Sunday, July 4, 2010

[30] " हाय, टुकड़ों में बँट गये -... हिमालयो नाम नगाधिराजः !"

हमलोगों के समय में स्कूल की पढ़ाई केवल दसवीं कक्षा तक पढने के बाद ही समाप्त हो जाति थी.उस समय दसवीं की परीक्षा भी विश्वविद्यालय द्वारा ली जाती थी.तब केवल कलकाता विश्वविद्यालय ही अस्तित्व में था.  १५ अगस्त  १९४७ में भारतवर्ष स्वाधीन हुआ था और उसी वर्ष मैं दसवीं की परीक्षा में बैठा था; और संयोगवश मेरा जन्मदिन भी १५ अगस्त ही है. उस दिन (१४ अगस्त को स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या के समय)  मन में इच्छा हुई थोड़ा गंगा के किनारे खड़े होकर सूर्य को अस्त हुए देखा जाय. एक लाल बड़े से आग के गोले के रूप में सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा था. उसे देख कर याद आया- 
" वरषी अनल राशि सहस्रकिरण 
पातियाछे विश्रामिते क्लान्त कलेवर 
दूर तरुराजि शिरे स्वर्ण सिंहासन | "
' पहले ऐसा कहा जाता था कि ब्रिटश साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता. सूर्य दिन भर अपनी हजार हजार किरणों से अग्नि की वर्षा करने के बाद सूर्यास्त के समय ऐसा लगता है की अब वह थक कर वह विश्राम करने जा रहा हो,किन्तु दूर पेड़ों के शिखर पर पड़ती हुई सूर्यास्त की लालिमा को देख कर ऐसा लगता है मानो उसने पुनः स्वर्ण-सिंहासन का रूप धारण कर लिया हो. मैंने सूर्य से कहा-
" हे सूर्य, पराधीन भारत में आज तुम अन्तिम बार अस्त हो रहे हो.
कल प्रातःकाल जब तुम पूर्व के आकाश में उदित होओगे,
तब तक भारत स्वाधीन हो चुका होगा ! "  
सूर्य से यह सब कहते हुए मन में कितना आनन्द हो रहा था ! सभी मनुष्य आनन्द से भर कर उन्मत्त हो रहे थे. भारत का राष्ट्रिय-ध्वज चारों ओर छाया हुआ था. और बिजली-बत्ती की क्या अद्भुत रौशनी सजाई गयी थी, मानो आज ही दीपावली मनाई जा रही हो ! 
सड़क पर, घर के अन्दर सर्वत्र सभी मनुष्यों का मन मानो उद्वेलित हो उठा था. सबों के किलकारियों में आनन्द छलक रहा था. रात्रि के ठीक बारह बजे सभी घरों से एक साथ समवेत स्वर में शंख-ध्वनी होने लगी.
किन्तु सुबह होने के पहले से ही मन में कुछ कुछ  . 
 भारत के मानचित्र को देखने से ऐसा महसूस होता था, मानो सचमुच यह जन्म-भूमि ही हमारी साक्षात् जननी है! नीचे की ओर देखने से ऐसा लगता मानो माँ दोनों पैरों को आपस में मिला कर खड़ी हैं. कश्मीर का अँचल मानो माँ का मुखमंडल है. हिमालय का पूरा फैलाव माँ की साड़ी का ही कुंचित भाग है और पूर्व में ब्रह्मदेश (बर्मा) को स्पर्श से करते हुए उसके असंख्य समुद्री द्वीपों के ऊपर उनका ही आँचल लहरा रहा है. मानो जीवन्त भारतमाता का ही दर्शन हो रहा हो. 
कालिदास ने अपने ' कुमारसंभव ' ग्रन्थ के प्रथम श्लोक में भारतवर्ष का सुन्दर चित्रण करते हुए लिखा है:  
अस्त्य् उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोयनिधी विगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥१.१॥
- पूर्व एवं पश्चिम समुद्र को स्पर्श करती हुई देवताओं की निवास भूमि को जो विराट पर्वत मानो पृथ्वी के मानदण्ड के समान समस्त उत्तर दिशा को अपने में समेटे हुए खड़ा है, उसका नाम है- हिमालय !
इसीका हिंदी अनुवाद  -रामधारी सिंह 'दिनकर' ने इस प्रकार किया है- 
  मेरे नगपति! मेरे विशाल!
        साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
     पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल
         मेरी जननी के हिम-किरीट 
             मेरे भारत के दिव्य भाल।"


