Sunday, July 11, 2010

[32] " संगीत से श्रेष्ठ अन्य कोई विद्या नहीं है !"

" न विद्या संगीतात परा "
क्रमशः वीरेश्वर दा (बाबू) से संगीत सीखना आरम्भ हुआ, कुछ कुछ अभ्यास चलने लगा. वे थोड़ी-बहुत संगीत कि शिक्षा देने लगे. ज्यादा कुछ नहीं सिखलाते थे, वे कहते - " सारेगामापाधानिसा, सानिधापामागारेसा " - का अभ्यास करो, और खींच-खींच कर करो ( अर्थात सा रे गा.... में से एक-एक स्वर को पकड़ कर-- उसका( आरोह और अवरोह का) अभ्यास करो, जल्दी-जल्दी नहीं). मैं भी सरगम का अभ्यास - उसी प्रकार (एक-एक स्वर को पकड़ पकड़ कर) खींच खींच कर करने लगा. उनका कहना था- " एक साधे सब सधे, सब साधे (--तो) सब जाय ! " 
कुछ समय के बाद संगीत सीखते समय एकदिन, मैंने वीरेश्वर बाबू से पूछा- " प्राचीन भारतीय संगीत परम्परा में जिसको 'मार्ग संगीत' Classical Music कहते हैं,उसके अन्तर्गत शायद बाइस प्रकार की श्रुतियों के प्रयोग करने की बात थी. ये बाइस श्रुतियां क्या गले से बाहर निकाली जा सकतीं हैं?
{भारतीय शास्त्रीय संगीत या मार्ग, भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है । शास्त्रीय संगीत को ही ‘क्लासिकल म्जूजिक’ भी कहते हैं। शास्त्रीय गायन ध्वनि-प्रधान होता है, शब्द-प्रधान नहीं । इसमें महत्व ध्वनि का होता है (उसके चढ़ाव-उतार का, शब्द और अर्थ का नहीं)। इसको जहाँ शास्त्रीय संगीत-ध्वनि विषयक साधना के अभ्यस्त कान ही समझ सकते हैं, अनभ्यस्त कान भी शब्दों का अर्थ जानने मात्र से देशी गानों या लोकगीत का सुख ले सकते हैं। इससे अनेक लोग स्वाभाविक ही ऊब भी जाते हैं पर इसके ऊबने का कारण उस संगीतज्ञ की कमजोरी नहीं, लोगों में जानकारी की कमी है।}
उन्होंने कहा-- " हाँ, वैसा किया जा सकता है |" मैं थोड़ा अवाक् हो गया. कोई व्यक्ति केवल अपने गले से बाईस प्रकार की श्रुति निकाल लेता हो-- ऐसा तो मैंने कभी सुना न था. मेरे अपने मन में यह विचार उठा था इसीलिये उनसे पूछ बैठा था. इस पर मैं बोला- " क्या यह मैं सुन सकता हूँ, किसी दिन मुझे भी सुनाइएगा ? उन्होंने कहा था-- " ठीक है, कभी सुना दूंगा|" 
बात आयी-गयी हो गयी, बहुत दिनों बाद एक दिन उनसे संगीत सीखने हम जितने लोग जाया करते थे, उनमे से कोई भी नहीं पहुँचा| मैं अकेला ही पहुँच सका| उस दिन उन्होंने ही कहा-- " उस दिन आपने २२ श्रुति सुनाने का आग्रह किया था, तो आज उसे सुना देता हूँ ! " और बैठे बैठे सुना दिये थे. 
नीचे का ' सा ' (उदारा) से ऊपर का ' सा ' (तारा)  तक २२ श्रुति को पुनः-पुनः एक के बाद दूसरे का  ऊपर से नीचे उतरना और फिर नीचे से ऊपर चढ़ना, चढ़ना-उतरना, चढना -उतरना इस प्रकार बार बार सुनाये थे. अपने कानों से २२ श्रुतियों का पुनः-पुनः श्रवण करने से, कान उसके सूक्ष्म अन्तर को भी बिकुल स्पष्ट रूप से पकड़ सकते हैं| 
यही जो सूक्ष्म स्वर-स्थान आदि हैं, यदि इनका प्रयोग सही ढंग से नहीं होने पर संगीत का माधुर्य जाता रहता है. इन्ही के विभिन्न प्रयोग के ऊपर ही संगीत की रचना होती है. संगीत का माधुर्य इनके ऊपर ही निर्भर करता है. उपयुक्त स्वर-स्थान न रहने से संगीत कभी भी श्रुति-सुखकर नहीं होता. कान निर्मित हो जाने (अभ्यस्त होने) से, अब कठिनाई हो रही है- सुर-विहीन गाने कर्ण-कटू जान पड़ते हैं | जो हो इसी प्रकार चलता रहा. कहा गया है -
