*परिच्छेद- ४*
⚜️राजेन्द्र के घर पर ब्राह्म भक्त-सम्मेलन में श्रीरामकृष्ण⚜️
(१)
राम, मनोमोहन आदि के संग में*
राजेन्द्र मित्र का घर ठनठनिया में बेचु चटर्जी की गली में है । मनोमोहन के घर पर 'उत्सव' के दिन श्री केशव ने राजेन्द्र बाबू से कहा था, 'आपके घर पर इसी प्रकार एक दिन [धार्मिक उत्स्व या भक्त-सम्मेलन] हो तो अच्छा है ।' राजेन्द्र आनन्दित होकर उसी की तैयारी कर रहे हैं ।
At Keshab's request Rajendra Mitra arranged a religious festival at his home in Calcutta and invited Sri Ramakrishna and the devotees, including the members of the Brahmo Samaj.
রাজেন্দ্র মিত্রের বাটী ঠনঠনে বেচু চাটুজ্যের গলি। মনোমোহনের বাটীতে উৎসবের দিন শ্রীযুক্ত কেশব রাজেন্দ্রবাবুকে বলিয়াছিলেন, আপনার বাড়িতে এইরূপ একদিন উৎসব হয়, বেশ হয়। রাজেন্দ্র আনন্দিত হইয়া তাহার উদ্যোগ করিতেছেন।
आज शनिवार है, 10 दिसम्बर 1881 ई.। आज उत्सव होना निश्चित हुआ है । अनेक भक्त पधारेंगे - केशव आदि ब्राह्म भक्तगण भी आयेंगे । इसी समय उमानाथ ने राजेन्द्र को ब्राह्मभक्त भाई अघोरनाथ की मृत्यु का समाचार सुनाया । अघोरनाथ ने लखनऊ शहर में रात्रि के दो बजे शरीर-त्याग किया है, उसी रात को तार द्वारा यह समाचार आया है । (8 दिसम्बर, 1881 ई.) । उमानाथ दूसरे ही दिन यह समाचार ले आये हैं । केशव आदि ब्राह्मभक्तों ने अशौच ग्रहण किया है। यह सोचकर कि शनिवार को वे कैसे आयेंगे, राजेन्द्र चिन्तित हो रहे हैं ।
Two days before, Aghorenath, a prominent member of the Brahmo Samaj, had suddenly passed away in Lucknow. Keshab and the other Brahmo devotees were in mourning, and Rajendra thought they could not possibly join in the festival at his house. This worried him.
আজ শনিবার, ১০ই ডিসেম্বর, ১৮৮১ খ্রীষ্টাব্দ, ২৬শে অগ্রহায়ণ, ১২৮৮। আজ উৎসব হইবে স্থির হইয়াছে। খুব আনন্দ — অনেক ভক্ত আসিবেন — কেশব প্রভৃতি ব্রাহ্মভক্তগণও আসিবেন। মন সময় ব্রাহ্মভক্ত ভাই অঘোরনাথের মৃত্যুসংবাদ উমানাথ রাজেন্দ্রকে জানাইলে। অঘোরনাথ লক্ষ্ণৌ নগরে রাত দুটার সময় শরীরত্যাগ করিয়াছেন, সেই রাত্রেই তারযোগে এই সংবাদ আসিয়াছে। ৮ই ডিসেম্বর, ২৪শে অগ্রহায়ণ। উমানাথ পর দিনেই ওই সংবাদ লইয়া আসিয়াছেন। কেশবাদি ব্রাহ্মভক্তগণ অশৌচ গ্রহণ করিয়াছেন — শনিবারে তাঁহারা কেমন করিয়া আসিবেন, রাজেন্দ্র চিন্তিত হইলেন।
राम राजेन्द्र से कह रहे हैं, "आप क्यों सोच रहे हैं ? केशव बाबू नहीं आयेंगे तो न आये । श्रीरामकृष्ण तो आयेंगे । आप तो जानते ही है कि वे सदा समाधिमग्न रहा करते हैं । उनकी कृपा से दूसरे को भी ईश्वर का दर्शन हो सकता है । उनकी उपस्थिति से यह उत्सव सफल हो जायगा।"
But Ram, the Master's devotee, said to him: "Why are you so sad? If Keshab can't come, let him stay away. Our Master will be here. He is always in communion with God. He enables one to see God. And his presence will make the festival a success."
রাম রাজেন্দ্রকে বলিতেছেন — আপনি কেন ভাবছেন? কেশববাবু নাই বা এলেন। ঠাকুর আসিতেছেন — আপনি কি জানেন না তিনি সর্বদা সমাধিস্থ, ঈশ্বরকে প্রত্যক্ষ করিতেছেন, — যাঁর আনন্দে জগৎ আনন্দ আস্বাদন করছে।
राम, राजेन्द्र, राजमोहन व मनोमोहन केशव से मिलने गये । केशव ने कहा "कहाँ, मैंने ऐसा तो नहीं कहा कि मै नहीं आऊँगा । श्रीरामकृष्णदेव आयेंगे और मैं न आऊँगा ? - अवश्य आऊँगा; अशौच हुआ है तो अलग स्थान पर बैठकर खा लूँगा ।"
Rajendra, accompanied by Ram and a few others, paid Keshab a visit to express their condolence for the death of Aghorenath. Keshab said to Rajendra: "Why, I haven't said I shall not join in the festival at your house. Sri Ramakrishna will be there; so how can I stay away? I am in mourning, it is true, but I shall come."
রাম, রাজেন্দ্র, রাজমোহন, মনোমোহন কেশবের সঙ্গে দেখা করিলেন। কেশব বলিলেন, “কই, আমি এমন কথা বলি নাই যে আমি যাব না। পরমহংস মহাশয় আসবেন আর আমি যাব না? অবশ্য যাব; অশৌচ হয়েছে, তা আলাদা জায়গায় বসে খাব।”
केशव राजेन्द्र आदि भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । कमरे में श्रीरामकृष्ण का समाधि-चित्र टँगा हुआ है ।
On the wall in Keshab's room hung a picture of Sri Ramakrishna absorbed in samadhi.
কেশব রাজেন্দ্র প্রভৃতি ভক্তদের সহিত কথা কহিতেছেন। ঘরে শ্রীরামকৃষ্ণের সমাধিচিত্র টাঙ্গান ছিল।
राजेन्द्र - (केशव के प्रति) - श्रीरामकृष्णदेव को अनेक लोग चैतन्य का अवतार कहते हैं ।
RAJENDRA (to Keshab): "Many people say that he (pointing to the picture) is an incarnation of Chaitanya."
