Wednesday, April 17, 2013

" स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त ' यथार्थ मनुष्य ' का आदर्श (साँचा ) [18 A]স্বামীজির দেওয়া আদর্শ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना

युवा-आदर्श का चयन: जिस प्रकार किसी शिल्पकार को मूर्ति को गढ़ने के लिये एक साँचे की आवश्यकता होती है,उसी प्रकार युवाओं को भी अपना जीवन-गठन करने के लिये किसी जीवन्त और ज्वलन्त आदर्श को एक साँचे (Role Model) के रूप में अपने सामने रखना आवश्यक है। किसी व्यक्ति के निजी जीवन में संचित कुछ महान गुणों के संकलन-फल को आदर्श कहते हैं। जिस व्यक्ति के अपने आचरण में वैसे महान गुण परिलक्षित नहीं होते हों, उनके मुख से केवल कुछ रटे-रटाये बेजान शब्दों के संयोजन का श्रवण करने से
उन महान सत्यों (अहम् ब्रह्मास्मि जैसे महावाक्यों) की वास्तविक अवधारणा नहीं हो सकती है। जब किसी महापुरुष के व्यक्तिगत जीवन में समस्त गुण पूर्ण मात्रा में विकसित हो जाते हैं, तभी उस जीवन से आदर्श का जीवन्त-ज्वलन्त प्रतिफलन प्राप्त किया जा सकता है। किसी वैसे ही आदर्श स्वरूप व्यक्ति को देखकर सीखा जा सकता है, उनसे प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है, उनके हृदय के जोश और उत्साह से प्रेरणा लेकर अपने ह्रदय को भी जोश और उत्साह से भर लेना संभव हो जाता है। 
युवा पीढ़ी के सामने ऐसा ही एक जीवन्त आदर्श रहना बहुत आवश्यक है। आधुनिक युग के युवा पीढ़ी के लिये स्वामी विवेकानन्द ही वह श्रेष्ठ आदर्श (Role Model) हैं! इस तथ्य को कम से कम भारतवर्ष के लोग अब थोडा-बहुत समझने लगे हैं, और राष्ट्र की नजरें अब धीरे धीरे स्वामीजी की ओर  उठने लगी हैं। इस सच्चाई को हमलोगों ने धीरे धीरे स्वीकार करना शुरू कर दिया है कि स्वामी विवेकानन्द को अपने राष्ट्र के युवा-आदर्श के रूप में ग्रहण किये बिना अब हमलोगों का काम नहीं चलने वाला है।
स्वामी विवेकानन्द की 'जन्म-सार्धशती ' का तात्पर्य : स्वामीजी के 'जन्म' की सार्धशती समारोह पालन के लिये एक वर्ष पहले से ही जिस प्रकार के तीव्र उत्साह और उमंग की अनुभूति (विवेकानन्द-रथयात्रा, युवा-
सम्मेलन आदि के माध्यम से) हो रही है, उसको थोड़ा और अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है। जिस समय पृथ्वी पर विचरण करने वाले देवगण (भारतवासी) माया की जादुई मृगतृष्णा से सम्मोहित होकर, स्वयं को नगण्य और कमजोर समझने लगे थे, और संसार के भंवर से बाहर निकलने में स्वयं को बिल्कुल असमर्थ मान चुके थे। उस समय अनन्त आकाश के अज्ञात राज्य से पारस-मणि (महावाक्यों को) लाने के लिये एक श्वेताभ-कोमल राजहंस के साथ, स्वामी विवेकानन्द को मानों किसी महा-शक्तिशाली गरुड़ (Eagle) के सदृश्य, अपने पंखों को फैलाकर तीव्र गति से उड़ान भरना पड़ा था। उनका ह्रदय उन मोहग्रस्त मनुष्यों की भ्रान्ति को मिटा देने के लिये व्याकुल हो उठा था, जो अजर-अमर आत्मा (सिंह) होकर भी अपने को केवल एक मरण-धर्मा  शरीर (भेंड़) समझकर क्रन्दन (भें-भें) कर रहे थे। वे उस पारस-मणि (महावाक्यों) का स्पर्श करवाकर सम्पूर्ण मानव-जाति को उसकी मोहनिद्रा से जाग्रत करना चाहते थे, उनमें नये जीवन का संचार करना चाहते थे, उनके जीवन को पूरी तरह से बदल देना चाहते थे-यही उनकी साधना थी।
उन्हीं दबे-कुचले कंकाल सदृश मनुष्यों के जन-आरण्य के शिखर पर बैठे- 'नरेन्द्र' (स्वामी विवेकानन्द) को अपने ह्रदय में उनकी वेदना का अनुभव जब इतनी तीव्रता से हुआ कि उनके हृदय का रक्त आँखों का अश्रु बनकर बहने लगे, तब उन्हें इस सत्य का साक्षात्कार हुआ कि -
 " प्रत्येक मानव-शरीर ईश्वर का श्रेष्ठ मन्दिर है!" 
और तब वह पुरुष सिंह एक महा-शक्तिशाली गरुड़ (Eagle-महाश्येन) बनकर अपने साथ श्वेताभ-कोमल राजहंस (वेदमूर्ति -भगवान श्रीरामकृष्ण) की शिक्षा (पारस-मणि) को लेकर देश-देशान्तर तक उड़ान भरने लगा । एवं करुणा से भरे उस वीर 'पुरुष-सिंह ' के हृदय उठे हुँकार -

 " उठो,जागो ! और लक्ष्य तक पहुँचे बिना विश्राम मत लो! " 

ने धरती माता के दिग-दिगन्त तक को कम्पायमान कर दिया। युगनायक विवेकानन्द ने मनुष्यों के समस्त प्रकार के बन्धनों के विरुद्ध घोर संग्राम चलाने की घोषणा कर दी। बिजली की कड़क के सदृश सबों से बन्धनों को तोड़ कर मुक्त हो जाने का आह्वान किया। सिंहगर्जना करते हुए घोषित कर दिया-

" मुक्ति --ओ मुक्ति, मुक्ति --सिर्फ़ मुक्ति ! यही आत्मा का गीत है "

उस विराट पुरुष (सुपरमैन) ने सम्पूर्ण पृथ्वी को ही मानो दोनों हाथों से उठाकर- झकझोर दिया था ! जिसके परिणाम स्वरुप मनुष्य जितने भी डरावने सपनों से परेशान और दुःखी रहता था, वे सभी दू:स्वप्न शून्य में विलीन हो गये, अमावस्या की लम्बी काली रात्रि कट गयी, और सुबह के झिलमिलाते प्रकाश की किरणें दिखाई देने लगी। मनुष्य-जाति के इतिहास में एक नये प्रभात का आगमन हुआ। यही है स्वामी विवेकानन्द के 'जन्म' (आविर्भूत होने) का तात्पर्य !
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।"
" निम्न स्तर के मन (मैं-पन M/F) के साथ उच्चतर मन (हमारे स्वरूप) का संघर्ष चल रहा है, और यह संघर्ष अपने पृथक अस्तित्व को जिसे हम 'व्यक्तित्व' (मैं-पन M/F) समझते हैं -को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करता है। ...हम जन्मसिद्ध विद्रोही हैं। जब हम जीवन के प्रथम तथ्य (मृत्यु), स्वयं जीवन के अन्तर्प्रवाह के विरुद्ध भी विद्रोह करते हैं और चिल्ला उठते हैं, " हमारे लिये कोई नियम नहीं हो सकता।"...जब हमारे भीतर प्रकृति का यह बन्धन तोड़ कर मुक्त होने की चेष्टा उत्पन्न हो जाती है, तभी उच्च स्तर के जीवन (या मनुष्यत्व) का प्रथम उन्मेष होना समझना चाहिये। 
 " मुक्ति --ओ मुक्ति, मुक्ति --ओ मुक्ति !" यही आत्मा (हमारे स्वरूप) का गीत है! किन्तु हाय (जब तक कोई श्रीरामकृष्ण-स्वामी विवेकानन्द जैसा जीवन-मुक्त शेर नहीं मिल जाये) प्रकृति की सैकड़ों श्रृंखलाओं में बद्ध (भेंड़ बने रहना) होना ही उसकी नियति है !"
" किसी भी वस्तु में जीवन है, उसके भीतर एक यथार्थ सत्ता है, यह बात हम क्यों कहते हैं ?  मनुष्यों के मुक्ति-लाभ की अविराम-चेष्टा का नाम ही जीवन है ! हम आदि काल से ही नियमों का अध्यन करते आ रहे हैं, किन्तु मनुष्य भी किसी (जायस्व- म्रियस्व जैसे) किसी शाश्वत-नियम के अधीन है-इस बात को हम नहीं मानते और न मानेंगे ही। आत्मा सदैव चीत्कार करती रहती है, मुक्ति ! मुक्ति ! स्वाधीनता ! स्वाधीनता ! पूर्णतः स्वाधीन ईश्वर (ठाकुर) की धारणा लाभ करने के पश्चात् मनुष्य अनन्त काल तक इस बन्धन में नहीं रह सकता। मनुष्य अपनी ओर देखकर कहा करता है, " मैं जन्म से ही प्रकृति का दास हूँ-बद्ध हूँ ; फिर भी (मेरे ही जैसा द्वा-सुपर्णा) एक ऐसा पुरुष है जो प्रकृति के नियम में बद्ध नहीं है- जो नित्यमुक्त और प्रकृति का प्रभु है। मुक्ति या स्वाधीनता के इस मूर्त विग्रहस्वरूप, प्रकृति के प्रभु (श्रीरामकृष्ण देव, ईसा, बुद्ध, मोहम्मद,...नानक) को ही हम ईश्वर कहते हैं !" (२/२९४-९५) 

" मनुष्य में जो स्वाभाविक बल है, उसको अभिव्यक्त करना ही धर्म है। असीम शक्ति का स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान ( बीज में वृक्ष के जैसा-क्रमसंकुचित) है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। ...यही है मनुष्य का,धर्म का, सभ्यता या प्रगति का-इतिहास !" 

"ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है। ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवन्त ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।"
 
स्वामीजी प्रति-मुहूर्त 'आविर्भूत' हो रहे हैं: इसीलिये ऐसा समझना कि स्वामी विवेकानन्द का आविर्भाव आज से १५० वर्ष पूर्व केवल १२ जनवरी १८६३ ई० के प्रातः काल के किसी विशेष मुहूर्त में हुआ था बिल्कुल गलत होगा। क्योंकि वे आज भी ('असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों ' का निर्माण करने के उद्देश्य से) सैकड़ो-हजारो नर-नारियों के हृदय मन्दिर में प्रति-मुहूर्त 'आविर्भूत' हो रहे हैं ! उस कवी-हृदय स्वामी विवेकानन्द की इस रचना "To The Fourth Of July" में क्या यही सन्देश नहीं गूँज रहा है ?

" Move on, O Lord, on thy resistless path!
 

Till thy high noon o'erspreads the world.
 

Till every land reflects thy light,
 

Till men and women, with uplifted head,
 

Behold their shackles broken, and
 

Know, in springing joy, their life renewed! " 

" बढ़े चलो, हे देव !  अपने ' प्रतीरोधविहीन-पथ ' पर !
 
जब तक तुम्हारा प्रखर तेज न फैले सर्वत्र !
 

कण कण चमकाए न तेज तुम्हारा,
 

जब तक सारे नारी- नर, उठाकर शीर्ष;
  

देख न लें स्वयं को बंधन मुक्त ! 

और अनुभव करें वसंतोल्लास- 'पुनर्जीवन' का !"

स्वामी विवेकानन्द लिखते हैं- " हो सकता है कि एक पुराने वस्त्र को त्याग देने के सदृश, अपने शरीर से बाहर निकल जाने को मैं बहुत उपादेय समझूँ। लेकिन मैं काम करना नहीं छोडूँगा। जब तक सारी दुनिया न जान ले, मैं सब जगह लोगों को यही प्रेरणा देता रहूँगा कि -वह परमात्मा के साथ एक है। (खण्ड १०/२१७ सूक्तियाँ एवं सुभाषित ४४)  
" It may be that I shall find it good to get outside of my body—to cast it off like a disused garment. But I shall not cease to work! I shall inspire men everywhere, until the world shall know that it is one with God."(Volume 5, Sayings and Utterances 44.) 

