Monday, November 22, 2010

" भारत पुनर्निर्माण मन्त्र " महामण्डल का साप्ताहिक पाठचक्र -' Study Circles'


(महामण्डल का साप्ताहिक "शैक्षिक-सत्र ")
जिस किसी भी स्थान में महामण्डल का एक केन्द्र होता है, वहाँ पर सप्ताह में कम से कम एक पाठचक्र तो अवश्य ही होता है. भले ही हम इसको एक ' पाठचक्र ' की संज्ञा देते हों, किन्तु यह केवल एक चिन्तन गोष्ठी ही नहीं है;बल्कि यह उन समस्त स्थानीय युवाओं की मिलन-स्थली भी है जो महामण्डल के सिद्धान्तों (चरित्र-निर्माण आन्दोलन के प्रचार प्रसार ) में उत्कट अभिरुचि रखते हैं| क्योंकि इसका मूख्य उद्देश्य केवल पढ़ाकू बनना और बनाना ही नहीं है.
जब वे अनूठे देश-प्रेमी युवा (जो भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच में गाल पर तिरंगे का चित्र बनवाने को ही देश भक्ति नहीं समझते ) बल्कि - जो स्वामी विवेकानन्द के भारत पुनर्निर्माण मन्त्र -'तुम स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्य बनने में साहायता करो'  को ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य निर्धारित कर चुके हैं; एक साथ इकट्ठे होते हैं, तो उनको यह अनुभव होता है कि महामण्डल के सिद्धान्तों (Be and Make आदि) को अपने जीवन में धारण करने के अभियान में वे बिल्कुल एकाकी नहीं हैं | 
वे यहाँ आकर अपने जैसे दूसरे युवा भाइयों के साथ मित्रता के इस अनूठे बन्धन को भी ह्रदय से महसूस करते हैं. प्रत्येक सप्ताह यहाँ पहुँच कर वे अपने नेता स्वामी विवेकानन्द के उत्साह-अग्नि से अपने ह्रदय को फिर से चार्ज कर लेते हैं.
महामण्डल वैसे लोगों की संस्था नहीं है- जो सन्यासी बन चुके हों य़ा जिन लोगों ने जगत का परित्याग कर दिया हो;बल्कि यह उन साधारण युवाओं के लिये है जो समाज के अन्य साधारण गृहस्थ लोगों के जैसा ही अपने घर-परिवार के बीच निवास करते हैं.
किन्तु एक अन्तर अवश्य है- वे लोग (अन्य साधारण कैरियरिस्ट युवाओं की तरह केवल अपने ही बारे में नहीं सोंचते बल्कि) मनुष्य-जीवन का अर्थ एवं अपने समाज की ज्वलंत आवश्यकताओं को समझने के लिये प्रयासरत रहते हैं, तथा उसी समझ के आलोक में अपना जीवन गठित करने के लिये कठोर परिश्रम भी करते हैं.
वे लोग भी दूसरे सामान्य युवाओं की तरह ही विद्यालय तथा महाविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हैं, तत्पश्चात अपनी जीविका चलाने के लिये किसी न किसी व्यवसाय से जुड़ जाते हैं. बावजूद इसके वे उन साधारण किस्म के युवाओं (जो महामण्डल को नहीं जानते ) की तरह नहीं होते, क्योंकि वे सामान्य कोटि के युवाओं की अपेक्षा कुछ हद तक कठिन जीवन शैली को चुनना पसन्द करते हैं. 
अपने जीवन की - ' प्रत्येक गतिविधि ' में उनको एक आदर्श का अनुसरण करना पड़ता है.अतः स्वाभाविक रूप से उनको ज़माने के प्रवाह के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ता है.
इसीलिये उनको अपनी जीवन-यात्रा का प्रारम्भ अपने जीवन लक्ष्य (निशाना)  की स्पष्ट धारणा बनाने के बाद ही करनी चाहिये. भारत के पुनर्निर्माण के लिये राष्ट्र-व्यापी स्तर पर जैसा युवा-आन्दोलन चलाने का स्वप्न स्वामी विवेकानन्द ने देखा था, उनके उसी सपने को महामण्डल कार्यान्वित करना चाहता है- वही स्वप्न क्रमशः इन युवाओं के मन में भी बस जाना चाहिये.
यह साप्ताहिक पाठचक्र, विवेकानन्द साहित्य के अध्यन एवं बोधगम्य परिचर्चा के माध्यम से उनलोगों में  ऐसे मनोभाव को विकसित करने में सहायता करता है. साप्ताहिक पाठचक्र में क्या अध्यन करना अच्छा रहेगा, इसका चुनाव युवाओं को खुद से करना उतना आसान नहीं भी हो सकता है.इसीलिये महामण्डल पाठचक्र के लिये छोटी छोटी चुनिन्दा पुस्तिकाओं (महामण्डल का उद्देश्य और कार्यक्रम, एक युवा आन्दोलन, नेतृत्व का अर्थ एवं गुण, जीवन-गठन, चरित्र गठन, मनः संयोग आदि ) से अध्यन करने का परामर्श देता है.
ये पुस्तिकाएँ ही हमारे उद्देश्य तक ले जाने के लिये यथेस्ट हैं. हमलोगों को इन पुस्तिकाओं का गहराई से बार बार अध्यन करना चाहिये, एवं उनके मूल-विषय पर चिन्तन-मनन भी करना चाहिये. इसप्रकार उन सिद्धान्तों को हम समझ जाते हैं, तथा तब हम उनको अपने जीवन में उतार भी सकते हैं. 
इस प्रकार वे समस्त श्रेष्ठ सिद्धान्त जो स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरुष (सदगुरु ) के मुख से निःसृत हुई हैं,इन महामण्डल पुस्तिकाओं के माध्यम से  हमारे समक्ष सहज रूप में उपलब्ध हो जातीं हैं.किसी भी महान और कल्याणकारी ज्ञान को तीन चरणों में आत्मसात (य़ा जीवन में धारण किया) जा सकता है।
  पहला है - " श्रवण "(य़ा Study Seriously), 
दूसरा है-   " मनन "(य़ा Think deeply and freely), 
एवं तत्पश्चात " निदिध्यासन " (य़ा Apply - 'put them into practice ') 
केवल साहित्यिक ज्ञान तुमको एक पण्डित तो बना सकता है, किन्तु न तो यह तुम्हारे जीवन को बदल सकता है, और न ही किसी विशिष्ट विषय की स्पष्ट अवधारणा ही प्रदान कर सकता है. यदि हम सभी लोग, खास तौर पर वे जो पाठचक्र का नेतृत्व करना चाहते हैं, यदि स्वयं अपने दैनन्दिन जीवन में स्वामीजी की वाणी को उपरोक्त विधि (तीन चरणों में ) से आत्मसात करने के लिये गंभीरता के साथ प्रयासरत रहते हों,केवल तभी हमारा पाठचक्र पर्याप्त उत्साह एवं जीवन्त अंदाज के साथ जारी रह सकता है.
केवल इतना ही नहीं, हमारे अन्दर विकसित मनुष्योचित गुणों से प्रभावित होकर, तब बहुत से नवागन्तुक भी इस ओर आकर्षित होंगे, उनमे भी यथोचित समझदारी का विकास होगा तथा वे स्वयं भी इस कार्य (मनुष्य-निर्माण आन्दोलन) में योगदान करने के लिये स्वेच्छा से जुट जायेंगे.
पाठचक्र में चलने वाली परिचर्चा इतनी स्पष्ट होनी चाहिये कि वहाँ उपस्थित सारे युवा उसको पकड़ सकें. वहाँ पर जो कोई भी सिद्धान्त/ज्ञान/ य़ा जानकारी युवाओं के समक्ष प्रस्तुत किये जाएँ, उनका स्तर आवश्यकता से अधिक ऊँचा य़ा उनके जगत से बहुत ज्यादा अलग हट कर नहीं होना चाहिये. जो युवा पाठचक्र में आ रहे हैं, उनको यहाँ प्राप्त होने वाली नई नई जानकारियाँ इस ढंग से दी जानी चाहिये कि को वे इन नवीन विचारों ( 'मन', 'विवेक', 'श्रद्धा',अथवा अन्तर्यामी " सत्ता " सम्बन्धित ज्ञान) को अपने जीवन के अनुभवों के साथ सम्बद्ध करके समझने में सक्षम हो सकें. 
हम जानते हैं कि किसी विषय का तजुर्बा करके जो ज्ञान होता है- वही सर्वोत्तम शिक्षक है.
( Experience is the great teacher). जब वे लोग यहाँ से सीखे हुए नई नई जानकारियों (सिद्धान्तों) को प्रयोग में लायेंगे, उनको नये नये अनुभव प्राप्त होने लगेंगे;तथा वे स्वयं ही इन सिद्धान्तों कि सच्चाई के कायल हो जायेंगे. 
हमलोगों को यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि हमलोगों का सारा फोकस (मूख्य-मुद्दा)- अपने सामान्य व्यवसाय,य़ा घर-परिवार का त्याग किये बिना,अपना सारा ध्यान अपने व्यवहारिक जीवन को सुन्दर ढंग से गठित करने पर ही केन्द्रित रखना है. समाज को आज इसी बात की आवश्यकता है, क्योंकि ज्ञान के साथ जीवन में व्यवहारिक तालमेल ही, हमें यथार्थ मनुष्य में परिणत कर देता है. 
हमें अपने सभी सदस्यों को,घर से ही अध्यन करके आने के लिये एवं परिचर्चा में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये. हमें अपने किसी भी सदस्य के विचारों की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, बल्कि उनके समझ को बहुत ही दोस्ताना तथा सकारात्मक ढंग से क्रमशः बेहतर य़ा उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करना चाहिये. तुम यह कभी मत भूलो कि तुम कोई ' गुरु '- नहीं हो, पाठचक्र/परिचर्चा में ' गुरु-गिरी ' करने के लिये नहीं आये हो, बल्कि तुम भी वैसे ही एक ' विद्यार्थी ' हो जैसा कोई अन्य सहभागी है.
हमारे पाठचक्र में कोई- ' सदन के नेता ' य़ा " Leader of the House " की अवधारणा नहीं है. इसीलिये पाठचक्र में किसी भी योजना का अनुशरण तो पूरी ईमानदारी के साथ करना चाहिये, किन्तु जबरन थोपे गये अनुशासन की अधिक मात्रा देकर इसे एक यांत्रिक (मशीनी) समारोह में परिणत करने से भी बचना चाहिये.नवयुवकों को ताजगी और उत्साह से भरपूर एक खिले हुए पुष्प के जैसा ह्रदय को लेकर ही अपने 'युवा नेता' विवेकानन्द के समक्ष आने एवं उनके ह्रदय के निष्काम प्रेम के स्पर्श के स्पन्दन को महसूस करने के लिये भी अनुप्रेरित करना चाहिये.
जो लोग 'शैक्षिक सत्र ' को सन्चालित करते हैं,उन्हें महामण्डल पुस्तिकाओं का गहन अध्यन न केवल इसके अभिनव विचारों को आत्मसात करने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर करना चाहिये, वरण युवा मन के समीप पहुँचने के लिये महामण्डल के अनूठे पद्धति का भी अनुसरण करना चाहिये. हमें उनलोगों से उसी भाषा में बात करनी चाहिये जिसे वे आसानी से समझ सकते हों.' धर्म ', 'आध्यात्मिकता', 'योग','भक्ति','अद्वैत वेदान्त ' जैसे कठिन -कठिन शब्दों का अत्यधिक प्रयोग करके नवयुवकों के मन को बोझिल करने से कोई विशेष लाभ नहीं होता है.
 क्योंकि अक्सर इन सभी शब्दों का अर्थ समाज में कुछ का कुछ निकाल लिया जाता है, इसीलिये ऐसे युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा है, जो इन बातों में तनिक भी दिलचस्पी नहीं रख सकते हैं. इनमे से कोई भी शब्द - ' यह य़ा वह ' उनकी आसन्न जरूरतें भी नहीं हैं. स्वामीजी ने एक पत्र में अपने कुछ युवा मित्रों को सम्बोधित करते हुए लिखा था- 
" Be moral , Be brave - keep your heart completely pure . 
Be strictly moral, brave unto desperation. Do not bother  
your heads with religious theories. " 
- " मेरे युवा मित्रों, तुम वीर (बहादुर और निडर ) बनो, 
नीति-परायण बनो, 
अपने ह्रदय को संपूर्णतः पवित्र रखने के लिये पाँच सदाचार 
(सत्य,अहिंसा, ब्रह्मचर्य, आस्तेय, अपरिग्रह यम-नियम आदि) 
का पालन पूरी कठोरता के साथ करो,
(यदि इस काम में कभी नैराश्य आ जाय तो- इस) 
नैराश्य का सामना पूरी निडरता के साथ करो. 
तथा अन्य प्रकार धार्मिक सिद्धान्तों (मतवादों) से -
              अपने मन को बिल्कुल ही व्याकुल य़ा परेशान मत होने दो!  "  
हमें इसी पत्र की भावना को ध्यान में रखते हुए ' शैक्षिक सत्र ' का सञ्चालन करना चाहिये.आज के युवाओं में सही दृष्टिकोण को क्रमशः विकसित होने दो. नवागन्तुक भाइयों को तुम अपनी सनक य़ा धुन दिखला कर उसको डराने य़ा चौंका देने की चेष्टा मत करो. उनलोगों की जरूरतें, योग्यता (पात्रता), और अभिरुचियों को समझने की चेष्टा करो. 
उनलोगों को पहले यह समझने दो कि वे लोग अपने " 3H " (Hand,head और heart ) अर्थात शरीर,मन और ह्रदय को कैसे विकसित कर सकते हैं. उनलोगों को मनुष्य जीवन के उद्देश्य को जानने वाला - ' एक सिद्धान्ती और (निडर) आत्मविश्वासी ' पूरी तरह से एक नीतिपरायण एवं चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो. उनलोगों को अपने देशवासियों की अकथनीय, दारुण दुर्दशा को समझ कर, उसे दूर करने के उपाय, ' त्याग और सेवा ' के प्रति समर्पित कार्यकर्ता बनने के लिये अपने जीवन से अनुप्रेरित करो.
इस प्रकार की प्रचेष्टा के द्वारा स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में युवाओं का एक ऐसा राष्ट्रव्यापी बलिदानी-जत्था निर्मित हो जायेगा- जो भारत में आमूलचूल परिवर्तन ला देगा, जिसके आविर्भूत होने की भविष्यवाणी स्वामीजी ने स्वयं की थी. किन्तु जो अभी तक साकार रूप नहीं ले सका है.
(अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की द्विभाषी सम्वाद पत्रिका " Vivek-Jivan" के नवम्बर २०१० में अंग्रेजी में प्रकाशित सम्पादकीय का हिन्दी संस्करण.)  

