Tuesday, May 25, 2010

" कठोपनिषद् " [23] श्रद्धा के जाग्रत होने पर सत्य का साक्षात्कार होता है !

" श्रद्धा आविवेश - की दीक्षा ! "
मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि बचपन से ही भगवान के साकार रूप पर आस्था रखने य़ा मूर्ति में साक्षात् गोपाल को देखने, देवता पूजने, भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करने, कांसे का घन्टा बजाने, य़ा आरती करने से मुझे कोई क्षति हुई हो (य़ा मैं 'दूसरों की अपेक्षा' मूर्ख रह गया हूँ )! बल्कि मुझे  कुछ लाभ ही हुआ है, यह मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ|  
 क्योंकि बचपन से ही पवित्र परिवेश में पालन-पोषण होने,और किशोर तथा युवा अवस्था में भी ऐसे ही वातावरण में रहने, परिवार के सदस्यों तथा अन्य लोगों के त्यागपूर्ण जीवन से, य़ा कुछ विस्मयजनक घटनाओं आदि को देखने से -जितने भी शुभ और पवित्र संस्कार मन पर पड़ते हैं, वे सब मनुष्य जीवन को सुन्दर रूप से गठित करने में बहुत ही सहायक होते हैं| 
प्रत्यक्ष होने (साक्षात् देख लेने य़ा स्वयं अनुभव कर लेने) के बाद विश्वास करना उचित है | हम सभी को  अपने जीवन में कुछ न कुछ अद्भुत किन्तु- सत्य घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव होता है| कौन बता सकता है कि, उस कहानी में वह सब कैसे घटित हुआ हुआ होगा? 
(JNKHMP -१३ में ' कलयुग में गोपाल-काली एक हैं ' में जो दो भाइयों की कहानी है, जिसमे माँ काली गोपाल को अपने गोदी में लेकर आम खिला रहीं थी |
मूल बंगला पुस्तक " जीबन नदीर बाँके बाँके " के पृष्ठ २२ को देखें) कृष्णनगर के राजबाड़ी की जो कहानी मेरे पितामह ने सुनाई थी, वह सच है य़ा नहीं? य़ा उस दिन की आखों-देखी घटना ! माँ ने तो मुझे सांत्वना देने के लिये कह दिया था-" माँ कालीर झूड़ी थेके खेये नेबे गोपाल !"
 -अर्थात गोपाल माँ काली की टोकरी से स्वयं ही पूड़ियों को निकाल कर खा लेंगे !" और सुबह में घर के सभी लोगों ने वह दृश्य देखा- माँ काली की टोकरी में पूड़ियाँ नहीं बची हैं, एवं  पूड़ियाँ महीन-महीन टुकड़े टुकड़े होकर गोपाल की चौकी तक एक कतार में बिछी हैं! ( क्या वह भी झूठ है ?) 
विश्वास होना य़ा न होना एक बात है, और ऐसा होना संभव है य़ा नहीं वह दूसरी बात है| किन्तु किसी घटना को प्रत्यक्ष देख लेने से जो विश्वास होता है - वह कुछ अलग ही श्रेणी का होता है| क्योंकि स्वयं प्रत्यक्ष करने से- अन्तर में एक भिन्न प्रकार की श्रद्धा जाग्रत होती है ! स्वामीजी कठोपनिषद में नचिकेता के भीतर इसी तरह के  " श्रद्धा-आविवेश " का उदाहरण दिया करते थे न!
नचिकेता के पिता यज्ञ कर रहे हैं ! बहुत बड़े पैमाने पर यज्ञ कर रहे हैं, किन्तु उसमे जो दान-पुण्य कर रहे हैं, उसमे वे चुन चुन कर ऐसे गौओं को दान में दे रहे हैं, जो ' दुग्धदोहा निरिन्द्रिया: ' हो चुकी हैं|अर्थात वे गौएँ ' निरिन्द्रिय ' हैं अर्थात जो अब और दूध देने के योग्य नहीं हैं, जिनको अब बछड़ा आदि कुछ नहीं हो सकता है| 
यह देख कर नचिकेता कहता है- " पिताजी आप इस तरह की गौओं को क्यों दान कर रहे हैं? आपकी श्रेष्ठ वस्तु क्या है? मैं, आपका पुत्र हूँ,क्या मैं श्रेष्ठ वस्तु नहीं हूँ? मुझको आप किसे दान कर रहे हैं? "
उसके पिताजी नाराज होकर कह दिये- " तुझको मैं यम को देता हूँ! " इस कहानी को प्रायः सभी जानते हैं की इसके बाद नचिकेता यम से मिलने चल देते हैं, और सशरीर ही यम के घर पहुँच जाते हैं! 
तब यम कहीं बाहर गये हुए थे, इसलिए नचिकेता तीन दिनों तक उनके लौटने की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं| यम जब लौट आते हैं तो नचिकेता के साथ उनकी मुलाकात होती है| वह उनसे आत्म-तत्व के विषय में प्रश्न करता है| वे उसको आत्मतत्व समझा देते हैं ! इस प्रकार जब वह अपने यथार्थ स्वरूप को जान जाता है,तब उसका ह्रदय में "श्रद्धा-आविवेश " होता है - 
अर्थात उस बालक के निर्मल अंतःकरण में श्रद्धा- ' आस्तिक्य-बुद्धि ' जाग्रत हो जाती है! जब तक श्रद्धा जाग्रत नहीं हो जाती, तब तक पशु-मानव यथार्थ 'मनुष्य' (जिसको अपने मान का होश रहता है) नही बन सकता| (jnkhmp -४९ पेज )
इस प्रकार जब वह अपने यथार्थ स्वरूप को जान जाता है,तब उसका ह्रदय में "श्रद्धा-आविवेश " होता है - अर्थात उस बालक के निर्मल अंतःकरण में श्रद्धा- ' आस्तिक्य-बुद्धि ' जाग्रत हो जाती है! जब तक
 " आत्म-श्रद्धा " जाग्रत नहीं हो जाती, तब तक (मनुष्य बनना) य़ा कुछ भी होना संभव नहीं है! 
इसके लिये हमें पहले स्वयं से प्रश्न करना चाहिये, क्या मैं भी नचिकेता के समान समस्त प्रकार के इन्द्रिय भोगों के प्रलोभनों का त्याग कर पाने में समर्थ हो सका हूँ य़ा नहीं ? यदि अपने ह्रदय से यह आवाज आये कि - " हाँ, सांसारिक विषय भोगों की नश्वरता को जान कर मैं यह समझ चुका हूँ की केवल वैराग्य में ही सुख है; और मैं अपना सर्वस्व त्याग कर के भी ' सत्य ' को ही प्राप्त करना चाहता हूँ !" 
[ वैदिक -साहित्य में आचार्य को 'मृत्यु' के महत्त्वपूर्णपद से अलंकृत किया गया है।'आचार्यो मृत्यु:।' आचार्य मानो माता की भांति तीन दिन और तीन रात गर्भ में रखकर नीवन जन्म देता है। 'नचिकेता' का अर्थ - 'न जाननेवाला, जिज्ञासु' है तथा यमराज यमाचार्य है, मृत्यु के सदृश आंखे खोलनेवाले गुरु।मृत्यु विवेकदायिनी गुरु है। मृत्यु के यथार्थ को समझाने के लिए साक्षात् मृत्यु के देवता यमराज को यमाचार्य के रुप में प्रस्तुत करना कठोपनिषद् के प्रणेता का अनुपम नाटकीय कौशल है। यह कल्पनाशक्ति के प्रयाग का भव्य स्वरुप् है।]

क्योंकि नचिकेता के जैसा सत्यार्थी ही सत्य को प्राप्त कर सकता है| यमाचार्य की प्रतीक्षा में नचिकता भूखा प्यासा तीन दिनों तक उनके दरवाजे पर बैठा रहता है! यम के वापस आने पर जब दोनों में मुलाकात होती है तो वह उनसे आत्मतत्त्व य़ा परमसत्य (जिसका तीनों कालों में भी नाश नहीं होता) को जानने का उपाय पूछता है|  
परमसत्य को समझ पाने की पात्रता है दृढ वैराग्य, उस परीक्षा में जब नचिकेता उत्तीर्ण हो जाता है, तब यमाचार्य उसको आत्मतत्व का अनुभव करा देते हैं!" एई जे एई रकम जखन हलो, तखन से बलछे ' श्रद्धाविवेश ' !" (please see जीबन नदीर बाँके बाँके पेज 48) उस समय (- आत्मसाक्षात्कार के समय ) जो उसको अनुभव हुआ, उससे उस छोटे से बालक में जो श्रद्धा जाग्रत हो गयी उसको ' श्रद्धा आविवेश ' कहा जाता है|
(jnkhmp -४९ पेज )

इस प्रकार जब वह अपने यथार्थ स्वरूप को जान जाता है,तब उसका ह्रदय में "श्रद्धा-आविवेश " होता है - अर्थात उस बालक के निर्मल अंतःकरण में श्रद्धा- ' आस्तिक्य-बुद्धि ' जाग्रत हो जाती है! जब तक " श्रद्धा " जाग्रत नहीं हो जाती, तब तक (मनुष्य बनना) य़ा कुछ भी होना संभव नहीं है! 
इसके लिये हमें पहले स्वयं से प्रश्न करना चाहिये, क्या मैं भी नचिकेता के समान समस्त प्रकार के इन्द्रिय भोगों के प्रलोभनों का त्याग कर पाने में समर्थ हो सका हूँ य़ा नहीं ? यदि अपने ह्रदय से यह आवाज आये कि - " हाँ, सांसारिक विषय भोगों की नश्वरता को जान कर मैं यह समझ चुका हूँ की केवल वैराग्य में ही सुख है; और मैं अपना सर्वस्व त्याग कर के भी ' सत्य ' को ही प्राप्त करना चाहता हूँ !" 
क्योंकि नचिकेता के जैसा सत्यार्थी ही सत्य को प्राप्त कर सकता है| यमाचार्य की प्रतीक्षा में नचिकता भूखा प्यासा तीन दिनों तक उनके दरवाजे पर बैठा रहता है! यम के वापस आने पर जब दोनों में मुलाकात होती है तो वह उनसे आत्मतत्त्व य़ा परमसत्य (जिसका तीनों कालों में भी नाश नहीं होता) को जानने का उपाय पूछता है| परमसत्य को समझ पाने की पात्रता है दृढ वैराग्य, उस परीक्षा में जब नचिकेता उत्तीर्ण हो जाता है, तब यमाचार्य उसको आत्मतत्व का अनुभव करा देते हैं!" एई जे एई रकम जखन हलो, तखन से बलछे ' श्रद्धाविवेश ' !"(please see जीबन नदीर बाँके बाँके पेज 48)उस समय  (आत्मसाक्षात्कार के समय ) जो उसको अनुभव हुआ, उससे उस छोटे से बालक में जो श्रद्धा जाग्रत हो गयी उसको ' श्रद्धा आविवेश ' कहा जाता है|
अतः महामण्डल के सभी भाइयों को स्वयं से प्रश्न करना चाहिये, क्या मुझमे ' श्रद्धा आविवेश ' य़ा आस्तिक्य बुद्धि जाग्रत हो गयी है; और कोई भी मूल्य चुका कर मैं केवल 'सत्य 'को ही पाना चाहता हूँ ? किसी ऐसे ही " सत्यार्थी " य़ा सत्य के जिज्ञाषु में ऐसी श्रद्धा जाग्रत कराने के उपाय को वेद में एक सूत्र के रूप में कहा गया है:

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् |
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्ध्या सत्यमाप्यते ||
यजुर्वेद 19|30 ||

