Friday, May 21, 2010

' गोपाल ' के प्रति झुकाव [22]" आज भी अघटन घटित होता है ! "

पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता के कूप्रभाव को देखकर, १०० वर्ष पहले के - ' वर्तमान भारत ' को सावधान करने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानन्द ने ' स्वदेश मंत्र ' देते हुए कहा था - " हे भारत ! यह परानुवाद, परानुकरण, परमुखापेक्षा , इसी दास-सुलभ दुर्बलता, इसी घृणित जघन्य निष्ठूरता के बल पर तुम उच्चाधिकार प्राप्त करोगे ? (य़ा विश्व महासभा में उच्चासन ग्रहण करोगे?)  

स्वामीजी के इस चेतावनी को उस समय किसने सुना ? काश, यदि भारत उनकी इस चेतावनी को सुनकर तभी सावधान हो गया होता !आज का भारतवर्ष ( वर्ष १९८५ में १२ जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित करने के बाद से) थोड़ा- बहुत " विवेकानन्द, विवेकानन्द " करने लगा है| किन्तु किस कारण से उनको याद कर रहा है- यह बात मैं ठीक से समझ नहीं पाता हूँ| जिन सब लोगों य़ा संगठनों के मुख से ' विवेकानन्द, विवेकानन्द ' का नाम उच्चारित हो रहा है, उनका उद्देश्य बहुत स्पष्ट नहीं है| 
एक बार स्वामी विवेकानन्द ने एक पत्र में उलाहना देते हुए लिखा था- " भारतवर्ष के असंख्य मनुष्य मुझे समझ नहीं सके हैं! " स्वामीजी ने जिस पत्र में यह बात लिखी थी, वह बहुत पुरानी चिट्ठी है, याद पड़ता है कि वर्ष १८९४-९५ में किसी समय का पत्र होगा| यह बात आज भी उतनी ही सत्य है, आज भी भारतवर्ष स्वामी विवेकानन्द को समझ नहीं पाया है| फिर भी कुछ लोग क्यों " स्वामीजी, स्वामीजी " कर रहे हैं,यह बात स्पष्ट नही होती !
परन्तु किसी सच्चे देश-प्रेमी संस्था य़ा व्यक्ति को यह बोध हो जाय कि - " देश से भ्रष्टाचार मिटाने का एक मात्र उपाय है, यहाँ के नागरिकों का चरित्र निर्माण! "वैसा व्यक्ति यदि स्वामीजी की शिक्षा को अपनाकर स्वयं मनुष्य बने और दूसरों को भी मनुष्य बनाने के उद्देश्य से उनकी चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को भारत के गाँव-गाँव तक फैला देने के लिये व्याकुल हो उठे ! 
और उसके मन में रात-दिन यदि केवल यही प्रश्न उमड़ता-घुमड़ता रहे, कि किस उपाय से यथार्थ रूप में देश का नवनिर्माण संभव हो सकता है?  तब " विवेकानन्द,विवेकानन्द " का नाम उच्चारित करना अनिवार्य हो जाता है ! 
क्योंकि ' मूर्तमान-चरित्र ', ' चिर-युवा स्वामी विवेकानन्द ' के जैसा युवा आदर्श (Youth Model ), युवा नेता (Youth Leader ) अन्य दूसरा कोई भी नहीं है!! इसी तथ्य को स्वीकार करके भारत सरकार ने भी उनके जन्म-दिवश १२ जनवरी को भारत का राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया है !    
देश का अर्थ क्या है ? देश का अर्थ होता है देश के मनुष्य ! देश की धरती ही देश नहीं है ! देश-प्रेम का अर्थ है देश-वासियों से प्रेम ! 
देश की मिट्टी से प्रेम करना बहुत अच्छी बात है |किन्तु देश की उसी माटी पर जितने भी मनुष्य जन्म ग्रहण किये है, जो भारत माता की संतानें (हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई हैं) हैं, जो हमारे भाई हैं, जो भारतवासी हैं ! - उन भारतवासियों के जीवन को सुन्दर रूप से गठित कर उन्हें ' यथार्थ- मनुष्य ' य़ा ' योग्य- नागरिक ' के रूप में परिणत करना होगा हमसबों का पुनीत कर्तव्य है ! 
क्योंकि भारत महान तब होगा - जब इसके नागरिकों का चरित्र भी महान होगा! और हम भी गर्व से भर कर कह सकेंगे -  ' हमारा भारत महान !'  किन्तु प्रश्न यह है कि, इन भारत-वासियों -  " भारत-माता की सन्तानों " -  के चरित्र का निर्माण कर उन्हें यथार्थ ' मनुष्य ' बनाने अथवा" योग्य नागरिक के रूप गढ़ने की जिम्मेदारी " को उठाने के लिये, कौन आगे आयेगा ?" पूरे समाज को यह उत्तरदायित्व सार्वजनिक तौर पर उठाना होगा ! " (जैसे हमलोग ' सार्वजनिक दुर्गा पूजा-समिति ' बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार पूरे समाज को सार्वजनिक तौर इस जिम्मेदारी को भी मिल-जुल कर उठाना होगा!)

