Sunday, October 5, 2014

'स्प्रिचुअल लाइफ़' या आध्यात्मिक जीवन का अर्थ क्या है ? (प्रैक्टिकल वेदांत पार्ट -4 )

'मानव-जीवन' कितना बहुमूल्य है, उसका अनुभव केवल आधायत्मिक जीवन में ही किया जा सकता है। किन्तु यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि - ' व्हाट इज दी मीनिंग ऑफ़ स्पिरिचुअल लाइफ ?  'स्प्रिचुअल लाइफ़' या आध्यात्मिक जीवन का अर्थ क्या है ? ध्यानपूर्वक मनुष्य का विश्लेषण करने से यह बात स्पष्ट हो जाती  है कि - प्रत्येक मनुष्य के तीन प्रमुख उपादान हैं - स्थूल भौतिक शरीर ( मोर्टल मटीरीअल बॉडी), सूक्ष्म भौतिक मन या बुद्धि ( माइंड ऑर  इंटेलेक्ट ) तथा 'स्पिरिट' या रूह जिसे हमलोग अविनाशी आत्मा या ब्रह्म कहते हैं। मनुष्य '3H' का संयोजन है इसलिये ह्रदय से जुड़े बिना, 'स्प्रिचुअल ' या आध्यात्मिक  हुए बिना- 'चरित्र-निर्माण' करना सम्भव नहीं है।
 ' स्पिरिचूऐलिटी एप्लाइड इन लाइफ मेक्स अ स्पिरिचुअल लाइफ' ! जीवन में प्रयुक्त आध्यात्मिकता-  या ' प्रैक्टिकल आध्यात्मिकता '  ही आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करती है।  यदि  कोई व्यक्ति अपना  जीवन केवल भौतिक स्तर (मटेरियल प्लेन) पर ही व्यतीत करता रहता है, या थोड़ा बहुत मानसिक एवं बौद्धिक स्तर पर भी व्यतीत कर लेता हो, तो वैसा व्यक्ति पूर्णतया मनुष्य जीवन व्यतीत नहीं कर रहा होता है। वास्तविक मनुष्य का जीवन जीने के लिये, हमें अपने जीवन में आध्यात्मिक स्तर के जीवन (ह्रदय का विकास ) को भी अनिवार्य रूप से संयुक्त करना होता है।
आइडियल एजुकेशन या आदर्श शिक्षा :  ' होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन' (एच.बी.सी.एस.ई) का संचालन करने वाली संस्था "  टाटा इंस्टिच्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च" (टी.आई.एफ.आर या  टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान) ने  ''नेशनल काउन्सिल फ़ॉर टीचर ट्रेनिंग' या ' शिक्षक प्रशिक्षण की राष्ट्रीय परिषद' में दरख्वास्त किया है कि 'टीचर एज्यूकेटर पूल ' शिक्षकों के समुच्य को प्रशिक्षित करने की योग्यता रखने वाले शिक्षक या शिक्षाविशारद् के कोर्स में एक योग्यता के रूप में विज्ञान की शिक्षा में पीएचडी का समावेश करना अनिवार्य होना चाहिये। उसी प्रकार आदर्श शिक्षा आइडियल एजुकेशन अर्थात मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा देने में समर्थ शिक्षकों को प्रशिक्षित करने वाले शिक्षकों के समुच्य -'टीचर  एजुकेटर पूल ' के शिक्षाविशारद् के कोर्स में ' ब्रह्मविद् मनुष्य बनने का प्रशिक्षण देने में समर्थ शिक्षक -या नेता के कोर्स में ब्रह्मविद्या अर्थात 'मनःसंयोग' के प्रशिक्षण को अनिवार्य होना चाहिये। 
आध्यात्मिक शिक्षा या आदर्श शिक्षा देने की योग्यता क्या है, आध्यात्मिक शिक्षा देने में समर्थ शिक्षकों का समुच्य तैयार करने का प्रशिक्षण कोई शिक्षक (या मानवजाति का मार्गदर्शक नेता) किसी दूसरे व्यक्ति को, अथवा अपने सहकर्मिओं को चरित्रवान मनुष्य बनने के लिये किस प्रकार प्रेरित कर सकता है ? मनुष्य-निर्माणकारी और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा देने में समर्थ सभी शिक्षकों में - 'शिव ज्ञान से जीव सेवा ' करने की योग्यता अनिवार्य रूप से होनी चाहिये।
 उस  'टीचर  एजुकेटर' या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता को यह जानना होगा, कि ' प्रत्येक मनुष्य के भीतर ज्ञान पहले से ही अन्तर्निहित है।' कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अन्दर ही है, शिक्षक केवल उस ज्ञान को अनावृत करने का उपाय सिखा सकता है; ज्ञान को बाहर से किसी के भीतर प्रविष्ट नहीं कराया जा सकता है। जो ज्ञान-स्वरूप होकर भीतर में जो पहले से ही विद्यमान हैं, उनको बाहर से केवल जाग्रत किया जा सकता है।
किन्तु कोई शिक्षक या नेता यदि बाहर से आदेश दें- ' मैं तुम्हारा मार्गदर्शक गुरु हूँ, तुम मेरे शिष्य या  'अनुयायी' हो, मैं तुमको आदेश करता हूँ, तुमको निर्देश दे रहा हूँ- अरे, मूर्ख, तू कब सुधरेगा ? तुम जाग जाओ ! ' तो ऐसे उपदेश का भी कोई लाभ नहीं होता है। जो ज्ञानस्वरूप पहले से ही सबके हृदय में विद्यमान हैं, उनको पूर्ण श्रद्धा और प्रेम के बल पर ही जाग्रत किया जा सकता है, क्रोध से या अपशब्द से कभी नहीं। किन्तु यदि कोई शिक्षक अपने छात्र को आत्मस्वरूप समझकर उसे भी भावी नेता जानकर उसे हृदय से प्यार करते हों, तो उनके इस प्यार भरे पुकार - 'उत्तिष्ठत् ! जाग्रत ! तुम भी अपने 3H को विकसित कर यथार्थ मनुष्य बन सकते हो, ' की गूँज - को सुनकर शिष्य के हृदय के बन्द दरवाजे खुल जाते हैं।  
किन्तु अक्सर हम शिक्षक गण अपने विद्यार्थियों या अनुयायिओं को अपने तुच्छ समझते हैं- उन्हें अज्ञ या मुर्ख समझते हैं, तथा यह सोचते हैं, कि हम तो उन्हें सिखा रहे है। तो अक्सर ऐसे मूर्ख  शिक्षकों की आवाज विद्यर्थियों के कानों तक नहीं पहुँच पाती है, और गुरु की वह पुकार, विद्यार्थी के हृदय -कपाट को उन्मुक्त नहीं कर पाती है। 
गुरु के लिए यह आवश्यक है, कि वह अपने शिष्य को सर्वदा श्रद्धा की दृष्टि से देखे, उसको भीतर से - अपना अंतरधन समझ कर भीतर से प्रेम करे. मुझमें और उसमें कोई भिन्नता नहीं है, यही भाव ( प्रज्ञा या सच्ची-समझ या Uptake) मन के भीतर सतत जाग्रत रखनी चाहिए. (भेद-दृष्टि को दूर करके) इसी बोध के साथ जब किसी को शिक्षा दी जाती है, तब उस शिष्य के अन्तस्थ सत्ता की मोहनिद्रा जल्द टूट जाती है, और वह तीव्र गति से प्रगति करने लगता है।
शास्त्र वचन है ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ अर्थात् श्रेष्ठ-पवित्र कार्य को पवित्रता के साथ ही करना चाहिए। देवत्व से जुड़ने की पहली शर्त पवित्रता ही है। सर्वदा ऐसा मनोभाव ( अभेद-दृष्टि की प्रज्ञा या सच्ची-समझ ) को जाग्रत रखने के लिए पहले स्वयं मुझे पवित्र बनना होगा, मुझको ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा. मनःसंयोग की कक्षा प्रारम्भ करने से पहले इसका संकल्प करना अच्छा होगा -
   ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
    तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
इस प्रकार गाकर भी दुहरवाया जा सकता है :
 साथ-साथ हो रक्षण-पालन, साथ-साथ पुरुषार्थ करें। 
तेजस्वी  हो  ज्ञान   हमारा,  नहीं  परस्पर  द्वेष  करें।
प्रार्थनाएँ भावनापूर्वक सुनें, समझें और मन ही मन निरंतर संस्कृत के सूत्र दुहरायें-  हम (आचार्य और शिष्य ) दोनों का यश और ब्रह्मतेज एक साथ बढ़े। ॐ शीर्षं/उन्नतं भूयात् !  - हमारा मस्तक सदा ऊँचा रहे -  ॐ विवेकः/ स्थिरीभूयात्। - इसमें विवेक सदैव बना रहे !   
" ॐ सह नौ यशः। ॐ सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। की भावना ":-  अर्थात हम दोनों का यश एक साथ बढ़े। हम दोनों का 'ब्रह्मवर्चस' एक साथ बढ़े। मनुष्य बनने और बनाने का यह कार्य प्रशिक्षणार्थियों एवं प्रशिक्षकों के संयुक्त पुरुषार्थ से ही सम्भव होगा। इसलिए प्रशिक्षकों को अपने मन में सदैव याद रखना होगा यहाँ प्रशिक्षण लेने वाले सभी छात्र मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेता -'वुड बी लीडर्स ' हैं; इसलिये प्रत्येक भाई के साथ श्रद्धा पूर्वक व्यव्हार करना अनिवार्य है । हमलोगों के शास्त्रों ( तैत्रियोपनिषद 1/3) में यह सब कहा गया है-
  ॐ सह नौ यशः।ॐ सह नौ ब्रह्मवर्चसम्।
हम दोनों (गुरु और शिष्य ) का यश एक साथ बढ़े।  हम दोनों का ब्रह्मवर्चस अर्थात ब्रह्मतेज या ओजस्विता एक साथ बढ़े। इस अनुवाक में पहले सम-भाव में स्थित 'समदर्शी आचार्य' के द्वारा अपने लिए और अपने शिष्य के लिए भी यश और ब्रह्म-तेज की वृद्धि के उद्देश्य से शुभ-कामना की जा रही है। आचार्य की अभिलाषा यह है, कि मुझे तथा मेरे श्रद्धालु और विनयी शिष्य को साथ-साथ ज्ञान और अभ्यास से उपलब्ध होने वाले यश और ब्रह्मतेज की प्राप्ति हो।  
ध्यान रखें-यश लौकिक होता है, वह स्वाध्याय या पठन-पाठन की सम्यक् साधना से बढ़ेगा। तथा वेदों में प्रार्थना है - ' आ ब्रह्मा ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायताम्।'- मेरे राष्ट्र के विद्वान सम्पूर्णता के ज्ञाता हों !  पूर्ण ब्रह्म को जानने से जो ब्रह्म तेज या ब्रह्मवर्चस  (दिव्य तेज) उत्पन्न होता है, वह अलौकिक होता है, वह आध्यात्मिक साधना से बढ़ेगा। किसी वृत्त के केन्द्र गुजरती हुई जो सरल रेखा परिधि को दोनों ओर स्पर्श करती है, उसे व्यास कहते है। अर्थात यदि किसी वृत्त का व्यास (पूर्णता) ज्ञात हो जाय, तो व्यास के सम्बन्ध में जुड़े रहने वाले को, इस पार और उस पार सम्पूर्ण का ज्ञान हो जाता है। इसलिये गीता के ध्यान मन्त्र में, जहाँ व्यासदेव की स्तुति की गयी है, वहाँ उनको 'विशालबुद्धि' कहा गया है। अस्तु; हम सङ्कल्प करते हैं कि दोनों को साथ-साथ चलायेंगे।  
इसीलिए आचार्य पहले स्वयं पवित्र जीवन जीते हुए, ब्रह्मचर्य पालन करते हुए- शिक्षार्थी में भी यश और
 ब्रह्मतेज जाग्रत होने की कामना करते हैं। सच्ची शिक्षा देने के लिए ऐसे ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है. अर्थात आचार्य को अपने मन, वचन तथा कर्मों में पवित्रता रखनी होगी। यदि मेरा जीवन जीवन पवित्र स्वच्छ या उज्ज्वल नहीं है, तो वैसे गुरु के हजार बार पुकारने से भी विद्यार्थी की नींद नहीं टूट सकेगी। 
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था फलदायी नहीं हो पा रही है?
क्यों आज यह बात आज कहनी पड़ रही है, कि स्कूल-कॉलेज या विश्वविद्यालयों में मनुष्य तैयार नहीं हो रहे हैं ? प्रचलित शिक्षा पद्धति द्वारा विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण क्यों नहीं हो पा रहा है ? इसका कारण यह है कि- हमने शिक्षा नीति में परिवर्तन का अर्थ स्कूल के कोर्स को 10+2 रखें या + 3 कर दें, यही समझ रखा है ? या फिर एक ही प्रकार की शिक्षा के लिये, एक ही जगह टेस्ट - या कम्बाइंड एक्ज़ाम कराने को ही शिक्षा-नीति नहीं कहते है। 