' न विद्या संगीतात परा '
-- संगीत से श्रेष्ठ अन्य कोई विद्या नहीं है !
प्रसंगवश ' ठाकुर ' (परमहंसदेव) एवं ' स्वामीजी ' (स्वामी विवेकानन्द) के संगीत की बातें याद आ रही हैं. ठाकुर का कन्ठ-स्वर अत्यन्त मधुर था, और वे एक असाधारण गायक थे. उनकी सुमधूर गले के विषय में, उनके संगीत के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है. किसी ने लिखा है, " उनके समकालीन जो लोग उनके संगीत को सुने हैं, उन सबों का कहना है कि उनके गले के जैसा मधुर गला और दूसरा कहीं सुना नहीं है ! "
स्वामीजी जिस उस्ताद (संगीत के गुरु) से संगीत सीखे थे, मेदनीपुर जिले के एक गाँव के एक धनी परिवार के कई लोगों ने भी, उनसे ही संगीत सीखा था. एक बार उस घर में जाने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ था. उनके घर में अलग से एक संगीत-कक्ष भी बना हुआ है, जो किसी हाल जितना बड़ा था.उस संगीत कक्ष में लगता है, कम से कम ३०-४० प्रकार के तो वाद्य-यन्त्र (Musical -Instruments) ही रखे हुए थे. उसी जगह पर संगीत का अभ्यास किया जाता था. उनलोगों के जो गुरु थे, स्वामी विवेकानन्द के भी संगीत गुरु वे ही थे.
स्वामीजी कितना सुन्दर गाते थे! उनका कन्ठ-स्वर कितना असाधारण (अनोखा) था. हमलोगों ने तो सुना ही नहीं है, अतः उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. शायद बड़ानगर मठ की बात है, एक दिन रात को लगभग १० बजे सेवक को कहते हैं, " अरे, जरा हारमोनियम देना तो| " और हारमोनियम ले कर वे एक ही संस्कृत श्लोक( गायत्री आह्वान का मन्त्र) को विभिन्न रागों में गाने लगे--
         " आयातु   वरदे   देवी    त्रैक्षरे    ब्रह्मवादिनी |
                गायत्रीच्छ्न्दस्याम माता ब्रह्मयोने  नमोस्तु ते ||  "
(--हे, अपने भक्तों को वर देने वाली देवी ! त्रिभुवन (स्वर्ग-मर्त्य-पाताल लोक) -तीनों लोकों में {ॐ} परमात्मा ही(शाश्वत चैतन्य बिजली शक्ति य़ा प्राण की तरह) समाया हुआ है!यह जितना भी विश्व ब्रह्माण्ड है, परमात्मा की एक जीवित-जाग्रत साकार प्रतिमा है! कण-कण में भगवान समाये हुए हैं| इस सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र देखते हुए--मुझे कुविचारों और कुकर्मों से सदा दूर रहना चाहिये! मेरी बुद्धि को इस प्रकार के ज्ञान से उदभासित कर देने वाली- गायत्री के छन्द में, ' ॐ भू: भुवः स्वः ' रूपिणी देवी !सम्पूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करने वाली ब्रह्म-योनी माते ! तुम्हें मेरा नमस्कार है ! )
इसी श्लोक को बारी बारी से विभिन्न रागों में दुहराए जा रहे थे. बहुत रात बीत जाने तक भी यही क्रम चलता रहा. सभी लोग बेसुध होकर सुन रहे थे. उनको समय का ज्ञान भी न रह गया था.तब ब्रह्मनान्दजी प्रातः ४ बजे स्वामीजी को विराम करवाए. 
शास्त्रीय संगीत के भारत विख्यात ग्वालियर घराना-- के संगीत-गुरु (उस्ताद) रामकृष्ण भंज (अधिकांश लोग उनको बूय़ा नाम से जानते हैं) ने अपनी आत्मकथा (आत्मजीवनी) में लिखा है कि, स्वामी विवेकानन्द ने उनको लगभग १०० ध्रुपद-गाने सिखाये थे. 
