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गुरुवार, 23 जनवरी 2025

🔱🕊 🏹 🙋*परिशिष्ट -2 * [ (आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2] 🏹 The Absolute and the Relative belong to the same Reality. जिनका नित्य (इन्द्रियातीत सत्य) है, उन्हीं की लीला (सापेक्षिक सत्य) है . । 🏹

  🔱🕊 🏹 🙋*परिशिष्ट -2 *

 [(आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2]   

*सुरेन्द्र के मकान पर श्रीरामकृष्ण*

(१)

राम, मनोमोहन, त्रैलोक्य तथा महेन्द्र गोस्वामी आदि के साथ 

आज श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ सुरेन्द्र के घर पधारे हैं । १८८१ ई., आषाढ़ महीना है । सन्ध्या होनेवाली है । श्रीरामकृष्ण ने इसके कुछ देर पहले श्री मनोमोहन के मकान पर थोड़ी देर विश्राम किया था ।

[One day during the rainy season of 1881 Sri Ramakrishna and a number of devotees visited Surendra's house. It was about dusk.

আজ শ্রীরামকৃষ্ণ ভক্তসঙ্গে সুরেন্দ্রের বাড়িতে আসিয়াছেন। ১৮৮১ খ্রীষ্টাব্দ, আষাঢ় মাসের একদিন। সন্ধ্যা হয় হয়। শ্রীরামকৃষ্ণ কিয়ৎক্ষণ পূর্বে বৈকালে শ্রীযুক্ত মনোমোহনের বাড়িতে একটু বিশ্রাম করিয়াছিলেন।

सुरेन्द्र के दूसरे मँजले के बैठकघर में अनेक भक्तगण बैठे हुए हैं । महेन्द्र गोस्वामी, भोलानाथ पाल आदि पड़ोसी भक्तगण उपस्थित हैं । श्री केशव सेन आनेवाले थे, परन्तु आ न सके । ब्राह्मसमाज के श्री त्रैलोक्य सान्याल तथा अन्य कुछ ब्राह्म भक्त आये हैं

The Master entered the drawing-room on the second floor, where several of Surendra's neighbours had already, gathered. Keshab had also been invited but could not come. Trailokya and a few Brahmo devotees were present.

সুরেন্দ্রের দ্বিতলের বৈঠকখানার ঘরে ভক্তেরা আসিয়াছেন। মহেন্দ্র গোস্বামী, ভোলানাথ পাল ইত্যাদি প্রতিবেশীগণ উপস্থিত আছেন। শ্রীযুক্ত কেশব সেনের আসিবার কথা ছিল কিন্তু আসিতে পারেন নাই। ব্রাহ্মসমাজের শ্রীযুক্ত ত্রৈলোক্য সান্যাল ও আরও কতকগুলি ব্রাহ্মভক্ত আসিয়াছেন।

बैठकघर में दरी और चद्दर बिछायी गयी है - उस पर एक सुन्दर गलीचा तथा तकिया भी है । श्रीरामकृष्ण को ले जाकर सुरेन्द्र ने उसी गलीचे पर बैठने के लिए अनुरोध किया । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “यह तुम्हारी कैसी बात है ?" ऐसा कहकर महेन्द्र गोस्वामी के पास बैठ गये ।

 A mat covered with a white sheet was spread on the floor, and on it had been placed a beautiful carpet with a cushion. Surendra requested the Master to sit on the carpet; but Sri Ramakrishna would not listen to him and sat on the mat next to Mahendra Goswami, one of Surendra's neighbours.  

বৈঠকখানা ঘরে সতরঞ্চি ও চাদর পাতা হইয়াছে — তার উপর একখানি সুন্দর গালিচা ও তাকিয়া। ঠাকুরকে লইয়া সুরেন্দ্র ওই গালিচার উপর বসিতে অনুরোধ করিলেন।শ্রীরামকৃষ্ণ বলিতেছেন, একি তোমার কথা! এই বলিয়া মহেন্দ্র গোস্বামীর পার্শ্বে বসিলেন।

महेन्द्र गोस्वामी - (भक्तों के प्रति ) - मैं इनके (श्रीरामकृष्ण के) पास कई महीनों तक प्रायः सदा ही रहता था । ऐसा महान् व्यक्ति मैंने कभी नहीं देखा । इनके भाव साधारण नहीं हैं ।

MAHENDRA (to the devotees): "For several months I spent most of my time with him [meaning Sri Ramakrishna]. I have never before seen such a great man. His spiritual moods are not of the ordinary kind."

যদু মল্লিকের বাগানে যখন পারায়ণ হয় শ্রীরামকৃষ্ণ সর্বদা যাইতেন। কয়মাস ধরিয়া পারায়ণ হইয়াছিল। মহেন্দ্র গোস্বামী (ভক্তদের প্রতি) — আমি এঁর নিকট কয়েক মাস প্রায় সর্বদা থাকতাম। এমন মহৎ লোক আমি কখনও দেখি নাই। এঁর ভাব সকল সাধারণ ভাব নয়

श्रीरामकृष्ण - (गोस्वामी के प्रति) - यह सब तुम्हारी कैसी बात है ? मैं छोटे से छोटा, दीन से भी दीन हूँ । मैं प्रभु के दासों का दास हूँ । कृष्ण ही महान् हैं

MASTER (to Mahendra): "How dare you say that? I am the most insignificant of the insignificant, the lowliest of the lowly. I am the servant of the servants of God. Krishna alone is great.

শ্রীরামকৃষ্ণ (গোস্বামীর প্রতি) — ও-সব তোমার কি কথা! আমি হীনের হীন, দীনের দীন; আমি তাঁর দাসানুদাস; কৃষ্ণই মহান।

 [(आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2] 

 🏹 परम् सत्य (नित्य=ब्रह्म) और सापेक्षिक सत्य (लीला=जीव) 

एक ही सिक्के के दो पहलू (aspect) हैं ! 🏹

(जीवो ब्रह्मैव नापरः !)    

"जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं । दूर से देखने पर समुद्र नीला दिखता है, पर पास जाओ तो कोई रंग नहीं । जो सगुण हैं, वे ही निर्गुण हैं । जिनका नित्य है, उन्हीं की लीला है

"Krishna is none other than Satchidananda, the Indivisible Brahman. The water of the ocean looks blue from a distance. Go near it and you will find it colourless. He who is endowed with attributes is also without attributes. The Absolute and the Relative belong to the same Reality.

[निर्गुण निराकार सच्चिदानन्द , परम् सत्य या अचल इन्द्रियातीत सत्य या 'ब्रह्म' - तथा सापेक्षिक सत्य या  नाम-रूप सहित परिवर्तनशील इन्द्रियगोचर जगत ('शक्ति') दोनों एक ही सत्यता (Reality-काली?? सिक्का) के दो पहलू हैं!]  

"श्रीकृष्ण त्रिभंग क्यों हैं ? - राधा के प्रेम से ।

"Why is Krishna tribhanga, bent in three places? Because of His love for Radha.

[ब्रह्म सगुण ईश्वर अवतार वरिष्ठ ठाकुर क्यों बने ? - राधा के (जीव के या मेरे ?) प्रेम से।]   

“শ্রীকৃষ্ণ ত্রিভঙ্গ কেন? রাধার প্রেমে।

"जो ब्रह्म हैं, वे ही काली, आद्याशक्ति हैं, सृष्टि-स्थिति-प्रलय कर रहे हैं । जो कृष्ण हैं, वे ही काली हैं । " मूल एक है - यह सब उन्हीं का खेल है, उन्हीं की लीला है ।

"That which is Brahman is also Kali, the Adyasakti, who creates, preserves, and destroys the universe. He who is Krishna is the same as Kali. The root is one — all these are His sport and play.

“যিনিই ব্রহ্ম তিনিই কালী, আদ্যাশক্তি সৃষ্টি-স্থিতি-প্রলয় করছেন। যিনি কৃষ্ণ তিনিই কালী।“মূল এক — তাঁর সমস্ত, লীলা।”

 [(आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2] 

 🏹 भगवान के दर्शन करने का उपाय  🏹 

"उनका दर्शन किया जा सकता है शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि से उनका दर्शन किया जा सकता है । कामिनी-कांचन में आसक्ति रहने से मन मैला हो जाता है

"God can be seen. He can be seen through the pure mind and the pure intelligence. Through attachment to 'woman and gold' the mind becomes impure.

তাঁকে দর্শন করা যায়। শুদ্ধ মন, শুদ্ধ বুদ্ধিতে দর্শন করা যায়। কামিনী-কাঞ্চনে আসক্তি থাকলে মন মলিন হয়।

"मन पर ही सब कुछ निर्भर है । मन धोबी के यहाँ का धुला हुआ कपड़ा जैसा है; जिस रंग में रँगवाओगे उसी रंग की हो जायगा । मन से ही ज्ञानी, और मन से ही अज्ञानी है । जब तुम कहते हो कि अमुक आदमी खराब हो गया है, तो अर्थ यही है कि उस आदमी के मन में खराब रंग आ गया है ।"

"The mind is everything. It is like a white cloth just returned from the laundry. It will take any colour you dye it with. Knowledge is of the mind, and ignorance is also of the mind. When you say that a certain person has become impure, you mean that impurity has coloured his mind."

“মন নিয়ে কথা। মন ধোপা ঘরের কাপড়; যে রঙে ছোপাবে, সেই রঙ হবে! মনেতেই জ্ঞানী, মনেতেই অজ্ঞান। অমুক লোক খারাপ হয়ে গেছে অর্থাৎ অমুক লোকের মনে খারাপ রঙ ধরেছে।”

শ্রীযুক্ত ত্রৈলোক্য সান্যাল ও অন্যান্য ব্রাহ্মভক্ত এইবার আসিয়া আসন গ্রহণ করিলেন।

सुरेन्द्र माला लेकर श्रीरामकृष्ण को पहनाने आये । पर उन्होंने माला हाथ में ले ली, और फेंककर एक ओर रख दी । इससे सुरेन्द्र के अभिमान में धक्का लगा और उनकी आँखें डबडबा गयीं । सुरेन्द्र पश्चिम के बरामदे में जाकर बैठे - साथ राम तथा मनोमोहन आदि हैं ।

सुरेन्द्र प्रेमकोप करके कह रहे हैं, “मुझे क्रोध हुआ है; राढ़ देश # का ब्राह्मण है, इन चीजों की कद्र क्या जाने ? कई रुपये खर्च करके यह माला लायी । मैं गुस्से में आकर कह बैठा ‘और सब मालाएँ दूसरों के गले में डाल दो ।’

[#लाल मिट्टी का देश]

"अब समझ रहा हूँ मेरा अपराध, भगवान पैसे से खरीदे नहीं जा सकते । वे अहंकारी के नहीं हैं । मैं अहंकारी हूँ, मेरी पूजा क्यों लेने लगे ? मेरी अब जीने की इच्छा नहीं है ।" कहते कहते आँसू की धाराएँ उनके गालों और छाती पर से बहती हुई नीचे गिरने लगीं

Surendra approached the Master with a garland and wanted to put it around his neck. But the Master took it in his hand and threw it aside. Surendra's pride was wounded and his eyes filled with tears. He went to the west porch and sat with Ram, Manomohan, and the others. 