{फरवरी १८९७ में जब स्वामीजी मद्रास में थे तब, ' मद्रास टाइम्स ' नामक समाचार पत्र का एक प्रतिनिधि ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा था- ' आप भारत के पुनर्जागरण के लिये क्या करना चाहते हैं? '
इसके उत्तर में स्वामीजी कहते हैं- " ...हम कितनी ही राजनीति बरतें, उससे उस समय तक कोई लाभ नहीं होगा, जब तक कि भारत के सभी नागरिक (य़ा भारत का जनसमुदाय) एक बार फिर सुशिक्षित, सुपोषित और सुपालित नहीं होता |
..यदि हम भारत को पुनर्जीवित करना ( महान बनाना ) चाहते हैं, तो हमें उनके लिये काम करना होगा| मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमे से आयेंगे| सिंहों की भाँती वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे|मैंने अपना ' उद्देश्य ' निर्धारित कर लिया है और उसके लिये अपना समस्त जीवन दे दिया है |
दि मुझे सफलता नहीं मिलती, तो मेरे बाद कोई अधिक उपयुक्त व्यक्ति( श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय जैसा, जैसा ......infinite युवा ?) आयेगा और इस काम को सँभालेगा, और मैं अपना संतोष प्रयत्न करने में ही मानूंगा| 
आपके- अर्थात ' भारत के युवओं 'के सामने है - जनसमुदाय को उसका अधिकार देने (के पहले उन्हें योग्य नागरिक के रूप में प्रशिक्षित करने ) की समस्या ?(नहीं , परम उत्तरदायित्व है ! ) ये (प्रशिक्षित ) ' हृदयवान युवा '  - अर्थात ' आध्यात्मिक-शक्ति सम्पन्न युवा !' हमारे जनसमुदाय( भारतवासियों) के दोनों प्रकार के-(परा और अपरा) आध्यात्मिक और लौकिक विद्या प्रदान करने में समर्थ शिक्षक (नेता य़ा मार्गदर्शक) होंगे| वे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र में उस समय तक फैलेंगे, जब तक कि हम सम्पूर्ण भारत पर नहीं छा जायेंगे|" (वि० सा० ख० ४: २६०-६१) }

" 3H-निर्माण की शिक्षा " का अर्थ  :
एवं इस अनिवार्य -उत्तरदायित्व को सार्वजनिक रूप से अपने कन्धों पर उठाने के लिये, हमे  स्वामीजी से शरीर(Hand ) और मन (Head )को विकसित कराने के साथ-साथ ह्रदय(Heart ) को भी विकसित करने की शिक्षा भी अवश्य ग्रहण करनी होगी!
अन्यत्र स्वामीजी कहते हैं-" मैं शिक्षा को गुरु के साथ सम्पर्क, ' गुरु-गृहवास ' (योग्य गुरु के सानिध्य में ' ह्रदय के विस्तार करने हेतु ' लिया जाने वाला युवा प्रशिक्षण शिविर) समझता हूँ| गुरु के व्यक्तिगत जीवन के आभाव में शिक्षा नहीं हो सकती| अपने विश्वविद्यालयों को ही लीजिये| अपने ६३ वर्ष के अस्तित्व में उन्होंने क्या किया है ? उन्होंने एक भी मौलिक व्यक्ति पैदा नहीं किया| वे केवल परीक्षा लेने की संस्थाएँ हैं| 
भारतवासिओं के कल्याण के लिये अपने जीवन को भी न्योछावर कर देने की भावना का अभी हमारे राष्ट्र में विकास नहीं हुआ है| " ( ४: २६२)}
अपने ह्रदय को बड़ा बनाने,अर्थात " ह्रदय के विस्तार को " ही   'आध्यात्मिकता' कहते हैं|' आध्यात्मिकता ' का अर्थ है-सबसे- (हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई) प्रेम करने की शक्ति ! य़ा आध्यात्मिक शक्ति! और आध्यत्मिकता के विस्तार से ही - ह्रदय का विस्तार होता है !