उन्होंने कहा था, " जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः।"
इसलिये 'उनकी शिक्षाओं प्रचार-प्रसार मुझे या आपको नहीं करना है, वे आज भी प्रतिमुहूर्त देश और मनुष्यों से प्रेम करने वाले अपने कार्यकर्ताओं के ह्रदय में आविर्भूत होते रहते हैं। ' हमें तो बस उनसे यथार्थ मनुष्य बनने की प्रेरणा प्राप्त करके स्वयं मनुष्य बनने के लिये कठोर परिश्रम करना है और दूसरों को भी मनुष्य बनने के लिये सहायता करना है। 
इस आपात निरर्थक जगत (क +मन ) में भी स्वामीजी ने एक अर्थ खोज निकाला था, जिसको अंग्रेजी के विख्यात कवि टैनिसन के शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है -  

"Yet, I doubt not through the ages,

one increasing purpose runs,
 

And the thoughts of men are widen'd,

 with the process of the suns."



[Alfred Tennyson (1809–1892 "There is a divine plan in all human history. It embraces nations as well as individuals, and stretches on to the end of time(सनातन). Every nation and people is a part of the plan of God, who has set to each its bounds and its sphere of service to God is service to man."]-
 
" फिर भी, नहीं है मुझमें किसी प्रकार का शंशय और ;

युगों युगों से चला आ रहा मनुष्य जीवन का एक ही उद्देश्य,

एक ही अर्थ है-" हृदय का वैसा विस्तार - "
         
 कि जैसे सूर्य की अरुण-किरणें पसरी हों गगन में !  "    

शुक्ल यजुर्वेद  में व्याहृति सह गायत्री मन्त्र  का भाव भी यही है। तथा इन्हीं भावों के आलोक में स्वामी विवेकानन्द के जन्म (लेने या आविर्भूत होने ) के तात्पर्य को समझने की चेष्टा करनी होगी।   

जगत-प्रवाह का एक गहरा अर्थ है: १० जनवरी १९०४ ई० को बेलुड़ मठ में स्वामीजी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित सम्मेलन में भगिनी निवेदिता ने एक भाषण दिया था । उन्होंने कहा - "हमलोग यहाँ उत्सव के क्षणिक आनन्द के तरंग में बह जाने के लिये एकत्रित नहीं हुए हैं। बल्कि इस महोत्सव का आयोजन यहाँ इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर  किया जा रहा है, जिससे हमलोग स्वामीजी की शिक्षाओं को कार्य में उतारने के लिये अपनी समस्त शक्तियों को  नियोजित कर देने का सामर्थ्य अर्जित कर सकें। उन्होंने क्या शिक्षा दी थी ? क्या वे यही चाहते थे कि सभी लोग उनका गुणगान करते रहें?  कदापि नहीं ! हमलोग जानते हैं कि वे भीतर से नाम-यश को घृणा करते थे। क्या वे यह चाहते थे कि हम सभी लोग मिलकर उनके गुरु श्रीरामकृष्ण के नाम को सम्पूर्ण विश्व में फैला दें ? नहीं, वे यह भी नहीं चाहते थे ! फिर क्या वे यह चाहते थे कि उनके किसी विशेष सिद्धान्त या अनुष्ठान-पद्धति को सभी के लिये स्वीकार करना अनिवार्य होगा ? नहीं, वे ऐसा भी नहीं चाहते थे। तो फिर वे चाहते क्या थे?" इन प्रश्नों को उठाने के बाद इसका उत्तर देते हुए भगिनी निवेदिता कहती हैं- "वे केवल इतना ही चाहते थे कि सभी व्यक्ति स्वयं अपने ही पैरों पर खड़े होना, (अर्थात परा और अपरा विद्या में संतुलन रखना ) सीख जायें और मनुष्य बनें।"
क्योंकि युगाचार्य दार्शनिक स्वामी विवेकानन्द की ऋषि-दृष्टि के सम्मुख इस समस्त जगत-प्रपंच के भीतर, सृष्टि में अन्तरलीन जो सत्य (ब्रह्म) है, वह एक ही मुहूर्त में बिजली की चमक के सदृश प्रकट हो उठा था ! इस जगत-प्रवाह के पीछे जो रहस्य छुपा हुआ है- उसके सारांश को उद्घाटित करते हुए स्वामी विवेकनन्द ने जो कहा था, उसे परमपूज्य नवनीदा ने 'विवेकानन्द-दर्शनम्' मे इस प्रकार लिखा है-'After all, this world is a series of pictures.' This colourful conglomeration expresses one idea only. Man is marching towards perfection. That is ' the great interest running through. We were all watching the making of men, and that alone.'

    ' नान्यदेका चित्रमाला जगदेतच्चराचरम्।
     
       एष वर्णमयो वर्गो भावमेकं प्रकाशते।।

          मानुषाः पूर्णतां यन्ति नान्या वार्ता तु वर्तते। 
         
          पश्यामः केवलं तद्धि नृनिर्माणं कथं भवेत्।। "

" सब कुछ होने के बाद भी, यह संसार एक सतत परिवर्तनशील चित्रों की श्रृंखला के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। तथा इस  धारावाहिक चित्रों की सतरंगी श्रृंखला (घूस देने वाले और घूस लेने वाले दोनों को कष्ट होता देखने) के माध्यम से जो एकमात्र सर्वोच्च अभिप्राय व्यक्त हो रहा है वह है - मनुष्य निर्माण !  

अपने भ्रमों भूलों को त्यागता हुआ मनुष्य धीरे धीरे ब्रह्मत्व प्राप्ति (सृष्टि या क+मन को निरुद्ध करके 
ब्रह्म को जान लेने की दिशा या ब्रह्मविद मनुष्य बनने) की दिशा में अग्रसर हो रहा है। हमलोग जो कुछ भी देख रहे हैं, उसका अर्थ मनुष्य-निर्माण के सिवा और कुछ नहीं है।

ईश्वर, जीव और जगत - के स्वरूप तथा इनके बीच परस्पर-संबंध के विषय मे जितने भी सच्चे सद्ग्रंथ हैं-उन सब का सार-संदेश इतना ही है। सम्पूर्ण जगत-प्रपंच का समग्र विवरण इतने संक्षेप में,तथा इससे अधिक सरल भाषा मे देना संभव नहीं है। समस्त दर्शन-शास्त्रों का उद्देश्य इतना ही है कि जो कुछ दिख रहा है, उसकी एक समग्र धारणा निर्मित हो जाय।


बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि आचार्य शंकर ने भी इसी प्रकार  की एक सामग्रीक धारणा (वेदान्त) को बहुत संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त सार गर्भित संदेश निम्न श्लोक में दिया था -" करोड़ो शास्त्रों के माध्यम से जिस ' बात ' ( वस्तु-विचार, सत्य-असत्य और मिथ्या का विवेक ) को समझाने का प्रयत्न किया गया है, उसको मैं आधे श्लोक में कहता हूँ - 

 ' ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:। ' 

-अर्थात ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, तथा जीव ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। " यद्यपि उनके इस श्लोक की बहुत गलत ढंग से व्याख्या करने की चेष्टा होती रही है, किन्तु जो कुछ वास्तव मे कहा गया है, उसकी अविकृत और सच्ची व्याख्या यही है। इस सतत गतिशील एवं परिवर्तनशील विश्व-ब्रह्माण्ड के पीछे जो इसका एक गहरा अर्थ है, उसकी एक झलक स्वामीजी के इस संदेश में देखी जा सकती है-  


" हमलोग जो कुछ भी देख रहे हैं, उसका अर्थ मनुष्य-निर्माण के सिवा और कुछ नहीं है। "
  
 स्वामी विवेकानन्द की यह व्याख्या आपात शून्य-गर्भ प्रतीत होने वाली अर्थ हीन चित्रों की शृंखला रूपी जगत-प्रवाह में जो गहरा अर्थ छिपा हुआ था, उसको सर्वसाधारण के समक्ष प्रकट कर देती है ! स्वामीजी इस जगत को असत्य या मिथ्या नहीं मानते थे, उनकी दृष्टि मेँ इस जगत-प्रवाह का एक गहरा अर्थ था। (वे जानते थे, हमलोग  विवेक-जागृत करके सत्य-असत्य और मिथ्या में से ज्ञान को आविष्कृत कर सकते हैं।) स्वामी विवेकानन्द ने जिस नव-वेदान्त या व्यवहारिक वेदान्त का प्रचार किया था, उसमें इसी अर्थ ने गतिशीलता का संचार  किया था। इसिलये उनके समर-गीत में बस एक ही धुन सुनाई देता है, 
 " चलते रहो, चलते रहो ! - ' चरैवेति चरैवेति ' ! " 
इस युग के ईश्वर श्रीरामकृष्ण के आदर्श-व्यक्तित्व के प्रकाश को सर्वत्र फैला देने के लिये, उनका सन्देश-वाहक बनकर स्वामी विवेकानन्द मध्याह्न के प्रखर-सूर्य के समान उदित हुए थे। एवं अपने ज्ञानालोक से प्राच्य और पाश्चात्य दोनों गोलार्धों को उन्होंने जिस प्रकार प्रकाशित कर दिया था ; उसका वर्णन उन्नसिवीं सदी के एक अंग्रेजी कवि आर्थर (Arthur Hugh Clough) की भाषा में इस प्रकार किया जा सकता है -

SAY not the struggle naught availeth, .... 

And not by eastern windows only,
  

 When daylight comes, comes in the light;
 

In front the sun climbs slow, how slowly!
  

 But westward, look, the land is bright! 

" और केवल पूर्व दिशा की खिड़कियों से ही नहीं,
    

जब मध्याह्न का मार्तण्ड उदित होता है,

तो सभी दिशायें प्रकाशित हो जाती हैं;
 

देखो कैसे सामने उदित हो रहा है रवि- धीरे, बहुत धीमी गति से;
     

लेकिन पश्चिम की ओर देखो ! सम्पूर्ण धरा आलोकित है !

[Don’t say that the long struggle ' against tyranny and injustice ' is of no avail; don’t say that all your efforts, and all the injuries you’ve sustained, were in vain. Don’t say that the enemy’s just as strong as ever; and don’t say that nothing’s changed for the better! 
 Look! The eastern window you’re sitting at ; isn’t the only place affected by sunrise; from there, yes, it’s true, the sun (teachings of SriRamakrishna) hardly seems to moving up the sky at all— but cross the room and look through a westward-facing casement (through swami Vivekananda ): see how the whole landscape’s already flooded with light!]

