Wednesday, October 29, 2014

१.'मनः संयोग'- एक परिचय' 'दी मदर बर्ड हैचिंग हर एग्स ' [ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ] (1)

 (प्रथम संस्करण २५ दिसम्बर २००१ -द्वितीय संस्करण २५ दिसम्बर २०१४ )
'आवरण चित्र की व्याख्या '
इस पुस्तिका के आवरण पृष्ठ पर जो चित्र छपा है उसका विस्तृत विवरण रामकृष्ण मठ, नागपुर से प्रकाशित श्रीरामकृष्णवचनामृत के बीसवें संस्करण के प्रथम भाग परिच्छेद ९ में इस प्रकार मिलता है : दिन बृहस्पतिवार है, सावन शुक्ला दशमी, २४ अगस्त १८८२ ई. ……श्रीरामकृष्ण मास्टर से खड़े खड़े वार्तालाप कर रहे हैं, कभी बरामदे में टहल रहे हैं ।  
 श्रीरामकृष्ण :  " ह्रदय में सोना दबा पड़ा है। ह्रदय में ही ईश्वर हैं --यह समझ लेने के बाद सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उन्हें पुकारने की इच्छा होती है। किन्तु ह्रदय में क्या है ?-- इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिये कुछ साधना (मनःसंयोग) आवश्यक है। "
मास्टर : साधना क्या बराबर करते ही रहना चाहिये ?
श्रीरामकृष्ण परमहंस : नहीं, पहले कुछ कमर कसकर करनी चाहिये। फिर ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती। जब तक तरंग, आँधी, तूफान और नदी मोड़ से नौका जाती है तभी तक मल्लाह को मजबूती से पतवार पकड़नी पड़ती है; उतने से पार हो जाने पर नहीं। जब वह मोड़ से बाहर हो गया और अनुकूल हवा चली तब वह आराम से बैठा रहता है, पतवार में हाथ भर लगाये रहता है। फिर तो पाल टाँगने का बंदोबस्त करके आराम से चिलम भरता है । कामिनी और कांचन की आँधी, तूफान से निकल जाने पर शान्ति मिलती है ! 
 "अन्तश्चराणां मरुतां निरोधान्  निर्वातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्  " ॥कुमारसम्भव ३.४८॥

योग के विघ्न :- " मन के स्थिर हुए बिना योग नहीं होता। संसार की हवा मनरूपी दीपशिखा को सदा ही चंचल किया करती है। वह शिखा यदि जरा भी न हिले तो योग की अवस्था हो जाती है।  कामिनी और कांचन योग के विघ्न हैं। वस्तुविचार करना चाहिये।  स्त्रियों के शरीर में क्या है ---रक्त, मांस, आतें, कृमि, मूत्र, विष्ठा --यही सब। उस शरीर पर प्यार  क्यों ?
" किसी किसी में योगियों के लक्षण दीखते हैं परन्तु उन लोगों को भी सावधानी से रहना चाहिये। कामिनी और कांचन ही योग में विघ्न डालते हैं। योगभ्रष्ट होकर साधक फिर संसार में आता है, - भोग की कुछ इच्छा रही होगी। इच्छा पूरी होने पर वह फिर ईश्वर की ओर जायेगा- फिर वही योग की अवस्था होगी। 
" तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं। नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर। नीचे की सुई का ऊपर की सुई से एक होना ही योग (मनःसंयोग) है। 
" त्याग (वैराग्य) के लिये मैं अपने में अपने में राजसी भाव भरता था। साध हुई थी कि जरी की पोशाक पहनूँगा, अँगूठी पहनूँगा, लम्बी नलीवाले हुक्के में तम्बाकू पिऊँगा।  जरी की पोशाक पहनी। ये लोग (मथुरबाबू) ले आये थे। कुछ देर बाद मन से कहा - यही शाल है, यही अँगूठी है, यही लम्बी नली वाले हुक्के में तम्बाकू पीना है। सब फेंक दिया, तब से फिर मन नहीं चला । " 
शाम हो रही है। कमरे के दक्षिण-पूर्व की ओर के बरामदे में द्वार के पास ही, अकेले में श्रीरामकृष्ण मणि से बातें कर रहे हैं। 
श्रीरामकृष्ण - " योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है --सदा आत्मस्थ रहता है। शून्य दृष्टि, देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है । समझ में आ जाता है, कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र 'दी मदर बर्ड हैचिंग हर एग्स ' क्या मुझे दिखा सकते हो ? " 
मणि- जैसी आज्ञा। चेष्टा करूँगा, यदि कहीं मिल जाय।"


[ हिज आईज़ आर वाइड ओपन, विथ ऐन एमलेस लुक, लाइक दी आईज़ ऑफ़ दी मदर बर्ड हैचिंग हर एग्स. हर इन्टायर माइंड इज़ फिक्स्ड ऑन दी एग्स, ऐंड देयर इज़ अ वेकेंट लुक इन हर आईज.   'आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि।' (बृहदारण्यक उपनिषद /२२) इसका अर्थ यह है कि 'अरे मैत्रेयी, आत्मा के ज्ञान या दर्शन का होना सर्वथा सर्वदा वांछनीय है। उसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना होगा। ]
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 भूमिका  
( 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' के अध्यक्ष श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय के द्वारा बंगला भाषा में लिखित पुस्तिका- ' मनः संयोग ' का हिन्दी भावानुवाद.)
