Saturday, July 17, 2010

[36] " भारतीय नृत्य की एक कुसुमावली "

" An Anthology of Indian Dance"
संगीत का थोड़ा श्रवण, इसे सीखने का प्रयास, एवं इसका अभ्यास थोड़ा-बहुत हमसे भी हुआ है. गाने भी यथेष्ट सुने गये हैं. इसके साथ साथ, संगीत वाद्ययंत्र बजाने एवं गायन के क्षेत्र में जो लोग भारत विख्यात संगीत विशारद माने जाते हैं, उन बड़े बड़े संगीतज्ञों का- गायन और वादन भी कमों-बेश सुना गया है. 
घटनाक्रम वश ' नृत्य ' के विषय में भी कुछ चिन्तन-मनन करने का सूयोग प्राप्त हुआ है. अकस्मात एक बार किसी कारण-वश मेरे ऊपर यह दायित्व सौंप दिया गया कि, आपको नृत्य के विषय में एक पुस्तक के आकार का वृहत-प्रबन्ध जैसा कुछ लिखना पड़ेगा. 
किसी ' नृत्यकला शिक्षण संस्थान ' के एक विशिष्ट नृत्य-शिक्षक के संवर्धना के उपलक्ष्य में नृत्य  के ऊपर एक अनुष्ठान होने वाला था; उसी अवसर पर उस पुस्तकाकार निबन्ध का विमोचन होना भी तय  था. दायित्व ऐसे किसी व्यक्ति के माध्यम से आया, जिसे टाला भी नहीं जा सकता था. उस समय कलकाता के इनसब विषय में जानकर परिचित लोगों, यथा- रविन्द्रभारती विश्वविद्यालय के उपाचार्य, ' य़ू.सि.गांगुली ' जिनकी गणना संगीत-नृत्य के क्षेत्र में एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में होती थी, उन्ही के समान अनेकों लोगों के पास जा-जाकर, एवं ' यन्त्र-संगीत ' तथा  ' कन्ठ संगीत ' के विषय में अनेका-नेक पुस्तकों को संग्रहित कर के मुझे नृत्य के ऊपर भी  
' भारतीय नृत्य की एक कुसुमावली य़ा संकलन '
नामक एक स्मारक ग्रन्थ को प्रकाशित करना पड़ा था. स्वाभाविक रूप से उसकी भूमिका लिखने का दायित्व भी पड़ा था. इसीलिये ' भारतीय नृत्य विद्या ' के सम्बन्ध में कुछ पुस्तकों को संग्रहित कर उनका गहराई से अध्यन करके इसकी भूमिका को भी एक 'शोध-पत्र ' के जैसा लिखना पड़ा था. अनेक दृष्टिकोण से इस विद्या को देखने के कारण वह भूमिका थोड़ी  वृहत हो गयी थी.उस समय स्वामी प्रज्ञानन्द महाराज के पास तो मैं अक्सर जाया करता था.बातों बातों में किसी ' शोध-पत्र ' के सदृश्य इस ' भारतीय नृत्य विद्या ' पर लिखी भूमिका के विषय में भी चर्चा हुई |
उन्होंने कहा कि, ' तुम जरा मुझे एक बार सुनाओ तो कि तुमने उस शोध-पत्र में क्या चीज लिखा है|' तब मैंने कहा कि, ' महाराज, वह तो कम्पोज हो गया है, लालचाँद प्रेस में छपने के लिये दे दिया हूँ|' वे बोले, ' तुम उसे ले आओ, प्रेस में जितना कम्पोज हुआ है, उस प्रूफ को ही ले कर आ जाओ|' लालचाँद प्रेस कलकाता का एक विख्यात छापाखाना है, कलकाता के बहुत अच्छे प्रिंटर्स में उनकी गिनती होती है, उनलोगों के पास ही इस स्मारक-ग्रन्थ को छापने के लिये दिया गया था.प्रूफ वहाँ से मांग कर ले आया.कितने पृष्ठ थे अभी ठीक से याद नहीं, किन्तु सात-आठ पन्ने तो होंगे ही. 