शब्दार्थ--(ब्रतेन) व्रत के द्वारा, किसी निश्चित विचार या संकल्प से, (दीक्षाम्) दीक्षा को, कर्तव्यनिष्ठा को, (आप्नोति) प्राप्त होता है. (दीक्षया) दीक्षा या कर्तव्यनिष्ठा से, (दक्षिणाम्) दाक्षिण्य, चतुरता या कुशलता को, (आप्नोति) प्राप्त होता है. (दक्षिणा) दक्षिणा से, चतुरता या कुशलता से, (श्रद्धाम्) श्रद्धा को, आस्तिकता या आस्तिक्य वुद्धि को (आप्नोति) प्राप्त होता है. (श्रद्धया) श्रद्धा से, (सत्यम्) सत्य या सत्यस्वरूप ब्रह्रा, (आप्यते) प्राप्त होता है. हिन्दी अर्थ--ब्रत (संकल्प) से दीक्षा (कर्तव्यनिष्ठा) को प्राप्त होता है.
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति, श्रद्धया सत्यमाप्यते.. यजु. १९-३० अन्त्रय-ब्रतेन दीक्षाम् आप्नोति. दीक्षया दक्षिणाम् आप्नोति. दक्षिणा श्रद्धाम् आप्नोति. श्रद्धया सत्यम् आप्यते. शब्दार्थ--(ब्रतेन) व्रत के द्वारा, किसी निश्चित विचार या संकल्प से, (दीक्षाम्) दीक्षा को, कर्तव्यनिष्ठा को, (आप्नोति) प्राप्त होता है. (दीक्षया) दीक्षा या कर्तव्यनिष्ठा से, (दक्षिणाम्) दाक्षिण्य, चतुरता या कुशलता को, (आप्नोति) प्राप्त होता है. (दक्षिणा) दक्षिणा से, चतुरता या कुशलता से, (श्रद्धाम्) श्रद्धा को, आस्तिकता या आस्तिक्य वुद्धि को (आप्नोति) प्राप्त होता है.
[सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी भी इनकी आज्ञा के अनुसार चलते हैं. एक क्षण के लिए भी ये ऋत की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं. मनुष्य की तो शक्ति ही नहीं कि इनके विरुद्ध कार्य करके जीवित रह सके. दीक्षा का अभिप्राय है--किसी व्रत को लेकर उस पर अडिग रहना. एकाग्र या तन्निष्ठ होकर उस व्रत का पालन करते रहने से उसमें विशेष योग्यता जागृत होती है. तप का अभिप्राय संयम है. अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना तप है. तप:सार इन्द्रियनिग्रह:. चा. सूत्र ४७५ इस तप या संयम से समाज की व्यवस्था सुचारु रूप से चलती है.तप का अभिप्राय संयम है. अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना तप है.ईश्वर प्रणिधानमका अभिप्राय ईश्वर-विश्वास और आस्तिकता है. जहां ईश्वर-विश्वास है, वहां उत्साह, पुरुषार्थ और प्रगति है.आस्तिकता से पापों का निरोध होता है. इससे अनुचित कार्यों के प्रति घृणा का भाव बना रहता है और विश्वबन्धुत्व का भाव जागृत होता है. दीक्षा का अभिप्राय है--किसी व्रत को लेकर उस पर अडिग रहना. एकाग्र या तन्निष्ठ होकर उस व्रत का पालन करते रहने से उसमें विशेष योग्यता जागृत होती है.अथर्ववेद में सत्य और ऋत को संसार का धारक बताया है. सत्य से पृथिवी रुकी हुई है और ऋत से सूर्य रुका हुआ है. सत्येनोत्तभिता भूमि:.. ऋतेनादित्यास्तष्ठन्ति... अथर्व. १४-१-१ आचार्य चाणक्य ने भी यही भाव प्रकट किया है कि सत्य ही संसार का धारक है. सत्येन धार्यते लोक:. चा. सूत्र ४१९ मंत्र में सत्य को महान् और ऋत को उग्र कहा गया है. इसका अभिप्राय यह है कि ऋत और सत्य संसार की सबसे बड़ी शक्तियां हैं. तप का अभिप्राय संयम है. अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना तप है. तप:सार इन्द्रियनिग्रह:. चा. सूत्र ४७५ इस तप या संयम से समाज की व्यवस्था सुचारु रूप से चलती है. असंयम असामाजिक तत्त्वों की वृद्धि करता है और अनाचार का कारण है. तप:सार इन्द्रियनिग्रह:. चा. सूत्र ४७५ इस तप या संयम से समाज की व्यवस्था सुचारु रूप से चलती है. असंयम असामाजिक तत्त्वों की वृद्धि करता है और अनाचार का कारण है. ब्रह्रा का अभिप्राय ईश्वर-विश्वास और आस्तिकता है. जहां ईश्वर-विश्वास है, वहां उत्साह, पुरुषार्थ और प्रगति है. आस्तिकता से पापों का निरोध होता है. इससे अनुचित कार्यों के प्रति घृणा का भाव बना रहता है और विश्वबन्धुत्व का भाव जागृत होता है. यज्ञ सृष्टि-चक्र का नियामक तत्त्व है. संसार में प्राकृतिक यज्ञ सृष्टि के आरम्भ से चल रहा है. सामान्य यज्ञ उसी का प्रतीक है. इससे परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति होती है. टिप्पणी--(१) वृहत् सत्यम्--महान् सत्य, सत्यभाषण, प्राकृतिक नियमों का क्रियात्मक रूप. (२) उग्रम ऋतम्--प्रचंड या अटल प्राकृतिक नियम. शाश्वत नियमों को ऋत कहते हैं. (३) दीक्षा--कर्तव्यनिष्ठा. किसी प्रकार का कोई दृढ़ संकल्प दीक्षा है. (४) तप:--तपस्या. शारीरिक वाचिक और मानसिक संयम तप है. (५) ब्रह्मा--ज्ञान, आस्तिकता. उग्रम ऋतम्--प्रचंड या अटल प्राकृतिक नियम. शाश्वत नियमों को ऋत कहते हैं.
प्रारम्भ में (प्रथम सोपान पर), यदि तुझे सचमुच सत्य से प्रेम हो तो तुझे जहाँ कहीं कोई सच्चा नियम (यम-नियम), सत्य नियम,व्रत (मनः संयोग का नियमित अभ्यास करने की पद्धति) का पता लगेगा तू उसे अवश्य पालन करने में लग पड़ेगा |इस तरह व्रतों को ( मनः संयोग की पद्धति को ) जानने और यथाशक्ति पालन करने की तेरी प्रव्रृतितुझे शीघ्र दीक्षा का पात्र बना देगी | दीक्षित होने पर तुम दूसरी सीढ़ी पर चढ़ जाओगे | "दीक्षित हो जाना " -मानो सत्य के साम्राज्य में घुसने का प्रवेशपत्र पा लेना है!" और सत्य के दरबार में पहुंचने का अधिकारी बन जाना है!" दीक्षित होने की इस दूसरी सीढ़ी " पर जब तुम चढ़ जाओगे,तब तुम  दीक्षा से सत्य के वायुमण्डल में रहने वाले की पात्रता प्राप्त कर लोगे। और तेरा सत्यप्रेमी साथियों का परिवार बन जावेगा |  तब तेरे लिये अपने अन्य सत्यपथिक भाइयों के अनुभव से लाभ उठाते हुए सत्यनियमों का जान लेना और उनका यथावत् पालन करना बहुत सहज हो जायेगा |एवं आगे आगे सत्य के पालन में अभ्य‌स्त होता हुआ 
 तुझे यह स्वात्म-अनुभव होने लग जायेगा कि सत्य के पालन से तेरी व्रृद्धि (दक्षिणा) होती है, तेरी उन्नति होती है |  तब तू स्वयमेव अनुभव करेगा कि सत्य के पालन से तू बलवान और उन्नत हो रहा है |कुछ आश्चर्य नहीं यदि उस समय बाहर का संसार भी तुझे प्रतिष्ठा देता हुआ और तेरे प्रति नानाविध दक्षिणायें लाता हुआ तेरी दक्षता, बलवत्ता और बढ़्ती को स्वीकार करे | तुझे अपने आप तो अपनी व्रृद्धि अनुभूत होगी ही!यह अनुभव ही तुझ‌ में सत्य के लिये श्रद्धा उत्पन्न कर देगा और तुझे श्रद्धा की तीसरी सीढ़ी पर पहुंचा देगा | तब तुझमें सत्य के लिये ऐसी अटल श्रद्धा हो जायेगी कि तू त्रिकाल में भी यह शक नहीं करेगा कि कभी सत्य तेरी हानि भी कर सकता है | श्रद्धा पा जाने पर मनुष्य बड़ी तीव्र गति से आगे बढ़ने लग‌ता है | अतः जब तू अपनी श्रद्धा में मग्न होकर सत्य के - केवल सत्य के - पा लेने के लिये व्याकुल हुआ-हुआ एकाग्र  होकर अग्रसर हो रहा होगा तो इससे अगली उच्च सीढ़ी पर पैर रखते ही तुझे "सत्य" के दर्शन हो जायेंगे ,  अपने प्यारे सत्य का साक्षात्कार हो जायेगा |
 सर्वप्रथम किसी कार्य में लग जाने से धीरे धीरे विश्वास आता है, और उससे श्रद्धा आती है| एवं श्रद्धा के जाग्रत होने पर सत्य (का साक्षात्कार होता है !) को प्राप्त किया जाता है| यदि इस श्रद्धा को जाग्रत करने कि चेष्टा बचपन से प्रारम्भ न किया जाय, किशोरावस्था में भी न किया जाय, यौवन में भी श्रद्धा यदि जाग्रत न हो सके- तो फिर किसी व्यक्ति के जीवन में सच्ची-श्रद्धा य़ा सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती |
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   " कठोपनिषद् "
[ क= ब्रह्म; ठ= निष्ठा; इस प्रकार 'कठ' माने 
ब्रह्म में निष्ठा उत्पन्न करनेवाला उपनिषद्।"
 शाश्वत शान्ति का पथ : वि० सा० ख० ३:१६० ]  
कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा के अर्न्तगत है। इसमें दो अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में तीन वल्ली हैं। इस उपनिषद में नचिकेता और यम का संवाद हैं, जिसमें यम ने परमात्म-तत्त्व का रोचक एवं विशद वर्णन किया है। यह उपनिषद् कठ ऋषि के नाम से जुड़ा हुआ है। 
  प्रथम अध्याय : प्रथम वल्ली
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:

शब्दार्थ: ॐ =परमात्मा का प्रतीकात्मक नाम; नौ =हम दोनों (गुरु और शिष्य) को; सह = साथ-साथ; भुनक्तु = पालें, पोषित करें; सह =साथ-साथ; वीर्यं = शक्ति को; करवावहै = प्राप्त करें; नौ = हम दोनों को; अवधीतम् =पढी हुई विद्या; तेजस्वि =तेजोमयी; अस्तु =हो; मा विद्विषावहै = (हम दोनों) परस्पर द्वेष न करें।

अर्थ: हे परमात्मन् आप हम दोनों गुरु और शिष्य की साथ- साथ रक्षा करें, हम दोनों का पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-साथ शक्ति प्राप्त करें, हमारी प्राप्त की हुई विद्या तेजप्रद हो, हम परस्पर द्वेष न करें, परस्पर स्नेह करें। हे परमात्मन् त्रिविध ताप की शान्ति हो। आध्यात्मिक ताप (मन के दु:ख) की, अधिभौतिक ताप (दुष्ट जन और हिंसक प्राणियों से तथा दुर्घटना आदि से प्राप्त दु:ख) की शान्ति हो। ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति (श्वेत उप० ४.१४)। शान्ति मन्त्र- ॐ शरणं त्रिविधतापहरणं ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
ॐ अशन् ह वै वाजश्रवस: सर्ववेदसं ददौ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥१॥


शब्दार्थ: ॐ = सच्चिदानन्द परमात्मा का नाम है, जो मंगलकारक एवं अनिष्टनिवारक है;ह वै =प्रसिद्ध है कि;उशन्= यज्ञ के फल की इच्छावाले; वाजश्रवस: =वाजश्रवा के पुत्र वाजश्रवस् उद्दालक ने; सर्ववेदसं =(विश्वजित् यज्ञ में) सारा धन;ददौ =दे दिया; तस्य नचिकेता नाम ह पुत्र: आस =उसका नचिकेता नाम से प्रसिद्ध पुत्र था।
वचनामृत: वाजश्रवस्(उद्दालक) ने यज्ञ के फल की कामना रकते हुए (विश्वजित यज्ञ में) अपना सब धन दान दे दिया। उद्दालक का नचिकेता नाम से ख्यात एक पुत्र था
व्याख्या: प्राचीन  काल में यज्ञ करना और दक्षिणा आदि में दान देना एक पुण्यकृत्य माना जाता था। विश्वजित एक महान यज्ञ था जिसमें सारा धन दान देकर रिक्त हो जाना गौरवमय माना जाता था। महर्षि उद्दालक ने विश्वजित यज्ञ किया और सर्वस्व दान करके रिक्त हो गये। उनका एक पुत्र नचिकेता सब कुछ देख रहा था। अधिकांश ऋषिगण गृहस्थ होते थे तथा वनों में रहते थे। प्राय: गौएं ही उनकी धन-सम्पति होती थी।
तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानसु श्रद्धा आविवेश सोऽमन्यत ॥२॥
शब्दार्थ: दक्षिणासु नीयमानासु =दक्षिणा के रुप में देने के लिए गौओं को ले जाते समय में; कुमारम् सन्तम् =छोटा बालक होते हुए भी; तम् ह श्रद्धा आविवेश =उस (नचिकेता) पर श्रद्धाभाव (आस्तिक्य-बुद्धि) का आवेश हो गया। स: अमन्यत = उसने चिन्तन करना प्रारंभ किया।
वचनामृत: जिस समय दक्षिणा के लिए गौओं को ले जाया जा रहा था, तब छोटा बालक होते हुए भी उस नचिकेता में श्रद्धाभाव का आवेश हो गया, अर्थात उसमे अपने "आत्म-स्वरूप पर आस्तिकता" उत्पन्न हो गयी  तथा उसने चिन्तन-मनन प्रारंभ कर दिया।
व्याख्या: आत्मश्रद्धा ही मनुष्य को गहराई से चिन्तन करने की शक्ति प्रदान करती है। प्रकृति ने मनुष्य को चिन्तन मनन की शक्ति दी है, पशु को नहीं। मनन करने से ही वह मनुष्य होता है, अन्यथा मानव की आकृति में वह पशु ही होता है। चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान में प्रगति की है तथा चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य उचित-अनुचित धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदि का निर्णय करता है। चिन्तन के द्वारा ही "विवेक" उत्पन्न होता है !तथा वह स्मृति कल्पना आदि का सदुपयोग कर सकता है। चिन्तन को स्वस्थ दिशा देना श्रेष्ठ पुरुष का लक्षण होता है।


पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया:।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥३॥


