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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

" सांख्य एवं वेदान्त " (स्वामी विवेकानन्द द्वारा १५ जनवरी १८९६ को न्यूयार्क में दिया गया भाषण)

" अंतःप्रज्ञा ( intuition), तर्कशील बुद्धि (reason) या सहज-वृत्ति (instinct) "
 पिछले वक्तव्य में हम जिस सांख्य-दर्शन पर विचार कर रहे थे, उसके सारांश (resume) को संक्षेप में पुनः एक बार कहूंगा।  इस व्याख्यान में हम यह दिखलाना चाहते हैं कि सांख्य-दर्शन की अपूर्णता कहाँ है, और वेदान्त ने आकर उन कमियों को किस प्रकार परिपूर्ण कर दिया है ?  तुमको स्मरण होगा कि सांख्य दर्शन के अनुसार -विचार, बुद्धि, तर्क, राग, द्वेष, स्पर्श, रस, इन्द्रिय, तन्मात्रा, (शरीर से संलग्न आँख, नाक आदि स्थूल यन्त्र, ) इन सब अभिव्यक्तियों का कारण एक मात्र प्रकृति ही है। यह प्रकृति सत्व, रज और तम नामक तीन प्रकार के तत्वों से गठित है। ये तीनों गुण (लक्षण,विशेषता या qualities) नहीं हैं, बल्कि तत्व (elements) हैं, जगत् के उपादान हैं, जिनसे समग्र ब्रह्माण्ड विकसित हुआ है। कल्प के प्रारम्भ में ये तीनों उपादान संतुलन (equilibrium या साम्य ) की अवस्था में रहते हैं, और जब सृष्टि का प्रारम्भ होता है, ये उपादान परस्पर संघटित और पुनर्संघटित होकर इस ब्रह्माण्ड के रूप में अभिव्यक्त या प्रकट (manifest) होते हैं। 
इसकी प्रथम अभिव्यक्ति (स्वरुप प्रकाश या manifestation) महत् या ब्रह्माण्डीय बुद्धि है, और फिर उससे अहंकार ('मैं' कुछ हूँ की चेतना - consciousness) की उत्पत्ति होती है। अहंकार ('मैं'-पन) को भी सांख्य एक तत्व (element) मानता है, उससे सर्वव्यापी मनस्तत्व (चित्त या मनवस्तु जिससे मन बनता है) और मन का उद्भव होता है। इस अहंकार से ही ज्ञान और कर्म के इन्द्रिय (मस्तिष्क में स्थित दर्शन, श्रवण आदि नाड़ी-केन्द्र) तथा तन्मात्रा अर्थात 'particles of sound, touch, etc.' शब्द, स्पर्श, रस आदि के सूक्ष्म परमाणुओं की उत्पत्ति होती है; फिर ये सूक्ष्म परमाणु ही स्थूल परमाणुओं में रूपान्तरित हो जाते हैं।  इन तन्मात्राओं (सूक्ष्म परमाणुओं) को देखा नहीं जा सकता है, किन्तु जब वे स्थूल परमाणु बन जाते हैं, तब हम उन्हें अनुभव और इन्द्रियगोचर कर सकते हैं। मनस या मनवस्तु जिसे 'चित्त' कहते हैं, जो स्पन्दित होकर मन, बुद्धि और अहंकार -इन तीन माध्यमों से कार्य करके 'प्राण' नामक शक्ति का निर्माण करता है। 
तुम्हें इस धारणा को इसी समय त्याग देना चाहिये कि प्राण का अर्थ श्वसन (breath) है। श्वसन क्रिया तो प्राण का एक कार्य (effect) मात्र है। यहाँ 'प्राण' शब्द से उन समस्त नाड़ी-शक्तियों (nervous forces) का बोध होता है, जो सम्पूर्ण शरीर का शासन और परिचालन करती हैं, एवं स्वयं को निरंतर गतिशील विचारों (thoughts) के रूप में अभिव्यक्त कर रही है। किन्तु प्राण का प्रधान और सबसे स्पष्ट रूप 'श्वसन गति' में ही दृष्टिगोचर होता है। इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि 'श्वसन गति' में प्राण ही वायु पर कार्य कर रहा है प्राण के ऊपर वायु कार्य नहीं कर रहा है। (Prana acts upon air, and not air upon it.) "श्वसन गति" या सांस लेने की गति को नियंत्रित करना ही प्राणायाम है श्वसन गति पर अधिकार प्राप्त करने के लिये ही प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। प्राणायाम का उद्देश्य केवल श्वसन गति का नियमन करना या फेफड़ों को सबल बनाना ही नहीं है। वह तो केवल डेल्टा-शोर है (Delsarte=delta noise?) प्राणायाम नहीं है। 
ये पंच-प्राण ही जीवनी-शक्ति (vital forces) हैं, जो समस्त शरीर को कुशलतापूर्वक संचालित करते हैं, और इसके बदले में वह मन तथा अन्य आंतरिक इन्द्रियों का कुशल संचालन करता है। यहाँ तक यह मनोविज्ञान बहुत स्पष्ट और असंदिग्ध है, इसके साथ ही साथ यह विश्व की प्राचीनतम तर्क-संगत विचारधारा भी है! पाइथागोरस ने भारत आकर इस विद्या को सीखा था, और ग्रीस जाकर इसीको पढ़ाया था। आगे चलकर प्लेटो को इस विद्या में निहित गूढ़ तत्वों का आभास हुआ, और भी आगे चलकर नास्टिकस (Gnostics) लोग सिकन्दरिया ले गये, और वहाँ से यह विचारधारा यूरोप पहुंची। इस प्रकार दर्शन और मनोविज्ञान के क्षेत्र में जहाँ भी कोई प्रयास किया जाता है तो, यह बात सिद्ध हो जाती है कि उसके पितामह परमर्षि कपिल ही हैं। अब तक हमने देखा कि यह मनोविज्ञान अत्यन्त प्रशंसनीय है, किन्तु यहाँ के बाद आगे बढ़ते समय हमें कुछ बिंदुओं पर, इससे भिन्न मत का अवलम्बन करना होगा। हम देखते हैं, कि कपिल का प्रधान मत है ---परिणाम। वे कहते हैं - 
' कारणभावाच्च ।' 
{सांख्यसूत्र-१.११८ /असत्कार्यवादनिराकरणं}   
अर्थात हर वस्तु किसी दूसरी वस्तु का परिणाम अथवा विकार है; क्योंकि उनके मत के अनुसार कार्य-कारण वाद का लक्षण यह है कि ' कार्य अन्य रूप में परिणत कारण मात्र है।' क्योंकि हम जहाँ तक देख पाते हैं, समग्र जगत् विकारशील और प्रगतिशील है। जैसे हम मिटटी को ही अन्य रूप में देखकर घड़ा कहते हैं। मिटटी है कारण, घड़ा है कार्य। इससे अधिक कारणता की कोई धारणा नहीं की जा सकती। यह समग्र ब्रह्माण्ड निश्चित रूप से एक उपादान से अर्थात प्रकृति के परिणाम से उतपन्न हुआ है। अतएव यह ब्रह्माण्ड अपने कारण से स्वरुपतः कभी भिन्न नहीं हो सकता।  परमर्षि कपिल के अनुसार, अव्यक्त प्रकृति से चित्त, बुद्धि, अहंकार तक कोई भी वस्तु वास्तविक भोक्ता "enjoyer" या भीतर से ज्ञान देने वाला "Enlightener" नहीं है। जैसा कोई मिट्टी का ढेला होता है, यह मन भी ठीक उसी प्रकार की जड़ वस्तु है। 
स्वरूपतः मन में अपना आलोक या चैतन्य नहीं है, किन्तु हम देखते हैं कि हमारा मन-- यह क्या है, वह क्या है ? आदि प्रश्न पूछता रहता है, तर्कना करता ही रहता है। इसलिए इसके पीछे, निश्चित रूप से ऐसी कोई सत्ता होनी चाहिये, जिसका आलोक महत (बुद्धि), अहंभाव (consciousness) और अन्य परवर्ती परिणामों के माध्यम से व्यक्त हो रहा है। उसी सत्ता को कपिल 'पुरुष' कहते हैं, और वेदान्ती उसे आत्मा कहते हैं।
कपिल के अनुसार, 'पुरुष' एक परिशुद्ध अस्तित्व (simple entity) है, वह यौगिक पदार्थ (compound) नहीं है, वही एकमात्र अभौतिक (या आत्मिक immaterial) तत्व है, और सब विभिन्न प्रपंच (नाम-रूप आदि) जड़ हैं। मान लो, हम एक काले बोर्ड को देख रहे हैं। हमारे बाह्य उपकरण (रेटिना), उस संवेदना को सबसे पहले, मस्तिष्क में स्थित तंत्रिका-केंद्र (ऑप्टिक नर्भ) में (कपिल के मत से दर्शन इन्द्रिय) में भेज देंगे, फिर संवेदना की छाप उस केन्द्र से संलग्न मन के ऊपर आघात करेगा, मन फिर उसे बुद्धि को समर्पित कर देगा। किन्तु बुद्धि में निर्णय लेने की क्षमता स्वतः क्रियाशील नहीं है---उसकी पृष्ठभूमि में जो पुरुष विदयमान है, उसीसे मानो क्रियाशीलता आती है। ये सब मानो उसके सेवक हैं, संवेदना (sensations) को उसके समीप ला देते हैं। और वह मानो आदेश देता है, प्रतिक्रिया करता है।
मनुष्य की आत्मा या पुरुष ही सिंहासन पर बैठा हुआ राजा, यथार्थ सत्ता, भोक्ता (enjoyer), द्रष्टा और ज्ञाता (perceiver) है, और वह अभौतिक (immaterial) है। क्योंकि वह अभौतिक है, इसलिए उसे अवश्य ही अनन्त भी होना ही चाहिए; वह जो भी हो किन्तु उसकी कोई सीमा नहीं हो सकती, उसे तो असीम होना ही चाहिये। इन पुरुषों में प्रत्येक ही सर्वव्यापी है, हम सब सर्वव्यापी हैं, किन्तु हम केवल लिंग-शरीर (सूक्ष्म-शरीर या fine body) के माध्यम से ही कार्य कर सकते हैंचित्त, मन, बुद्धि, अहंकार, मस्तिष्क-केन्द्र अथवा इन्द्रियाँ, तथा प्राण इन सबके संयोग से सूक्ष्म-शरीर या कोष (आवरण या sheath) बनता है, इसीको ईसाई-दर्शन में मानव की 'अध्यात्मिक देह ' 
(spiritual body) कहते हैं। इस देह को ही उद्धार अथवा दण्ड प्राप्त होता है, यही विभिन्न स्वर्गों में जाती रहती है, इसका ही बार बार जन्म और पुनर्जन्म होता है। 
क्योंकि हम पहले से ही  देखते आये हैं कि पुरुष या आत्मा तो अनन्त है, अतः उसके लिये आवागमन असम्भव है। गति का अर्थ है आना-जाना, और जो एक स्थान से दूसरे स्थान में जाता है, वह कभी सर्वव्यापी (omnipresent) नहीं हो सकता। कपिल के दर्शन में यहाँ तक हमने देखा कि आत्मा अनन्त है, और एकमात्र वही प्रकृति का परिणाम नहीं है। एकमात्र वही प्रकृति के बाहर है, किन्तु जाहिरा तौर पर देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि वह भी प्रकृति से बद्ध हो गया है। प्रकृति ने पुरुष पर आवरण डाल दिया है, और पुरुष का प्रकृति के साथ तादात्म्य हो गया है। 'पुरुष' सोचते हैं, ' हम लिंग शरीर हैं' , 'हम स्थूल शरीर' हैं, इसीलिये वे सुख-दुःख भोग रहे हैं; किन्तु वास्तव में 'पुरुष' तो आनंद स्वरुप हैं, सुख-दुःख से परे हैं, सुख-दुःख पुरुष का नहीं है, वह लिंग शरीर या सूक्ष्म शरीर का है। 