রাজেন্দ্র (কেশবের প্রতি) — পরমহংস মহাশয়কে অনেকে বলে চৈতন্যের অবতার।
केशव - (समाधि-चित्र को देखकर) - इस प्रकार की समाधि प्रायः नहीं देखी जाती । ईसा मसीह, मुहम्मद, चैतन्य इनको हुआ करती थी ।
KESHAB (looking at the picture): "One doesn't see such samadhi. Only men like Christ, Mohammed, and Chaitanya experienced it."
কেশব (সমাধিচিত্র দেখিয়া) — এরূপ সমাধি দেখা যায় না। যীশুখ্রীষ্ট, মহম্মদ, চৈতন্য এঁদের হত।
दिन के तीन बजे के समय मनोमोहन के घर पर श्रीरामकृष्ण पधारे । वहाँ पर विश्राम करके थोड़ा जलपान किया । फिर सुरेन्द्र उन्हें गाड़ी पर चढ़ाकर 'बेंगाल फोटोग्राफर' के स्टुडिओ में ले गये । फोटोग्राफर ने कैसे फोटो लिया जाता है दिखा दिया । काँच के पीछे सिलवर नाइट्रेट (Silver Nitrate) लगायी जाती है, उस पर फोटो उतरता है - यह सब बतला दिया । श्रीरामकृष्ण का फोटो लिया जा रहा है, उसी समय वे समाधिमग्न हो गये ।
About three o'clock in the afternoon Sri Ramakrishna arrived at Manomohan's house. He rested there awhile and had some refreshments. Surendra took the Master in a carriage to the studio of the Bengal Photographer. The art of photography was explained to him, and he was shown how glass covered with silver nitrate takes the image. As the Master was being photographed he went into samadhi.
বেলা ৩টার সময় মনোমোহনের বাটীতে শ্রীরামকৃষ্ণ আসিয়াছেন। সেখানে বিশ্রাম করিয়া একটু জলযোগ করিলেন। সুরেন্দ্র বলিতেছেন — আপনি কল দেখবেন বলেছিলেন — চলুন! তাঁহাকে গাড়ি করিয়া সুরেন্দ্র বেঙ্গল ফটোগ্রাফারের ষ্টুডিওতে লইয়া গেলেন। ফটোগ্রাফার দেখাইলেন কিরূপে ছবি তোলা হয়। কাঁচের পিছনে কালী (Silver Nitrate) মাখান হয়; তারপর ছবি উঠে। ঠাকুরের ছবি লওয়া হইতেছে — অমনি তিনি সমাধিস্থ হইলেন।
अब श्रीरामकृष्ण राजेन्द्र मित्र के मकान पर आये हैं । राजेन्द्र मित्र (राम और मनमोहन के मौसा) रिटायर्ड डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं । श्री महेन्द्र गोस्वामी आँगन में भागवत का प्रवचन कर रहे हैं । अनेक भक्तगण उपस्थित हैं - केशव अभी तक नहीं आये । श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं ।
A little later Sri Ramakrishna arrived at Rajendra Mitra's house. Keshab had not yet come, and Mahendra Goswami was reading from the Bhagavata. The Master conversed with the devotees.
এইবার ঠাকুর রাজেন্দ্র মিত্রের বাটীতে আসিয়াছেন। রাজেন্দ্র পুরাতন ডেপুটি ম্যাজিস্ট্রেট।শ্রীযুক্ত মহেন্দ্র গোস্বামী বাটীর প্রাঙ্গণে ভাগবত পাঠ করিতেছেন। অনেক ভক্ত উপস্তিত — কেশব এখনও আসিয়া পৌঁছান নাই। শ্রীরামকৃষ্ণ কথা কহিতেছেন।
[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]
⚜️गृहस्थ के लिए मार्ग क्या है?⚜️
[ गृहस्थ के लिए परमपद (=परमहंस पद) प्राप्त करने का क्या मार्ग है?....
जो भजे 'हरि' को सदा वही परमपद पायेगा !
(What is the way for a householder to attain
the supreme position (Paramhansa position)?]
श्रीरामकृष्ण - (भक्तों के प्रति ) - गृहस्थी में धर्म (=भक्ति) होगा क्यों नहीं ? परन्तु है बड़ा कठिन। आज बागबाजार के पुल पर से होकर आया । कितने जंजीरों से उसे बाँधा है ! एक जंजीर के टूटने से भी पुल का कुछ न होगा, क्योंकि वह और भी अनेक जंजीरों से बँधा हुआ है । वे सब उसे खींचे रहेंगे । उसी प्रकार गृहस्थों के अनेक बन्धन हैं, ईश्वर की कृपा के बिना उन बन्धनों के कटने का उपाय नहीं है ।
MASTER: "Why shouldn't one be able to lead a spiritual life in the world? But it is extremely difficult. While coming here I passed over the bridge at Baghbazar. How many chains it is tied with! Nothing will happen if one chain is broken, for there are so many others to keep it in place. Just so, there are many ties on a worldly man. There is no way for him to get rid of them except through the grace of God.
শ্রীরামকৃষ্ণ (ভক্তদের পতি) — সংসারে হবে না কেন? তবে বড় কঠিন। আজ বাগবাজারের পুল হয়ে এলাম। কত বন্ধনেই বেঁধেছে। একটা বন্ধন ছিঁড়লে পুলের কিছু হবে না। আরও অনেক শিকল দিয়ে বাঁধা আছে — তারা টেনে রাখবে। তেমনি সংসারীদের অনেক বন্ধন। ভগবানের কৃপা ব্যতিরেকে সে বন্ধন যাবার উপায় নাই।
“उनका दर्शन #होने पर फिर कोई भय नहीं है । उनकी माया में विद्या और अविद्या दोनों ही हैं; पर दर्शन के बाद मनुष्य निर्लिप्त हो जाता है । परमहंस-स्थिति प्राप्त होने पर यह बात ठीक तरह से समझ में आती है । दूध में जल है, हंस दूध लेकर जल (देह-मन इन्द्रियों की गुलामी) को छोड़ देता है, पर केवल हंस ही ऐसा कर सकता है, बतख नहीं ।”
(#ठाकुर-माँ -स्वामीजी की कृपा से आत्मसाक्षात्कार ? सच्चिदानन्द स्वरुप का दर्शन होने पर.)
"One need not be afraid of the world after one has had the vision of God. Both vidya and avidya exist in His maya; but one becomes indifferent to them after realizing God. One understands it rightly after attaining the State of a Paramahamsa. Only a swan can discard the water and drink the milk from a mixture of milk and water. A robin cannot do so."