किन्तु वैसा ह्रदय कहाँ है, हृदय तो सूख गया है| क्योंकि हम सभी लोग ' वैश्वीकरण ' के नाम पर - पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता का अनुकरण करने के होड़ में दौड़े चले जा रहे हैं! आज का भारत - अपनी उसी गुलामी वाली मानसिकता य़ा " दास सुलभ दुर्बलता " के कारण  १०० वर्ष पहले के 'वर्तमान-भारत ' की अपेक्षा और भी अधिक " अमेरिका-परस्त " बन चुका है! तथा अपनी ' त्याग की महिमा पर आधारित ' अति प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भूल कर, " कामिनी-कांचन के भोग- " Eat , Drink and be marry ! " को ही अपना परम पुरुषार्थ मानने लगा है|
 आज का भारतवासी दिग्भ्रमित होकर भोग, भोग और केवल 'भोग करने की लालच' में फंस कर एक-दूसरे से अधिक भोगसामग्री इकठ्ठा करने की होड़ में दौड़ा चला जा रहे हैं| जिसके फलस्वरूप हमारा ह्रदय सूख कर रेगिस्तान बन गया है |( अपने किसी भी देशवासी के भूख से हुई मौत को देख-सुन कर भी अब कोई प्रतिक्रिया नहीं होती ! हमारा ह्रदय विकसित होने के बजाय सिकुड़ता जा रहा है !) 
यदि हमे फिर से ' हृदयवान मनुष्य ' बनना है, तो इस भोगवादी संस्कृति से हमे दूर होना ही होगा अन्य कोई उपाय नहीं है !   अन्य कोई उपाय नहीं है !! 
स्वामीजी कहते हैं- " हमारी कार्य-विधि (कार्यक्रम) बहुत सरलता से बतायी जा सकती है| वह केवल राष्ट्रीय जीवन को पुनः स्थापित करना है|बुद्ध ने 'त्याग' का प्रचार किया था| भारत ने सुना और फिर केवल छः शताब्दियों में वह अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गया|( पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति का ) भेद यहाँ है ! भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं : त्याग और सेवा ! आप इसकी इन धाराओं में तीव्रता उत्पन्न कीजिये, और शेष सब अपने आप ठीक हो जायेगा| इस देश में आध्यात्मिकता का झंडा कितना ही ऊँचा क्यों न किया जाय, वह पर्याप्त नहीं होता| केवल इसीमे भारत का उद्धार निर्भर करता है! " (वि० सा० ख० ४: २६५)}
(नवनी दा कहते हैं- JNKPH पेज ४६ :)
आशैशव (बचपन से ही ) सबों के (मन में ) भीतर अच्छे भाव भरने की चेष्टा करना अत्यन्त आवश्यक है| मुझे अपने बचपन की बहुत सारी स्मृति तो नहीं है, किन्तु मेरे चित्त में एक स्मृति आज भी इतनी प्रगाढ़ है, जिसे मैं इस उम्र में भी भूल नहीं सका हूँ !
प्रतिदिन रात्रि के समय जब सोने जाता तो नींद आने में देरी होती थी, दोपहर के समय में भी विश्राम करना य़ा सोना नहीं चाहता था| मुझे याद है कि, दोपहर के समय में माँ बंकिमचन्द्र के ' आनन्दमठ ' से थोड़ा-थोड़ा पढ़ करके भैया को और मुझको सुनाया करतीं थीं|
  
पूरी पुस्तक को सुना देने के बाद माँ ने कहा था -  " बन्किमचंद्र द्वारा लिखित पुस्तक - आनन्दमठ   बहुत अच्छी ( देश-भक्ति बढ़ाने वाली) चीज है, इसीलिये तुम दोनों को पढ़ कर सुना दी हूँ, किन्तु इस प्रकार कि पुस्तकों को ' उपन्यास ' कहते हैं, और उपन्यास पढना अच्छी बात नहीं है |" 