In a voice choked with sadness he said: "I am really angry. How can a poor brahmin know the value of a thing like that? I spent a lot of money for that garland, and he refused to accept it. I was unable to control my anger and said that the other garlands were to be given away to the devotees. Now I realize it was all my fault. God cannot be bought with money; He cannot be possessed by a vain person. I have really been vain. Why should he accept my worship? I don't feel like living any more." Tears streamed down his cheeks and over his chest.

সুরেন্দ্র অশ্রুপূর্ণ লোচনে পশ্চিমের বারান্দায় গিয়া বসিলেন; সঙ্গে রাম ও মনোমোহন প্রভৃতি। সুরেন্দ্র অভিমানে বলিতেছেন; — আমার রাগ হয়েছে; রাঢ় দেশের বামুন এ-সব জিনিসের মর্যাদা কি জানে! অনেক টাকা খরচ করে এই মালা; ক্রোধে বললাম সব মালা আর সকলের গলায় দাও। এখন বুঝতে পারছি আমার অপরাধ; ভগবান পয়সার কেউ নয়; অহংকারেরও কেউ নয়! আমি অহংকারী, আমার পূজা কেন লবেন। আমার বাঁচতে ইচ্ছা নাই। বলিতে বলিতে অশ্রুধারা গণ্ড বহিয়া পড়িতে লাগিল ও বুক ভাসিয়া যাইতে লাগিল।

इधर कमरे के अन्दर त्रैलोक्य गाना गा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण मतवाले होकर नृत्य कर रहे हैं । जिस माला को उन्होंने फेंक दिया था, उसी को उठाकर गले में पहन लिया । वे एक हाथ से माला पकड़कर तथा दूसरे हाथ से उसे हिलाते हुए गाना गा रहे हैं और नृत्य कर रहे हैं

सुरेन्द्र यह देखकर कि श्रीरामकृष्ण गले में उसी माला को पहनकर नाच रहे हैं, आनन्द में विभोर हो गये । मन ही मन कह रहे हैं, 'भगवान गर्व का हरण करनेवाले हैं । जरूर, परन्तु (दीनों के, निर्धनों के धन भी हैं) !"

In the mean time Trailokya was singing inside the room. The Master began to dance in an ecstasy of joy. He put around his neck the garland that he had thrown aside; holding it with one hand, he swung it with the other as he danced and sang. Now Surendra's joy was unbounded. The Master had accepted his offering. Surendra said to himself, "God crushes one's pride, no doubt, but He is also the cherished treasure of the humble and lowly."

এদিকে ঘরের মধ্যে ত্রৈলোক্য গান গাহিতেছেন। শ্রীরামকৃষ্ণ মাতোয়ারা হইয়া নৃত্য করিতেছেন। যে মালা ফেলিয়া দিয়াছিলেন, সেই মালা তুলিয়া গলায় পড়িলেন। এক হাতে মালা ধরিয়া, অপর হাতে দোলাতে দোলাতে গান ও নৃত্য করিতেছেন। —(জগৎ-চন্দ্র-হার পরেছি!)সুরেন্দ্র আনন্দে বিভোহৃদয় পরশমনী আমার —আখর দিতেছেন —(ভূষণ বাকি কি আছে রে!)র — ঠাকুর গলায় সেই মালা পরিয়া নাচিতেছেন! মনে মনে বলিতেছেন, ভগবান দর্পহারী। কিন্তু কাঙালের অকিঞ্চনের ধন!

শ্রীরামকৃষ্ণ নিজে গান ধরিলেন:

যাদের হরি বলতে নয়ন ঝুরে

তারা তারা দুভাই এসেছে রে।

(যারা মার খেয়ে প্রেম যাচে)

(যারা আপনি মেতে জগৎ মাতায়)

(যারা আচণ্ডালে কোল দেয়)

(যারা ব্রজের কানাই বলাই)

श्रीरामकृष्ण अब स्वयं गाने लगे, -

जादेर हरि बोलते नयन झरे,

तारा तारा दूभाई ऐसेछे रे। 

(जारा मार खेये प्रेम याचे) 

(जारा आपनि मेते जगत माताय) 

(जारा आचाण्डाले कोल देय)  

[जारा व्रजेर कानाई (कन्हैया) बलाई (बलराम)]  

गाना - (भावार्थ) –

"हरिनाम लेते हुए जिनकी आँखों से आँसू बहते हैं, वे दोनो भाई आये हैं ! - वे, जो मार खाकर प्रेम देते हैं, जो स्वयं मतवाले बनकर जगत् को मतवाला बनाते हैं, जो चाण्डाल तक को गोद में ले लेते हैं, जो दोनों ब्रज के कन्हैया-बलराम थे ।"

The Master now sang:Behold, the two brothers have come, who weep while chanting Hari's name, The brothers who, in return for blows, offer to sinners Hari's love !Behold them, drunk with Hari's love, who make the world drunk as well, Embracing everyone as brother, even the outcaste shunned by men. Behold, the two brothers have come, who once were Kanai and Balai of Braja. . . .

अनेक भक्त श्रीरामकृष्ण के साथ-साथ नृत्य कर रहे हैं ।कीर्तन समाप्त होने पर सभी बैठ गये और ईश्वर की बातें करने लगे । श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र से कह रहे हैं, "मुझे कुछ खिलाओगे नहीं ?" यह कहकर वे उठकर घर के भीतर चले गये । स्त्रियों ने आकर भूमिष्ठ हो भक्तिभाव से उन्हें प्रणाम किया । भोजन करने के बाद थोड़ी देर विश्राम करके वे दक्षिणेश्वर लौट आये ।

Many of the devotees danced while Sri Ramakrishna sang this song. When the kirtan was over, everyone sat around the Master and became engaged in pleasant conversation. Sri Ramakrishna said to Surendra, "Won't you give me something to eat?" Then he went into the inner apartments, where the ladies saluted him. After the meal Sri Ramakrishna left for Dakshineswar.

অনেকগুলি ভক্ত ঠাকুরের সঙ্গে নৃত্য করিতেছেন।সকলে উপবিষ্ট হইলেন ও সদালাপ করিতেছেন।শ্রীরামকৃষ্ণ সুরেন্দ্রকে বলিতেছেন, “আমায় কিছু খাওয়াবে না?”এই বলিয়া গাত্রোত্থান করিয়া অন্তঃপুরে গমন করিলেন। মেয়েরা আসিয়া সকলে ভূমিষ্ঠ হইয়া অতি ভক্তভরে প্রণাম করিলেন।আহারান্তে একটু বিশ্রাম করিয়া দক্ষিণেশ্বরে যাত্রা করিলেন।

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[ राढ़ देश # ‘राढ़’ शब्द को लेकर सामान्य जनमानस में कई तरह की भ्रांतियां हैं।  जबकि, इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है।  प्राचीन आष्ट्रिक भाषा में ‘राढ़’ या ‘राढ़ी’ शब्द का अर्थ है- रक्त मृत्तिका का देश, रांगामाटी या लाल मिट्टी का देश।  

बताया गया है कि ‘राढ़’ अथवा ‘राढ़ी’ प्राचीन और मध्य काल में (विशेषकर सेनवंशीय नरेशों के शासन काल में) बंगाल के चार प्रांतों में से एक था. ये प्रांत थे- ‘वरेंद्र’, ‘बागरा’, ‘बंग’ और ‘राढ़’. वरेंद्र उत्तर बंगाल का प्राचीन व मध्य युगीन नाम था. वंग या ‘बंग’ बंगाल का प्राचीन नाम है।  राढ़ क्षेत्र को दो भागों में बांटा गया- पूर्वी राढ़ और पश्चिमी राढ़। 

1856 में जब सौंताल परगना जनपद बना, तब वीरभूम से पाकुड़ और राजमहल महकमा को काट कर सौंताल परगना तथा कांदी महकमा को मुर्शिदाबाद को दे दिया गया।  पंचकोट या पांचेट या मानभूम में वर्त्तमान पुरुलिया जनपद, दामोदर का दक्षिणांश (चास, चंदनकियारी, बोकारो), पूर्व हजारीबाग जनपद (वर्त्तमान बोकारो जनपद) का जरीडीह, पेटरवार, कसमार तथा रांची का रामगढ़ अंचल शामिल था.