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, " जगत मे प्रकाश ले आओ। दरिद्र व्यक्तियों को प्रकाश दो (प्रबुद्ध बना दो), और जो धनी हैं उनको और अधिक प्रकाश दो, क्योंकि उन्हें प्रकाश की अवश्यकता सबसे अधिक है। अशिक्षित लोगों को प्रकाश दो, लेकिन जो शिक्षित हैं, उनको और अधिक प्रकाश दो। क्योंकि इस युग मे शिक्षा का अहंकार बहुत भयावह है। इसी प्रकार सभी के लिये प्रकाश ले आओ, उसके बाद सबकुछ प्रभु के ऊपर छोड़ दो। " 
चित्त-वृत्तियों का निरोध: स्वामीजी कहते हैं, " हम सत्य की प्राप्ति के लिये सदा प्रयत्नशील रहते हैं। किन्तु मानवात्मा की आभ्यंतरिक सृष्टि (क +मन ) ही ईश्वर को अच्छादित कर देती है, इसीलिये ईश्वर के आदर्शों में इतनी भिन्नतायें हैं। जब यह सृष्टि रुक जाती है, तभी हम ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं। यह ब्रह्म आत्मा में है, सृष्टि में नहीं।  अतः सृष्टि को निरुद्ध करके हम ब्रह्म को जान सकते हैं।"
" जब हम अपने विषय में सोचते हैं, तो अपने को एक स्त्री या पुरुष शरीर के रूप में सोचते हैं, और जब ईश्वर के विषय में सोचते हैं, तो उसकी भी कल्पना देहधारी के रूप में ही करते हैं। (सृष्टि का निरोध करना अर्थात) ऐसा प्रयत्न करना जिससे आत्मा प्रकट हो जाय, यही मनुष्य का कर्तव्य है। इसकी साधना मनःसंयोग सीखने से ही आरम्भ होती है। मनःसंयोग सीखने का लक्ष्य एकाग्रता की प्राप्ति है। यदि तुम एक क्षण के लिये भी पूर्णतया निश्चल हो सको, तो तुम लक्ष्य तक पहुँच गये। " 
" इसके बाद भी बुद्धि कार्य करती रहेगी, परन्तु वही पुरानी बुद्धि (स्वयं को स्त्री या पुरुष शरीर समझने वाली बुद्धि ) नहीं रह जायेगी। तुम, अपने को उसी रूप में जान लोगे, जो तुम हो-अर्थात अपनी यथार्थ आत्मा ! क क्षण के लिये अपनी चित्त-वृत्ति का निरोध कर लो, तब तुम्हारे यथार्थ स्वरुप की सत्यता तुम्हारे हृदय में बिजली के सामान कौंध जायेगी, तब मुक्ति हस्तगत हो जाती है और इसके बाद कोई बन्धन नहीं रह जाता। " २/२५६" 
" एक बात जो मैं सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट देखता हूँ, वह यह कि अज्ञान ही दुःख का कारण है और कुछ नहीं। जगत को प्रकाश कौन देगा ? भूतकाल में बलिदान का नियम था और अफ़सोस युगों तक ऐसा ही रहेगा। संसार के वीरों को और सर्व-श्रेष्ठों को ' बहुजनहिताय, बहुजन सुखाय ' अपना बलिदान करना होगा। असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों की आवश्यकता है।"  
" चिकने-चुपड़े पर तेल लगाना पागलों का काम है। दरिद्र, पद दलित तथा अज्ञ लोग तुम्हारे ईश्वर बनें। अपने में ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करने का यही एकमात्र उपाय है कि इस विषय में दूसरों की सहायता की जाय। " 
अर्थात मानव जाति को ऐसे मार्गदर्शक नेताओं की आवश्यकता है, जो युवाओं को ' मनुष्य बनो और बनाओ ' या ' Be and Make ' की पद्धति (3'H' के विकास) का प्रशिक्षण देने में समर्थ हो।
Direct perception या आत्मसाक्षात्कार: स्वामी विवेकानन्द ने ब्रह्म को प्रत्यक्ष धारणा (Direct perception या आत्मसाक्षात्कार के द्वारा) के द्वारा जाना था। इतना ही नहीं उन्होंने नरदेह-धारी ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) के श्री-चरणों का स्पर्श भी किया था। वे जानते थे कि ईश्वर सर्वत्र विराजमान हैं। वे यह भी जानते थे कि ' अहं ब्रह्मास्मि- मैं ही ब्रह्म हूँ !' इस सत्य को अपने अनुभव से जान लेना ही मनुष्य जीवन की चरम उपलब्धी है। फिर भी जब वे अपने गुरु से निर्विकल्प समाधि में लीन रहने की इच्छा व्यक्त किये थे, तो उनके गुरु ने प्रसन्न होने के बजाय उनको हलकी झिड़की लगाई थी। 
' अमृतत्व ' (निर्विकल्प समाधि) का त्याग: किन्तु उस झिड़की के बाद ही नरेन्द्र का नव-जन्म हुआ था। वे उसी दिन द्विज (विवेकानन्द) हो गये थे। क्योंकि इस भर्त्सना के बाद ही स्वामीजी उस वेद-वाक्य (?) के मर्म को धारण कर सके थे, जिसका अर्थ होता है- " कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो अमृतत्व प्राप्त करने के लिये मृत्यु तक का वरण कर लेते हैं; किन्तु कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं-जो सभी मनुष्यों का कल्याण करने के उद्देश्य से, अमृतत्व  तक का त्याग कर देते हैं ।" 
हमलोग यह समझ सकते हैं कि बाद वाला आदर्श ही सर्वोच्च आदर्श है। (एवं सभी प्रकार के आदर्शों में यही स्वामी विवेकानन्द रूपी 'गरुड़ावतार' ही सर्वोच्च आदर्श है !)
इसीलिये उनके गुरुदेव ने अपने हाथों से एक ' चपरास ' लिखा था- " नरेन् शिक्षा देगा।" तथा सार्वजनिक रूप से घोषित किया था, " नरेन्द्रनाथ वास्तव में नर-रूपी नारायण है ! जीवों की दुर्गति को दूर करने के लिये ही इसने एक बार पुनः शरीर धारण किया है ! " 
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने मानवमात्र के कल्याण के उद्देश्य से बाद वाले आदर्श, ' अमृतत्व ' (निर्विकल्प समाधि) का त्याग करके जन-कल्याण के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया था। श्रीरामकृष्ण ने कहा था, " इस युग में सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में इतने उच्च कोटि का आधार और कभी नहीं आया  था! "  'इस प्रकार के ऋषि इस विश्व में बहुत कम ही होते हैं। 
प्रेम-प्रयोग :  इसी बात को प्राचीन काल के राजा-कवि-दार्शनिक भर्तृहरी एक श्लोक में बड़े सुन्दर ढंग से कहा है -
 
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः-

त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभि: प्रीणयन्तः। 

परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,

निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ॥

( तात्पर्यम्: सज्जनानां स्वभावं वर्णयति कविः । सत्पुरुषाणां वचांसि मनांसि शरीराणि च अमृतेन पूर्णानि भवन्ति । तादृशेन अमृतपूर्णेन वचनेन, चेतसा, शरीरेण च ते सज्जनाः उपकारसहस्रेण लोके स्थितानां सर्वेषां जीविनामपि हितम् आचरन्ति । अपि च अन्येषु स्थिताः गुणाः अल्पाः चेदपि तान् एव बहु मत्वा, मनसि सन्तोषम् अनुभवन्ति । किन्तु एतादृशाः जनाः जगति कियन्तः सन्ति ?)
अर्थात -ऐसे सन्त समाज में कितने हैं; जिनके कार्य , मन तथा वाणी पुण्यरूप अमृत (पवित्रता ) से परिपूर्ण हैं, और जो सभी मनुष्यों का बहुत प्रकार से कल्याण करके त्रिभुवन को आनन्दित करते हैं? वे लोग त्रिभुवन को  किस उपाय से आनन्दित करते हैं ? किसी के भीतर यदि परमाणु के जितना छोटा भी गुण दिखता है, उसे वे पर्वत के जितना विशाल देखते और बखान करते हैं, और इस प्रकार अपने हृदय को सदैव विकसित करते रहते हैं। राजा कवि भर्तृहरी कहते हैं, ऐसे सन्त जो ' प्रेम-प्रयोग ' करके दूसरों के परमाणु तुल्य या  अत्यंत स्वल्प गुण को भी- पर्वत प्रमाण बढ़ा कर अपने हृदयों का विकास साधन करते हों, संसार में बहुत कम पाये जाते हैं।
आचार्य शंकर ने भी कहा हैं -

 शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो
    वसन्तवत् लोकहितं चरन्तः  |
   तीर्णाः स्वयं भीम-भवार्णवं  
     जनान् अहेतुना अन्यान् अपि तारयन्तः ॥३७||
( विवेकचूडामणि/ ३९)
इस भयंकर संसार-सागर से स्वयं तरे हुए शांत और महान् सज्जन पुरुष वसंत ऋतू के समान लोक-हित करते हुए बिना कारण दूसरे लोगों को तारते (making cross) हुए सदा निवास करते हैं। जब कोई मनुष्य इस नश्वर नाम-रूपात्मक जगत के पृष्ठभूमि में अवस्थित अविनाशी सत्य (अस्ति-भाति-प्रिय) का साक्षात्कार कर लेते हैं, वे इस जन्म-मृत्यु के सागर से तर जाते हैं। अर्थात
 ( 'क' +मन या नाम-रूप) जगत के पदार्थों को 'मैं' और 'मेरा' मानने की प्रवृत्ति या आसक्ति के बंधन से मुक्त हो कर परम शान्ति का अनुभव करते हैं। तब उनका दिल पिघलना शुरू कर देता है,अर्थात उनका ह्रदय अत्यन्त विशाल और उदार हो जाता है 
वे बिना किसी स्वार्थ के (अकारण) ही बसंत-ऋतू की तरह केवल परोपकार करने के उद्देश्य से भारत के गाँव-गाँव तक स्वामीजी के सन्देश "Be and Make " - ' मनुष्य बनो और बनाओ ' को पहुंचा देने के लिये  लोक-कल्याण के कार्य में निरन्तर लगे रहते हैं। वैसे शान्त (बुद्ध के जैसा magnanimous या महामनस्क-उदार,), महात्मा, सज्जन मनुष्य  सत्य का संदेश (3H मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण की ' शिक्षा ') फैलाने, अपने पैरों पर खड़े होने की पद्धति  लोगों को समझाने, के लिये व्याकुल हो जाते है।  ‘विगत मान सम सीतल मन’ सज्जनों को अभिमान छू तक नहीं जाता। सज्जन पुरुष दूसरों का उपकार करते हुए भी अपने को ही उपकृत समझते हैं। ‘मन अभिमान न आणे रे’। वे अपने को निमित्त मात्र समझते हैं। वे अपने में कर्ता बुद्धि को आने नहीं देते। 
ठीक वैसे ही इस युग के आह्वान (युगावतार श्रीरामकृष्ण के सन्देश) को सभी मनुष्यों तक पहुंचा देने के लिये, श्वेत-बर्फ से आच्छादित हिमालय की चोटियों जैसी प्रशान्त गंभीर अध्यात्मिक-ज्ञान के सर्वोच्च शिखर से विवेकानन्द के अमृत-वचन रूपी ज्ञान-गंगा हम भारत वासियों को पुनरुज्जीवित करने के लिये नीचे उतर आई है।
गुरु स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुध्द जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिनका चित्त ब्रह्मनुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे।"
"मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः- यही मेरा धर्म है।" 
 उसी प्रकार आचार्य शंकर ने भी जीवन-मुक्ति का सूत्र देते हुए कहा था -
दुर्जन: सज्जनो भूयात
सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।
शान्तो मुच्येत बंधेम्यो
मुक्त: चान्यान् विमोच्येत् ॥

दुर्जन लोग सज्जन अर्थात चरित्रवान मनुष्य बनेंगे, चरित्रवान मनुष्य शान्ति को प्राप्त होंगे। शान्त लोग बन्धन से मुक्त हो जायेंगे, मुक्त लोग दूसरों को बंधन से मुक्त करेंगे। आचार्य शंकर मूर्ख मनुष्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं,
इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति ।
 दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम् ॥ ५ ॥ 
 
( इतः= इस से, कः = कौन,  नु= वास्तव में, अस्ति= है, मूढात्मा= मोहग्रस्त मनुष्य, यः= जो,  तु= अब भी, स्वार्थे=स्वयं के सर्वोत्तम हित में, प्रमाद्यति=उपेक्षा करता है, दुर्लभं=दुष्प्राप्य, मानुषं= मानव,  देहं=  शरीर, प्राप्य= प्राप्त करके, तत्र= उसके उपर, अपि= साथ ही, पौरुषम्= साहसिकता )
वास्तव में सबसे अधिक मोहित व्यक्ति या मूर्ख व्यक्ति कौन होता है ? जो आलस्यवश कभी-कभी मिलने वाले इस दुर्लभ मानव-शरीर को, तथा उसके भी उपर साहसिकता या यौवन का तेज प्राप्त करके भी, स्वयं के  सर्वोत्तम हित (चरित्रवान मनुष्य बन जाने) की साधना में उपेक्षा करता है, वही सबसे अधिक मूर्ख या मोहित व्यक्ति है !
दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् । 
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुष संश्रयः ॥

[दुर्लभं= बहुत कठिनाई से प्राप्त होने वाले, त्रयम् = तीन, एव= केवल,  एतद् =इन, देवानुग्रहहेतुकम् ईश्वर की अहैतुकी कृपा से ही प्राप्त होते हैं, मनुष्यत्वं= मानव-शरीर, मुमुक्षुत्वं= मुक्त हो जाने की तीव्र व्याकुलता, महापुरुषसंश्रयः = महान (जो भव-सागर से पार करके दूसरों को भी पार कराने का सामर्थ्य रखते हों) लोगों के साथ सीधा संपर्क।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः (इति) एतत् त्रयं दुर्लभं देवानुग्रहहेतुकम् एव ।  भगवत्कृपा ही जिनकी प्राप्तिका कारण है वे मनुष्यत्व, मुमुक्षुत्व (मुक्त होनेकी इच्छा) और महान् पुरुषों का संग (सद्गुरु) - ये तीनों ही दुर्लभ हैं।  भगवन्त दुर्लभ नहीं है, सच्चे सन्त (वसन्त ऋतू की तरह निःस्वार्थ परोपकारी ) का मिलना दुर्लभ है।
लब्ध्वा कथश्चिन्नरजन्म दुर्लभं
तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्।
यः स्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढ़धीः
स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात्।। 4 ।।

किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्यजन्म को पाकर और उसमें भी, जिसमें श्रुतिके सिद्धान्त का ज्ञान होता है ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढ़बुद्धि अपने आत्माकी मुक्ति के लिये प्रयत्न नहीं करता, वह निश्चय ही आत्मघाती है; वह असत् में आस्था रखने के कारण अपने को नष्ट करता है।
'चरित्रवान मनुष्य ' बन जाने के एक निरन्तर संग्राम का नाम है-जीवन । भगिनी निवेदिता के माध्यम से युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, -"मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'साहसी' शब्द और उससे अधिक 'साहसी' कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार - बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?"
 " Be and Make ! ' मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ'  - यही हमारा उद्देश्य बने। " 
  - वे कहते थे,"अतीत मे भी आत्मत्याग ही कर्म का रहस्य था, अफ़सोस युगों युगों तक ऐसा ही चलता रहेगा।
"उठो, सिंह स्वरूप होकर भी तुमलोग अपने को भेंडो के समान समझ रहे हो, आओ, इस भ्रम को दूर हटा दो! तुम तो अजर-अमर आत्मा हो, मुक्त सनातन और आनन्दमय हो ! तुम लोग जड़ नहीं हो, तुमलोग देह नहीं हो, जड़ तो तुम्हारा दास है। तुमलोग जड़ के दास नहीं हो। यदि तूँ केवल अपनी मुक्ति के लिये साधना करना चाहता है, तो तूँ जहन्नुम में जायेगा। ...यदि दूसरों का कल्याण करने के लिये, यदि तुझे नरक मे भी जाना पड़े तो, तो उसमें हानी ही क्या है ? स्वार्थपरता के साथ स्वयं स्वर्ग प्राप्त करने की अपेक्षा क्या यही ज्यादा अच्छा नहीं है? " 
उन्होने सच्चा जीवन प्राप्त करने की शिक्षा दी थी। हृदय का विस्तार करने या विकसित करने और वैश्विक प्रेम की शिक्षा दी थी। त्याग और सेवा का आदर्श दिया था, पौरुष और भय-शून्यता का सन्देश दिया था। उनकी दृष्टि में ईश्वर भी ब्रह्म हैं, मनुष्य भी ब्रह्म है, फिर यह जगत भी ब्रह्म ही हैं। इसीलिये उनका आह्वान विश्व को भगवद-भाव से सम्पन्न करने के लिये नहीं था, बल्कि यथार्थ मनुष्यत्व को विकसित करने के लिये था।' आध्यात्मिक प्रयोग-वाद ' की अपरिहार्य भित्ति भी यही है । उनके आह्वान में ही पुनः ध्वनित हुआ था प्राचीन वेदमन्त्र - 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम'- सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात संस्कृतिवान बना दो। जो जिस स्थान पर है, उसको उन्होंने उसी स्थान पर उन्होंने ग्रहण किया था, तथा और उसके जीवन को उन्नत बना दिया था।
ब्राउनिंग [Robert Browning (1812-1890)] की इस कविता में उनके इसी परिकल्पना की झलक देखी जा सकती है -Progress is The law of life: man is not Man as yet. (man with capital M )
 Progress, man's distinctive mark alone,
 

Not God's, and not the beasts: God is, they are;
 

Man partly is, and wholly hopes to be. 
  
 " उन्नति की आशा - केवल मनुष्यों की है विशिष्ट पहचान !  
   
  तो पशु प्रजातियों की, और नहीं है भगवान की पहचान ।   

 ब्रह्म तो हैं ही पूर्ण, रहते सदा स्व-महिमा में स्थित,
    
पशु-प्रजातियाँ हैं बँधी, जो थीं -रहती उम्रभर उसी में ग्रथित।   
  
मनुष्य है अपूर्ण, फिर भी उसे आशा -' पूर्ण ' बन जाने की है।

जन्म-मृत्यु से होता हुआ, बढ़ता जाता है वह पूर्णत्व की ओर !

 -अर्थात उन्नति, आरोहण या संसार-सागर से पार-गमन (crossing) की चेष्टा करने की आवश्यकता ईश्वर को नहीं है, पशुओं में तो इसकी क्षमता भी नहीं है, यह केवल मनुष्यों का ही वैशिष्ट्य है। ईश्वर तो पूर्णता में ही विराजमान रहते हैं, उनके आरोहण (ascension) का तो प्रश्न ही नहीं उठता। पशु की प्रजातियाँ (गाय-भैंसें,गधे आदि)  चिर काल में जैसे थे, आज तक  वैसी ही हैं। किन्तु अपूर्ण होने पर भी मनुष्य पूर्णता में पहुँचने की आशा लेकर उन्नति के लिये प्रयत्न करता है।
धर्म का अर्थ जीवन भर केवल तात्विक-ज्ञान या धार्मिक-सिद्धान्तों (विभिन्न मतवादों) के उपर विवेचना करते रहना ही नहीं है। स्वामी विवेकानन्द के लिये धर्म का अर्थ है- 'being and becoming'- प्रयत्न करते करते पूर्ण (perfect मनुष्य) बन जाना ! अर्थात मैं स्वयं को (self को) जो (आत्मा) समझता हूँ, और अपने आदर्श के रूप में जिस प्रतिक (परमात्मा रूपी पूर्ण-निःस्वार्थी मनुष्य श्रीरामकृष्ण) या ईष्ट पर आस्था रखता हूँ या विश्वास करता हूँ, मेरी सम्पूर्ण सत्ता का उसी वस्तु में रूपान्तरित हो जाना ! इसीलिये स्वामीजी कहते हैं, निःस्वार्थपरता को ही ईश्वर मानते थे, और कहते थे - " निःस्वार्थपरता ही नीति- ' धर्माचार या Morality ' है; और स्वार्थपरता ही दुर्नीति - 'भ्रष्टाचार या Corruption' है। हे शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो ! कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष , निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो-सारा धर्म इसी में है।"
प्रवृत्ति (गृहस्थाश्रम) और निवृत्ति (संन्यास मार्ग) उनके लिये कर्म-प्रवणता और कर्म-विमुखता के पर्यायवाची शब्द नहीं थे। उनका मानना था कि स्वार्थ से प्रेरित होकर कर्म करना प्रवृत्ति है, तथा स्वार्थ-रहित होकर कर्म करना निवृत्ति है। स्वामीजी जानते थे कि जीवन एक निरन्तर संग्राम का नाम है। किस चीज के लिये संग्राम? यह जीवन जंजीरों को तोड़ देने, समस्त बाधाओं को अतिक्रमण करने, ('क+मन की चाहरदीवारी को भी अतिक्रम कर जाने ') का निरंतर संग्राम है ।

ईश्वर और मनुष्य  : किसी विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक ने कहा था- " यदि भगवान भी किसी बुद्धिमान मनुष्य के जैसे होते तो  निश्चित रूप से उनका दिमाग गणित के विषय में अत्यन्त निपुण होता।" स्वामीजी ने भी मनुष्य और ईश्वर की दो गणितीय परिभाषायें दी हैं। इन दोनों परिभाषाओं में उनके समग्र दर्शन की सांकेतिक अभिव्यक्ति के साथ उसके  वास्तविक प्रयोग एवं उपाय के बारे में भी इशारा किया गया है। स्वामीजी ने बार बार कहा है, ' यदि कोई भी तात्विक ज्ञान यदि प्रभावकारी और फलप्रसू नहीं हो, तो उसका कोई मूल्य नहीं है। वे कहते हैं, ज्ञान की बहुत बड़ी बड़ी बातें करने की अपेक्षा, उसे थोड़ा सा भी कार्य में उतार लेना अधिक अच्छा है।' इन दोनों परिभाषा में कहते हैं," मनुष्य एक ऐसा अनन्त वृत्त है जिसकी परिधि कहीं नहीं है, किन्तु उसका केंद्र बिंदु एक स्थान में स्थित है। और ईश्वर एक ऐसा अनन्त वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है, किन्तु उसका केन्द्र बिंदु सर्वत्र स्थित है।"  
उपरोक्त परिभाषा से मैक्स मूलर के इस कथन की सच्चाई सिद्ध हो जाती है कि भारतवर्ष में ईश्वर और मनुष्य के बीच का अन्तर बहुत ही कम है। दोनों ही अनन्त वृत्त हैं, जिनकी परिधि कहीं नहीं है। दोनों में अंतर केवल इतना ही है कि मनुष्य के क्षेत्र में केंद्र-बिंदु (आत्मा) एक स्थान में स्थित है, और ईश्वर के क्षेत्र में  यह केंद्र-बिंदु सर्वत्र है। अतः हम साधारण मनुष्यों या आम आदमी को ईश्वरत्व प्राप्ति की यात्रा पूरी करनी होगी।
पहले चरण की यात्रा:'man with capital M 'बनना। पहले हमलोगों को समस्त प्रकार की छोटी छोटी सीमाओं को तोड़ कर,मनुष्य बन जाना होगा। अर्थात पशुता (इन्द्रियों की दासता) को हटाकर मनुष्य बनना होगा। यहीं पर, इस बात की स्पष्ट धारणा हो जाती है कि हमलोगों को मनुष्य बनने के लिये अपने दैनिक जीवन में किन (पाँच) अभ्यासों को करना है और क्यों करना है ? हमें अपनी छोटी सी परिधि (M/F शरीर मात्र होने का सम्मोहन)  का अतिक्रमण करके उसी अनन्त वृत्त के समान बन जाना होगा जिसकी परिधि कहीं नहीं हो। मनुष्य बनने का यही अर्थ है।
 ऐसा मनुष्य बनने की प्रेरणा चरित्र के किन गुणों को अर्जित करने से प्राप्त होती है ? वे गुण हैं-प्रेम, आत्मोसर्ग (self-abnegation) की भावना, निःस्वार्थपरता, सहानभूति आदि (महामण्डल की हिन्दी पुस्तिका 'चरित्र के गुण' देखें)। मनुष्य बनने के मार्ग में कौन कौन से गुण बाधक हैं जिनका त्याग करना होगा ? वे दोष जिन्हें बाहर करना आवश्यक है-स्वार्थपरता, मन की संकीर्णता, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध आदि (महामण्डल की हिन्दी पुस्तिका 'नेति से इति' देखें।)
यथार्थ मनुष्य 'man with capital M ' बन जाने के बाद मेरे मन,वचन और कर्मों के द्वारा केवल कल्याण-कारी भाव ही प्रवाहित होंगे। मैं भी ' प्रेम-प्रयोग ' करूँगा - दूसरों के परमाणु तुल्य या  अत्यंत स्वल्प गुण को भी- पर्वत प्रमाण बढ़ा कर अपने हृदय का विकास साधन करूँगा, एवं अनेकों प्रकार के कल्याणकारी कर्मों के माध्यम से त्रिभुवन को आनन्दित करूँगा। इस प्रकार मेरा हृदय अनन्त विस्तार को प्राप्त हो जायेगा, जिसकी परिधि कहीं नहीं होगी।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता"।
दूसरे चरण की यात्रा :(The next phase of work '- ईश्वर बन जाने की साधना,' विवेक-प्रयोग ' और ' आत्म-मूल्यांकन ' का अभ्यास करना होगा। जो कार्य मुझे करना है, वह है स्वयं ईश्वर (ब्रह्मविद) बन जाने का अभ्यास ! मैं अपने जीवन में यथासंभव सत्य और प्रेम की प्रस्थापना करूँगा तथा मतान्धता, संकीर्णता और विद्वेष को निर्मूल कर दूँगा। सभी मनुष्यों से प्रेम और सहानुभूति का अनंत वृत्त बन जाने के बाद भी मेरा केंद्र-बिंदु, देहाध्यास के कारण मनुष्यों में जो क्षूद्र 'मैं'-पन होता है, इस शरीर के नाम और रूप के परिचय को मैं अपने स्वरुप का परिचय नहीं मानूँगा। 
स्वामीजी कहते हैं, " भारतीय कुशल-प्रश्न, ' How do you do ?' नहीं है, यहाँ पूछा जाता है-'आप स्वस्थ तो हैं?' अर्थात आप अपनी अविनाशी आत्मा में स्थित हैं, या अपने को केवल नश्वर शरीर (नाम-रूप) में ही स्थित समझते हैं ? अपने 'स्व' में स्थित व्यक्ति (स्वस्थ-व्यक्ति) के संकल्प को ही 'Self-Confidence ' या आत्मविश्वास कहा जाता है।"
जिसमें ऐसा आत्मविश्वास नहीं हो उसे ही स्वामीजी 'नास्तिक ' या अस्वस्थ मनुष्य कहते थे। इसीलिये अब मैं भी अपने को (मिथ्या नाम-रूप या) शरीर में स्थित न मान कर ' स्व ' में स्थित रहने का अभ्यास करूँगा। मैं मात्र ' कायस्थ ' (काया में स्थित) नहीं रह कर 'स्व' में (Self में ) स्थित रहने का अभ्यास (मन को निरन्तर अपनी आत्मा या ठाकुर में एकाग्र रखने अभ्यास) करके ' स्वस्थ ' मनुष्य बन जाउँगा ! मेरे हृदय-केंद्र से निसृत सर्वग्रासी प्रेम के बाढ़ का प्रवाह इस एक ही स्थान (देह के नाम-रूप ) में आबद्ध केंद्र-बिंदु (अहं) को उखाड़ कर बहा ले जायेगी। जितने सारे दूसरे मनुष्य हैं, मनुष्येत्तर प्राणी हैं, यहाँ तक कि जितने भी स्थावर और जंगम वस्तुयें हैं, सभी मेरे स्वरुप के साथ एकाकार हो जायेंगे, और अपने ही केंद्र-बिंदु (बिल्कुल अपनी आत्मा) प्रतीत होने लगेंगी। मैं सम्पूर्ण सृष्टि के साथ एकत्व की अनुभूति करूँगा।
इसको ही ईश्वर बन जाना कहते हैं। तत्व-ज्ञान की सार-बात बस इतनी ही है, इसके बाद जो भी विवेचनायें की जाती हैं,वे केवल ज्ञान के सामान्य विवरण हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति इस विवरण से अपने लिये आवश्यक जीवन-गठनकारी सूचनाओं को चुन सकता है, और उनकी सहायता से लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकता है।
परस्पर विरोधी भावों का समन्वय करने में समर्थ युवा: इसीलिये स्वामी विवेकानन्द किसी निर्दिष्ट और अपरिवर्तनशील रुढ़िवादी (stereotype) विचार-धारा, मतवाद (dogma), धर्ममार्ग, या किसी विशिष्ट पूजा-पद्धति के प्रवक्ता नहीं हैं। उन्होंने भावी युग के लिये एक ऐसी अद्भुत (prodigious) समग्र और सामूहिक कार्यक्रम (schedule) दिया है, जिसके द्वारा समस्त देशों,सभी जातियों, समस्त धर्मों और दर्शनों को मानने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की समस्त आवश्यकताएं पूर्ण हो सकती हैं। स्वामी विवेकानन्द ने अपने विराट व्यक्तित्व में सम्पूर्ण मानव-जाति के उन्नत भविष्य के लिये उपरी तौर से परस्पर विरोधी दिखने वाले समस्त भावों को समावेशित कर लिया था।
उनके जीवन और संदेशों को ध्यान-पूर्वक देखने से-आध्यात्मिक और भविष्यत्, विश्वास और तर्कवाद, धर्म और विज्ञान, ज्ञान और कर्म आदि के बीच उपरी तौर जो विरोधाभास दिखाई देता है, वह सब समाप्त हो जाती है। इतना ही नहीं, उनके जीवन और संदेशों में लौकिक और पारलौकिक, सन्यास और परिवार, व्यक्ति और समाज, गहराई और चौड़ाई, पूर्व और पश्चिम, भूत और भविष्य, विश्वास और तर्क, धर्म एवं विज्ञान, ज्ञान तथा कर्म आदि विषयों में उपरी तौर से जो विरोधिता प्रतीत होती है, वे सब केवल समाप्त ही नहीं होते, बल्कि  इन सबों के बीच एक अभूतपूर्व समन्वय भी दिखाई देता है।  
भावी मानव-सभ्यता का निर्माण कार्य में जुट जाने के लिये स्वामीजी ने खास तौर से बलिष्ठ और बुद्धिमान युवाओं का आह्वान किया था। वे तीक्ष्ण मेधा और बलिष्ठ भुजाओं के साथ एक ऐसे हृदय का निर्माण करना चाहते थे, जो फूलों से भी अधिक कोमल होने का साथ साथ बज्र से भी अधिक शक्तिशाली हो-

वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥
 
स्वस्य विषये वज्रादपि कठोरम्, अन्येषां विषये कुसुमादपि मृदु मनः येषां पुरुषश्रेष्ठानां भवति तादृशानां मनसः अवगमने कः समर्थः ? बाहर से वज्र जैसे कठोर दिखने वाले महापुरुषों का अंतःकरण वास्तव में पुष्प के जैसा कोमल होता है। ऐसे परसपर विरोधी भावों को धारण करने वाले लोकोत्तर (ब्रह्म-विद) पुरुषश्रेष्ठ के ह्रदय को कौन समझ सकता है ?
अपना सुधार करने के विषय में बज्र से भी ज्यादा कठोर, किन्तु दूसरों (जो अब भी मोहित हैं) के लिये फूल की तुलना में भी नरम - ऐसे परसपर विरोधी भावों को धारण करने वाले लोकोत्तर (ब्रह्म-विद) पुरुषश्रेष्ठ के ह्रदय को कौन समझ सकता है ? वे ही वन्दनीय हैं, वे महात्मा हैं, वे धन्य हैं तथा उनका यश इस संसार में स्थिर है जिन्होंने प्रकाश-दीप बनकर लोक को आलोकित किया।
युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ' तुम्हें भी अपने जीवन में ' क्षात्र-वीर्य और ब्रह-तेज ' इन दो आपात परस्पर विरोधी भावों का समावेश करके, संसार में नये युग की शुरुआत (origination) करनी होगी। यही सन्देश यजुर्वेद में भी दिया गया है-" जहाँ ब्रह्मतेज  और क्षात्र-वीर्य एक साथ रहते हैं, केवल वहीँ पर पुण्याग्नि के साथ समस्त देवता निवास करते हैं। "
हमारे वैदिक ऋषिओं ने " क्षात्र-वीर्य" (सक्रीय सदाचार को स्थापित करने वाली साहसिकता Dynamic goodness of manliness) तथा "ब्रह्म-तेज" (सन्तसुलभ सर्व प्रेमी बुद्धि-या होश All loving intelligence of saintliness) का बहुत गुणगान किया है। भविष्य के गौरवशाली भारत के निर्माण का प्रारम्भ तभी होगा, जब हमारे देश के युवाओं के जीवन में  ' क्षात्रवीर्य ' और ' ब्रह्मतेज ' (जोश और होश ) साथासाथ एवं एक सामान आभा बिखेरेंगे।
इसी महान स्वप्न को अपने ह्रदय में संजोये हुए हमारे वीर शहीदों ने भारत-माता की बली वेदी पर अपनेप्राणों को न्योछावर कर दिया था। आज का युवा समुदाय अपनी चारित्रिक-शक्ति की संप्रभुता का दुन्दुभीनिनाद कर उनके स्वप्नों को साकार कर सकते हैं। भारत के युवाओं के समक्ष यही सबसे बड़ी चुनौती है।
यह चुनौती सबसे ज्यादा कठिन भी है,क्योंकि चुनौती से प्राप्त होने वाला -'जय या पराजय' ही हमारे भविष्य का स्वरूप निश्चित करेगा। इसका सारा उत्तरदायित्व युवाओं के कन्धों पर ही है। अपनी तथा अपनी प्यारी मातृभूमि को संकट में डालने का जोखिम उठा कर ही वे चाहें तो,इस चुनौती को अनदेखा कर सकते हैं।
इसीलिये जो युवा सच्चे हृदय से देश-कल्याण का कार्य करना चाहते हैं, उनको समदर्शी भी अवश्य होना होगा। तभी वे लोग ब्रह्मतेज के स्पर्श का अनुभव कर सकेंगे। इसके साथ साथ कार्य करने के लिये जिस रजोगुण की भी आवश्यकता होती है, उसी को क्षात्रवीर्य कहा जाता है। इस विषय के महत्व पर गीता के अन्तिम श्लोक में कहा गया है-  
       यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।
              तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।18/78।
 

" जिधर हैं कृष्ण मेहरबां,-योगेश्वर हैं खुद जहाँ ,
जिधर है साहबे कमाल, अर्जुन जैसा पहलवां।
 

वहीँ हैं शाद कामियां, वहीं खुश इंतजामियाँ,
वहीं हैं कामरानियाँ,  वहीं है शादमनियाँ।।

(II 78 II उर्दू अनुवाद बी. एन.शर्मा)

-हे राजन् ! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण (होश ) हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन (जोश ) हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है । स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं से भारत का पुनर्निर्माण करने के लिये इसी चुनौती को स्वीकार करने का आह्वान किया था !
" उपदेश तो तुझे अनेक दिये; कम से कम एक उपदेश को भी तो काम में परिणत कर ले। बड़ा कल्याण हो जायेगा। दुनिया भी देखे कि तेरा शास्त्र पढ़ना तथा मेरी बातों को सुनना, सार्थक हुआ है।"

"ऐसे कौन कौन युवा हैं, जो अपने नाम-यश और सुख भोगने की इच्छा को त्याग कर यहाँ तक कि इहलोक और परलोक की समस्त आशाओं को भी त्याग कर, अधोगति की धारा को उल्टा घुमा देने, और भारत को फिर से विश्व-गुरु बनाने के कार्य में कूद पड़ना चाहते हैं? बहुत से युवा किले की दीवारों (अपने मन की चाहार दिवारी ) को लाँघ कर, खण्डहरों को फिर से उठाने के कार्य में कूद पड़े हैं। उन्होंने इसी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। किन्तु अभी उनकी संख्या बहुत कम है, वैसे युवा हमें हजारों की संख्या में चाहिए, और वे अवश्य आयेंगे।"
 " किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है ? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।"
यदि उनका यह आह्वान हमलोगों के हृदय तक नहीं पहुंचे, तो स्वामीजी को महान कहना और उनका जय-जयकार करना व्यर्थ है। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त ' क्षात्र-वीर्य और ब्रह-तेज ' इन दो आपात परस्पर विरोधी भावों से समावेशित आदर्श को अपने हृदय में बसा लेने का समय आ गया है। भारत के हजारों हजार युवाओं को आगे आना होगा, जगत को यह दिखलाना होगा कि स्वामीजी के संदेशों को सुनना सार्थक हुआ है। भावी पीढ़ियों के लिये एक नया भारत गढ़ने का संकल्प धारण करके सभी युवाओं को जी-जान से जुट जाना होगा !
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[पाठचक्र :
स्वामीजी द्वारा प्रदत्त ' यथार्थ मनुष्य ' का आदर्श (साँचा ) के आलोक में प्रत्येक मनुष्य में स्वयं को केवल स्त्री-पुरुष (M/F) मानने या अपने को केवल साढ़े-तीन हाथ का शरीर मानने का जो देहाध्यास रहता है, उस देहाध्यास (या सम्मोहन) का (Direct perception या आत्मसाक्षात्कार) के द्वारा अतिक्रमण (transgression) करके;  ब्रह्म या अपने स्वरुप को प्रत्यक्ष जान कर, हमलोगों को भी उसी अनन्त वृत्त के समान ब्रह्म बन जाना होगा, जिसकी परिधि कहीं नहीं हो, किन्तु केंद्र सर्वत्र हो।
स्वामीजी युवाओं को 'यथार्थ -मनुष्य ' के  इसी आदर्श या साँचे में डाल कर गढ़ना चाहते थे। इसी मानव शरीर में सृष्टि को पूर्णतया निरुद्ध करके अपने स्वरुप या ब्रह्म की धारणा को प्रत्यक्ष रूप से जान कर यथार्थ मनुष्य ' बनने और बनाने ' की अपेक्षा रखते हैं।
स्वामी विवेकानन्द आज भी ' असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों की आवश्यकता को पूरा करने के लिये प्रतिमुहूर्त हजारों युवाओं के ह्रदय में आविर्भूत होकर ' Be and Make ' यथार्थ मनुष्य बनने और बनाने में सहायता करते हैं। आज भी हमारा मार्गदर्शन करने के साथ साथ पतन होने से हमारी रक्षा भी करते हैं।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं- " कुछ महापुरुष सप्तम भूमि या समाधी की सर्वोच्च अवस्था में पहुँचकर भगवद-बोध में विलीन हो जाने के बाद भी लोककल्याण के लिये उस भूमि से उतर आते हैं। समाधी के बाद भी वे इच्छापूर्वक
' विद्या का अहं ' रख लेते हैं। समाधी के बाद भी कोई-कोई 'मैं' को रख छोड़ते है- 'दास मैं या भक्त का मैं। ' शंकराचार्य ने लोकशिक्षा के लिये ' विद्या का मैं ' रख छोड़ा था। इसी प्रकार ज्ञानाग्नि में दग्ध हो जाने के बाद अहं का भी केवल आकार भर रह जाता है।"
 वह सशरीर सर्वगत समष्टिमन (universal mind) के रूप में अवतीर्ण होती है। जिस प्रकार अहंकार मूलक मन का जन्म कर्म बन्धन के अधीन होता है उसी प्रकार ईश्वर-कोटि पुरुष का अवरोहण कर्म बन्धन के अधीन नहीं होता। साधारण पुरूष अपनी अदम्य तृष्णा की प्रेरणा से बाध्य होकर जन्म लेता है किन्तु ईश्वर-कोटि का पुरुष भम्र तथा बन्धन के जगत् में फंसे हुए लोगों के प्रति असीम तथा सहज करुणा के कारण संसार में अवतीर्ण होता है।"
वे बद्ध-जीव जिन्हें ईश्वर की अनुभूति प्राप्त नहीं हुई है द्वैत की ही सीमा के भीतर रहते हैं, और विभिन्न क्षेत्रों में अनेक पारस्परिक लेनदेन के कार्यों के परिणामस्वरूप वे अपने लिये ऐसे कर्मजन्य कर्जा या पावना की बन्धनों की सृष्टि करते हैं, जिनसे छुटकारा पाने में वे असमर्थ हो जाते हैं। उनके पारस्परिक सम्बन्धों का फल यह होता है कि या तो वे किसी के ऋणी ग्रस्त या बध्द हो जाते हैं या कोई दूसरा उनका ऋणी या बध्द हो जाता है। बद्ध-जीव के बारे में कहा गया है,
येषां न विद्या न तपो न दानं , ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः । 
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः , मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