शब्दार्थ: पीतोदका: जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणा: =जो तिनके (घास )खा चुकी हैं;दुग्धदोहा: =जिनका दूध (अन्तिम बार )दुहा जा चुका है; निरिन्द्रिया: = जिनकी इन्द्रियां सशक्त नहीं रही हैं, शिथिल हो चकी हैं; ता: ददत्= उन्हें देनेवाला; अनन्दा नाम ते लोका:= आनन्द-रहित जो वे लोक हैं; स तान् गच्छति= वह उन लोको को जाता है।

वचनामृत: (ऐसी गौएं) जो (अन्तिम बार)जल पी चुकी हैं, जो घास खा चुकी हैं, जिनका दूध दुहा जा चुका है, जो मानोज इन्द्रियरहित हो गयी है, उनको देनवाला उन लोको को प्राप्त होता है, जो आनन्दशून्य हैं।
व्याख्या: नचिकेता ने सोचा कि पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणा में दे रहे हैं ! अब इनमे न तो झुककर जल पीने की शक्ति रही है, न इनके मुख में घास चबाने के लिये दाँत ही रह गये हैं, और न इनके स्तनों में तनिक-सा दूध ही बचा है !अधिक क्या, इनकी तो इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट हो चुकी हैं- इनमे गर्भधारण करने तक की भी सामर्थ्य नहीं है! भला, ऐसी निरर्थक और मरणासन्न गौएँ जिन ब्राह्मणों के घर जायेंगी, उनको दुःख के सिवा ये और क्या देंगी ? 
दान तो (-" शिव ज्ञान से जीव सेवा कर रहूँ " ऐसा सोंच कर पूरी श्रद्धा के साथ देना चाहिये!)  उसी वस्तुका करना चाहिये, जो अपने को सूख देने वाली हो, अपने को बहुत अच्छी लगती हो तथा उपयोगी हो 
तथा वे वस्तुएँ जिन्हें प्राप्त हों, उन्हें भी सूख और लाभ पहुँचानेवाली हो| जिन गौओं की इन्द्रियां शिथिल हो चुकी हैं, उनको दान में देनवाला मनुष्य पाप का भागी होता है तथा उन लोकों को प्राप्त होता है, जो सब प्रकार से सुखों से शून्य हैं।
पिताजी इस दान से क्या सूख पायेंगे? ये तो मेरे मोह में पड़ कर मेरे सुखद भविष्य के लिये उपयोगी गौओं को रख लिये हैं,अर्थात ये मुझको ही अपना सर्वस्व समझते हैं, अतः इस ' सर्वस्व-दानरूपी यज्ञ ' में
इनको मुझको ही दान करने पर यज्ञ का पूरा फल प्राप्त होगा| पर मैं इनका पुत्र हूँ, अतएव मैं पिताजी को इस अनिष्टकारी परिणाम से बचाने के लिये अपना बलिदान कर दूंगा| यही मेरा धर्म है !
 कुमार नचिकेता में " श्रद्धा आविवेश " हो जाने के कारण उसका 
" विवेक " भी जाग्रत हो चुका था! अतः  उत्तम उत्कृष्ट और निकृष्ट, नित्य और अनित्य, श्रेय और प्रेय में से किसका चयन करना चाहिये - वह अच्छी तरह से समझ चुका था! अपने पुत्र-धर्म का निश्चय करके उसने अपने पिता से कहा -


स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यतीति।
द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति॥४॥


शब्दार्थ: स ह पितरं उवाच =वह (यह सोचकर)पिता से बोला;तत (तात)= हे प्रिय पिता; मां कस्मै दास्यति इति = मुझे किसको देंगे? द्वितीयं तृतीयं तं ह उवाच = दूसरी, तीसरी बार (कहने पर) उससे (पिता ने) कहा; त्वा मृत्यवे ददामि इति =तुझे मैं मृत्यु को देता हूं।
वचनामृत: वह ( नचिकेता) ऐसा विचार कर पिता से बोला-हे तात, आप मुझे किसको देंगे? दूसरी, तीसरी बार (यी कहने पर )उससे पिता ने कहा-तुझे मैं मृत्यु को देता हूं।
व्याख्या:  "श्रद्धा आविवेश" से प्रेरित होकर नचिकेता ने पिता से कहा –हे पिताजी, मैं भी तो आपका धन हूं। आप मुझे किसको देंगे?  पिताने कोई उत्तर नहीं दिया; तब नचिकेता ने फिर कहा- ' पिताजी ! मुझे किसको देते हैं? पिताने इस बार भी बच्चा जान कर उसके निर्भीक-प्रश्न की उपेक्षा की| उसने तीसरी बार फिर वही कहा-' पिताजी! आप मुझे किसको देते हैं?' अब ऋषि को क्रोध आ गया और " क्रोध के आवेश " में आकर कहा- ' तुझे देता हूँ मृत्यु को !'   

बहूनामेमि प्रथमों बहूनामेमि मध्यम:।
किं स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥५॥
शब्दार्थ: बहूनां प्रथमो एमि = बहुत से (शिष्यों )में तो प्रथम चलता आ रहा हूं; बहूनां मध्यम: एमि =बहुत से (शिष्यों मे) मध्यम श्रेणी के अन्तर्गत चलता आ रहा हूं;यमस्य =यम का; किम् स्वित् कर्तव्य् = (यम का) कौन-सा कार्य हो सकता है; यत् अद्य= जिसे आज;मया करिष्यति =(पिताजी) मेरे द्वारा (मुझे देकर) करेंगे।
वचनामृत:   शिष्यों और पुत्रों की तीन श्रेणियां होती हैं-उत्तम, मध्यम और अधम |  जो शिष्य य़ा पुत्र अपने गुरु य़ा पिता के मनोरथ को समझकरउनकी आज्ञा की प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी  रूचि के अनुसार कार्य करने लगते है,वे उत्तम श्रेणी के शिष्य हैं!जो अपने नेता गुरु य़ा सर्वस्व की आज्ञा पाने के बाद कार्य करते हैं,वे मध्यम श्रेणी के हैं !और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार कार्य नहीं करते,वे अधम कोटि के शिष्य हैं! मैं बहुत से (शिष्यों एवं पुत्रों में) प्रथम श्रेणीका हूं, प्रथम श्रेणी के आचरण पर चलने वाला हूँ, क्योंकि मैं उनके आदेश देने के पहले ही उनके मनोरथ ( " Be and  Make !" -अर्थात  तुम स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो !) को समझकर, इसी कार्य को अपना एकमात्र कर्तव्य समझता हूँ! बहुत-से शिष्यों से मध्यम श्रेणी का भी हूँ, मध्यम श्रेणी के आचरण पर भी चलता आया हूँ; परन्तु अधम श्रेणी का तो हूँ ही नहीं| आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैंने कभी किया ही नहीं|फिर, पता नहीं, पिताजीने मुझे ऐसा क्यों कहा? यम का कौन सा ऐसा कार्य है, जिसे पिताजी मेरे द्वारा (मुझे देकर)करेंगे?
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे।
सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन: ॥६॥
शब्दार्थ: पूर्वे यथा =पूर्वज जैसे (थे); अनुपश्य = उस पर विचार कीजिये;अपरे (यथा) तथा प्रतिपश्य = (वर्तमान काल में)दूसरे(श्रेष्ठजन) जैसे (हैं )उस पर भली प्रकार दृष्टि डालें;  मर्त्य:=मरणधर्मा मनुष्य;
सस्यम् इव =अनाज की भांति; पच्यते=पकता है;सस्यम् इव पुन: अजायते =अनाज की भांति ही पुन: उत्पन्न हो जाता है।
वचनामृत: (आपके) पूर्वजों ने जिस प्रकार का आचरण किया है, उस पर चिन्तन कीजिये, उपर अर्थात वर्तमान में भी(श्रेष्ठ पुरुष कैसा आचरण करते हैं) उसको भी भंलीभाति देखिए। मरणधर्मा मनुष्य अनाज की भांति पकता है (वृद्ध होता और मृत्यु को प्राप्त होता है ), अनाज की भांति फिर उत्पन्न हो जाता है।
व्याख्या: नचिकेता ने अपने पिता एवं गुरु उद्दालक को पूर्वजों से चली आती हुई श्रेष्ठ आचरण की परम्परा पर दृष्टिपात करने का निवेददन किया। श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण में पहले भी सत्य का आग्रह था तथा वह अब भी ऐसा ही है। मनुष्य तो अनाज की भांति जन्म लेता है, जीर्ण-शीर्ण होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है अनाज की भांति पुन: जन्म ले लेता है। जीवन अनित्य् होता है, मनुष्य के सुख भी अनित्य होते हैं,अत: क्षणभंगुर सुखों के लिए ' सत्य के आचरण का परित्याग करना '-  विवेकपूर्ण नही होता।
नचिकेता ने अपने पिता एवं गुरुसे अनुरोधपूवर्क् कहा कि वह संशय छोड़कर सत्याचरण पर दृढ रहें तथा सत्य की रक्षा के लिए उसे अपने वचनानुसार मृत्यु (यमराज)के पास जाने की अनुमति दे दें। 
 महर्षि उद्दालक ने उसकी सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उसे यमराज के पास जाने की अनुमति दे दी। 
यमराज के भवन में जाकर नचिकेता को ज्ञात हुआ कि वे कीं बाहर गये हैं। नचिकेता ने बिना अन्न-जल ही तीन दिन तक उनकी प्रतीक्षा की। यमराज के लौटने पर उनकी पत्नी ने उन्हें नचिकेता के अन्न-जल बिना ही उनकी प्रतीक्षा करने का समाचार दिया तथा उसका सम्मान करने का परामर्श दिया।
अपनी पत्नी के बचन सुनकर यमराज अविलम्ब नचिकेता के गये और उसकी समुचित अर्चना-पूजा की तथा इसके उपरान्त् यमराज-नचिकेता का संवाद प्रारंभ हो गया।
जीवन के यथार्थ को जानने के लिए मृत्यु के रहस्य को समझना अत्यावश्यक है क्योंकि जीवन का स्वाभाविक अवसान मृत्यु के रुप में होता है।" जीवन की पहेली का समाधान "मृत्यु के रहस्य का उदघाटन करने मे सन्निहित है। जीवन मानों मृत्यु की धरोहर है तथा वह इसे चाहे जब विलुप्त कर सकती है।  
सारे संसार को अपने आतंक से प्रकम्पित कर देनेवाले महापराक्रमी मनुष्य क्षणभर में सदा के लिए तिरोहित हो जाते हैं।जीवन और मृत्यु का रहस्य अनन्तकाल से जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। धर्मग्रन्थों ने तथा मनीषीजन ने इसके अगणित समाधान प्रस्तुत किये हैं, तथापि रहस्य का उद्घाटन एक गंभीर समस्या बना हुआ है।जीवन का उद्गम कहां से होता है,जीवन क्या है और मृत्यु क्या है?जीवन और मृत्यु का यथार्थ जानने पर " जीवन एक उल्लास "तथा मृत्यु - एक उत्सव हो जाते हैं। अज्ञान के कारण मृत्यु एक भयप्रद घटना तथा जीवन निरुउद्देश्य भटकाव प्रतीत होते हैं।
  साक्षात मृत्यृदेव (यमराज) से ही जीवन और मृत्यु के रहस्य को जानने से बढकर अन्य क्या उपाय हो सकता है? जिज्ञासु नचिकेता यमराज का शरणागत, भयत्रस्त व्यक्ति नहीं है,बल्कि पूज्य् अतिथि है और सम्मानपूर्वक् उपदेश ग्रहण करता है।यह ब्रह्मज्ञान की महिमा है, जो दाता और गृहीता दोनों को पवित्र कर देता है।कठोपनिषद् के ऋषि का कल्पना-कौशल तथा शिक्षण शैली दोनों अनुपम हैं।


तिस्त्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्य:।
नमस्ते अस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति में अस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् बरान् वृणीष्व॥९॥


शब्दार्थ: ब्रह्मन् =हे ब्राह्मण देवता;नमस्य: अतिथि: =आप नमस्कार के योग्य अतिथि हैं; ते नम: अस्तु =आपको नमस्कार हो; ब्रह्मन मे स्वस्ति अस्तु= हे ब्राह्मण देवता, मेरा शुभ हो; यम् तिस्त्र: रात्री: मे गृहे अनश्नन् अवात्सी: =(आपने) जो तीन रात मेरे घर में बिना भोजन ही निवास किया; तस्मात् = अतएव; प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्ठ = प्रत्येक के लिए आप (कुल) तीन वर मांग लें


वचनामृत: यमराज ने कहा, हे ब्राह्मण देवता, आप वन्दनीय अतिथि हैं। आपको मेरा नमस्कार हो। हे ब्राह्मण देवता, मेरा शुभ हो। आपने जो तीन रात्रियां मेरे घर में बिना भोजन ही निवास किया, इसलिए आप मुझसे प्रत्येक के बदले एक अर्थात तीन वर मांग लें।


व्याख्या: ब्रह्मज्ञान का अधिकारी जिज्ञासु सम्मान के योग्य् होता है।सम्मान पाकर ही वह निर्भीक भाव से संवाद कर सकता है। यमराज नचिकेता को नमस्कार करते हैंतथा उचित सम्मान देकर अपने कल्याण की कामना करते हैं।वे अपने घर में तीनरात बिना भोजन रहने के दोष का परिमार्जन करने के लिए नचिकेता से तीन वर मांगने का प्रस्ताव रखते हैं।