राढ़ क्षेत्र विश्व के अति प्राचीनतम क्षेत्रों में एक है। पश्चिमी राढ़ क्षेत्र में बहने वाली राढ़ नदी भी राढ़ शब्द के औचित्य को दर्शाती है।

पूर्वी राढ़ के अंतर्गत पश्चिमी मुर्शिदाबाद, बीरभूम जिले का उत्तरी भाग, पूर्वी बर्धमान, हुगली, हावड़ा क्षेत्र, पूर्वी मेदिनीपुर तथा बांकुड़ा जनपद का इंदास थाना क्षेत्र आते हैं।  पश्चिमी राढ़ में संथाल परगना, बीरभूम के अन्य क्षेत्र, बर्धमान का पश्चिमी भाग, बांकुड़ा (इंदास थाना क्षेत्र को छोड़कर), पुरुलिया, धनबाद, बोकारो व हजारीबाग के कुछ इलाके, रांची के कुछ इलाके, सिंहभूम तथा मेदिनीपुर के कुछ क्षेत्र सम्मिलित हैं।  मोटे तौर पर कहें तो झूमर और भगता (चड़क, गाजान) परब जहां तक मूल रूप से प्रचलित है, वह राढ़ क्षेत्र है। विश्व का सबसे प्राचीनतम क्षेत्र है ‘राढ़’ यानी अबुआ झारखंड  इस सभ्यता सिद्धांत का प्रतिपादन वर्ष 1981 में हुआ है।  महान दार्शनिक व मैक्रो हिस्टोरियन प्रभात रंजन सरकार इसके प्रतिपादक हैं. यह मानव सभ्यता के विकास से संबंधित नवीनतम सिद्धांत है। झारखंड का एक बड़ा भूभाग राढ़ भूमि का एक हिस्सा है और यहां के मूल में भी राढ़ी सभ्यता-संस्कृति का इतिहास रहा है। 

मुगलों के जमाने में समग्र राढ़ कई स्वशासित जनपदों में विभक्त हो गया. उनमें वीरभूम, गोपभूम, सामंतभूम, शेखरभूम, मल्लभूम, सोनभूम, सिंहभूम, धवलभूम, भज्जभूम, सप्तमी परगना, भूरिश्रेष्ठ या भूरशूट परगना, बराहभूम तथा पंचकोट या पांचेट या मानभूम का नाम शामिल है।  वीरभूम राज्य पूर्व में सौंताल परगना जनपद के पाकुड़ और राजमहल महकमा, वर्तमान वीरभूम जनपद के रामपुर हाट महकमा, मुर्शिदाबाद जनपद के कांदी महकमा और भागीरथी नदी के पश्चिमवर्ती अंश को लेकर बना था। 

ऐसी मान्यता है कि राजा मानसिंह देव के नाम पर इस राज्य का नामकरण मानभूम हुआ था. इसकी राजधानी मानबाजार थी. इस राज्य के उत्तर में दामोदर, दक्षिण में बराहभूम, पूरब में शुशुनिया पहाड़ तथा पश्चिम में चुटिया-नागपुर था. अंगार के समीप जहां पर पहाड़ शेष होकर रांची का समतल प्रारंभ होता है, वही मानभूम की पश्चिम दिशा थी। 

सिंहभूम का मतलब सिर्फ झारखंड का सिंहभूम न होकर एक विस्तृत इलाका है।  इसमें ओडिशा के धालजोरी, क्योंझर, महागिरि और सिमलीपाल जैसी जगहें भी शामिल हैं। ’ उन्होंने यह भी कहा है कि ‘यहां मिले खास तरह के अवसादी चट्टानों से उनकी उम्र का पता लगाकर यह जाना जा सका है कि ये 310 से 320 करोड़ साल पुराने हैं।  यहां मिले बलुआ पत्थर से शोध में मदद मिली। ]



रविवार, 19 जनवरी 2025

विवेक वाहिनी के नये तराने : " चल चल चल ; उर्ध गगने बाजे मादल !"

  विवेक वाहिनी के नये तराने- 



1.चल चल चल ; उर्ध गगने बाजे मादल !


चल चल चल 
उर्ध गगने बाजे मादल,
निम्ने उतला धरनी-तल, 
अरुण प्रातेर तरुण दल ,
चल रे, चल रे चल।  


ऊषार दूयारे हानि आघात ,
आमरा आनिबो रांगा प्रभात। 

आमरा टूटाबो तिमिर रात ,
बाधार बिन्ध्याचल। 

नव नबीनेर गाहिया गान, 
सजीब क़रीबो महा श्मशान ,
आमरा दानिबो नतून प्राण ,
बाहूते नवीन बल। 

चल रे नउ जोयान ,
शोन रे पातिया कान !
चल रे नउ जोयान ,
शोन रे पातिया कान !
मृत्यु तोरण दूआरे दूआरे ,
जीवनेर आह्वान। 


भाँग रे भाँग आगल,
चल रे चल रे चल ,
भाँग रे भाँग आगल,
चल रे चल रे चल ,
चल चल चल,
चल चल चल .....   

-काजी नजरुल इस्लाम
1.চল চল চল, উর্দ্ধ গগনে বাজে মাদল। 


চল চল‌ চল‌,
চল চল‌ চল‌...

ঊর্ধ্ব গগনে বাজে মাদল
নিম্নে উতলা ধরণী–তল
অরুণ প্রাতের তরুণ দল
চল‌ রে চল‌ রে চল‌‌-2


ঊষার দুয়ারে হানি আঘাত
আমরা আনিব রাঙা প্রভাত
আমরা টুটাব তিমির রাত
বাধার বিন্ধ্যাচল।-2


নব নবীনের গাহিয়া গান
সজীব করিব মহাশ্মশান
আমরা দানিব নতুন প্রাণ
বাহুতে নবীন বল।-2

চল‌‌ রে নও জোয়ান
শোন‌ রে পাতিয়া কান
চল‌‌ রে নও জোয়ান
শোন‌ রে পাতিয়া কান
মৃত্যু তোরণ, দুয়ারে দুয়ারে
জীবনের আহ্বান।

ভাঙ রে ভাঙ আগল
চল‌ রে চল রে চল‌
ভাঙ রে ভাঙ আগল
চল‌ রে চল রে চল‌
চল চল‌ চল,
চল চল‌ চল...

ঊর্ধ্ব আদেশ হানিছে বাজ,
শহীদী-ঈদের সেনারা সাজ,
দিকে দিকে চলে কুচ-কাওয়াজ
খোল রে নিদ-মহল-2


কবে সে খেয়ালী বাদশাহী,
সেই সে অতীতে আজো চাহি'
যাস মুসাফির গান গাহি'
ফেলিস অশ্রুজল।-2 

যাক রে তখত-তাউস
জাগ রে জাগ বেহুঁশ।
যাক রে তখত-তাউস
জাগ রে জাগ বেহুঁশ।

ডুবিল রে দেখ কত পারস্য
কত রোম গ্রিক রুশ,
জাগিল তারা সকল,
জেগে ওঠ হীনবল
জাগিল তারা সকল,
জেগে ওঠ হীনবল

আমরা গড়িব নতুন করিয়া
ধুলায় তাজমহল

চল চল‌ চল‌,
চল চল‌ চল‌...
ঊর্ধ্ব গগনে বাজে মাদল
নিম্নে উতলা ধরণী–তল
অরুণ প্রাতের তরুণ দল
চল‌ রে চল‌ রে চল‌‌

চল চল‌ চল‌,
চল চল‌ চল‌,
চল চল‌ চল‌,
চল চল‌ চল‌...
চল্‌ চল্‌ চল্‌। 
চল্‌ চল্‌ চল্‌।

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2. शुभ कर्मपथे धर निर्भय गान। 



शुभ कर्मपथे धर निर्भय गान। 
सब दुर्बल संशय होक अवसान। 

चिर शक्तिर निर्झर नित्य झरे , 
लह ' से अभिषेक ललाट ' परे। 

तव जाग्रत निर्मल नूतन प्राण ,
त्यागब्रते निक दीक्षा -
बिघ्न हते निक शिक्षा -
निष्ठुर संकट दिक् सम्मान। 
दुःखई होक तव बित्त महान। 
शुभ कर्मपथे धर निर्भय गान।
 
चल ' यात्री, चल ' दिनरात्रि -
कर ' अमृत लोकपथ अनुसन्धान। 

जड़ता तामस होओ उत्तीर्ण ,
क्लान्तिजाल कर ' दीर्घ बिदीर्ण -

दिन-अन्ते अपराजित चित्ते 
मृत्युतरण तीर्थे कर स्नान।। 

शुभ कर्मपथे धर निर्भय गान।
सब दुर्बल संशय होक अवसान। 


-रबीन्द्रनाथ टैगोर         


2. শুভ কর্মপথে ধর' নির্ভয় গান।

শুভ     কর্মপথে ধর' নির্ভয় গান।
সব      দুর্বল সংশয় হোক অবসান।
চির-    শক্তির নির্ঝর নিত্য ঝরে
লহ'          সে অভিষেক ললাট'পরে।
তব     জাগ্রত নির্মল নূতন প্রাণ
ত্যাগব্রতে নিক দীক্ষা,
বিঘ্ন হতে নিক শিক্ষা--
নিষ্ঠুর সঙ্কট দিক সম্মান।
দুঃখই হোক তব বিত্ত মহান।
চল' যাত্রী, চল' দিনরাত্রি--
কর' অমৃতলোকপথ অনুসন্ধান।
জড়তাতামস হও উত্তীর্ণ,
ক্লান্তিজাল কর' দীর্ণ বিদীর্ণ--
দিন-অন্তে অপরাজিত চিত্তে
মৃত্যুতরণ তীর্থে কর' স্নান ॥
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3.हासिते खेलिते आसिनी ए जगते ,करिते होबे मोदेर मायेरई साधना। 
(आशा -भैरवी / कहरवा) 
 

हासिते खेलिते आसिनी ए जगते ,
करिते होबे मोदेर मायेरई साधना।-2  

देखाते हबे आजि जगतबासी सबे, 
एखोनो भारतेर जायनी रे चेतना। 

हासिते खेलिते आसिनी ए जगते ,
करिते होबे मोदेर मायेरई साधना।-2  

गभीर हुँकारे हुँकारी दे रे डाक,
सिहरि उठूक बिश्व , मेदिनी टा फेटे जाक। 

गभीर हुँकारे हुँकारी दे रे डाक,
सिहरि उठूक बिश्व , मेदिनी टा फेटे जाक। 

आमादेर जन्मभूमि देवतार लीलाभूमि ,
देवगण आसूक, नेमे , पूर्ण होक वासना। 

देखाते हबे आजि जगतबासी सबे, 
एखोनो भारतेर जायनी रे चेतना। 

सार्थक हबे तबे ए जनम सबाकार,
छेलेर गौरवे हबे गर्विणी माँ आमार। 

जगत लूटिबे पाय , घूचे जाबे जत दाय ,
मिटे जाबे मुकुन्देर चिरदीनेर कामना। 

हासिते खेलिते आसिनी ए जगते ,
करिते होबे मोदेर मायेरई साधना।-2  

-चारण कवि मुकुन्द दास 
 

3.হাসিতে খেলিতে আসিনি এ জগতে,

হাসিতে খেলিতে আসিনি এ জগতে,
করিতে হবে মোদের মায়েরই সাধনা।

দেখাতে হবে আজি জগৎবাসী সবে,
এখোনো ভারতের যায়নি রে চেতনা।

গভীর ওঙ্কারে হুঙ্কারি দে রে ডাক,
শিহরি উঠুক বিশ্ব, মেদিনীটা ফেটে যাক।

আমাদের জন্মভূমি দেবতার লীলাভূমি,
দেবগণ আসুক নেমে, পূর্ণ হোক বাসনা।

সার্থক হবে তবে এ জনম সবাকার,
ছেলের গৌরবে হবে গরবিণী মা আমার!