“তাঁকে দর্শন করলে আর ভয় নাই; তাঁর মায়ার ভিতর বিদ্যা-অবিদ্যা দুই আছে; — দর্শনের পর নির্লিপ্ত হতে পারে। পরমহংস অবস্থায় ঠিক বোধ হয়। দুধে জলে আছে, হাঁসে যেমন দুধ নিয়ে জল ত্যাগ করে। হাঁস পারে কিন্তু শালিক পারে না।”
[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]
⚜️गृहस्थ के लिए परमपद=परमहंस पद पाने का उपाय है गुरुवाक्य में विश्वास⚜️
[For a householder, the way to attain the supreme position = Paramhans position is to believe in the words of the Guru⚜️]
एक भक्त - फिर गृहस्थ के लिए क्या उपाय है ?
A DEVOTEE: "Then what is the way for a householder?"
একজন ভক্ত — তবে সংসারীর উপায় কি?
श्रीरामकृष्ण – गुरु-वाक्य में विश्वास । उनकी वाणी का सहारा लेकर, उनका वाक्यरूपी खम्भा पकड़कर घूमो, गृहस्थी का काम करो ।
MASTER: "Faith in the guru's words. You should depend on his instruction. Do your duties in the world, holding fast to his words, like a person whirling round and holding fast to a pillar.
শ্রীরামকৃষ্ণ — গুরুবাক্যে বিশ্বাস। তাঁর বাক্য অবলম্বন; তাঁর বাক্যরূপ খুঁটি ধরে ঘোরো, সংসারের কাজ করো।
[(10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]
सरल विश्वास से क्या नहीं प्राप्त किया जा सकता !!
(What cannot be achieved by simple
faith like that of a shell in the Name!!)
“गुरु को मनुष्य नहीं मानना चाहिए । सच्चिदानन्द ही गुरु (जगतगुरु श्रीरामकृष्णदेव) के रूप में आते हैं । गुरु की कृपा से इष्ट का दर्शन होता है । उस समय गुरु इष्ट में लीन हो जाते हैं ।
"One must not look on one's guru as a mere human being: it is Satchidananda Himself who appears as the guru. When the disciple has the vision of the Ishta, through the guru's grace, he finds the guru merging in Him.
“গুরুকে মানুষবুদ্ধি করতে নাই। সচ্চিদানন্দই গুরুরূপে আসেন। গুরুর কৃপায় ইষ্টকে দর্শন হয়, তখন গুরু ইষ্টতে লীন হয়ে যান।
"सरल विश्वास से क्या नहीं प्राप्त किया जा सकता !! एक समय किसी गुरु के यहाँ अन्नप्राशन हो रहा था । उस अवसर पर शिष्यगण, जिससे जैसा बना, उत्सव का आयोजन कर रहे थे । उनमें एक दीन विधवा भी शिष्या थी । उसके एक गाय थी । वह एक लोटा दूध लेकर आयी । गुरुजी ने सोचा था कि दूध-दही का भार वही लेगी, किन्तु एक लोटा दूध देखकर क्रोधित हो उन्होंने उस लोटे को फेंक दिया और कहा, 'तू जल में डूबकर मर क्यों नहीं गयी ?' स्त्री ने गुरु का यही आदेश समझा और नदी में डूबने के लिए गयी ।
"What can one not achieve through simple faith! Once there was an annaprasana ceremony2 in a guru's house. His disciples volunteered, according ing to their powers, to supply the different articles of food. He had one disciple, a very poor widow, who owned a cow. She milked it and brought the guru a jar of milk. He had thought she would take charge of all the milk and curd for the festival. Angry at her poor offering, he threw the milk away and said to her, 'Go and drown yourself.' The widow accepted this as his command and went to the river to drown herself.
“সরল বিশ্বাসে কি না হয়। গুরুপুত্রের অন্নপ্রাশনে — শিষ্যেরা যে যেমন পারে, উৎসবের আয়োজন করছে। একটি গরীব বিধবা সেও শিষ্যা। তার একটি গরু আছে, সে একঘটি দুধ এনেছে। গুরু মনে করছিলেন যে দুধের ভার ওই মেয়েটি লবে। বিরক্ত হয়ে সে যা এনেছিল ফেলে দিলে আর বললে — তুই জলে ডুবে মরতে পারিস নি? মেয়েটি এই গুরুর আজ্ঞা মনে করে নদীর ধারে ডুবতে গেল।
उस समय नारायण ने दर्शन दिया और प्रसन्न होकर कहा, 'इस बर्तन में दही है, जितना निकालोगी उतना ही निकलता जायगा । इससे गुरु सन्तुष्ट होंगे ।' वह बर्तन जब गुरु को दिया गया तो वे दंग रह गये और सारी कहानी सुनकर नदी के किनारे पर आकर उस स्त्री से बोले - 'यदि मुझे नारायण का दर्शन न कराओगी तो मैं इसी जल में कूदकर प्राण छोड़ दूँगा ।' नारायण प्रकट हुए, परन्तु गुरु उन्हें न देख सके । तब स्त्री ने कहा, 'प्रभो, गुरुदेव को यदि दर्शन न दोगे और यदि उनकी मृत्यु हो जायगी तो मै भी शरीर छोड़ दूँगी ।' फिर नारायण ने एक बार गुरु को भी दर्शन दिया ।
But God was pleased with her guileless faith and, appearing before her, said: 'Take this pot of curd. You will never be able to empty it. The more curd you pour out, the more will come from the pot. This will satisfy your teacher.' The guru was speechless with amazement when the pot was given to him. After hearing from the widow the story of the pot, he went to the river, saying to her, 'I shall drown myself if you cannot show God to me.' God appeared then and there, but the guru could not see Him. Addressing God, the widow said, 'If my teacher gives up his body because Thou dost not reveal Thyself to him, then I too shall die.' So God appeared to the guru — but only once.
তখন নারায়ণ দর্শন দিলেন; আর প্রসন্ন হয়ে বললেন — এই পাত্রটিতে দধি আছে, যতই ঢালবে ততই বেরুবে, গুরু সন্তুষ্ট হবেন। এবং সেই পাত্রটি দেওয়া হলে গুরু অবাক্। আর সমস্ত বিবরণ শুনে নদীর ধারে এসে মেয়েটিকে বললেন — নারায়ণকে যদি আমাকে দর্শন না করাও তবে আমি এই জলেতে প্রাণত্যাগ করব। নারায়ণ দর্শন দিলেন, কিন্তু গুরু দেখতে পেলেন না। মেয়েটি তখন বললে, প্রভু গুরুদেবকে যদি দর্শন না দেন আর তাঁর শরীর যদি যায় তো আমিও শরীরত্যাগ করব; তখন নারায়ণ একবার গুরুকে দেখা দিলেন।
"देखो, गुरु-भक्ति रहने से अपने को भी दर्शन हुआ, फिर गुरुदेव को भी हुआ । "इसलिए कहता हूँ –‘यदि मेरे गुरु शराबखाने में भी जाते हों तो भी मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं ।'
यद्यपि आमार गुरु शुण्डी बाड़ी जाय ,
तथापि आमार गुरु नित्यानन्द राय।
"Now you see, because of faith in her guru the disciple herself had the vision of God and also showed Him to her teacher. Therefore I say, 'Even though my guru frequents a grog-shop, still to me he is the embodiment of Eternal Bliss.'