 मैंने जीवन में एक भी उपन्यास नहीं पढ़ा है| शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के द्वारा लिखे गये उपन्यास तो जगत-प्रसिद्ध हैं , किन्तु मुझे याद नहीं आता कि मैंने अपने जीवन में कभी भी शरतचंद्र के किसी भी पुस्तक को अपने हाथ में लिया हो| अन्य कोई भी उपन्यास नहीं पढ़ा हूँ|हाँ कभी कभी कोर्स के रूप में किसी किसी उपन्यास का अंश-विशेष दिया रहता तो पढना पड़ता था, दूसरा उपाय नहीं था| किन्तु जिसको उपन्यास पढना कहा जाता है, वैसा जीवन में कभी नहीं पढ़ा हूँ|

रात्रि के समय सोने में देरी करता था, मैं जल्दी से सोना नहीं चाहता था; हमलोगों में यह तय था, कि माँ पहले एक कहानी सुनाएगी, तब मैं सो जाऊंगा!एवं कहानियाँ सुनना मुझे बहुत पसन्द था|मेरी माँ अक्सर मुझे ' बालक ध्रुव ' की कहानी सुनाया करती थीं| मैं बालक-ध्रुव की कहानी सुनता, सुनकर रुलाई आ जाती और रोते रोते सो जाता था| माँ ध्रुव की कहानी का प्रारम्भ इस प्रकार किया करती थी- " ध्रुव भगवान के बड़ भाल बासतेन |"अर्थात " ध्रुव भगवान को बहुत प्यार करते थे !"
 
मै पूछता था- ' माँ, भगवान कहाँ रहते हैं? ' भगवान को कहाँ पाया जाता है ? माँ कहती- " भगवान सबों के सामने तो यूँ ही घूमते-फिरते नहीं रहते, भगवान जंगल-टंगल में रहते हैं, उनको यदि पूरे मन से चाहा जाय और उनकी खोज में निकल पड़ा जाय, तब उनको पाया जा सकता है |" तारपरे ध्रुव बलतो - " ताहले आमि जाब बने, ताहले आमि जाब बने | "  
उसके बाद बालक-ध्रुव कहते - " ऐसी बात है तो मैं जंगल में जाऊँगा, तब मैं जंगल में जाऊंगा !" (देखिये भारतीय-संस्कृति में बालक ध्रुव की कथा के माध्यम से बचपन में ही त्याग की महत्ता को कैसे भरा जाता है !) 
एक दिन ऐसा हुआ कि कहानी सुनाते सुनाते माँ ने सोचा कि ध्रुव भी सो गये हैं, इसलिए माँ पहले ही सो गयीं| किन्तु ध्रुव सोया नहीं था, जागा हुआ था|  वह उठा और दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया| चलते चलते बहुत दूर निकल गया, रास्ते में एक घना जंगल मिला, वह उसमे प्रविष्ट होकर - " भगवान तुम कहाँ हो, भगवान तुम कहाँ हो " करने लगा| 
प्रत्येक दिन यहीं तक की कहानी सुनने से ही रुलाई आ जाती थी, और मैं नींद में सो जाता था| बचपन की इससे प्रगाढ़ स्मृति और कोई याद नहीं पड़ती है |
{ बालक ध्रुव
राजा उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो भार्यायें (पत्नियाँ ) थीं। राजा उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुये। यद्यपि सुनीति बड़ी रानी थी किन्तु राजा उत्तानपाद का प्रेम सुरुचि के प्रति अधिक था। एक बार उत्तानपाद ध्रुव को गोद में लिये बैठे थे कि तभी छोटी रानी सुरुचि वहाँ आई। अपने सौत के पुत्र ध्रुव को राजा के गोद में बैठे देख कर वह ईर्ष्या से जल उठी।

झपटकर उसने ध्रुव को राजा के गोद से खींच लिया और अपने पुत्र उत्तम को उनकी गोद में बैठाते हुये कहा, "रे मूर्ख! राजा के गोद में वह बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ है। तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है इस कारण से तुझे इनके गोद में तथा राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार नहीं है। "
पाँच वर्ष के बालक ध्रुव को अपनी सौतेली माता के इस व्यहार पर बहुत क्रोध आया पर वह कर ही क्या सकता था? इसलिये वह अपनी माँ सुनीति के पास जाकर रोने लगा। 