জগৎ লুটিবে পায়, ঘুচে যাবে যত দায়,
মিটে যাবে মুকুন্দের চিরদিনের কামনা।


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4. हे स्वामीजी ! आमरा युवक दल , 

(ताल -दादरा )


हे स्वामीजी ! आमरा तरुण दल 

हे स्वामीजी ! आमरा युवक दल , 

तोमार आशिस तोमार वाणी कोरेछि संबल। 

तुमि मोदेर इष्टदेव, तुमि चलार पथ। 

एई जीवनेर लक्ष्य तुमि, तुमि आलोर रथ।

तुमि मोदेर सकल आशा , देहे नवीन बल। 

तोमार वाणी वक्ष निये शपथ निबो , 

मातृभूमिर कल्याणे जीवन सौंपीबो। 

ताईतो मोरा तोमाय नमि , तोमार दूटी चरण चूमि, माताबो एई धरणीतल। 

तोमार आशिस तोमार वाणी कोरेछि संबल। 

-स्वामी आत्मकामानन्द 
 

4. হে স্বামীজী আমরা যুবকদল , 

হে স্বামীজী আমরা যুবকদল , 

তোমার আশিস, তোমার বাণী করেছি সম্বল। 

তুমি মোদের ইষ্ট , তুমি চলার পথ। 

যেই জীবনের লক্ষ্য তুমি , তুমি আলোর রথ ,

তুমি মোদের সকল আশা , দেহে নবীন বল। 


তোমার বাণী বক্ষে নিয়ে শপথ নিব,

 মাতৃভূমির কল্যাণে জীবন সঁপিব। 

তাইতো মোরা তোমায় নমি, তোমার দুটি চরণ চুমি। 

মাতবো এই ধরণীতল।

তোমার আশিস, তোমার বাণী করেছি সম্বল। 

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5. आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो  

आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो !!-२  

शिकल पोड़ा देश माता के मुक्तो कोरे निबो। 

ए कथा शुधू - नेताजी सुभाष तुमि बोलते पारो।  

शुधू तुमि बोलते पारो। 

आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२  


तोमार मुखेर जोय हिन्द ध्वनि , स्वधीनतार सञ्जीवनी,
तोमार मुखेर जोय हिन्द ध्वनि स्वधीनतार सञ्जीवनी,
 
कदम कदम बढ़ाये जा , ऐशो प्रेमेर परश मणि। 
कदम कदम पाड़ाय जा ऐशो प्रेमेर परश मणि। 

झड़ेर मुखे प्रदीप होये ,झड़ेर मुखे प्रदीप होये, 
तुमि ज्वलिते पारो; शुधू तुमि ज्वलिते पारो। 

आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२ 
आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२ 

तोमार जीवन गल्पेर मोतो , तोमार वाणी  जीवनेर ब्रतो।
तोमार जीवन गल्पेर मोतो , तोमार वाणी  जीवनेर ब्रतो।

हजार बाँधार प्राचीर भेंगे ; तोबू तोमार शीर उन्नतो। 
हजार बाँधार प्राचीर भेंगे, तोबू तोमार शीर उन्नतो। 

पथेर काँटा पाएर निचे, पथेर काँटा पाएर निचे,
 तुमि दोलते पारो। शुधू तुमि दोलते पारो। 
आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२ 
आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२ [३.१०]  

शिकल कोरा देश माता के मुक्तो कोरे नेबो। 
ए कथा शुधू नेताजी सुभाष तुमि बोलते पारो। 
शुधू तुमि बोलते पारो। शुधु तुमि बोलते पारो।
 
आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२  
आमाय रक्त दाओ, आमि तोमाय स्वाधीनता देबो-२  

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा !"

" तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा !" देशवासियों से ऐसा आह्वान एकमात्र नेताजी [ ही कर सकते हैं ! एक मात्र बालक नेताजी ही उत्तर दे सकते थे -  कि भारत की पराधीनता के लिए कौन उत्तरदायी है? कटक (उड़ीसा) स्कूल के प्रधानाध्यापक बेनीमाधव बाबू ने पूछा तो नेताजी ने कहा कि हम बंगाली ही इसके लिए जिम्मेदार हैं, यदि हमलोग थोड़ा प्रतिरोध करते तो भारत पराधीन न होता। वह अपनी मां को पत्र लिख रहे हैं कि मुझे जो बीस रुपए की छात्रवृत्ति मिलेगी, उसे अपने देश के गरीब लोगों की सेवा में खर्च करूंगा। मां ने चींटी को उसकी किताब के पीछे रखी तीन रोटियां खाते देखा तो पूछा तो नन्हे सुभाष ने कहा आप मुझे भरपेट खाने को देते हैं, लेकिन रोज एक गरीब जाता है, मैं उसे एक रोटी देती हूं, पर वह तीन दिन से नहीं आया। बालकपन में वे ध्यान-ध्यान का खेल खेलते थे, जिससे उसका साहस और धैर्य बहुत बढ़ गया था। नेताजी के आदर्श थे -स्वामीजी ! और भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्श हैं नेताजी ! क्यों? क्योंकि वे ही एकमात्र ऐसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिनका जन्मदिन 23 जनवरी को ज्ञात है पर उनकी पुण्यतिथि या तिरोधान दिवस किसी को ज्ञात नहीं है। इसलिए वे हमेशा रहेंगे ! 

[प्लासी का युद्ध, बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 23 जून, 1757 को लड़ा गया था। यह युद्ध  उत्तर-पूर्वी भारत में भागीरथी नदी के किनारे 'प्लासी' नामक स्थान में हुआ था जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर स्थित है।  इस युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत हुई थी। कलाइव ने लड़कर नहीं षडंयत्र करके युद्ध जीत लिया था। इस युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप ही भारत में अंग्रेजों ने पैर जमा लिये। इस युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफ़र, तथा राज्य के अमीर सेठ जगत सेठ आदि ने  धोखा देकर अंग्रेज के साथ दलबदल किया था। नवाब की तो पूरी सेना ने युद्ध मे भाग भी नही लिया था। ने प्लासी के युद्ध के समय अंग्रेजों के पास मात्र 300 सिपाही थे और सिराजुदौला के पास बीस हजार भारतीय सिपाही थे, जो खड़े होकर युद्ध देख रहे थे। यदि एक-एक ढेला भी मारते तो भारत कभी गुलाम नहीं होता। इस युद्ध के बाद, अंग्रेज़ों ने बंगाल पर नियंत्रण हासिल कर लिया था।  इस युद्ध ने भारत के अन्य हिस्सों में ब्रिटिश विस्तार की संभावना को भी खोल दिया था। इस युद्ध के बाद, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति बन गई। बीरेन दा ने बहरागोड़ा कैम्प में अपने भाषण में कहा था।]      

"Give me blood, I will give you freedom" - only Netaji can say, who is responsible for India's subjugation? Asked Benimadhav Babu, the headmaster of Cuttack School, Netaji said that we are Bengalis, if we had resisted a little, India would not have been subjugated. He is writing a letter to his mother, saying that I will spend the twenty rupees scholarship that I will get in the service of the poor people of my country. Mother saw Ant eating three rotis kept behind his book, and when she asked, little Subhash said, "You give me plenty to eat, but every day a poor person goes, I give him one roti, but he has not come for three days. As a boy, he used to meditate and play, which increased his courage and patience. Swamiji was Netaji's ideal, his Netaji is the ideal of the freedom fighters of India, why? He is the only prominent freedom fighter whose birthday is on 23 January but his death anniversary or death anniversary is not known.

[The Battle of Plassey was fought between Siraj-ud-Daulah, the Nawab of Bengal, and the British East India Company on 23 June 1757. This war took place in north-eastern India. The British East India Company led by Robert Clive won this war. In this war, Nawab Siraj-ud-Daulah's commander Mir Jafar betrayed and defected to the British. The British army had only 300 soldiers in this war, and one lakh Indians were standing and watching the war. If even one stone had been thrown, India would never have been enslaved. After this war, the British had gained control over Bengal. This war also opened up the possibility of British expansion in other parts of India. After this war, the British East India Company became the largest economic and military power in India.

"আমায় রক্ত দাও , আমি তোমায় স্বাধীনতা দেব" - বলতে পারেন কেবল নেতাজি , ভারতের পরাধীনতা জন্যে কে দায়ী ? জিজ্ঞাসা করিলেন কাটাক স্কুলের হেডমাস্টার বেণীমাধব বাবু , নেতাজি বললেন আমরা বাঙালি রা , আমরা যদি একটু প্রতিরোধ করতাম ভারত পরাধীন হতো না।  মা কে চিঠি লিখছেন আমি কুড়ি টাকা যে স্কলারশিপ পাবো , তাকে আমি আমার দেশের গরিব মানুষের সেবায় খরচ করবো। মা দেখলেন পিঁপড়ে উনার কিতাব পিছনে রাখা তিন টি রুটি খাচ্ছে , জিগ্যেস করলেন তো ছোট সুভাষ বললো , তুমি আমাকে প্রচুর খেতে দাও , কিন্তু রোজ এক জন গরিব মানুষ যান আমি ওনাকে এক তা রুটি দি , কিন্তু তিন দিন হলো উনি আসছেন না। ছেলে বেলায় ধ্যান-ধ্যান খেলতেন তার  ফলে সাহস ওর ধৈর্য বেড়ে যায়। স্বামীজী ছিলেন নেতাজির  আদর্শ , ওর নেতাজি হলেন ভারতের স্বাধীনতা সংগ্রামীর আদর্শ , কেন ? উনি এক মাত্র প্রমুখ স্বতন্ত্রতা সেনানী যার জন্মদিবস ২৩ জনবরী আছে কিন্তু প্রয়াণ দিবস , বা তার তিরোধান দিবস জ্ঞাত নেই।  

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6. मुक्तिर मंदिर सोपान तले कतो प्राण हलो बलिदान, 

लेखा आछे अश्रु जले !