“দেখ গুরুভক্তি থাকলে নিজেরও দর্শন হল আবার গুরুদেবেরও হল। “তাই বলি —
যদ্যপি আমার গুরু শুঁড়ীবাড়ি যায়,
তথাপি আমার গুরু নিত্যানন্দ রায়।
“सभी गुरु बनना चाहते हैं । चेला बनना कदाचित् ही कोई चाहता है । परन्तु देखो, ऊँची जमीन में वर्षा का जल नहीं जमता, वह तो नीची जमीन में - गढ़े में ही जमता है ।
"All want to be the guru, but very few indeed want to be the disciple. But you know that rain-water doesn't collect on a high mound; it collects in low land, in a hollow.
“সকলেই গুরু হতে চায়, শিষ্য হতে বড় কেহ চায় না। কিন্তু দেখ উঁচু জমিতে বৃষ্টির জল জমে না। নিচু জমিতে — খাল জমিতে জমে।
"गुरु जो नाम दें, विश्वास करके उस नाम को लेकर साधनभजन करना चाहिए । "जिस सीप में मुक्ता तैयार होता है, वह सीप स्वाति नक्षत्र का जल लेने के लिए तैयार रहती है । उसमें वह जल गिर जाने पर फिर एकदम अथाह जल में डूब जाती है, और वहीं चुपचाप पड़ी रहती है । तभी मोती बनता है ।"
"One should have faith in the holy name given by the guru and with it practise spiritual discipline. It is said that the pearl oyster makes itself ready for the rain that falls when the star Svati is in the ascendant. Taking a drop of that rain, it dives into the fathomless depths of the ocean and remains there until the pearl is formed."
“গুরু যে নামটি দেবেন বিশ্বাস করে সে নামটি লয়ে সাধন-ভজন করতে হয়।”“যে শামুকের ভেতর মুক্তা তয়ের হয়, এমনি আছে, সেই শামুক স্বাতী-নক্ষত্রের বৃষ্টির জলের জন্য প্রস্তুত হয়ে থাকে। সেই জল পড়লে একেবারে অতল জলে ডুবে চলে যায়, যতদিন না মুক্তা হয়।”
[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]
(२)
[राजेन्द्र के घर पर ब्राह्म-भक्त सम्मेलन]
⚜️संसार (परिवार) में रहते समय बीच -बीच में निर्जनवास करने के लिए
भक्त-सम्मेलन, साधु-संग या कैम्प में जाते रहना चाहिए⚜️
अनेक ब्राह्म भक्त आये हैं । यह देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - "ब्राह्मसभा है या शोभा ("ब्रह्म-समाज के लोगों का सम्मेलन क्या वास्तविक भक्त सम्मेलन है या मात्र दिखावा?) ब्राह्मसभा में नियमित उपासना होती है, यह बहुत अच्छा है, परन्तु डुबकी लगानी पड़ती है । केवल उपासना या व्याख्यान से कुछ नहीं होने का । ईश्वर से प्रार्थना करनी पड़ती है, जिससे भोग-आसक्ति दूर होकर उनके चरण-कमलों में शुद्धा भक्ति हो ।
At the sight of the many Brahmo devotees assembled there, the Master said: "Is the meeting of the Brahmos a real devotional gathering or a mere show? It is very good that the Brahmo Samaj holds regular devotions. But one must dive deep; mere ceremonial worship or lectures are of no avail. One should pray to God that one's attachment to worldly enjoyment may disappear; that one may have pure love for His Lotus Feet.
অনেকগুলি ব্রাহ্মভক্ত আসিয়াছেন দেখিয়া ঠাকুর বলিতেছেন —“ব্রাহ্মসভা না শোভা? ব্রাহ্মসমাজে নিয়মিত উপাসনা হয়, সে খুব ভাল; কিন্তু ডুব দিতে হয়। শুধু উপাসনা, লেকচারে হয় না। তাঁকে প্রার্থনা করতে হয়, যাতে ভোগাসক্তি চলে গিয়ে তাঁর পাদপদ্মে শুদ্ধাভক্তি হয়।
[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]
⚜️ 'कामिनी और कांचन' में (ऐषणा) गिद्धदृष्टि रखने से भक्ति का पतन होता है ⚜️
"हाथी के दिखाने के दाँत और होते हैं तथा खाने के दाँत और । बाहर के दाँत शोभा के लिए है, परन्तु भीतर के दाँतों से वह खाता है । इसी प्रकार भीतर कामिनी-कांचन का भोग करने पर भक्ति की हानि होती है ।
"The elephant has outer tusks and inner grinders as well. The tusks are mere ornaments; but the elephant chews its food with the grinders. The inner enjoyment of 'woman and gold' injures the growth of one's devotion.
“হাতির বাহিরের দাঁত আছে আবার ভিতরের দাঁতও আছে। বাহিরের দাঁতে শোভা, কিন্তু ভিতরের দাঁতে খায়। তেমনি ভিতরে কামিনী-কাঞ্চন ভোগ করলে ভক্তির হানি হয়।
"बाहर भाषण आदि देने से क्या होगा ? गीध बहुत उँचे पर उड़ता है, परन्तु उसकी दृष्टि रहती है सड़े हुए मुर्दों की ओर । आतशबाजी 'फुँस' करके पहले आकाश में उठ जाती है, परन्तु दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ती है ।
"What will you achieve through mere public lectures? The vulture undoubtedly soars high, but its eyes are fixed on the charnel-pit. The rocket undoubtedly shoots up into the sky, but the next moment it falls to the ground.