जब परिव्राजक के रूप में स्वामीजी उत्तर भारत का भ्रमण कर रहे थे, तब एक भक्त के घर में ठहरे थे. उसी घर के नजदीक एक धनी परिवार के घर में ' महफ़िल ' चल रही थी,(संगीत-सभा को वहाँ महफ़िल कहा जाता है)|वहाँ शास्त्रीय संगीत चल रहा था, जिसे स्वामीजी भी सुन पा रहे थे. कोई व्यक्ति संगीत का अच्छा-जानकर है य़ा नहीं, इस बात को श्रोता के अच्छे-बुरे संगीत को सुनकर उसके चेहरे पर होने वाली प्रतिक्रिया को देख कर भी समझा जा सकता है. 
तो उस घर के लोग भी उनको देखकर यह समझ गये कि, निःसंदेह स्वामीजी संगीत के बहुत अच्छे ज्ञाता हैं. उनलोगों ने सोंचा, कि जो संगीत के इतने अच्छे ज्ञाता हैं, वे निश्चय ही स्वयं भी कुछ गाते होंगे. अतः उनसे अनुरोध किये," स्वामीजी ऐसा प्रतीत होता है कि आप गाना गाते हैं, क्या कोई गाना हमें भी सुनायेंगे ? पर स्वामीजी राजी नहीं हो रहे थे. तब वे लोग जिद करने लगे, " नहीं, स्वामीजी कोई न कोई गाना तो आप को सुनना ही पड़ेगा|" 
स्वामीजी बोले, " आज तो नहीं हो पायेगा; यदि कहो तो कल सुना सकता हूँ." दूसरे दिन उनलोगों को घन्टों तक गा कर सुनाये. कितना अनोखा उनका कन्ठ-स्वर था, जो भी सुनता वह मूग्ध हो जाता था! और ध्रुपद-ताल में उन्होंने " ठाकुर- परमहंसदेव " के लिये जिस आरात्रिक की रचना की है, वह कितना असाधारण है; ठाकुर का प्रणाम-मन्त्र भी कितना अनूठा है!
स्वामीजी ने हावड़ा के जिस भवन में, ठाकुर-परमहंसदेव के लिये " प्रणाम-मन्त्र " की रचना की थी उस भवन में जाने का सौभाग्य मुझे भी मिला है.श्रीरामकृष्ण के एक भक्त-- " नवगोपाल घोष "  ने सुना, कि हावड़ा जिले में " रामकृष्णपुर " नाम से एक नया अँचल बनाया गया है.यह सुनकर कलकाता के पुराने निवास को छोड़,वे वहीं जाकर वास करने लगे.
अमेरिका से स्वदेश वापस लौटने के बाद स्वामीजी उस भवन में गये थे; एवं उस भवन के प्रथम तल्ले पर बने एक कमरे में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की अमेरिका से लायी गयी एक छवि को आसान पर बैठा कर पूजा किये थे. स्वामीजी ने अपने हाथों से ठाकुर-परमहंसदेव की जिस छवि को आसान पर बैठा कर पूजा की थी, वह वहाँ आज भी है. अभी तीसरे तल्ले पर नवनिर्मित- पूजाघर में उस चित्र की नित्य पूजा होती है. 
किन्तु जब स्वामीजी ठाकुर के उस छवि की पूजा किये थे, तब पहले तल्ले पर बने एक कमरे में आसान पर बैठा कर पूजा किये थे. अभी उस भवन के सबसे उपरी तल्ले पर अलग से एक पूजा का कमरा बना कर उस छवि को रखा गया है. उस स्थान पर बैठ कर, उस छवि में ठाकुर " परमहंसदेव " की पूजा करने का सौभाग्य मुझे मिला है. उसी भवन में स्वामीजी ने पूजा के साथ साथ-" ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः || " 
मन्त्र की रचना कर के ठाकुर-परमहंसदेव के चरणों में अपना प्रणाम निवेदित किया था. और ठाकुर परमहंसदेव को केवल अवतार ही नहीं, " अवतारवरिष्ठ " कह कर सम्बोधित किया था !!   
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{संगीत- बोलचाल की भाषा में सिर्फ़ गायन को ही संगीत समझा जाता है मगर संगीत की भाषा में गायन, वादन व नृत्य तीनों के समुह को संगीत कहते हैं। संगीत वो ललित कला है जिसमें स्वर और लय के द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं। कला की श्रेणी में ५ ललित कलायें आती हैं- संगीत, कविता, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला। इन ललित कलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