कत बिप्लबी बन्धुर रक्ते राँगा, 

बन्दिशाला ओई शिकल भाँगा।   

ताँरा कि फिरिबे आज सुप्रभाते। 

जत तरुण अरुण गेछे अस्ताचले,  

मुक्तिर मंदिर सोपान तले कतो प्राण हलो बलिदान, 

लेखा आछे अश्रु जले !

जाँरा स्वर्गगत ताँरा एखनओ जाने ,

स्वर्गेर चेये प्रिय जन्मभूमि।  


एसो स्वदेशव्रतेर महा दीक्षा लभि,

जाँरा स्वर्गगत ताँरा एखनओ जाने ,

स्वर्गेर चेये प्रिय जन्मभूमि।  


सेई मृत्युंजयीदेर चरण चूमि , 

जाँरा जीर्ण जातिर बुके जागालो आशा ,

मौल मलिन मुखे जोगालो भाषा।   


आजि रक्त कमले गाँथा,   

आजि रक्त कमले गाँथा, माल्यखानि,  

বিজয় লক্ষ্মী দেবে তাঁদেরই গলে।

विजय लक्ष्मी देबे तांदेरई गले। 

मुक्तिर मंदिर सोपान तले कतो प्राण हलो बलिदान, 

लेखा आछे अश्रु जले !  

गायक: कलकत्ता कॉयर। संगीतकार: कृष्ण चंद्र डे। गीतकार: मोहिनी चौधरी। घराना : देशभक्ति

Muktira mandira sōpānatalē kato prāṇa halō balidāna

 lēkhā āchē aśru jalē ! 


মুক্তির মন্দির সোপানতলে কত প্রাণ হলো বলিদান,

‎লেখা আছে অশ্রুজলে। 

কত বিপ্লবী বন্ধুর রক্তে রাঙা,

বন্দীশালার ওই শিকল ভাঙ্গা। 

তাঁরা কি ফিরিবে আজ,

তাঁরা কি ফিরিবে আজ সুপ্রভাতে। 

যত তরুণ অরুণ গেছে অস্তাচলে, 

মুক্তির মন্দির সোপানতলে কত প্রাণ হলো বলিদান,

‎লেখা আছে অশ্রুজলে। 

যাঁরা স্বর্গগত তাঁরা এখনও জানে,

স্বর্গের চেয়ে প্রিয় জন্মভূমি।  

এসো স্বদেশব্রতের মহা দীক্ষা লভি, 


যাঁরা স্বর্গগত তাঁরা এখনও জানে

স্বর্গের চেয়ে প্রিয় জন্মভূমি। 

‎সেই মৃত্যুঞ্জয়ীদের চরণ চুমি, 

যাঁরা জীর্ণ জাতির বুকে জাগালো আশা,

মৌল মলিন মুখে জোগালো ভাষা। 

‎আজি রক্ত কমলে গাঁথা, 

‎আজি রক্ত কমলে গাঁথা মাল্যখানি, 

বিজয় লক্ষ্মী দেবে তাঁদেরই গলে। 

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7.सबार आगे स्वास्थ चाई , आध्यात्मिक शक्ति चाई।

(ताल -दादरा) 

सबार आगे स्वास्थ चाई , आध्यात्मिक शक्ति चाई।

उपासना ज्ञाने कर्ममय जीवन चाई। 

पिता, माता , गुरुजनदेर कथा मत चलबो भाई। 

देशेर काजे मरते चाई। 

देशेर सेवाय लागते चाई।। 

निजेर दोष देखबो मोरा , परेर दोषे नजर नाई।। 

अल्ला , गॉड , भगवान एकई शक्ति जानि भाई।। 

स्वामीजीर आशीर्वादे मानुष आमरा होबोई भाई। 

7. সবার আগে স্বাস্থ্য চাই, আধ্যাত্মিক শক্তি চাই।  

সবার আগে স্বাস্থ্য চাই, আধ্যাত্মিক শক্তি চাই।  

উপাসনা জ্ঞানে কর্মময় জীবন চাই। 

পিতামাতা গুরুজনদের কথামত চলবো ভাই। 

দেশের কাজে মরতে চাই। 

অভিঃ মন্ত্রে দীক্ষা মোদের। 

বাধা বিঘ্ন ভয় নাই।.

নিজের দোষ দেখবো মোরা ,

পরের দোষে নজর নাই। 

আল্লা গড ভগবান একই শক্তি জানি ভাই। 

স্বামীজীর আশীর্বাদে মানুষ আমরা হবোই ভাই। 

======   
8. मानुष होबार आन्दोलने मानुष होते चाई ,
(ताल दादरा )
मानुष होबार आन्दोलने मानुष होते चाई ,
मानुष होय देशेर तरे जीवन देबो भाई। 

ऐ आन्दोलन तोमार आमार एका कारोर नय ,
सबाई मिले ऐसो आजी मानुष होते जाई। 

अग्निमन्त्रे दीक्षा मोदेर भय बा करी कारे ,
वीर सेनानी सबाई मोरा स्वामीजिर तरे। 

डाक दिएछेन सेनापति आर देरी नय भाई। 
एगिए चलो एगिए एसो देशेर काजे जाई।।  
   
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 9.'एकई मत, एकई पथ, आमरा भाई भाई '
  
एकई मत, एकई पथ, आमरा भाई भाई ,
 एकई मत, एकई पथ, आमरा भाई भाई ,

हिंसा द्वेष भूले मोरा बाँचते सोबाई चाई। 
मिले मिशे स्फूर्ति कोरे हासि खेली गान गाई -

गान गान , गाई गान।।  

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10. आय आय आय आयरे सब छूटे -
(ताल -कहरवा )
आय आय आय आयरे सब छूटे -
सब बाधाके पिछने फेले, 
आयरे छूटे सबाई। 

मानुष होय मानुष गोड़ार -
संकल्प नीएछी मोरा 
सेई संकल्प सार्थक करते 
नीएछि स्वामीजिर भावधारा। 
त्यागेरई मन्त्रे दीक्षा निये जे ,
ह्रदय के विराट करि ,
सब मानुषेर माझे निजेके देखार 
साधना जे नियत करि। 
-उत्पल सिंह 
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सोमवार, 13 जनवरी 2025

🔱🕊 🏹 🙋*परिशिष्ट -1 * [ (1 जनवरी, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत ] [(क) परिच्छेद- 1, केशव के साथ दक्षिणेश्वर मन्दिर में] (Appendix A WITH KESHAB AT DAKSHINESWAR)

[(1 जनवरी, 1881),श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिशिष्ट] 

(क)

परिच्छेद- 1 

🔱🕊 🏹केशव के साथ दक्षिणेश्वर मन्दिर में🔱🕊 🏹

কেশবের সহিত দক্ষিণেশ্বর-মন্দিরে

(१)

* श्रीरामकृष्ण तथा श्री केशवचन्द्र सेन*

शनिवार, 1 जनवरी, 1881 ई. ब्राह्मसमाज का माघोत्सव आनेवाला है । राम, मनोमोहन आदि अनेक व्यक्ति उपस्थित हैं । ब्राह्म भक्तगण तथा अन्य लोग केशव के आने से पहले ही कालीबाड़ी में आ गये हैं और श्रीरामकृष्णदेव के पास बैठे हुए हैं । सभी बेचैन हैं, बार-बार दक्षिण की ओर देख रहे हैं कि कब केशव आयेंगे, कब केशव जहाज से आकर उतरेंगे । प्रताप, त्रैलोक्य, जयगोपाल सेन आदि अनेक ब्राह्मभक्तों को साथ लेकर केशवचन्द्र सेन श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर के मन्दिर में आये ।

.KESHAB CHANDRA SEN, the leader of the Brahmo Samaj, was expected to visit Sri Ramakrishna at the temple garden at Dakshineswar. With the Master were many Brahmo celebrities — Pratap, Trailokya, Jaygopal, and others. It was only a few days before the annual festival of the Brahmo Samaj, and the Brahmos were eagerly awaiting the arrival of their leader, who was to come by steamer. They were restless and talking rather noisily. Ram, Manomohan, and several other devotees of the Master were also there.

ব্রাহ্মসমাজের মাঘোৎসব সম্মুখে। প্রতাপ, ত্রৈলোক্য, জয়গোপাল সেন প্রভৃতি অনেক ব্রাহ্মভক্ত লইয়া কেশবচন্দ্র সেন শ্রীরামকৃষ্ণকে দর্শন করিতে দক্ষিণেশ্বর-মন্দিরে আসিয়াছেন। রাম, মনোমোহন প্রভৃতি অনেকে উপস্থিত। ব্রাহ্মভক্তেরা অনেকেই কেশবের আসিবার আগে কালীবাড়িতেই আসিয়াছেন ও ঠাকুরের কাছে বসিয়া আছেন। সকলেই ব্যস্ত, কেবল দক্ষিণদিকে তাকাইতেছেন, কখন কেশব আসিবেন, কখন কেশব জাহাজে করিয়া আসিয়া অবতরণ করিবেন। তাঁহার আসা পর্যন্ত ঘরে গোলমাল হইতে লাগিল।

हाथ में दो बेल फल तथा फूल का एक गुच्छा है । उन्होंने श्रीरामकृष्ण के चरण स्पर्श कर उन चीजों को उनके पास रख दिया और भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण ने भी भूमिष्ठ होकर प्रति-नमस्कार किया । श्रीरामकृष्ण आनन्द से हँस रहे हैं और केशव के साथ बात कर रहे हैं ।

At last Keshab entered the Master's room with two fruits and a bouquet of flowers in his hands. Touching the Master's feet, he laid the offering at his side. Then he saluted Sri Ramakrishna with great reverence, bowing very low before him. Sri Ramakrishna returned in like manner his distinguished visitor's salutation. Then he laughingly began the conversation.