                                                               
आनन्द मूग्ध रात्रि की खुमारी समाप्त होते ही मन में विचार उठा- क्या भारत सचमुच स्वाधीन हो गया? पर राजनीति के नेताओं में व्याप्त सत्ता-सुख भोगने के लोभ ने देश-माँ को तो खण्ड खण्ड  कर दिया था. क्रमशः तीन देशों में भारत के नक़्शे को बँटा हुआ दिखाया गया - जिसके एक टुकड़े को हमने स्वाधीन भारत का नाम दिया.



{ 1947 में जब ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता मिली तो साथ ही भारत का विभाजन करके 14 अगस्त को पाकिस्तानी डोमिनियन (बाद में इस्लामी जम्हूरिया ए पाकिस्तान) और 15 अगस्त को भारतीय यूनियन (बाद में भारत गणराज्य) की संस्थापना की गई।
इस घटनाक्रम में मुख्यतः ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत को पूर्वी पाकिस्तान और भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बाँट दिया गया और इसी तरह ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत को पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और भारत के पंजाब राज्य में बाँट दिया गया। 
15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत और पाकिस्तान कानूनी तौर पर दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। लेकिन पाकिस्तान की सत्ता परिवर्तन की रस्में 14 अगस्त को कराची में की गईं ताकि आखिरी ब्रिटिश वाइसराय लुइस माउंटबैटन कराची और नई दिल्ली दोनों जगह की रस्मों में हिस्सा ले सके।
इसलिए पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त और भारत में 15 अगस्त को मनाया जाता है। भारत के विभाजन से करोड़ों लोग प्रभावित हुए। विभाजन के दौरान हुई हिंसा में करीब 5 लाख लोग मारे गए, और करीब 1.45 करोड़ शरणार्थियों ने अपना घर-बार छोड़कर बहुमत संप्रदाय वाले देश में शरण ली।हाय, यह इतिहास का कैसा परिहास है! 
आपसी मार-काट ने माँ के शरीर को रक्त-रंजित कर दिया. भाई भाई अलग अलग हो गये. शायद इस प्रकार से भाइयों के बंटवारा हो जाने को ही स्वाधीनता प्राप्त करना कहते हैं. यह सोचने में भी लज्जा आती है कि आज मैं भी उसी टुकड़े में बँटे भारत का एक वृद्ध नागरिक हूँ!
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[विभाजन की प्रक्रिया भारत के विभाजन के ढांचे को 3 जून प्लान या माउंटबैटन प्लान का नाम दिया गया। भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमारेखा लंदन के वकील सर सिरिल रैडक्लिफ ने तय की। हिन्दू बहुमत वाले इलाके भारत में और मुस्लिम बहुमत वाले इलाके पाकिस्तान में शामिल किए गए। 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट (भारतीय स्वतंत्रता कानून) पास किया जिसमें विभाजन की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया। इस समय ब्रिटिश भारत में बहुत से राज्य थे जिनके राजाओं के साथ ब्रिटिश सरकार ने तरह-तरह के समझौते कर रखे थे। इन 565 राज्यों को आज़ादी दी गयी कि वे चुनें कि वे भारत या पाकिस्तान किस में शामिल होना चाहेंगे।अधिकतर राज्यों ने बहुमत धर्म के आधार पर देश चुना। जिन राज्यों के शासकों ने बहुमत धर्म के अनुकूल देश चुना उनके एकीकरण में काफ़ी विवाद हुआ (देखें भारत का राजनैतिक एकीकरण)। विभाजन के बाद पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र में नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया और भारत ने ब्रिटिश भारत की कुर्सी संभाली।

 संपत्ति का बंटवारा

ब्रिटिश भारत की संपत्ति को दोनों देशों के बीच बाँटा गया लेकिन यह प्रक्रिया बहुत लंबी खिंचने लगी। गांधीजी ने भारत सरकार पर दबाव डाला कि वह पाकिस्तान को धन जल्दी भेजे जबकि इस समय तक भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरु हो चुका था,और दबाव बढ़ाने के लिए अनशन शुरु कर दिया। भारत सरकार को इस दबाव के आगे झुकना पड़ा और पाकिस्तान को धन भेजना पड़ा। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी के इस काम को उनकी हत्या करने का एक कारण बताया 