अभी हाल में ही अमेरिका के १९ प्रख्यात शिक्षाविदों  ने अमेरिका में विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा का कैसा अधोपतन हो गया है? उस विषय में विशेष रूप से खोज-पड़ताल तथा विश्लेष्ण करने के बाद अमेरिका की शिक्षा-व्यवस्था के उपर एक रिपोर्ट जारी किया है। वह रिपोर्ट अत्यंत सनसनी खेज है।  वे कहते हैं, कि यह शिक्षा विद्यार्थियों के मन को सही रूप से गढ़ने, या अच्छा चरित्र निर्माण करने के विषय में कोई सहायता नही कर पा रही है। वैसी शिक्षा देने के लिए क्या करना होगा ? उन अमेरिकी शिक्षाविदों का मन्तव्य है, कि शिक्षकों को पहले अपना मन ठीक तरह से गढना होगा। 
स्वामीजी कहते हैं, यथार्थ शिक्षा क्या है ?  ' मन की शक्ति तथा उसके प्रवाह को अपने नियंत्रण में रखने तथा उसको लाभप्रद बना लेने की क्षमता को ही शिक्षा कहते है। ' स्वामीजी ने शिक्षा को कई प्रकार परिभाषित किया है, किन्तु एक स्थान पर जिस ढंग से परिभाषित किया है, वह बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है, वे कहते हैं- " शिक्षा क्या है? क्या वह पुस्तक विद्या है ? नहीं! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है ? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम (या मनः संयोग के अभ्यास) के द्वारा, ईच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है वह फलदायक होता है, - उसे शिक्षा कहते हैं।" 
ऐसी शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद- मनुष्य जो कुछ भी चाहे उसे प्राप्त कर सकता है, अथवा जब जी चाहे वह किसी वस्तु का त्याग भी कर सकता है। ऐसी ईच्छा हो रही है, कि यह कार्य करूँगा, उसे कारगर बना लेने से, वह हो सकेगा- इस प्रकार से निश्चय करके वह सब कुछ पर विजय प्राप्त कर सकता है। 
 मन की ईच्छाओं को परिष्कृत कर, उसे प्रभावी बना लेने से उसके द्वारा- अति सामान्य कार्य से लेकर बहुत बड़े बड़े कार्यों को भी बड़े सुंदर ढंग से सम्पन्न किया जा सकता है। अगर ऐसा संभव हो जाता है, तो उसका आधार क्या है? यही ईच्छाशक्ति !
किन्तु यदि शिक्षक के भीतर ही ऐसी दृढ इच्छा-शक्ति न हो, तो इसका कार्य नहीं हो सकेगा, छात्रों को भी वैसी शिक्षा नहीं दे सकेगा। यदि किसी नेता अथवा गुरु का जीवन स्वयं पवित्र न हो, प्रभावशाली तथा सम्मोहक न हो; वे यदि स्वयं उत्तम चरित्र के अधिकारी न हों, तो छात्रों के जीवन में भी ये सारे भाव संचारित नहीं हो सकते हैं। अभी शिक्षा के विषय में भीतर से निकलने वाले जिस आह्वान के उपर चर्चा हो रही थी, वैसा प्रभाव केवल लेक्चर देने से नहीं पड़ता, बल्कि शिक्षक (या नेता) के जीवन का प्रभाव पड़ता है। एक पवित्र और जादुई सम्मोहन उत्पन्न करने वाला जीवन ही किसी अन्य के जीवन में पवित्रता और सम्मोहित कर देने वाले सौन्दर्य -अर्थात एन्थ्रेलमेंट उतपन्न कर देने वाले व्यक्तित्व को प्रकाशित कर सकता है।
अतः यथार्थ शिक्षा प्रदान करने का उपाय है, शिक्षा के अर्थ को हृदयंगम करके शिक्षक को पहले स्वयं अपने जीवन को उत्कृष्ट बना लेना, तथा अपने जीवन से एक अन्य जीवन-दीप को प्रज्ज्वलित कर देना। मेरे जीवन की ऊष्मा ही किसी अन्य के जीवन में ऊष्मा का संचार कर सकती है। इसीलिए पहले मेरे जीवन उस उत्साह की ऊष्मा उत्पन्न होनी चाहिए, जिसे मैं दूसरों में संचारित करूँगा, वैसा नहीं होने से शिक्षा नहीं दी जा सकती है. 
हमलोग कभी कभी कहते हैं- श्रीरामकृष्ण के जैसे शिक्षक इस जगत में नहीं हैं, स्वामी विवेकानन्द जैसे शिक्षक जगत में नहीं हैं, थोड़ा विचार करके देखने से पाएंगे कि यह बिल्कुल सच्ची बात है. उन्होंने मनुष्यों को वास्तविक शिक्षा दी है. वे शिक्षा कैसे देते थे ? उनका जीवन इतना पवित्र हो गया था कि उनके निकट जाते ही उनके ह्रदय के प्रेमाग्नि की उष्णता और उत्साह का अनुभव होने लगता था, इसीलिए वे अपनी उष्णता को दूसरों के जीवन में संचारित कर सकते थे। इस प्रकार सच्ची शिक्षा प्रदान करने के उपाय के विषय में मूल सिद्धान्त यही है. 
जो शिक्षा देंगे उनका अपना जीवन किसी आदर्श-गुरु के साँचे में ढला हुआ होना चाहिये। उनको अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान रहना चाहिए। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे -" हे प्रचारक, क्या तुम्हें बिल्ला (प्रचार करने का अधिकार) मिला है ? राजा का बिल्ला (राज-मुद्रा या चपरास) जिसे मिलता है -भले ही वह एक  (प्राक्लमैशन ) घोषणा या ऐलान करने वाला सामान्य प्यादा हो , उसका कहना- लोग भय और श्रद्धा के साथ सुनते हैं। वह व्यक्ति अपना बिल्ला दिखाकर बड़ा दंगा तक रोक सकता है। हे प्रचारक, तुम पहले भगवान का साक्षात्कार कर उनकी प्रेरणा और आदेश प्राप्त कर लो, बिल्ला पा लो। बिना बिल्ला मिले यदि तुम सारा जीवन भी प्रचार करते रहो तो उससे कुछ न होगा, तुम्हारा श्रम व्यर्थ होगा। " 
" कोई भी व्यक्ति भगवत्प्रेम की गहराई में डुबकी लगाना नहीं चाहता -कोई इतना धीरज नहीं रखता।   विवेक -वैराग्य की साधना की किसी को परवाह तक नहीं है। दो-चार किताबें पढ़ते ही सभी लेक्चर देने और प्रचार करने में भिड़ जाते हैं। कितना आश्चर्य है ! लोकशिक्षा देना कितना कठिन काम है ! जिसने ईश्वर का साक्षात्कार कर उनसे आदेश पाया है-वही लोकशिक्षा दे सकता है। " 
" प्रश्न -जो व्यक्ति भाषण देने और प्रचार करने में तो कुशल हो परन्तु जिसका जीवन उन्नत न हो, उसके विषय में आपका क्या मत है ? 
उत्तर -ऐसा मनुष्य तो दूसरों की धरोहर रखी हुई सम्पत्ति को उड़ानेवाले की तरह होता है। वह लोगों को बड़ी आसानी से उपदेश देता है, पर सच पूछो तो उसमें उसके स्वयं के भाव या विचार नहीं होते -सभी दूसरों से उधार लिये हुए होते हैं। " 
" प्रश्न -आजकल जिस तरह का धर्मप्रचार हो रहा है,उसके बारे में आपकी क्या राय है ? 
उत्तर -यह तो एक जन के लायक भोजन तैयार कर सौ जनों को न्योता देने की तरह है। थोड़ी से साधना करते ही गुरुगिरी करने लग जाते हैं ! "
" चारदीवारी से घिरी हुई एक जगह थी। उसके भीतर क्या है इसका बाहर के लोगों को कुछ भी पता नहीं था। एक दिन चार जनों ने मिलकर सलाह की कि निसेनी लगाकर चारदीवारी पर चढ़कर देखा जाय कि भीतर क्या है। पहला आदमी निसेनी के सहारे दीवार पर जैसे ही चढ़ा वैसे ही 'हा हा ' कर हँसते हुए चारदीवारी के भीतर कूद पड़ा। क्या हुआ समझ न पाकर -दूसरा आदमी भी दीवार पर चढ़ा और वह भी उसी प्रकार 'हा हा' कर हँसते हुए भीतर कूद पड़ा। तीसरे आदमी का भी वही हाल हुआ। 
अन्त में चौथा आदमी चारदीवार पर चढ़ा। उसने देखा कि भीतर दिव्य उपभोग की वस्तुओं से भरा अपूर्व शोभामय एक उपवन है, उसके मन में उन सुन्दर वस्तुओं का उपभोग करने की तीव्र कामना उठी, पर उसने उसका दमन किया। और दूसरों को भी साथ लेकर उसका आनन्द चखाने की इच्छा से वह वापस नीचे उतर आया, तथा जो भी दिखाई पड़ता उसी को उस जगह के बारे में बताने लगा। ब्रह्मवस्तु भी इसी उपवन की तरह है। जो उसे एक बार देख लेता है, वही आनन्दमग्न होकर उसमें विलीन हो जाता है। परन्तु जो विशेष शक्तिमान पुरुष होते हैं वे ब्रह्मदर्शन के पश्चात् वापस आकर लोगों को उसकी खबर बताते हैं, और दूसरों को सथ लेकर उस ब्रह्मानन्द में निमग्न होते हैं। "  
" जीव वास्तव में सच्चिदानन्द-स्वरुप है, किन्तु अहंभाव के कारण वह विभिन्न उपाधियों में उलझकर अपने यथार्थ स्वरुप को भूल बैठा है। " 
" ईश्वर स्वयं ही मनुष्य के रूप में लीला करते हैं। वे बड़े जादूगर हैं -यह जीव-जगतरूपी इन्द्रजाल उन्हीं के जादू का खेल है। केवल जादूगर ही सत्य है और जादू मिथ्या। "
" इस दुर्लभ मनुष्य-जीवन को पाकर जो व्यक्ति इसी जीवन में ईश्वरलाभ (ब्रह्मविद् मनुष्य बनने) के लिये चेष्टा नहीं करता, उसका जन्म लेना ही व्यर्थ है। "
" देह-मन्दिर को अँधेरे में नहीं रखना चाहिये, उसमें ज्ञान का दीप जलाना चाहिये। 'ज्ञान-प्रदीप जला निज घर में, ब्रह्ममयी का मुख देख रे मनवा !' प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानलाभ कर सकता है। प्रत्येक जीवात्मा का परमात्मा के साथ संयोग पहले से ही है। प्रत्येक घर तक वॉटर सप्लाई का पाईप गया हुआ है, जिसके द्वारा वॉटर टैंक का जल आ सकता है। बस, योग्य अधिकारी को अर्जी भेजो, जल भिजवाने का प्रबंध हो जायेगा, और तुम्हारे घर की टंकी में भी जल भर जायेगा। "
" संसार में मनुष्य दो तरह की प्रवृत्तियाँ लेकर जन्म ग्रहण करता है-विद्या और अविद्या। विद्या मुक्तिपथ पर ले जाने वाली प्रवृत्ति है और अविद्या संसार-बन्धन में डालने वाली। व्यक्ति के जन्म के समय ये दोनों प्रवृत्तियाँ मानो खाली तराजू के पल्लों की तरह समतोल स्थिति में रहती हैं। परन्तु शीघ्र ही मानो मनरूपी तराजू के एक पल्ले में संसार के भोग-सुखों का आकर्षण तथा दूसरे में भगवान का आकर्षण स्थापित हो जाता है। यदि मन में संसार का आकर्षण अधिक हो तो अविद्या का पल्ला भारी होकर झुक जाता है; और मनुष्य संसार में डूब जाता है। परन्तु यदि मन में भगवान के प्रति अधिक आकर्षण हो तो विद्या का पल्ला भारी हो जाता है, और मनुष्य भगवान की ओर खिंचता चला जाता है। "
व्याहारिक जीवन में आध्यात्म या स्पिरिचुअलिटी को संयुक्त करने के लिये- पहले हमें मनुष्य के आध्यात्मिक आयाम ('अविनाशी ' स्पिरिचुअल डायमेंशन ) के अस्तित्व और महत्व के विषय में श्रवण करना अर्थात सुनना होगा, फिर उस पर चिन्तन-मनन (कान्टम्प्लैट) करना होगा; फिर निदिध्यासन -(ऑटो सजेशन या आत्म-
सुझाव)  अर्थात निरंतर स्वयं को ही सुझाव देना होगा-  क्या ? ( गुरुमुख से अविनाशी ईश्वर का जो नाम सुना है- वह अविनाशी आत्मा मैं हूँ ! आइ एम ही ! आई एम ही ! )  दीर्घ काल तक  (विवेक -वैराग्य पूर्वक ) अभ्यास करते करते हमारा आध्यात्मिक आयाम (स्पिरिचुअल डाइमेंशन), हमारे भौतिक आयाम (शरीर) और मानसिक आयाम (माइंड) के साथ घुलमिल कर 'ब्लेंडेड' हो जाता है; तब स्पिरिट या आत्मा (शुद्ध-बुद्धि) ही हमारे सब विचारों और कार्यों की - निर्देशक शक्ति (गाइडिंग फ़ोर्स) बन जाती है। जब कोई व्यक्ति इतनी तन्मयता के साथ वैराग्य के साथ ऑटो-सजेशन का अभ्यास करके आत्मा को ही अपने समस्त विचारों और कार्यों की निर्देर्शक ज्योति बना लेता है- वह आध्यात्मिक जीवन जीने लगता है, जो उसके मनुष्य जीवन को पूर्णता (सिद्धि या फुलफिलमेंट) की ओर ले जाता है। 