এইবার কেশব আসিয়াছেন। হাতে দুইটি বেল ও ফুলের একটি তোড়া। কেশব শ্রীরামকৃষ্ণের চরণ স্পর্শ করিয়া ওইগুলি কাছে রাখিয়া দিলেন এবং ভূমিষ্ঠ হইয়া প্রণাম করিলেন। ঠাকুরও ভূমিষ্ঠ হইয়া প্রতিনমস্কার করিলেন।

श्रीरामकृष्ण (केशव के प्रति, हँसते हुए) - केशव, तुम मुझे चाहते हो, परन्तु तुम्हारे चेले लोग मुझे नहीं चाहते । तुम्हारे चेलों से कहा था, 'आओ, हम खंजन-मंजन करें, उसके बाद गोविन्द आ जायेंगे ।' (केशव के शिष्यों के प्रति) “वह देखो जी, तुम्हारे गोविन्द आ गये । मैं इतनी देर तक खंजन-मंजन कर रहा था, भला आयेंगे क्यों नहीं ? (सभी हँसे)

MASTER: "You, Keshab, want me; but your disciples don't. I was saying to them: 'Let us be restless. Then Govinda will come.' (To Keshab's disciples) See, here is your Govinda!

শ্রীরামকৃষ্ণ আনন্দে হাসিতেছেন। আর কেশবের সহিত কথা কহিতেছেন।শ্রীরামকৃষ্ণ (কেশবের প্রতি সহাস্যে) — কেশব তুমি আমায় চাও কিন্তু তোমার চেলারা আমায় চায় না। তোমার চেলাদের বলছিলুম, এখন আমরা খচমচ করি, তারপর গোবিন্দ আসবেন। (কেশবের শিষ্যদের প্রতি) — “ওইগো, তোমাদের গোবিন্দ এসেছেন। আমি এতক্ষণ খচমচ করছিলুম, জমবে কেন। (সকলের হাস্য)

"गोविन्द का दर्शन सहज नहीं मिलता । कृष्ण-लीला में देखा होगा, नारद जब व्याकुल होकर ब्रज में कहते हैं - 'प्राण ! हे गोविन्द ! मम जीवन !' - उस समय गोपालों के साथ श्रीकृष्ण आते हैं, पीछे पीछे सखियाँ और गोपियाँ । व्याकुल हुए बिना ईश्वर का दर्शन नहीं होता । (केशव के प्रति) "केशव, तुम कुछ कहो, ये सब तुम्हारी बात सुनना चाहते हैं ।"

"We have been showing signs of restlessness all this while to set the stage for your arrival. It isn't easy to have the vision of Govinda. You must have noticed in the Krishnayatra.1 that Narada enters Vrindavan and prays with great yearning: 'O Govinda! O my soul! O Life of my life!', and then Krishna comes on the stage with the cowherd boys, followed by the gopis. No one can see God without that yearning. "Well, Keshab, say something! They are eager to hear your words."

(কেশবের শিষ্যদের প্রতি) — “ওইগো, তোমাদের গোবিন্দ এসেছেন। আমি এতক্ষণ খচমচ করছিলুম, জমবে কেন। (সকলের হাস্য) “গোবিন্দের দর্শন সহজে পাওয়া যায় না। কৃষ্ণযাত্রায় দেখ নাই, নারদ ব্যাকুল হয়ে যখন ব্রজে বলেন – ‘প্রাণ হে গোবিন্দ মম জীবন’, তখন রাখাল সঙ্গে কৃষ্ণ আসেন। পশ্চাতে সখীগণ গোপীগণ। ব্যাকুল না হলে ভগবানের দর্শন হয় না।(কেশবের প্রতি) — “কেশব তুমি কিছু বল; এরা সকলে তোমার কথা শুনতে চায়।”

केशव - (विनीत भाव से हँसते हुए) - यहाँ पर बात करना लुहार के पास सूई बेचने की चेष्टा-जैसा होगा !

KESHAB (humbly, with a smile): "To open my lips here would be like trying to 'sell needles to a blacksmith'."

কেশব (বিনীতভাবে, সহাস্যে) — এখানে কথা কওয়া কামারের নিকট ছুঁচ বিক্রি করতে আসা!

श्रीरामकृष्ण - (हँसते हुए) - बात क्या है, जानते हो ? भक्तों का स्वभाव गाँजा पीनेवालों-जैसा है । तुमने एक बार गाँजे की चिलम लेकर दम लगाया, और मैंने भी एक बार लगाया । (सभी हँसे)

MASTER (smiling): "But don't you know that the nature of devotees is like that of hemp-smokers? One hemp-smoker says to another, 'Please take a puff for yourself and give me one.'" (All laugh.)

শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে) — তবে কি জানো, ভক্তের স্বভাব গাঁজাখোরের স্বভাব। তুমি একবার গাঁজার কলকেটা নিয়ে টানলে আমিও একবার টানলাম। (সকলের হাস্য)

दिन के चार बजे का समय है । कालीबाड़ी के नौबतखाने का वाद्य सुनायी दे रहा है ।

श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - देखा, कैसा सुन्दर वाद्य है ! लेकिन एक आदमी केवल एक राग - 'पों' - निकाल रहा है और दूसरा अनेक सुरों की लहर उठाकर कितनी ही राग-रागिनियाँ निकाल रहा है । मेरा भी वही भाव है ।

It was about four o'clock in the afternoon. They heard the music from the nahabat in the temple garden. MASTER (to Keshab and the others): "Do you hear how melodious that music is? One player is producing only a monotone on his flute, while another is creating waves of melodies in different ragas and raginis. (Modes in Indian music.) That is my attitude. 

বেলা ৪টা বাজিয়াছে। কালীবাড়ির নহবতে বাজনা শুনা যাইতেছে। শ্রীরামকৃষ্ণ (কেশব প্রভৃতির প্রতি) — দেখলে কেমন সুন্দর বাজনা। তবে একজন কেবল পোঁ করছে, আর-একজন নানা সুরের লহরী তুলে কত রাগ-রাগিণীর আলাপ করছে।মারও ওই ভাব। 

मेरे सात सूराख रहते हुए फिर मैं क्यों केवल 'पों' निकालूँ - क्यों केवल 'सोऽहम्' 'सोऽहम्' करूँ ? मैं सात सूराखों से अनेक प्रकार की राग-रागिनियाँ बजाऊँगा । केवल 'ब्रह्म-ब्रह्म' ही क्यों करूँ? शान्त, दास्य, वात्सल्य, सख्य, मधुर सभी भावों से उन्हें पुकारूँगा, आनन्द करूँगा, विलास करूँगा ।

Why should I produce only a monotone when I have an instrument with seven holes? Why should I say nothing but, 'I am He, I am He'? I want to play various melodies on my instrument with seven holes. Why should I say only, 'Brahma! Brahma!'? I want to call on God through all the moods — through santa, dasya, sakhya, vatsalya, and madhur. I want to make merry with God. I want to sport with God."

 আমার সাত ফোকর থাকতে কেন শুধু পোঁ করব — কেন শুধি সোহং সোহং করব। আমি সাত ফোকরে নানা রাগ-রাগিণী বাজাব। শুধু ব্রহ্ম ব্রহ্ম কেন করব! শান্ত, দাস্য, বাৎসল্য, সখ্য, মধুর সবভাবে তাঁকে ডাকব — আনন্দ করব, বিলাস করব।

केशव अवाक् होकर इन बातों को सुन रहे हैं और कह रहे हैं, “ज्ञान और भक्ति की इस प्रकार अद्भुत और सुन्दर व्याख्या मैंने कभी नहीं सुनी ।”

Keshab listened to these words with wonder in his eyes and said to the Brahmo devotees, "I have never before heard such a wonderful and beautiful interpretation of jnana and bhakti."

কেশব অবাক্‌ হইয়া এই কথাগুলি শুনিতেছেন। আর বলিতেছেন, জ্ঞান ও ভক্তির এরূপ আশ্চর্য, সুন্দর ব্যাখ্যা কখনও শুনি নাই।

केशव - (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - आप कितने दिन इस प्रकार गुप्त रूप में रहेंगे - धीरे धीरे यहाँ पर लोगों का मेला लग जायगा ।

KESHAB (to the Master): "How long will you hide yourself in this way? I dare say people will be thronging here by and by in great crowds."

কেশব (শ্রীরামকৃষ্ণের প্রতি) — আপনি কতদিন এরূপ গোপনে থাকবেন — ক্রমে এখানে লোকে লোকারণ্য হবে।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हारी यह कैसी बात है ! मैं खाता-पीता रहता हूँ और उनका नाम लेता हूँ । लोगों का मेला लगाना में नहीं जानता । हनुमानजी ने कहा था, 'मैं वार, तिथि, नक्षत्र यह सब कुछ नहीं जानता, केवल एक राम का चिन्तन करता हूँ ।"

MASTER: "What are you talking of? I only eat and drink and sing God's name. I know nothing about gathering crowds. Hanuman once declared: 'I know nothing about the day of the week or the position of the moon and stars in the sky. I simply meditate on Rama.'"

শ্রীরামকৃষ্ণ — ও তোমার কি কথা। আমি খাই দাই থাকি, তাঁর নাম করি। লোক জড় করাকরি আমি জানি না। কে জানে তোর গাঁইগুঁই, বীরভূমের বামুন মুই। হনুমান বলেছিল — আমি বার, তিথি, নক্ষত্র ও-সব জানি না কেবল এক রামচিন্তা করি।

केशव - अच्छा, मैं लोगों का मेला लगाऊँगा, परन्तु आपके यहाँ सभी को आना पड़ेगा ।

KESHAB: "All right, sir, I shall gather the crowd. But they all must come to your place."

কেশব — আচ্ছা, আমি লোক জড় করব। কিন্তু আপনার এখানে সকলের আসতে হবে।

श्रीरामकृष्ण - मैं सभी के चरणों की धूलि की धूलि हूँ । जो दया करके आयेंगे, वे आवें !

MASTER: "I am the dust of the dust of everybody's feet. If anyone is gracious enough to come here, he is welcome."

শ্রীরামকৃষ্ণ — আমি সকলের রেণুর রেণু। যিনি দয়া করে আসবেন, আসবেন।

केशव - आप जो भी कहें, आपका आगमन (अवतार ग्रहण) व्यर्थ न होगा ।

KESHAB: "Whatever you may say, sir, your advent cannot be in vain."