योगी समाधि अवस्था को सर्वोच्च अवस्था मानता है। वह समाधी अवस्था (meditative state) न सक्रीय है, न निष्क्रिय और उसमें हम पुरुष के निकटतम पहुँच जाते हैं। पुरुष में सुख-दुःख कुछ नहीं है, वह सभी तत्वों, सभी कर्मों का शाश्वत साक्षी (eternal witness) है, किसी कार्य के फल को वह ग्रहण नहीं करता।  
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । 
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥कठ २. २. ११॥ 
जिस प्रकार समस्त ब्रह्मांड का प्रकाशक सूर्यदेवता सभी नेत्रों की दृष्टि का कारण है, किन्तु नेत्र के किसी भी दोष से अप्रभावित रहता है। उसी प्रकार सब प्राणियों का अंतरात्मा एक परब्रह्म परमात्मा लोगों के दुखों से लिप्त नहीं होता क्योकि सबमें रहता हुआ भी वह सबसे अलग है।
कुसुमवच्च मणिः । सांख्यसूत्र-२.३५ ।
(वृत्त्युपसंहारदशायामेव पुरुषस्य स्वरूपे ऽवस्थितिः)
" अथवा जैसे लाल या नीले फूल स्वच्छ स्फटिक मणि के सामने रख दिये जाने  पर, स्फटिक लाल या नीला प्रतीत होने लगता है; किन्तु फूल के हट जाने पर वह अपने स्वरुप में स्वच्छ प्रतीत होने लगता है-उसके वास्तविक स्वरुप में कोई अन्तर नहीं आता। इसी प्रकार अभौतिक (चेतन) 'पुरुष' भी भौतिक (अचेतन) इन्द्रिय वृत्तियों से तादात्म्य कर लेने के कारण सक्रीय-निष्क्रिय प्रतीत होता है, पर वह है इन दोनों से परे। समाधीलाभ द्वारा, इन्द्रिय-वृत्तियों के हट जाने पर, वह 'पुरुष' (अहंभाव नहीं) अपने चेतन-स्वरुप का साक्षात्कार करता है। स्फटिक मणि के समान उसके वास्तविक स्वरुप में कभी कोई अन्तर नहीं आता। वृत्तिस्वरूपता में भी उसका चेतनस्वरूप तद्वस्थ रहता है। वृत्तियों का हट जाना ही उसका स्वरुप में अवस्थित होना कहा जाता है। पुरुष की इसी अवस्था को समाधी कहकर व्यक्त किया जा सकता है। यही सांख्य दर्शन है।
इसके पश्चात् सांख्यवादी यह भी कहते हैं कि प्रकृति का यह स्वरुप प्रकाश केवल आत्मा के लिए है; विभिन्न उपादानों के समस्त संघात, उससे स्वतंत्र और किसी अन्य सत्ता (third person-'पुरुष' ) के लिये हैं। ये नाना प्रकार के संघात, जिसे हम प्रकृति अथवा जगत्प्रपञ्च कहते हैं, ये सब परिवर्तन, आत्मा के भोग, अपवर्ग अथवा मुक्ति के लिये क्रम से चल रहे हैं; जिससे आत्मा निम्नतम अवस्था से सर्वोत्तम अवस्था तक का अनुभव प्राप्त कर सकें। (दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति ही अपवर्ग है, और दु:खोत्पत्ति के कारण का अभाव ही आत्यन्तिक दु:खनिवृत्ति है।आत्मा और अपवर्ग ही उपादेय (ग्रहण करने योग्य) हैं। ) जब आत्मा यह अनुभव प्राप्त करती है, तब वह समझ सकती है कि वह किसी काल में प्रकृतिबद्ध नहीं थी; वह हर 'नाम-रूप' से सर्वदा ही पूर्णरूप से स्वतंत्र थी --वह अविनाशी है, उनका आना-जाना कुछ भी नहीं है। स्वर्ग में जाना, फिर यहाँ आकर उतपन्न होना, यह सब प्रकृति का है --आत्मा का नहीं है। तब आत्मा मुक्त हो जाती है। इसी प्रकार समस्त प्रकृति आत्मा का भोग अथवा अनुभव का संचय करने के लिये काम करती जा रही है। आत्मा उसी चरम लक्ष्य- जो मोक्ष या स्वतंत्रता है, तक पहुँचने के लिये यह अनुभव प्राप्त कर रही है। सांख्य दर्शन के अनुसार इस आत्मा की संख्या अनेक है। अनन्त संख्यक आत्मायें विदयमान हैं।
कपिल का एक और सिद्धान्त यह है कि ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता के रूप में कोई ईश्वर नहीं है। प्रकृति ही इन सब विभिन्न नाम-रूपों का सृजन करने में समर्थ है। सांख्यवादी कहते हैं, ईश्वर को स्वीकार करने का कोई प्रयोजन नहीं सधता है। वेदान्त का कहना है कि आत्मा स्वरूपतः परम सत् (Existence absolute),परम चित् (Knowledge absolute) और परम आनन्द (Bliss absolute) है; किन्तु ये आत्मा के गुण नहीं हैं; वे तीन नहीं, एक हैं--'आत्मा' का सार तत्व ही 'सच्चिदानन्द'-स्वरुप है ! तथापि सांख्य के अनुसार ही वेदान्त भी इस बात में एकमत है कि बुद्धि भी, जहाँ तक वह प्रकृति से उत्पन्न है, (चित्त शुद्धि होने तकप्रकृति की ही वस्तु है।
वेदान्त यह भी सिद्ध करता है कि बुद्धि एक यौगिक वस्तु (compound) है। उदाहरण के लिए, हम किसी वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान ( perception) कैसे प्राप्त करते हैं-- इसी संवेदन की प्रक्रिया पर विचार करो। मैं एक ब्लैकबोर्ड देखता हूँ। यह ज्ञान कैसे होता है कि मैं ब्लैकबोर्ड ही देख रहा हूँ? ब्लैकबोर्ड का 'वह' --जिसे जर्मन दार्शनिक वस्तुरूप " the thing-in-itself " कहते हैं, अज्ञात है; 'मैं' वहाँ तक कभी पहुँच ही नहीं सकता, 'मैं' (अहं) उसे कभी नहीं जान नहीं सकता। मान लो वह 'क' है। ब्लैकबोर्ड का वह 'क' हमारे चित्त के ऊपर आघात करता है, और चित्त तरंगायित होकर मन बन जाता है। चित्त की उपमा एक शान्त सरोवर से दी जाती है। सरोवर में एक ढेला फेंकने पर सरोवर की प्रतिक्रियास्वरूप एक तरंग पत्थर के उस ढेले की ओर आती है। यह तरंग उस पत्थर के समान जरा भी नहीं है -- वह केवल एक प्रतिक्रियारूपी तरंग है। ब्लैकबोर्ड का वह 'क' जब पत्थर के रूप में चित्त के ऊपर आघात करता है, तो चित्त भी उसकी दिशा में एक तरंग फेंकता है, और इस तरंग को ही हम ब्लैकबोर्ड की संज्ञा देते हैं। " You, as reality are unknown and unknowable" हम तुमको देख रहे हैं। तुम स्वरूपतः जो हो, वह अज्ञात और अज्ञेय है। तुम वही अज्ञात सत्ता 'क' हो, -तुम हमारे चित्त पर आघात करते हो, और मेरा चित्त आघात प्राप्त होने की दिशा में  प्रतिक्रियास्वरूप एक तरंग निक्षेप करता है, और बुद्दि उस तरंग के नाम-रूप को पहचानकर उसे श्री या श्रीमती अमुक कहती है। (वैसे ही अहंकार आकर कहता है, मैं पहचान गया, आप श्री या श्रीमती अमुक ही हैं ! इस प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया (Perception) के दो उपादान हैं, एक बाहर से मिलने वाला आघात और दूसरा भीतर से उठने वाली प्रतिक्रिया-तथा इन दोनों का मिश्रण "{ 'क' (नाम-रूप) + चित्त (मन,बुद्धि अहंकार)}" ही हमारा बाह्य ब्रह्माण्ड (external universe) है ! हमारा सम्पूर्ण ज्ञान चित्त की प्रतिक्रिया का फल है।
व्हेल मछली के सम्बन्ध में वैज्ञानिक गणना के अधर पर यह निर्धारित किया गया है, कि उसकी पूंछ में आघात होने के कितने क्षणों के बाद उसका मन पूँछ पर प्रतिक्रिया करता है, तब उस व्हेल को पीड़ा की संवेदना होती है। यही बात आन्तरिक अनुभूति जन्य अवधारण (internal - perception) के विषय में भी सत्य है। जब हम अपने को 'अमुक ' नाम-रूप वाले व्यक्ति-विशेष (स्त्री/पुरुष) के रूप में जानते हैं, तब वह 'क'+ मन होता है। हमारी अन्तर्निहित यथार्थ आत्मा (सच्चिदानन्द स्वरुप real self) भी इसी प्रकार अज्ञात (unknown) और अज्ञेय (unknowable) है। उसे (नाम-रूप से पीछे की सत्ता अस्ति-भाति-प्रिय को) 'ख' कहा जाय। यह 'ख' चित्त पर भीतर से आघात करता है। अतः हमारा समग्र जगत् 'क' + मन (बाह्य जगत् ) है, और 'ख' + मन (अन्तर्जगत) है। 'क' + 'ख' (बाह्य जगत् और अन्तर्जगत) के पीछे 'वह' है, जिसे हम वस्तुरूप (रजत का रजतत्व या सर्प का सर्पत्व)  " the thing-in-itself " कह सकते हैं। 
वेदान्त के अनुसार अहंभाव (consciousness) के तीन मौलिक तथ्य हैं-- मैं सत् हूँ ( I exist), मैं चित् हूँ (I know) और मैं आनन्दस्वरुप हूँ (I am blessed)! कभी कभी हमारे मन में ऐसे  विचार आते हैं, कि " मुझे कोई अभाव नहीं है; मैं शान्तिपूर्ण हूँ, मैं पूर्णसन्तुष्ट हूँ, मुझे न मोह है न शोक है, मुझे कोई भी परिस्थिति विचलित नहीं कर सकती है"। और यही भाव हमारे अस्तित्व का केन्द्रीय तथ्य है, हमारे जीवन का आधारभूत तत्व है, किन्तु जब असीमता का यह भाव सीमित रूप ले लेती है, और यौगिक बन जाती है, तो यह स्वयं को प्रतीयमान या जगातिक अस्तित्व, जगातिक ज्ञान, और भौतिक प्रेम के रूप में अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक मनुष्य का अस्तित्व है, प्रत्येक मनुष्य अवश्य जानता है, और प्रत्येक मनुष्य प्यार के लिए पागल है ! मनुष्य प्रेम किये बिना नहीं रह सकता। उच्चतम से लेकर निम्नतम सभी जीव अवश्य प्रेम करते हैं। 'ख' अथवा 'अन्तःवस्तुरूप' "the internal thing-in-itself" - जिसे वेदान्ती लोग सच्चिदानन्द (Existence absolute, Knowledge absolute, Bliss absolute.) कहते हैं, मन के साथ संयुक्त होकर ससीम सत् (जीवन या existence), ज्ञान और प्रेम का निर्माण करता है। यद्द्पि वह 'वास्तविक जीवन' (real existence) असीम, अमिश्रित, अयौगिक, अविकारी -मुक्तात्मा है; जब वह मिश्रित या यौगिक बन जाता है, मन के साथ घुलमिल जाता है, तब उसे व्यष्टि-जीवन, या जीवात्मा कहते हैं। वही पूर्णसत् (अनन्त जीवन)---- वनस्पति-जीवन, पशु-जीवन, मानव-जीवन बन जाता है, जैसे ब्रह्माण्डीय अंतरिक्ष (महाकाश) ही एक घड़े के भीतर बन्द होकर घटाकाश बन जाता है, या अन्य किसी वस्तु के भीतर खण्डित जैसा प्रतीत होता है।