देर शाम में प्रूफ लेकर प्रज्ञा महाराज के पास पहुँचा. निचले तल्ले पर अपने कमरे में टेबल के सामने जिस प्रकार से बैठा करते थे, उसी प्रकार बैठे हुए थे. मैं उनके सामने वाले चेयर पर बैठ कर, जैसे ही उसे खोलना प्रारम्भ किया कि, उन्होंने कहा-" मैं नहीं पढूंगा, तुम उसे पढ़ कर मुझे सुनाओ, मैं केवल सुनूंगा |" मैंने इधर पढना प्रारम्भ किया, उधर उन्होंने अपनी आँखों को बन्द कर लिया. पूरा निबन्ध पढ़ कर उनको सुना दिया. तब धीरे धीरे अपनी आँखों को खोल कर वे बोले- " नवनी, तूमि लिखेछो बलछो बले आमि विश्वास करछी. एटो अन्य केऊ गानेर, नाचेर आर्टेर जगतेर लोक यदि एने,पड़े शुनिये बलतो- ' एटा आमि लिखेछी '- आमि विश्वास करतूम ना|..."
अर्थात ' नवनी, यह तूम कह रहे हो कि इसे मैंने लिखा है, इसीलिये मैं विश्वास कर लेता हूँ| किन्तु तुम्हारी जगह पर, नृत्य-संगीत आर्ट से जुड़ा कोई भी अन्य व्यक्ति यदि इसे लाकर सुनाता और कहता - ' यह मैंने लिखा है ' - तो मैं कदापि विश्वास नहीं करता| तुम्हारे इस शोध-पत्र में जितना सारगर्भित material है, यदि किसी इस प्रकार के क्षेत्र से जुड़े किसी नामी व्यक्ति को भी लिखने के लिये कहो, तो वह भी ऐसा नहीं लिख पायेगा| इस निबन्ध को अब उस स्मारक-ग्रन्थ में छापने के लिये नहीं भेजना है| तुमने तो इस निबन्ध को preface के रूप में लिखा हैं न? " 
मैंने कहा- ' हाँ ' उन्होंने कहा- " एर तो एकटा नाम देउया दरकार|एटा preface हबे ना, तूमि एटा देबे ना | "(अर्थात यह शोध-पत्र तो अपने-आप में ही इतना पूर्ण है कि)" इसको तो एक शीर्षक देने की आवश्यकता है|यह अब भूमिका के रूप में नहीं छपेगा, तूम इसको उस प्रेस में मत देना |" मैंने कहा - " महाराज, फिर इस निबन्ध का होगा क्या ? इसको तो प्रेस में कम्पोज भी करवा चुका हूँ|" 
वे बोले- " तूम, एक-दो पन्नों की एक छोटी सी भूमिका लिख करवहाँ भेज दो, और इसे मुझे दे दो|इसको तो मैं स्वामी अभेदानन्द महाराज के शतवार्षिकी स्मारक ग्रन्थ- जो अंग्रेजी में निकलने वाला हैं, उसमे छपवा दूंगा|
 एवं इसका नाम होगा, ' The Philosophy of Indian Dance ' (अर्थात ' भारतीय नृत्य विद्या का दार्शनिक-पक्ष' )|एवं मैं यह तुमसे कहता हूँ, दक्षिण भारत के, नृत्य-कला के विषय में एक विश्व-विख्यात नृत्यांगना हैं- ' रुक्मिणी देवी अरूंडेल ', वे भी ऐसा नहीं लिख सकती हैं ! "