কেশব — আপনি যা বলুন, আপনার আসা বিফল হবে না।

(२)

 [(1 जनवरी, 1881),श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिशिष्ट] 

🏹*ईश्वर-दर्शन का उपाय -अहं का त्याग * 🏹

इधर कीर्तन का आयोजन हो रहा है । अनेक भक्त जुट गये हैं । पंचवटी से कीर्तन का दल दक्षिण की ओर आ रहा है । हृदय शहनाई बजा रहा है । गोपीदास मृदंग तथा अन्य दो व्यक्ति करताल बजा रहे हैं ।

 In the mean time the devotees had arranged a kirtan. Many of them had joined it. The party started at the Panchavati and moved toward the Master's room. Hriday blew the horn, Gopidas played the drum, and two devotees played the cymbals.

Sri Ramakrishna sang: O man, if you would live in bliss, repeat Lord Hari's name;Then you will lead a life of joy and go to paradise,And feed upon the fruit of moksha evermore:Such is the glory of His name! I give you the name of Hari, which Siva, God of Gods, Repeats aloud with His five mouths.

এদিকে সংকীর্তনের আয়োজন হইতেছে। অনেকগুলি ভক্ত যোগ দিয়াছেন। পঞ্চবটী হইতে সংকীর্তনের দল দক্ষিণদিকে আসিতেছে। হৃদয় শিঙা বাজাইতেছেন। গোপীদাস খোল বাজাইতেছেন আর দুইজন করতাল বাজাইতেছেন। শ্রীরামকৃষ্ণ গান ধরিলেন:

হরিনাম নিসে রে জীব যদি সুখে থাকবি।

সুখে থাকবি বৈকুণ্ঠে যাবি, ওরে মোক্ষফল সদা পাবি ॥

     (হরিণাম গুণেরে)

যে নাম শিব জপেন পঞ্চমুখে

আজ সেই হরিনাম দিব তোকে।

श्रीरामकृष्ण गाना गाने लगे –

हरिनाम निसे रे जीव यदि सूखे थाकबि। 

सूखे थाकबि बैकुण्ठ जाबी , ओरे मोक्षफल सदा पाबि।। 

(हरिनाम गुनेरे)

जे नाम शिव जपेन पञ्चमुखे ,

आज सेई हरिनाम दिबो तोके।   

संगीत - (भावार्थ) –"रे मन ! यदि सुख से रहना चाहता है तो हरि का नाम ले । हरिनाम के गुण से सुख से रहेगा, वैकुण्ठ में जायगा, सदा मोक्षफल प्राप्त करेगा । जिस नाम का जप शिवजी पंचमुखों से करते हैं, आज तुझे वही हरिनाम दूँगा ।"

श्रीरामकृष्ण सिंह-बल से नृत्य कर रहे हैं । अब समाधिमग्न हो गये ।समाधि-भंग होने के बाद कमरे में बैठे हैं ।

The Master danced with the strength of a lion and went into samadhi. Regaining consciousness of the outer world, he sat down in his room and began to talk with Keshab and the other devotees.

শ্রীরামকৃষ্ণ সিংহবিক্রমে নৃত্য করিতেছেন।এইবার সমাধিস্থ হইলেন।সমাধিভঙ্গের পর ঘরে উপবিষ্ট হইয়াছেন। 

[(1 जनवरी, 1881),श्री रामकृष्ण वचनामृत परिशिष्ट] 

 🏹[ब्रह्मसमाजी-आर्यसमाजी-मूर्तिपूजा पर विश्वास नहीं करने वाले]  

केशव के साथ सर्वधर्म समन्वय : विषय पर चर्चा 🏹 

श्रीरामकृष्ण  केशव आदि के साथ वार्तालाप कर रहे हैं ।

"- सभी पथों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है - जैसे, तुममें से कोई गाड़ी पर, कोई नौका पर, कोई जहाज पर सवार होकर और कोई पैदल आया है - जिसकी जिसमें सुविधा और जिसकी जैसी प्रकृति है, वह उसी के अनुसार आया है । उद्देश्य एक ही है । कोई पहले आया, कोई बाद में ।

[जैसे स्वामी विवेकानन्द ने अलवर (राजस्थान) के राजा मंगलसिंह को उनके पिता का चित्र (2D) पर विश्वास और उनकी मूर्ति (3D) पर अविश्वास को तार्किक तौर से प्रमाणित किया था ।]     

MASTER: "God can be realized through all paths, it is like your coming to Dakshineswar by carriage, by boat, by steamer, or on foot. You have chosen the way according to your convenience and taste; but the destination is the same. Some of you have arrived earlier than others; but all have arrived.

“সব পথ দিয়েই তাঁকে পাওয়া যায়। যেমন তোমরা কেউ গাড়ি, কেউ নৌকা, কেউ জাহাজে করে, কেউ পদব্রজে এসেছ, যার যাতে সুবিধা, আর যার যা প্রকৃতি সেই অনুসারে এসেছ। উদ্দেশ্য এক — কেউ আগে এসেছে, কেউ পরে এসেছে। কেশব প্রভৃতির সঙ্গে কথা কহিতেছেন।

[(1 जनवरी, 1881),श्री रामकृष्ण वचनामृत परिशिष्ट] 

 🏹ईश्वर को देखने का उपाय है - उपाधि के अहंकार का त्याग और सेवा 🏹 

"उपाधि जितनी दूर रहेगी, ईश्वर उतना ही निकट अनुभूत होंगे । अर्थात जितना अधिक तुम उपाधियों से मुक्त होते जाओगे  उतना ही अधिक तुम अपने ह्रदय में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करोगे। ऊँचे टिले पर वर्षा का जल एकत्र नहीं होता, यह केवल नीची जमीन पर ही एकत्र होता है । इसी प्रकार जहाँ अहंकार के उपाधि का टिला ऊँचा है, वहाँ पर ईश्वर की कृपा का जल नहीं जमता।  ईश्वर के समक्ष दीनभाव रखना ही अच्छा है ।

[अर्थात विद्या का 'मैं', या ठाकुर,माँ -स्वामी जी के दास का 'मैं',  के अलावा-किसी भी पद का मैं, या धनी-मानी होने का अहंकार ही ऊँचा टिला है। जितना अधिक तुम Director, अध्यक्ष, सचिव, बड़ा बाबू,  किसी फर्म के मालिक बाबू या पार्टनर बाबू, आदि उपाधियों से मुक्त होते जाओगे, उतना ही अधिक तुम अपने ह्रदय में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करोगे।] 

The more you rid yourself of upadhis, the nearer you will feel the presence of God. Rain-water never collects on a high mound; it collects only in low land. Similarly, the water of God's grace cannot remain on the high mound of egotism. Before God one should feel lowly and poor.

(কেশব প্রভৃতির প্রতি) — “উপাধি যতই যাবে, ততই তিনি কাছে হবেন। উঁচু ঢিপিতে বৃষ্টির জল জমে না। খাল জমিতে জমে; তেমনি তাঁর কৃপাবারি, যেখানে অহংকার, সেখানে জমে না। তাঁর কাছে দীনহীন ভাবই ভাল।

"बहुत सावधान रहना चाहिए, यहाँ तक कि वस्त्र से भी अहंकार होता है । तिल्ली के रोगी को देखा, काली किनारवाली धोती पहनी है और साथ ही निधुबाबू की गजल गा रहा है ! "किसी ने बूट पहना नहीं कि मुँह से अंग्रेजी बोली निकलने लगी ! यदि कोई छोटा आधार हो तो गेरुआ वस्त्र पहनने से अहंकार होता है । उसके प्रति सम्मान प्रदर्शन करने में जरा सी त्रुटि उसके क्रोध और नाराजगी को भड़का देती है ।

"One should be extremely watchful. Even clothes create vanity. I notice that even a man suffering from an enlarged spleen sings Nidhu Babu's light songs when he is dressed up in a black-bordered cloth. There are men who spout English whenever they put on high boots. And when an unfit person puts on an ochre cloth he becomes vain; the slightest sign of indifference to him arouses his anger and pique.

“খুব সাবধানে থাকতে হয়, এমন কি কাপড়চোপড়েও অহংকার হয়। পিলে রোগী দেখেছি কালাপেড়ে কাপড় পরেছে, অমনি নিধুবাবুর টপ্পা গাইছে!“কেউ বুট পরেছে অমনি মুখে ইংরাজী কথা বেরুচ্ছে! “সামান্য আধার হলে গেরুয়া পরলে অহংকার হয়; একটু ত্রুটি হলে ক্রোধ, অভিমান হয়।”

[(1 जनवरी, 1881),श्री रामकृष्ण वचनामृत परिशिष्ट] 

[भोगों (3 ऐषणा) का विवेकपूर्ण अन्त हुए बिना, विवेकदर्शन की तड़प नहीं होती !]

 🏹 ईश्वर लाभ के तीन चरण : भोगान्त, व्याकुलता और आत्मसाक्षात्कार ! 🏹  

 [ভোগান্ত, ব্যাকুলতা ও ঈশ্বরলাভ ]

"व्याकुल हुए बिना उनका दर्शन नहीं किया जा सकता । यह व्याकुलता भोग का अन्त हुए बिना नहीं होती । जो लोग कामिनीकांचन के बीच में हैं, जिनके भोग का अन्त नहीं हुआ, उनमें व्याकुलता नहीं आती ।

[ "व्याकुल हुए बिना ईश्वर का दर्शन नहीं किया जा सकता । और यह व्याकुलता  (ईश्वर को देखने की तड़प -मन तड़पत हरि दर्शन को आज ) भोग का अन्त हुए बिना नहीं होती । जो लोग कामिनी-कांचन के बीच घिरे रहते हैं, जिनके भोग का (स्वयं को M/F शरीर मानकर तीनों ऐषणाओं में Bh  आसक्ति का) अन्त नहीं हुआ, उनमें व्याकुलता नहीं आती ।]

"God cannot be seen without yearning of heart, and this yearning is impossible unless one has finished with the experiences of life. Those who live surrounded by 'woman and gold', and have not yet come to the end of their experiences, do not yearn for God.