जब हमारा मन मनुष्य के उस आध्यात्मिक आयाम (स्पिरिचुअल डायमेंशन) के अस्तित्व और महिमा को स्वीकार कर लेता है जो मनुष्य के शारीरिक और मानसिक जीवन में परम सत्य ' हाईएस्ट ट्रूथ ' के आधिपत्य को प्रतिष्ठित कर देती है ; तब हमारा ह्रदय सचमुच इतना विस्तृत हो जाता कि वह विश्व के प्रत्येक मनुष्य के साथ एकात्मता का अनुभव करने लगता है। दूसरों का सुख अपना सुख और दूसरों का दुःख अपना दुःख अनुभव होने लगता है। हम निःस्वार्थपर होना सीखते हैं, और किसी जरूरतमन्द व्यक्ति की सहायता के लिये, समय आने पर हम अपने साधनों का त्याग करने के लिये तत्पर हो जाते हैं। दूसरों की सेवा करने के लिये अधिक से अधिक प्रेम का उपार्जन करने लगते हैं। हम स्वार्थ में अन्धे होकर अपनी आत्मसन्तुष्टि के लिये अपनी धन-सम्पदा और शक्ति का भोण्डा प्रदर्शन नहीं करते, हर प्राणी के लिये हमारे हृदय से प्रेम प्रवाहित होने लगता है।  हम अपने हृदय में सदैव उस अवर्णनीय आनन्द (सबलाइम जॉय) का अनुभव करते हैं, सामान्यतः वैसा आनन्द कभी किसी को इन्द्रिय-भोगों या बौद्धिक स्तर के सुख में नहीं मिलता। और कुछ पाना बाकि नहीं रह जाता, मानवजीवन में परिपूर्णता आ जाती है। व्यवहारिक जीवन में आध्यात्मिकता के अनुप्रयोग करने का ऐसा ही परिणाम होता है। आध्यात्मिक जीवन वह जीवन है, जिसमें मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार या आचरण से आध्यात्मिकता की झलक मिलने लगती है। स्वामी विवेकानन्द इसी को प्रैक्टिकल वेदान्त कहते थे। 'व्यवहारिक जीवन में वेदान्त -चतुर्थ भाग' शीर्षक निबंध में वे कहते हैं -  
"आत्मा के संबंध में सबसे प्राचीन मत - "आर्गुमेन्ट ऑफ़ सेल्फ-आइडेंटिटी " अर्थात 'अहं-सारूप्य' के तर्क पर या ' मनुष्य का ' मैं ' क्या है' के तर्क पर स्थापित है।  'अहं-सारूप्य ' तर्क से तातपर्य है - शरीर में जो भी परिवर्तन हो, कल का 'मैं' ही आज का 'मैं' है और आज का 'मैं' आगामी कल का 'मैं' रहेगा। और  मैं विश्वास करता हूँ कि जो समस्त परिवर्तनों का साक्षी है- वही 'मैं' हूँ। 
दूसरी ओर प्राचीन बौद्ध ऐसी जीवात्मा मानने की कोई आवश्यकता नहीं समझते थे। इसके पीछे उनका तर्क यही था कि हमलोग जो कुछ जानते हैं, अथवा जान सकते हैं, वह इन सतत परिवर्तन शील शरीर-मन के सिवा अन्य कुछ होना असम्भव है। कल जो 'मैं' था, आज भी 'मैं' वही हूँ, क्योंकि मुझे इसका स्मरण है, अतएव 'मैं' सतत रहने वाला 'कुछ' हूँ- यह बात तर्क के द्वारा सिद्ध नहीं की जा सकती। अतः इनके पीछे किसी अविकारी (अन्चेन्जबल या अपरिवर्तनीय) तत्व में विश्वास करना अनावश्यक है।  और यदि वास्तव में इस प्रकार की कोई अपरिणामी वस्तु हो भी तो हम उसे कभी समझ नहीं सकेंगे और न उसे कभी काग्निज़बल (संज्ञेय) बना सकेंगे, न किसी तरह प्रत्यक्ष कर सकेंगे। एक अन्य पाश्चात्य अज्ञेयवादी (ऐग्नास्टिक) कॉम्टे ( कांट ?) का तर्क भी यही था  कि हम केवल परिणामशील पदार्थ  की ही धारणा कर सकते हैं, जहाँ तक परिवर्तन के पीछे किसी अपरिणामी सत्ता के होने की बात है, तो जब हम उसे अनुभव या प्रत्यक्ष ही नहीं कर सकते तो उसे स्वीकार करने की क्या जरूरत है ?
 'मैं जाता हूँ', ' मैं खाता हूँ', 'मैं सो रहा हूँ', 'मैं स्वप्न देखता हूँ', यहाँ चलना, खाना,सोना,स्वप्न देखना --ये सब विभिन्न परिवर्तन भले ही हों, किन्तु उनके बीच 'मैं-पन' नित्य भाव से वर्तमान रहता है। जब मैं खाता हूँ, तो खाते हुए रूप में अपना विचार करता हूँ। तब खाने की क्रिया के साथ मेरा तादात्म्य हो जाता है। जब मैं दौड़ता रहता हूँ, तब मैं और दौड़ना -ये दो अलग बातें नहीं रह जातीं। अतएव व्यक्तिगत तादात्म्य पर आधारित ये तर्क कुछ सबल प्रतीत नहीं होते। स्मृति वाला दूसरा तर्क भी निर्बल ही है। क्योंकि अनेक लोग कुछ विशेष अवस्थाओं में अपना  पिछला सबकुछ पूर्ण रूप से भूल जाते हैं। यदि केवल स्मृति पर ही उस व्यक्ति का अस्तित्व निर्भर करता, तब तो कहना पड़ता कि यह वह नहीं है। 