शान्तसकल्प: सुमना यथा स्याद्वीतमन्युगौर्तमों माभि मृत्यो।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१०॥


शब्दार्थ: मृत्यो =हे मृत्यु देव;यथा गौतम: मा अभि = जिस प्रकार गौतम वंशीय उद्दालक मेरे प्रति; शान्तसंकल्प: सुमना: वीतमन्यु: स्यात् = शान्त संकल्पवाले प्रसन्नचित क्रोधरहित हो जायं; त्वत्प्रसृष्टं मा प्रतीत: अभिवदेत् =आपके द्वारा भेजा जाने पर वे मुझ पर विश्वास करते हुए मेरे साथ प्रेमपूर्वक बात करें; एतत् = यह; त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे = तीन में प्रथम वर मांगता हूं। सुयोग्य पुत्र पिता के परितोष को महत्त्व देता है।


यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्ट:।
सुखं रात्री: शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥११॥


शब्दार्थ: त्वां मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ददृशिवान् = तुझे मृत्यु के मुख से प्रमुक्त हुआ देखने पर; मत्प्रसृष्ट: आरुणि: औद्दालकि: = मेरे द्वारा प्रेरित, आरुणि उद्दालक (तुम्हारा पिता); यथा पुरस्ताद् प्रतीत: = पहले की भांति ही विश्वास करके; वीतमन्यु: भविता =क्रोधरहित एवं दु:खरहित हो जायगा; रात्री:सुखम् शयिता = रात्रियों में सुखपूर्वक सोयेगा।
वचनामृत: यमराज ने नचिकेता से कहा- तुझे मृत्यु के मुख से प्रमुक्त देखने पर मेरे द्वारा प्रेरित उद्दालक (तुम्हारा पिता) पूर्ववत विश्वास करके क्रोध एवं दु:ख से रहित हो जायगा, (जीवन भर) रात्रियों में सुखपूर्वक् सोयेगा।यमदेव की कृपा से नचिकेता मृत्यु द्वारा प्रमुक्त हुआ।वास्तव में वह यमराज के दैवी प्रसाद से मृत्युभय से विमुक्त हो गया।यह नचिकेता के ब्रह्मज्ञान द्वारा मृत्यु पर विजय की पूर्वसूचना भी है।


स्वर्गे लोक न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति।
उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शेकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१२॥


शब्दार्थ: स्वर्गे लोक किञ्चन भयम् न अस्ति = स्वर्गलोक में किञ्चित् भय नहीं है; तत्र त्वं न = वहां आप(मृत्यु) भी नहीं हैं; जरया न बिभेति= कोई वृद्धावस्था से नहीं डरता; स्वर्गलोके = स्वर्ग लोक में (वहां के निवासी ); अशनायापिपासे = भूख और प्यास; उभे तीर्त्वा = दोनों को पार करके;शोकातिग: =शोक (दु:ख) से दूर रहकर; मोदते = सुख भोगते हैं।


वचनामृत: नचिकेता ने कहा-स्वर्गलोक में किञ्चिन्मात्र भी भय नहीं है। वहां आप (मृत्युस्वरुप) भी नहीं हैं। वहां कोई जरा (वृद्धावस्था) से नहीं डरता। स्वर्गलोक के निवासी भूख-प्यास दोनों को पार करके शोक (दु:ख) सेदूर रहकर सुख भोगते हैं।वास्तव में स्वर्ग चेतना की एक उच्चावस्था है,  जब मनुष्य भय और चिन्ता से मुक्त रहता है तथा वृद्धावस्था और मृत्यु से पार चला जाता है और भूख-प्यास भी नहीं सताते। 
यह मानवीय चेतना के उच्च स्तर पर आनन्दभाव की एक अवस्था है।न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु: प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् (श्वेत० उप० २.१२)आध्यात्मिक साधक देहाध्यास (मैं देह हूं यह भाव) से मुक्त होकर ही 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति कर सकता है।


स त्वमग्नि स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यों प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥१३॥


शब्दार्थ: मृत्यो =हे मृत्युदेव;स त्वं स्वर्ग्यम् अग्निं अध्येषि = वह आप स्वर्ग-प्राप्ति के साधनरुप अग्नि को जानते हैं; त्वं मह्यम श्रद्दधानाय प्रब्रूहि =आप मुझ श्रद्धालु को (उस अग्नि को) बतायें। स्वर्गलोका: अमृतत्वं भजन्ते =स्वर्गलोक के निवासी अमरत्व को प्राप्त् होते हैं; एतद् द्वितीयेन वरेण वृणे =(मैं) यह दूसरा वर मांगता हूं।


वचनामृत: हे मृत्युदेव, वह आप स्वर्गप्राप्ति की साधनरुप अग्नि को जानते हैं। आप मुझ श्रद्धालु को उसे बता दें। स्वर्गलोक के निवासी अतृतभाव को प्राप्त हो जाते हैं। मैं यह दूसरा वर मांगता हूं।
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निवोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेत: प्रजानन्।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥१४॥


शब्दार्थ: नचिकेत: = हे नचिकेता; स्वर्ग्यम् अग्निम् प्रजानन् ते प्रब्रवीमि= स्वर्गप्राप्ति की साधनरुप अग्निविद्या को भली प्रकार जाननेवाला मैं तुम्हें इसे बता रहा हूं;तत् उ मे निबोध = उसे भली प्रकार मुझसे जान लो; त्वं एतम् =तुम इसे;अनन्तलोकाप्तिम् = अनन्तलोक की प्राप्ति करानेवाली; प्रतिष्ठाम् =उसकी आधाररुपा; अथो = तथा;गुहायाम् निहितम् = बुद्धिरुपी गुहा में स्थित (अथवा रहस्यमय एवं गूझ् ); विद्धि =समझो।
वचनामृत: हे नचिकेता स्वर्गप्रदा अग्निविद्या को जाननेवाला मैं तुम्हारे लिए भलीभांति समझाता हूं। (तुम) इसे मुझसे जान लो। तुम इस विद्या को अनन्लोक की प्राप्ति करानेवाली, उसकी आधाररुपा और गुहा मे स्थित समझो।धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्।उपनिषद् कर्मकाण्ड तथा स्वर्ग आदि को महत्त्व नहीं देते तथा अन्त:करण की शुद्धि ही कर्मकाण्ड का उद्देश्य होता है। तत्त्वज्ञान ही सर्वोच्च है।


लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्यु: पुनरेवाह तुष्ट:॥१५॥


शब्दार्थ: तम् लोकादिम् अग्निम् तस्मै उवाच = उस लोकादि (स्वर्ग-लोक की साधन-रुपा) अग्निविद्या को उस (नचिकेता )को कह दिया; या वा यावती: इष्टका: = (उसमें कुण्डनिर्माण आदि के लिए )जो-जो अथवा जितनी-जितनी ईंटें (आवश्यक होती हैं ); वा यथा = अथवा जिस प्रकार(उनका चयन हो; च स अपि तत् यथोक्तम् प्रत्यवदत् =और उस (नचिकेता)ने भी उसे जैसा कहा गया था, पुन: सुना दिया; अथ= इसके बाद; मृत्यु: अस्य तुष्ट: = यमराज उस पर संतुष्ट होकर; पुन: एव आह = पुन: बोले।


वचनामृत: उस लोकादि अग्निविद्या को उसे (नचिकेता को )कह दिया। (कुण्डनिर्माण इत्यादि में) जो–जो अथवा जितनी-जितनी ईंटें (आवश्यक होती हैं) अथवा जिस प्रकार (उनका चयन हो)। और उस (नचिकेता) ने भी उसे जैसा कहा गया था, पुन: सुना दिया। इसके बाद यमराज उस पर संतुष्ट होकर पुन: बोले।
व्याख्या: आचार्यरुप यमदेव ने स्वर्गलोक की साधनरुपाअग्निविद्या की गोपनीयता कहकर नचिकेता को उसे समझा दिया। यमदेव ने कुण्डनिर्माण आदि के लिए जिस आकर की और जितनी ईंटें आवश्यक होती हैं तथा उनका जिस प्रकार चयन होता है, यह सब समझा दिया।नचिकेता कुशाग्रबुद्धि था, अतएव उसने जैसा सुना था, वैसा ही सुना दिया।यमाचार्य ने उसकी बुद्धि की विलक्षणता से संतुष्ट होकर उसे इसके आगे भी कुछ समझाया।


तमब्रवीत प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूय:।
तवैव नामा भवितायमग्नि: सृक्ङां चेमामनेकरुपां गृहाण ॥१६॥


शब्दार्थ: प्रीयमाण: महात्मा तम् अब्रवीत् =प्रसन्न एवं परितुष्ट हुए महात्मा यमराज उससे बोले;अद्य तव इह भूय: वरम् ददामि = अब (मैं) तुम्हें यहां पुन: (एक अतिरिक्त)वर देता हूं; अयम् अग्नि: तव एव नाम्रा भविता = यह अग्नि तुम्हारे ही नाम से (प्रख्यात) होगी; च इमाम् अनेकरुपाम् सृक्ङाम् गृहाण = और इस अनेक रुपों वाली (रत्नों की )माला को स्वीकार करो।
व्याख्या: यदि गुरु शिष्य के आचरण से प्रसन्न हो जाता है तो वह उसे अपना सर्वस्व लुटा देना चाहता है। आचार्यरुप महात्मा यमराज ने परम प्रसन्न एंव परितुष्ट होकर नचिकेता को बिनाउसके मांगे हुए ही एक अतिरिक्त वर दे दिया कि वह विशेष अग्नि भविष्य में 'नाचिकेत अग्नि' के नाम से प्रख्यात होगी।अतिप्रसन्न यमराज ने नचिकेता को एक दिव्य माला (रत्नमाला) भी भेंट कर दी।


त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू।
ब्रह्मजज्ञ। देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शानितमत्यन्तमेति ॥१७॥
शब्दार्थ: त्रिणाचिकेत: = नाचिकेत अग्नि का तीन बार अनुष्ठान् करनेवाला; त्रिभि: सन्धिम् एत्य =तीनों(ऋक्, साम, यजु:वेद) के साथ सम्बन्ध जोड़कर अथवा माता, पिता, गुरु से सम्बद्ध होकर मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् (बृ० उप० ४.१.२); त्रिकर्मकृत = तीन कर्मों (यज्ञ दान तप) को करनेवाला मनुष्य;जन्ममृत्यु तरति= जन्म और मृत्यु को पार कर लेता है, जन्म और मृत्यु के चक्र से ऊपर उठ जाता है; ब्रह्मजज्ञम् =ब्रह्म से उत्पन्न सृष्टि (अथवा अग्निदेव) के जानने वाले;'ब्रह्मजज्ञ' का अर्थ अग्नि भी है, जैसे अग्नि को जातवेदा भी कहते हैं।'ब्रह्मजज्ञ' का एक अर्थ सर्वज्ञ भी है 
"ब्रह्मणों हिरण्यगर्भात् जातो ब्रह्मज:,ब्रह्मजश्चासौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञ: सर्वज्ञों हि असौ (शंकराचार्य)।"
ईड्यम देवम् = स्तवनीय अग्निदेव (अथवा ईश्वर) को;विदित्वा=जानकर; निचाय्य = इसका चयन करके इसको भली प्रकार समझकर देखकर; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति = इस अत्यन्त शान्ति को प्राप्त् हो जाता है।
वचनामृत:जो भी मनुष्य इस नाचिकेत अग्नि का तीन बर अनुष्ठान् करता है और तीनों (ऋक्, साम, यजु:वेदों) से सम्बद्ध हो जाता है तथा तीनों कर्म(यज्ञ, दान, तप) करता है, वह जन्म-मृत्यु को पार कर लेता है। वह ब्रह्मा से उत्पन्न उपासनीय अग्निदेव को जानकर और उसकी अनुभुति करके परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है।
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम्।
स मृत्यृपाशानृ पुरत: प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥


शब्दार्थ: एतत् त्रयम् = इन तीनों (ईंटो के स्वरुप संख्या और चयन विधि)को;विदित्वा = जानकर; त्रिणाचिकेत: =तीन बार नाचिकेत अग्नि का अनुष्ठान करनेवाला; य एवम् विद्वान् = जो भी इस प्रकार जाननेवाला ज्ञानी पुरुष:नाचिकेतम् चिनुते = नाचिकेत अग्निका चयन करता है; स मृत्युपाशान् पुरत: प्रणोद्य =वह मृत्यु के पाशों को उपने सामने ही (अपने जीवनकाल में ही )काटकर; शोकातिग: स्वर्गलोके मोदते = शोक को पार करके स्वर्ग लोक में आनन्द का अनुभव करता है। (मृत्युं जयति मृत्युञ्जय:)


वचनामृत: इन तीनों (ईंटों के स्वरुप संख्या और चयन-विधि) को जानकर तीन बर नाचिकेत अग्नि का अनुष्ठान करनेवाला जो भी विद्वान पुरुष नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह (अपने जीवनकाल मे ही) मृत्यु के पाशों को अपने सामने ही काटकर, शोक को पार कर, स्वर्गलोक में आनन्द का अनुभव करता है।