http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/1/1c/Rukmini_Devi.jpg 
Rukmini Devi Arundale
29 February 1904-24 February 1986 (aged 81)
Padma Bhushan: 1956-Sangeet Natak Akademi Fellowship: 1967
मैंने वह निबन्ध महाराज को दे दिया|तब अलग से (भूमिका के लिये ) दो पृष्ठ लिख कर वह स्मारक-ग्रन्थ प्रकशित हुआ| उसके बाद नौकरी के सिलसिले में मुझे पुनः कुछ वर्षों के लिये कलकाता के बाहर जाकर प्रवास करना पड़ा था.जब कुछ अधिक दिनों के बीत जाने के बाद जब वापस लौटा, तो ज्ञात हुआ कि,  अभेदानन्द महाराज का शतवार्षिकी स्मारक ग्रन्थ तो प्रकाशित भी हो चुका है| तब मैं थोड़े संकोच के साथ महाराज से पूछा- " महाराज, मेरे उस निबन्ध का क्या हुआ ?  
" वे बोले- " ओह, मैं तो एकदम से भूल ही गया नवनी! क्या होगा!
जो हो, अब किया भी क्या जा सकता है बोलो,बिल्कुल ही भूल गया था| उसको तूम ले जाओ |" 
तब से अपने पूरे जीवन-काल में- एकबार सदात्मनान्दजी के कहने पर स्वामीजी के ऊपर जो निबन्ध लिखा था, उसके बाद कोई निबन्ध नहीं लिखा-- लिखने की न तो कभी इच्छा हुई, न कोई आवश्यकता ही हुई|
किन्तु इसके बाद भी तो विविध प्रकार के विषयों पर लिखता ही रहा हूँ मैं| 
संगीत के विषय में जो प्रबन्ध लिखा था, वह विभिन्न जगहों में प्रकाशित हुआ है| स्वामी अभेदानन्द की शतवार्षिकी के ऊपर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखा हूँ.उस समय के प्रसिद्ध ' भारतवर्ष ' जैसी मासिक पत्रिकाओं में -अन्यान्य विषयों पर प्रबन्ध (शोध-पत्र) लिखा हूँ, कविता लिखा हूँ, गाना लिखा हूँ | उनदिनों ' भारतवर्ष ' और ' प्रवासी ' नामक दो विख्यात मासिक पत्रिकाएं हुआ करतीं थीं. ' भारतवर्ष ' में तो मेरी कितनी ही रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं, ' कथासाहित्य ' में प्रकाशित हुई हैं,' उद्बोधन ', ' विश्ववाणी ', ' प्रबुद्ध भारत', ' उज्जीवन ' इत्यादि और भी अन्यान्य पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं|    