'मनः संयोग ' अर्थात मन की एकाग्रता  इतना महत्वपूर्ण विषय है जिसको सीखे बिना कुछ भी कर पाना संभव नहीं है। केवल पढ़ाई-लिखाई व जीवन-गठन ही नहीं, बल्कि समाज और देश का कल्याण भी इसी पर निर्भर करता है। इतना महत्वपूर्ण विषय होने पर भी, जिनके लिये इसे सीखना अत्यन्त अनिवार्य है- उन छात्रों-युवाओं के पाठ्यक्रम में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है।
महामण्डल का ' उदेश्य ' है- ' भारत का कल्याण ' क्योंकि 'कृण्वन्तो विश्वं आर्यं' - विश्व को आर्य बनाने के पहले - ' कृण्वन्तो भारतं आर्यं ' भारत को भी आर्य बनना होगा; और इसका उपाय है-' चरित्र-निर्माण'! इसीलिये महामण्डल का आदर्श-वाक्य है - 'Be and Make' स्वयं आर्यं (चरित्रवान मनुष्य) बनो और साथ ही साथ दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो ! ' बनो और बनाओ ' - इसीको स्वामीजी कहते हैं- पशु मानव (दस्यु) को देव मानव (आर्य) में उन्नत करो ! पहले भारतवासियों को ' सुसंस्कृत ' या चरित्रवान मनुष्य में रूपान्तरित करो, ताकि वे ' पृथ्वी के समस्त मनुष्यों के मन पर शुभ-संस्कारों की छाप डाल कर उन्हें एक सभ्य मनुष्य में परिणत होने की पद्धति सीखा सकें ! 
अतः स्वाभाविक रूप से महामण्डल के 'मनुष्य निर्माण कार्यक्रम ' के अर्न्तगत, आर्य बनने और बनाने के लिये प्रत्येक भारतवासी को मनः संयोग अर्थात मन को एकाग्र करने की विधि को सीखना अनिवार्य है। इसीलिये महामण्डल द्वारा इसे सीखने की एक पद्धति निर्धारित की गई है। विगत सैंतालीस वर्षों से हमारा यह अनुभव रहा है कि जिन छात्रों-युवओं ने मन को एकाग्र करने की पद्धति को अपने दैनिन्दन जीवन में अपनाया है, उन्हें उसका आशातीत परिणाम मिला है। यह अब एक 'परीक्षित सत्य ' बन चुका है।
पाश्चात्य जगत्, मनोविज्ञान के क्षेत्र में अभी एक नवजात शिशु के समान है ; जबकि हमारे देश में यह विज्ञान अत्यन्त ही प्राचीन है। इसीलिये इस पुस्तिका को- वेद, उपनिषद, गीता, भागवत्, पातंजलि योग-सूत्र, एवं स्वामी विवेकानन्द के मनोविज्ञान विषयक असाधारण आविष्कारों के साथ-साथ पाश्चात्य मनोविज्ञान को भी दृष्टि में रखते हुये लिखा गया है। किन्तु कम उम्र के छात्र-छात्राओं की सुविधा के लिये, इसमे शास्त्रादि के नामों को उल्लिखित किये बिना, इसे अत्यन्त ही सरल भाषा में लिखा गया है। विद्यालय एवं महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं के साथ साथ जनसामान्य भी इससे लाभान्वित होंगे ऐसी हमारी आशा है। 
अध्यापक तथा अभिभावक गण छात्र-छात्राओं को यदि मनः संयोग की पद्धति का अनुसरण करने के लिये अनुप्रेरित करेंगे तो इससे, न केवल उनको अपने अध्यन में सफलता मिलेगी बल्कि देश का भी यथार्थ कल्याण होगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
- प्रकाशक 

[ मानवतावादी जर्मन दार्शनिक एवं मनोविश्लेषक एरिक  फ्रॉम (23 मार्च 1900 - 18 मार्च 1980) कहते हैं - " साइकोलॉजी कैन शो अस व्हाट मैन इज़ नॉट. इट कैन नॉट टेल अस व्हाट मैन, ईच वन ऑफ़ अस, इज़. दी सोल ऑफ़ मैन, दी यूनिक कोर ऑफ़ ईच इंडिविजुअल, कैन नेवर बी ग्रैस्पड ऐंड डिस्क्राईब्ड ऐडक्वट्ली." 