दंगा फ़साद - बहुत से विद्वानों का मत है कि ब्रिटिश सरकार ने विभाजन की प्रक्रिया को ठीक से नहीं संभाला। चूंकि स्वतंत्रता की घोषणा पहले और विभाजन की घोषणा बाद में की गयी, देश में शांति कायम रखने की जिम्मेवारी भारत और पाकिस्तान की नयी सरकारों के सर पर आई।

किसी ने यह नहीं सोचा था कि बहुत से लोग इधर से उधर जाएंगे। लोगों का विचार था कि दोनों देशों में अल्पमत संप्रदाय के लोगों के लिए सुरक्षा का इंतज़ाम किया जाएगा। लेकिन दोनों देशों की नयी सरकारों के पास हिंसा और अपराध से निबटने के लिए आवश्यक इंतज़ाम नहीं था। फलस्वरूप दंगा फ़साद हुआ और बहुत से लोगों की जाने गईं, और बहुत से लोगों को घर छोड़कर भागना पड़ा। अंदाज़ा लगाया जाता है कि इस दौरान लगभग 5 लाख लोग मारे गये, कुछ दंगों में, तो कुछ यात्रा की मुश्किलों से। भारत का विभाजन - मुख्य घटनाएं-सर सैयद अहमद खान, जिसने "मोहम्मडन एंग्लो-ओरियन्टल कॉलेज'' की स्थापना की थी और जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कहलाया, को अंग्रेजी सरकार ने इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह राजनीति को साम्प्रदायिक बनाएं।अंग्रेजों की सरकारी नीति के तहत पंजाब में १२ प्रतिशत सिखों को १५ प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया गया। बिहार और उड़ीसा के १० प्रतिशत मुसलमानों को २५ प्रतिशत आरक्षण दिया गया।१९४० में मोहम्मद अली जिन्ना ने पृथक मुस्लिम राज्य ÷पाकिस्तान' को मुसलमान बाहुल क्षेत्र में बनाने की बात लोगों के सामने रखी। यह सिखों के लिए हैरान करने वाली बात थी।  लेकिन पं. जवाहर लाल नेहरू का एक महत्वकांक्षी चेहरा  भी सामने आ रहा था।
  १९४२ में, अंग्रेजी सरकार ने अलग मुस्लिम राज्य अथवा देश बनाने के लिए सर स्टीफोर्ड क्रिप्स कमीशन की घोषणा की। अंग्रेजों की नियत भारत के विभाजन की थी।१६ अगस्त १९४६ को जिन्ना और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्राप्ति के लिए"डायरेक्ट एक्सन' की घोषणा की। 
चारों तरफ दंगे फसाद कराए गए। भारत भू का रंग रक्त से लाल हो गया था।दिल्ली में नए वायसराय माउन्टबेटन केवल भारत विभाजन की नियत से आया था।पं. नेहरू पंजाब और बंगाल के विभाजन के लिए सहर्ष तैयार हो गए, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री बनने की जल्दी थी।इस प्रकार १९४७ में भारत का विभाजन हो गया। 
मजहब के आधार पर आरक्षण की नीति का अन्त विभाजन से हुआ।ज्वलंत प्रश्न : एडविना-नेहरू प्रेम संबंध से आहत थे माउंटबेटन.इस बात का खुलासा उनकी ही बेटी पामेला ने ÷इंडिया रिमेम्बर्ड : ए पर्सनल एकाउंट ऑपफ द माउंटबेटंस ड्यूरिंग द ट्रांसपफर ऑपफ पावर' में किया है ।क्या १९४७ में भारत का विभाजन मजहब के आधर पर नहीं हुआ था?
क्या विभाजन के अहदनामें पर कांग्रेस के नेता पं. जवाहर लाल नेहरू के हस्ताक्षर नहीं थे? सेक्यूलरवाद की बात करने वाले नेहरू मजहब के आधर पर विभाजन के प्रश्न पर सहमत कैसे हो गए?अंग्रेजों के लिए भारत विभाजन का खेल खेलने वाले वायसराय माउंटबेटन और भारत के नेता पं. नेहरू परस्पर मित्र कैसे बन गये ?}


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