{ भारतीय नृत्य

नृत्य भी मानवीय अभिव्यक्तियों का एक रसमय प्रदर्शन है। यह एक सार्वभौम कला है, जिसका जन्म मानव जीवन के साथ हुआ है। बालक जन्म लेते ही रोकर अपने हाथ पैर मार कर अपनी भावाभिव्यक्ति करता है कि वह भूखा है- इन्हीं आंगिक -क्रियाओं से नृत्य की उत्पत्ति हुई है। यह कला देवी-देवताओं- दैत्य दानवों- मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों को अति प्रिय है।
भारतीय पुराणों में यह दुष्ट नाशक एवं ईश्वर प्राप्ति का साधन मानी गई है। अमृत मंथन के पश्चात जब दुष्ट राक्षसों को अमरत्व प्राप्त होने का संकट उत्पन्न हुआ तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने लास्य नृत्य के द्वारा ही तीनों लोकों को राक्षसों से मुक्ति दिलाई थी। 
इसी प्रकार भगवान शंकर ने जब कुटिल बुद्धि दैत्य भस्मासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि वह जिसके उपर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाए- तब उस दुष्ट राक्षस ने स्वयं भगवान को ही भस्म करने के लिये कटिबद्ध हो उनका पीछा किया- एक बार फिर तीनों लोक संकट में पड़ गये थे तब फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने मोहक सौंदर्यपूर्ण नृत्य से उसे अपनी ओर आकृष्ट कर उसका वध किया।
भारतीय संस्कृति एवं धर्म की आरंभ से ही मुख्यत- नृत्यकला से जुड़े रहे हैं। देवेन्द्र इन्द्र का अच्छा नर्तक होना- तथा स्वर्ग में अप्सराओं के अनवरत नृत्य की धारणा से हम भारतीयों के प्राचीन काल से नृत्य से जुड़ाव की ओर ही संकेत करता है।
विश्वामित्र-मेनका का भी उदाहरण ऐसा ही है। स्पष्ट ही है कि हम आरंभ से ही नृत्यकला को धर्म से जोड़ते आए हैं। पत्थर के समान कठोर व दृढ़ प्रतिज्ञ मानव हृदय को भी मोम सदृश पिघलाने की शक्ति इस कला में है। यही इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है। जिसके कारण यह मनोरंजक तो है ही- धर्म- अर्थ- काम- मोक्ष का साधन भी है। स्व परमानंद प्राप्ति का साधन भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कला-धारा पुराणों- श्रुतियों से होती हुई आज तक अपने शास्त्रीय स्वरूप में धरोहर के रूप में हम तक प्रवाहित न होती। 
इस कला को हिन्दु देवी-देवताओं का प्रिय माना गया है।भगवान शंकर तो नटराज कहलाए- उनका पंचकृत्य से संबंधित नृत्य सृष्टि की उत्पत्ति- स्थिति एवं संहार का प्रतीक भी है। भगवान विष्णु के  अवतारों में श्रीकृष्ण नृत्यावतार ही हैं। इसी कारण वे 'नटवर' कृष्ण कहलाये। भारतीय संस्कृति एवं धर्म के इतिहास में कई ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि जिससे सफल कलाओं में नृत्यकला की श्रेष्ठता सर्वमान्य प्रतीत होती है।
भारतीय नृत्य के प्रकार
भारतीय नृत्य उतने ही विविध हैं जितनी हमारी संस्कृति, लेकिन इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है- शास्त्रीय नृत्य तथा लोकनृत्य। हाल ही में बॉलीवुड नृत्य की एक नई शैली लोकप्रिय होती जा रही हैं जो भारतीय सिनेमा पर आधारित है। इसमें भारतीय शास्त्रीय, भारतीय लोक और पाश्चात्य शास्त्रीय तथा पाश्चात्य लोक का समन्वय देखने को मिलता है।
जिस तरह भारत में कोस-कोस पर पानी और वाणी बदलती है वैसे ही नृत्य शैलियाँ भी विविध हैं। प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्य हैं:
  • कथक
  • ओडिसी
  • भारतनाट्यम
  • कुचिपुडि
  • मणिपुरी एवं
  • कथकलि

लोक नृत्यों
में प्रत्येक प्रांत के अनेक स्थानीय नृत्य हैं। जैसे पंजाब में भांगड़ा,उत्तर-प्रदेश का पखाउज, झारखण्ड का छऊ आदि

भारतीय नृत्य का इतिहास 

नृत्य का प्राचीनतम ग्रंथ भरत मुनि का नाट्यशास्त्र है। लेकिन इसके उल्लेख वेदों में भी मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि प्रागैतिहासिक काल में नृत्य की खोज हो चुकी थी। इतिहास की दृष्टि में सबसे पहले उपलब्ध साक्ष्य गुफाओं में प्राप्त आदिमानव के उकेरे चित्रों तथा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाईयों में प्राप्त मूर्तियाँ हैं, जिनके संबंध में पुरातत्वेत्ता नर्तकी होने का दावा करते हैं। ऋगवेद के अनेक श्लोकों में नृत्या शब्द का प्रयोग हुआ है।  

इन्द्र यथा हयस्तितेपरीतं नृतोशग्वः । 

तथा  

नह्यंगं नृतो त्वदन्यं विन्दामि राधसे। 

अर्थात- इन्द्र तुम बहुतों द्वारा आहूत तथा सबको नचाने वाले हो। इससे स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में नृत्यकला का प्रचार-प्रसार सर्वत्र था। इस युग में नृत्य के साथ निम्नलिखित वाद्यों का प्रयोग होता था। 