जब अतीव प्राचीन काल में इस समस्या का समाधान भारत में भी नहीं मिल रहा था, तब अद्वैतवाद का आविष्कार हुआ- जिसे हम पदार्थ रूप में देख रहे हैं, वही गुण स्वरुप है। आत्मा, पुरुष या साक्षी चैतन्य अकर्ता है, किन्तु देह-मन-इन्द्रियों के साथ तादात्म्य करके वह स्वयं को कर्ता मानने लगता है -और कर्म के नियम से बंध जाता है। जब मैं अपने को शरीर सोचता हूँ,तो मैं आत्मा हूँ यह भूल जाता हूँ। जब मैं अपने को आत्मा मानता हूँ, तब देहानुभूति ही नहीं रहती। देह-ज्ञान लुप्त हुए बिना कभी आत्मानुभूति होती ही नहीं। 
इसको समझने के लिये अद्वैतवादी 'रज्जु-सर्प' का उदाहरण देते हैं। जब रस्सी का ज्ञान होने से सर्प समझने का भ्रम दूर हो जाता है, तब केवल रस्सी ही बच रहती है। इसी प्रकार हम भ्रम में पड़ जाते हैं कि मानो सचमुच ही हमें आत्मा और देह का द्वैत अनुभव हो रहा है, किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। एक समय में या तो केवल देह (Hand ) का ही अनुभव होता है, या आत्मा (Heart) का ही। इसे प्रमाणित करने के लिये किसी तर्क की आवश्यकता नहीं। तुम अपने मन (Head) से ही इस इसका सत्यापन कर सकते हो। तुम अपने को आत्मा या कोई देह रहित तत्व सोचने का प्रयत्न करो, तो प्रतीत होगा कि यह असम्भव सा है, और जो इने-गिने लोग इसमें सफल होते हैं, वे देखेंगे कि जब वे अपने को आत्मस्वरूप अनुभव करते हैं, तब उन्हें देह ज्ञान बिल्कुल नहीं रहता। 
इसीसे सिद्ध हो जाता है कि 'अस्तित्व' एक का ही है -२ या ३ का नहीं! वह एक ही अनेक रूपों में जान पड़ता है और इन्हीं सारे नाम-रूपों से 'कॉज एंड इफ़ेक्ट' कार्य-कारण का सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है। कार्य-कारण सम्बन्ध का अर्थ है--परिणाम, एक का दूसरे में बदल जाना। समय समय पर मानो कारण अन्तर्हित हो जाता है, उसके बदले केवल कार्य रह जाता है। यदि आत्मा (Heart) देह (Hand) का कारण है, तो मानो कुछ देर के लिये वह अन्तर्हित हो जाती है, और उसके बदले देह रह जाती है; और जब शरीर अन्तर्हित हो जाता है,तो आत्मा ही अवशिष्ट रहती है। इस अद्वैत मत से बौद्धों का मत खण्डित हो जाता है। 
इसलिये सीमाबद्ध जीवात्मा को ऐसा व्यक्ति कहा जा सकता है, जो क्रमशः पूर्ण व्यक्तित्व प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो रहा है। पूर्ण व्यक्तित्व तभी प्राप्त होगा, जब वह अनन्त में पहुँचेगा, किन्तु इस अवस्था में पहुँचने से पहले उसके मिथ्या व्यक्तित्व का लगातार परिणाम हो रहा है और साथ ही साथ विकास भी। बौद्ध मत का दोष यह है कि उसमें क्रम विकासवाद ( ईवोलूशन) को समझने की क्षमता नहीं थी। इसलिये अद्वैतवाद अपने पूर्वगामी द्वैतवाद के साथ साथ अन्य सभी मतों को भी यह मानकर अंगीकार कर लेता है कि वे भी एक सत्य तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं; और अद्वैतवाद जिन सिद्धान्तों पर पहुँचा है, वे भी उन्हीं सिद्धान्तों पर पहुँचा देते हैं। अतएव विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रति कठोर वचन न कहकर उनको आशीर्वाद देते हुए उनकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि सभी मत एक ही सत्य के आंशिक वर्णन मात्र हैं। द्वैतवाद की कुछ लोकप्रिय धारणायें इस प्रकार हैं -
१.लॉ ऑफ़ कर्मा (कर्मविधान) :  इस स्थूल शरीर के पीछे एक सूक्ष्म शरीर (अर्थात चित्त या मनवस्तु या माइन्ड स्टफ) है, यह सूक्ष्म शरीर (माइन्ड स्टफ) भी जड़ है, किन्तु अत्यन्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थों से बना है। चित्त हमारे सम्पूर्ण कर्मों और संस्कारों (ऐक्शंस एंड इम्प्रेशंस) को धारण करता है। इसमें संचित कर्म और संस्कार दृश्य रूप में व्यक्त होने के लिये सदा तत्पर रहते हैं। हमारा प्रत्येक विचार और प्रत्येक कार्य कुछ समय बाद सूक्ष्म रूप धारण कर लेता है, मानो बीज बन जाता है, चित्त की गहराई में अव्यक्त रूप से रहता है, और कुछ समय बाद आविर्भूत होकर अपना फल देता है। कर्म-फलों का यही समूह मनुष्य के जीवन को निर्धारित करता है। अर्थात हमारे वर्तमान कर्म ही हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं। हमारे विचार, वाणी और कर्म ही हमारे शुभ या अशुभ बंधन-जाल के सूत (थ्रेड्स) हैं, इसके अतिरिक्त मनुष्य किसी भी नियम से बद्ध नहीं है। एक बार किसी शक्ति को चलायमान कर देने पर उसका पूर्ण फल हमें भोगना पड़ता है। यही दी लॉ ऑफ़ कर्मा या कर्म का सिद्धान्त है। इस सूक्ष्म शरीर (मन) के पीछे जीव या मनुष्य की व्यष्टि आत्मा है। 
२. यह जीव (अहं रूप में प्रकाशित - 'हुंकार'-शक्ति समन्वित आत्मा) भी उस सर्वव्यापी चित्त (सर्वव्यापी वास्तविक पदार्थ या यूनिवर्सल सब्सटेन्स, माइन्ड स्टफ) का एक अंश है, और वह भी शाश्वत है- वह अनादि (विदाउट  बिगनिंग) और अनन्त (विदाउट एंड) है। अपने वास्तविक स्वरुप -पवित्रता ( प्युरिटी) को प्रकाशित करने के लिये वह अनेक प्रकार के देहों में से होकर क्रमविकसित हो रहा है। जो कर्म इस क्रमविकास में बाधक हों, उन्हें ईविल एक्शन (अशुभ कर्म) कहते हैं। जो विचार इस प्रकार पवित्रता स्वरुप बनने में बाधक हो उन्हें अशुभ विचार कहते हैं। और जिस कार्य या विचार द्वारा उसके स्वरुप प्रकाशन में सहायता मिलती हो, उसे सद्कार्य अथवा सद्विचार कहते हैं। 
३.विवेक-पोटेंशियलिटी:  भारत के निम्नतम द्वैतवादी और अत्यन्त उच्च श्रेणी के अद्वैतवादी सभी का यह सामान्य मत है कि आत्मा की समस्त शक्ति और संभावना उसीके भीतर है -वे किसी बाह्य स्रोत से नहीं आती। वे आत्मा में ही अव्यक्त रूप में (स्वध्या तदेकं), और जीवन का सारा कार्य उनके उस अव्यक्त शक्ति-समूह (विवेक-पोटेंशियलिटी) को व्यक्त करना मात्र है। 
४. थ्योरी ऑफ़ रिइंकार्नेशन : पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार इस देह के नष्ट होने पर जीव फिर एक देह धारण करेगा, और उस देह के नाश होने पर फिर एक दूसरी देह, तथा इसी प्रकार आगे भी क्रम चलता रहेगा। इस जगत में घोर दुःख भी है, और कुछ सुख भी है। अतएव जीव की मोह-निद्रा यहाँ कभी न कभी टूटती अवश्य है। चाहे मोह-मुद्गर पढ़ने से हो, किन्तु जीव की इच्छा मुक्ति पाने की होती ही है। 
५. बैकुण्ठ : रामकृष्ण लोक : कुछ द्वैतवादी उच्चतम स्वर्ग को ही चरम लक्ष्य मानते हैं -उनके मतानुसार जीवात्माएं वहाँ जाकर चिरकाल तक भगवान के साथ रहतीं हैं। वे वहाँ दिव्य देह प्राप्त करती हैं, उन्हें रोग, शोक, मृत्यु अथवा अन्य कोई अशुभ नहीं सताता। उनकी सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं। समय समय पर उनमें से कोई कोई पृथ्वी पर आकर, देह धारण कर मनुष्य को ईश्वर के मार्ग का उपदेश देतीं है। जगत सभी मार्ग-दर्शक नेता, महान उपदेशक ऐसे व्यक्ति ही हैं। वे पहले ही मुक्त होकर भगवान के साथ उच्चतम लोक में वास करते हैं, किन्तु दुःखार्त मनुष्यों के प्रति उनकी इतनी प्रीति और अनुकम्पा होती है कि वे यहाँ आकर पुनः देह धारण कर लोगों को स्वर्ग-पथ के संबंध में उपदेश देते हैं। 
किन्तु अद्वैतवाद के अनुसार मनुष्य का चरम लक्ष्य है -'विदेह मुक्ति'! आदर्श कभी ससीम नहीं हो सकता। अनन्त से घटकर कुछ भी हमारा चरम लक्ष्य नहीं हो सकता, किन्तु देह तो कभी अनंत होती नहीं। क्योंकि शरीर और विचार ससीम से ही उतपन्न होते हैं। अद्वैतवादी कहता है, हमें देह और विचार के परे जाना होगा। मुक्ति कोई प्राप्त करने की वस्तु नहीं है, हम तो सदा से मुक्त हैं, केवल हम उसे भूल जाते हैं और अस्वीकार करते हैं। पूर्णता कोई प्राप्त करने की चीज नहीं है, वह तो सदैव ही हमारे भीतर वर्तमान है। यह अमरत्व, यह आनंद हमें अर्जित नहीं करना है; वह तो सदा से ही हमें प्राप्त है। 
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदतीह सत्येयं या मति: स गतिर्भवेत।।
 यदि तुम साहस के साथ कह सको कि ' मैं मुक्त हूँ ', तो  इसी क्षण तुम मुक्त हो। यदि तुम कहो कि 'मैं बद्ध हूँ', तो तुम बद्ध ही रहोगे। जैसा सोचो, जैसी मति वैसी गति हो जाती है। जो हो, द्वैतवादियों के विभिन्न मत तुम्हारे सामने हैं, सिंह-शावक होकर भी चाहे तुम स्वयं को भेंड़ मानो या सिंह मानो यह तुम पर ही निर्भर करता है।
 यदि तुम अपने इस 'क्षुद्र व्यक्तित्व ' को, इस ससीम देहाध्यास को रखना इतना अच्छा लगता है, तो तुम जितने दिन इच्छा हो, उसे रख सकते हो। क्योंकि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो। जैसा चाहोगे वैसा ही पाओगे।
किन्तु ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं- जिन्हें सत्य दर्शन हुआ है, वे देह-मन की सीमाओं में सन्तुष्ट नहीं रह सकते-वे इनके परे जाना चाहते हैं। जगत और उसका सम्पूर्ण भोग उन्हें मिट्टी के कीचड़ से अधिक नहीं लगता। जो अपने इस क्षुद्र व्यक्तित्व को एकदम भुला देते हैं, वैसे ही लोग मानव-जाति के सच्चे हितैषी हैं, और जो स्त्री-पुरुष छोटे छोटे भोग-सुखों में आसक्त रहना और उनकी निरंतरता तथा पुनरावृति चाहते हैं, वे घोर स्वार्थी हैं।  
आइ वुड लाइक टु सी मोरल मैन लाइक  गौतम बुद्धा !  मैं गौतम बुद्ध के समान नैतिक मनुष्य देखना चाहता हूँ। वे निरंतर इसी चिंता में मग्न रहते थे कि दूसरों का उपकार किस प्रकार हो? उन्होंने 'बहुजनहिताय बहुजन सुखाय'-जन्म ग्रहण किया था (समाधी के बाद दुबारा शरीर में लौटे थे, या माँ उन्हें जबरदस्ती शरीर में लौटा दिया था? ) वे अपनी निजी मुक्ति के लिये वन में तप करने नहीं गये। " ही फेल्ट दैट दी वर्ल्ड वाज बर्निंग इन मिज़री " --उन्होंने अनुभव किया कि दुनिया दुःख से जली जा रही है; तथा इसे बचाने का कोई उपाय मुझे अवश्य खोज निकालना चाहिये। 
मनुष्य जितना स्वार्थी होता है, उतना ही अनैतिक भी होता है। जो कौम या जाति जितना अधिक अपने स्वयं के मिथ्या व्यक्तित्व से चिपके रहना चाहती है, वही जाति संसार में सबसे क्रूर और पातकी सिद्ध हुई है। अरब के पैगम्बर द्वारा प्रवर्तित धर्म से बढ़कर द्वैतवाद से चिपके रहने वाला दूसरा कोई धर्म संसार में आज तक पैदा नहीं हुआ। और इतना रक्त बहाने वाला तथा दूसरों के प्रति इतना निर्मम धर्म भी कोई दूसरा नहीं हुआ। क़ुरान का यह आदेश है कि जो मनुष्य इन शिक्षाओं को न माने, उसको मार डालना चाहिये; उसकी हत्या कर देना ही उस पर दया करना है। और सुन्दर हूरों तथा सभी प्रकार के भोगों से युक्त स्वर्ग को प्राप्त करने का सबसे विश्वस्त रास्ता है, काफ़िरों की हत्या करना। ऐसे कुविश्वासों के फलस्वरूप जितना रक्तपात हुआ है, और आज भी हो रहा है, उसकी कल्पना कर लो। 
ईसा मसीह ने जिस धर्म का प्रचार किया, उसमें ऐसी भद्दी बातें नहीं थीं। विशुद्ध ईसाई धर्म और वेदान्त में बहुत कम अंतर है। उन्होंने अद्वैतवाद के उच्चतम आदर्श की धारणा कराने के लिये सोपान के रूप में द्वैतवाद के आदर्श की शिक्षा भी दी है। जिस पैग़म्बर ने " माइ फादर इन हेवन"-  'मेरे स्वर्गस्थ पिता ' कहकर प्रार्थना करने का उपदेश दिया था, उन्होंने यह भी कहा था - "आइ ऐंड माइ फादर आर वन !" वे यह भी जानते थे कि इस स्वर्गस्थ पिता की द्वैत भाव से उपासना करते करते एक न एक दिन "आइ ऐंड माइ फादर आर वन !" वाली अभेद बुद्धि आ ही जाती है। यह जो ' क्षुद्र मैं ' के लिये धर्मों के बीच मारकाट, 'मैं ' के प्रति घोर आसक्ति, और केवल इसी जीवन में नहीं बल्कि मृत्यु के बाद बाद भी इस 'क्षुद्र मैं ' तथा इस मिथ्या व्यक्तित्व को ही लेकर रहने की इच्छा, यह सब देहाध्यास से या ससीमता से बंधे रहना ही तो है। उन्हें यह डर लगता है कि तुच्छ अहं का उन्मूलन हो जाने से वे कहीं मर तो नहीं जायेंगे ? सच्चाई तो यह है कि तुच्छ अहं का उन्मूलन ही वास्तविक आत्मा का विकास है। 
सृष्टि के भीतर ये दो शक्तियाँ सेल्फिश्नेस अर्थात स्वार्थपरायणता (खुदगर्जी) और अन्सेल्फिश्नेस या निःस्वार्थपरता (उदारता) सदा पास पास ही काम कर रही हैं-एक है ग्रहण (एक्वीजीशन) और दूसरी त्याग 
(रीनन्सिएशन) । क्षुद्रतम प्राणी से लेकर उच्चतम प्राणी तक समस्त ब्रह्माण्ड इन्हीं दोनों शक्तियों का लीलाक्षेत्र है ! इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं --यह स्वतः प्रमाण है। क्या, कोई मनुष्य यह अस्वीकार कर सकता है कि - " लव इज  दी  ओनली  पॉजिटिव  पावर  इन  दी यूनिवर्स ? " यह प्रेम, अहंशून्यता ' नॉट आइ ' अथवा त्याग -(रीनन्सिएशन) ही जगत की एकमात्र सकारात्मक शक्ति या ' पॉजिटिव पावर ' है। एक व्यक्ति जो दूसरे की हत्या करता है, वह भी प्रायः अपने पुत्रादि के प्रति स्नेह की प्रेरणा से ही, उसके लालन-पालन की प्रेरणा से ही उसके प्रेम का सागर संसार के अन्य करोड़ों व्यक्तियों से हट कर केवल अपने परिवार में ही सीमित हो जाता है, किन्तु ससीम हो या असीम, वह मूलतः  प्रेम, निःस्वार्थपरता तथा संन्यास या रीनन्सिएशन ही है ! इसलिये वेदान्त अद्वैत पर जोर देता है। अगर हम इस बात को स्वीकार कर लें कि वही एक अपूर्व सुन्दर प्रेम - सीमित होकर अशुभ रूप में प्रतीत होता है; तो एक ही प्रेमशक्ति के द्वारा सम्पूर्ण जगत की व्याख्या हो जाती है। नहीं तो हमें जगत के दो कारण मानने पड़ेंगे - एक शुभ दूसरा अशुभ-एक प्रेम दूसरा घृणा। कौन सा अधिक तर्कसंगत है? निश्चित रूप से एक प्रेम की शक्ति क सिद्धांत। 
मनुष्य का ज्ञान मनुष्य के मंगल का विरोधी नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान ही हमारी रक्षा करता है। ज्ञान ही उपासना है - 'नॉलेज इज वरशिप'! हम जितना अधिक जान सकें, उसी में हमारा मंगल है। वेदान्ती कहते हैं, इस समस्त प्रतीयमान अशुभ का कारण है, ' लिमिटेशन ऑफ़ दी अनलिमिटेड' अर्थात असीम का सीमाबद्ध हो जाना। वह प्रेम जो सीमाबद्ध होकर 'लिटिल चैनल्स' छोटे प्रणालों से प्रवाहित होने लगता है (पॉज़ेसिवत लव) तो अशुभ प्रतीत होता है, और ह्रदय का विस्तार होते होते फिर वही प्रेम जब अपनी चरम अवस्था में सम्पूर्ण विश्व की ओर प्रवाहित होने लगता है, अपने को ईश्वर रूप से प्रकट करता है। 
 मेरा हृदय क्यों संकुचित हो गया था ? पहले मैं केवल अपने को, फिर अपने परिवार या ससुराल के लोगों को ही क्यों प्रेम करता था ? वेदान्त कहता है इसके लिये किसी अलौकिक  शक्ति या सुपरनैचुरल बीइंग को दोष मत दो, न निराश होओ न मायूस होओ। न यह सोचो कि तुम ऐसे भँवर में फँस चुके हो, कि जब तक कोई दूसरा आकर तुम्हारी सहायता नहीं करता तुम इससे निकल नहीं सकते। वेदान्त कहता है-कोई दूसरा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता, हमें अपने ह्रदय को विस्तृत करने का प्रयास स्वयं करना होगा। हमलोग सिल्क-वर्म की तरह हैं। अपने ही शरीर-मन से जाल बुनकर हमने ककून (५ कोष) बना लिये हैं और उसी में आबद्ध हो गये है। किन्तु यह बद्ध भाव चिर काल के लिये नहीं है। हमलोग उससे तितली के सामान बाहर निकलकर मुक्त हो जायेंगे। हमलोग अपने चारों ओर इस कर्मजाल - 'नेट्वर्क ऑफ़ कर्मा ' को लगा लेते हैं और अज्ञानवश सोचने लगते हैं कि हम बद्ध हैं। इस जाल को तोड़ने में सहायता अपने हृदय से ही मिलती है। इस जाल को काटने की शक्ति हमारे ह्रदय में ही है। 
मैंने अपने जीवन में बहुत सी भूलें की हैं, किन्तु इनको किये बिना मैं आज जो हूँ - वह कभी नहीं होता। और अब मैं अपने जीवन से अत्यंत संतुष्ट हूँ ! यदि कुछ भूल-चूक हो गयी हो, तो एकदम हताश होकर बैठ मत जाओ,यह जान लो कि अन्त में सबका फल शुभ ही होता है। क्योंकि शिवत्व और पवित्रता (गुडनेस ऐंड प्यूरिटी) तो हमारा स्वरुप ही है, और हमारे स्वरुप का किसी प्रकार नाश नहीं हो सकता ! हमारा एसेंशियल नेचर-स्वाभाविक प्रकृति या यथार्थ स्वरुप सदा एक रूप रहता है। हमने भूलें इसी लिये की हैं क्योंकि हम दुर्बल थे, मनःसंयम का अभ्यास करके हमने अपने शरीर-मन को बलवान नहीं बनाया था। और हम दुर्बल केवल अज्ञानी होने के कारण हैं, अपने को ससीम या जड़ शरीर मानने के कारण हैं। 
हमें किसने अज्ञानी बनाया ? स्वयं हमने ! तुम क्षुद्र जीवाणु (अमीबा) से इतने बड़े मनुष्य हो गये। किसने तुम्हें मनुष्य बनाया ? तुम्हारी अपनी इच्छा-शक्ति ने ही। अपनी इच्छा-शक्ति का प्रयोग करते रहो, और भी उन्नत होकर ब्रह्म हो जाओगे ! तुम कहोगे -'यदि इच्छा सर्वशक्तिमान है, तो मैं हर बात क्यों नहीं कर पाता ? उत्तर यह है कि जब तुम ऐसा कहते हो, उस समय अपने को केवल शरीर या क्षुद्र 'मैं' समझकर शिकायत करते फिरते हो । जिस इच्छा-शक्ति ने तुम्हें इतना उन्नत बना दिया, वह तुम्हें और भी उन्नत कर सकती है। तुमको आवश्यकता है चरित्र की और इच्छा-शक्ति को सबल बनाने की। हममें क्या दोष हैं, यह किसी को बताना नहीं पड़ता हम स्वयं जानते हैं। 
ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करो, एक क्षण में सब अशुभ चला जायेगा। अपने चरित्र का निर्माण करो और अपने नित्य शुद्ध 'मैं ' की अनुभूति करो, फिर उसे अपने हर आचरण में प्रकट करो, प्रत्येक व्यक्ति में उसी आत्मश्रद्धा को जाग्रत करो। यदि तुमने अपने सत्य-स्वरुप का साक्षात्कार कर ही लिया है- और अद्वैतवादी बन चुके हो; तो इसी क्षण से उस बूढ़े आदमी को (पुराने मिथ्या व्यक्तित्व को) मर जाने दो! दी ओल्ड मिस्टर सिंह ऑर मिसेज़ सिंह एंड मिस सो-एंड-सो आर गॉन, पहले जो स्वयं को स्त्री-पुरुष मानने का भाव था वह तो चला गया ! वे तो केवल अन्धविश्वास (भ्रम) मात्र थे। 
यहाँ शेष है नित्य ओजस्वरूप, नित्य शुद्ध, सर्वज्ञस्वरूप ब्रह्म ! तब हमारा सारा भय चला जाता है। सत्य किसी व्यक्ति-विशेष की सम्पत्ति नहीं है, सत्य ही सब आत्माओं का यथार्थ स्वरूप है। हम यदि किसी हत्यारे या बलात्कारी को भी देखें-तो उसकी बाह्य दुर्बलताओं को न देखें; बल्कि उसके ह्रदय में रहने वाले भगवान को देखें, और उसकी निन्दा न कर यह कह सकेँ- "  उठो, जागो ! और अपने आत्मस्वरूप को प्रकाशित करो ! तुम जो अपने को पापी समझ रहे हो - डू नॉट बेफ़िट दी ! तुमको शोभा नहीं देते! " निज स्वरुप का निरंतर स्मरण -यही सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। कौन इस सर्वव्यापी 'मैं' का अनिष्ट कर सकता है ? हम देखते हैं कि वे भी आत्मस्वरूप हैं, किन्तु वे यह नहीं जानते। अतएव नेता को उन्हें यह सिखाना होगा, उनके इस अनन्त स्वरुप के प्रकाशनार्थ हमें उनकी सहायता करनी पड़ेगी।
किन्तु हमें उसे व्यवहारिक और सरल भाषा में समझाना होगा -' फॉर दी हाईएस्ट ट्रूथस आर ऑलवेज वेरी सिंपल '- उच्चतम सत्य (महावाक्य) अत्यन्त सहज और सरल होते हैं। जिसे कोई बच्चा भी समझ सके आओ, हम सब आज से धर्म को उतना ही सहज और सरल बनाकर उस सत्ययुग के पुनरागमन में सहायता करें; जब प्रत्येक व्यक्ति उपासक होगा और उसका अन्तस्थ सत्य ही उसकी उपासना का विषय होगा ! ८/ ४८-६३