और जिसे हम अंतःप्रज्ञा ( intuition), तर्कशील बुद्धि (reason) या सहज-वृत्ति (instinct) कहते हैं, वह --'पूर्णज्ञान' नहीं है। जब वह 'ज्ञानस्वरुप' कुछ विकृत होकर भ्रम में पड़ जाता है तब उसी को अन्तःप्रज्ञा (intuition) कहते हैं, जब यह और अधिक विकृत हो जाता है, हम उसे तर्कशील बुद्धि (reason) कहते हैं, और जब उससे भी अधिक विकृत होता है हम उसे सहज-वृत्ति (instinct) कहते हैं। ज्ञानस्वरूप वास्तव में विज्ञान है-न वह अन्तःप्रज्ञा है, न तर्कशील बुद्धि है, और न सहज-वृत्ति है। उसकी निकटतम अभिव्यंजना है "सर्वज्ञत्व" (all-knowingness)। उस पूर्णज्ञान की कोई सीमा नहीं है, यह यौगिक नहीं 'विशुद्ध बुद्धि' है- इसमें कोई मिलावट नहीं है। 
उसी प्रकार आनन्दस्वरुप या परमानन्द जब आवरण में फँसकर थोडा मलिन हो जाता है, तो उसे स्थूल शरीरों के प्रति आकर्षण, या सूक्ष्म शरीरों के प्रति आकर्षण, अथवा भावनाओं के प्रति प्रेम या आकर्षण कहते हैं। यह भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण भी उसी परमानन्द की विकृत अभिव्यक्ति है। पूर्ण सत्, पूर्ण चित्, पूर्ण आनन्द आत्मा के गुण नहीं हैं, बल्कि सारतत्व हैं, आत्मा के साथ उनका कोई प्रभेद नहीं है। और ये तीनों एक ही तत्व हैं, उस एक ही तत्व--- 'तदेकं' को हम तीन विभिन्न पहलुओं से देखते हैं। वे सभी पहलु सापेक्ष ज्ञान (relative knowledge) के परे हैं। आत्मा का वही शाश्वत ज्ञान, मनुष्यों के मस्तिष्क के माध्यम से अनुश्रवित होकर अंतःप्रज्ञा, तर्कशील बुद्धि, आदि बनता है। वह अनन्त ज्ञान - चित्त, मन, बुद्धि, अहंकार आदि गुणवत्ता के तारतम्य के अनुसार ही स्वयं भासमान करता है। आत्मा के रूप में मनुष्य और निम्नतम पशुओं में कोई अन्तर नहीं है, केवल पशुओं का अंतःकरण कम विकसित हुआ है, और उनके कमविकसित अंतःकरण के माध्यम से होने वाली अभिव्यक्ति, जिसे हम सहज-वृत्ति (आहार-निद्रा-भय-मैथुन या instinct) कहते हैं, वह बहुत भोथरा (dull) है। मनुष्य का अन्तःकरण पशुओं की अपेक्षा अधिक परिष्कृत या तीक्ष्ण है, इसीलिये उसके माध्यम से आत्मा की अभिव्यक्ति भी अधिक स्पष्ट होती है, और उच्चतम अन्तःकरण वाले मनुष्य में यह पूर्ण रूप से चमकने लगती है। 
अस्तित्व या सत् के बारे में भी यह कहा जा सकता है। सीमित अस्तित्ववान देश (घटाकाश) या व्यष्टि-
जीव के रूप में हम जिसे जानते हैं, वह असीम अस्तित्व का एक प्रतिबिम्ब है, वह उसी आत्मा की प्रकृति है। परमानन्द के साथ भी यही घटित होता है। जिसे हम शारीरिक आकर्षण या प्रेम कहते हैं, वह आत्मा के अनन्त परमानन्द का प्रतिबिम्ब मात्र है। असीम जब स्वयं को ससीम के माध्यम से अभिव्यक्त करता है, तो वह उस आवरण से ढँक जाता है। लेकिन अनभिव्यक्त आत्मा का यथार्थ स्वरुप अनन्त है, अनन्त होकर भी जो सान्त में छिपा हुआ है, उस परमानन्द की कोई सीमा नहीं है। लेकिन मानवीय प्रेम में सीमा बंधन है। किसी दिन मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, और दूसरे दिन घृणा। मेरा प्रेम एक दिन बढ़ता है और दूसरे दिन घटता है; क्योंकि वह किसी माध्यम
(आवरण या नाम-रूप) से होने वाली अभिव्यक्ति मात्र है। 
पहले तो ईश्वर विषयक धारणा में कपिल के साथ हमारा विवाद है। जैसे व्यष्टि बुद्धि से आरम्भ करके व्यष्टि-शरीर (पिण्ड) तक इस प्रकृति के रूप-परिवर्तनों की श्रृंखला के पीछे उसके नियन्ता और शासक के रूप में 'पुरुष' को स्वीकार करने की आवश्यकता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डीय बुद्धि, ब्रह्माण्डीय अहंभाव, --समष्टि-मन, समष्टि-बुद्धि, समष्टि-सूक्ष्म और समष्टि स्थूल पदार्थों के पीछे उनके नियन्ता और शास्ता के रूप में किसी न किसी को अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। इस  ब्रह्माण्डीय श्रृंखला के पीछे इसके नियन्ता-शास्ता के रूप में एक ब्रह्माण्डीय पुरुष (universal Purusha) को स्वीकार न करने पर यह ब्रह्माण्ड सृष्टि-क्रम पूर्ण कैसे होगा ? यदि तुम ब्रह्माण्डीय रचना-क्रम के कुशल-संचालन के पीछे यदि किसी ब्रह्माण्डीय पुरुष को अस्वीकार करते हैं, तो हमें व्यष्टि-जीवन श्रृंखला के पीछे भी उस पुरुष को अस्वीकार करना होगा। अतएव यदि यह सत्य है कि इस अभिव्यक्त व्यष्टि-क्रम के पीछे ऐसा पुरुष विद्य्मान है, जो समस्त प्रकृति के परे है, जो किसी प्रकार के जड़ उपादान से निर्मित नहीं है, तो यही तर्क समष्टि-ब्रह्माण्ड पर भी लागू होगी। जो सर्वव्यापी आत्मा (Universal Self) प्रकृति के समस्त विकारों के परे है, उसे प्रधान नियन्ता, ईश्वर कहते हैं। 
अब अधिक महत्वपूर्ण मतभेद उठता है। क्या एक से अधिक पुरुष हो सकते हैं ? हमने देखा कि पुरुष सर्वव्यापी और असीम है। सर्वव्यापी और असीम दो नहीं हो सकते। यदि 'क' और 'ख' दो असीम वस्तुएँ हैं, तो असीम 'क' असीम 'ख' को सीमाबद्ध करेगा। क्योंकि असीम 'क' असीम 'ख' नहीं है, तथा असीम 'ख' असीम 'क' नहीं है। अभेद में भेद का अर्थ है, पृथक्करण और पृथक्करण का अर्थ है-परिसीमन।  अतः 'क' और 'ख' एक दूसरे को सीमाबद्ध करने से असीम नहीं रह सकते। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि केवल एक ही असीम वस्तु--एक ही 'पुरुष' विद्य्मान है। 
अब हम कथित 'क' एवं 'ख' की सहायता से यह दिखलाने का प्रयास करेंगे कि ये दोनों एक हैं। हमने पहले ही देखा है कि जिसे हम बहिर्जगत कहते हैं, वह 'क' + मन है, तथा अन्तर्जगत 'ख' + मन है।  'क' और 'ख', ये दोनों अज्ञात और अज्ञेय राशियाँ हैं। समस्त विभेद देश, काल और निमित्त के कारण हैं। ये सब चित्त के गठन तत्व है। इनके (देश-काल-निमित्त रूपी चित्त) के बिना कोई मनोवृत्ति सम्भव नहीं है।  तुम काल का परित्याग करके कदापि विचार नहीं कर सकते, देश को को छोड़कर किसी वस्तु की धारणा नहीं कर सकते, एवं निमित्त अर्थात कार्य-कारण (बीज-वृक्ष) का सम्बन्ध छोड़कर किसी वस्तु की कल्पना नहीं कर सकते। ये सब मन के ही रूप हैं। इन्हें हटा लो, और मन का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। अतः सब विभेद का कारण है-मन। 
वेदान्त के अनुसार मन या इसके रूपों ने ही 'क' और 'ख' को आपतदृष्टी से सीमाबद्ध कर लिया है , और उन्हें बाह्य जगत और अन्तर्जगत के रूप में प्रतीयमान  होने को बाध्य करते हैं। किन्तु 'क' और 'ख' दोनों ही मन के परे होने के कारण भेदरहित हैं और इसलिये एक हैं। हम उन पर किसी गुण का आरोप नहीं कर पाते, क्यों की गुण मन के द्वारा उत्पन्न होते हैं। जो गुण रहित है, वह अवश्य ही एक है। 'क' गुणरहित है, यह केवल मन के ही गुणों को ग्रहण करता है, इसी प्रकार 'ख' भी; अतः ये 'क' और 'ख' एक हैं। समग्र ब्रह्माण्ड एक है। जगत् में केवल एक आत्मा है, एक सत्ता है, और वही एक सत्ता जब देश-काल-निमित्त के माध्यम से गुजरती है, उसे बुद्धि, अहंज्ञान, तन्मात्रा, इन्द्रिय, स्थूल पदार्थ आदि की संज्ञाएँ दी जाती है। 
इस समग्र ब्रह्माण्ड में सब कुछ वह एक वस्तु है, जो विभिन्न रूपों में प्रतिभासित हो रही है। जब उसका कुछ अंश मानो इस देश-काल-निमित्त के जाल में पड़ता है, तब यह विभिन्न रूप ग्रहण करती है। " take off the network,(चित्त) and it is all one." उस जाल को हटा दो, सभी एक हैं। अतः अद्वैत दर्शन के अनुसार समग्र विश्व आत्मा में एक है, और यह आत्मा ही ब्रह्म है। वह ब्रह्म जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की पृष्ठभूमि पर प्रतीयमान होने लगता है, तब उसे हम ईश्वर कहते हैं। वही ब्रह्म जब इस क्षुद्र ब्रह्माण्ड या पिण्ड के पीछे प्रतीयमान होने लगता है, तब उसे आत्मा कहते हैं। अतः यह आत्मा ही ससीम मनुष्य में अन्तर्निहित असीम ईश्वर है। इसलिये सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड में केवल एक ही 'पुरुष' है, जिसे वेदान्त ब्रह्म कहता है। ईश्वर और मनुष्य दोनों के स्वरुप का विश्लेषण करने पर, ब्रह्मस्वरूप में दोनों एक हो जाते हैं। यह ब्रह्माण्ड स्वयं 'तुम' है, अविभक्त तुम ( The universe is you yourself, the unbroken you)। तुम इस विश्व-ब्रह्माण्ड में ओतप्रोत हो। ' समस्त हाथों से तुम कार्य कर रहे हो, समस्त मुखों से तुम खा रहे हो, समस्त नासा-ग्रंधों से तुम श्वसन कर रहे हो, समस्त मन से तुम विचार कर रहे हो।'
सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
                  सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।गीता/१३/ १३।।
तत् = वह (तुम); सर्वत:पाणिपादम् = सब ओरसे हाथ पैरवाला (एवं) ; सर्वतोकक्षि शिरोमुखम् = सब ओर से नेत्र सिर और मुखवाला (तथा) ; सर्वत:श्रुतिमत् = सब ओर से श्रोत्रवाला ; अस्ति = है ; यत: = क्योंकि (वह) ; लोके = संसार में ; सर्वम् = सबको ; आवृत्य = व्याप्त करके ; तिष्ठति = स्थित है ; 
वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है ।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ।।१३/१४ ।।
सर्वेन्द्रियगुणाभासम् = संपूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जाननेवाला हो परन्तु वास्तव में तुम (अतीन्द्रिय-बुद्धि शुद्ध बुद्धि, Intuition ) ; सर्वेन्द्रियविवर्जितम् = सब इन्द्रियों से रहित हो  ; च = तथा ; असक्तम् = आसक्तिरहित (और) ; निर्गुणम् = गुणों से अतीत (हो गये हो ) ; एव = भी (अपनी योगमाया से) ; सर्वभृत् = सबको धारणपोषण करनेवाले हो ; च = और ; गुणभोक्तृ = गुणों को भोगनेवाला भी तुम्हीं हो ; 
(वह तुम ही हो !) तुम्हीं सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाले  हो, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित हो, तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाले हो, और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाले  हो।  समग्र जगत् ही तुम हो, यह ब्रह्माण्ड तुम्हारा शरीर है। तुम्हीं व्यक्त (साकार) और अव्यक्त (निराकार) दोनों  हो। तुम्हीं जगत् की आत्मा हो तथा तुम्हीं उसका शरीर भी हो। तुम्हीं ईश्वर हो, तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं मनुष्य हो, तुम्हीं पशु हो, तुम्हीं उद्भिद (plants) हो, तुम्हीं खनिज (minerals) हो, तुम्हीं सब हो -समग्र व्यक्त जगत् ही तुम हो।  
जो कुछ है, सब तुम हो। तुम असीम (Infinite) हो।  असीम को विभक्त नहीं किया जा सकता।  इसका कोई अंश नहीं हो सकता, क्यों तब प्रत्येक अंश असीम होगा, और तब अंश और पूर्ण या ससीम और असीम में कोई भेद नहीं रह जायगा, जो एक असंगत या तर्कशीलबुद्धि के विरुद्ध ( absurd) बात है। इससे यह सिद्ध हो जाता है, कि बुद्धि के सामान्य धरातल पर (Intellect और Instinct के धरातल पर) खड़े होकर, अतीन्द्रिय-बुद्धि (Intuition) को जाने बिना ही, तुम जो अपने को (सीमित या मरणशील देह) 
" श्री या श्रीमती अमुक " मान रहे थे; कभी सत्य नहीं हो सकता, वह (गो-गोचर जगत्) केवल दिवा-स्वप्न (day-dream-मुंगेरी लाल के हसीन सपने मात्र) है !! " Know this and be free." यह जान लो और मुक्त हो जाओ !! यही अद्वैत का निष्कर्ष (conclusion) है--"निर्वाण षटकम्"
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे
न च व्योमभूमि-र्न तेजो न वायुः ,चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति (देश-काल-निमित्त) नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥१॥

न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः, न वा सप्तधातु-र्न वा पञ्चकोशाः
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्  

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में  कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥२॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्  
न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की  भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥३॥ 
पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् , न मंत्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥४॥ 
न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥४॥ 
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः, चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥५ 
न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य,  मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥५॥ 
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपः,विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः,चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् 
यही यथार्थ ज्ञान है, " मैं न तो देह हूँ, न इन्द्रिय और न मन ही; मैं अखण्डित सच्चिदानन्द हूँ, मैं ही वह हूँ, मैं ही वह हूँ ! " {I am neither the body, nor the organs, nor am I the mind; I am Existence, Knowledge, and Bliss absolute; I am He. जिसको पहले ' तदेकं ' जो अकेला बिना हवा के भी अपने दम पर श्वसन कर रहा था ! समझ कर आश्चर्य जनक कोई वस्तु 'अजूबा ' समझता था, किन्तु शुद्ध बुद्धि (प्रज्ञा या 'Intuition' ) जान लेती है मैं ही वह हूँ ! } यही यथार्थ ज्ञान है, तर्क तथा बुद्धि तथा अन्य सब अज्ञान है। मैं तब कौन सा ज्ञान-लाभ करूँगा ? मैं स्वयं ज्ञानस्वरूप हूँ। मैं कौन सा जीवन प्राप्त करूँगा ? मैं स्वयं ही शाश्वत जीवन हूँ ! मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि मैं नहीं मरूँगा ! क्योंकि मैं ही जीवन-स्वरुप हूँ, मैं ही वह ' ब्रह्म ' हूँ (जिससे देश-काल-निमित्त या चित्त निकला है, जिसमें अवस्थित है, और जिसमें लीन हो जाता है।) और ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो मेरे द्वारा प्रकाशित नहीं है, जो मुझमें नहीं है या जो मेरे स्वरुप में अवस्थित नहीं है। मैं ही भूतसमूह के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा हूँ, किन्तु मैं इन सब से परे भी हूँ, क्योंकि मैं मुक्तस्वरुप  हूँ ! (अब अन्तःप्रज्ञ हो जाने के बाद ) मुक्ति कौन चाहता है ? अब चाहने वाला तो है ही नहीं ! 

" चाह गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह
                 जिनको कुछ न चाहिए, वे शाहन के शाह "
~ कबीर
यदि तुम अपने को बद्ध सोचो, तो बद्ध ही रहोगे, तुम स्वतः ही अपने बन्धन के कारण होओगे। यदि तुम अनुभव करो कि तुम मुक्त हो, तो इसी क्षण तुम मुक्त हो!
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
                         किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवे
त्
 
    अष्टावक्र गीता: १-१
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है यही ज्ञान है --मुक्तिप्रद ज्ञान ! Freedom is the goal of all nature. समग्र प्रकृति का लक्ष्य ही मुक्ति है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ! 
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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

' सांख्य दर्शन का एक अध्यन ' (अवचेतन, चेतन एवं अतिचेतन A study of the Sankhya Philosophy )

' शापेनहावर तथा भारतीयदर्शन में अन्तर'
 अवचेतन, चेतन एवं अतिचेतन तीन अवस्थायें हैं, जिनमें ज्ञान (होश ) का वास है।
सांख्य दार्शनिकों ने प्रकृति को अव्यक्त  कहा है, और उसकी परिभाषा उसके अन्तर्गत समस्त उपादानों की साम्यावस्था के रूप में की है। इससे स्वभावतः यह  निष्कर्ष निकलता है कि पूर्ण साम्यावस्था में किसी प्रकार की गति नहीं हो सकती। आद्द्य अवस्था (primal state) में, किसी अभिव्यक्ति के पूर्व जब कि कोई गति नहीं थी, अपितु पूर्ण साम्यावस्था थी, यह प्रकृति अविनाशी (indestructible) थी, क्योंकि विघटन अथवा विनाश अस्थिरता अथवा परिवर्तन से ही होता है।
सांख्य का यह मत भी है कि परमाणु आरम्भिक अवस्था के रूप नहीं हैं।  इस जगत् की उत्पत्ति परमाणुओं से नहीं होती : वे दूसरी या तीसरी अवस्था हो सकते हैं। सम्भव है कि आदिकालीन पदार्थ (The primordial material) परमाणुओं का रूप धारण कर स्थूलतर होता हुआ विशालतर वस्तुओं में परिणत हो जाता है। जहाँ तक आधुनिक अनुसन्धानों का सम्बन्ध है; वे भी यथार्थतः इसी निष्कर्ष का संकेत करते हैं। उदाहरणार्थ आकाश ( ether) के सम्बन्ध में आधुनिक सिद्धान्त को लें, यदि तुम कहो कि कि आकाश या ईथर आणविक हैं, तो कोई बात हल नहीं होती। इस बात को और स्पष्ट करने के लिये मानलो कि वायु परमाणुओं से निर्मित है। हम जानते हैं कि आकाश सर्वत्र, ओतप्रोत और सर्वव्यापी है और वायु के ये परमाणु मानो आकाश (ether) में चलायमान हैं। यदि आकाश भी परमाणुओं का बना हुआ है, तो आकाश के प्रत्येक दो परमाणु के बीच देश (spaces/रिक्त स्थान) होगा। इन रिक्त स्थानों की कौन पूर्ति (क्या भर जाता है) करता है?