संगीत पद्धतियाँ- भारतवर्ष में मुख्य दो प्रकार का संगीत प्रचार में है जिन्हें संगीत पद्धति कहते हैं। उत्तरी संगीत पद्धति व दक्षिणी संगीत पद्धति । ये दोनों पद्धतियाँ एक दूसरे से अलग ज़रूर हैं मगर कुछ बातें दोनों में समान रूप से पायी जाती हैं।

ध्वनि- वो कुछ जो हम सुनते हैं वो ध्वनि है मगर संगीत का संबंध केवल उस ध्वनि से है जो मधुर है और कर्णप्रिय है।
ध्वनि की उत्पत्ति कंपन से होती है। संगीत में कंपन (वाइब्रेशन) को आंदोलन कहते हैं। किसी वाद्य के तार को छेड़ने पर तार पहले ऊपर जाकर अपने स्थान पर आता है और फिर नीचे जाकर अपने स्थान पर आता है। इस प्रकार एक आंदोलन पूरा होता है। 
एक सेकंड मॆं तार जितनी बार आंदोलित होता है, उसकी आंदोलन संख्या उतनी मानी जाती है। जब किसी ध्वनि की आंदोलन एक गति में रहती है तो उसे नियमित और जब आंदोलन एक रफ़्तार में नहीं रहती तो उसे अनियमित आंदोलन कहते हैं। इस तरह जब किसी ध्वनि की अंदोलन कुछ देर तक चलती रहती है तो उसे स्थिर आंदोलन और जब वो जल्द ही समाप्त हो जाती है तो उसे अस्थिर आंदोलन कहते हैं।
नाद- संगीत में उपयोग किये जाने वाली मधुर ध्वनि को नाद कहते हैं। अगर ध्वनि को धीरे से उत्पन्न किया जाये तो उसे छोटा नाद और ज़ोर से उत्पन्न किया जाये तो उसे बड़ा नाद कहते हैं।

श्रुति- एक सप्तक (सात स्वरों का समुह) में सा से नि तक असंख्य नाद हो सकते हैं। मगर संगीतज्ञों का मानना है कि इन सभी नादों में से सिर्फ़ २२ ही संगीत में प्रयोग किये जा सकते हैं, जिन्हें ठीक से पहचाना जा सकता है। इन बाइस नादों को श्रुति कहते हैं।

स्वर- २२ श्रुतियों में से मुख्य बारह श्रुतियों को स्वर कहते हैं। इन स्वरों के नाम हैं - सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद) अर्थात सा, रे, ग, म, प ध, नि स्वरों के दो प्रकार हैं- शुद्ध स्वर और विकृत स्वर। 
बारह स्वरों में से सात मुख्य स्वरों को शुद्ध स्वर कहते हैं अर्थात इन स्वरों को एक निश्चित स्थान दिया गया है और वो उस स्थान पर शुद्ध कहलाते हैं। इनमें से ५ स्वर ऐसे हैं जो शुद्ध भी हो सकते हैं और विकृत भी अर्थात शुद्ध स्वर अपने निश्चित स्थान से हट कर थोड़ा सा उतर जायें या चढ़ जायें तो वो विकृत हो जाते हैं। उदाहरणार्थ- अगर शुद्ध ग आठवीं श्रुति पर है और वो सातवीं श्रुति पर आ जाये और वैसे ही गाया बजाया जाये तो उसे विकृत ग कहेंगे। 
जब कोई स्वर अपनी शुद्ध प्रकार से नीचे होता है तो उसे कोमल विकृत और जब अपने निश्चित स्थान से ऊपर हट जाये और गाया जाये तो उसे तीव्र कहते हैं। सा और प अचल स्वर हैं जिनके सिर्फ़ शुद्ध रूप ही हो सकते हैं।
सप्तक- क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समुह को सप्तक कहते हैं। ये सात स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि । जैसे-जैसे हम सा से ऊपर चढ़ते जाते हैं, इन स्वरों की आंदोलन संख्या बढ़ती जाती है। 'प' की अंदोलन संख्या 'सा' से डेढ़ गुनी ज़्यादा होती है।'सा' से 'नि' तक एक सप्तक होता है, 'नि' के बाद दूसरा सप्तक शुरु हो जाता है जो कि 'सा' से ही शुरु होगा मगर इस सप्तक के 'सा' की आंदोलन संख्या पिछले सप्तक के 'सा' से दुगुनी होगी। इस तरह कई सप्तक हो सकते हैं मगर गाने बजाने में तीन सप्तकों का प्रयोग करते हैं।

