Monday, July 19, 2010

[35] " ह्रदय की भाषा को कौन सुनता है, कौन याद रखता है ?"

उसके बाद ( ' The Philosophy of Indian Dance 'वाली घटना के बाद) एक बड़े नामचीन चित्रकार हुए हैं ' दीपेन बसू ' एक दिन मुझसे बोले- " नवनी भाई, मैंने श्रीचैतन्य देव के जीवन के ऊपर सिरिज ऑफ़ पिक्चर्स (पेंटिंग्स की एक श्रृंखला) बनाई है, उसमे ठीक ठीक कितने पेंटिंग्स होंगे अभी याद नहीं किन्तु ३०-४० तो होंगे ही| इन तस्वीरों को मैं बहुत दिनों तक परिश्रम करके चित्रित किया है.
' एकाडमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स ' में इसीकी एक एक्सिबिसन (चित्र-प्रदर्शनी) लगने वाली है. इस कार्य में मुझे तुम्हारी भी थोड़ी सहायता चाहिये|" मैंने कहा, ' कैसी सहायता ?'" इसको inaugurate किस से करवाया जाय ? " 
मैंने कहा, " इस बारे में मेरी राय लेना चाहते हैं ! मैं भला आर्ट से सम्बन्धित कितने लोगों को जानता हूँ, अकाडमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स में एक्सिबिसन होगा आर्ट्स के ऊपर, उसका inauguration किसके द्वारा होगा, यह क्या मैं तय कर सकता हूँ ?"  
" तुम्ही तय कर दो भाई, चैतन्य के जीवन के ऊपर मैं कोई आर्टिस्ट य़ा उसी प्रकार के किसी प्रोफ़ेसर य़ा कहीं का वाईस-चांसलर जैसे लोगों को मैं नहीं चाहता, इसीलिये तुमको तय करने कह रहा हूँ. तुम्ही एक व्यक्ति को ठीक करो|"
मैं तो भारी मुश्किल में पड़ गया. तब मैंने कहा कि, " स्वामी रंगनाथानन्दजी के द्वारा कराने से कैसा रहेगा ? " 
" रंगनाथानान्दजी ! वे तैयार होंगे ? 
" मैंने कहा, " यदि रंगनाथानन्दजी  से मैं अनुरोध करूँ, तो आशा करता हूँ वे स्वीकार कर लेंगे|"
" फिर तो इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता है| तुम इसके लिये प्रयास करो|" उसी समय मैं रंगनाथानन्दजी से मिलने गोलपार्क स्थित Institute of Culture जा पहुँचा; वैसे भी मैं वहाँ अक्सर जाया करता था|
मैंने कहा कि, " महाराज, एक इस प्रकार का कार्य है- श्री चैतन्य के जीवन पर आधारित एक सिरिज ऑफ़ पेन्टिंग्स को एक कलाकार ने बनाया है, विख्यात चित्रकार हैं, अकाडमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स में उसका एक्सिबिसन होगा, उसका उदघाटन यदि आप करें तो बहुत अच्छा होगा|" 
उनका स्वाभाव जिस प्रकार का था, उसी तरह उन्होंने कहा- ' What do I know about art ? ' पर मैं तो उनके स्वाभाव को बहुत दिनों से जानता था.

    
Revered Swami Ranganathananda at a Mahamandal camp
Monks & Brahmacharis of the Ramakrishna Order
at the public session of a youth training camp

मैंने कहा कि, " महाराज, आप आर्ट के विषय में कितना जानते हैं, य़ा नहीं जानते हैं उसका परिचय नहीं देना होगा, चूँकि यह श्री चैतन्य की जीवनी है, अतः यदि कृपा करके आप वहाँ आकार उसका उदघाटन कर देंगे, तो उतने से ही सबों को बड़ी प्रसन्नता होगी !इसका उदघाटन अन्य किसी से करवाने की अपेक्षा, आप करेंगे तो,वह कार्यक्रम बहुत सुन्दर होगा|"
" जब इतना कह रहे हो, तो हो जायेगा " कर दिये| 
फिर तो अकाडमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स में भी मेरा आना-जाना प्रारम्भ हो गया. कई बड़े बड़े आर्टिस्टों के साथ मेरा परिचय हुआ. उसके पहले भी कुछ-कुछ था. क्योंकि उस 'Anthology of Indian Dance '  नामक ग्रन्थ में कलकाता के बड़े बड़े आर्टिस्टों ने भारतीय- नृत्य के बहुत से स्केच इत्यादि बनाये थे. जिमरमैन के History of Arts से नटराज के एक चित्र का बहुत बड़ा सा ब्लौक बनवा कर उस स्मारक-ग्रन्थ के मुख-पृष्ठ पर लगा दिया था.Ananda natanam, the cosmic dance of Shiva at Chidambaram