Tuesday, November 9, 2010

Advice of Swami Vivekananda

(Letter of Swami Vivekananda )
{... " It is not the building that makes the home, but it is the wife that makes it, " says a Sanskrit poet, and how true it is ! The roof that affords you shelter from heat and cold and rain is not to be judged by the pillars that support it- the finest Corinthian columns though they be- but by the real spirit-pillar who is the center, the real support of the home- the woman (Letter of Swami Vivekananda: pg 75) 
य़ा श्रीः स्वयं सुक्रितिनाम भवनेषु - 
" Who is the Goddess of Fortune in the families of meritorious." 
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
" The gods are pleased where the women are held in esteem- says the old Manu. 
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी - 
" Thou art the women, Thou art the man. Thou art the boy and the girl as well " (Shvetashvatar Upnishad )
सर्वशास्त्र पुरानेषु व्यासस्य वचनं ध्रुवं |
परोपकार अस्तु पुण्याय पापाय परपीडनम ||
- " Amidst all the scriptures and Puranas, know that statement of Vyasa to be true, that doing good to others conduces to merit, and doing harm to them leads to sin. "...Is there any sex-distinction in the Atman (Self) ? Out with the differentiation between man and woman - all is Atman! Give up the identification with the body, and stand up ! Say, " Asti, Asti "- Everything is ! - cherish positive thoughts. By dwelling too much upon " Nasti, Nasti " - " It is not! It is not ! " (negativism), the whole country is going to ruin ! " 
Soham, Soham, Shivoham "- " I am He ! I am He ! I am Shiva ! " What a botheration! In every soul is infinite strength, and should you turn yourselves into cats and dogs by harbouring negative thoughts ? Who dares to preach negativism? Whom do you call weak and powerless ? say " Shiivoham, Shivoham " -"- I am Shiva ! I am Shiva !"
- marriage is the truest goal for 99% of the human race, and they will live the happiest life as soon as they have learn t and are ready to abide by the eternal lesson- that we are bound to bear and forbear and that life to every one must be a compromise.
Believe me, dear Harriet (Miss Harriet Hale), perfect life is a contradiction in terms. Therefore we must always expect to find things not up to our highest ideal. Knowing this, we are bound to make the best of every thing. From what I know of you, you have the calm power which bears and forbears to a great degree, and  therefore I am safe to prophesy that your married life will be very happy.
...The best I can do in the circumstances is to quote from Kalidasa's Shakuntla, where rishi kanva gives his benediction to Shakuntla on the eve of her departure to her husbands place- " May you always enjoy the undivided love of your husband, helping him in attaining all the that is desirable in this life, and when you have seen your children's children,
and the drama of life is nearing its end, may you help each other in reaching that infinite ocean of Existence, Knowledge, and Bliss(सत्- चित्-आनन्द ); at the touch of whose waters all distinction melt away and we are all one ! }
( His letter dated 17th Sept 1896)    


Tuesday, November 2, 2010

मनुष्य को पुनरुज्जीवित करना होगा ! (Revivification of men )