१) मन्द्र २) मध्य ३) तार । संगीतज्ञ साधारणत: मध्य सप्तक में गाता बजाता है और इस सप्तक के स्वरों का प्रयोग सबसे ज़्यादा करता है। मध्य सप्तक के पहले का सप्तक मंद्र और मध्य सप्तक के बाद आने वाला सप्तक तार सप्तक कहलाता है।


भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आज से लगभग ३००० वर्ष पूर्व रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। ऐसा मानना है कि ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को संगीत वरदान में दिया था। चारों वेदों में, सामवेद के मंत्रों का उच्चारण उस समय के वैदिक सप्तक या समगान के अनुसार सातों स्वरों के प्रयोग के साथ किया जाता था। 
गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार, शिष्य को गुरू से वेदों का ज्ञान मौखिक ही प्राप्त होता था व उन में किसी प्रकार के परिवर्तन की संभावना से मनाही थी। इस तरह प्राचीन समय में वेदों व संगीत का कोई लिखित रूप न होने के कारण उनका मूल स्वरूप लुप्त होता गया।
भरत मुनि द्वारा रचित भरत नाट्यशास्त्र, भारतीय संगीत के इतिहास का प्रथम लिखित प्रमाण माना जाता है। इसकी रचना के समय के बारे में कई मतभेद हैं। आज के भारतीय शास्त्रीय संगीत के कई पहलुओं का उल्लेख इस प्राचीन ग्रंथ में मिलता है। भरत् नाट्य शास्त्र के बाद शारंगदेव रचित संगीत रत्नाकर, ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। बारहवीं सदी के पूर्वाद्ध में लिखे सात अध्यायों वाले इस ग्रंथ में संगीत व नृत्य का विस्तार से वर्णन है।
संगीत रत्नाकर में कई तालों का उल्लेख है व इस ग्रंथ से पता चलता है कि प्राचीन भारतीय पारंपरिक संगीत में अब बदलाव आने शुरू हो चुके थे व संगीत पहले से उदार होने लगा था। १००० वीं सदी के अंत तक, उस समय प्रचलित संगीत के स्वरूप को प्रबंध कहा जाने लगा। प्रबंध दो प्रकार के हुआ करते थे... निबद्ध प्रबंध व अनिबद्ध प्रबंध। निबद्ध प्रबंध को ताल की परिधि में रह कर गाया जाता था जबकि अनिबद्व प्रबंध बिना किसी ताल के बंधन के, मुक्त रूप में गाया जाता था। प्रबंध का एक अच्छा उदाहरण है जयदेव रचित गीत गोविंद।