यदि तुम यह मानलो कि कोई अन्य सूक्ष्मतर आकाश (another ether still finer) है, जो यह कार्य करता है, तो उस सूक्ष्मतर आकाश के परमाणुओं के बीच भी रिक्त स्थान होंगे, जिनकी पूर्ति होनी चाहिये। इस प्रकार सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम आकाश की कल्पना करते करते हम किसी अन्तिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकेंगे। इसीको सांख्य दार्शनिक अनवस्था दोष "cause leading to nothing" कहते हैं। इसलिये परमाणुवाद (atomic theory) सृष्टि का अन्तिम सिद्धान्त नहीं हो सकता। सांख्य के अनुसार प्रकृति सर्वव्यापी है। वह एक सर्वव्यापी जड़-राशिस्वरूप है, जिसमें इस जगत की समस्त वस्तुओं के कारण विद्य्मान हैं।
 कारण का क्या तात्पर्य है ? कारण व्यक्त अवस्था कि सूक्ष्म दशा है --उस वस्तु की अनभिव्यक्त अवस्था (unmanifested state), जो अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। विनाश (destruction) का तुम क्या अर्थ लगाते हो ? कारण में प्रत्यावर्तन का नाम विनाश है। यदि तुम्हारे पास मिटटी का कोई बरतन है और तुम उस पर आघात करो, तो वह विनष्ट हो जायेगा। इसका तात्पर्य यह है कि कार्य का उसके मूल स्वरुप में प्रत्यावर्तन हो जाता है, जिन उपादानों से बरतन बना था, वे अपने मूल स्वरुप में लौट जाते हैं। विनाश का इस भाव से परे यदि कोई अन्य भाव, उन्मूलन (annihilation) आदि का लिया जाता है, तो वह स्पष्टतः असंगत है। आधुनिक बहुतिक विज्ञान के अनुसार यह, जिसे कपिल ने युगों पूर्व कहा था, सिद्ध किया जा सकता है कि (नाशः कारण लयः ) समस्त विनाश कारण में प्रत्यावर्तन मात्र है। विनाश का तात्पर्य सूक्ष्मतर अवस्था में रूपान्तरण  ही है, और कुछ नहीं। तुम जानते हो कि एक प्रयोगशाला में यह कैसे सिद्ध किया जा सकता है कि ' Matter is indestructible.(E=M) ' भौतिक पदार्थ अविनाशी हैं। हमारे ज्ञान की वर्तमान स्थिति में यदि कोई मनुष्य यह कहता है कि भौतिक पदार्थ अथवा इस आत्मा का उन्मूलन हो जाता है, तो वह अपने को मात्र हास्यास्पद बनाता है।  केवल अशिक्षित, मूर्खलोग ही ऐसी प्रस्थापना प्रस्तुत कर सकते हैं। विचित्र बात यह है कि आधुनिक विज्ञान का प्राचीन दार्शनिकों की शिक्षा से साम्य है। ऐसा होना ही चाहिये, सत्यता का यही प्रमाण है। (सभी धर्मों के धार्मिक-सिद्धान्तों के सत्यता की कसौटी यही होनी चाहिये।) मन को आधार मानकर वे अपने अनुसन्धान में अग्रसर हुए, उन्होंने इस विश्व के मानसिक अवयव (mental part) का विश्लेषण किया और कतिपय निष्कर्षों पर पहुँचे, जिन्हें अभी हम भौतिक अवयव  (physical part) का विश्लेषण (सर्न प्रयोगशाला में ) करके प्राप्त करेंगे; क्योंकि उन दोनों का एक ही केन्द्र की ओर जाना निश्चित है।
तुम्हें स्मरण रखना चाहिये कि ब्रह्माण्ड में इस प्रकृति की प्रथम अभिव्यक्ति सांख्य के शब्दों में 'महत' है। हम इसे बुद्धि कह सकते हैं। प्रकृति में जो प्रथम परिवर्त्तन हुआ, उससे तार्किक-बुद्धि की उत्पत्ति हुई। मैं इसका अनुवाद आत्मचेतना (self-consciousness) के रूप में नहीं करूँगा, क्योंकि वह गलत होगा। चेतना (Consciousness) इस बुद्धि का अंश मात्र है। 'महत' सर्वव्यापी (universal) है। मन की ये सभी अवस्थायें - 'अवचेतन' (sub-consciousness) 'चेतन' (consciousness) और 'अतिचेतन' (super-consciousness) सब इसके (महत के ) अन्तर्गत आ जाते हैं, अतः इस महत के लिये प्रयुक्त चेतना की कोई भी अवस्था पर्याप्त न होगी।  उदाहरण के लिये तुम अपनी आँखों के सामने बाह्य प्रकृति में कुछ परिवर्तन घटित होते हुए देखते हो, जिन्हें तुम देखकर समझ भी सकते हो, किन्तु कुछ परिवर्तन इतने सूक्ष्मतर होते हैं, कि कोई मानव प्रत्यक्षतः उनको पकड़ नहीं सकता ! किन्तु वे एक ही कारण से उदभूत होते हैं; वही महत इन समस्त परिवर्तनों का जनक है। महत से ही सर्वव्यापी अहं-तत्व (universal egoism) की उत्पत्ति हुई है। ये सब द्रव्य (substance) हैं। जड़-तत्व और मन (matter and mind) में परिणामगत भेद के अतिरिक्त और कोई भेद नहीं है। सूक्ष्म एवं स्थूल स्वरूप में एक ही पदार्थ होता है, एक दूसरे में रूपांतरित हो जाता है, और इसका आधुनिक शरीरविज्ञान के निष्कर्षों से पूर्ण साम्य है। इस शिक्षा में विश्वास करने से कि 'मन' मस्तिष्क ( Brain) से पृथक नहीं है, तुम बहुत से द्वंद्व और संघर्षों से बच जाओगे। 
अहंभाव (Egoism) दो प्रजातियों में रूपान्तरित  हो जाता है। इसकी एक प्रजाति इंद्रियों में परिवर्तित हो जाती है। इंद्रियाँ दो प्रकार की होती हैं: संवेदक इंद्रियाँ (organs of sensation) और प्रतिक्रियात्मक इंद्रियाँ (organs of reaction)। वे आँख और कान (आदि उपकरण ) नहीं हैं, बल्कि इनके पृष्ठ भाग हैं, जिन्हें मस्तिष्क-केन्द्र (brain-centers) और स्नायु-केन्द्र (nerve-centers) आदि कहा जाता है। यह अहंभाव (egoism), यह पदार्थ ही परिवर्तित हो जाता है, और इसी पदार्थ से मस्तिष्क में ये केन्द्र आदि निर्मित होते हैं। फिर इसी पदार्थ (अहंभाव) से दूसरी प्रजाति के रूप में तन्मात्राओं-पदार्थ के सूक्ष्म कणों का निर्माण होता है, जो अभिज्ञता प्रदान करने वाली हमारी संवेदक-इंद्रियों पर आघात करते हैं, और संवेदना उत्पन्न होती है। तुम उन्हें देख नहीं सकते, मात्र जानते हो कि वे हैं। तन्मात्राओं से स्थूल पदार्थ --क्षिति, जल, तथा उन सब वस्तुओं का, जिन्हें हम देखते और अनुभव करते हैं, निर्माण होता है। ये सब (अहंभाव से इन्द्रिय और तन्मात्रा आदि की उत्पत्ति भी) ब्रह्माण्ड की रचना से सम्बंधित बातें हैं। यह बात मैं तुम्हारे मन में बैठा देना चाहता हूँ।  इसे समझना बहुत कठिन है, क्योंकि पश्चिमी देशों में मन एवं पदार्थ के विषय में विचार बहुत विचित्र हैं। उन प्रभावों को अपने मस्तिष्क से दूर करना बहुत कठिन है।  पाश्चात्य दर्शन में अपने बाल्य काल में प्रशिक्षित होने से मुझे स्वयं को बड़ी कठिनाई हुई थी। 
ब्रह्माण्ड रचना में प्रथम रूपान्तरण को- 'महत' कहा जाता है। एक अविभक्त (undifferentiated), अखण्डित द्रव्य, की कल्पना करो, जो प्रत्येक वस्तु की प्रथम अवस्था है। उसी 'महत' से यह ब्रह्माण्डीय विस्तार (universal extension), उसी प्रकार रूपान्तरित होने लगता है, जिस प्रकार दूध परिवर्तित होकर दही बन जाता है। महत पदार्थ स्थूलतर पदार्थ, जिसे अहंभाव (egoism) कहते हैं,में रूपान्तरित हो जाता है। इसका तीसरा रूपान्तरण सार्वभौम संवेदक इन्द्रियों ( universal sense-organs) तथा सार्वभौम तन्मात्राओं (universal fine particles) के रूप में अभिव्यक्त होता है, और ये अंतिम वस्तुएँ पुनः संयुक्त होकर इस स्थूल जगत में, जिसे हम अपनी आँख, नाक तथा कान से देखते, सूँघते और सुनते हैं, (यन्त्र ) में परिणत हो जाती हैं। सांख्य के अनुसार यही वह 'cosmic plan' ब्रह्माण्डीय योजना है, वह विधान है-कि  " जो ब्रह्माण्ड (cosmos) में है, वह अवश्य पिण्ड (microcosmic) में भी होगा !" 