सारी बातें जानने के पश्चात् सुनीति ने कहा, "बेटा ध्रुव! तेरी सौतेली माँ सुरुचि से अधिक प्रेम होने के कारण तेरे पिता हम लोगों से दूर हो गये हैं। अब हमें उनका सहारा नहीं रह गया है। तू भगवान को अपना सहारा बना ले। 
सम्पूर्ण लौकिक तथा अलौकिक सुखों को देने वाले भगवान नारायण के अतिरिक्त तुम्हारे दुःख को दूर करने वाला और कोई नहीं है। तू केवल उनकी भक्ति कर।"

माता के इन वचनों को सुन कर ध्रुव को कुछ ज्ञान उत्पन्न हुआ और वह भगवान की भक्ति करने के लिये पिता के घर को छोड़ कर चल दिया। मार्ग में उसकी भेंट देवर्षि नारद से हुई। नारद मुनि ने उसे वापस जाने के लिये समझाया किन्तु वह नहीं माना। तब उसके दृढ़ संकल्प को देख कर नारद मुनि ने उसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र की दीक्षा देकर उसे सिद्ध करने की विधि समझा दी। 
 उधर बालक ध्रुव ने यमुना जी के तट पर मधुवन में जाकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र के जाप के साथ भगवान नारायण की कठोर तपस्या की। अत्यन्त अल्पकाल में ही उसकी तपस्या से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन देकर कहा, "हे राजकुमार! मैं तेरे अन्तःकरण की बात को जानता हूँ। तेरी सभी इच्छायें पूर्ण होंगी। 
तेरी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुझे वह लोक प्रदान करता हूँ जिसके चारों ओर ज्योतिश्चक्र घूमता रहता है तथा जिसके आधार पर यह सारे ग्रह नक्षत्र घूमते हैं। प्रलयकाल में भी जिसका नाश नहीं होता। सप्तर्षि भी नक्षत्रों के साथ जिसकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। तेरे नाम पर वह लोक ध्रुवलोक कहलायेगा। इस लोक में छत्तीस सहस्त्र वर्ष तक तू पृथ्वी का शासन करेगा।बालक ध्रुव को ऐसा वरदान देकर भगवान नारायण अपने लोक को चले गये।( सूख सागर के सौजन्य से)}
 दूसरी घटना जो याद आती है- वह है घर में जितनी भी पूजा-पाठ आदि हुआ करते थे, उन सबको बहुत ध्यान से देखना और सुनना भी मुझे बहुत पसन्द था| 

पूजा-घर में पितामह जिस चौकी पर माँ काली की पूजा करते थे, उसी चौकी के एक छोर पर गोपाल की मूर्ति भी रखी  है |ये वही गोपाल हैं जो, एक साधु की छाती से बन्धे हुए थे, और जिन्होंने पूरे भारतवर्ष का भ्रमण कर लिया है,( जिसे मेरी पितामही को दे कर चले गये थे!) पितामह को कालीपूजा करते देख कर मुझमे इन्ही ' गोपाल ' के प्रति झुकाव उत्पन्न हो गया| 
पितामह जब काली-पूजा कर रहे होते तो मैं जिद पकड़ लेता कि मैं भी गोपाल की पूजा करूँगा! और मैं इस बात के लिये भी जिद करता था कि, माँ काली के लिये जैसा जैसा भोग बनेगा, गोपाल लिये भी वैसा वैसा ही भोग देना होगा !
माँ काली की पूजा के बीच में पितामह, कुछ देर तक 'चंडीपाठ' ( दुर्गा सप्तसदी का पाठ ) भी किया करते थे| मेरे पास भी अपनी एक ' छोटी सी चंडी 'थी जो मात्र ' दो इंच चौड़ी ' थी; मैं गोपाल के सामने उसी चंडी का पाठ किया करता था|पितामह माँ काली के सामने चंडी का पाठ करते और मैं गोपाल के सामने चंडी का पाठ करता|
  
जितना जितना भोग माँ काली के लिये बनेगा, उतना ही भोग गोपाल को भी देना होगा, यही मेरी जिद थी|हमलोगों के घर में ऐसी प्रथा थी कि काली पूजा के समय बाहर के लोग, प्रायः कभी नहीं उपस्थित रहते थे, केवल घर के लोग ही पूजा में शामिल होते थे; और जितना भी भोग बनता था, वह समस्त भोग ही भगवान को निवेदित कर दिया जाता था| 