 उसके पहले और किसी ने उस चित्र को नहीं चुना था. अभी तो देखता हूँ कि किसी साधारण से संगीत के पुस्तक पर भी उसी चित्र को छाप देता है. किन्तु बहुत वर्ष पहले उस चित्र को पहली बार उस डांस के पुस्तक के ऊपर ही छापा गया था.
रंगनाथानन्दजी आये, उदघाटन किये, भाषण दिये. उस समय उस भाषण को लिख देने का दायित्व भी मुझे ही मिला था, और मैंने स्वयं उसे रिकॉर्ड भी किया था. उससमय तक आज-काल जैसा कैसेट-रेकॉर्डर नहीं उपलब्ध था, टेप रेकॉर्डर ही था, उससे ही रिकॉर्ड कर लिया. फिर उस पूरे रेकॉर्डिंग को लिख कर उनलोगों को दे दिया. उनलोगों ने उसको अन्य कहीं प्रकाशित किया य़ा और कहीं छपवाया, जो हो उनलोगों को बहुत आनन्द हुआ. 
श्री चैतन्य के जीवन पर आधारित जो एक्सिबिसन हुआ था, उसके ऊपर भी मैंने चार निबन्ध लिखे थे. 'भारतवर्ष', 'कथासाहित्य ', 'विश्ववाणी ' एवं 'उज्जीवन ' में चार चित्रों के साथ वे निबन्ध प्रकाशित हुए थे. 
उनमे से एक पेन्टिंग की एक छोटी सी कॉपी अभी भी मेरे कमरे में लगी है. उसमे दिखाया गया है कि, श्रीचैतन्य जमीन पर किसी बुत के समान (पाँचिल के जैसा) बैठे हुए हैं, उनके निकट किसी वृक्ष की एक टेंढी सी डाली है. और श्रीचैतन्य वहाँ पर बैठे हुए हैं, तीन सूखे हुए पत्ते वहीं पर गिरे हुए हैं.-
पर मैं तो आर्ट के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं हूँ, उसको परिभाषित कैसे करूँ, उसकी व्याख्या क्या होगी? जब मैं 'भारतवर्ष' में छापने के लिये उस पेन्टिंग्स पर निबन्ध लिख रहा था, उस समय याद हो आया कि, वहाँ पर तीन पत्ते क्यों दिये गये हैं? भागवत में कहा गया है- 
वदंति तत्‌ तत्वविदस्तत्वं. यज्‌ ज्ञानमद्वयम्‌
                      ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।: (भाग. 1.2:11)
(भागवत का कथन है कि परमार्थत: एक ही अद्वय ज्ञान है। वही ज्ञानियों के द्वारा 'ब्रह्म', योगियों के द्वारा 'परमात्मा' तथा भगवद्भक्तों के द्वारा 'भगवान्‌' कहा जाता है। भेद है उपासकों की दृष्टि का तथा उपासना के केवल तारतम्य का। एक अभिन्न परम तत्व नाना उपासना की दृष्टि में भिन्न प्रतीत होता है, परंतु वह अभिन्न अद्वयज्ञान रूप शक्तियों की संपत्ति ही भगवान्‌ की भगवत्ता है। यह शक्ति एक न होकर अनेक हैं तथा अचिंतनीय है। अचिंत्यशक्ति का निवास होने के कारण वह 'लीलापुरुषोत्तम' है। इसी के कारण वह एक होते हुए भी अनेक प्रतीत होता है और भासित होने पर भी वह वस्तुत: एक है। इसीलिए वह बहुमूर्तिक होने पर भी एकमूर्तिक है।इसी शक्ति के कारण भगवान्‌ आश्रयशून्य, शरीररहित तया स्वयं अगुण होते हुए भी अपने स्वरूप के द्वारा ही इस सगुण विश्व की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करते हैं, परंतु इन व्यापारों की सत्ता होने पर भी उनमें किसी भी प्रकार का बिकार उत्पन्न नहीं होता.)
भगवान के तीन प्रकार के रूप की चर्चा इसमें की गयी है. श्री चैतन्य चेहरे को नीचे कर के बैठे हैं, और सामने सूखे हुए तीन पत्ते गिरे हुए हैं. अर्थात ब्रह्म, परमात्मा, भगवान इत्यादि, आज हमलोगों के लिये किसी वृक्ष की डाली से टूट कर गिरे सूखे हुए पत्ते के जैसे ही हैं. किन्तु ये तीनों रूप अत्यन्त सजीव महावृक्ष से आये हैं. गीता के भाष्य में शंकराचार्य एक स्थान पर कहते हैं- 