सांख्य-दर्शन समझने की पहली सीढ़ी:  किसी एक व्यक्ति (पिण्ड) को लो, उसमें प्रथमतः अविभक्त (undifferentiated), अखण्डित पदार्थगत प्रकृति (material nature ) है, और उसके भीतर की वह पदार्थगत प्रकृति, महत में रूपान्तरित हो गयी है।  वह व्यक्तिगत महत, ब्रह्माण्डीय बुद्धि (universal intelligence) का एक अंश है। और उसमें निहित ब्रह्माण्डीय बुद्धि (universal intelligence) का यह कण 'अहंभाव' ( egoism) में, और फिर संवेदक इन्द्रियों (sense-organs) तथा सूक्ष्म तन्मात्राओं (fine particles of matter) में रूपान्तरित हो जाता है, जो (which combine and manufacture his body)उसके शरीर का संयोजन एवं निर्माण करते हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम इस तथ्य को भली-भाँति समझ लो, क्योंकि  सांख्य-दर्शन समझने की पहली सीढ़ी यही है। सांख्य-दर्शन के इस प्रथम सोपान 'stepping-stone' को समझना तुम्हारे लिये अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि यह समस्त विश्व के दर्शन का आधार है। विश्व में कोई ऐसा दर्शन नहीं है, जो महर्षि कपिल का ऋणी न हो। पाइथागोरस (Pythagoras) भारत आये और उन्होंने इस दर्शन का अध्यन किया और वही ग्रीक लोगों के दार्शनिक विचारों का समारम्भ था। बाद में इसे ऐलग्ज़ैन्ड्रीयन स्कूल या ' सिकन्दरियन दर्शन शाखा ' और उसके भी बाद 'Gnostic' या नास्टिक अर्थात 'रहस्यवादी दर्शन-शाखा' का जन्म हुआ। बाद में यह दो भागों में बँट गया, एक भाग यूरोप तथा सिकन्दरिया (Alexandria) चला गया और दूसरा भारत में ही रहा; इससे व्यास की दर्शन-पद्धति का विकास हुआ। कपिल का सांख्य-दर्शन ही इस विश्व का सर्वप्रथम ऐसा दर्शन है, जिसने तर्कसंगत प्रणाली (rational system) से जगत् -रचना के सम्बन्ध में विचार किया है, विश्व के प्रत्येक तत्वमीमांसाक (आध्यात्मिक वैज्ञानिकों meta-physician) को उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिये। मैं तुम्हारे मन में यह भाव उत्पन्न करना चाहता हूँ कि ' great father of philosophy ' दर्शन शास्त्र के पितामह के रूप में उनकी बातें सुनने के लिये हम बाध्य हैं। इस अद्भुत व्यक्ति, इस अत्यन्त प्राचीन दार्शनिक का श्रुति में भी उल्लेख है --" हे भगवान, आपने (सृष्टि के) प्रारम्भ में कपिल मुनि को उत्पन्न किया।"  
उनके प्रत्यक्ष-ज्ञान कितने आश्चर्यजनक थे, और यदि योगियों की प्रत्यक्ष-बोध सम्बन्धी असाधारण शक्ति का कोई प्रमाण चाहिये, तो ऐसे व्यक्ति उसके प्रमाण हैं। उनके पास कोई माइक्रस्कोप अथवा टेलीस्कोप यंत्र नहीं था। तथापि उनका प्रत्यक्ष-बोध कितना उत्कृष्ट था, उनका वस्तुओं का विश्लेषण कितना पूर्ण एवं अद्भुत है ! यहाँ मैं शापेनहावर तथा भारतीयदर्शन के अन्तर का संकेत करूँगा। शापेनहॉवर का कथन है कि इच्छा अथवा संकल्प (desire, or will) ही सब चीज का कारण है। 'होने' (अस्तित्व) की इच्छा (the will to exist) से ही हमारी अभिव्यक्ति होती है, किन्तु हम इससे इंकार करते हैं।  इच्छा और प्रेरक नाड़ी (motor nerves) एकरूप हैं।  जब हम कोई वस्तु देखते हैं, तो इसमें इच्छा की कोई बात नहीं होती; जब इसकी संवेदनाएँ मस्तिष्क के पास पहुँचती हैं, तब प्रतिक्रिया उपस्थित होती है, जो कहती है, 'यह करो', अथवा 'यह न करो' अहं-पदार्थ की इस अवस्था को ही इच्छा कहते हैं।  इच्छा का एक भी कण ऐसा नहीं है, जो प्रतिक्रिया का प्रतिफल न हो।  अतएव इच्छा से पूर्व बहुत सी बातें होती हैं।
ह इच्छा - अहंभाव से निर्मित कोई वस्तु है, और अहंभाव का सृजन कुछ और ऊँची वस्तु --'बुद्धि' से होता है और वह 'बुद्धि' भी अविभक्त प्रकृति का रूपान्तरण है। यह विचार बौद्धों का था कि हम जो कुछ भी देखते हैं, वह 'इच्छा' ही है। यह धारणा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बिलकुल गलत है।  क्योंकि इच्छा केवल या प्रेरक नाड़ियों
 में ही पायी जा सकती है। यदि तुम प्रेरक या संचालक तंत्रिकाओं, ' motor nerves' को निकाल दो, तो मनुष्य में किसी प्रकार की इच्छा नहीं रह जाती। जैसा कि सम्भवतः तुम लोग जानते होगे, कि वैज्ञानिकों को यह तथ्य निम्न श्रेणी के पशुओं पर अनेक प्रयोग करने के बाद ज्ञात हुआ है।
 हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे। मनुष्य में विद्य्मान महान सिद्धान्त ' महत' या 'बुद्धि'  सम्बन्धी बात को समझना बहुत जरुरी है। यह बुद्धि भी एक वस्तु  में रूपान्तरित हो जाती है, जिसे अहंभाव कहते हैं और 'बुद्धि' शरीर की समस्त शक्तियों का कारण है। इसके अन्तर्गत अवचेतन, चेतन एवं अतिचेतन सब आ जाते हैं। ये तिन अवस्थाएँ-  क्या हैं ?
अवचेतन या  'sub-consciousness ' अवस्था, जिसे जन्मजात-प्रवृत्ति ( instinct) कहते हैं, उसे हम पशुओं में देख सकते हैं। इसमें प्रायः भूल नहीं होती, यह लगभग अचूक है,किन्तु यह बहुत सीमित होती है।  जन्मजात-प्रवृत्ति शायद ही कभी विफल होती है।  पशु खाद्य एवं विषाक्त वनसप्ति में सहज ही विभेद कर लेता है; परन्तु उसकी जन्मजात-प्रवृत्ति बहुत सीमित होती है, जैसे ही कोई नयी वस्तु आ जाती है, वह कुछ नहीं समझ पाता। (पशु भ्रष्टाचार इसीलिये नहीं करते कि उनके पास तर्कशील बुद्धि नहीं होती) वह यन्त्रवत कार्य करता है।  इसके बाद ज्ञान (consciousness या चेतना ) की उच्च अवस्था आती है, जिसमें भूल और बहुधा गलतियाँ होती हैं, किन्तु इसका क्षेत्र अपेक्षाकृत विस्तृत है, यद्द्पि यह सचेत (slow) है। इसे हम तर्कशील बुद्धि (reasoning) की संज्ञा देते हैं।  इसका दायरा सहज-प्रवृत्ति से बहुत विस्तृत है, किन्तु सहज-प्रवृत्ति तर्कशील बुद्धि की अपेक्षा अधिक असंदिग्ध निर्णय कर सकती है। सहज-प्रवृति से प्रेरित होकर कर्म करने की अपेक्षा तर्कशील बुद्धि (reasoning) से प्रेरित होकर कर्म करने में अधिक गलतियाँ होने की सम्भावना होती है।
 मन की इससे भी भी ऊँची एक अवस्था है--अतिचेतन (super-consciousness) जो केवल योगियों में होती है, जिन्होंने उसका विकास किया है (who have cultivated it उसकी उपलब्धि की है)। यह अमोघ है, इसके निर्णय में कोई भूल नहीं हो सकती, और तर्कशील बुद्धि की अपेक्षा इसका दायरा भी बहुत अधिक व्यापक है। यह उच्चतम अवस्था है। अतएव हमें स्मरण रखना चाहिये कि यह महत ही उन सबका वास्तविक कारण है, जो कुछ यहाँ है; यानि वह महत जो अपने को विभिन्न प्रकार से व्यक्त करता है, जिसके अन्तर्गत अवचेतन, चेतन एवं अतिचेतन तीन अवस्थायें हैं, जिनमें ज्ञान का वास है। अब एक सूक्ष्म प्रश्न उठता है, जो हमेशा पूछा जाया करता है। यदि एक पूर्ण ईश्वर ने इस जगत की सृष्टि की है, तो इसमें अपूर्णता क्यों है ? 
जिसे हम विश्व कहते हैं, वह वही है, जो हम देखते हैं, और वह है चेतन एवं तर्कशील बुद्धि का यह लघु स्तर, जिसके परे ( beyond that) हम बिल्कुल नहीं देखते। अब हम समझ सकते हैं कि यह प्रश्न ही एक असम्भव प्रश्न है। यदि हम किसी बृहत् राशि के एक छोटे से भाग को लें और उसकी ओर दृष्टिपात करें, तो वह असंगत (बेमेल) प्रतीत होता है। यह स्वाभाविक ही है। विश्व अपूर्ण है, क्योंकि हम उसे वैसा बना लेते हैं। कैसे ? तर्कशील-बुद्धि क्या है ? ज्ञान क्या है ? ज्ञान का अर्थ है, 'finding the association' वस्तुओं की साहचर्य-प्राप्ति। तुम सड़क पर घूमते समय किसी मनुष्य को देखते हो, और कहते हो मैं जानता हूँ, कि यह मनुष्य है। क्योंकि तुमको अपने मन पर पड़े संस्कारों, चित्त पर अंकित चिन्हों का स्मरण हो आता है। तुमने बहुत से मनुष्यों को देखा है, और प्रत्येक ने तुम्हारे मन पर एक संस्कार डाला है और तुम जैसे ही इस मनुष्य को देखते हो, इसे अपने ज्ञान-भण्डार से सम्बद्ध करते हो, और वहाँ पर तुमको इसी प्रकार के बहुत से चित्र दिखाई पड़ते हैं; एवं जब तुम उन्हें देख लेते हो, तो संतुष्ट हो जाते हो और उनके साथ इस नये चित्र को भी रख देते हो। जब कोई नया संस्कार पड़ता है और उसका तुम्हारे मन में साहचर्य होता है, तो तुम सन्तुष्ट हो जाते हो। साहचर्य की इस अवस्था को ज्ञान कहते हैं। 
अतएव ज्ञान पहले से विद्य्मान अनुभव के कोष में किसी अनुभव को उसी प्रकार रखता है, जिस प्रकार एक ही वर्ग के खाते में डाला जाता है, और इस तथ्य का कि तुमको उस समय तक कोई ज्ञान नहीं हो सकता, जब तक कि तुम्हारे पास ज्ञान का पहले से कोई कोष न हो, यह सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि तुम्हारे पास पहले का कोई अनुभव चित्त में संचित नहीं है, जैसा कुछ यूरोपीय दार्शनिक मानते हैं कि तुम्हारा मन समारम्भ के लिये एक 'अनुत्क़ीर्ण फलक' (tabula rasa) की भाँति है, तो तुमको कोई ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता, क्योंकि ज्ञान का वास्तविक अर्थ मन में पहले से विद्य्मान सहचार्यों द्वारा नूतन की पहचान या स्वीकृति मात्र है। अपने पास संचित अनुभव-ज्ञान का एक भण्डार होना ही चाहिए, जिससे किसी नये संस्कार को सम्बद्ध किया जा सके। मानलो कि एक शिशु बिना ऐसे कोष के इस विश्व में जन्म लेता है, तो उसके लिये कभी भी कोई ज्ञान प्राप्त करना असम्भव हो जायगा। अतएव, शिशु पहले एक ऐसी अवस्था में अवश्य रहा होगा, जब कि उसके पास कोई ज्ञान-कोष था, इस प्रकार ज्ञान की शाश्वत रूप से वृद्धि हो रही है। इस तर्क से बचने का कोई मार्ग हो, तो मुझे बताओ। यह एक गणितीय तथ्य है।