ह्रदय के ही माध्यम से ईश्वर बोलता है, 
कार्य करता है, और बुद्धि के माध्यम से तुम स्वयं| "
श्रद्धा मिल जाने से मनुष्य बड़ी तीव्र गति से विकसित होने लग‌ता है, और वह ' श्रद्धावान मनुष्य ' सत्य को प्राप्त कर लेता है|उपनिषद में कहा गया है-" ब्रह्मवित आप्नोति परम !" - ब्रह्मज्ञानी परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है | वह परम सत्य क्या है ? वे परब्रह्म परमात्मा (ठाकुर) सत्य स्वरूप हैं|यहाँ ' सत्य ' उस नित्य सत्ता का बोधक है जो प्रत्येक वस्तु में अनुस्यूत है|वह परब्रह्म नित्य सत हैं अर्थात किसी भी काल में उनका आभाव नहीं होता, तथा वे ज्ञान स्वरूप हैं, उनमे अज्ञान का लेश भी नहीं है और वे अनन्त हैं अर्थात देश और काल की सीमा से अतीत है! " सत्यम ज्ञानम अनन्तं ब्रह्म !"जो मनुष्य उस परब्रह्म को तत्व से जान लेता है -जो मनुष्य उस परब्रह्म को तत्व से जान लेता है - ' वह ब्रह्म के साथ सब भोगों का अनुभव करता है !'  
" विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान कामान अश्नुते !"
(तैत्तरीय उपनिषद: वल्ली २: अनुवाक १)
परमात्मा को अनुभव से जानने वाला- वह ब्रह्मविद पुरुष इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों का (भोग नहीं) सदुपयोग य़ा सेवन करते हुए भी स्वयं सदा ह्रदय की गुफा में छिपे हुए परब्रह्म में ही स्थित रहता है ! इसलिए वह अपने मन को विषयों में जाने से रोक सकता है|अतः सदा सभी कर्मों से निर्लेप रहने में समर्थ ब्रह्म के जैसा बन जाता है! इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्म के स्वरुप तथा उसके ज्ञान की महिमा को बताने वाली है !परब्रह्म को जानने वाला - ब्रह्मज्ञानी; परब्रह्म को प्राप्त हो जाता ! 
इसी उपनिषद में आगे कहा गया है- " सः अकामयत प्रजायेय बहु स्याम इति " सर्ग के (सृष्टि के पहले) आदि में ब्रह्म  अकेला था,उसे अच्छा नहीं लग रहा था, इसीलिये ने ईश्वर ने विचार किया -मैं नानारूप में उत्पन्न हो कर बहुत हो जाऊँ ! यह विचार करके उन्होंने तप किया -" सः तपः अतप्यत " -अर्थात जीवों के कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करने के लिये संकल्प किया। और संकल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझने आता है इस जड़-चेतनमय जगत को अपने संकल्पमय स्वरूप में गढ़ लिया;उसके बाद स्वयं भी उसमे प्रविष्ट हो गये-" तत-सृष्ट्वा तत एव अनुप्राविशत ! तत अनुप्रविश्य सत च त्यत (अमूर्त- निर्गुण Super-Consciousness ) अभवत ! " विज्ञानम च अविज्ञानम च सत्यम च अनृतम च, इदम यत किम च; तत सत्यम - चेतन और जड़ तथा, सत्यम (अस्ति-भाति-प्रिय) और अनृतम (नाम-रूप) वह सत्य-स्वरूप ब्रह्म  ही हैं ! सत्य यही है कि यह सबकुछ (मनुष्य भी) एक ही वस्तु (ब्रह्म) से उत्पन्न हुआ है!
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " मैं पुरुष य़ा स्त्री हूँ, मैं अमुक देशवासी हूँ, यह सब कहना केवल मिथ्या है। सभी देश मेरे हैं, सारा विश्व मेरा है; ...सारा विश्व ही मानो मेरा शरीर हो गया है| किन्तु हम देखते हैं कि संसार में बहुत से लोग ये सब बातें मुख से कहने पर भी आचरण में सभी प्रकार के अपवित्र कार्य करते रहते हैं; ... जब तक अशुभ-वेग एकदम समाप्त नहीं हो जाता, जब तक पहले की अपवित्रता बिल्कुल दग्ध नहीं हो जाती, तब तक कोई भी सत्य का साक्षात्कार और उसकी उपलब्धि नहीं कर सकता| अतएव जिन लोगों ने आत्मा को प्राप्त कर लिया है, जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है, उनके लिये अतीत जीवन के शुभ संस्कार, शुभ वेग ही बच रहता है| शरीर में वास करते हुए भी और अनवरत कर्म करते हुए भी वे केवल सत्कर्म ही करते हैं; उनके मुख से सब के प्रति केवल आशीर्वाद ही निकलता है, उनके हाथ केवल सत्कार्य ही करते हैं, उनका मन केवल सत्चिन्तन ही कर सकता है, उनकी उपस्थिति ही, चाहे वे कहीं भी रहे सर्वत्र मानव जाती के लिये महान आशीर्वाद होती है| " (२: ३८) 
" मान लो, समाज में कोई दोष है, तो तुम देखोगे कि फ़ौरन ही एक दल उठकर प्रतिहिंसात्मक रूप से गली-गलौज करने लगता है| कभी कभी तो ये लोग बड़े मतान्ध और कट्टर हो उठते हैं|.... जो भी मतान्ध खड़ा होकर किसी विषय के विरुद्ध लेक्चरबाजी कर सकता है, उसे अनुयायी मिल जाते हैं| तोडना सहज है, पागल भी तोड़-फोड़ कर सकता है किन्तु किसी वस्तु को गढ़ना उसके लिये बड़ा कठिन है | मान लो कोई दोष है, तो केवल गली-गलौज से तो कुछ होगा नहीं; हमें उसके जड़ तक जाके कार्य करना पड़ेगा |
"पहले तो यह जानो कि दोष (भ्रष्टाचार-या हर प्रकार के अपराध का) का कारण क्या है ? (ब्रह्मविद बनने की या चरित्र-निर्माण कर मनुष्य बनने की शिक्षा नहीं दी जाती) फिर उस कारण को दूर करो!  (Be and Make ) "ब्रह्मविद मनुष्य बनो और बनाओ" - और कार्य (भ्रष्टाचार) अपने आप ही चला जायेगा| केवल अपशब्द कहने से कोई लाभ नहीं होता,वरन उससे हानी कि सम्भावना ही अधिक होती है|
..जिसके ह्रदय में सहानुभूति थी, वे समझ गये थे कि दोषों को दूर करने के लिये उसके कारणों में पहुँचना होगा| ...वे महापुरुष संसार के समस्त नर-नारियों को अपनी सन्तान के रूप में देखते थे| ..उनका ह्रदय प्रत्येक के लिये अनन्त सहानुभूति और क्षमा से पूर्ण था- वे सदा ही सहने और क्षमा करने को प्रस्तुत रहते थे| वे जानते थे कि किस प्रकार मानव-समाज को पुनरुज्जीवित (Revivification  of men )  किया जाता है। अतएव अनन्त धैर्य के साथ धीरे धीरे किन्तु अमोघ रूप से अपनी ' संजीवनी औषधि ' का प्रयोग कर के मनुष्यों को ब्रह्मविद बनने के लिये जाग्रत करने लगे| उन्होंने किसी को गालियाँ नहीं दी, भय नहीं दिखाया पर बड़ी कृपा के साथ धीरे धीरे वे लोगों को एक एक सोपान (पशु से मनुष्य में - पशु मानव को देव-मानव में ) ऊपर उठाते गये| " (२:७०-७१)
" केवल ह्रदय (Heart) ही हमें उच्चतम भूमि में ले जाता है, जहाँ बुद्धि (Head) कभी नहीं पहुँच सकती| ..केवल बुद्धिमान, किन्तु ह्रदयशून्य मनुष्य कभी अन्तः स्फूर्त (ब्रह्मविद) नहीं बन सकता| ...यदि योग्य संस्कार किया जाय तो, ह्रदय में परिवर्तन हो सकता है और वह बुद्धि का भी अतिक्रमण कर अन्तःस्फुरण में परिवर्तित हो जाता है| अन्त में मनुष्य को बुद्धि के परे जाना ही पड़ेगा| ...ह्रदय ही अन्तिम ध्येय (सत्य) तक पहुँच सकता है|...निर्मल ह्रदय ही सत्य के प्रतिबिम्ब के लिये सर्वोत्तम दर्पण है, इसलिए यह सारी साधना ह्रदय को निर्मल करने के लिये ही है, और जब वह निर्मल हो जाता है,सारे सत्य उसी क्षण उस पर प्रतिबिम्बित हो जाते हैं|...दुःख की समस्या बुद्धि से हाल नहीं हो सकती, यह केवल ह्रदय से ही होगी| ...सर्वदा ह्रदय का ही संस्कार करो, उसे अधिकाधिक पवित्र बनाओ, क्योंकि ह्रदय के ही माध्यम से ईश्वर बोलता है, कार्य करता है, और बुद्धि के माध्यम से तुम स्वयं| " (३:१०८) 
" सत्य का स्वरूप ही ऐसा है कि जो कोई उसे देख लेता है, उसे एकदम पूरा विश्वास हो जाता है| सूर्य का अस्तित्व सिद्ध करने के लिये मशाल की जरुरत नहीं होती|  वह तो स्वयं ही प्रकाशमान है|..और तब हमारा ह्रदय जाग्रत हो उठेगा- और कहेगा, 'यह सत्य है, और यह सत्य नहीं है|...परमेश्वर के अस्तित्व का प्रमाण क्या है? - साक्षात्कार! " (३: १०९)    
" इस समस्त विश्व में एक सत वस्तु ओतप्रोत है; और वह देश, काल तथा (निमित्त ) कार्य-कारण के जाल में मानो फँसी हुई है| मनुष्य का सच्चा स्वरूप वह है, जो अनादी, अनन्त, आनन्दमय तथा नित्य मुक्त है, वही देश, काल और परिणाम के फेर में फंसा है| यही प्रत्येक वस्तु के सम्बन्ध में भी सत्य है| प्रत्येक वस्तु का परमार्थ स्वरूप वही अनन्त है|
यह विज्ञानवाद (प्रत्याय वाद ) नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं कि विश्व का अस्तितिव ही नहीं है| इसका अस्तित्व सापेक्ष है, और सापेक्षता के सब लक्षण इसमें विद्यमान हैं| लेकिन इसकी स्वयं की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है| यह इसलिए विद्यमान है कि इसके पीछे देश-काल-निमित्त से अतीत निरपेक्ष आद्वितीय सत्ता मौजूद है| " (३:११९)


" चेतन मन ही अचेतन का कारण है" हमारे जो लाखों पुराने चेतन विचार और चेतन कार्य थे, वे ही घनीभूत होकर प्रसुप्त हो जाने पर हमारे अचेतन विचार बन जाते हैं|हमारा उधर ख्याल ही नहीं जाता, हमे उनका ज्ञान नहीं होता, हम उन्हें भूल जाते हैं|...वे ही प्रसुप्त कारण (पाशव -भाव ) एक दिन मन के ज्ञानयुक्त क्षेत्र पर आ उठते हैं और मानवता का नाश कर देते हैं| अतएव सच्चा मनोविज्ञान (मनः संयम का अभ्यास) उनको (अचेतन मन को) चेतन मन के अधीन लाने का प्रयत्न करेगा|  
" अतएव शिक्षा का सबसे महत्व पूर्ण कार्य है, मनुष्य को उसके सच्चे स्वरुप को जानने का उपाय बताकर उसका 'Revivification' कर देना, उसे पुनरुज्जीवित कर देना, उसमें नई रूह फूँक देना या उसके मिथ्या अहंकार को मैं समझने के भ्रम को दूर कर देना ! जिससे कि वह ब्रह्मविद बनकर (अपने भाग्य का विधाता या ) अपना पूर्ण स्वामी बन जाये| अचेतन को अपने अधिकार में लाना हमारी साधना का पहला भाग है|"
 