युग परिवर्तन के साथ संगीत के स्वरूप में भी परिवर्तन आने लगा मगर मूल तत्व एक ही रहे। मुगल शासन काल में भारतीय संगीत फ़ारसी व मुसलिम संस्कृति के प्रभाव से अछूता न रह सका। उत्तर भारत में मुगल राज्य ज़्यादा फैला हुआ था जिस कारण उत्तर भारतीय संगीत पर मुसलिम संस्कृति व इस्लाम का प्रभाव ज़्यादा महसूस किया जा सकता है। जबकि दक्षिण भारत में प्रचलित संगीत किसी प्रकार के बाहरी प्रभाव से अछूता ही रहा। इस तरह भारतीय संगीत का दो भागों में विभाजन हो गया :
१) उत्तर भारतीय संगीत या हिन्दुस्तानी संगीत
२) कर्नाटक शैली।
उत्तर भारतीय संगीत में काफ़ी बदलाव आए। संगीत अब मंदिरों तक सीमित न रह कर शहंशाहों के दरबार की शोभा बन चुका था। इसी समय कुछ नई शैलियॉं भी प्रचलन में आईं जैसे ख़याल, ग़जल आदि और भारतीय संगीत का कई नए वाद्यों से भी परिचय हुआ जैसे सरोद, सितार इत्यादि।
बाद में सूफ़ी आंदोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव जमाया। आगे चलकर देश के विभिन्न हिस्सों में कई नई पद्धतियों व घरानों का जन्म हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कई नए वाद्य प्रचलन में आए। आम जनता में भी प्रसिद्ध आज का वाद्य हारमोनियम, उसी समय प्रचलन में आया। इस तरह भारतीय संगीत के उत्थान व उसमें परिवर्तन लाने में हर युग का अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा।
भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार
भारतीय शास्त्रीय संगीत आधारित है स्वरों व ताल के अनुशासित प्रयोग पर।सात स्वरों व बाईस श्रुतियों के प्रभावशाली प्रयोग से विभिन्न तरह के भाव उत्पन्न करने की चेष्टा की जाती है। सात स्वरों के समुह को सप्तक कहा जाता है। भारतीय संगीत सप्तक के ये सात स्वर इस प्रकार हैं
षडज (सा), ऋषभ(रे), गंधार(ग), मध्यम(म), पंचम(प), धैवत(ध), निषाद(नि)।
सप्तक को मूलत: तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है...मन्द्र सप्तक़, मध्य सप्तक व तार सप्तक।अर्थात सातों स्वरों को तीनों सप्तकों में गाया बजाया जा सकता है।षड्ज व पंचम स्वर अचल स्वर कहलाते हैं क्योंकि इनके स्थान में किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता और इन्हें इनके शुद्ध रूप में ही गाया बजाया जा सकता है जबकि अन्य स्वरों को उनके कोमल व तीव्र रूप में भी गाया जाता है। इन्हीं स्वरों को विभिन्न प्रकार से गूँथ कर रागों की रचना की जाती है।
राग क्या हैं :
राग संगीत की आत्मा हैं, संगीत का मूलाधार। राग शब्द का उल्लेख भरत नाट्य शास्त्र में भी मिलता है। रागों का सृजन बाईस श्रुतियों के विभिन्न प्रकार से प्रयोग कर, विभिन्न रस या भावों को दर्शाने के लिए किया जाता है। 
प्राचीन समय में रागों को पुरूष व स्त्री रागों में अर्थात राग व रागिनियों में विभाजित किया गया था।सिर्फ़  यही नहीं, कई रागों को पुत्र राग का भी दर्जा प्राप्त था। उदाहरणत: राग भैरव को पुरूष राग, और भैरवी, बिलावली सहित कई अन्य रागों को उसकी रागिनियॉं तथा राग ललित, बिलावल आदि रागों को इनके पुत्र रागों का स्थान दिया गया था।बाद में आगे चलकर पं व़िष्णु नारायण भातखंडे ने सभी रागों को दस थाटों में बॉंट दिया। 
अर्थात एक थाट से कई रागों की उत्पत्ति हो सकती थी। अगर थाट को एक पेड़ माना जाए व उससे उपजी रागों को उसकी शाखाओं के रूप में देखा जाए तो गलत न होगा। उदाहरणत: राग शंकरा, राग दुर्गा, राग अल्हैया बिलावल आदि राग थाट बिलावल से उत्पन्न होते हैं।
थाट बिलावल में सभी स्वर शुद्ध माने गए हैं अत: तकनीकी दृष्टि से इस थाट से उपजे सभी रागों में सारे स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाने चाहिए। मगर दस थाटों के इस सिद्धांत के बारे में कई मतांतर हैं क्योंकि कुछ राग किसी भी थाट से मेल नहीं खाते मगर उन्हें नियमरक्षा हेतु किसी न किसी थाट के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है।
किसी भी राग में ज़्यादा से ज़्यादा सात व कम से कम पॉंच स्वरों का प्रयोग करना ज़रूरी है।इस तरह रागों को मूलत: ३ जातियों में विभाजित किया जा सकता है...
१) औडव जाति जहॉं राग विशेष में पॉंच स्वरों का प्रयोग होता हो
२) षाडव जाति जहॉं राग में छ: स्वरों का प्रयोग होता हो
३) संपूर्ण जाति जहॉं राग में सभी सात स्चरों का प्रयोग किया जाता हो।
राग के स्वरूप को आरोह व अवरोह गाकर प्रदर्शित किया जाता है जिसमें राग विशेष में प्रयुक्त होने वाले स्वरों को क्रम में गाया जाता है।
उदाहरण के लिए राग भूपाली का आरोह कुछ इस तरह है:
सा रे ग प ध सां।