किन्तु ईश्वर-कोटि पुरुष अद्वैत या एकत्व के ज्ञान में निवास करता है और उसके कार्यों का उसके लिये बन्धन कारक होना तो दूर रहा, किंतु उसके कार्य बध्द मनुष्यों के लिये मुक्ति कारक होते हैं। ऐसा एक भी प्राणी नहीं होता जो ईश्वर पुरुष की सत्ता के अन्तर्गत नहीं होता। वह सभी में अपने आप को देखता है और चूँकि उसके समस्त कार्य उसकी अद्वैत की चेतना से स्फुरित होते है अत: वह स्वतंत्रता पूर्वक दे सकता है; और स्वतंत्रता पूर्वक ले सकता है। किसी को देकर उसे अपना ऋणी नहीं बनाता, न किसी से लेकर वह उसका ऋणी बनता है। उसके कार्य, उसके लिये तथा अन्य मनुष्यों के लिये बन्धन कारक नहीं होते।
 ईश्वर-कोटि पुरुष बरगद के वृक्ष के सदृश होता है। बरगद का वृक्ष उच्च तथा विशाल होता है तथा धूप, वर्षा और ऑंधी से यात्रियों की रक्षा करता है, तथा उसके पूर्णत: विकसित हो जाने के पश्चात् उसकी जड़ के समान नीचे की ओर झुकने वाली शाखायें ऊसर ज़मीन में काफ़ी गहराई तक घुस जाती हैं और उससे कुछ समय के पश्चात् एक उसी जड़ से दूसरा पूर्ण बरगद का वृक्ष उत्पन्न होता है। 
 "जो पहले बरगद के वृक्ष की तरह उच्च और विशाल होता है तथा न केवल पहले बरगद के वृक्ष की ही भांति धूप, वर्षा तथा ऑंधी से यात्रियों की रक्षा करता है, किन्तु पहले बरगद के वृक्ष की ही भांति वह भी एक दूसरा पूर्ण बरगद का वृक्ष उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।"
" यही बात ईश्वर-कोटि पुरुष पर भी लागू होती है जो अन्य मनुष्यों में सुप्त ईश्वर-कोटि  पुरुष को जागृत करता है। पृथ्वी पर ईश्वर-कोटि पुरुषों का क्रमबध्द निरंतर अभ्युदय मानवता के लिये स्थायी वरदान है। ये ईश्वर-कोटि पुरुष मानवता की तिमिराच्छादित पूर्ण यात्रा में उसका पथ प्रदर्शन करते हैं। ईश्वर-कोटि  पुरुष संसार का प्रभु भी है तथा साथ ही साथ सेवक भी है अपने अक्षय अनुग्रह की मुक्त हस्त से अनन्त वर्षा करने वाले की हैसियत से वह संसार का स्वामी है; तथा निरंतर औरों का भार वहन करने वाले तथा उन्हें उनकी असंख्य कठिनाईयों में सहायता करने वाले के नाते वह संसार का सेवक है। 
जिस प्रेम का वह दान करता है तथा प्रति दान में वह जो प्रेम प्राप्त करता है वह प्रेम जीवात्मा को अज्ञान से मुक्त करता है। जब वह प्रेम देता है तो वह अन्य रूपधारी अपने आप को ही देता है जब वह प्रेम प्राप्त करता है तो वह वही प्रेम प्राप्त करता है जिसे वह अपने अनुग्रह के द्वारा औरों में जाग्रत करता है। वह बिना किसी भेद भाव, सब पर अपने अनुग्रह की वर्षा करता है। ईश्वर-कोटि  पुरुष का अनुग्रह मेघ जल के तुल्य है। मेघ का जल, ऊसर तथा उर्वरा सभी भूमियों पर समान भाव से बरसता है। उसी प्रकार ईश्वर-कोटि पुरुष सभी मनुष्यों पर, बिना भेदभाव के अपने अनुग्रह की वर्षा करता है। किन्तु जिस प्रकार, परिश्रम पूर्वक तथा धैर्य पूर्वक जोती गई उर्वरा भूमि में ही वर्षा के कारण बीज उगता है, तथा फलता फूलता है, उसी प्रकार योग्य पात्र (जिसमें श्रद्धा हो) में ही, ईश्वर-कोटि पुरुष का अनुग्रह उगता तथा विकसित होता है। 
 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है। कर्म सफलता का द्वार खोल देता है। मनुष्य अपने सुख-दु:ख के लिए स्वयं ही उतरदायी है। हम जैसा चिन्तन करते हैं, वैसा ही हमारा मन बनता है तथा वैसे ही हम हो जाते हैं। हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही हमारा भविष्य बन जाता है। हम अपने विचार और कर्म से भविष्य का निर्माण करते हैं।
मैं अतीत के बन्धन से मुक्त हो रहा हूं। मनुष्य बन्धन-मुक्त होकर ही जीवन के सौंदर्य का मुक्त-दर्शन कर सकता है तथा जीवन में आगे बढ़ सकता है। मैंने वर्तमान में जीना सीख लिया है। केवल वर्तमान ही सत्य है। भूतकाल का तो अस्तित्व ही नहीं है, वह स्पप्नमात्र है। भविष्य का अभी निर्माण हा रहा है तथा उसकी चिन्ता करना अविवेक है। भूतकाल की भूलों पर पछताव करते ही रहना, भूतकाल के दु:खों का स्मरण करके अपने भीतर घुलते ही रहना तथा भविष्य की चिन्ता होना पुनर्जन्म एंव नवजीवन का प्रारम्भ है। प्रकाश की ओर उन्मुख होने पर भी अतीत के अन्धकार का स्मरण करते रहना अविवेक है। अतीत के बन्धन से मुक्त होने का अर्थ है अतीत को अस्तित्वहीन और मिथ्या मानकर उससे भावात्म्क् सम्बन्ध न मानना तथा उसके गतिरोधक कुप्रभाव से मुक्त रहना।
बहुत कुछ खोने के बाद भी, पुन: प्रारम्भ कर देने के लिए बहुत कुछ शेष बचा है। यदि चेतना शेष है तथा आशा और उत्साह की संजीवनी शेष है तो कटा हुआ जीवन-वृक्ष फिर से फूटकर उग आएगा। उतम पुरुष विपति आने पर विनष्ट नहीं होते तथा अपनी प्रबल-शक्ति से नवचेतना एंव नवजीवन का संचार कर लेते है। विवेकशील पुरुष गिर जाने पर गेंद की भांति प्रत्येक बार उठ जाते हैं तथा मूर्ख जन मिट्टी के ढेले की भांति गिरकर पड़े रह जाते हैं।
मैंने समझ लिया है कि भय एक मिथ्या कल्पना है। हमने किसी अबोध अवस्था में स्वये ही भय की काली चादर को ओढ़ा है। हम स्वयं ही उसे क्षणभर में अभी उताकर फेंक सकते हैं। प्राय: सभी किसी न किसी भय से ग्रस्त होते है किन्तु यह समझ पाते कि भय मात्र दूर कर सकते हैं। ज्ञान की अग्नि अज्ञान और मन के पुराने संस्कारों को भस्म कर देती है तथा विवेक का प्रकाश भय के अंधकार को नष्ट कर देता है। भय चिन्ता और शोक मानव की नियति नहीं हैं। विवेक, साहस और धैर्य हमारे श्रेष्ठ मित्र हैं।
सत्य और प्रेम ही जीवन को सार्थक बना सकते हैं तथा सत्य और प्रेम ही धरती को स्वर्ग बना सकते हैं। सन्त कबीर कहते हैं -