साधना का दूसरा सोपान है- चेतन के परे Super -Conscious (अतिचेतन ) में जाना ! जिस तरह, अचेतन चेतन के नीचे - उसके पीछे रहकर कार्य करता है, उसी तरह चेतन के ऊपर - उसके अतीत भी एक अवस्था है। जब मनुष्य इस अतिचेतन अवस्था में पहुँच जाता है, तब वह मुक्त हो जाता है, (ब्रह्म को जानकर ब्रह्मरूप हो जाता है या) ईश्वरत्व को प्राप्त हो जाता है। तब मृत्यु अमरत्व में परिणत हो जाती है, दुर्बलता असीम शक्ति बन जाती है और अज्ञान की लौह श्रृंखलाएँ मुक्ति बन जाती हैं|
अतिचेतन का यह असीम राज्य ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है! अतएव यह स्पष्ट है कि हमे दो कार्य अवश्य ही करने होंगे| एक तो यह कि इड़ा और पिंगला के प्रवाहों का नियमन कर अचेतन कार्यों को नियमित करना; और दूसरा, इसके साथ ही साथ चेतन के भी परे चले जाना|  ग्रंथों में कहा गया है कि योगी वही है, जिसने दीर्घ काल तक चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करके ( य़ा अनायास भगवत कृपा से भी ) इस सत्य की उपलब्धि कर ली है|अब सुषुम्ना का द्वार खुल जाता है और इस मार्ग में वह प्रवाह प्रवेश करता है, जो इसके पूर्व उसमे कभी नहीं गया था, यह धीरे धीरे विभिन्न कमल-चक्रों को खिलाता हुआ अन्त में मस्तिष्क तक पहुँच जाता है|तब योगी को अपने सत्यस्वरूप का ज्ञान हो जाता है, वह जान लेता है कि वह स्वयं परमेश्वर ही है| हममें से प्रत्येक व्यक्ति, बिना किसी अपवाद के, योग के इस अन्तिम अवस्था को प्राप्त कर सकता है| लेकिन यह अत्यन्त कठिन कार्य है|यदि मनुष्य को इस सत्य का अनुभव करना हो ...कुछ विशेष साधनाएँ भी करनी होंगी (य़ा महामण्डल का निष्ठावान कर्मी बनने से अनायास T की कृपा से भी होगा ) | महत्व तो तैयारी का ही है; दीपक जलाने में कितनी देर लगती है? केवल एक सेकंड, लेकिन उस दीपक को बनाने में कितना समय लग जाता है! " (३: १२१-१२२) 
" लोग विश्व बंधुत्व और साम्यवाद य़ा (हिन्दुवाद ) के अनुसन्धान में सारी पृथ्वी पर घूमते फिरते हैं|किन्तु जो लोग यथार्थ (महामण्डल ) कर्मी हैं और अपने ह्रदय से विश्वबंधुत्व का अनुभव करते हैं। वे लम्बी- चौड़ी बातें नहीं करते, न उस निमित्त सम्प्रदायों की रचना करते हैं; किन्तु उनके क्रिया-कलाप, गतिविधि और सारे जीवन के ऊपर ध्यान देने से यह स्पष्ट समझ में आ जायेगा कि उनके ह्रदय सचमुच ही मानव-जाति के प्रति बंधुता से परिपूर्ण है, वे सबसे प्रेम और सहानुभूति करते हैं| वे केवल बातें न बनाकर काम (कैंप-युवा प्रशिक्षण शिविर) कर दिखाते हैं- आदर्श के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं| सारी दुनिया लम्बी-चौड़ी बातों से परिपूर्ण है| हम चाहते हैं कि बातें बनाना कम हो, यथार्थ काम कुछ अधिक हो|" (३:१४४)
" हम सभी लोग मनुष्य तो अवश्य हैं, किन्तु क्या सभी समान हैं? निश्चय ही नहीं | कौन कहता है, हम सब समान हैं? केवल पागल | क्या हम बल, बुद्धि शरीर में समान हैं? ... बहुत्व में एकत्व का होना सृष्टि का विधान है|..पुरुष होने से तुम स्त्री से भिन्न हो, किन्तु मनुष्य होने के नाते स्त्री और पुरुष एक ही हैं|..उस ईश्वर में हम सब एक हैं, किन्तु व्यक्त जगत-प्रपंच में यह भेद अवश्य चिरकाल तक विद्यमान रहेगा| ..क्योंकि विचित्र ही जीवन की मूल भित्ति है| हमें आकारयुक्त किसने बनाया है? वैषम्य ने| सम्पूर्ण साम्यभाव होने से ही हमारा विनाश अवश्यम्भावी है|" (३:१४४-१४५)
" धर्म अनुभूति की वस्तु है - वह मुख की बात, मतवाद अथवा युक्ति मूलक कल्पना मात्र नहीं है- चाहे वह जितना भी सुन्दर हो| आत्मा की ब्रह्मस्वरुपता को जान लेना, तद्रूप हो जाना- उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म है- वह केवल सुनने और मान लेने की चीज नहीं है| समस्त मन-प्राण विश्वास की वस्तु के साथ एक हो जायेगा| यही धर्म है| " (३:१५९)  
" मृत्यु, दुःख तथा इस संसार में मनुष्य को मिलनेवाले अनेक जोरदार- झटके केवल वही मनुष्य पार कर सकता है, जिसने सत्य जान लिया है| सत्य क्या है ? सत्य वह है, जिसमे कोई विकार उत्पन्न नहीं होता, मनुष्य की आत्मा, विश्व की आत्मा ही सत्य है|...जो अनेकता में एकमेवाद्वितीय को समझता है और उसका अपनी आत्मा में दर्शन करता है, केवल वही शाश्वत शान्ति का अधिकारी होता है, दूसरा कोई नहीं , दूसरा कोई नहीं|"  " (३:१६४-६५)
  " तुम जो जो आवश्यक समझते हो, सब रखो, यहाँ तक कि उससे अतिरिक्त वस्तुएं भी रखो- इससे कोई हानी नहीं| पर तुम्हारा प्रथम और प्रधान कर्तव्य है- सत्य को जान लेना, उसको प्रत्यक्ष कर लेना|" (२:१५२)
" सत्य को प्राप्त करने में निमिष मात्र लगता है- प्रश्न केवल जान लेने भर का है| स्वप्न टूट जाता है, उसमे कितनी देर लगती है ? एक सेकण्ड में स्वप्न का तिरोभाव हो जाता है| जब भ्रम का नाश होता है, तो उसमे कितना समय लगता है ? पलक झपकने में जितनी देर लगती है, उतनी| जब मैं सत्य को जानता हूँ, तो इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होता कि - 'असत्य' (नाम-रूप) गायब हो जाता है| मैंने रस्सी को सर्प समझ लिया था और अब जानता हूँ कि वह रस्सी है। प्रश्न केवल आधे सेकण्ड का है। और सब कुछ हो जाता है ! तू वह है! तू वास्तविकता है ; इसे जानने में कितना समय लगता है? ईश्वर जीवन है; ईश्वर सत्य है| फिर भी इस स्वतः प्रत्यक्ष सत्य को प्राप्त करना कितना कठिन जान पड़ता है ? "
( ३:१९०) 