वीणा वादं पाणिघ्नं तूणब्रह्मं तानृत्यान्दाय तलवम्। 

अर्थात- नृत्य के साथ वीणा वादक और मृदंगवादक और वंशीवादक को संगत करनी चाहिये और ताल बजाने वाले को बैठना चाहिये।

यर्जुवेद में भी नृत्य संबंधी सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। नृत्य को उस युग में व्यायाम के रूप में माना गया था। शरीर को अरोग्य रखने के लिये नृत्यकला का प्रयोग किया जाता था। हरिवंश पुराण में भी नृत्य संबंधी घटनाओं का उल्लेख है। भगवान नेमिनाथ के जन्म के समय के कलापूर्ण नृत्य व गायन के समारोहों का वर्णन इसमें मिलता है। 
श्रीमदभागवत महापुराण, शिव पुराण तथा कूर्म पुराण में भी नृत्य का उल्लेख कई विवरणों में मिला है। रामायण और महाभारत में भी समय-समय पर नृत्य पाया गया है। इस युग में आकर नृत्त- नृत्य- नाट्य तीनों का विकास हो चुका था। भरत के नाट्य शास्त्र के समय तक भारतीय समाज में कई प्रकार की कलाओं का पूर्णरूपेण विकास हो चुका था।
इसके बाद संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों जैसे कालिदास के शाकुंतलम- मेघदूतम- तथा मृच्छकटिकम आदि ग्रंथों में इन नृत्य का विवरण हमारी भारतीय संस्कृति की कलाप्रियता को दर्शाता है। आज भी हमारे समाज में नृत्य- संगीत को उतना ही महत्व दिया जाता है कि हमारे कोई भी समारोह नृत्य के बिना संपूर्ण नहीं होते। भारत के विविध शास्त्रीय नृत्यों की अनवरत शिष्य परंपराएँ हमारी इस सांस्कृतिक विरासत की धारा को लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित करती रहेंगी।
भारतीय डाकटिकटों में नृत्य: कत्थक " भरतनाट्यम "ओडिसी, कुचीपुडी,कथकली, मणिपुरी}


{Essential ideas

Bharatanatyam PerformanceBharatanatyam is the manifestation of the South Indian idea of the celebration of the eternal universe through the celebration of the beauty of the material body. 
In Hindu mythology the whole universe is the dance of the Supreme Dancer, Nataraja, a name for Lord Shiva, the Hindu ascetic yogi and divine purveyor of destruction of evil.
Bharatanatyam is considered to be a fire-dance, being the mystic manifestation in the human body of the metaphysical element of fire, is one of the five major styles that include Odissi(element of water), and Mohiniattam (element of air). The movements of an authentic Bharatanatyam dancer resemble the movements of a dancing flame.
Contemporary Bharatanatyam is practiced as Natya Yoga, a sacred Hindu meditational tradition by a few orthodox schools. A professional danseuse (patra), according to Abhinayadarpanam (one of the two most authoritative texts on Bharatanatyam), must possess the following qualities.