“বাহিরে লেকচার ইত্যাদি দিলে কি হবে? শকুনি উপরে উঠে কিন্তু ভাগাড়ের দিকে নজর। হাওয়াই হুস করে প্রথমে আকাশে উঠে যায় কিন্তু পরক্ষণেই মাটিতে পড়ে যায়।
"भोगासक्ति का त्याग हो जाने पर देह-त्याग होते समय ईश्वर की ही स्मृति आयगी । और नहीं तो इस संसार की ही चीजों की (तीनों ऐषणाओं की) याद आयगी - स्त्री, पुत्र, गृह, धन, मान, इज्जत आदि । पक्षी अभ्यास करके राधा-कृष्ण रटता तो है, परन्तु जब बिल्ली पकड़ती है तो 'टें-टें' ही करता है ।
"He who has renounced his attachment to worldly enjoyments will remember nothing but God in the hour of death. Otherwise he will think only of worldly things: wife, children, house, wealth, name and fame. Through practice a bird can be trained to repeat 'Radha-Krishna'; but when a cat catches it, it only squawks.
“ভোগাসক্তি ত্যাগ হলে শরীর যাবার সময় ঈশ্বরকেই মনে পড়বে। তা না হলে এই সংসারের জিনিসই মনে পড়বে — স্ত্রী, পুত্র, গৃহ, ধন, মানসম্ভ্রম ইত্যাদি। পাখি অভ্যাস করে রাধাকৃষ্ণ বোল বলে। কিন্তু বেড়ালে ধরলে ক্যাঁ ক্যাঁ করে।
“इसीलिए सदा अभ्यास करना चाहिए - उनके नाम-गुणों का कीर्तन, उनका ध्यान, चिन्तन और प्रार्थना - जिससे भोगासक्ति छूट जाय और उनके चरणकमलों में मन लगा रहे ।
"Therefore one should constantly practise the singing of God's name and glories, and meditation and contemplation as well. And further, one should always pray that one's attachment to the world may disappear and one's love for God's Lotus Feet may grow.
“তাই সর্বদা অভ্যাস করা দরকার। তাঁর নামগুণকীর্তন, তাঁর ধ্যান, চিন্তা, আর প্রার্থনা — যেন ভোগাসক্তি যায় আর তোমার পাদপদ্মে মন হয়।
"इस प्रकार के भक्त-गृहस्थ संसार (परिवार) में नौकरानी की तरह रहते हैं । वे सब कामकाज तो करते हैं, परन्तु मन देश में पड़ा रहता है । अर्थात् मन को ईश्वर पर रखकर वे सब काम करते हैं। गृहस्थी करने से ही देह में कीचड़ लगती है । यथार्थ भक्तगृहस्थ 'पाँकाल' मछली की तरह होते हैं, पंक में रहकर भी देह में कीच नहीं लगता ।
"Householders devoted to God live in the world like a maidservant, who performs her duties for her master but always keeps her mind fixed on her own native village; that is to say, they do their duties in the world keeping their minds on God. Anyone leading a worldly life is sure to come in contact with its dirt; but a householder who is a true devotee of God lives like the mudfish, which, though remaining in the mud, is not stained by it.
“এরূপ সংসারী লোক, সংসারে দাসীর মতো থাকে, সব কর্ম কাজ করে, কিন্তু দেশে মন পড়ে থাকে। অর্থাৎ ঈশ্বরের উপর মন রেখে কর্মগুলি করে। সংসার করতে গেলেই গায়ে পাঁক লাগে। ঠিক ভক্ত সংসারী পাঁকাল মাছের মতো, পাঁকে থেকেও গা পাঁকশূন্য।
(ब्रह्म, ईश्वर, भगवान या माँ जगदम्बा एक और अभिन्न हैं)
[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]
⚜️ ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं -उन्हें माँ कहकर पुकारने से भक्ति शीघ्र होती है।⚜️
[#ब्रह्म एक चेतन शक्ति है। ईश्वर भी वही चेतन शक्ति है तथा शरीर में वही चेतन शक्ति आत्मा कहलाती है। ब्रह्म शुद्ध चेतनतत्व है तथा ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है। इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है अन्यथा दोनों में कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने पुत्र के लिए पिता, पत्नी के लिए पति, रेल में यात्रा करने पर यात्री, उपासना करने पर भक्त, मांग कर खाने पर भिखारी आदि कहलाता है, ये उसकी उपाधियां हैं, जिससे उसको विभिन्न नाम दे दिये हैं, किंतु वास्तव में वह व्यक्ति तो एक ही है। इसी प्रकार लेखक, कलाकार, इंजीनियर, डॉक्टर, कलेक्टर आदि उसकी उपाधियां मात्र हैं, जो उसकी पहचान के लिए दिये जाते हैं अन्यथा मूल रूप में है वह एक मनुष्य ही। इसी प्रकार माया की उपाधि के कारण उसे ईश्वर कहा जाता है। वह इसी मायाशक्ति से सृष्टि की रचना करता है। वह इस माया का अधिपति व स्वामी है, जो उसी के संकल्प के अनुसार, उसी के नियम व अनुशासन में रह कर कार्य करती है। इसलिए ईश्वर ही सर्वेसर्वा है। इसलिए शरीर से आबद्ध होने के कारण ही ब्रह्म की शक्ति को आत्मा कहा जाता है अन्यथा उसमें और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। – आदि शंकराचार्य
[ब्रह्म शुद्ध चेतन-तत्व है और ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है। इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है। आत्मा की शक्ति को - समस्त स्त्रीजाति को, माँ कहकर पुकारने से भक्ति शीघ्र होती है !....Brahma is pure consciousness and God is covered by the illusionary power of that Brahma. Due to this illusionary title, that Brahma is called God.]