" जब कोई भी मनुष्य यह दावा करता है कि ' मैं सत्य को जानता हूँ|' तो मैं कहता हूँ, ' यदि तुम सत्य को जानते हो, तो तुममें आत्मनियंत्रण होना चाहिये; और यदि तुममे आत्मनियंत्रण है, तो इन (मस्तिष्क में स्थित) इन्द्रियों के नियन्त्रण करने में समर्थ बन कर सिद्ध कर दो!.. जब मैं ध्यान के लिये बैठता हूँ, तो मन में संसार के सब बुरे से बुरे विषय उभर आते हैं|मतली आने लगती है (ऐसा लगता है मानो अपना कान ऐंठ कर अपने चेहरे पार खुद ही थप्पड़ मारूँ)| मन ऐसे विचारों को क्यों सोचता है, जिन्हें मैं नहीं चाहता कि वह सोचे ? मैं मानो मन का दास हूँ|जब तक मन चंचल है और वश से बाहर है, तब तक कोई आध्यात्मिक ज्ञान संभव नहीं है| शिष्य (विद्यार्थी) को मनः संयम सीखना ही होगा| हाँ, मन का कार्य है सोचना ! पर यदि शिष्य जिन विचारों को सोचना नहीं चाहता, तो मन में वैसे विचार आने ही नहीं चाहिये! जब वह आज्ञा दे, तो मन को सोचना भी बन्द कर देना चाहिये|" (३:१९३)
" सत्य यह है : तुम चेतन हो, तुम पार्थिव (matter) नहीं हो| एक वस्तु है भ्रम (अध्यास) - इसमें एक वस्तु दूसरी जान पड़ती है| पदार्थ (शरीर,मन) को चेतन तत्व य़ा शरीर को आत्मा समझ लिया जाता है| यह बहुत बड़ा भ्रम है, इसे नष्ट होना चाहिये|" (३:१९५) 
" इस समय हमारे सामने ये सब विविधताएँ हैं और उन्हें हम देखते हैं- उन्हें हम पंचभूत कहते हैं- पृथ्वी,जल, अग्नि, वायु और आकाश| इसके परे सत्ता की अवस्था मानसिक है, और उसके परे है आध्यात्मिक। यह नहीं है कि आत्मा एक है, मन दूसरा है, आकाश उससे भिन्न है आदि आदि| सत्ता एक ही है, जो इन सभी विविधताओं में दिखाई पड़ती है।... ध्यान वह अभ्यास है जिसमे सब कुछ उस परम सत्य आत्मा में घुला दिया जाता है| पृथ्वी जल में रूपान्तरित होती है, जल वायु में, वायु आकाश में, तब मन और फिर वह मन भी विलीन हो जाता है| सब आत्मा ही है|" (४: १३६-३७)
" वेदान्त का सार है कि सत केवल एक ही है और प्रत्येक आत्मा पूर्णतया वही सत है, उस सत का अंश नहीं| ओस कि हर बून्द में 'सम्पूर्ण' सूर्य प्रतिबिम्बित होता है|...सभी नाम-रूप य़ा आभासों के पीछे एक ही सत्य है|..हमें अपने को इस दुखद स्वप्न से मुक्त करना है कि हम यह देह हैं| हमें यह ' सत्य ' जानना ही चाहिये कि 'मैं वह हूँ'|" (६:२५६-५७) 
" सत्य के लिये संस्कृत शब्द है - सत| सगुण ईश्वर (श्री रामकृष्ण परमहंस )स्वयं अपने लिये उतना ही सत्य है, जितना हम अपने लिये, इससे अधिक नहीं| ईश्वर को भी उसी प्रकार साकार भाव से देखा जा सकता है, जैसे हमें देखा जा सकता है|जब तक हम मनुष्य हैं, तब तक हमें ईश्वर का प्रयोजन है; हम जब स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जायेंगे तब फिर हमें ईश्वर का प्रयोजन नहीं रह जायेगा| इसीलिये श्री रामकृष्ण उस जगत-जननी को अपने समीप सदा सर्वदा वर्तमान देखते थे - वे अपने आस-पास की अन्य सभी वस्तुओं की अपेक्षा उन्हें अधिक सत्य रूप में देखते थे; किन्तु समाधी-अवस्था में उन्हें आत्मा के अतिरिक्त और किसी वस्तु का अनुभव नहीं होता था| (७:७०)      
" मेरा उपदेश किसी धर्म का विरोधी नहीं है| मैं व्यक्ति (को पुनरुज्जीवित करने) की ओर ही विशेष ध्यान देता हूँ, उसे तेजस्वी बनाने की चेष्टा करता हूँ| मैं तो यही शिक्षा देता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति साक्षात् ब्रह्म है, और सबको उनके इसी आन्तरिक ब्रह्म भाव के सम्बन्ध में सचेत होने के लिये आह्वान करता हूँ| जानकर हो य़ा बिना जाने, वस्तुतः यही सब धर्मों आदर्श है| " (४: २२९) 
" संसार के सभी धर्म एक ही सत्य-स्वरूप केन्द्र की विभिन्न त्रिज्याएँ (अभिव्यक्तियाँ) हैं|.. और यह केंद्रीय सत्य क्या है? वह है भीतर का ईश्वर| प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह कितना ही पतित हो, ईश्वर की - दिव्यत्व की अभिव्यक्ति है|दिव्यत्व पर आवरण आ जाता है, वह दृष्टि से छिप जाता है|...चिर मौन रहने के व्रत की साधना करने वाले एक स्वामीजी को एक मुसलमान ने छुरा भोंक दिया| लोग हत्यारे को खींच कर आह्ट के सामने ले गये और बोले, ' स्वामीजी आप कहें, तो हम इसे ठिकाने लगा दें|' 
...अपना व्रत अपने अन्तिम समय में यह कहने के लिये तोड़ा, ' मेरे बच्चो, तुम सब भूल में हो| यह मनुष्य साक्षात् ईश्वर है!' महान शिक्षा यह है कि सबके पीछे वही एक है| " (४: २३३) 
" मैं चाहता हूँ कि सभी व्यक्ति ऐसी दशा में आ जाएँ कि अति जघन्य पुरुष को भी देखकर उसकी बाह्य दुर्बलताओं की ओर वे दृष्टिपात न करें, बल्कि उसके ह्रदय में रहने वाले भगवान को देख सकें|
और उसकी निंदा न कर यह कह सकें- ' हे स्वप्रकाशक, ज्योतिर्मय, उठो! हे सदाशुद्धस्वरूप उठो! हे अज, अविनाशी, सर्वशक्तिमान, उठो ! आत्मस्वरूप प्रकाशित करो। तुम जिन क्षूद्र (पाशव) भावों में आबद्ध (सूकर-योनी) पड़े हो, वे तुम्हें सोहते नहीं।'अद्वैतवाद इसी श्रेष्ठतम प्रार्थना का उपदेश देता है|" (८:६२-६३)
" हम इन्द्रिय-सुख जैसी तुच्छ वस्तु के शिकार हैं, भले ही उससे हमारा सर्वनाश ही क्यों न हो| हमने यह भुला दिया है कि जीवन में और अधिक महान वस्तुएं हैं|...ईश्वर ने एक बार धरती पर वराह-अवतार लिया; उनकी एक शूकरी भी थी। कालान्तर में उनके कई शूकर संतानें हुईं|अपने परिवारवालों के बीच वे बड़े चैन से रह रहे थे। कीचड़ में लोटते हुए वे खूब मस्त थे। वे अपनी दिव्य महिमा एवं प्रभुता भूल बैठे थे। देवता लोग उनकी इस दुर्दशा को देख कर बड़े चिंतित हुए|
वे धरती पर उतर आये और उनसे शूकर-शरीर का त्याग कर देवलोक लौट चलने की विनती करने लगे| ईश्वर ने उनकी एक न सुनी और उन सब को दुत्कार दिया| वे बोले ' मैं इसी योनी में बड़ा प्रसन्न हूँ और इस रंग में भंग देखना नहीं चाहता।'कोई चारा न देख देवताओं ने प्रभु का शूकर-शरीर नष्ट कर दिया। तत्क्षण ईश्वर की दिव्य भव्यता लौट आई और वे बड़े विस्मित थे कि शूकर-स्थिति में वे प्रसन्न रहे कैसे! मानवीय आचरण भी इसी प्रकार का है|
जब कभी वे लोग निर्गुण ईश्वर (Super -Consciousness ) की चर्चा सुनते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया होती है कि ' मेरे व्यक्तित्व का क्या होगा? मेरा तो व्यक्तित्व ही लुप्त हो जायेगा ? ' फिर कभी ऐसा विचार मन में उठे तो उस शूकर की दशा याद कर लेना|" (९:८२) 