पाश्चात्य दर्शनशास्त्र के भी कुछ दार्शनिकों का मत है कि बिना विगत ज्ञान-कोष के कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने यह धारणा बनायी है कि शिशु को जन्म से ही ज्ञान होता है। इन पाश्चात्य दार्शनिकों का कहना है कि जिन संस्कारों के साथ शिशु विश्व में जन्म लेता है, उसके विगत जीवन के कारन नहीं होते, अपितु उसके पूर्वजों के अनुभव के फलस्वरूप होते हैं। यह मात्र आनुवांशिक संक्रमणवाद ' hereditary transmission ' है। शीघ्र ही उन्हें पता चल जायगा कि यह सिद्धान्त बिलकुल गलत है। कुछ जर्मन दार्शनिक आनुवांशिकता सम्बन्धी इन विचारों पर अब कठोर प्रहार कर रहे हैं। आनुवांशिकता का सिद्धान्त बहुत अच्छा है, किन्तु अपूर्ण है, यह केवल शारीरिक पहलु पर प्रकाश डालता है। परिवेश का हम पर जो प्रभाव पड़ रहा है, उसकी व्याख्या तुम कैसे करोगे ? अनेक कारण मिलकर एक कार्य का प्रादुर्भाव करते हैं। परिवेश भी रूपान्तरकारी कार्यों में एक है। जिस प्रकार का हमारा अतीत होता है,अपने लिये ठीक वैसे ही परिवेश का निर्माण हम स्वयं कर लेते हैं; और इस प्रकार हमारा वर्तमान परिवेश हमको प्राप्त होता है। इसीलिये एक शराबी शहर की गन्दी बस्तियों की ओर स्वभावतः आकृष्ट हो जाता है। 
तुम जानते हो कि ज्ञान का क्या तात्पर्य है। ज्ञान पुराने संस्कारों के साथ किसी नवीन संस्कार को वर्गीकृत करके रखने के सदृश है-नूतन संस्कार की पहचान (recognizing) मात्र है। पहचानने (recognition) का क्या अर्थ है ? किसी व्यक्ति के पास पहले से जो संस्कार हैं, उनके तुल्य संस्कारों की साहचर्य-प्राप्ति शिनाख्त या पहचान (recognition) कहलाती है। ज्ञान का और कोई दूसरा अर्थ नहीं है। यदि यह बात है कि ज्ञान का तात्पर्य साहचर्य-प्राप्ति (finding the associations) है, तो इसका अर्थ यह होगा कि किसी चीज को जानने के लिये हमको उसके तुल्य वस्तुओं (similars) के सम्पूर्ण अनुक्रम को देखना पड़ेगा। Is it not so? क्या ऐसी बात नहीं? मानलो तुम एक कंकड़ लेते हो, साहचर्य ज्ञात करने के लिये उसीके सदृश कंकड़ के सम्पूर्ण अनुक्रम को तुम्हें देखना होगा।
किन्तु सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड की अवधारणा बनानी हो, तो हम वैसा नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे मन के संचित खानों (pigeon-hol) में प्रत्यक्ष-बोध (अभिज्ञता या perception) का मात्र एक ही आलेख है, हमारे पास उसी प्रकृति अथवा वर्ग का कोई अन्य प्रत्यक्ष-बोध नहीं है, हम उसकी अन्य किसी प्रत्यक्ष-बोध से तुलना नहीं कर सकते। हम उसको उसके सहचार्यों से सम्बद्ध नहीं कर सकते। हमारी चेतना (consciousness) से पृथक विश्व-ब्रह्माण्ड का यह टुकड़ा हमारे लिये आश्चर्यजनक नूतन पदार्थ है, क्योंकि हम इसके साहचार्यों से सम्बद्ध नहीं कर सकते। अतएव हम इससे संघर्ष कर रहे हैं, और इसे दुष्ट, भयावह तथा बुरा समझते हैं; हम किसी समय इसे अच्छा भी समझ सकते हैं, किन्तु हमारा सदैव यह विचार रहता है कि यह अपूर्ण है। ब्रह्माण्ड तभी जाना जा सकता है, जबकि हम उसके साहचर्यों को पा सकें। इसकी पहचान हमें तभी मिलेगी जब हम इस ब्रह्माण्ड और चेतना के परे चले जायेंगे, और तब यह विश्व-ब्रह्माण्ड हमें स्वतः व्याख्यात हो जायगा। 
जब तक हम यह नहीं कर पाते, हमारी सारी माथापच्ची ब्रह्माण्ड की व्याख्या कभी नहीं कर सकती, क्योंकि ज्ञान "finding of similars" हमेशा तुल्य-वस्तु की प्राप्ति है, और हमारी चेतना का यह साधारण स्तर इसका हमें मात्र एक ही प्रत्यक्ष-बोध प्रदान करता है।  
यही बात ईश्वर के प्रति हमारी अवधारणा के सम्बन्ध में है। ईश्वर का हमको जो सब कुछ दिखायी पड़ता है, वह अंश मात्र है, उसी प्रकार जिस प्रकार हम विश्व के केवल एक अंश को देखते हैं और शेष 'beyond human cognition' मानव-बोध से परे है। " मैं अनन्तस्वरुप हूँ।  मैं इतना वृहद् हूँ कि यह ब्रह्माण्ड भी केवल मेरा एक अंश मात्र है !"

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
                           विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ।।गीता १०/४२ ।।
एतेन = इस; बहुना = बहुत; ज्ञातेन = जानने से; तव = तेरा; किम् = क्या प्रयोजन है; इदम् = इस; कृत्स्त्रम् = संपूर्ण; जगत् = जगत् को (अपनी योगमाया के ); एकांशेन = एक अंशमात्र से; विष्टभ्य = धारण करके 
अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन हैं। बस इतना ही समझ ले कि मैं ही इस सम्पूर्ण जगत् को अपनी योग शक्ति के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ ।।10 /42।।
यही कारण है कि ईश्वर भी हमें अपूर्ण दिखायी पड़ता है, और हम 'उसे ' समझ नहीं पाते। 'उसे' (अपने अनन्त स्वरुप को) तथा ब्रह्माण्ड को समझने का एकमात्र उपाय यह है कि हम तर्कशील बुद्धि एवं चेतना के परे 'beyond consciousness' चले जायें।' भगवान कृष्ण कहते हैं, "जब श्रुत और श्रवण, विचार तथा चिन्तन, इन सबके परे जाओगे, तभी सत्य-लाभ करोगे। "

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
                        तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।। गीता २/५२ ।।
 यदा = जिस कालमें ; ते = तेरी ; बुद्धि: = बुद्धि ; तदा = तब ; (त्वम्) = तूं ; श्रोतव्यस्य = सुननेयोग्य ; च = और ; मोहकलिलम् = मोहरूप दलदलको ; व्यतितरिष्यति = बिल्कुल तर जायगी ; श्रुतस्य = सुने हुएके ; निर्वेदम् = वैराग्यको ; गन्तासि = प्राप्त होगा ;
जिस  क्षण तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल (अहं ) को भलीभाँति पार कर जायेगी, उसी क्षण तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी सच्चायी को जान  जाओगे और तुम्हें स्वतः समस्त भोगों से वैराग्य हो जायेगा ।।2 /52।।
भगवान यह भी कहते हैं कि, " हे अर्जुन, तुम  शास्त्र की सीमा के बाहर चले जाओ, क्योंकि वे केवल प्रकृति और तीन गुणों तक की ही शिक्षा देते है। " जब हम इनके परे जाते हैं, तब हमें अविरोध (समानता harmony) की प्राप्ति होती है, इसके पूर्व नहीं। 
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
                  निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।गीता २/४५ ।।

त्रैगुण्यविषया: = तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारको विषय करनेवाले अर्थात प्रकाश करने वाले हैं (इसलिये तूं) ; निस्त्रैगुण्य: = असंसारी अर्थात निष्कामी (और) ; निर्द्वन्द्व: = सुख दु:खादि द्वन्द्वोंसे रहित ; नित्यसत्वस्थ: = नित्य वस्तुमें स्थित (तथा) ; निर्योगश्रेम: = योग क्षेमको न चाहनेवाला (और) ; आत्मवान् = आत्मपरायण ; भव = हो ;
हे अर्जुन ! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं। इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों, आसक्ति हीन, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित, नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित योगक्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्त:करण वाला हो ।।45।।

सूक्ष्म ब्रह्माण्ड (microcosm)तथा बृहत ब्रह्माण्ड (macrocosm) वास्तव में एक ही योजना के अनुसार निर्मित हैं, और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड में हम केवल एक अंश --मध्य भाग --को ही जानते हैं। हम न अवचेतन (sub-conscious) को जानते हैं, न अतिचेतन (super-conscious) को। हम केवल चेतन (conscious) को ही जानते हैं। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि "I am a sinner" या  मैं पापी हूँ, तो वह मिथ्या कथन करता है; क्योंकि वह अपने को नहीं जानता। वह मनुष्यों में अत्यन्त अज्ञ है, अपने विषय में वह अंश मात्र जानता है; क्योंकि वह जिस भूमि पर है, उसका ज्ञान (उसकी तर्कशील बुद्धि) उसके केवल एक ही भाग को स्पर्श करता है। यही बात इस ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में है, तर्कशील बुद्धि (reason) के द्वारा इसके केवल एक पहलू को जानना सम्भव है, सम्पूर्ण को नहीं; क्योंकि ब्रह्माण्ड का निर्माण अवचेतन, चेतन, अतिचेतन, व्यक्तिगत महत, सार्वभौम महत तथा परवर्ती परिणामों से होता है।