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
 
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?]
' असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण बुद्ध ' या स्वामी विवेकानन्द के ह्रदय को केवल वही समझ सकता है, जो अपने अहं को मिटा कर स्वयं बुद्ध (ब्रह्म-विद)  बन गया हो। स्वामीजी कहते हैं,(दूसरे मनुष्यों को साक्षात् ईश्वर समझकर उनके प्रति ) " पूरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकर, दिखानी होगी, याद रखना उनकी कृपा से सब ठीक हो जायेगा।" हमें भी स्थित-प्रज्ञ मनुष्य बनना होगा। या अपने को बॉल-पॉइंट मानकर लिखने वाले तो ठाकुर हैं, ऐसा सोंचकर अपने अहंकार को सात्विक बनाकर धूप-वर्षा में सन्तुलित रहने की क्षमता प्राप्त करनी होगी। महानता या ह्रदय की विशालता को दिखाने की चेष्टा साधक को छोटा बना देती  है। महान ठाकुर दूसरों की जूठी पत्तलें भी उठाते थे, ताकि कोई उनको महान समझकर अपने को छोटा नहीं समझे। 
 क्योंकि यह संसार अन्धापरम्परा की तरह देखा-देखी किया करता हैं न कि सच्ची या झूठी, अथवा योग्य, अयोग्य, बातों का विचार किया करता हैं- ' गतानुगति को लोको न लोक: पारमार्थिक:।'- अर्थात्  ओंकार में जो 'अं', 'उ' और 'म' ये तीन अक्षर हैं उन्हें और भू:, भुव: और स्व: इन महाव्याहृतियों (महावाक्यों )का अर्थ बड़े वाक्य नहीं है। देखने में तो यह वाक्य बहुत छोटे है। वस्तुतः महावाक्य एक महान सत्य का प्रतिपादन करते है, इसलिए उन्हें महावाक्य कहते है। वेदांत का सबसे महान सत्य यही है कि आत्मा और परमात्मा एक अखण्ड तत्त्व है। इसी ब्रह्मात्मैक्य का प्रतिपादन कने वाले वेदांत वाक्य महावाक्य कहलाते है। जैसे 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत्त्वमसि', 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' आदि को परमात्मा ने क्रम से तीनों वेदों से मथ कर निकाला हैं।
हम जगतमें आते हैं तथा जगतसे जाते हैं। मरने के बाद हम किस योनि में जाएँगे यह तय नहीं है। वेद में एक अधमाधम ’जायस्व भ्रियस्व’ गति का भी उल्लेख मिलता है जिसमें अतीव प्राणी एक ही दिन में कीट पतंग आदि के रूप में कई-कई बार उत्पन्न होता और मरता रहता है।"  मनुष्य एक अल्प अवधि तक पृथ्वी पर रहता है तथा अकस्मात् यहाँ से सदा के लिए बिदा हो जाता है। ' जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ' गीता 2/27 क्रमिक विकास के नियम ' Law of evolution ' या उत्क्रान्ति के नियमानुसार पुनर्जन्म मिलेगा। विवेकशील पुरुष अपने जीवन को आनन्दमय बना लेता है तथा विवेकहीन मनुष्य इसे दुःखमय कर लेता है। मनुष्य के सामने दो मार्ग खुले होते हैं-एक श्रेयमार्ग, दूसरा प्रेयमार्ग। मनुष्य मार्ग का चयन करने में स्वतंत्र होता है। मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र होता है तथा कर्म के फल का भोग करने में ईश्वरीय विधान से नियंत्रित होने के कारण परतंत्र होता है। जो जैसा बोता है, वैसा काटता है, यद्यपि मनुष्य को इसका बोध नहीं होता। मूढ मनुष्य भगवान् और भाग्य को व्यर्थ ही दोष देता है।  मनुष्य होकर पशुतुल्य जीवन जिया हो तो उसे दूसरे जन्म में पशु ही बनना पडेगा। सुभाषितकार कहते हैं:
स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ता: केशा नखा: नरा: ।
इति  विज्ञाय मतिमान् स्वस्थानं न परित्यजेत् ॥
 दाँत, बाल, नख और मनुष्य स्थानभ्रष्ट हाने के बाद शोभा नहीं देते। ऐसा समझकर समझदार व्यक्ति को स्थान नहीं छोडना चाहिए।
स्थानभ्रष्ट की शोभा नष्ट हो जाती है। दान्त स्थानपर हों तो वे शोभा देते हैं। बाल सिरपर हों तब तक शोभा देते हैं। रोज बाल हम कंघी से संवारते हैं। मगर हजामत करने के बाद हम काटे हुए बालों को छूते भी नहीं। एक बाल भी कपडे पर रहा तो उसे झटक कर निकाल देते हैं। इसका कारण बाल स्थानभ्रष्ट हुए।मानवी जीवन मिलने के बाद स्थान के विषय में विचार नही करेंगे तो कब करेंगे ?अपना स्थान निचित होना चाहिए। जिस स्थान पर पहुँचकर वापिस आना नहीं है वह स्थान कौनसा है ? तद्विष्णो: परमं पदम्...... प्रभु की गोदमें परम स्थान है। मनुष्य को अपना स्थान निचित करना चाहिए और स्थानभ्रष्ट नहीं होना चाहिए। भगवान ! मुझे तेरी गोदमें बैठना है। वही मेरा स्थान है और उसे प्राप्त करना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे मै प्राप्त करके ही दम लूँगा।’ प्रभु की गोद ही निजधाम है।
पञ्चाग्निविद्या, वैश्वानरोपासना के अनुसार परलोक को भी युक्ति से साधा जाता है । छान्दोग्य उपनिषद की श्रुति प्रसिद्ध है- 
ये रमणीयाचरण रमणीयां योनिमापघेरन्।
कपूयाचरणा: कपूयां योनिमापघेरन्। 

 [ छा०उ० ५.१०.७]
अर्थात- शास्त्रविहित आचरण करने वाले व्यक्ति उत्तम योनियों को प्राप्त होते हैं और पापाचारी पाप योनियों को प्राप्त होते हैं। यही कर्मानुसार जीवन की विविध गतियों का रहस्य है।'' यहाँ इतना और अधिक समझ लेना आवश्यक होगा कि मनुष्य योनि को छोड़कर अन्य योनि केवल भोग्योनी हैं। वेद ने सिद्धान्त बताया है कि जो जिसकी उपासना करता है , सिद्ध होने पर वह अपने उपास्य के जैसा ही बन जाता है । पशुभाव को जीतने की साधना करना ही पुरुषार्थ है,या  फिर वीर भाव के साधक इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिये भगवान पशुपति नाथ या वर्धमान महावीर की उपासना करते हैं। देव भाव से उपासना करने वाले साधक विरले होते हैं जो देवो भूत्वा देवं यजेत के अनुसार स्वयं देव बनकर श्रीरामकृष्णदेव का यजन करते हैं
जिसका जीवन गतिशील नहीं, वह जीवन को ही नहीं समझ सकता तो वह, किस प्रकार भगवान को समझ सकता है ? जीवन गतिशील (Dynamic) होना चाहिए। जीवनमें वही बातें बार बार आती हों तो उसमें स्वाद कैसे आए ? उसमें आनन्द भी नहीं हैं। जीवन गतिशील तथा छलछल बहते पानी के समान होना चाहिए। हमारा जीवन संग्रहित पानी के समान है इसीलिए उसमें मच्छर होते हैं। जीवन गतिमान होना चाहिए।‘नदी वेगेन शुद्धयति ’। नदी वेग से शुद्ध होती है। नदी को पवित्र माना जाता है। क्यों ? वह बहती है। फल की ओर उसका ध्यान नहीं है। नदी निष्काम भाव से बहती रहति है, उसे इतना ही मालूम है कि, मुझे बहते रहना है, सागर तक पहुँचना है। ’ जिस जीवन में प्रवाहित्व है उसी जीवनमें शुचित्व है।
खिडकी में बाहरकी हवा आती है, उसका हमारे शरीर पर परिणाम होता है। उसके लिए भीतर के कोषों (cells) को लडना पडता है।  भीतर के कोष ( cells ) जब ढीले पडते हैं तब जुकाम हो जाता है।  इसका कारण हम लडने में थोडे ढीले पड गये।  मनुष्य को लड़ना ही पड़ता है, लड़े बिना मनुष्य जगतमें रह ही नहीं सकता।  युध्द से कायर की तरह भयभीत बनकर नहीं चलेगा।  हमारी संस्कृति युध्द से नहीं डरती है, उल्टे गीता रणांगन पर कही गयी है।  जब कर्मयोग थै थै नाच रहा था, तब गीता कही गयी है।  बहुतसे लोग संग्राम से डर जाते हैं और घबडा जाते है।  भारतीय संस्कृति कभी संग्राम से नहीं डरती, क्योंकि तुम्हे अगर समाज में युध्द पिपासु-वृत्ति टिकानी हो तो निर्भयता टिकानी पडेगी।  मनुष्य के पास निर्भयता न हो तो युध्द पिपासु-वृत्ति नहीं रहेगी । इसीलिये शौर्य-वीर्य पराक्रम अपने आप में बहुत बड़ी चीज है ।  वेद कहते हैं कि, समाज में युध्द पिपासु-वृत्ति रहनी चाहिए। सम्पूर्ण समाज को सुस्त नहीं रहना चाहिए।  तो क्या समाज में सतत लडाई की आग भडकाये रहना चाहिए ? ऐसा नहीं है।  युध्द पिपासु-वृत्ति के लिए कई गुणोंका विकास करना पडता है।  उसमें पहला गुण लडनेका है। मनुष्यको निसर्ग (Nature अन्तः और वाह्य प्रकृति ) के साथ लडना पडता है। मनुष्य विरुध्द मनुष्य, मनुष्य विरुध्द समाज और मनुष्य विरुध्द निसर्ग (Man v/s man Man v/s society Man v/s nature) इन सभी लडाईयों को लडकर ही हम विकास साध सकते हैं।
युध्द का अर्थात दूसरे की गर्दन काटना नहीं है, बल्कि युध्दपिपासु वृत्ति समाजमें रहनी चाहिए।  ‘ताल ठोककर अपने पैरों पर खड़ा रहूँगा, अर्थात परा-अपरा विद्या में, ' होश ' में और 'जोश ' में संतुलन बनाये रखूँगा ’ और भगवान के चरण स्पर्श कर काम मे लगूंगा ऐसी वृत्ति होनी चाहिए।  ऐसी वृत्ति स्वामीजी में थी तो स्वामीजी के उपासकों में भी यह वृत्ति रहनी चाहिए।  बाह शक्ति बडी कि, मेरे भीतर की चित्त्शक्ति बडी ?  किंतु आज निर्भयता चली गयी है।  स्वामीजी के उपासकों को स्वामीजी  से निर्भयता का गुण आत्मसात करना चाहिए।