" जिस दिन श्री रामकृष्ण देव ने जन्म लिया है, उसी दिन से Modern India  तथा सत्ययुग का आविर्भाव हुआ है| तुम लोग सत्ययुग का उद्घाटन करो और इसी विश्वास के साथ कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण हो| यदि श्री रामकृष्ण देव सत्य हैं, तो तुम भी सत्य हो| किन्तु तुमको यह प्रमाणित कर दिखाना होगा| " (४:३०९) " सत्यमेव जयते नानृतम - ' सत्य की ही जाय होती है, असत्य की नहीं;' तदा किं विवादें- ' तब विवाद से क्या लाभ ? '(४:३१८)                      
" एक समय ऐसा अवश्य आयेगा, जब हममे से प्रत्येक अतीत की ओर नजर डालेगा और अपने पुराने कुसंस्कारों पर हँसेगा, जो शुद्ध और नित्य आत्मा को ढके हुए थे, एवं प्रेम-मुदित मन से सत्यता में स्थित रहकर दृढ़ता के साथ बारम्बार कहेगा- मैं वही हूँ, चिरकाल वही था, और सदैव वही 'T ' रहूँगा! ...कारण, यही सत्य है और जो सत्य है, वह सनातन है, तथा सत्य ही यह शिक्षा देता है कि वह किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं है|
...इसके विरुद्ध जो तर्क दिया जाता है, वह यह कि- " मैं नित्य शुद्ध बुद्ध आनन्दस्वरूप हूँ ", इस प्रकार से मौखिक कहना तो ठीक है पर जीवन नदी के हर मोड़ (परिस्थिति) पर तो मैं इसे अपने आचरण के द्वारा दिखा नहीं पाता|" हम इस बात को स्वीकार करते हैं, आदर्श सदैव अत्यन्त कठिन होता है|प्रत्येक बालक आकाश को अपने सिर से बहुत ऊँचाई पर देखता है, पर इस कारण क्या हम आकाश कि ओर देखने की चेष्टा भी न करें? और क्या पुनः पुराने (पाशविक) संस्कारों की ओर जाने से ही क्या कुछ अच्छा हो जायेगा ? यदि हम अमृत न पा सकें, तो क्या विषपान करने से ही कल्याण होगा ? " (२: १८७-८८)
" जो मनुष्य यह जान लेता है कि ' मैं वही हूँ ', वह चिथड़ों में लिपटे रहने पर भी सुखी रहता है| उस शाश्वत तत्व में प्रवेश करो और शाश्वत शक्ति के साथ वापस आ जाओ| (मन का) दास सत्य का अन्वेषण करने जाता है और स्वतन्त्र होकर (मन का प्रभु होकर) लौटता है|" (२:२५३) 
" बालक शुक का अपने मन पर ऐसा संयम था कि बिना उनकी इच्छा के संसार की कोई वस्तु उन्हें आकृष्ट नहीं कर सकती थी| ...यदि हम भी अपने मन को प्रशिक्षित करना चाहते हैं, तो ...यह निश्चित है कि हमें अन्त में पूर्ण आत्मत्याग का लाभ होगा ही| और ज्यों ही इस कल्पित अहं का नाश हो जायेगा, त्यों ही वही संसार, जो हमे पहले अमंगल से भरा प्रतीत होता है, अब स्वर्ग स्वरूप और परमानन्द से पूर्ण प्रतीत होने लगेगा| यहाँ की हवा तक बदलकर मधुमय हो जाएगी और प्रत्येक व्यक्ति भला प्रतीत होने लगेगा| " ( ३: ६६) 
           