" आजीव्यः सर्वभूतानाम ब्रह्मवृक्षः सनातनः |"
पुराणों में से मैंने कितने ही श्लोकों को लिखा है, किसी भी पुराण में ऐसा नहीं कहा गया है. किन्तु वहाँ पर एक श्लोक में यह भी लिखा है- उसी सनातन ब्रह्मवृक्ष (से सब कुछ निकला है)
दीपेनदा के भाई निताईदा सितार बजाया करते थे.' शिकागो धर्ममहासभा ' की पचहत्तर-वार्षिकी का अनुष्ठान कलकाता में केवल महामण्डल के द्वारा ही आयोजित किया गया था. एवं इसके शतवार्षिकी के अवसर पर श्रद्धानन्द पार्क में कुछ दिनों तक जो कार्यक्रम आयोजित हुआ था, उसने सबों के मन को छू लिया था.
उस दिन प्रचण्ड वर्षा हो रही थी- सामने बैठ कर बात कहने से भी अच्छी तरह से सुन पाना मुश्किल हो रहा था. और उसी के बीच निताईदा जिस तरह से सितार बजा रहे थे, उस ' सितार की  मधुरध्वनी और झंझावात की गूँज ' दोनों की जुगल-बन्दी से जो अदभुत स्वर-व्यंजना उत्पन्न हो रही थी उसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता.
उसी कार्यक्रम के दौरान हुई एक अन्य घटना मैं भूल नहीं पाता हूँ.एक साधारण सा दिखने वाला कोई व्यक्ति आकार पूछते हैं- " जो लोग इस कार्यक्रम के आयोजन-कर्ता हैं,उनमे से किसी व्यक्ति के साथ मैं थोड़ी बातचीत करना चाहता हूँ." वहाँ उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा- " बोलिए, आप मुझ से कह सकते हैं." उन्होंने कहा, " मैं इस पार्क के निकट वाले सिनेमा हॉल में काम करता हूँ. अभी एक व्याख्यान चल रहा था तब मैं भी सभा-कक्ष में एक किनारे बैठ कर सुन रहा था. वक्ता कह रहे थे, किसी जगह में बहुत से लोगों की दुर्गति की बात सुनकर स्वामीजी अधीर होकर कहे थे-
'उनके त्राण कार्य में यदि पैसे का आभाव होगा तो ' बेलुड़ मठ ' बेच दूंगा|'
मैं यहीं तक सुन पाया था कि सिनेमा का बेल बज गया, उसे सुन कर मैं शो शुरू होने के पहले लोगों को उनकी सीट पर बैठाने के लिये मुझे दौड़ जाना पड़ा.अब फिर दुबारा दौड़ कर यह जानने के लिये आया हूँ कि, स्वामीजी ने उस समय कहीं मठ को बेच तो नहीं दिया था?"ऐसे मनुष्य के ह्रदय की भाषा को कौन सुनता है, कौन याद रखता है ?    
                 
Once one great sant had explained that - " Dharma " is like a vast tree, different sampradayas are like its branches, and Adhyatma is its root.

Different Acharyas that take birth from time to time are like the fruits that the tree bears when the right season comes.

Depending upon which direction a branch faces - it takes a different shape, and develops in a different size. But the essence of the tree - the seeds - remain the same and are contained inside the fruits - the Acharyas.

So, as long as we see the tree is flowering and bearing fruits, we can be assured that the tree is healthy and potent.

This thread is to collect sayings, anecdotes, life and deeds of all the great Acharyas of all the various sampradayas of all the hues and shades of Sanatan Dharma.}

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