व्याख्या: नाचिकेत अग्निविद्या की महिमा का कथन करते हुए यमराज ने कहा कि जो भी इस विद्या का जाननेवाला विद्वान इसका अनुष्ठान करता है, वह अपने जीवनकाल मे ही मृत्यु से मुक्त होकर मृत्युञ्जय हो जाता है। वह शोक को पार कर, चेतना की उच्चावस्था में स्थित हो जाता है और दैवी आनन्द को भोग लेता है। वह स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है। वास्तव में सारे लोक सूक्ष्म रुप में अपने भीतर भी हैं।


एष तेऽग्निर्नचिकेत: स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृष्णीष्व॥१९॥


शब्दार्थ: नचिकेत:= हे नचिकेता; एष ते स्वर्ग्य: अग्नि: = यह तुमसे कही हुई स्वर्ग की साधनरुपा अग्निविद्या है; यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथा: =जिसे तुमने दूसरे वर से मांगा था; एतम् अग्निम् =इस अग्निको;जनास: =लोग;तव एव प्रवक्ष्यन्ति =तुम्हारी ही (तुम्हारे नाम से ही) कहा करेंगे;नचिकेत = हे नचिकेता; तृतीयम् वरम् वृणीष्व= तीसरा वर मांगों।


वचनामृत: हे नचिकेता, यह तुमसे कही हुई स्वर्गसाधनरुपा अग्निविधा है, जिसे तुमने दूसरे वर से मांगा था। इस अग्नि को लोग तुम्हारे नाम से कहा करेंगे। हे नचिकेता, तीसरा वर मांगों।


व्याख्या: यमराज ने नचिकेता को यह कहकर सम्मान दिय कि भविष्य में लोग इस अग्नि को 'नाचिकेत अग्नि' कहेंगे। तदुपरान्त यमराज ने नाचिकेता को तीसरा वर मांगने की अनुमति दी। नचिकेता के तीन अभीप्सित वरों मे एक सोपानात्मकता है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण वर ज्ञानात्मक है। आत्मज्ञान ही उपनिषदों का प्रयोजन एवं प्रतिपाद्य है। 
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय: ॥२०॥
 शब्दार्थ: प्रेते मनुष्ये या इयं विचिकित्सा = मृतक मनुष्य के संबंध में यह जो संशय है;एके अयम् अस्ति इति = कोई तो (कहते हैं) यह आत्मा (मृत्यु के बाद) रहता है; च एके न अस्ति इति = और कोई (कहते हैं) नहीं रहता है;  त्वया अनुशिष्ट: अहम् = आपके द्वारा उपदिष्ट मैं;एतत् विद्याम् =इसे भली प्रकार जान लूं; एष वराणाम् तृतीय: वर: = यह वरों में तीसरा वर है।
वचनामृत: मृतक मनुष्य के संबंध में यह जो संशय है कि कोई कहते हैं कि यह आत्मा(मृत्यु के पश्चात) रहता है और कोई कहते हैं कि नहीं रहता, आपसे उपदेश पाकर मैं इसे जान लूं, यह वरों मे तीसरा वर है।
एक कुमार से ऐसे गूढ प्रश्न की आशा नहीं की जा सकती।अतएव यमदेव ने नचिकेता के सच्चा अधिकारी अथवा सुपात्र होने की परीक्षा ली। यमदेव ने देर तक उसे टालने का प्रयत्न किया, किन्तु यह संभव न हो सका। इससे संवाद में रोचकता आ गयी है।


देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुवेज्ञेयमणुरेष धर्म:।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥२१॥


शब्दार्थ: नचिकेत:= हे नचिकेता; अत्र पुरा देवै: अपि विचिकित्सितम् =यहां (इस विषय में) पहले देवताओं द्वारा भी सन्देह किया गया; 
हि एष: धर्म: अणु: =क्योकि यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म है; न सुविज्ञेयम् = सरल प्रकार से जानने के योग्य नहीं है; अन्यम् वरम् वृणीष्व = अन्य वर मांग लो; मा मा उपरोत्सी: मुझ पर दवाव मत डालो; एनम् मा अतिसृज = इस (आत्मज्ञान-सम्बन्धी वर )को मुझे छोड़ दो।


वचनामृत: हे नचिकेता, इस विषय में पहले भी देवताओं द्वारा सन्देह किया गया था, क्योकि यह विषय अत्यन्त् सूक्ष्म है और सुगमता से जानने योग्य् नहीं है। तुम कोई अन्य वर मांग लो। मुझ पर बोझ मत डालो। इस आत्मज्ञान संबंधी वर को मुझे छोड़ दो।


व्याख्या: अध्यात्मविद्या दुर्विज्ञेय है। अग्निविद्या आदि कर्मकाण्ड के विषयों को समझना सरल है, किन्तु ब्रह्मविद्या का उपदेश करना और ग्रहण करना अत्यन्त कठिन है। यमदेव ने नचिकेता से कहा-यह विषय तो अत्यन्त गूढ है तथा सुगम नहीं है। अत: तुम कोइ अन्य वर मांग लों और इस वर को मुझे ही छोड़ दो। वास्तव में यमदेव ने केवल नचिकेता के औत्सुक्य को उद्दीप्त कर रहे हैं और उसकी पात्रता की परीक्षा ले रहे हैं, बल्कि उसके मन में ब्रह्मज्ञान की महिमा को प्रतिष्ठित भी कर रहे हैं।


देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यों यत्र सुविज्ञेममात्थ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यों न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥२२॥


शब्दार्थ: मृत्यों =हे यमराज;त्वम् यत् आत्थ = आपने जो कहा; अत्र किल देवै: अपि विचिकित्सितम् = इस विषय में वास्तव में देवताओं द्वारा भी संशय किया गया; च न सुविज्ञेयम् = और वह सुविज्ञैय भी नहीं है; च अस्य वक्ता = और इसका वक्ता; त्वादृक् अन्य: लभ्य: = आपके सृदश अन्य कोई प्राप्त नहीं हो सकता; एतस्य तुल्य: अन्य: कश्चित् वर: न =इस (वर) के समान अन्य कोई वर नहीं है।


वचनामृत: नचिकेता ने कहा-हे यमराज, आपने जो कहा कि इस विषय में वास्तव में देवताओं द्वारा भी संशय किया गया और वह (विषय) सुगम भी नहीं है। और, इसका उपदेष्टा आपके तुल्य अन्य कोई लभ्य नहीं हो सकता। इस (वर) के समान अन्य कोई वर नहीं है।
व्याख्या: नचिकेता अपनी गहन उत्सुकता तथा निश्चय की दृढता का परिचय देता है तथा यम द्वारा आगृह न करने के परामर्श को स्वीकार नहीं करता। वह कहता है-हे यमराज, आपका कथन ठीक है कि देवता भी आत्मतत्त्व के विषय में संशयग्रस्त हैं और निर्णय नहीं ले पाते, किन्तु आप मृत्यु के देवता हैंऔर आपके समान कोई अन्य उपदेष्टा 
यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि मृत्यु के उपरान्त् आत्मा का अस्तित्व रहता है अथवा नहीं।मेरे प्रश्न द्वारा याचित वरदान के तुल्य महत्त्वपूर्ण अन्य कुछ भी नहीं हो सकता।यह एक विचित्र संयोग है कि आपके सदृश इस विषय का कोई अन्य ज्ञाता नहीं है और अध्यात्मविद्या के वर के समान अन्य कोई वर भी नहीं हो सकता।


शतायुष: पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३॥


शब्दार्थ: शतायुष: =शतायुवाले; पुत्रपौत्रान् = बेटे पोतों को; बहून पशून् = बहुत से गौ आदि पशुओं को; हस्तिहिरण्यम् = हाथी और हिरण्य (स्वर्ग)को;अश्वान वृणीष्व =अश्वों को मांग लो; भूमें: महत् आयतनम् = भूमि के महान् विस्तार को; वृणीष्व = मांग लो; स्वयम् च = तुम स्वयं भी; यावत् शरद: इच्छसि जीव = जीवन शरद् ऋतुओं (वर्षों तक इच्छा करो, जीवित रहो।


वचनामृत: शतायु (दीर्घायु )पुत्र-पौधों को, बहुत से (गौ आदि) पशुओं को, हाथी-सुवर्ण को, अश्वो को मांग लो, भूमि के महान् विस्तार को मांग लो, स्वयं भी जितने शरद् ऋतुओं (वर्षो) तक इच्छा हो, जीवित रहो।


व्याख्या: यमराज ने नचिकेता को एक कुमार के मन की अवस्था के अनुरुप धन-धान्य मांग लेने के लिए कहा। यमराज ने उसे दीर्घायुवाले बेटे-पोते, बहुत से गौ आदि पशु, गज, अश्व, भूमि के विशाल क्षेत्र,
स्वयंकी भी यथेच्छा आयु प्राप्त करने का प्रलोभन दिया और समझाया कि वह आत्मविद्या को सीखने के लिए उसे विवश न करे।


एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च।
महाभूभौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि॥२४॥


शब्दार्थ: नचिकेता:हे नचिकेता;यदि त्वम् एतत् तुल्यम् वरम् मन्यसे वृणीष्व =यदि तुम इस आत्मज्ञान के समान (किसी अन्य) पर को मनते हो, मांग लो; वित्तं चिरजीविकाम् = धन को और अनन्तकाल तक जीवनयापन के साधनों को;व महभूमौ =और विशाल भूमि पर;एधि= फलो-फूलो, बढो, शासन करो; त्वा कामानाम् कामभाजम् करोमि = तुम्हें (समस्त कामनाओं का उपभोग करनेवाला बना देता हूँ।


वचनामृत: हे नचिकेता, यदि तुम इस आत्मज्ञान के समान (किसी अन्य) वर को मांगते हो, मांग लो –धन, जीवनयापन के साधनों को और विशाल भूमि पर (अधिपति होकर) वृद्धि करो, शासन करो। तुम्हें (समस्त) कामनाओं का उपभोग करनेवाला बना देता हूँ।


व्याख्या:यमराज नचिकेता के मन को प्रलुब्ध करने के लिए अनेक कामोपभोगों की गणना करते हैं-अपार धन, जीवनयापन के साधन, विशाल भूमि पर शासन, अनन्त कानाओं का भोगी। यमराज नचिकेता से कहते हैं कि वह आत्मज्ञान के समानकिसी भी अन्य वर को मांग ले, जिसे वह उपयुक्त समझता हो।वास्तव में यमाचार्य नचिकेता के मन मे आत्मज्ञान के प्रति उसकी उत्सुकता बढा रहे हैं और उसकी पात्रता को परख भी रहे हैं।


ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दत: प्रार्थयस्व।
इमा रामा: सरथा: सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यै:।
आभिर्मत्प्रत्ताभि: परिचारयस्व् नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षी ॥२५॥


शब्दार्थ: ये ये कामा: मर्त्यलोके दुर्लभा: (सन्ति) =जो-जो भोग मनुष्यलोक में दुर्लभ हैं; सर्वान् कामान् छन्दत: प्रार्थयस्व = उन सम्पूर्ण भोगो को इच्छानुसार मांग लो; सरथा: सतूर्या: इमा: रामा: =रथोंसहित, तूर्यों (वाद्यों, वाजों ) सहित, इन स्वर्ग की अप्सराओं को; मनुष्यै: ईदृशा: न हि लम्भनीया: =मनुष्यों द्वारा ऐसी स्त्रियॉँ प्राप्य नहीं हैं, मत्प्रत्ताभि: आभि: पिरचारयस्व = मेरे द्वारा प्रदत्त इनसे सेवा कराओ;नचिकेत:= हे नचिकेता;मरणं मा अनुप्राक्षी:=मरण (के संबंध में प्रश्न को) मत पूछो।


वचनामृत: हे नचिकेता, जो-जो भोग मृत्युलोक में दुर्लभ हैं, उन सबको इच्छानुसार मांग लो-रथोंसहित, वाद्योंसहित इन अप्सराओं को (मांग लो), मनुष्यों द्वारा निश्चय ही ऐसी स्त्रियां अलभ्य हैं। इनसे अपनी सेवा कराओ, मृत्यु के संबंध में मत पूछो।


व्याख्या:यमाचार्य अनेक प्रकार से नचिकेता के अधिकारी (सुपात्र) होने की परीक्षा ले रहे हैं तथा मानवकल्पित संपूर्ण भोगों का प्रलोभन दिखा देते हैं। वे नचिकेता से कहते हैं कि वह स्वर्ग क अप्सराओं को, स्वर्गीय रथों और वाद्यों के सहित ले जाए जो मृत्यु लोक के मनुष्यों के लिए अलभ्य हैं तथा उनसे सेवा कराए, किन्तु आत्मज्ञानविषयक प्रश्न न पूछे। किन्तु नचिकेता वैराग्यसम्पन्न और दृढनिश्चयी थाआत्मतत्त्व के सच्चे जिज्ञासु के लिए वैराग्यभाव तथा दृढनिश्चय होना आवश्यक होता है, अन्यथा वह अपनी साधना में अडिग नहीं रह सकता।


श्वो भावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेज:।
अपि सर्वम् जीवितमल्पेमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥२६॥


शब्दार्थ: अन्तक =हे मृत्यों;श्वो भावा:= कल तक ही रहनेवाले अर्थात नश्वर, क्षणिक, क्षणभंगुर ये भोग;मर्त्यस्य् सर्वेन्द्रियाणाम् यत् तेज: एतत् जरयन्ति = मरणशील मनुष्य की सब इन्द्रियों का जो तेज (है) उसे क्षीण कर देते हैं;  अपि सर्वम् जीवितम् अल्पम् एव = इसके अतिरिक्त समस्त आयु(span of Life)अल्प ही है; तव वाहा: न्त्यगीते तव एव = आपके रथादि वाहन, स्वर्ग के नृत्य और संगीत आपके ही (पास) रहें।


वचनामृत: हे यमराज, (आपके द्वारा वर्णित) कल तक ही रहनेवाले (एक ही दिन के, क्षणभंगुर) भोग मरणधर्मा मनुष्य की सब इन्द्रियों के तेज को क्षीण कर देते हैं। इसके अतिरिक्त समस्त आयु अल्प ही है। यदि कामना वासना के रहते हुए हजार वर्ष भी जिया जाय तो व्यर्थ है, निष्काम होकर जीने में ही सच्चा आनन्द है, इसलिए हे यमराज आपके रथादि वाहन, स्वर्ग के नृत्य और संगीत आप अपने ही पास रहने दें मैं इन्हें लेकर क्या करूँगा?