                             
आगे कहते है- " मनुष्य चाहता है सत्य, वह सत्य का स्वयं अनुभव करना चाहता है; और जब वह सत्य कि धारणा कर लेता है, सत्य का साक्षात्कार कर लेता है, ह्रदय के अन्तरतम प्रदेश में उसका अनुभव कर लेता है, वेद कहते हैंतभी उसके सारे सन्देह दूर होते हैं, सारा तमोजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है, और सारी वक्रता सीधी हो जाती है|"  (१:३८) 
स्वामीजी कहते हैं - " हम जो दुःख भोगते हैं, वह अज्ञान से, सत्य और असत्य के अविवेक से उत्पन्न होता है|...एकमात्र आत्मा ही सत्य है, पर हम यह भूल गये हैं| शरीर एक मिथ्या स्वप्न मात्र है, पर हम सोचते हैं कि हम शरीर हैं| यह अविवेक ही दुःख का कारण है| " (१:२०१)
" जब कोई प्रथम बार मृगतृष्णा को देखता है, तो वह उसे सत्य मानने कि भूल करता है,और उसमे (नाम-रूप में) अपनी प्यास बुझाने का निष्फल प्रयास करता है, पर बाद में (तृष्णा और बढ़ जाती है ) वह समझ पाता है कि वह मृगतृष्णा थी| किन्तु जब कभी उसके बाद भविष्य में वह उसे देखता है, तो स्पष्ट वास्तविकता होते हुए भी यह विचार सदैव उसके सामने आता है कि वह मृगतृष्णा देख रहा है| एक जीवन्मुक्त के लिये यही हाल माया के संसार का है |" (१:२८७)
" मेरे बच्चों को सबसे पहले वीर बनना चाहिये, किसी भी कारण से (लालच वश) तनिक भी समझौता न करो|(अपने को शरीर मन इन्द्रियों का गुलाम मत समझो) सर्वोच्च सत्य - " मैं वह हूँ ! " की मुक्त रूप से घोषणा कर दो|..यदि तुम लालच य़ा प्रलोभनों को ठुकरा कर सत्य के सेवक बनोगे, तो तुममे ऐसी दैवी-शक्ति आ जाएगी, जिसके सामने लोग तुम से उन बातों को कहते डरेंगे, जिन्हें तुम सत्य नहीं समझते |" (१:३२७       
(चैतन्यात सर्वम उत्पन्नम!) वही एक ' वस्तु ' हर किसी में अनुस्यूत है!'पूरा स पक्षीभूत्वा प्राविशत!' पुराकाल में (अर्थात सृष्टि के पहले) वही ब्रह्म वस्तु सभी कुछ के भीतर किसी पक्षी के रूप से प्रविष्ट थे| यहाँ प्रविष्ट होने का अर्थ लौकिक रूप में जैसे बाहर से भीतर प्रविष्ट हुआ जाता है, वैसा नहीं है | बल्कि सब कुछ उसी से निर्मित हुआ है ! वह वस्तु ही एकमात्र वस्तु है ! किन्तु उस वस्तु को इन्द्रियों से नहीं अनुभूति के द्वारा जाना जाना जाता है; और आजका विज्ञान भी ठीक यही बात कहता है| केवल आज कह रहा है सो नहीं, बहुत दिनों से विज्ञान ऐसा ही कहता चला आ रहा है! एक ही वस्तु से सब कुछ अस्तित्व में आया है| जैसा Big Bang में कहा गया है- महाकाश में एक बहुत बड़ा Explosion  (विस्फोट) हुआ था, एक समय में बहुत बड़ी घटना घटी जिसके फलस्वरूप इस विश्व-ब्रह्माण्ड कि सृष्टि हुई !
।।इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद् विप्रा बहुधा वदंत्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु: ।।
- ऋग्वेद (1-164-43)
भावार्थ : जिसे लोग इन्द्र, मित्र, वरुण आदि कहते हैं, वह सत्ता केवल एक ही है; ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।
 उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म [ब्रह्मा नहीं] ही परम तत्व है। ब्रह्म ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है और विश्व का आधार है। इसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और नष्ट होने पर विश्व उसी में विलीन हो जाता है।
 श्लाकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ:।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।।
अर्थात् जो अनेक ग्रंथों में लिखा है, उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं। ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्म ही है, कोई अन्य नहीं। सत्य का अर्थ है- जिसका तीनों कालों में बाध नहीं होता अर्थात् जो था, जो है और जो रहेगा। इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म-सापेक्ष है।जो था, जो है और जो सदैव रहेगा- वही तो ब्रह्म है। 'जगत मिथ्या '-यहां मिथ्या शब्द असत् से भिन्न है। मिथ्या शब्द यहां प्रतीति होनेवाली वस्तु सत्य सी लगती है जबकि वह प्रतीति क्षण में नहीं। यही मिथ्यात्व है। इसमें संस्कारों तथा उसके परिणाम स्वरूप स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संसार के अस्तित्व को स्वीकार करने पर ही जीव है। संसार की संसार के रूप में प्रतीति के नष्ट होते ही ‘जीव’ का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जागने पर स्वप्नकाल के द्रष्टा और दृश्य का को लोप हो जाता है। इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म-सापेक्ष है। ब्रह्म को जगत् के होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता। जिस प्रकार आभूषण के न रहने पर भी स्वर्ण की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है, उसी प्रकार सृष्टि से पूर्व भी सत्य था। दूसरे शब्दों में, ब्रह्म का अस्तित्व सदैव रहता है।श्रुति का वचन है-'सदेव सोम्येदग्रमासीत्' अर्थात् हे सौम्य ! सृष्टि से पूर्व सत्य ही था।
भौतिक विज्ञानी आइंसटीन के नियम के अनुसार इसे पूरे ब्रह्मांड में द्रव्य या ऊर्जा है। यह दोनों भी आपस में परिवर्तनशील हैं अर्थात् जो द्रव्य या ठोस पदार्थ हमें दिखते हैं; वे भी ऊर्जा से निर्मित हैं और सभी ठोस पदार्थ अंतत: ऊर्जा में ही परिवर्तित हो जाते हैं। अत: इस पूरे ब्राह्मंड में ऊर्जा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। अध्यात्म विज्ञान में यही ऊर्जा ब्रह्म है।