“ब्रह्म और शक्ति (ईश्वर-माँ जगदम्बा,भगवान) अभिन्न # हैं । उन्हें माँ कहकर पुकारने से शीघ्र ही भक्ति होती है, प्रेम होता है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –
श्यामा पद आकाशते मन घुड़िखाना उड़िते छीलो।
कलूषेर कूबातास खेये गोप्ता खेय पड़े गेलो।
मायाकान्नी होलो भारी, आर आमि उठाते नारि।
दारासूत कलेर दड़ी , फाँस लेगे से फेंसे गेलो।।
ज्ञान -मुण्डू गेछे छिंड़े, उठिये दिलो ओमनी पड़े।
माथा नेई से आर कि उड़े , सङ्गेर छजन जयी होलो।।
भक्ति डोरे छीलो बाँधा , खेलते एसे लागलो धाँधा।
नरेशचन्द्रेर हासा -काँदा, ना आसा एक छिलो भालो।।
गाना - (भावार्थ) –
“श्यामा के चरणरूपी आकाश में मेरा मनरूपी पतंग उड़ रहा था । पाप की जोरदार हवा से धक्का खाकर उल्टा होकर गिर गया .......” ।
(अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद) यह कहते हुए, श्री रामकृष्ण ने गाया: माता के चरणों के ऊपर, मेरा मन पतंग की तरह उड़ रहा था, तभी पाप की प्रचंड हवा का झोंका आया और उसे तेजी से धरती की ओर ले गया। माया ने एक ओर से दबाव देकर उसकी सम उड़ान में बाधा डाली, और मैं उसे और ऊपर नहीं उठा सका। बच्चों और पत्नी के प्रेम की टेढ़ी डोर में उलझकर, हाय! मेरी पतंग दो टुकड़ों में फट गई। उसने अपनी ज्ञान की शिखा शीघ्र ही खो दी और जैसे ही मैंने उसे छोड़ा, वह नीचे की ओर गिर गई; जब उसका पूरा सिरा ही उखड़ गया, तो वह फिर से उड़ने की आशा कैसे कर सकती थी? यद्यपि वह भक्ति की डोर से बंधी हुई थी, फिर भी यहाँ खेलते हुए उसे दुःख हुआ; उसके षड्रिपुओं ने (छह वासनाओं) ने उसे परास्त कर दिया। अब नरेशचंद्र को मुस्कान और आंसुओं के इस खेल पर पछतावा होता है, और वह सोचता है कि इसे कभी न खेलना ही बेहतर है।]
गाना -
यशोदा नाचातो गो माँ बोले नीलमणि।
से भेश लुकाली कोथा करालवदनी?
एकबार नाच गो श्यामा ,-
हासि बांशी मिशाईये, मुण्डमाला छेड़े, वनमाला पोरे ,
असि छेड़े बाँशी लोये, आड़ -नयने चेय चेय,
गज मोती नसाय दुलुक ;
(भावार्थ) –
“ओ माँ ! तुम्हें यशोदा नीलमणि (बालक श्रीकृष्ण का एक नाम) कहकर नचाती थी । ऐ करालवदनि, उस भेष को तूने कहाँ छिपा दिया है ? ....”
श्रीरामकृष्ण उठकर नृत्य कर रहे हैं और गाना गा रहे हैं । भक्तगण भी उठे ।श्रीरामकृष्ण बार बार समाधिमग्न हो रहे हैं । सभी उन्हें एकदृष्टि से देख रहे हैं और चित्रवत् खड़े हैं । डाक्टर दोकौड़ी समाधि कैसी होती है इसकी परीक्षा करने के लिए उनकी आँखों में उँगली डाल रहे हैं । यह देखकर भक्तों को विशेष क्षोभ हुआ ।
“ব্রহ্ম ও শক্তি অভেদ। তাঁকে মা বলে ডাকলে শীঘ্র ভক্তি হয়, ভালবাসা হয়।” এই বলিয়া শ্রীরামকৃষ্ণ গান ধরিলেন:
শ্যামাপদ-আকাশেতে মন ঘুড়িখান উড়তেছিল ৷
কলুষের কুবাতাস পেয়ে গোপ্তা খেয়ে পড়ে গেল ॥
মায়াকান্নি হল ভারী, আর আমি উঠাতে নারি ৷
দারাসুত কলের দড়ি, ফাঁস লেগে সে ফেঁসে গেল ॥
জ্ঞান-মুণ্ড গেছে ছিঁড়ে, উঠিয়ে দিলে অমনি পড়ে ৷
মাথা নেই সে আর কি উড়ে, সঙ্গের ছজন জয়ী হল ॥
ভক্তি ডোরে ছিল বাঁধা, খেলতে এসে লাগল ধাঁধা ৷
নরেশচন্দ্রের হাসা-কাঁদা, না আসা এক ছিল ভাল ॥
গান —
যশোদা নাচাতো গো মা ব'লে নীলমণি;
সে বেশ লুকালে কোথা করালবদনী?
একবার নাচ গো শ্যামা, -
হাসি বাঁশী মিশাইয়ে, মুণ্ডমালা ছেড়ে, বনমালা প'রে,
অসি ছেড়ে বাঁশী লয়ে, আড়-নয়নে চেয়ে চেয়ে,
গজমতি নাসায় দুলুক;
যশোদার সাজানো বেশে, অলকা-আবৃত মুখে,
অষ্ট নায়িকা, অষ্ট সখী হোক;
যেমন ক'রে রাসমণ্ডলে নেচেছিলি,
হৃদি-বৃন্দাবন-মাঝে, ললিত ত্রিভঙ্গ-ঠামে,
চরণে চরণ দিয়ে, গোপীর মন-ভুলানো বেশে,
তেমনি তেমনি তেমনি করে;
(দেখে নয়ন সফল করি) বড় সাধ আছে মনে;
তোর শিব বলরাম হোক, (হেরি নীলিগিরি আর রজতগিরি)
একবার বাজা গো মা - সেই মোহন বেণু,
যে বেণু-রবে ধেনু ফিরাতিস্, যে বেণু-রবে যমুনায় উজান ধরিত;
বাজুক তোর বেণু বলায়ের শিঙে।
শ্রীদামের সঙ্গে নাচিতে ত্রিভঙ্গে গো মা;
তা থেইয়া তা থেইয়া, তা তা থেই থেই বাজত নূপুর-ধ্বনি।
শুন্তে পেয়ে, আসতো ধেয়ে ব্রজের রমণী॥ (গো মা)
গগনে বেলা বাড়িত, রাণী ব্যাকুল হইত;
বলে ধর ধর ধর, ধর রে গোপাল, ক্ষীর সর ননী।
এলাইয়ে চাঁচর কেশ রাণী বেঁধে দিত বেণী॥
ঠাকুর উঠিয়া নৃত্য করিতেছেন ও গান গাহিতেছেন। ভক্তেরাও উঠিয়াছেন।শ্রীরামকৃষ্ণ মুহুর্মুহু সমাধিস্থ হইতেছেন। সকলেই একদৃষ্টে দেখিতেছেন আর চিত্রপুত্তলিকার ন্যায় দাঁড়াইয়া আছেন।ডাক্তার দুকড়ি সমাধি কিরূপ পরীক্ষা করিবার জন্য চক্ষে আঙুল দিতেছেন। তাহা দেখিয়া ভক্তেরা অতিশয় বিরক্ত হইলেন।
"Brahman and Sakti are identical. One acquires love and devotion, quickly by calling on God as Mother."
[ ब्रह्म शुद्ध चेतनतत्व है और ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है। इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है।.... Brahma is pure consciousness and God is covered by the illusionary power of that Brahma. Due to this illusionary title, that Brahma is called God.]