' दी हाईएस्ट ट्रूथस आर ऑलवेज वेरी सिंपल', स्वामीजी रीअलाइज़्ड ऐंड डिस्कवर्ड दिस- 'हाईएस्ट ट्रुथ' !! ऐंड एक्सप्रेस्ड इट इन वेरी सिंपल लैंग्वेज- ' ईच सोल इज पोटेन्शियली डिवाइन ऐंड आवर गोल शुड बी टू मैनिफ़ेस्ट दैट डिविनिटी !'- अर्थात ' परम सत्य (निर्वाण) सदैव बिल्कुल सरल है !', स्वामी विवेकानन्द ने इस 'सत्य' को आविष्कृत और प्रत्यक्ष किया, तथा इसे अत्यन्त सरल भाषा में अभिव्यक्त करते हुए कहा - " प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, और हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिये उस -' अन्तर्निहित ब्रह्मत्व' को प्रकट करना !" सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम अपने इस 'पोटेन्शियल डिविनिटी ' अन्तर्निहित ब्रह्मत्व के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण, स्वयं को संकीर्ण आत्म-केन्द्रित जीवन में सीमित कर लेते हैं; और यही जगत के समस्त दुःखों का मूल कारण है।
 इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने, सबसे महत्वपूर्ण कार्य- " मनुष्य-जाति को उसकी अंतर्निहित दिव्यता का उपदेश देना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे प्रकट करने का उपाय बताना" - को अपने कन्धों पर उठा लिया था। 'दिस इज मैन मेकिंग'; ठाकुर कहते थे -'मानहूश तो मानुष'  जिसको अपने अंतर्निहित ब्रह्मत्व का पता होता है -उसी को मनुष्य कहते हैं। मनुष्य-जाति को उसके अन्तर्निहित दिव्यता का उपदेश सुनाना ही - 'मनुष्य- निर्माण' करना है। " ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बनने और बनाने वाली शिक्षा " का प्रचार-प्रसार करना ही स्वामी जी-अपने जीवन का ध्येय मानते थे।
स्वामी जी के नश्वर संसार को छोड़ कर जाने के ६५ वर्षों बाद, १९६७ ई० में महामण्डल की स्थापना हुई थी। और तब से लेकर आज तक महामंडल युवाओं के बीच, इसी मनुष्य-निर्माणकारी आदर्श को रूपायित करने का काम करता चला आ रहा है। मात्र छह केन्द्रों के साथ शुरुआत करने के बाद, अभी महामण्डल के केन्द्रों की संख्या ३०० से भी अधिक हो गयी है।  
पश्चिम में लोगों की समृद्धि की तुलना में भारत के लोगों की गरीबी के कारण की समीक्षा करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने देखा था कि, दोनों की असमानता शिक्षा के ऊपर ही निर्भर करती है। उन्होंने दृढ़ता पूर्वक घोषणा किया -" उन्हें ऐसी शिक्षा दो जिससे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें, और अपने जीवन के भौतिक सुख-सुविधाओं के लिये उन्हें दूसरों के ऊपर निर्भर न रहना पड़े।" उन्होंने कहा कि ' बीइंग एजुकेटेड मीन्स बिल्डिंग करैक्टर, ग्रोइंग इन सेल्फ-कॉन्फिडेंस ऐंड कैपेसिटी टू सैक्रिफाइस दी ट्राइफल्स ऑफ़ लाइफ' -अर्थात  शिक्षित होने का अर्थ - ' चरित्र-निर्माण, आत्मविश्वास में वृद्धि तथा जीवन की क्षुद्रताओं को त्यागने की क्षमता में विकास होना है। ' विपदाग्रस्त लाखों- करोड़ों देशवासियों को कष्ट में पड़े देखने से भी व्यक्तिगत सुख-भोग के लिये अधिक से अधिक पाने की लालसा, स्वार्थपरायणता हमारे जीवन को तुच्छ बना देती है - आदर्श शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में इस बोध को विकसित करना होना चाहिये । किन्तु दुर्भाग्यवश हमारी वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में ये सब बातें अनुपस्थित हैं। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, " वर्तमान शिक्षा नीति बिल्कुल गलत है।"
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की कमी को पूर्ण करने के लिये महामण्डल युवाओं को -' आइडियल एजुकेशन विथ दी कन्वेंशनल एजुकेशन ' - अर्थात पारम्परिक शिक्षा के साथ आदर्श शिक्षा देने की चेष्टा करता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर महामण्डल के कई केन्द्र नर्सरी स्कूल से लेकर माध्यमिक विद्यालयों का संचालन करते हैं। महामण्डल के ३० इकाइयों में निःशुल्क कोचिंग देने की व्यवस्था है, जहाँ स्कूल एवं कॉलेज के विद्यार्थियों को कोचिंग दिया जाता है। 