  " Psychology can show us what man is not. It cannot tell us what man, each one of us, is. The soul of man, the unique core of each individual, can never be grasped and described adequately." --Erich Fromm
" मनोविज्ञान हमें यह नहीं बता सकता कि मनुष्य - हम में से प्रत्येक व्यक्ति वस्तुतः क्या है ? वह यह तो बता सकता है कि मनुष्य क्या नहीं है । किन्तु यह  मनुष्य की आत्मा, प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग ह्रदय, उसका सत्व-  कभी बुद्धि के द्वारा समझा नहीं जा सकता और न ही उसे पर्याप्त रूप से भाषा में कभी वर्णित किया जा सकता है."  -- एरिक फ्रॉम
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१.'मनः संयोग- एक परिचय'
मनः संयोग किये बिना अर्थात मन को एकाग्र किये बिना, हम न तो किसी कार्य को अच्छी तरह कर सकते हैं, न किसी विषय का सम्यक ज्ञान ही अर्जित कर सकते हैं। किसी भी विषय का ज्ञान अर्जित करने के लिये तथा किसी भी कार्य को सुचारू ढंग से करने के लिये हमें उसके ऊपर अपने मन को एकाग्र करना ही पड़ता है। हमलोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी कार्य को मन लगा कर करने से वह कार्य अच्छी तरह सम्पन्न हो जाता है।
किन्तु जब हमे मनःसंयोग के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तो क्या उस समय हम बिल्कुल निष्क्रिय थे और किसी भी विषय कि जानकारी हमे प्राप्त नहीं हो रही थी ? ऐसा नहीं है। हम सभी लोग हर समय कुछ न कुछ कर रहे हैं, और कुछ न कुछ ज्ञान भी अर्जित कर रहे हैं। किन्तु हम जिस कार्य पर और जिस विषय पर मन को तल्लीन करने में अर्थात मनःसंयोग करने में जितना अधिक सक्षम हुए हैं - वह कार्य उतना ही अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ है, तथा उस विषय को उतने ही अच्छे ढंग से जान सके हैं। फिर भी हमलोग मनःसंयोग की पद्धति सीखे बिना ही निरन्तर विभिन्न विषयों में मनःसंयोग करते रहते हैं।
लेकिन जब हमे ज्ञात हो जायगा कि मनः संयोग क्या है, तथा अपनी इच्छा और प्रयत्न द्वारा मन को किस प्रकार एकाग्र किया जाता है-उस पद्धति को यदि सीख लिया जाय तो हम अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी कार्य (कर्म) में इसका प्रयोग कर उसे अत्यन्त कौशल से सम्पन्न कर सकेंगे तथा कम समय में ही किसी भी विषय के ज्ञान को और अच्छी तरह से अर्जित कर लेंगे।
हमलोग लगातार जो कुछ भी कार्य करते रहते हैं- जैसे देखते या सुनते अथवा जो कुछ भी करते हैं, उसे करते समय उस कार्य में हमे अपने मन को संयुक्त करना ही पड़ता है। मन की सहायता के बिना, देखना-सुनना अथवा कुछ भी करना सम्भव नहीं है। कभी-कभी ऐसा होता है कि मेरे सामने से कोई चला गया, या किसी ने कुछ कहा तो वहीं होने पर भी मैं उसे देख या सुन नहीं पाता। ऐसा क्यों होता है ? 
