रहेगा- ऐसा मनुष्य बनना होगा। तभी हमलोग मातृ-ऋण, पितृ-ऋण, जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता, - उसके लिये थोड़ा बहुत उचित कार्य हम कर सकेंगे। अब प्रश्न यह है कि हमलोग इस कार्य को करेंगे या नहीं ? इसका उत्तर हमें ही देना होगा। यदि हमलोग स्वयं को उनकी सुसंतान के रूप में गढ़ सकेंगे, तो भारत माता बहुत प्रसन्न होंगी। स्वामी विवेकानन्द हमलोगों को यही संकल्प लेने का आह्वान करते हैं। आज हमलोग क्या बन गए हैं, और क्या बन सकते हैं?  हमलोग क्या कर सकते हैं, उसका मार्ग दिखलाने के लिए ही स्वामीजी ने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था। 
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(बचपन में कृष्ण भगवान जब गाय चराते समय दोपहर में सभी गौओं को बरगद के पेड़ की छाया में विश्राम करते देखते हैं, तो अपने ग्वाल-बाल मित्रों से कहते हैं-' पश्य एतान महाभागान ' ये वृक्ष केवल दूसरों के लिये ही जीते हैं )[इस्लाम के ५ जरुरी अरकान (स्तम्भ) हैं, इसमें पहला अरकान 'तौहीद'- सबसे खास है उसका अर्थ है- ' दिल ओ जुबाँ से तुम यह शहादत अदा करो के "अल्लाह ता'आला" के सिवा कोई ज़ात इबादात ओ बंदगी के लायक नहीं (अल्ला, जो एक मेव अद्वितीय है,निर्गुण-निराकार है -को ही संस्कृत में ब्रह्म कहा जाता है! ); अन्य ४ हैं -नमाज-रोजा-हज-ज़कात]केन्द्रापसारी बल (Centrifugal force) और केंद्राभिसारी बल (centripetal force) दो प्रकार के बलों के प्रभाव से  या यथापूर्व स्थिति (status quo) बनाये रखता है।
[तैत्तिरीयोपनिषद २/७/१ में कहा गया है है - " उदरम् अन्तरम् कुरुते अथ तस्य भयम् भवति ।"' जो व्यक्ति ब्रह्म और अपने अथवा दूसरों में -' उदरम् ' थोड़ा-सा भी, अन्तरम् कुरुते - अन्तर समझता है, उसको भय होता है।'

 इह चेदवेदिदथ सत्यम् अस्ति, न चेत् इह अवेदीत महती विनष्टिः। 
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः, प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृताः भवन्ति ।।
(केनोपनिषद 2/2/5)

' इस जगत में कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं '- इस अद्वैत निश्चय को इसी मनुष्य शरीर में रहते समय 'अवेदित् ' जान लिया, 'अथ'-तब तो 'सत्यम अस्ति ' -बहुत कुशल है। और यदि इस शरीर के रहते रहते, इस तथ्य को अपने अनुभव से नहीं जान सके, तो ' महती विनष्टिः '- यह दुर्लभ मानव-शरीर, सभी प्राणियों में स्वयं को देखने का एक अवसर है, यदि इस बार भी यह अवसर हाथसे निकल गया फिर महान विनाश हो जायेगा-बार-बार   मृत्युरूप संसार प्रवाह में बहना पड़ेगा। यही सोचकर ' धीराः ' - विवेक-प्रयोग करने में सक्षम बुद्धिमान पुरुष, ' भूतेषु भूतेषु '- प्राणी-प्राणी में या प्राणिमात्र में ' विचित्य' - अपने (ब्रह्म-स्वरुप) को समझकर, इस लोक से ' प्रेत्य ' -प्रयाण कर जाने के बाद, 'अमृताः भवन्ति '- अमर हो जाते हैं।]    

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