खगोल विज्ञानियों के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति पूर्ण ऊर्जा एवं धूल के कणों में महाविस्फोट से हुई है। कालांतर में इसी से आकाशगंगाएं, नक्षत्र, तारे एवं ग्रह आदि बने। सूर्य के विखंडन से संपूर्ण सौरमंडल अस्तित्व में आया। अध्यात्म विज्ञानी इस सृष्टि की उत्पत्ति नाद से मानते हैं जबकि खगोल विज्ञानी विस्फोटक से मानते हैं अर्थात् सभी ग्रहों या पृथ्वी पर जो कुछ भी जड़-चेतन तत्त्व है; वह सूर्य या ब्रह्मांड के मूल तत्त्व से ही बना है। परन्तु नाम-रूप में भिन्नता होने पर भी मूल तत्त्व एक ही है और वह ब्रह्म है। दर्शन शास्त्रों में ब्रह्म के संदर्भ में 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति' कहा गया है। 
सत्य क्या है ? असत्य क्या है ? सत्य वह है जिसमें कभी कोई परिवर्तन न हो जैसा पहले था वैसा अब भी है और आगे भी वैसा हे रहेगा | असत्य वह है जो बनता बिगड़ता है | संत महात्माओं ने जगत नाशवान कहा है, मनुष्य का शरीर नाशवान है, शरीर के सम्बन्धी भी नाशवान है, सम्बंधित पदार्थ भी नाशवान हैं | जो कुछ हम इन आखों से देखतें हैं, कानों से सुनतें हैं और इन्द्रियों के द्वारा जो कुछ भी हम अनुभव करतें हैं, मन की पहुँच जहाँ तक है वह सब मिथ्या है अर्थात नाशवान है |

गो गोचर जहं लगि मन जाई |
सो सब माया जनेउ भाई ||

केवल राम नाम सत्य है, बाकी सब मिथ्या है | राम नाम सत्य है ऐसा कहा गया है इसमें गूढ़ रहस्य है नाम दो प्रकार का होता है |
१. वर्णात्मक नाम
२. ध्वन्यात्मक नाम
वर्णात्मक नाम वह है जो वाणी द्वारा बोला जा सके और लिखने पढने में आये,

" लिखन और पढ़न में आया, उसे वर्णात्मक गाया "
वर्णात्मक नाम जैसे - राम, कृष्ण, अल्ला, खुदा, गोद, गोविन्द, गोपाल आदि | अब यह सोचना चाहिए की जब कोई भाषा नहीं थी, कोई वर्णमाला नहीं थी, कागज, स्याही नहीं थी, कोई मनुष्य नहीं था, चौरासी लाख योनियाँ नहीं थी, कोई देवी-देवता नहीं थे, ब्रहमा, विष्णु, महेश नहीं थे, कोई अवतार नहीं था, कोई पैगम्बर नहीं थे, कोई तीर्थकर नहीं थे, स्वर्ग, नर्क, पाताल नहीं था, तीन लोक चौदह भुवन नहीं थे | तब परमात्मा का क्या स्वरुप था ? रचना की उत्पत्ति कैसे हुई ? यह सब हाल घट के अन्दर देखने और समझने के लिए सत्य मार्ग की आवशयकता है, अभी तक वर्णात्मक नाम के बारे में जो थोड़ा बताया गया है इससे परे ध्वन्यात्मक नाम है | जो परम प्रकाश रूप है यह वाणी द्वारा नहीं बोला जा सकता, और न लिखने पढ़ने में आ सकता है |
यह नाम मनुष्य शरीर के घट के अन्दर है | संत महात्माओं ने इसी परम प्रकाश रूप ध्वन्यात्मक नाम की महिमा गाई है लोगों ने इसे वर्णात्मक तक ही सीमित रखा |
 


श्री गुरु पद नख मनि गन जोती |
सुमिरत दिव्य दुष्टि हियँ होती ||


पहले गुरु चरण घट में प्रगट हों उनके नखों के प्रकाश से दिव्य दुष्टि प्राप्त होगी जिससे राम नाम रुपी हीरा घट के अन्दर दिखाई देगा, जो परम प्रकाश रूप है | नाम की महिमा तीनों लोकों में कोई नहीं जानता, केवल संत नाम की महिमा जानते हैं |

यह नाम विदेह है भाषा रहित है मन इन्द्रियों से परे है इसे सार नाम या सार शब्द भी कहतें हैं कुल रचना की उत्पत्ति इसी से हुई है | मिलौनी की रचना जड़ और चेतन तथा निर्मल चैतन्य रचना सब नाम से ही हुई है |
" शब्द ने रची त्रिलोकी सारी, शब्द से माया फैली भारी "
यह नाम सगुण और निर्गुण दोनों से बड़ा है गोस्वामी जी ने कहा है |
अगुन सगुन दुई ब्रह्म सरूपा |
अकथ अगाध अनादि अनूपा ||



यह नाम ध्वन्यात्मक है और रूप उसका परम प्रकाश रूप है यह चेतन का आदि भण्डार है | कुल रचना की उत्पत्ति इसी से हुई | संतों ने इसी नाम की महिमा गाई है | जिनको घट का भेद नहीं मिला, क्योंकि उनको पूरे गुरु नहीं मिले इसी लिए वर्णात्मक तक ही सीमित रह गये और नाम का परिचय नहि मिला | आप लोग यदि सत्य मार्ग के बारे में जानना चाहतें हैं | सच्चे परमार्थी जीव हैं तो सभी प्रकार की टेक छोड़कर  संत सतगुरु वक़्त की शरण लें | सभी मनुष्यों के अन्तर का सत्य मार्ग एक हे है इसीलिए सभी से आपस में प्रेम व सदभाव रखना चाहिये |
  
" जांति पातिं पूछे नहि कोई,
हरी का भजै सो हरि का होई "