व्याख्या:नचिकेता ने आत्मज्ञान की अपेक्षा सांसारिक सुखभोगो को तुच्छ घोषित कर दिया। भौतिक सुखभोग इन्द्रियों की शक्ति को क्षीण कर देते हैं तथा उनसे शान्ति नहीं होती। इसके अतिरिक्त मनुष्य का जीवन अल्प और अनिश्चित है।अतएव जिस विवेकशील पुरुष के लिए सत्य साध्य है एवं प्राप्य है,  उसके लिए ये भौतिक सुखभोग त्याज्य हैं।
नचिकेता यमदेव से कह देता है कि उसे ये नश्वर भोग-पदार्थ प्रलुब्ध नहीं करते तथा इन्हें वह अपने पास ही रखे।


न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत् त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीय: स एव॥२७॥


शब्दार्थ: मनुष्य: वित्तेन तर्पणीय: न = मनुष्य धन से कभी तृप्त नहीं हो सकता;चेत्= यदि, जब कि; त्वा अद्राक्ष्म =(हमने) आपके दर्शन पा लिये हैं;वित्तम् लप्स्यामहे = धन को (तो हम) पा ही लेंगे;त्वम् यावद् ईशिष्यसि = आप जब तक ईशन(शासन) करते रहेंगे, जीविष्याम:= हम जीवित ही रहेंगे; मे वरणीय: वर: तु स एव = मेरे मांगने के योग्य वर तो वह ही है।


वचनामृत: मनुष्य धन से तृप्त नहीं हो सकता। जब कि (हमने) आपके दर्शन पा लिये हैं, धन तो हम पा ही लेंगे। आप जब तक शासन करते रहेंगे, हम जीवित भी रह सकेंगे। मेरे मांगने के योग्य वर तो वह ही है।
व्याख्या:नचिकेता ने एक परम सत्य का कथन किया है कि धन से मनुष्य की आत्यन्तिक तृप्ति नही हो सकती।उसने यमदेव को सम्मानदेते हुए कहा-जब कि हमने आपके दर्शन प्राप्त कर लिए हैं,
आपकी कृपा से धन तो हम पा ही लेंगे तथा आप जब तक शासन करते रहेंगे, हम भी तब तक जीवित रह सकेंगे। अत: धन और दीर्घायु की याचना करना व्यर्थ है।


कठोपनिषद् का पहला उपदेश नचिकेता के मुख से निस्सृत हुआ है। 
"न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य:" को कण्ठस्थ करके इसके सारतत्त्व को ग्रहण कर लेना चहिए। मनुष्य की आत्यन्तिक तृप्ति कभी धन-सम्पत्ति से नहीं हो सकती। मनुष्य धन से सुख-सुविधा के साधनों को प्राप्तकर सकता है, किन्तु आन्रिक सुख को प्राप् नहीं कर सकता। 
मनुष्य के जीवन में धन बहुत कुछ है, किन्तु सब कुछ नही है। इच्छाओं की तप्ति भोग से नहीं होती, जैसे कि अग्नि की शान्ति घृत डालने से नहीं होती, बल्कि वह अधिक उद्दीप्त हो जाती है।

न जातू काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ 
(मनुस्मृति २.९४)


भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता: 
(भर्तृहरि, वैराग्यशतक)
अर्थात भोग कभी भुक्त नहीं होते, हम भी भुक्त हो जाते हैं। कामाग्नि का शमन विवेकपूर्ण सन्तोष से ही होना संभव होता है।
'बिनु संतोष न काम नसाही।'
हूवर कमेटी द्वारा प्रस्तुत अमेरिका की अर्थसंबंधी युद्धोत्तर अन्वेषण रिपोर्ट में परम्परागत सिद्धान्त का ही प्रतिपादन किया गया कि- एक इच्छा को शान्त करने पर वह अन्य इच्छा को जन्म दे देती है तथा इच्छाओं का क्रम कभी समाप्त नहीं होता।
" The survey has provaed conclusively what has been long held theoretically to be true that wants are almost insatiable, that one want makes way for another.”
“Wants multiply."
महात्मा ईसा ने कहा था कि मनुष्य एक साथ ही भगवान् तथा धन को प्रेम नहीं कर सकता 
"Ye cannot serve God and a mammon."
ऊँट के लिए सुई में से गुजरना धनिक द्वारा परमात्मा के राज्य में प्रवेश करने की अपेक्षा सरल है।
" For it is easier for a camel to go through a needle’s eye than for a richman to enter into the kingdom of God." 

आद्यात्मिक साधक के मार्ग में धन की तृष्णा एवं धन का अभिमान बाधक हैं। उसे सादगी और संतोष से जीवन-यापन करना चाहिए। धन की लिप्सा मनुष्य को पाप में प्रवृत्त कर देती है। धन का प्रभाव धन के अभाव से अधिक दुःखदायक होता है।धन का लोभ मनुष्य को भटकाकर अशान्त बना देता है तथा धन की प्रचुरता को मदान्ध बना देती है। 
"कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। 
वह खाये बौराय जग यह पाये बौराय "
(बिहारी)। 
धन की प्रचुरता प्रायः मनुष्य को विलासिता, दुर्व्यसन, अपराध, हिंसा और अशान्ति की ओर ले जाती है। वास्तव में धन में दोष नहीं है, धन की लिप्सा एवं आसक्ति में दोष होता है। मनुष्य धन के सदुपयोग से दीन दुःखी जन की सेवा आदि लोक-कल्याण के कार्य कर सकता है। 
अतः हमें त्यागपूर्वक भोग करना चाहिए। ईशावास्य उपनिषद् में इसी भाव को सूत्रात्मक रूप से कहा गया है
-तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।
सन्त कबीर ने संतोषवृत्ति की प्रशंसा में कहा था-साँईं इतना दीजिये, जामें कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा ना मरूँ साधु न भूखा जाय
परिश्रम और सच्चाई से धन अर्जित करना, जो भी प्राप्त हो जाय उसमें सन्तोष करना तथा उसका सदुपयोग करना विवेकसम्मत है। 
यदृच्छालाभसन्तुष्टों (गीता, ४.२२)
यह एक तथ्य है कि मनुष्य सब कुछ यहीं एकत्रित करता है और सब कुछ यहीं छोड़कर सहसा चला जाता हैं।यदि सब कुछ छूटना है तो हम उसे स्वयं ही छोड़ दें अर्थात् उसके ममत्व, स्वामित्व और आसक्ति के भाव को छोड़कर भारयुक्त हो जाएँ। सब धन परमात्मा का ही है। 
अतः 'इदं न मम' (यह मेरा नहीं है। ) की भावना को शिरोधार्य करके धन का उपभोग एवं सदुपयोग करना सब प्रकार से श्रेष्ठ है। निश्चय ही आत्मज्ञान की अपेक्षा धन अत्यन्त तुच्छ है। बृहदारण्यक उपनिषद् में मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य ऋषि से पूछा-यदि यह धन से सम्पन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाये तो क्या मैं अमर हो सकती हूँ? 
याज्ञवल्क्य ने कहा -भोग-सामग्रियों से सम्पन्न मनुष्यों का जैसा जीवन होता है,वैसा ही तेरा जीवन भी हो जाएगा। धन से अमृतत्व की तो आशा ही नहीं।'अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेन।'
मैत्रेयी ने कहा-जिससे मैं अमृता नहीं हो सकती, उसे लेकर क्या करूँगी? मुझे तो अमृतत्व का साधन बतलाएं। 
'येनाहं नामृतास्यां किमहं तेन कुर्याम्?
यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहि।' 
जीवन का उद्देश्य तो अमृतस्वरूप आत्मा को जानकर अमृतत्व प्राप्त करना है। उपनिषदों में अनेक स्थलों पर अमृतत्व की चर्चा है। जीवनकाल में आत्मतत्त्व को जानकर अमृतत्व प्राप्त करना ही उत्तम धन है। यही मानव की सर्वोच्च उपलब्धि भी है।


अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः व्कधःस्थः प्रजानन्।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानदीर्घे जीविते को रमेत ॥२८॥


शब्दार्थः जीर्यन् मर्त्यः = जीर्ण होनेवाला मरणधर्मा मनुष्य;अजीर्यताम् अमृतानाम् = वयोहानिरूप जीर्णता को प्राप्त न होनेवाले अमृतों (देवताओं, महात्माओं) की सन्निधि में,निकतटता में;उपेत्य= प्राप्त होकर, पहुँचकर; प्रजानन्= आत्मतत्त्व की महिमा का जाननेवाला 
अथवा उन (देवताओं, महात्माओ) से प्राप्त होनेवाले लाभ को जाननेवाला;व्कधःस्थः=व्कधः (कु=पृथ्वी, अन्तरिक्ष आदि से अधः,
नीचे होने के कारण पृथ्वी व्कधः कहलाती है-शंकराचार्य) में स्थित व्कधःस्थ, नीचे पृथ्वी पर स्थित होकर; कः= कौन; वर्णरतिप्रमोदान् अभिध्यायन् रूप, रति और भोगसुखों का ध्यान करता हुआ (अथवा उनकी व्यर्थता पर विचार करता हुआ); अतिदीर्घे जीविते रमेत=
अतिदीर्घ काल तक जीवित रहने में रुचि लेगा।(इस श्लोक के अनेक अन्वय और अर्थ किए गए हैं।
वचनामृतः जीर्ण होनेवाला मरणधर्मा मनुष्य, जीर्णता को प्राप्त न होनेवाले देवताओं (अथवा महात्माओं) के समीप जाकर, आत्मविद्या से परिचित होकर, (अथवा महात्माओं से प्राप्त होनेवाले लाभ को सोचकर) पृथ्वी पर स्थित होनेवाला, कौन भौतिक भोगों का स्मरण करता हुआ (अथवा उनकी निरर्थकता को समझता हुआ) अतिदीर्घ जीवन में सुख मानेगा?
व्याख्याः नचिकेता कुमारावस्था में ही बुद्धि की परिपक्वता एवं जिज्ञासा की गहनता का परिचय देता है। वह यमदेव से कहता है कि जीर्ण हो जानेवाला तथा मृत्यु को प्राप्त होनेवाला, मृत्युलोक में रहनेवाला,कौन मनुष्य जीर्ण न होनेवाले अमृतस्वरूप महात्माओं का संग पाकर भी भौतिक भोगों का चिन्तन करते हुए दीर्घकाल तक जीवित रहने में रुचि लेगा? यमराज जैसे महात्मा का सान्निध्य पाकर भी भोगों का चिन्तन करने की मूर्खता कौन विवेकशील मनुष्य करेगा? मृत्युलोक में रहनेवाले मरणधर्मा मनुष्य के लिए यमराज के सान्निध्य में आकर आत्मज्ञान की प्राप्ति से बढ़कर अन्य कौन-सा सौभाग्य हो सकता है? 
नचिकेता ने आत्मज्ञान के लिए आवश्यक वैराग्यभाव को प्रदर्शित करके स्वयं को उपदेश का सच्चा अधिकारी सिद्ध कर दिया।यह प्रसिद्ध ही है कि विषय-वासना औरभौतिक वस्तुओं की तृष्णा से ग्रस्त मनुष्य आत्मज्ञान की साधना नहीं कर सकता। नचिकेता सत्य का गंभीर अनुसंधाता है तथा संसार के सुखभोगों को तुच्छ समझ कर उनका परित्याग करने पर दृढ़ है। वह मात्र दीर्घजीवी नहीं, दिव्यजीवी होना चाहता है।


यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत्।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥


शब्दार्थः मृत्यो=हे यमराज; यस्मिन् इदम् विचिकित्सन्ति= जिस समय यह विचिकित्सा (सन्देह, विवाद) होती है; यत् महति साम्पराये = जो महान् परलोक-विज्ञान में है; तत्=उसे; नः ब्रूहि=हमें बता दो; यः अयम् गूढम् अनुप्रविष्टः वरः= जो यह वर (अब) गूढ रहस्यमयता को प्रवेश कर गया है (अधिक रहस्यपूर्ण एवं महत्त्वपूर्ण हो गया है); तस्मात् अन्यम्= इससे अतिरिक्त अन्य (वर) को; नचिकेता न वृणीते= नचिकेता नहीं माँगता। (इस श्लोक के भी अनेक अन्वय और अर्थ किए गए हैं। )


वचनामृतः हे यमराज, जिस विषय में सन्देह होता है, जो महान् परलोक-विज्ञान में है, उसे हमें कहो। जो यह (तृतीय) वह है, (अब) गूढ रहस्यमयता में प्रवेश कर गया है (अधिक रहस्यपूर्ण हो गया है)। उसके अतिरिक्त अन्य (वर को) नचिकेता नहीं माँगता।
व्याख्याः नचिकेता अपने निश्चय पर दृढ़ है तथा कोई प्रलोभन उसे विचलित नहीं कर सकता। यमराज जैसे उपदेष्टा के सान्निध्य का स्वर्णिम अवसर प्राप्त करके वह उसे खोना नहीं चाहता। यमराज ने जितने भी प्रलोभन प्रस्तुत किए,नचिकेता ने उन सबको तुच्छ एवं हेय कह दिया। आत्मतत्त्व के ज्ञान से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं हो सकता। साभार (कठोपनिषद् दिव्यामृत 11From WikisourceJump to: navigation, searchकठोपनिषद् दिव्यामृतलेखक - शिवानन्द )}





     

Friday, May 21, 2010

' गोपाल ' के प्रति झुकाव [22]" आज भी अघटन घटित होता है ! "

पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता के कूप्रभाव को देखकर, १०० वर्ष पहले के - ' वर्तमान भारत ' को सावधान करने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानन्द ने ' स्वदेश मंत्र ' देते हुए कहा था - " हे भारत ! यह परानुवाद, परानुकरण, परमुखापेक्षा , इसी दास-सुलभ दुर्बलता, इसी घृणित जघन्य निष्ठूरता के बल पर तुम उच्चाधिकार प्राप्त करोगे ? (य़ा विश्व महासभा में उच्चासन ग्रहण करोगे?)  