महामण्डल की शिक्षा

तैत्तिरीयोपनिषत् ।।

ॐ  श्री गुरुभ्यो नमः । हरिः ॐ  । ॐ  शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेवप्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ  शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥१॥
इति प्रथमो ऽनुवाकः ॥
 महामण्डल बैज (प्रतीकधारण):  ज्ञान-यज्ञ रूपी ' चरित्र-निर्माणकारी युवा प्रशिक्षण शिविर ' में जीवन गठन तथा मनुष्य बनने और बनाने के लिये जिन गरिमामय चरित्र के गुणों को अपनाने और अभ्यास में लाने का शुभारम्भ किया जा रहा है, उनकी स्मृति में कोई प्रतीक धारण कराया जाना उचित और आवश्यक है। प्रतीक चिह्नों का निर्धारण इस दृष्टि से किया जाना चाहिए कि उसे सभी प्रशिक्षणार्थी शान के साथ धारण करें और अपने विकास के प्रति सतत जागरूक एवं सचेष्ट रह सकें। वेदान्ती मनुष्य के जीवन का चरम लक्ष्य एवं उससे सम्बन्धित सङ्कल्पों को बराबर ध्यान में बनाए रखने के लिए, तथा उनसे जुड़े होने का गौरव अनुभव करते रहने के लिए महामण्डल में कुछ प्रतीकों एवं आदर्शवाक्य का निर्धारण किया गया है। 
[ महामण्डल के आविर्भूत हो जाने बाद, सोंच-विचार कर के सर्वप्रथम इसका एक " प्रतीक-चिन्ह " (Emblem) निर्धारित किया गया. उसमे जो गोलाई है, वह पृथ्वी है, पृथ्वी के भीतर, कन्याकुमारी के ऊपर से शुरू होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है, भारतवर्ष के भीतर दण्डधारी परिव्राजक स्वामी विवेकानन्द खड़े हैं. उस गोलाई के दोनों ओर दो वाक्य लिखे हुए है-  " Be and Make " स्वामीजी के द्वारा कही गयी यह वाणी एक मन्त्र के सदृश्य है,  " बनो और बनाओ " (Be and Make ) - का यह आह्वान  उपनिषदों में कहे गये " महावाक्यों " के जैसा अत्यन्त सारगर्भित है.(दादा कहते हैं- इस मन्त्र में इतनी शक्ति है जो भी इस काम से निष्ठा पूर्वक जुड़ा रहेगा उसे  मोक्ष तक प्राप्त हो जायेगा, अन्य कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी ) इसका अर्थ है :-" स्वयं मनुष्य बनो दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो!"]
महामण्डल- ध्वज : सिस्टर निवेदिता ने स्वतंत्र भारत के ध्वज-रूप में डिज़ाइन किया था, महामण्डल ने उसी ध्वज को अपनाया है। महामण्डल- स्कार्फ में भी ध्वज में बने वज्र-निशान को अंकित किया गया है। महामण्डल के सभी कर्मी स्वामीजी के सैनिक होते हैं, इसलिये शिविर में सभी प्रशिक्षणार्थियों को ऑर्डिनरी कैम्पर्स तथा लीडर ट्रेनीज को अलग अलग बैज दिया जाता है। जो शिविर में प्रवेश करने वाले हर प्रशिक्षणर्थी को धारण करना अनिवार्य होगा । तथा उन्हीं में से पूर्व-प्रशिक्षित कर्मियों के  वरिष्ट गुणों को ध्यान में रखकर प्रशासनिक अधिकारियों या ' शिविर संचालक ऑफिसर्स ' को श्वेत-शुभ्र ड्रेस एवं सैनिकों के जैसे बैज कमाण्डर इन चीफ़ के द्वारा प्रदान किये जाते हैं। शिविर आरम्भ होने के पहले प्रत्येक शिविर संचालक को इन बैजों का महत्व तथा उनसे जुड़ी जिम्मेदारियों को भी समझाया जायगा। 
प्रत्येक युवा पाठचक्र तथा महामण्डल को अपने महत्त्वपूर्ण पत्रकों (लेटरपैड,रशीद आदि) पर महामण्डल द्वारा निर्धारित प्रतीक चिह्न (मोनोग्राम), उन्हीं मोनोग्राम्स के बैज सीलों (मुहर) आदि पर भी अंकित किया जाना चाहिये। भारत के मानचित्र के निचले हिस्से पर परिव्राजक स्वामी विवेकानन्द की ध्यान-मूर्ति के साथ ' चरैवेति चरैवेति ' एवं ' बी ऐंड मेक ' आदि जैसे प्रेरक महावाक्य अंकित बैज को शिविर अवधि में धारण करना प्रत्येक प्रशिक्षार्थी के लिये अनिवार्य होगा। है। ताकि हम अपने जीवन लक्ष्य ' बी गुड, डू गुड ' की दिशा में अग्रसर होते रहें।
[इस प्रतीक चिन्ह के ऊपर की ओर लिखा है-" चरैवेति चरैवेति !" अर्थात "चलते रहो - चलते रहो !" 
महामण्डल का यह ध्येय वाक्य वैदिक साहित्य (ऐतरेय ब्राह्मण ७.१५) के सुप्रसिद्ध संचरण गीत "चरैवेति-चरैवेति।" से लिया गया है; इस वैदिक गीत में जीवन एवं समाज के विकास के केन्द्र में मनुष्य के श्रम या पुरुषार्थ के महत्व को उजागर किया गया है।
 यहाँ इस मंत्र के द्रष्टा : (ऋषि कवि महीदास ऐतरेय ) कहते हैं - जो मनुष्य (मोहनिद्रा में ) सोया रहता है और पुरुषार्थ नहीं करता उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है,  जो पुरुषार्थ करने के लिये खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है. जो आगे चलना शुरू कर देता है , उसका भाग्य भी आगे आगे चलने लगता है, इसीलिये- " हे मनुष्यों- चरैवेति चरैवेति ! "चलते रहो - चलते रहो!" (साभार Pt. Chhavinath Mishra / प. छविनाथ मिश्र ने इस रचना का सुन्दर हिन्दी अनुवाद किया है - ) 
संचरण गीत "चरैवेति-चरैवेति।"
  "चलते रहो - चलते रहो"
१-ॐ नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, इति रोहित शुश्रुम ।
पापो नृषद्वरो जन, इन्द्र इच्चरतः सखा । चरैवेति चरैवेति॥
सुनो रोहित --
सुना हमने
अथक श्रम ही श्रीमुखी

कर्मरत यदि हों नहीं तो श्रेष्ठ जन भी सब दुखी
नित्य जो गतिशील है बस इन्द्रता तो है उसीकी
इसलिए चलते रहो - चलते रहो …

२- पुष्पिण्यौ चरतो जंघे, भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।
शेरेऽस्य सवेर् पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः । चरैवेति चरैवेति॥
फूल उनकी पिण्डलियाँ हैं जो हमेशा चला करते
वर्धमाना चेतना की टहनियों पर फला करते
सुप्त रहते हैं सभी अपकर्म भी उसके सखे हे !
किन्तु श्रम से पंथ पर ही नष्ट होते नित दिखे वे
इसलिए चलते रहो - चलते रहो …

३- आस्ते भग आसीनस्य, ऊध्वर्स्तिष्ठति तिष्ठतः ।
शेते निपद्यमानस्य, चराति चरतो भगः । चरैवेति चरैवेति॥
बैठने वाले पथिक का भाग्य बैठा अड़ा होता
और उठने की क्रिया में वही ऊँचे खड़ा होता
जो यहाँ सोया रहा वह हाथ मलता ही रहा है
भाग्य उसका ही चला है जो सदा चलता रहा है
इसलिए चलते रहो - चलते रहो …

४- कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् । 
चरैवेति चरैवेति॥
 सदा ही सोता हुआ - सा
यहाँ कलियुग हुआ करता
नींद टूटी, जागरण ही, यहाँ द्वापर हुआ करता
और उठता हुआ मानुष
खड़ा त्रेता -सा स्वयम्भर
यहाँ चलता हुआ पथ पर सत्ययुग होता निरन्तर
इसलिए चलते रहो - चलते रहो …

५- चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।
सूयर्स्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन् । चरैवेति चरैवेति॥
 
 कर्मरत गतिशील जो
मधुपान करता है सुनिश्चित
कर्मशीला अस्मिता को ही सदा मिलता फलामृत
देख लो तुम सूर्य की श्रमशीलता यह सृजनधर्मी
जो न पल भर श्रम-विमुख है
श्रम-मुखी शाश्वत सुकर्मी
इसलिए चलते रहो - चलते रहो …
सोये रहने का तात्पर्य है, जो मनुष्य सोया हुआ है वह अभी ' कलिकाल में वास 'कर रहा है, (स्वामीजी की ललकार - उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्नी बोधत ! सुनने से ) जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, वह द्वापर युग में वास कर रहा है. 
" उत्तिष्ठ्म स्त्र्रेता भवति |"
- जो उठ कर के खड़ा हो जाता है- जो पुरुषार्थ करने के लिये कमर कस कर उठ खड़ा होता है, वह त्रेता युग में वास कर रहा है, 
" कृतं संपद्यते चरन् । "
और अपनी मंजिल की ओर जिसने चलना शुरू कर दिया है, वह मानो सत्य युग में वास कर रहा होता है. इसीलिये स्वामीजी युवाओं से आह्वान करते हैं - 'चरैवेति चरैवेति ' - आगे बढो, आगे बढो ' इसके साथ ही साथ उन्हें परम-पुरषार्थ करने के लिये पुकार रहे हैं  " Be and Make !  "  उनके दोनों महावाक्यों को महामण्डल के प्रतीक-चिन्ह में उकेरा गया है ! परिव्राजक का काम है चलते रहना । " नदिया चले चले रे धारा चन्दा चले चले रे तारा तुझको चलना होगा तुझको चलना होगा |]
संघगीत तथा स्वस्तिवाचन : संघगीत की प्रेरणा- स्वस्ति का भाव है हितकारी-कल्याणकारी, वाचन का भाव है कथन-घोषणा। हम किसी श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए सद्भाव एवं उत्साहपूर्वक सङ्कल्पित हो रहे हैं, इस तथ्य की घोषणा मन्त्रों द्वारा स्थूल एवं सूक्ष्म जगत् में की जाती है। स्थूल जगत् में घोषणा होने से सत्पुरुषों का सहयोग उस पुण्य कार्य हेतु सुलभ होने लगता है।
 सूक्ष्म जगत् में सञ्चार होने से अन्तरिक्ष में संव्याप्त ईश्वर की श्रेष्ठ शक्तियाँ और अपने अन्तःकरण में स्थित श्रेष्ठ प्रवृत्तियाँ जाग्रत् और सक्रिय हो उठती हैं। हम भी विश्व समाज को श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रदान करने के उद्देश्य से ‘ज्ञानदीक्षा’ में प्रवृत्त हो रहे हैं। इसलिए स्वस्तिवाचन द्वारा स्थूल-सूक्ष्म जगत् में अपने भाव सञ्चारित कर रहे हैं।
[ Why do we rush through our lives, as if we were in a hurry to get somewhere? Take me anywhere, just not to here! Why so? Sure, I am the first to admit that goals are important in life, but if we don’t take time to look around and enjoy the journey our goals will loose their effect; they are to make us happy now. Today. That is why I like this simple Chinese proverb:


“The Journey is the Reward”
If we enjoy our journey our lives gain meaning. It’s as simple as that. Let’s not think that the only important thing is that celestial glory which awaits us some time faaaaar in the future. Seeing how wonderful this life is, here and now, lets us experience the sparking of that celestial flame in a hearts already today.!Enjoy your day! -by Louis Herrey)}