Saying this, the Master sang:
High in the heaven of the Mother's feet, my mind was soaring like a kite, When came a blast of sin's rough wind that drove it swiftly toward the earth. Maya disturbed its even flight by bearing down upon one side, And I could make it rise no more. Entangled in the twisting string of love for children and for wife, Alas! my kite was rent in twain. It lost its crest of wisdom soon and downward plunged as I let it go; How could it hope to fly again, when all its top was torn away? Though fastened with devotion's cord, it came to grief in playing here; Its six opponents (The six passions) worsted it. Now Nareschandra rues this game of smiles and tears, and thinks it better Never to have played at all.
He sang again:
O Mother, for Yasoda Thou wouldst dance, when she called Thee her precious "Blue Jewel":3 Where hast Thou hidden that lovely form, O terrible Syama? Dance that way once for me, O Mother! Throw down Thy sword and take the flute; Cast off Thy garland of heads, and wear Thy wild-flower garland. . . .
As Sri Ramakrishna sang, he left his seat and began to dance. The devotees, too, stood up. Every now and then the Master went into samadhi and the devotees gazed at him intently. Dr. Dukari touched the Master's eyeballs with his finger to test the genuineness of his samadhi. This disgusted the devotees.
इस अद्भुत संकीर्तन और नृत्य के बाद सभी ने आसन ग्रहण किया । इसी समय केशव कुछ ब्राह्म भक्तों के साथ आ उपस्थित हुए । श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर उन्होंने आसन ग्रहण किया ।
राजेन्द्र - (केशव के प्रति) - बड़ा सुन्दर नृत्य-गीत हुआ । ऐसा कहकर उन्होंने श्री त्रैलोक्य से फिर गाना गाने के लिए अनुरोध किया । केशव - (राजेन्द्र के प्रति ) - जब श्रीरामकृष्णदेव बैठ गये हैं, तो कीर्तन किसी भी तरह नहीं जमेगा ।
When the music and dancing were over, the devotees took their seats. Just then Keshab arrived with some of his Brahmo disciples. Rajendra told him about their great joy in the Master's kirtan and requested Trailokya to sing again. Keshab replied, "Since Sri Ramakrishna has taken his seat, the kirtan will sound flat."
Trailokya and the Brahmo devotees sang: Chant, O mind, the name of Hari, Sing aloud the name of Hari, Praise Lord Hari's name!And praising Hari's name, O mind, Cross the ocean of this world. Hari dwells in earth, in water, Hari dwells in fire and air; In sun and moon He dwells. Hari's ever living presence Fills the boundless universe.
এ অদ্ভুত সংকীর্তন ও নৃত্যের পর সকলে আসন গ্রহণ করিলেন। এমন সময় কেশব আরও কয়েকটি ব্রাহ্মভক্ত লইয়া আসিয়া উপস্থিত। ঠাকুরকে প্রণাম করিয়া আসন গ্রহণ করিলেন। রাজেন্দ্র (কেশবের প্রতি) — চমৎকার নৃত্যগীত হল। এই কথা বলিয়া শ্রীযুক্ত ত্রৈলোক্যকে আবার গান গাহিতে অনুরোধ করিলেন। কেশব (রাজেন্দ্রের প্রতি) — যখন পরমহংস মশায় বসেছেন, তখন কোনমতে কীর্তন জমবে না।
গান হইতে লাগিল। ত্রৈলোক্য ও ব্রাহ্মভক্তেরা গান গাহিতে লাগিলেন:
মন একবার হরি বল হরি বল হরি বল।
হরি হরি হরি বলে ভবসিন্ধু পারে চল ॥
জলে হরি, স্থলে হরি, চন্দ্রে হরি, সূর্যে হরি,
অনলে অনিলে হরি, হরিময় এ ভূমণ্ডল ॥
गाना होने लगा । त्रैलोक्य तथा ब्राह्म भक्तगण गाना गाने लगे ।
मन एकबार हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल।
हरि हरि हरि बोले भवसिन्धु पारे चोल।।
जले हरि, स्थले हरि , चन्द्रे हरि , सूर्ये हरि।
अनले अनिल हरि, हरिमय ऐ भूमण्डल।।
गाना - (भावार्थ) –
"मन, एक बार हरि बोलो, हरि बोलो, हरि बोलो । हरि-हरि कहकर भवसागर के पार उतर चलो । जल में, थल में, चन्द्र में, सूर्य में, आग में, वायु में, सभी में हरि का वास है । यह भूमण्डल ही हरिमय है ।"
श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों के भोजन के लिए व्यवस्था हो रही है । वे अभी भी आँगन में बैठकर केशव के साथ बातचीत कर रहे हैं । राधाबाजार में फोटोग्राफरों के यहाँ गये थे - यही सब बातें ।
While preparations were being made to give the guests something to eat, Sri Ramakrishna talked with Keshab.
শ্রীরামকৃষ্ণ ও ভক্তদের খাওয়ার জন্য দ্বিতলে উদ্যোগ হইতেছে। এখনও তিনি প্রাঙ্গনে বসিয়া কেশবের সহিত কথা বলিতেছেন। রাধাবাজারের ফটোগ্রাফারদের ওখানে গিয়াছিলেন — সেই সব কথা।
श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति हँसते हुए) - आज मशीन से फोटो खींचना देख आया । वहाँ पर देखा कि सादे काँच पर फोटो नहीं उतरता, काँच के पीछे काली लगा देते हैं, तब फोटो उतरता है। उसी प्रकार कोई ईश्वर की बातें तो सुनता जा रहा है, पर इससे उसका कुछ नहीं होता, फिर उसी समय भूल जाता है । यदि भीतर प्रेम-भक्तिरूपी काली लगी हुई हो तो उन बातों की धारणा होती है । नहीं तो सुनता है और भूल जाता है ।
MASTER (with a smile): "Today I enjoyed very much the machine by which a man's picture is taken. One thing I noticed was that the impression doesn't stay on a bare piece of glass, but it remains when the glass is stained with a black solution. In the same way, mere hearing of spiritual talk doesn't leave any impression. People forget it soon afterwards. But they can retain spiritual instruction if they are stained inside with earnestness and devotion."