ऐसा इसीलिये होता है कि देखने और सुनने की तरफ मेरा मन लगा ही नहीं था, उस समय मेरा मन कहीं  और लगा हुआ था। ऐसी स्थिति में कहना पड़ता है कि- 'क्षमा कीजियेगा, मैं थोड़ा अन्यमनस्क (Inattentive) हो गया था- मेरा मन कहीं और था इसीलिये आपको देख न सका या आपकी बात को ठीक से सुन न सका, क्या एक बार फ़िर से कहियेगा ? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि -देखने, सुनने  अथवा कोई कार्य करने, किसी विषय को जानने, अथवा किसी भी विषय का ज्ञान अर्जित करने के लिये उसके साथ मन को संयुक्त करना ही पड़ता है। जो व्यक्ति अपने मन को किसी कार्य या विषय पर जितना अधिक एकाग्र रखने में समर्थ होता है, उसके द्वारा इस प्रकार किया गया कोई भी कार्य उतना ही उत्कृष्ट श्रेणी का होता है। 
यह जो किसी विषय या कार्य में मन को लगाया जाता है, उसे क्या कहते हैं ? उसे ही मनोयोग करना अर्थात उस कार्य या विषय से मन का योग करना या संयुक्त करना कहते हैं।और जब यह मनोनिवेश अपनी आवश्यकता और इच्छा के अनुसार सम्यक रूप से और पूरी दक्षता के साथ सम्पन्न होने लगता है- तो उसे ही मनःसंयोग करना कहा जाता है। अब यह स्पष्ट हो गया कि ' मनः संयोग ' किसे कहते हैं और उसे क्यों किया जाता है! किसी प्रयोजनीय कार्य या ज्ञातव्य विषय में मन को भली-भांति संयुक्त रखने कि क्षमता को ही मनः संयोग कहते हैं। और जिस किसी कार्य में मनःसंयोग जितनी दक्षता के साथ किया जाता है, वह कार्य भी उतना ही अधिक उत्कृष्ट तथा सफल होता है। उसी प्रकार हम चाहे जिस विषय का भी ज्ञान अर्जित करना चाहते हों, उस विषय पर दक्षतापूर्वक मनःसंयोग करने से उस विषय का सम्पूर्ण ज्ञान भी अर्जित हो जाता है।
अतः किसी भी कार्य को सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के लिये हम सर्वदा मनः संयोग कि पद्धति को व्यवहार में ला सकते हैं। मान लो कि हम पढ़ रहे हैं, पर उस समय हमारा मन पढ़ाई में अच्छी तरह से न लगा रहे (क्रिकेट के मैदान में चला जाय) तो पढ़ाई भी अच्छी तरह से नहीं हो सकती। किन्तु ज्ञातव्य विषय पर मन को एकाग्र रख कर पढ़ाई करने से, जिस विषय को पढ़ा जा रहा है, उसे उसे भली-भांति समझा जा सकता है तथा वह विषय याद भी जल्दी हो जाता है। अर्थात मन को पढ़ाई पर एकाग्र रख कर पढने से पढ़ाई सहजता से सम्पन्न हो जाती है। इतना ही नहीं, मन को एकाग्र रख कर पढ़ने से कम समय में ही अधिक पढ़ा जा सकता है। विषय को गहराई से समझा जा सकता है, और वह सभी याद रह जाता है।
इस तरह मनः संयोग सीखने से कई लाभ हो सकते हैं। मन कि चंचलता या अस्थिरता से सभी कार्यों में हानी होती है। कोई भी कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो सकता और समय भी व्यर्थ में नष्ट होता रहता है। जबकि मन को एकाग्र रख कर जो भी कार्य किया जाता है, वह कार्य चाहे जैसा भी क्यों न हो, अल्प समय में ही सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न हो जाता है। इसके बाद जो अतिरिक्त समय बचा रह जाता है, उसका सदुपयोग हम अध्यन में या अपनी इच्छानुसार किसी नए मनपसंद विषयों को सीखने या अन्य अच्छे कार्यों में कर सकते हैं।
अतः मनःसंयोग की पद्धति को सीख कर अपने दैनन्दिन जीवन में उसे व्यवहार में लाना सचमुच अत्यन्त बुद्धिमानी का कार्य है। इसके आभाव में सम्पूर्ण जीवन में नुकसान बढ़ता ही जाएगा। जबकि मन को एकाग्र रखना सीख लेने से दुनिया के सभी क्षेत्रों में लाभ का परिमाण उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाएगा। जीवन में सफलता सहज-साध्य हो जायेगी !

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