स्वामीजी के इस चेतावनी को उस समय किसने सुना ? काश, यदि भारत उनकी इस चेतावनी को सुनकर तभी सावधान हो गया होता !आज का भारतवर्ष ( वर्ष १९८५ में १२ जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित करने के बाद से) थोड़ा- बहुत " विवेकानन्द, विवेकानन्द " करने लगा है| किन्तु किस कारण से उनको याद कर रहा है- यह बात मैं ठीक से समझ नहीं पाता हूँ| जिन सब लोगों य़ा संगठनों के मुख से ' विवेकानन्द, विवेकानन्द ' का नाम उच्चारित हो रहा है, उनका उद्देश्य बहुत स्पष्ट नहीं है| 
एक बार स्वामी विवेकानन्द ने एक पत्र में उलाहना देते हुए लिखा था- " भारतवर्ष के असंख्य मनुष्य मुझे समझ नहीं सके हैं! " स्वामीजी ने जिस पत्र में यह बात लिखी थी, वह बहुत पुरानी चिट्ठी है, याद पड़ता है कि वर्ष १८९४-९५ में किसी समय का पत्र होगा| यह बात आज भी उतनी ही सत्य है, आज भी भारतवर्ष स्वामी विवेकानन्द को समझ नहीं पाया है| फिर भी कुछ लोग क्यों " स्वामीजी, स्वामीजी " कर रहे हैं,यह बात स्पष्ट नही होती !
परन्तु किसी सच्चे देश-प्रेमी संस्था य़ा व्यक्ति को यह बोध हो जाय कि - " देश से भ्रष्टाचार मिटाने का एक मात्र उपाय है, यहाँ के नागरिकों का चरित्र निर्माण! "वैसा व्यक्ति यदि स्वामीजी की शिक्षा को अपनाकर स्वयं मनुष्य बने और दूसरों को भी मनुष्य बनाने के उद्देश्य से उनकी चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को भारत के गाँव-गाँव तक फैला देने के लिये व्याकुल हो उठे ! 
और उसके मन में रात-दिन यदि केवल यही प्रश्न उमड़ता-घुमड़ता रहे, कि किस उपाय से यथार्थ रूप में देश का नवनिर्माण संभव हो सकता है?  तब " विवेकानन्द,विवेकानन्द " का नाम उच्चारित करना अनिवार्य हो जाता है ! 
क्योंकि ' मूर्तमान-चरित्र ', ' चिर-युवा स्वामी विवेकानन्द ' के जैसा युवा आदर्श (Youth Model ), युवा नेता (Youth Leader ) अन्य दूसरा कोई भी नहीं है!! इसी तथ्य को स्वीकार करके भारत सरकार ने भी उनके जन्म-दिवश १२ जनवरी को भारत का राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया है !    
देश का अर्थ क्या है ? देश का अर्थ होता है देश के मनुष्य ! देश की धरती ही देश नहीं है ! देश-प्रेम का अर्थ है देश-वासियों से प्रेम ! 
देश की मिट्टी से प्रेम करना बहुत अच्छी बात है |किन्तु देश की उसी माटी पर जितने भी मनुष्य जन्म ग्रहण किये है, जो भारत माता की संतानें (हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई हैं) हैं, जो हमारे भाई हैं, जो भारतवासी हैं ! - उन भारतवासियों के जीवन को सुन्दर रूप से गठित कर उन्हें ' यथार्थ- मनुष्य ' य़ा ' योग्य- नागरिक ' के रूप में परिणत करना होगा हमसबों का पुनीत कर्तव्य है ! 
क्योंकि भारत महान तब होगा - जब इसके नागरिकों का चरित्र भी महान होगा! और हम भी गर्व से भर कर कह सकेंगे -  ' हमारा भारत महान !'  किन्तु प्रश्न यह है कि, इन भारत-वासियों -  " भारत-माता की सन्तानों " -  के चरित्र का निर्माण कर उन्हें यथार्थ ' मनुष्य ' बनाने अथवा" योग्य नागरिक के रूप गढ़ने की जिम्मेदारी " को उठाने के लिये, कौन आगे आयेगा ?" पूरे समाज को यह उत्तरदायित्व सार्वजनिक तौर पर उठाना होगा ! " (जैसे हमलोग ' सार्वजनिक दुर्गा पूजा-समिति ' बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार पूरे समाज को सार्वजनिक तौर इस जिम्मेदारी को भी मिल-जुल कर उठाना होगा!)

{फरवरी १८९७ में जब स्वामीजी मद्रास में थे तब, ' मद्रास टाइम्स ' नामक समाचार पत्र का एक प्रतिनिधि ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा था- ' आप भारत के पुनर्जागरण के लिये क्या करना चाहते हैं? '
इसके उत्तर में स्वामीजी कहते हैं- " ...हम कितनी ही राजनीति बरतें, उससे उस समय तक कोई लाभ नहीं होगा, जब तक कि भारत के सभी नागरिक (य़ा भारत का जनसमुदाय) एक बार फिर सुशिक्षित, सुपोषित और सुपालित नहीं होता |
..यदि हम भारत को पुनर्जीवित करना ( महान बनाना ) चाहते हैं, तो हमें उनके लिये काम करना होगा| मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमे से आयेंगे| सिंहों की भाँती वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे|मैंने अपना ' उद्देश्य ' निर्धारित कर लिया है और उसके लिये अपना समस्त जीवन दे दिया है |
दि मुझे सफलता नहीं मिलती, तो मेरे बाद कोई अधिक उपयुक्त व्यक्ति( श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय जैसा, जैसा ......infinite युवा ?) आयेगा और इस काम को सँभालेगा, और मैं अपना संतोष प्रयत्न करने में ही मानूंगा| 
आपके- अर्थात ' भारत के युवओं 'के सामने है - जनसमुदाय को उसका अधिकार देने (के पहले उन्हें योग्य नागरिक के रूप में प्रशिक्षित करने ) की समस्या ?(नहीं , परम उत्तरदायित्व है ! ) ये (प्रशिक्षित ) ' हृदयवान युवा '  - अर्थात ' आध्यात्मिक-शक्ति सम्पन्न युवा !' हमारे जनसमुदाय( भारतवासियों) के दोनों प्रकार के-(परा और अपरा) आध्यात्मिक और लौकिक विद्या प्रदान करने में समर्थ शिक्षक (नेता य़ा मार्गदर्शक) होंगे| वे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र में उस समय तक फैलेंगे, जब तक कि हम सम्पूर्ण भारत पर नहीं छा जायेंगे|" (वि० सा० ख० ४: २६०-६१) }

" 3H-निर्माण की शिक्षा " का अर्थ  :
एवं इस अनिवार्य -उत्तरदायित्व को सार्वजनिक रूप से अपने कन्धों पर उठाने के लिये, हमे  स्वामीजी से शरीर(Hand ) और मन (Head )को विकसित कराने के साथ-साथ ह्रदय(Heart ) को भी विकसित करने की शिक्षा भी अवश्य ग्रहण करनी होगी!
अन्यत्र स्वामीजी कहते हैं-" मैं शिक्षा को गुरु के साथ सम्पर्क, ' गुरु-गृहवास ' (योग्य गुरु के सानिध्य में ' ह्रदय के विस्तार करने हेतु ' लिया जाने वाला युवा प्रशिक्षण शिविर) समझता हूँ| गुरु के व्यक्तिगत जीवन के आभाव में शिक्षा नहीं हो सकती| अपने विश्वविद्यालयों को ही लीजिये| अपने ६३ वर्ष के अस्तित्व में उन्होंने क्या किया है ? उन्होंने एक भी मौलिक व्यक्ति पैदा नहीं किया| वे केवल परीक्षा लेने की संस्थाएँ हैं| 
भारतवासिओं के कल्याण के लिये अपने जीवन को भी न्योछावर कर देने की भावना का अभी हमारे राष्ट्र में विकास नहीं हुआ है| " ( ४: २६२)}
अपने ह्रदय को बड़ा बनाने,अर्थात " ह्रदय के विस्तार को " ही   'आध्यात्मिकता' कहते हैं|' आध्यात्मिकता ' का अर्थ है-सबसे- (हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई) प्रेम करने की शक्ति ! य़ा आध्यात्मिक शक्ति! और आध्यत्मिकता के विस्तार से ही - ह्रदय का विस्तार होता है !

किन्तु वैसा ह्रदय कहाँ है, हृदय तो सूख गया है| क्योंकि हम सभी लोग ' वैश्वीकरण ' के नाम पर - पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता का अनुकरण करने के होड़ में दौड़े चले जा रहे हैं! आज का भारत - अपनी उसी गुलामी वाली मानसिकता य़ा " दास सुलभ दुर्बलता " के कारण  १०० वर्ष पहले के 'वर्तमान-भारत ' की अपेक्षा और भी अधिक " अमेरिका-परस्त " बन चुका है! तथा अपनी ' त्याग की महिमा पर आधारित ' अति प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भूल कर, " कामिनी-कांचन के भोग- " Eat , Drink and be marry ! " को ही अपना परम पुरुषार्थ मानने लगा है|
 आज का भारतवासी दिग्भ्रमित होकर भोग, भोग और केवल 'भोग करने की लालच' में फंस कर एक-दूसरे से अधिक भोगसामग्री इकठ्ठा करने की होड़ में दौड़ा चला जा रहे हैं| जिसके फलस्वरूप हमारा ह्रदय सूख कर रेगिस्तान बन गया है |( अपने किसी भी देशवासी के भूख से हुई मौत को देख-सुन कर भी अब कोई प्रतिक्रिया नहीं होती ! हमारा ह्रदय विकसित होने के बजाय सिकुड़ता जा रहा है !) 
यदि हमे फिर से ' हृदयवान मनुष्य ' बनना है, तो इस भोगवादी संस्कृति से हमे दूर होना ही होगा अन्य कोई उपाय नहीं है !   अन्य कोई उपाय नहीं है !! 
स्वामीजी कहते हैं- " हमारी कार्य-विधि (कार्यक्रम) बहुत सरलता से बतायी जा सकती है| वह केवल राष्ट्रीय जीवन को पुनः स्थापित करना है|बुद्ध ने 'त्याग' का प्रचार किया था| भारत ने सुना और फिर केवल छः शताब्दियों में वह अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गया|( पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति का ) भेद यहाँ है ! भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं : त्याग और सेवा ! आप इसकी इन धाराओं में तीव्रता उत्पन्न कीजिये, और शेष सब अपने आप ठीक हो जायेगा| इस देश में आध्यात्मिकता का झंडा कितना ही ऊँचा क्यों न किया जाय, वह पर्याप्त नहीं होता| केवल इसीमे भारत का उद्धार निर्भर करता है! " (वि० सा० ख० ४: २६५)}
(नवनी दा कहते हैं- JNKPH पेज ४६ :)
आशैशव (बचपन से ही ) सबों के (मन में ) भीतर अच्छे भाव भरने की चेष्टा करना अत्यन्त आवश्यक है| मुझे अपने बचपन की बहुत सारी स्मृति तो नहीं है, किन्तु मेरे चित्त में एक स्मृति आज भी इतनी प्रगाढ़ है, जिसे मैं इस उम्र में भी भूल नहीं सका हूँ !
प्रतिदिन रात्रि के समय जब सोने जाता तो नींद आने में देरी होती थी, दोपहर के समय में भी विश्राम करना य़ा सोना नहीं चाहता था| मुझे याद है कि, दोपहर के समय में माँ बंकिमचन्द्र के ' आनन्दमठ ' से थोड़ा-थोड़ा पढ़ करके भैया को और मुझको सुनाया करतीं थीं|
  
पूरी पुस्तक को सुना देने के बाद माँ ने कहा था -  " बन्किमचंद्र द्वारा लिखित पुस्तक - आनन्दमठ   बहुत अच्छी ( देश-भक्ति बढ़ाने वाली) चीज है, इसीलिये तुम दोनों को पढ़ कर सुना दी हूँ, किन्तु इस प्रकार कि पुस्तकों को ' उपन्यास ' कहते हैं, और उपन्यास पढना अच्छी बात नहीं है |" 

 मैंने जीवन में एक भी उपन्यास नहीं पढ़ा है| शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के द्वारा लिखे गये उपन्यास तो जगत-प्रसिद्ध हैं , किन्तु मुझे याद नहीं आता कि मैंने अपने जीवन में कभी भी शरतचंद्र के किसी भी पुस्तक को अपने हाथ में लिया हो| अन्य कोई भी उपन्यास नहीं पढ़ा हूँ|हाँ कभी कभी कोर्स के रूप में किसी किसी उपन्यास का अंश-विशेष दिया रहता तो पढना पड़ता था, दूसरा उपाय नहीं था| किन्तु जिसको उपन्यास पढना कहा जाता है, वैसा जीवन में कभी नहीं पढ़ा हूँ|

रात्रि के समय सोने में देरी करता था, मैं जल्दी से सोना नहीं चाहता था; हमलोगों में यह तय था, कि माँ पहले एक कहानी सुनाएगी, तब मैं सो जाऊंगा!एवं कहानियाँ सुनना मुझे बहुत पसन्द था|मेरी माँ अक्सर मुझे ' बालक ध्रुव ' की कहानी सुनाया करती थीं| मैं बालक-ध्रुव की कहानी सुनता, सुनकर रुलाई आ जाती और रोते रोते सो जाता था| माँ ध्रुव की कहानी का प्रारम्भ इस प्रकार किया करती थी- " ध्रुव भगवान के बड़ भाल बासतेन |"अर्थात " ध्रुव भगवान को बहुत प्यार करते थे !"
 