She has to be- young, slender, beautiful, with large eyes, self-confident, witty, pleasing,  well aware of when to dance and when to stop, able to follow the flow of songs and music, and to dance to the time (thalam),with splendid costumes, and of a happy disposition.
The performance concludes with the chanting of a few religious verses as a form of benediction. When a dancer has mastered all the elements of dance, as a coming out performance, he or she generally performs an Arangetram, which everyone in his/her institute attends. After that, he/she is entitled to teach and his/her lessons are finally over.
Bharata Natyam dancerCostume - From the ancient texts and sculptures, one can see that the original costume did not cover most of the dancers' bodies.
The medieval times, with the puritanistic drive, caused the devadasis to wear a special, heavy saree that severely restricted the dance movements. There are several varieties of Bharatanatyam costumes, some of which do not restrict the dancer's movements, while the others do.
The modern costumes are deeply symbolic, as their purpose is to project the dancer's subtle body.
  • Music - The music is in the Carnatic style of south India, "purer" than the classical music of north India (Hindustani music) only in the sense that it was not heavily influenced by traditions, like those of the Persians, from outside of India.
  • Ensemble - Instruments for Bharatanatyam include, the mridangam (drum), nagaswaram (long black wood pipe horn made from a black wood), the flute, violin and veena (stringed instrument traditionally associated with Saraswati, the Hindu goddess of the arts and learning).
  • Languages - Tamil (predominant), Sanskrit, Telugu and Kannada are traditionally used in Bharatanatyam.
Local kings often invited temple dancers devadasis to dance in their courts, the ocurrence of which created a new category of dancers and modified the technique and themes of the recitals. 
By that time, devadasis had already gone from being high-status life-long celibate priestesses (brahmacharya) to being lower-status temple servants.
Rukmini Devi Arundale 
   
She had the vision of a poet and looked at the beautiful side of things. It was this sense of beauty that made her life a thing of joy. She tirelessly spread the message of Indian art and heritage within the country and outside. She was not only a famous dancer but also an animal lover and a champion of vegetarianism. 
She was nominated twice to India`s Upper House of Parliament, the Rajya Sabha, where she pushed and got passed the Bill for Prevention of Cruelty to Animals. Morarji Desai suggested her name for the office of President of the Indian Republic. It was she who brought Maria Montessori to India and organized her public talks and set up the first Montessori kindergarten in India.
Rukmini Devi was born at Madurai on February 29, 1904 -during the auspicious Mahamagam festival. Rukmini Devi was one of eight children of her parents. Her father Nilakantha Sastri belonged to an orthodox Brahmin family of Sanskrit scholars. During her childhood, she had fleeting glimpses of Bharatanatyam at the Navaratri festival organized by her father for the Maharaja. In those days, dance was an integral part of temple festivals.

She married George Arundale, a foreigner and a leading member of the Theosophical Society. The marriage helped her to get exposure to foreign audiences and also to widen her mental horizon. Once she went to meet Anna Pavlova, a dancer of fame and recognition. This was a turning point in her life. She expressed to Pavlova, her desire to dance with her, to which she replied, "You don`t have to dance, for if you just walk across the stage, it will be enough. People will come to watch you do that". These words of Anna Pavlova created in her the enthusiasm for dancing.

She learnt Sadir, the art of the devadasis from a hereditary guru and displayed her marvelous achievement under a banyan tree at the International Theosophical Conference. First she renamed Sadir as "Bharata Natyam", the dance of Bharata. 
This struck a deep dual chord, not only does it mean the dance of the sage Bharatha (author of the Natya Shastra,) but also connotes the dance of `Bhaarata` (India), the land of the hero Bharata.
Moreover, it stands for Bhava (emotion), Raga (melody) and Tala (Rhythm), the three components of the dance.





She was the founder of Kalakshetra `The Temple of Arts`. Training in Kalakshetra was perfect. Rukmini Devi was a purist who never compromised on the quality of classical arts. 
There were great masters like Papanasam Sivan and Mysore Vasudeva Acharya as the staff of Kalakshetra. The teaching was in Gurukula style. Most of the classes were in the open, under the shade of the great banyan trees of Adyar. 
It was like the Shantiniketan of Tagore. .Kalakshetra will remain as a living monument to her. Besides Kalakshetra, she found schools in mem-ory of Annie Besant and Arundale.

The great dancer died on February 1986. Rukrnini Devi Arundale was India`s cultural queen and her life reflected a many-sided splendour. 
Posterity will remember her not only as a leading exponent of Indian art but also as a fearless crusader for social change. 
She had charm, vision, deep-rooted moral convictions and remark-able courage. Rukmini Devi left a memorable imprint on our culture and art. 
No other person, in recent history, has contributed so much to Indian art as Rukrnini Devi did, and therein lie her greatness.}

 

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