जिस प्रकार परात में भोग दिया जाता है, वैसे किसी बड़ी थाली में सजा कर भोग चढाने की प्रथा हमलोग के यहाँ नहीं थी| इतने बड़े से पीतल की हाँडी में खिचड़ी बना तो, उस पूरी हाँडी को ही दो आदमी उठाकर पूजाघर में रख आते थे| 
पूड़ियाँ छान ली गयीं, तो समस्त पूड़ियों को भी एक बेंत की बड़ी सी टोकरी में भर कर - वहीं भगवान के सामने रख दिया जाता था|अन्य कोई सब्जी-भाजी य़ा पायस इत्यादि जो कुछ भी भोग बनाया जाता था वह सबकुछ को वैसे ही पूरा का पूरा ठाकुर (भगवान) को अर्पित कर दिया जाता था|

मेरी जिद के अनुसार,निकट में ही गोपाल के लिये भी एक छोटी सी हाँडी में खिचड़ी, एक छोटी सी कटोरी में पायस, छोटी सी तस्तरी में अन्य सब्जी- भाजी, छोटी सी एक बेंत की टोकरी में पूड़ियाँ- ये सब कुछ देना ही होगा|
एकबार काली पूजा के समय गोपाल को- बेंत की ' छोटी टोकरी' में भर कर पूड़ियाँ नहीं दी गयीं| मैंने माँ से पूछा- ' गोपाल की पूड़ियाँ कहाँ हैं?' माँ ने कहा - शायद उस समय नजदीक में कोई टोकरी नहीं थी,य़ा शायद उसमे अन्य कोई सामग्री भर कर रख दी गयी हो; मुझे बहलाने के लिये माँ ने कहा, " तुम वह सब मत सोंचो, गोपाल स्वयं माँ काली की टोकरी से पूड़ी निकाल कर खा लेंगे|" मै यह सुनकर संतुष्ट हो गया
रात्रि में पूजा हुई| पूजा के बाद घर के सभी सदस्यों ने प्रसाद ग्रहण किया, और सोने चले गये|माँ काली के पूजा के कमरे के सामने वाले एक कमरे में ही पितामह भी रहा करते थे| प्रातः काल नींद से उठते ही 
वे पूजा के कमरे (ठाकुर-घर) की सिंकड़ी खोल देते, और ठाकुर के कमरे में जा कर प्रणाम करने के बाद ही कहीं जाते|और वह दिन हम सबों के लिये बड़े आनन्द का दिन था|
पूजा के बाद, जब हमलोग उनको प्रणाम करते तो हमलोगों के पीठ पर हाथ रख कर प्रेम-जतलाते हुए स्पर्श करते थे, य़ा जब बहुत छोटे थे तो गोदी में बैठा लेते थे|हम लोग उनके उसी एक बार के स्नेहिल- स्पर्श, उनके शरीर का स्पर्श प्राप्त करने की प्रतीक्षा में रहते थे| 
सुबह-सुबह दरवाजा खोल कर ठाकुर-घर (पूजा के कमरे) में जो दृश्य देखे तो आश्चर्य चकित हो गये! आश्चर्य से स्तंभित हो कर,
                  वहीं से खड़े होकर माँ को आवाज दिये - " बोउमा, एइदिके एसो, देखे जाउ ! " वहाँ जाने पर देखा गया कि, माँ काली की जिस बड़ी टोकरी से घर के सदस्यों को देने के लिये खिचड़ी-उचड़ी सब भोग से थोड़ा थोड़ा निकाल लिया गया था|उसके बाद जितना भी  भोग बचा रहता था, वह सब वैसे ही रहता था, यही हमारे घर की रीति थी| 
किन्तु वहाँ जाने पर देखा गया कि माँ काली की उतनी बड़ी बेंत की टोकरी में जितनी भी पूड़ियाँ बची हुई थीं, सब की सब लगभग समाप्त हो गयीं थीं, और उस टोकरी में पूड़ी के एक-आध टुकड़े ही पड़े हुए हैं| और पूड़ियों के छोटे-छोटे टुकड़े उस टोकरी से शुरू होकर गोपाल की चौकी तक कतार में बिछे हुए थे!
माँ जाकर देखी, तो आश्चर्य से आवाक रह गयीं! हम सभी लोगों को पुकारीं| हमलोग भी पूजा के कमरे में जो देखे तो आश्चर्य चकित हो गये! यह (अघटन) तो मैंने अपनी आँखों से घटित होते देखा है, इसीलिये इसको तो मैं अस्वीकार नहीं कर सकता! 
इसीलिये कहना पड़ता है - " आज भी अघटन घटित होता है !! "    
                                     

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