मै पूछता था- ' माँ, भगवान कहाँ रहते हैं? ' भगवान को कहाँ पाया जाता है ? माँ कहती- " भगवान सबों के सामने तो यूँ ही घूमते-फिरते नहीं रहते, भगवान जंगल-टंगल में रहते हैं, उनको यदि पूरे मन से चाहा जाय और उनकी खोज में निकल पड़ा जाय, तब उनको पाया जा सकता है |" तारपरे ध्रुव बलतो - " ताहले आमि जाब बने, ताहले आमि जाब बने | "  
उसके बाद बालक-ध्रुव कहते - " ऐसी बात है तो मैं जंगल में जाऊँगा, तब मैं जंगल में जाऊंगा !" (देखिये भारतीय-संस्कृति में बालक ध्रुव की कथा के माध्यम से बचपन में ही त्याग की महत्ता को कैसे भरा जाता है !) 
एक दिन ऐसा हुआ कि कहानी सुनाते सुनाते माँ ने सोचा कि ध्रुव भी सो गये हैं, इसलिए माँ पहले ही सो गयीं| किन्तु ध्रुव सोया नहीं था, जागा हुआ था|  वह उठा और दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया| चलते चलते बहुत दूर निकल गया, रास्ते में एक घना जंगल मिला, वह उसमे प्रविष्ट होकर - " भगवान तुम कहाँ हो, भगवान तुम कहाँ हो " करने लगा| 
प्रत्येक दिन यहीं तक की कहानी सुनने से ही रुलाई आ जाती थी, और मैं नींद में सो जाता था| बचपन की इससे प्रगाढ़ स्मृति और कोई याद नहीं पड़ती है |
{ बालक ध्रुव
राजा उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो भार्यायें (पत्नियाँ ) थीं। राजा उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुये। यद्यपि सुनीति बड़ी रानी थी किन्तु राजा उत्तानपाद का प्रेम सुरुचि के प्रति अधिक था। एक बार उत्तानपाद ध्रुव को गोद में लिये बैठे थे कि तभी छोटी रानी सुरुचि वहाँ आई। अपने सौत के पुत्र ध्रुव को राजा के गोद में बैठे देख कर वह ईर्ष्या से जल उठी।

झपटकर उसने ध्रुव को राजा के गोद से खींच लिया और अपने पुत्र उत्तम को उनकी गोद में बैठाते हुये कहा, "रे मूर्ख! राजा के गोद में वह बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ है। तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है इस कारण से तुझे इनके गोद में तथा राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार नहीं है। "
पाँच वर्ष के बालक ध्रुव को अपनी सौतेली माता के इस व्यहार पर बहुत क्रोध आया पर वह कर ही क्या सकता था? इसलिये वह अपनी माँ सुनीति के पास जाकर रोने लगा। 

सारी बातें जानने के पश्चात् सुनीति ने कहा, "बेटा ध्रुव! तेरी सौतेली माँ सुरुचि से अधिक प्रेम होने के कारण तेरे पिता हम लोगों से दूर हो गये हैं। अब हमें उनका सहारा नहीं रह गया है। तू भगवान को अपना सहारा बना ले। 
सम्पूर्ण लौकिक तथा अलौकिक सुखों को देने वाले भगवान नारायण के अतिरिक्त तुम्हारे दुःख को दूर करने वाला और कोई नहीं है। तू केवल उनकी भक्ति कर।"

माता के इन वचनों को सुन कर ध्रुव को कुछ ज्ञान उत्पन्न हुआ और वह भगवान की भक्ति करने के लिये पिता के घर को छोड़ कर चल दिया। मार्ग में उसकी भेंट देवर्षि नारद से हुई। नारद मुनि ने उसे वापस जाने के लिये समझाया किन्तु वह नहीं माना। तब उसके दृढ़ संकल्प को देख कर नारद मुनि ने उसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र की दीक्षा देकर उसे सिद्ध करने की विधि समझा दी। 
 उधर बालक ध्रुव ने यमुना जी के तट पर मधुवन में जाकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र के जाप के साथ भगवान नारायण की कठोर तपस्या की। अत्यन्त अल्पकाल में ही उसकी तपस्या से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन देकर कहा, "हे राजकुमार! मैं तेरे अन्तःकरण की बात को जानता हूँ। तेरी सभी इच्छायें पूर्ण होंगी। 
तेरी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुझे वह लोक प्रदान करता हूँ जिसके चारों ओर ज्योतिश्चक्र घूमता रहता है तथा जिसके आधार पर यह सारे ग्रह नक्षत्र घूमते हैं। प्रलयकाल में भी जिसका नाश नहीं होता। सप्तर्षि भी नक्षत्रों के साथ जिसकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। तेरे नाम पर वह लोक ध्रुवलोक कहलायेगा। इस लोक में छत्तीस सहस्त्र वर्ष तक तू पृथ्वी का शासन करेगा।बालक ध्रुव को ऐसा वरदान देकर भगवान नारायण अपने लोक को चले गये।( सूख सागर के सौजन्य से)}
 दूसरी घटना जो याद आती है- वह है घर में जितनी भी पूजा-पाठ आदि हुआ करते थे, उन सबको बहुत ध्यान से देखना और सुनना भी मुझे बहुत पसन्द था| 

पूजा-घर में पितामह जिस चौकी पर माँ काली की पूजा करते थे, उसी चौकी के एक छोर पर गोपाल की मूर्ति भी रखी  है |ये वही गोपाल हैं जो, एक साधु की छाती से बन्धे हुए थे, और जिन्होंने पूरे भारतवर्ष का भ्रमण कर लिया है,( जिसे मेरी पितामही को दे कर चले गये थे!) पितामह को कालीपूजा करते देख कर मुझमे इन्ही ' गोपाल ' के प्रति झुकाव उत्पन्न हो गया| 
पितामह जब काली-पूजा कर रहे होते तो मैं जिद पकड़ लेता कि मैं भी गोपाल की पूजा करूँगा! और मैं इस बात के लिये भी जिद करता था कि, माँ काली के लिये जैसा जैसा भोग बनेगा, गोपाल लिये भी वैसा वैसा ही भोग देना होगा !
माँ काली की पूजा के बीच में पितामह, कुछ देर तक 'चंडीपाठ' ( दुर्गा सप्तसदी का पाठ ) भी किया करते थे| मेरे पास भी अपनी एक ' छोटी सी चंडी 'थी जो मात्र ' दो इंच चौड़ी ' थी; मैं गोपाल के सामने उसी चंडी का पाठ किया करता था|पितामह माँ काली के सामने चंडी का पाठ करते और मैं गोपाल के सामने चंडी का पाठ करता|
  
जितना जितना भोग माँ काली के लिये बनेगा, उतना ही भोग गोपाल को भी देना होगा, यही मेरी जिद थी|हमलोगों के घर में ऐसी प्रथा थी कि काली पूजा के समय बाहर के लोग, प्रायः कभी नहीं उपस्थित रहते थे, केवल घर के लोग ही पूजा में शामिल होते थे; और जितना भी भोग बनता था, वह समस्त भोग ही भगवान को निवेदित कर दिया जाता था| 

जिस प्रकार परात में भोग दिया जाता है, वैसे किसी बड़ी थाली में सजा कर भोग चढाने की प्रथा हमलोग के यहाँ नहीं थी| इतने बड़े से पीतल की हाँडी में खिचड़ी बना तो, उस पूरी हाँडी को ही दो आदमी उठाकर पूजाघर में रख आते थे| 
पूड़ियाँ छान ली गयीं, तो समस्त पूड़ियों को भी एक बेंत की बड़ी सी टोकरी में भर कर - वहीं भगवान के सामने रख दिया जाता था|अन्य कोई सब्जी-भाजी य़ा पायस इत्यादि जो कुछ भी भोग बनाया जाता था वह सबकुछ को वैसे ही पूरा का पूरा ठाकुर (भगवान) को अर्पित कर दिया जाता था|

मेरी जिद के अनुसार,निकट में ही गोपाल के लिये भी एक छोटी सी हाँडी में खिचड़ी, एक छोटी सी कटोरी में पायस, छोटी सी तस्तरी में अन्य सब्जी- भाजी, छोटी सी एक बेंत की टोकरी में पूड़ियाँ- ये सब कुछ देना ही होगा|
एकबार काली पूजा के समय गोपाल को- बेंत की ' छोटी टोकरी' में भर कर पूड़ियाँ नहीं दी गयीं| मैंने माँ से पूछा- ' गोपाल की पूड़ियाँ कहाँ हैं?' माँ ने कहा - शायद उस समय नजदीक में कोई टोकरी नहीं थी,य़ा शायद उसमे अन्य कोई सामग्री भर कर रख दी गयी हो; मुझे बहलाने के लिये माँ ने कहा, " तुम वह सब मत सोंचो, गोपाल स्वयं माँ काली की टोकरी से पूड़ी निकाल कर खा लेंगे|" मै यह सुनकर संतुष्ट हो गया
रात्रि में पूजा हुई| पूजा के बाद घर के सभी सदस्यों ने प्रसाद ग्रहण किया, और सोने चले गये|माँ काली के पूजा के कमरे के सामने वाले एक कमरे में ही पितामह भी रहा करते थे| प्रातः काल नींद से उठते ही 
वे पूजा के कमरे (ठाकुर-घर) की सिंकड़ी खोल देते, और ठाकुर के कमरे में जा कर प्रणाम करने के बाद ही कहीं जाते|और वह दिन हम सबों के लिये बड़े आनन्द का दिन था|
पूजा के बाद, जब हमलोग उनको प्रणाम करते तो हमलोगों के पीठ पर हाथ रख कर प्रेम-जतलाते हुए स्पर्श करते थे, य़ा जब बहुत छोटे थे तो गोदी में बैठा लेते थे|हम लोग उनके उसी एक बार के स्नेहिल- स्पर्श, उनके शरीर का स्पर्श प्राप्त करने की प्रतीक्षा में रहते थे| 
सुबह-सुबह दरवाजा खोल कर ठाकुर-घर (पूजा के कमरे) में जो दृश्य देखे तो आश्चर्य चकित हो गये! आश्चर्य से स्तंभित हो कर,
                  वहीं से खड़े होकर माँ को आवाज दिये - " बोउमा, एइदिके एसो, देखे जाउ ! " वहाँ जाने पर देखा गया कि, माँ काली की जिस बड़ी टोकरी से घर के सदस्यों को देने के लिये खिचड़ी-उचड़ी सब भोग से थोड़ा थोड़ा निकाल लिया गया था|उसके बाद जितना भी  भोग बचा रहता था, वह सब वैसे ही रहता था, यही हमारे घर की रीति थी| 
किन्तु वहाँ जाने पर देखा गया कि माँ काली की उतनी बड़ी बेंत की टोकरी में जितनी भी पूड़ियाँ बची हुई थीं, सब की सब लगभग समाप्त हो गयीं थीं, और उस टोकरी में पूड़ी के एक-आध टुकड़े ही पड़े हुए हैं| और पूड़ियों के छोटे-छोटे टुकड़े उस टोकरी से शुरू होकर गोपाल की चौकी तक कतार में बिछे हुए थे!
माँ जाकर देखी, तो आश्चर्य से आवाक रह गयीं! हम सभी लोगों को पुकारीं| हमलोग भी पूजा के कमरे में जो देखे तो आश्चर्य चकित हो गये! यह (अघटन) तो मैंने अपनी आँखों से घटित होते देखा है, इसीलिये इसको तो मैं अस्वीकार नहीं कर सकता! 
इसीलिये कहना पड़ता है - " आज भी अघटन घटित होता है !! "