...." जो हमलोगों का संघ-मन्त्र है, वह ऋग्वेद में भी है और अथर्ववेद में भी है -
 

संगच्ध्वं संग्वदध्वं संग वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ।।
समानो मन्त्रः समितिः समानी ।
समानं मनः सः चित्त्मेषाम ।।
समानं मन्त्रः अभिम्न्त्रये वः ।
समानेन वो हविषा जुहोमि ।।
समानी व् आकुतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ।।
(ऋग्वेद :१०/१९१/२-४ )
हिन्दी भाव -एक साथ चलेंगे ,एक बात कहेंगे । हम सबके मन को एक भाव से भरेंगे ।देव गण जैसे बाँट हवि लेते हैं ,हम सब सब कुछ बाँट कर ही लेंगे ।। हम अपने सारे निर्णय एक मन हो कर ही करेंगे ,क्योंकि देवता लोग एक मन रहने के कारण ही असुरों पर विजय प्राप्त कर सके थे । अर्थात एक मन बन जाना ही समाज-गठन का रहस्य है ......कैसा अनोखा मन्त्र है.' संजयान ' हो उठना का तात्पर्य है जाग उठना ! इस मन्त्र को स्वामीजी ने भी उद्धृत किया था. विवेकानन्द साहित्य में जहाँ इस मन्त्र का उल्लेख स्वामीजी ने किया है, वहाँ कहा गया है की यह मन्त्र अथर्ववेद से लिया गया है; किन्तु यही मन्त्र ऋग्वेद में भी है.]
 क्रिया और भावना- महामण्डल फ्लैग होस्टिंग के समय सभी प्रशिक्षणार्थी भाई निर्धारित बैज को धारण कर मैदान में सावधान मुद्रा में खड़े होंगे। उन्हें परेड करवाकर चुस्त बना देना होगा। वहाँ से ऑडोटोरियम में जाना है, वहाँ ठाकुर माँ स्वामीजी के कटआउट पर मुख्य अतिथि पहले पुष्प अर्पित करेंगे। शिविर के फॉर्म में लिखे शिविर को उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिये चरित्रवान 'मनुष्य बनने और बनाने'  का सङ्कल्प -' निवेदिता वज्र हो अक्षय ' नारों के द्वारा धारण कराये जायेंगे। संघ-मन्त्र और स्वदेश मन्त्र पाठ के साथ मन ही मन यह प्रार्थना करें कि हे परमात्मा! हमें शक्ति दें; ताकि हम प्रतीकों से जुड़ें सङ्कल्पों का भली प्रकार पालन कर सकें।
[ये सारे कार्यक्रम भारत के १० राज्यों में २८० केन्द्रों के माध्यम से चल रहा है. क्या यही कम बड़ी उपलब्धी है! यही तो है स्वामीजी का कार्य. इसके साथ साथ महामण्डल के लिये एक पताका की भी आवश्यकता महसूस हुई. पताका के बारे में विचार करते करते मन में विचार आया कि (भगिनी) निवेदिता ने तो स्वाधीन भारत के लिये एक पताका का निर्माण किया था. उसके पीछे भी स्वामीजी कि एक उक्ति का स्मरण हो उठता है. इसीलिये  महामण्डल का जय-घोष बना : " निवेदिता वज्र हो अक्षय ! उनकी उसी उक्ति से प्रेरणा प्राप्त करके निवेदिता ने उस पताका की रुपरेखा तैयार की थी य़ा नहीं, यह मुझे नहीं पता है. 
Do u Know?........
The first serious attempt at flag making came from Sister Nivedita (Margaret Nobel, 1867-1911) an Irish disciple of Swamy Vivekananda.  She conceived the idea of the flag, while on a  visit to Bodh Gaya in 1904, in the company of J.C. Bose and Rabindranath Tagore. She was inspired by the Vajra sign, symbol of Budha - the selfless man. 
It was the weapon of Lord Indra and is a symbol of strength (and also associated with the Goddess Durga).Legend goes that Vajra (Thunder bolt) was made from the bones of Rishi Dadhichi.  It is a symbol of supreme sacrifice.
http://3.bp.blogspot.com/_bHIDGwZ6i50/S8qOE9pXAhI/AAAAAAAAACQ/zDx_rGKMhkE/s1600/scan0012.jpg

Sister Nivedita’s flag, 
prepared by the students of her Girls' School at Calcutta  was displayed for public view at the Congress exhibition in December 1906. The flag was square in shape, it had the symbols of Vajra (Thunder bolt) in the centre. On both sides of the Vajra was written‘Vande’ and ‘Mataram’ and 108 Jyotis (flames) in the outer periphery.
Sister Nivedita (using R.S. as nom de plume) in an article titled ‘The Vajra as a National Flag’ published in the Modern Review in 1909, strongly suggested Vajra as a National flag for whole of India. The opening sentences of the article goes, I quote   "The question of the invention of a flag for India is beginning to be discussed in the press.Those who contemplate the desirability of such a symbol, seem to be unaware that already a great many people have taken up, and are using, the ancient Indian Vajra or Thunderbolt, in this way....",unquote.  Below are some of the draft sketches prepared by Sister Nivedita herself for illustrations of the said article.

Nivedita’s Vajra, has been adopted as the logo of the Bose Institute, Kolkata .Crest of North Bengal University has also the Vajra symbol in the centre .]

एक बार स्वामीजी से किसी ने प्रश्न किया था- स्वामीजी, आपने इतना कुछ किया है, किन्तु भारत की स्वाधीनता के लिये आपने क्या किया है ? स्वामीजी कहते हैं- " भारतवर्षेर स्वाधीनता आमी  तीन दिनेर मध्येई एने फेलते पारि| किन्तु भारते मानुष कोथाय रे ?से स्वाधीनता राखबे के ? " - " भारतवर्ष को मैं तिन दिनों के भीतर ही स्वाधीनता दिला सकता हूँ| किन्तु चरित्रवान मनुष्य भारत में कहाँ हैं रे ?  उस स्वाधीनता को अक्षुण कौन रखेगा ? "
 भारत  की वर्तमान अवस्था तो शायद पहले से भी ज्यादा बिगड़ चुकी है, यदि चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण नहीं किया गया, तो भारत के गांवों में रहने वाले गरीब लोगों को भूख-भय- भ्रष्टाचार से मुक्ति कैसे मिलेगी ? हो सकता है कि इस समय विदेशी आक्रमण का उतना खतरा नहीं हो, किन्तु उसका वास्तविक कारण " Balance of Power " ( शक्ति का सन्तुलन ) है. विश्व के बड़े बड़े देशो के बीच ऐसा कोई अलिखित करार है कि कोई भी बड़ा देश (जिसके पास वीटो पावर है ) वह अन्य किसी बड़े देश पर आक्रमण नहीं कर सकेगा. किन्तु देश की स्वाधीनता की रक्षा करने का क्या अर्थ है ? आज के भारतवर्ष में स्वाधीनता प्राप्त कर लेने के बाद क्या हुआ है ? स्वाधीनता प्राप्ति के ६४ वर्षों बाद भी भारत के " सैंकड़े ३४ व्यक्ति " गरीबी की सीमा-रेखा के नीचे वास करते हैं. स्वाधीनता किसे प्राप्त हुई है? स्वाधीनता प्राप्त हुई उनको जो अर्थवान हैं. उनका अर्थ और किस तरह बढ़ जाये इसके लिये दरवाजे खोल दिये गये हैं. आजकल ग्लोबलाइजेशन का, वैश्विकरण का, उदारीकरण का शोर है. किन्तु वैश्वीकरण की महत्ता का जन्म भी भारतवर्ष में ही हुआ था. ]  