किसी भी राग में दो स्वरों को विशेष महत्व दिया जाता है। इन्हें वादी स्वर व संवादी स्वर कहते हैं। वादी स्वर को राग का राजा भी कहा जाता है क्योंकि राग में इस स्वर का बहुतायत से प्रयोग होता है। दूसरा महत्वपूर्ण स्वर है संवादी स्वर जिसका प्रयोग वादी स्वर से कम मगर अन्य स्वरों से अधिक किया जाता है। इस तरह किन्हीं दो रागों में जिनमें एक समान स्वरों का प्रयोग होता हो, वादी और संवादी स्वरों के अलग होने से राग का स्वरूप बदल जाता है। उदाहरणत: राग भूपाली व देशकार में सभी स्वर समान हैं मगर वादी व संवादी स्वर अलग होने के कारण इन रागों में आसानी से फ़र्क बताया जा सकता है। 

 
हर राग में एक विशेष स्वर समुह के बार बार प्रयोग से उस राग की पहचान दर्शायी जाती है। जैसे राग हमीर में 'ग म ध' का बार बार प्रयोग किया जाता है और ये स्वर समूह राग हमीर की पहचान हैं।
मुगल़कालीन शासन के दौरान ही शायद रागों के गाने बजाने का निर्धारित समय कभी प्रचलन में आया। जिन रागों को दोपहर के बारह बजे से मध्यरात्रि तक गाया बजाया जाता था उन्हें पूर्व राग कहा गया और मध्यरात्रि से दोपहर के बीच गाए बजाए जाने वाले रागों को उत्तर राग कहा गया। कुछ राग जिन्हें भोर या संध्याकालीन समय में गाया जाता था उन्हें संधिप्रकाश राग कहा गया। यही नहीं कुछ राग ऋतुप्रधान भी माने गए। जैसे राग मेघमल्हार वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला राग है। इसी तरह राग बसंत को बसंत ऋतु में गाए जाने की प्रथा है।

चैत में गाई जाने वाली चैती
चैत्र के महीने में गाई जाने वाली उप-शास्त्रीय संगीत में एक प्रकार की बंदिश है चैती। इसमें रामा शब्द का प्रयोग बार बार होता है और इसमें कोयल की कूक, विरह, प्रेम, साजन से प्रेम निवेदन, और कई बार राम जी का वर्णन होता है। क्योंकि चैत्र मास में होली आती है, कई बार चैती में होली का वर्णन भी होता है। मन को छूने वाली चैती की जन्मभूमि बनारस मानी जाती है। बिहार में भी चैती गाई जाती है।आज शुभा मुद्गल की आवाज़ में सुनते हैं ये चैती- 
सपना देखीला पलकनवा हो रामा, सैंया के आवनवा
  हमारी संस्कृति का एक स्तंभ भारतीय शास्त्रीय संगीत, जीवन को संवारने और सुरुचिपूर्ण ढंग से जीने की कला है। यह आधार है हर तरह के संगीत का साथ ही ऐसी गरिमामयी धरोहर है जिससे लोक और लोकप्रिय संगीत की अनेक धाराएँ निकलती हैं जो न सिर्फ हमारे तीज त्योहारों में राग रंग भरती हैं बल्कि हमारे विभिन्न संस्कारों और अवसरों में भी उल्लासमय बनाते हुए अनोखी रौनक प्रदान करती हैं। 
साभार संगीत विद्या की ज्ञाता
--मानोशी  

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