শ্রীরামকৃষ্ণ (কেশবের প্রতি সহাস্যে) — আজ বেশ কলে ছবি তোলা দেখে এলুম। একটি দেখলুম যে শুধু কাচের উপর ছবি থাকে না। কাচের পিঠে একটা কালি মাখিয়ে দেয়, তবে ছবি থাকে। তেমনি ঈশ্বরীয় কথা শুধু শুনে যাচ্ছি; তাতে কিছু হয় না, আবার তৎক্ষণাৎ ভুলে খায়; যদি ভিতরে অনুরাগ ভক্তিরূপ কালি মাখান থাকে তবে সে কথাগুলি ধারণা হয়। নচেৎ শুনে আর ভুলে যায়।
अब श्रीरामकृष्ण दुमँजले पर आये । सुन्दर कालीन के आसन पर उन्हें बैठाया गया । मनोमोहन की माँ श्यामासुन्दरी देवी परोस रही हैं । राम आदि खाते समय वहाँ पर हैं । जिस कमरे में श्रीरामकृष्ण भोजन कर रहे हैं, उस कमरे के सामनेवाले बरामदे में केशव आदि भक्तगण खाने बैठे हैं । बेचु चटर्जी स्ट्रीट के 'श्यामसुन्दर' देवमूर्ति के सेवक श्री शैलजाचरण मुखोपाध्याय भी वहाँ पर उपस्थित हैं ।
The Master was conducted to the second floor of the house and was asked to sit on a beautiful carpet. The ladies waited on him while he ate his meal. Keshab and the other devotees were also sumptuously fed.
এইবার ঠাকুর দ্বিতলায় আসিয়াছেন। সুন্দর কার্পেটের আসনে তাঁহাকে বসান হইল। মনোমোহনের মাতাঠাকুরানী শ্যামাসুন্দরী দেবী পরিবেশন করিতেছেন। মনোমোহন বলিয়াছেন — “আমার স্নেহময়ী জননী সাষ্টাঙ্গ প্রণিপাত করিলেন ও ঠাকুরকে খাওয়াইলেন।” রাম প্রভৃতি খাবার সময় উপস্থিত ছিলেন।
যে ঘরে ঠাকুর খাইতেছেন, সেই ঘরের সম্মুখের দালানে কেশব প্রভৃতি ভক্তরা খাইতে বসিয়াছেন। ওই দিবসে বেচু চাটুজ্যের স্ট্রীটের ৺শ্যামসুন্দর বিগ্রহের সেবক শ্রীশৈলজাচরণ চাটুজ্যে উপস্থিত ছিলেন। ইনি কয়েকমাস হইল পরলোকগত হইয়াছেন।
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परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज का प्रवचन: (दिनांक— 23.5.1994, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश)
जीव मात्र की किसी- न- किसी का सहारा, आश्रय लेने की स्वाभाविक ही प्रवृत्ति रहती है; जीवात्मा प्रकृति से संबंध जोड़कर नाशवान् प्राणी- पदार्थों का आश्रय लेता है, जो कि टिकने वाला नहीं है। जीवात्मा यदि भगवान् (अवतार वरिष्ठ) का आश्रय ले ले, तो फिर किसी दूसरे का आश्रय लेना ही नहीं पड़े। आश्रय नित्य का लेना चाहिए, जो कभी छूटे नहीं। जो दुःख अभी आया नहीं है, भविष्य में आने वाला है, उस वृद्धावस्था और मृत्यु रूपी दुःख से छूटने का उपाय मनुष्यों को करना चाहिए।
गंगा जमुना सरस्वती सात सिंधु भरपूर।
तुलसी चातक के मते बिन स्वाती सब धूर॥१४॥
एक भरोसो, एक बल, एक आस, विश्वास।
स्वाति-सलिल रघुनाथ-जस, चातक तुलसीदास ॥१५।।
(एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥)
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श्रीरामकृष्ण उपदेश :
1 . "सामान्य आदमी झोला भरकर धर्म की बातें करता है किन्तु खुद के व्यवहार में एक दाना बराबर नहीं लाता। एक बुद्धिमान व्यक्ति बातें बहुत थोड़ी करता है जबकि उसका पूरा जीवन धर्म के वास्तविक व्यवहार का प्रदर्शन होता है।"
2. छोटे बच्चे कमरे में गुड़ियों से खेलते रहते हैं, बिना किसी डर या बंधन के। परंतु जैसे ही उनकी मां कमरे में प्रवेश करती है, वे गुड़ियों को फेंककर मां-मां चिल्लाते हुए उसकी ओर भागते हैं। तुम भी सांसारिक जगत में खेल रहे हो, धन, मान, प्रसिद्धि आदि की गुड़ियों से आकर्षित होकर। लेकिन अगर तुम एक बार अपनी जगत माता -(ठाकुरदेव-सच्चिदानंद ) को देख लो, उसके बाद तुमको सांसारिक वस्तु में आनंद नहीं आएगा। तुम सब कुछ एक तरफ फेंककर, उनकी ओर भागोगे।
3. भगवान तो सबके मन में हैं लेकिन सबका मन भगवान में नहीं लगा है। इसीलिए, हम कष्ट और दुर्गति भोगते हैं। (अहं,कर्ता'-पन या 'मैं'-पन के पीछे की सच्चाई-आत्मा या ईश्वर ही हैं। और ये 'अहं' जायेगा नहीं, तो रहे दास बनकर !)
4. ईश्वर सब जगह है परन्तु वह मनुष्य में सबसे अधिक प्रकट होता है। इसलिए, मनुष्य की भगवान की तरह सेवा करो, जो भगवान की पूजा करने जितना ही अच्छा है।
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*साभार ~ @Subhash Jain*
जब तक तुम्हारा कर्ता का भाव न छूट जाए, और साक्षी भाव में स्थित न हो जाओ - तब तक तुम (accident के समय) परमात्मा को स्मरण न कर सकोगे; या परमात्मा का स्मरण कर लो तो कर्ता का भाव छूट जाए। कर्ता के भाव में ही हमारा अहंकार है। कर्ता का भाव ही हमारे अहंकार का शरण स्थल है–यह करूं वह करूं, यह कर लिया वह कर लिया, यह करना है वह करना है। प्रार्थना की नहीं जाती, प्रार्थना होती है–वैसे ही जैसे 'प्रेम' या 'ध्यान -समाधि' होती है। प्रेम कोई करता है, कर सकता है ? कोई तुम्हें आज्ञा दे कि करो प्रेम, जैसे सैनिकों को आज्ञा दी जाती है बाएं घूम दाएं, घूम, ऐसे आज्ञा दे दी जाए करो प्रेम। दाएं-बाएं घूमना हो जाएगा, देह की क्रियाएं हैं; अगर प्रेम ? प्रेम तो कोई क्रिया ही नहीं है, कृत्य ही नहीं है। प्रेम (ध्यान-समाधि) तो भेंट है विराट की ओर से। प्रेम तो अनंत की ओर से भेंट है। उन्हें मिलती है जो अपने हृदय के द्वार को खोलकर प्रतीक्षा करते हैं।