प्रकृति रूपान्तरित क्यों होती है ? अब तक हमने देखा कि प्रत्येक वस्तु, समस्त प्रकृति जड़, अचेतन है। यह सब यौगिक (compound) एवं अचेतन (insentient) है। जहाँ भी नियम है, (जो भी नियम से बंधा हुआ है ) यह सिद्ध है कि उसका कार्यक्षेत्र अचेतन है।  मन, बुद्धि, इच्छा और अन्य सभी अचेतन है। किन्तु ये सब किसी चेतना का, ' the "Chit" of some being who is beyond all this ' किसी ऐसे सत् पदार्थ के चित् का प्रतिबिम्बन कर रहे हैं, जो इन सब से परे है, जिसे सांख्य दार्शनिक 'पुरुष' संज्ञा से सम्बोधित करते हैं। पुरुष ही विश्व के सम्पूर्ण परिवर्तनों का सक्षिस्वरूप कारण (बेखबर कारण : unwitting cause) है। 
इसका तात्पर्य यह हुआ कि सार्वभौमिक अर्थ में पुरुष को ग्रहण करने पर, वही ब्रह्माण्ड का प्रभु है।  यह कहा जाता है कि ईश्वर की इच्छा ने ब्रह्माण्ड की रचना की है। सामान्य भाषा में ऐसा कहना ठीक है, परन्तु हम देखते हैं कि यह बात सत्य नहीं है। इच्छा कारण कैसे बन सकती है ? प्रकृति में इच्छा तीसरी या चौथी अभिव्यक्ति है।  बहुत से तत्वों का अस्तित्व इसके पूर्व है, उनका सृजन किसने किया ? इच्छा एक यौगिक तत्व (compound) है, और प्रत्येक यौगिक पदार्थ की उत्पत्ति प्रकृति से होती है। अतएव इच्छा प्रकृति की सृष्टि नहीं कर सकती। अतः यह कहना कि ईश्वर की इच्छा से ब्रह्माण्ड की रचना हुई है, अर्थहीन है। हमारी इच्छा अहंभाव के छोटे से हिस्से को ही आच्छादित करती है, और हमारे मस्तिष्क को परिचालित करती है। इच्छा वह तत्व नहीं है, जिससे हमारा शरीर या ब्रह्माण्ड परिचालित हो रहा है। हमारा शरीर जिस शक्ति के द्वारा गतिशील होता है, इच्छा उसकी आंशिक अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड में इच्छा का अस्तित्व है, किन्तु वह ब्रह्माण्ड का एक अंश मात्र है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसी इच्छा के द्वारा संचालित नहीं हो रहा है। यही कारण है कि हम इसकी व्याख्या ' इच्छा-सिद्धान्त' (will theory) के अधर पर नहीं कर सकते। मानलो कि मैं यह सही मानता हूँ कि इच्छा-शक्ति ही शरीर का संचालन संचालन कर रही है, लेकिन जब मैं यह पाता हूँ कि यह मेरी इच्छानुसार कार्य नहीं करता, तो मुझे झुँझलाहट होती है। इसी प्रकार जब मैं यह मानता हूँ कि ब्रह्माण्ड का नियमन इच्छा-शक्ति ही कर रही है, और कुछ ऐसी वस्तुओं को पाता हूँ, जो इसका अनुसरण नहीं करती हैं, तो इसमें मेरा ही दोष है। 
अतएव पुरुष इच्छा नहीं है, और नतो वह बुद्धि ही हो सकता है, क्योंकि स्वयं बुद्धि भी एक यौगिक पदार्थ है। मस्तिष्क के समानान्तर किसी जड़ पदार्थ के अस्तित्व के बिना बुद्धि का अस्तित्व सम्भव नहीं है। जहाँ कहीं भी बुद्धि है, वहाँ मस्तिष्क के सदृश कोई पदार्थ अवश्य ही होगा, जो एक विशिष्ट रूप में गठित होकर मस्तिष्क का कार्य करता है। किन्तु स्वयं बुद्धि एक यौगिक तत्व है। तो फिर पुरुष क्या है? यह न तो बुद्धि है, और न इच्छा ही बल्कि यह इन सबका कारण है। उसके ही सानिध्य में इनमें क्रिया उत्पन्न होती है, एवं इन सबका परस्पर संयोग होता है। यह प्रकृति से अनासक्त रहता है; यह बुद्धि या महत नहीं, बल्कि आत्मा --निर्गुण पुरुष है। भगवान् (पुरुष या आत्मा) में जो कर्तापन का अभाव दिखलाया गया, अब उस को स्पष्ट करने के लिये कहते हैं- भगवान कहते हैं- " मैं साक्षी हूँ, और मेरे साक्षिस्वरूप होने के कारण ही प्रकृति जड़, चेतन सबको उत्पन्न कर रही है। " 
मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् ।
                      हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।।गीता ९/१०।।
कौन्तेय = हे अर्जुन ; मया = मुझ ; अध्यक्षेण = अधिष्ठाता के सकाश से (यह मेरी) ; प्रकृति: = माया ; सचराचरम् = चराचरसहित सर्व जगत् को ; सूयते = रचती है (और) ; अनेन = इस (ऊपर कहे हुए) ; हेतुना = हेतु से (ही) ; जगत् = यह संसार ; विपरिवर्तते = आवागमनरूप चक्र में घूमता है ; 
 प्रकृति में चेतनता (sentience) कहाँ से आयी ? हम पाते हैं कि यह चेतनता बुद्धि है, जिसे चित् कहा जाता है। चेतनत्व का आधार पुरुष है, पुरुष का यह स्वभाव है। यह वह तत्व है --जिसकी व्याख्या नहीं की सकती, लेकिन जिसे हम ज्ञान कहते हैं, उसका वह कारण है।  पुरुष अहंकार (consciousness) नहीं है, क्योंकि अहंकार यौगिक है, किन्तु अहंकार में जो कुछ भी शुभ या प्रकाशस्वरूप है, वह पुरुष का अंश है।  पुरुष बुद्धि (conscious) नहीं है, लेकिन बुद्धि में जितना भी प्रकाश (intelligence) है, वह उसे पुरुष से ही ग्रहण करती है। पुरुष में चेतनता तो है, किन्तु पुरुष न तो बुद्धिमान ही है, न ज्ञानवान ही। अपने चारों ओर हम जो कुछ भी देख रहे हैं, वह प्रकृति एवं पुरुष में निहित चित् का (The Chit in the Purusha plus Prakriti) मिश्रण है। 
 "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति।" बृ.उ.४।३।३२  'जहाँ कहीं भी कोई सुख है, जहाँ भी कोई आनन्द है, वहाँ उस अमृत-तत्व की चिनगारी है, जिसे ईश्वर कहते हैं। पुरुष (कृष्ण) ही विश्व-ब्रह्माण्ड का आकर्षण-केन्द्र है; यद्दपि यह उससे अप्रभावित एवं असंयुक्त है, तथापि यह समग्र ब्रह्माण्ड को आकृष्ट करता है।' 
मनुष्य को स्वर्ण-मृग के पीछे दौड़ लगाते देखा जाता है, क्योंकि इसके पीछे पुरुष की चिनगारी है, यद्दपि अधिक मात्रा में यह मल से युक्त है। जब कोई मनुष्य अपने बच्चों से से प्यार करता है, या कोई स्त्री अपने पति से प्यार करती है, तो उनको आकृष्ट करने वाली कौन सी शक्ति होती है ? वह उनके पीछे पुरुष का स्फुलिंग ही है। यह वहाँ विद्य्मान है, केवल वह 'मल' से आवेष्टित है। उसके सिवा  कोई आकृष्ट नहीं कर सकता है। ' इस जड़ संसार में केवल पुरुष ही चैतन्य है। ' यही सांख्य का पुरुष है। इस धारणा के अनुसार, पुरुष अवश्य ही सर्वव्यापी होगा। जो सर्वव्यापी नहीं है, वह निश्चित रूप से ससीम होगा। सभी सीमायें कारणोत्पन्न हैं; जो कार्यस्वरूप हैं, उनका आदि और अन्त है। यदि पुरुष ससीम है, तो यह विनाश को प्राप्त होगा, मुक्त नहीं होगा, चरम तत्व नहीं हो पायेगा, बल्कि यह भी कारणोंत्पन्न हो जायेगा। अतएव यह सर्वव्यापी है।
कपिल के अनुसार पुरुष बहुसंख्यक हैं, एक नहीं, बल्कि अनन्त संख्यक हैं। मुझमें और तुममें एक एक पुरुष है, और इसी प्रकार सबमें अलग अलग पुरुष का निवास है; एक अनन्त वृत्तों की परम्परा, जो प्रत्येक अपने अपने में अनन्त है, विश्व में गतिमान है।  पुरुष न तो जड़ है और न तो मन ही, इसके द्वारा प्रेषित प्रतिबिम्ब को ही हम जान पाते हैं। जब यह सर्वव्यापी है, तो यह निश्चित रूप से जन्म एवं मृत्यु से परे है।  प्रकृति इस पर अपनी प्रतिच्छाया --जन्म एवं मृत्यु की प्रतिच्छाया --प्रक्षिप्त करती है; परन्तु यह पुरुष स्वभावतः शुद्ध है। यहाँ तक तो हम सांख्य दर्शन को प्रशंसनीय पाते हैं। 
अब हम इसके (सांख्य-दर्शन के) विरुद्ध दी गयी युक्तियों पर विचार करेंगे। यहाँ तक व्याख्या पूर्ण है, एवं मनोविज्ञान के आधार पर देखें तो किसी भी विवाद से ऊपर है। 'division of the senses into organs and instruments' 'अहंभाव' का संवेदक 'इन्द्रियों' एवं संवेदन-वाहक 'यन्त्रों' (आँख-कान -नाक आदि ) में विभक्त हो जाना इस बात का प्रमाण है, वे अयौगिक (परिशुद्ध या simple) नहीं बल्कि यौगिक (मिश्रित या compound) हैं। 'अहंभाव'  (egoism) को इन्द्रिय एवं जड़ (तन्मात्राओं) , इन दो भागों में विभक्त कर हम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि यह (अहं) भी जड़ पदार्थ है और महत भी जड़ पदार्थ की एक अवस्था है। इस प्रकार अन्त में हम 'पुरुष' की उपलब्धि करते हैं। यहाँ तक इस सिद्धान्त से कोई विरोध नहीं। 
लेकिन यदि हम सांख्यवादियों से यह प्रश्न करें कि -प्रकृति की सृष्टि किसने की ? तो उनका उत्तर होगा कि पुरुष एवं प्रकृति अनादि एवं सर्वव्यापी (uncreated and omnipresent) हैं, और पुरुषों की संख्या अनन्त है। हमें इन वाक्यों का विरोध करना है, और एक श्रेष्ठ समाधान की उपलब्धि करनी है। और इस समाधान को खोजने के क्रम में हम अद्वैत मत की उपलब्धि करेंगे। हमारा प्रथम प्रतिवाद है, कि --" how can there be these two infinities? " दो अनन्त तत्व कैसे रह सकते हैं ? और फिर यह युक्ति देंगे कि सांख्य एक सर्वांगपूर्ण सामान्यीकरण नहीं है, और इसमें हमें कोई समाधान नहीं प्राप्त होता। पुनः हम देखेंगे कि वेदान्ती किस प्रकार इन कठिनाइयों को पार करते हैं और एक सर्वांगीण समाधान को प्राप्त करते हैं। इसके बावजूद हमें इस वेदान्ती-समाधान प्राप्त करने का सारा श्रेय सांख्य को ही देना होगा । क्योंकि जब एक प्रासाद का निर्माण हो जाता है, तो उसका अन्तिम सौंदर्य-प्रसाधन (finishing touch ) देना आसान हो जाता है। ( १-८-१८९६ को न्यूयार्क में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिया गया भाषण )
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( हम देखेंगे कि किन्तु अहंभाव का इन्द्रियों, यंत्रों और जड़ तन्मात्राओं में रूपान्तरित होना या दो विभिन्न प्रजातियों में विभक्त हो जाना, केवल विवर्त है, परिणाम नहीं है।)