“ব্যাকুল না হলে তাঁকে দেখা যায় না। এই ব্যাকুলতা ভোগান্ত না হলে হয় না। যারা কামিনী-কাঞ্চনের মধ্যে আছে ভোগান্ত হয় নাই, তাদের ব্যাকুলতা আসে না।

"उस देश (कामारपुकुर) में जब मैं था, हृदय का लड़का, जो चार-पाँच वर्ष का था सारा दिन मेरे पास रहता था, मेरे सामने इधर उधर खेला करता था, एक तरह से भूला रहता था । पर ज्योंही सन्ध्या होती वह कहने लगता - 'माँ के पास जाऊँगा ।' मैं कितना कहता - 'कबूतर दूँगा' आदि आदि, अनेक तरह से समझाता, पर वह भूलता न था, रो-रोकर कहता था – ‘माँ के पास जाऊँगा ।’ खेल, खिलौना कुछ भी उसे अच्छा नहीं लगता था । मैं उसकी दशा देखकर रोता था ।

"When I lived at Kamarpukur, Hriday's son, a child four or five years old, used to spend the whole day with me. He played with his toys and almost forgot everything else. But no sooner did evening come than he would say, 'I want to go to my mother.' I would try to cajole him in various ways and would say, 'Here, I'll give you a pigeon.' But he wouldn't be consoled with such things; he would weep and cry, 'I want to go to my mother.' He didn't enjoy playing any more. I myself wept to see his state.

“ও-দেশে হৃদয়ের ছেলে সমস্ত দিন আমার কাছে থাকত, চার-পাঁচ বছরের চেলে। আমার সামনে এটা ওটা খেলা করত, একরকম ভুলে থাকত। যাই সন্ধ্যা হয় হয় অমনি বলে — মা যাব। অমি কত বলতুম — পায়রা দিব, এই সব কথা, সে ভুলত না; কেঁদে কেঁদে বলত — মা যাব। খেলা-টেলা কিছুই ভাল লাগছে না। আমি তার অবস্থা দেখে কাঁদতুম।

"यही हैं बालक की तरह ईश्वर के लिए रोना ! यही है व्याकुलता ! फिर खेल, खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता । यह व्याकुलता तथा उनके लिए रोना, भोग के क्षय होने पर होता है ।"

"One should cry for God that way, like a child. That is what it means to be restless for God. One doesn't enjoy play or food any longer. After one's experiences of the world are over, one feels this restlessness and weeps for God."

“এই বালকের মতো ঈশ্বরের জন্য কান্না। এই ব্যাকুলতা। আর খেলা, খাওয়া কিছুই ভাল লাগে না। ভোগান্তে এই ব্যাকুলতা ও তাঁর জন্য কান্না!”

सब लोग विस्मित होकर इन बातों को सुन रहे हैं । सायंकाल हो गया है, बत्तीवाला बत्ती जलाकर चला गया । केशव आदि ब्राह्म भक्तगण जलपान करके जायेंगे । जलपान का आयोजन हो रहा है।

The devotees sat in silence, listening to the Master's words. When evening came, a lamp was lighted in the room. Preparations were being made for feeding Keshab and the devotees.

সকলে অবাক্‌ হইয়া নিঃশব্দে এই সকল কথা শুনিতেছেন।সন্ধ্যা হইয়াছে, ফরাশ আলো জ্বালিয়া দিয়া গেল। কেশব প্রভৃতি ব্রাহ্মভক্তগণ সকলে জলযোগ করিয়া যাইবেন। খাবার আয়োজন হইতেছে।

केशव - (हँसते हुए) - आज भी क्या लाई-मुरमुरा है ?

KESHAB (with a smile): "What? Puffed rice again today?"

কেশব (সহাস্যে) — আজও কি মুড়ি?

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) - हृदय जानता है ।

MASTER (smiling): "Hriday knows."

শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে) — হৃদু জানে।

पत्तल बिछाये गये । पहले लाई-मुरमुरा, उसके बाद पूड़ी और उसके बाद तरकारी । (सभी हँसते हैं) सब समाप्त होते होते रात के दस बज गये ।

The devotees were served first with puffed rice, and then with luchi and curries on leaf-plates. All enjoyed the meal very much. It was about ten o'clock when supper was over.

পাতা পড়িল। প্রথমে মুড়ি, তারপর লুচি, তারপর তরকারি। (সকলের খুব আনন্দ ও হাসি) সব শেষ হইতে রাত দশটা বাজিয়া গেল।

[(1 जनवरी, 1881),श्री रामकृष्ण वचनामृत परिशिष्ट] 

 🙋*बूढ़ी* (ढाई) को पहले छू लो, और फिर खेल करो 🙋

श्रीरामकृष्ण पंचवटी के नीचे ब्राह्म भक्तों के साथ फिर बातचीत कर रहे हैं ।

The Master went to the Panchavati with Keshab and the devotees.

ঠাকুর পঞ্চবটীমূলে ব্রাহ্মভক্তগণের সঙ্গে আবার কথা কহিতেছেন।

श्रीरामकृष्ण - (हँसते हुए, केशव के प्रति) - ईश्वर को प्राप्त करने के बाद गृहस्थी में भलीभाँति रहा जा सकता है । *बूढ़ी* (ढाई) को पहले छू लो, और फिर खेल करो ।(*बच्चों के एक खेल में एक बालक 'चोर' बनता है, जो एक खूंटी के पास रहता है और अन्य बालक इधर-उधर रहते हैं । वह 'चोर' बालक जिस बालक को छुएगा, वही 'चोर' बनेगा । लेकिन जिसने उस खूँटी को छू लिया वह फिर 'चोर' नहीं बन सकता । उस खूँटी को बूढ़ी कहते हैं ।)

MASTER (to Keshab and the others): "One can very well live in the world after realizing God. Why don't you first touch the 'granny' and then play hide-and-seek?

শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে কেশব প্রভৃতির প্রতি) — ঈশ্বরলাভের পর সংসারে বেশ থাকা যায়। বুড়ী ছুঁয়ে তারপর খেলা কর না।

"ईश्वर-प्राप्ति के बाद भक्त निर्लिप्त हो जाता है, जैसे कीचड़ की मछली - कीचड़ के बीच में रहकर भी उसके बदन पर कीच नहीं लगता ।"

"After attaining God, a devotee becomes unattached to the world. He lives like a mudfish. The mudfish keeps its body unstained though it lives in mud."

“লাভের পর ভক্ত নির্লিপ্ত হয়, যেমন পাঁকাল মাছ। পাঁকের ভিতর থেকেও গায়ে পাঁক লেগে থাকে না।”

लगभग ११ बजे रात का समय हुआ, सभी जाने की तैयारी में हैं । प्रताप ने कहा, ‘आज रात को यहीं पर रह जाना ठीक होगा ।’

About eleven o'clock the Brahmos became eager to go home. Pratap said, "It would be nice if we could spend the night here."

প্রায় ১১টা বাজে, সকলে যাইবার জন্য অধৈর্য। প্রতাপ বললেন, আজ রাত্রে এখানে থেকে গেলে হয়।

श्रीरामकृष्ण केशव से कह रहे हैं, 'आज यहीं रहो न ।'

MASTER (to Keshab): "Why not stay here tonight?"

শ্রীরামকৃষ্ণ কেশবকে বলিতেছেন, আজ এখানে থাক না।

केशव - (हँसते हुए) - काम-काज है, जाना होगा ।

KESHAB (smiling): "No, I have business to attend to. I must go."

কেশব (সহাস্যে) — কাজ-টাজ আছে; যেতে হবে।

श्रीरामकृष्ण - क्यों जी, तुम्हें क्या मछली की टोकरी की गन्ध न होने से नींद न आयगी ? एक मछलीवाली रात को एक बागवान के घर अतिथि बनी थी । उसे फूलवाले कमरे में सुलाया गया, पर उसे नींद न आयी । वह करवटें बदल रही थी, उसे देख बागवान की स्त्री ने आकर कहा, 'क्यों री, सो क्यों नहीं रही हो ?' मछलीवाली बोली, 'क्या जानूँ बहन, शायद फूलों की गन्ध से नींद नहीं आ रही है । क्या तुम जरा मछली की टोकरी मँगा सकती हो ?'“तब मछलीवाली मछली की टोकरी पर जल छिड़ककर उसकी गन्ध सूँघती सो गयी !" (सभी हँसे)

MASTER: "Why must you, my dear sir? Can't you sleep without your fish-basket? Once a fishwife was a guest in a gardener's house. She was asked to sleep in a room full of flowers. But she couldn't get any sleep there. (All laugh.) She was restless and began to fidget about. The gardener called to her: 'Hello there! Why aren't you asleep?' 'Oh, I don't know', said the fishwife. 'There are flowers here. The smell keeps me awake. Can't you bring me my fish-basket?' She sprinkled a little water in the basket, and when she smelled the fish she fell fast asleep." (All laugh heartily.)

শ্রীরামকৃষ্ণ — কেন গো, তোমার আঁষচুবড়ির গন্দ না হলে কি ঘুম হবে না। মেছুনী মালীর বাড়িতে রাত্রে অতিথি হয়েছিল। তাকে ফুলের ঘরে শুতে দেওয়াতে তার আর ঘুম হয় না। (সকলের হাস্য) উসখুস করছে, তাকে দেখে মালিনী এসে বললে — কেন গো — ঘুমুচ্ছিস নি কেন গো? মেছুনী বললে কি জানি মা কেমন ফুলের গন্ধে ঘুম হচ্ছে না, তুমি একবার আঁষচুবড়িটা আনিয়ে দিতে পার? তখন মেছুনী আঁষচুবড়িতে জল ছিটিয়ে সেই গন্ধ আঘ্রাণ করতে করতে নিদ্রায় অভিভূত হল। (সকলের হাস্য)

बिदा के समय केशव ने श्रीरामकृष्ण के चरणों में अपने द्वारा चढ़ाये हुए पुष्पों में से एक गुच्छा लिया और भूमि पर माथा लगाकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके भक्तों के साथ कहने लगे, 'विधान की जय हो ।'

Keshab took a few of the flowers that he had offered at Sri Ramakrishna's feet on his arrival. He and his Brahmo devotees cried out as they saluted the Master, "Hail, Navavidhan!" Thus they bade him adieu.

বিদায়ের সময় কেশব ঠাকুরের চরণ স্পর্শ করে একটি ফুলের তোড়া গ্রহণ করিলেন ও ভূমিষ্ঠ প্রণাম করিয়া ‘বিধানের জয় হউক’ এই কথা ভক্তসঙ্গে বলিতে লাগিলেন।

केशव ब्राह्मभक्त जयगोपाल सेन की गाड़ी में बैठे । वे कलकत्ता जायेंगे ।

ব্রাহ্মভক্ত জয়গোপাল সেনের গাড়িতে কেশব উঠিলেন; কলিকাতায় যাইবেন।

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