महामण्डल का उद्देश्य - ' कृण्वन्तो विश्वं आर्यं !' ' सम्पूर्ण पृथ्वी को आर्य बनाओ ! ' आर्य बनाओ ' कहने का तात्पर्य क्या है ? इसीको स्वामीजी कहते हैं- पशु मानव को देव मानव में उन्नत करो ! ' कृण्वन्तो विश्वं आर्यं !' -- वैश्वीकरण के इस महत आदर्श का जन्म भारतवर्ष में ही हुआ था। भारतवर्ष के वेदों का जयघोष था- सम्पूर्ण पृथ्वी को आर्य बनाओ ! ' सुसंस्कृत बनाओ.अर्थात उनके जीवन और आचरण में शुभ संस्कारों को भरो. भारतवर्ष का यही संदेष था. सम्पूर्ण पृथ्वी के मनुष्यों को सुसंस्कृत बनाना होगा, उन्हें सभ्य बनाना होगा.'
सुसंस्कृत ' करो अर्थात - ' पृथ्वी के समस्त मनुष्यों के मन पर शुभ-संस्कारों की छाप डाल कर उन्हें एक सभ्य मनुष्य में परिणत करो ! 'सम्पूर्ण पृथ्वी पर शुभ-संस्कारों की छाप डालना भारत का ही उत्तरदायित्व था.किन्तु आज क्या हो रहा है ? आज अर्थनैतिक वैश्वीकरण (इकनोमिक ग्लोबलाइजेशन) हो रहा है. इसके माध्यम से हो क्या रहा है ? 'आर्य' बनने के बजाय धनी लोग और भी ज्यादा धनी बन रहे हैं.
स्वामीजी ने अमेरिका के पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजन में भाषण दिया था. हमलोग कहते नहीं अघाते कि, स्वामीजी ने भाषण का प्रारम्भ हठात - " सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका "  कह कर किया जिसे सुनकर, अमेरिका मतवाला हो उठा था. किन्तु उस स्थान पर भाषण देने के पहले भी स्वामीजी और भी कई भाषण दे चुके थे. उनमे से उनका एक भाषण अत्यन्त महत्वपूर्ण है.एकबार अमेरिका के
'सोशल साइंस एसोसिएशन ' में उनको भाषण देने के लिये कहा गया था. वहाँ पर इकोनॉमिक्स -के उपर चर्चा हो रही थी. उनको मोनेटरी इकोनॉमिक्स के विषय में भाषण देना था. किसी अर्थशास्त्री के लिये भी यह विषय अत्यन्त कठिन है. वहाँ पर स्वामीजी को इसी विषय पर बोलने के लिये कहा गया था, एवं स्वामीजी ने इस पर भाषण देते हुए कहा था-" दी यूज ऑफ़ सिल्वर इन इंडिया " - ' भारतवर्ष में चाँदी का व्यवहार |'
उस समय वहाँ पर ' गोल्ड स्टैण्डर्ड , सिल्वर स्टैण्डर्ड ' को लेकर चर्चा चल रही थी. यह भाषण उन्होंने १८९३ ई० में दिया था. और अमेरिका के पार्लियामेंट में वर्ष १८९१ - १८९५ तक के लिये निर्वाचित एक सदस्य भी उसी सभा में उपस्थित थे जिन्होंने एक भाषण भी दिया था. वे उत्तर अमेरिका के एक छोटे से राज्य के प्रतिनिधि थे. वे एक नामी ' वक्ता ' थे. जिस प्रकार इंगलैंड के प्रसिद्ध वक्ता थे ' वार्क 'महोदय - एक विश्वविख्यात वक्ता थे, जिनके विख्यात भाषणों को कलकाता यूनीवर्सिटी में भी बहुत दिनों तक पढाया जाता था. उन्ही  के स्तर के एक वक्ता वहाँ भी थे जिनका नाम था ' ब्रायन '. वे उसी वक्ता के द्वारा कथित उक्ति को अपने भाषण में कोट करते हुए कहते हैं- " ब्रायन वाज़ राइट व्हेन हे सेड , दैट  दिस गोल्ड स्टैण्डर्ड इज मेकिंग दी पुअर पुअरर. दी रिच रिचर. "  - अर्थात ब्रायन ने बिल्कुल खरी बात कही थी कि-  बैंकिंग प्रणाली में स्वर्ण को मानक बना कर किसी देश की मुद्रा का मूल्य निर्धारित करने का कूफल यह हो रहा है कि, इसके द्वारा दरिद्र दिन पर दिन और ज्यादा दरिद्र होते जा रहे हैं और, जो पहले से धनी देश हैं वे और भी ज्यादा धनी हो रहे हैं | " आज भी क्या हो रहा है ?
गरीब और भी गरीब बनते जा रहे हैं, बड़े आदमी और भी ज्यादा बड़े (धनी ) होते जा रहे हैं. यही तो है आज के ग्लोबलाइजेशन का फल! किन्तु हमारे देश एवं विदेश के यथेष्ट बड़े बड़े अर्थशास्त्री हैं जो इस प्रकार के ' वैश्वीकरण ' को पूरी तरह से गलत मानते हैं. किन्तु हमलोग उनकी चेतावनी की ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं दे रहे हैं.
अभी हाल में ही वर्ष २००१ ई० में नोबेल प्राइज़ प्राप्त एक अर्थनीतिविद कलकाता आये थे. वे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में Economics के प्राध्यापक हैं. अभी हाल में ही कलकाता में एक  नया यूनिवर्सिटी स्थापित हुआ है- " West Bengal National University of Juridical Science . " वहाँ पर आयोजित एक सम्मेलन में भाषण देते हुए उन्होंने बतलाया है कि, यह जो वैश्वीकरण चला हुआ है, उसका कुपरिणाम क्या होगा ? " उसका सबसे बड़ा कुपरिणाम तो यही होगा कि गरीबों का (गरीब देशों का) पैसा बड़े लोगों (अमीर देशों ) के हाथ में चला जायेगा."
आज के युग में (वेदान्ता के लिये उड़ीसा में जमीन लेने य़ा जमुना एक्सप्रेस वे के लिये यूपी में जमीन लेने के युग में ) साधारण मनुष्यों ( कर्ज की बोझ में दब कर आत्महत्या कर लेने वाले किसानों ) का स्थान कहाँ है ? साधारण मनुष्यों ( पिपली लाइव के ' नत्था ') की तरफ देखने की फुर्सत भी किसको है ? गरीबों की उन्नति के लिये बड़ी बड़ी योजनायें चलायी जा रहीं हैं. ('नरेगा' का नाम बदल कर ' मनरेगा ' कर दिया गया है !)
इसमें दावा तो है कि प्रत्येक गरीब को १०० दिनों के रोजगार की गारन्टी है ! पर कई जगह की रिपोर्ट है कि केवल पाँच दिनों का काम मिला है, उससे अधिक काम नहीं मिल सका. काम (रोजगार ) है कहाँ ? कौन देगा काम ? गरीबों के लिये राशन देने की व्यवस्था भी की जा रही है. BPL कार्ड पर मुफ्त राशन य़ा सस्ती दर पर राशन उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है. पर उस तालिका में कितने गरीबों के नाम दर्ज हैं ? उनलोगों का राशन चुरा लिया जाता है, य़ा बरसात में भींग कर करोड़ो टन सरकारी अनाज सड़ जा रहे हैं, इन सबको कौन देख रहा है ?
भ्रष्टाचार से देश भरा हुआ है, यह भ्रष्टाचार, बहुत दिनों से, भारतवर्ष के स्वाधीन होने के समय से ही चला आ रहा है, एवं पार्लियामेन्ट में तो यहाँ तक कह दिया गया है कि -  " जे खाने अनेक टाका खरच हय सेखाने एकटू चुरी हयेई थाके | "
 " - जहाँ पर ( जिस पंच वर्षीय योजनाओं में ) करोड़ो- करोड़ रुपये खर्च होते हैं, वहाँ थोड़ी बहुत चोरी (य़ा घपला ) तो चलता ही रहता है ! " 
  जो लोग देश के कर्णधारहैं, जिनके हाथों में देश की बागडोर है, जो लोग प्रधान सेवक हैं देश के - ' वही ' लोग यदि (भ्रष्टाचार को बिल्कुल हलके से लें और ) यह कहना शुरू कर दें कि-" चुरी एकटू हयई थाके !" " - थोड़ी बहुत चोरी तो होती ही रहती है !"
तो देश से भ्रष्टाचार दूर कैसे होगा ? क्या उपाय है इस भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने का ? यदि मनुष्य का चरित्र गठन हो जाये तो वह भ्रष्ट-आचरण (भ्रष्टाचार) कभी कर ही नहीं सकता. मनुष्य यदि ' मनुष्य ' ( T के शब्दों में जिसको अपने मान का होश हो- मानहुश !) बन जाये तो भर्ष्टाचार स्वतः मिट जायेगा. मनुष्य अभी तक मनुष्य नहीं बन सका है, इसी लिये तो भ्रष्टाचार चल रहा है.
(N -दादा कहते हैं- बाकी सब पशु पक्षी पूर्ण हो कर आये हैं, उनको कुछ बनना नहीं पड़ता है- स्कूल जाना नहीं पड़ता है, किसी गुरु के पास जाना नहीं पड़ता है. पर मनुष्य अधुरा है उसको मनुष्य बनने की साधना - मन को अपने वश में रखने साधना , " मनः संयोग " ही सीखना पड़ता है. जो व्यक्ति मन को वश में करके मनुष्य बन जाने की चेष्टा नहीं करता वह नीचे गिर कर केवल पशु ही नहीं राक्षस बन जाता है ! )
मनुष्य यदि " मनुष्य " बन जाता तो दुर्नीति (बेईमानी) कहीं दिखाई भी नहीं पडती ! स्वाधीन भारत की शिक्षानीति में - " मनुष्य " बनने (चरित्रवान मनुष्य बनने की शिक्षा ) की शिक्षा देने का प्रयास कभी किया ही नहीं गया है. इसीलिये स्वामीजी ने कहा था - " तोदेर देशे मानूष कोथाय रे ? "
 " - तुमलोगों के देश में मनुष्य कहलाने योग्य मनुष्य कहाँ हैं रे ? "मनुष्यों का निर्माण करने से क्या होगा ? उन सज्जन ने स्वामीजी से यही जानना चाह था, की क्या करने क्या हो सकता है ? उन्होंने उत्तर में कहा था-"मेक मैन फर्स्ट"- पहले मनुष्यों का निर्माण करो ! "
क्या मनुष्यों का निर्माण कर लेने से सब कुछ ठीक हो जायेगा ? हाँ, जब यथेष्ट संख्यक मनुष्य निर्मित हो जायेंगे तो सेष सब कुछ अपने आप हो जायेगा ! क्योंकि हमारे देश आभाव केवल चरित्रवान मनुष्यों का ही है. ( बाकी तो शश्यश्यामला रत्नगर्भा भारत भूमि पहले से ही है !) स्वामीजी ने यह बात १००  वर्ष पहले कहा था, वह आज तक नहीं किया गया है. आज तक सरकारी प्रयास के द्वारा देशव्यापी स्तर पर " मनुष्य निर्माण करने की कोई पञ्च वर्षीय योजना ",  नहीं ही बनाई जा सकी है !
विश्वविद्यालय की तो देश में भरमार है, अभी भारतवर्ष में ३५० विश्वविद्यालय हैं, और नये नये खुलते भी जा रहे हैं. इतना ही नहीं विदेश के विश्वविद्यालय भारत में अपनी शाखायें खोल रहे हैं. अपने देश के विश्वविद्यालय को दूसरे देशो में ले जाने का प्रयास चल रहा है. तर्क है कि इस प्रकार करने से ' विद्या ' का आदान प्रदान होगा. कौन सी ' विद्या ' ली और दी जाएगी ?
" अर्थकरी- विद्या " इस विद्या में मनुष्य के द्वारा ' मनुष्यत्व ' अर्जित करने की ओर कोई ध्यान नहीं रखा जाता है.इसमें बस यही सिखया जाता है कि किस उपाय से और भी अधिक धन उपार्जित किया जा सकता है ?
विश्व को  इस अवस्था से (आर्थिक वैश्वीकरण के कुपरिणाम से ) यदि कोई विचारधारा रक्षा कर सकती है, तो वह केवल स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा ही है ! स्वामीजी की विचारधारा कहने का अर्थ श्री रामकृष्ण परमहंस देव ( ठाकुर ) की विचारधारा ही है, और ठाकुर की विचारधारा का अर्थ ही है श्री श्री माँ सारदा देवी की विचारधारा ! इन तीनों में एक ही भाव का मिलन है, पूर्ण स्वीकृति है !
शायद इसीलिये मुझ से कुछ दिनों पहले एक स्थान पर, अर्थात महामण्डल चलते हुए बहुत वर्ष बीत जाने के बाद, किसी जगह यह प्रश्न पूछा गया कि, इस महामण्डल कि स्थापना किस प्रकार हुई ? प्रश्न को सुनने के साथ ही साथ मेरे मन में जो विचार उठते हैं, उसीको तत्काल मुझे कह देना पड़ता है. बहुत सोंच विचार करके कुछ बोलने कि क्षमता भी मुझमे नहीं है. इसीलिये बरबस मुख से निकल पड़ा था-
" The will of Sri Ramakrishna, the blessings of the Holy Mother, and enthusiasm of Swami Vivekananda mingled to form this organization ."
" - ठाकुर की इच्छा,  माँ का आशीर्वाद और स्वामीजी का उत्साह-  इन तीन भावों  के सम्मलित होने से ही इस संगठन ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' की सृष्टि हुई है ! "
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महामण्डल के आदर्श स्वामी विवेकानन्द : जिसके प्रति वास्तविक श्रद्धा हो, तो उसके ऊपर प्रत्याहार और धारणा का अभ्यास करने में आसानी होती है, स्वतः पूजन करने का मन होता है। पूजन में सम्मान की भावना को क्रिया रूप में व्यक्त किया जाता है। श्रद्धा को सक्रिय बनाना ही पूजन का वास्तविक स्वरूप है। पूजन में कुछ अर्पित किया-चढ़ाया जाता है। जिनको हम श्रद्धा से नमन कर रहे हैं, उनके समस्त गुण वैज्ञानिक नियम -लॉ ऑफ़ एसोसिएसन के अनुसार हमारे भीतर जाग्रत होने लगते हैं। उनका कार्य-प्रभाव क्षेत्र बढ़े, इसके लिए अपना योगदान देने के लिए, जीवन गठन करने के लिए मन आकुल-व्याकुल हो उठता है। यह श्रद्धा भरा सहयोग ही वास्तविक पूजन सामग्री है। विवेकानन्द के प्रणाम मंत्र का पाठ
   नमन  तुम्हें  प्रभु!  अनन्तरूपी,  अनन्त बाहु शिर-नेत्र धारी।
    अनन्त हैं नाम तुम एक शाश्वत, अनन्त ब्रह्माण्ड के तुम प्रभारी॥
जिस प्रकार दीपक अपने छोटे से कलेवर में ईश्वरीय प्रकाश की प्रतीक ज्योति को लम्बे समय तक धारण किये रहने में समर्थ होता है। हम भी चाहते हैं कि अपनी नगण्य काया (नाचीज़ हस्ती) में ईश्वरीय ज्ञान को जीवन भर धारण किये रहें। इसी भाव से दीपक को आदर्श मानकर परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि वह हम सबके अन्दर अपने दिव्य ज्ञान को सञ्चरित करता रहे और उसी के अनुसार हमारा जीवन सञ्चालित होता रहे।
 संघ-मंत्र और स्वदेश मन्त्र :  केवल महामण्डल द्वारा विभिन्न भाषाओँ में स्वीकृत स्वदेशमन्त्र और संघमन्त्र का पाठ ही प्रशिक्षणार्थियों से दुहरवाये जाने हैं। संगीत प्रशिक्षण में प्रशिक्षित चुने हुए सदस्य ही शिविर में यह सङ्कल्प क्रमशः दुहरवाने का कार्य करें। हो सके, तो संघ-मंत्र और स्वदेश मन्त्र का छपा पत्रक सभी प्रशिक्षणार्थियों को पहले से ही दे दिया जाय। 
ऑटोसजेसन एवं फॉलो अप फॉर्म : सभी प्रशिक्षणार्थी महामण्डल के आदर्श-उद्देश्य एवं कार्ययोजना के अनुरूप-उच्च भावों को पाने-देने की साधना, जीवन गढ़ने-गढ़ाने की तप साधना हेतु अपना नाम, पता, मोबाईल नंबर डालकर यह संकल्प सूत्र भरेंगे कि - मैं जीवन गठन और चरित्र-निर्माण के पाँच निर्धारित आदर्श कार्यों प्रार्थना-मनसंयोग -व्यायाम-स्वाध्याय-विवेकप्रयोग या आत्ममूल्यांकन को करने और कराने के लिए , मनुष्य बनने बनाने का निष्ठापूर्वक शपथ लेता हूँ।

 'ॐ सर्वाभ्यो/मातृशक्तिभ्यो नमः'की भावना -  केनोपनिषद में भी ब्रह्मविद्या का हेमवती उमा के रूप में प्रकट होना चर्चित है- "स तिस्मन्नेनकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना युमाम् हैमवतीम" (केनोपनिषद, 3,12) बिना मातृजाति के अभ्युदय के भारत का कल्याण सम्भव नहीं है। पक्षी एक पंख से कभी उड़ नहीं सकता; इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने पथ-प्रदर्शक स्त्री-गुरु में भैरवी ब्राह्मणी को ग्रहण किया, स्वयं स्त्री-भाव से साधना की, अपनी सहधर्मिणी की शिक्षा-दीक्षा का भार ग्रहण किया, और मातृभाव का प्रचार किया था।
जगत-विमोहिनी स्त्रिमूर्ति में विद्या,क्षमा, शान्ति, मोह,निद्रा,भ्रान्ति आदि सात्विक एवं तामसिक गुणों में उसी अद्वितीया, वराभयकरा,मुण्डमालिनी देवी का आविर्भाव दर्शन और श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करके वे कृतार्थ हुए थे और मानवमात्र को उसी पथ में चलकर कृतकृत्य होने की शिक्षा उन्होंने दी थी। जिसके अभाव में मनुष्य अज्ञान-अन्धकार में ही भटकता रह जाता है, उस महाविद्या को नमन - ॐ महाविद्यायै नमः। करने का उपदेश दिया था! ममता की मूर्ति, शुभ-सद्भाव जगाने वाली, कुपुत्रों को सुधारने वाली, सुपुत्रों को दुलारने वाली (देवपुरुषों, महाप्राणवानों को जन्म देने वाली, विकसित करने वाली) समस्त मातृशक्तियों को नमन करना समस्त नेताओं का परम कर्तव्य है।

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