किसीको मुंबई, दिल्ली जाना हो तो वह दिल्ली से आये किसी (नेता ) के पास से जानकारी हासील करता है कि वहाँ कौन सी हॉटल अच्छी है। खाना कहाँ अच्छा मिलता है वगैरह। इसी प्रकार क्या हमलोगों ने  उपर जाने के लिए वहाँ की जानकारी प्राप्त की ? मनुष्य को परलोक का मार्ग निचित करना चाहिए। तो ही ‘अच्छी गति मिली’ ऐसा कहा जाएगा। कोई मर जाता है तो व्यवहार में बोलते हैं कि गौरिशंकरजी को सद्गति मिली। गति का अर्थ है मार्ग। तुम जिस मार्ग को अपनाओगे उस पर से तुम्हारी परलोक की गति निचित होगी। ' जायस्व म्रियस्व ' में से छुटना होगा तो भगवान को जानना होगा, गति निश्चित करना पडेगा। 
बचपन से मुझे मन मिला है।  बचपन में मेरा मन जैसा था आज साठवें वर्ष में भी वैसा ही है।  उसमें कोई फर्क पडा ?  उम्र है पचपन का और दिल है बचपन का ? कितने ही लोग पचपन साठ वर्ष के होने पर भी वे झूले पर झूलते हुए पान चबाते रहते है।  उन्हे कुछ करना नहीं है, कुछ बनना नहीं है, क्या यह जीवन है?  मुझे कुछ करना है, कुछ बनना है, यही जीवन है। सुभाषितकार कहता है ‘स्वभावो दुरतिक्रम:’ स्वभाव बदलता नही।  यदि मन को बदला नहीं जा सकता तो साधना निरर्थक है। मेरे पास यदि सामथ्‍र्य है तो वह कौनसा है।  मानसिक, शारीरिक या आत्मिक ? मेरे पास जो सामथ्‍र्य है क्या उसे बढाने के लिए मैने प्रयत्न किये या नहीं, उसका विचार करना चाहिए  
तुकाराम महाराज पूछते हैं, ‘कोणाचिये सत्ते चाले हे शरीर’ यह शरीर किसकी सत्ता से चल रहा है ?  मनुष्य अंतर्मुख होकर जब सोचता है कि इस जगतमें मेरा अपना क्या है ?  उस समय उसका मुँह बंद हो जाता है। यह प्रकाश मांगने से या किसी की कृपा से नहीं मिलता। उसके पाने के लिए मनुष्य को स्वयं ही विकास साधना चाहिए।
इसीलिये मनीषी जन ने मानव-जीवन को यात्रा की संज्ञा दी है  मेरे पास (यात्री बनने का ) सामथ्‍र्य है या नहीं इसका पहले निर्णय होना चाहिए। उपनिषद में आत्मा को रथी या गाड़ी का मालिक और सवार करार दे के बुद्धि को कोचवान - सारथी, - मन को लगाम -और इंद्रियों को घोड़े की जगह माना है। शरीर ही रथ - गाड़ी - और संयतजीवन ही पक्की सड़क मानी है। इस संयम से हटना खंदक में जाना है जहाँ इंद्रियों के विषय लहलहाती घास है। लक्ष्य स्थान है निर्वाणमुक्ति या ब्रह्मनिष्ठा। जीवन की लंबी यात्रा तय करनी है। फलत: आत्मा यदि सतर्क न रहे, बुद्धि को ताकीद न करे कि लगाम को कस के पकड़ो तो घोड़े जरूर ही ग में जाए और सबको चौपट करें। कितना सरस, पर कितना काम का, यह वर्णन है! इसलिए वहाँ कह दिया है कि जिसकी बुद्धि चुस्त और मन कब्जे में है वही जीवनयात्रा सकुशल पूरी करके विष्णु के परम पद - मोक्ष - तक पहुँच जाता है -
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
(आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्, बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् ।)इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो । (लगाम – इंद्रियों पर नियंत्रण हेतु, अगले मंत्र में उल्लेख ।)
इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)
 मनीषिणः इन्द्रियाणि हयान् आहुः = मनीषीजन इन्द्रियों को घोड़े कहते हैं; विषयान् तेषु गोचरान् = विषयों (भोग के पदार्थों) को उनके गोचर (विचरने का मार्ग) कहते हैं; आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम् (आत्मा इन्द्रियमनः युक्तम्) = शरीर, इन्द्रिय और मन से युक्त (जीवात्मा) को; भोक्ता इति आहुः = भोक्ता है, ऐसा कहते हैं।
समस्त उपनिषदों में तथा भगवद् गीता में अगणित स्थलों पर अनेक प्रकार से कहा गया है कि भगवान् की प्राप्ति से मनुष्य नितान्त अभय हो जाता है। उन स्थलों का उल्लेख करना कठिन है। अभयं हि वै ब्रह्म भवति (बृह० उप० ४.४.२५) अभय होने पर ब्रह्म हो जाता है।  श्वेताश्वर उपनिषद् (२.९) में इसी रूपक का उपयोग हुआ है।
इसी प्रकार जीवन में दृढता होनी चाहिए। मनुष्य के पास संकल्प की दृढता न हो तो वह क्या कर सकेगा ?  मनुष्य दृढनिश्चयी होना चाहिए।  ‘ मैं अमुक कार्य को पूरा किये बिना विश्राम नहीं करुँगा ’ ऐसी वृत्ति निर्माण होनी चाहिए। जीवन में निश्चय होना चाहिए ये सब गुण युध्द पिपासु-वृत्ति में आते है।  निश्चय अर्थात् -' लक्ष्य को प्राप्त किये बिना नहीं रुकूँगा ' ऐसा निश्चय।  हमारे जीवन में कोई निश्चय ही नहीं है।  किसी को तुम पूछो, ‘इस श्रावण मास में तुम श्रीसुक्त सुनोगे, या गीता पढोगे’ तो वह तुरंत कहेगा,‘ बन सका तो देखूँगा। ‘मै अवश्य श्रवण करुँगा या गीता पढूँगा ’ ऐसा वह दृढता से नहीं कहता।  उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं है, ऐसा मनुष्य भगवान के पास कैसे पहुँचेगा ?  स्वामीजी में यह सब गुण विद्यमान थे।आज मनुष्य के जीवन में निश्चय नहीं होता। 
 प्राचीनकाल के मनुष्यों के जीवन में दृढ़ संकल्प (ज़िद या निश्चय) रहते थे कि, संध्या (योगासन,जप-ध्यान) किये बिना भोजन नहीं करुँगा। मनुष्य में निश्चय होना चाहिए, जुझारूपन होनी चाहिए, निर्भयता होनी चाहिए ये सब गुण युध्द पिपासु-वृत्ति जागृत होगी तभी खिलते हैं।  वे समाज के प्रत्येक व्यक्ति में होने ही चाहिए क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को लडना है। राजलक्ष्मी, ज्ञानलक्ष्मी, और आत्मलक्ष्मी ये सब लडाई से ही प्राप्त होती हैं।  मनुष्य को सभी सभी प्रकार की लक्ष्मी लडाई से मिलती है।  शुक महान हुए, क्योंकि रंभा के सामने आने पर भी वे हिम्मत से खडे रहे।  शुक लडे, किंतु छगन-भाई तुरन्त पिघल जाता है, शरण जाता है।  रंभा ही क्यों ?  रंभा नाम की कोई स्त्री उसके सामने आयी तो वह उसकी शरणमें जाता है।  प्रत्यक्ष रंभा आयेगी तो उसकी क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती।  क्योंकि उसमें लडने की शक्ति या दृढता नहीं है।  लडाई में दृढता होनी चाहिए।  अध्यात्म में भी लडाई है।  हनुमानजी के पास भी अपार शक्ति थी वह उन्होने भगवद्कार्य के लिये लगाई इसलिए वे भक्त श्रेष्ठ हुए।  भक्ति को अध्यात्मिक मूल्य है, आधिभौतिक मूल्य है और आधिदैविक मूल्य है।  भक्ति का सभी जगह मूल्य है।]
Alfred Tennyson (1809-1892)Tennyson wrote a number of phrases that have become commonplaces of the English language, including:  "Theirs not to reason why, / Theirs but to do and die", and "My strength is as the strength of ten, / Because my heart is pure". " Self reverence, self-knowledge, self control. These three alone lead life to sovereign power." "Knowledge comes, but wisdom lingers." " Who are wise in love, love most, say least. " " Whose faith has center everywhere, Nor cares to fix itself to form."  He is the second most frequently quoted writer in the English language, after Shakespeare.
Historians have observed that, before this Parliament, "religion" was classified by many Americans that ' ethnic religions (गैर-ईसाई धर्मों में) may have had portions of the truth, but only Christianity had all truth. This 1893 Parliament was a pivotal moment in the abolition of such classification, as representatives of "eastern" religions such as Swami Vivekananda and Anagarika Dharmapala promoted a new religious tolerance.

और गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों में से जो आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण हैं, उन्हें भी क्रम से तीनों वेदों से ही दुहकर भगवान् से निकाला हैं। इसलिए ये सायं-प्रात:काल जो व्यक्ति ओंकार, व्याहृति और गायत्री मन्त्र को मिलाकर-ओं भूर्भुव:स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात्-जप करता हैं उसे सब वेदों के पाठ करने का पुण्य मिलता हैं।ओंकार और तीन महाव्याहृतियों के सहित गायत्री मन्त्र परमात्मा का मुख हैं।
 ''सम्पूर्ण जगत् को रचने वाले और प्राणियों के कल्याणकर्ता स्वयं प्रकाश स्वरूप परमात्मा के इस ज्योति:स्वरूप का ध्यान हम लोग करते हैं, जो ओंकार स्वरूप, और सर्वरक्षक तीनों लोक स्वरूप और स्वयंभू, सर्वाधार, आनन्द स्वरूप, सब शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित और सभी लोगों की प्रार्थना एवं भजन के योग्य हैं। वह ज्योति:स्वरूप हमारी बुद्धियों को अपनी ओर, सत्कर्म और विचार में लगावे।'']
जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को झिड़की लगाई थी, श्रीकृष्ण को यह साफ नजर आया कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानने के कारण ही अर्जुन युद्ध करने में डर रहे थे।  यह उन्होंने  देख लिया कि उस स्वरूप के जानते ही यह सारा परदा कुहासे की तरह फट जाएगा। इसीलिए उन्होंने  आत्मा के ही स्वरूप को ले के गीतोपदेश आरंभ किया। यदि आत्मा अकर्त्ता और अविनाशी सिद्ध हो जाए तो फिर स्वर्ग-नरक और पाप-पुण्य का सवाल उठता ही कहाँ है? इसलिए पहले जड़ को ही साफ करना उनने उचित समझा और जरूरी भी।उसी प्रकार श्रीरामकृष्ण ने भी ब्रह्मविद युवक नरेन्द्रनाथ को झिड़की लगाकर उनमें सुप्त मानवजाति के नेता-जो जगत को शिक्षा देगा ' को जाग्रत कर दिया था। 

 " यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, " जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता। "
 " तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कुद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उध्दार में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर - गुल मचाओ की उसकी आवाज़ दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नही चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढो। इसके बाद मैं भारत पहुँच कर सारे देश में उत्तेजना फूँक दूंगा। डर किस बात का है? नहीं है, नहीं है, कहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो 'नहीं' हो जाना पडेगा। खूब शाबाश! छान डालो - सारी दूनिया को छान डालो! अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो - चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते। तमाम संसार हिल उठता। क्या करूँ धीरे-धीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूफ़ान मचा दो तूफ़ान! " 
 स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " भाव यह है कि मनुष्य को इसी जीवन में ईश्वर की प्राप्ति करनी होगी और अद्वैत ग्रन्थ अत्यन्त प्रमाण-युक्त तर्क के साथ उसमें यह जोड़ देते हैं कि -'ईश्वर को जानना ही ईश्वर हो जाना है '-ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति।'..पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे। बनो और बनाओ, ' Be and Make ' यही हमारा मूल-मंत्र रहे।" ९/३७९

  " अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा- ठहरो- धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है- तुमसे कहता हूँ देखना- कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति कहीं अनिवार्य न बन जाये - 'बहुत्व में एकत्व'  (Unity in Diversity) 'सार्वजनिन-प्रेम' के भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो "सार्वजनीनता" के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना कि, सार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, "दुसरों के धर्म का द्वेष न करना"; नहीं, हमलोग तो सभी नस्ल -जाति के मनुष्यों को, सभी धर्मों को सत्य समझते हैं और उन्का ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं। सावधान रहना, दूसरे (किसी सहयोगी) के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना - इसी भँवर में बडे-बडे जहाज डूब जाते हैं।"
 
" एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है -- वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नाम, यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, देवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया।"
  • जो सबका दास होता है, वही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच - नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच - नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है।
  • वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो।
  • अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसीसे विरोध नहीं होता, वह किसीकी शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है।
  • जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।
  • तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

  • जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।
  • जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।
  • मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।
  • हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।
  • मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।
  • पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।
  • सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।
  • संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।
  • हे सखे, तुम क्योँ रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ!
  • बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो -- । डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं -- इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।
  • लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
  • श्रेयांसि बहुविघ्नानि अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। -- प्रलय मचाना ही होगा, इससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं। दुनीया भर में प्रलय मच जायेगा, वाह! गुरु की फतह! अरे भाई श्रेयांसि बहुविघ्नानि, उन्ही विघ्नों की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! ....बड़े-बड़े बह गये, अब गडरिये का काम है जो थाह ले? यह सब नहीं चलने का भैया, कोई चिन्ता न करना। सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता है; अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयान-मार्ग की गति मिलती है।) ...धीरे - धीरे सब होगा।
  • वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श (समाधी के अमरत्व का त्याग ) पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य- जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो -- व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।
  • इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जायेगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड नहीं है -- बडे आदमी वे हैं जो अपने हृदय-रुधिर से दूसरों का रास्ता तैयार करते हैं- यही सदा से होता आया है -- एक आदमी अपना शरीर-पात करके सेतु निर्माण करता है, और हज़ारों आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते हैं। एवमस्तु एवमस्तु, शिवोsहम् शिवोsहम् (ऐसा ही हो, ऐसा ही हो- मैं ही शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। )
  • मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना -- इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।
  • मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, "भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।" सब विषयों  में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे। क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार " ऐसे ही चलना है।
             कछु लेना देना मगन रहना ……………..
    नाहिं किसी की कहना सुनना,
    नाहिं किसी को अपनी कहना ।।
    कछु लेना देना मगन रहना
    ……………….
    पाँच तत्त्व का बना रे पिंजरा,
    वा में बोले हे मेरी मैना ।।
    कछु लेना देना मगन रहना ………………
    गहरी नदिया नाव पुरानी,
    खेवटिया से मिलते रहना ।।

    कछु लेना देना मगन रहना ……………….
    तेरा साहिब है तुझ माँही,
    सखी खोलकर देखो नैना ।।

    कछु लेना देना मगन रहना ……………….
    कहत कबीरसुनो भई साधो,
    हरि चरणों में लिपटे रहना ।।

        
    कछु लेना देना मगन रहना
    दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।
  • जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों सम्पूर्ण शुध्दचरित्र हों।
  • नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त: करण पूर्णतया शुध्द रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो -- प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते -- यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चो, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप्, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।
  • क्या संस्कृत पढ रहे हो? कितनी प्रगति होई है? आशा है कि प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप्त कर चुके होगे। विशेष परिश्रम के साथ संस्कृत सीखो।
  • शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो।
  • बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी।
  • बालकों, दृढ बने रहो, मेरी सन्तानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है - सदा उसीका साथ करो। बिना विघ्न - बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है? समय, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है। मैं तुम लोगों को ऐसी बहुत सी बातें बतलाता, जिससे तुम्हारे हृदय उछल पडते, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो लोहे के सदृश दृढ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँ, जो कभी कम्पित न हो। दृढता के साथ लगे रहो, प्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे। सदा शुभकामनाओं के साथ तुम्हारा विवेकानन्द।
  • जब तक जीना, तब तक सीखना' -- अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
  • जीस प्रकार स्वर्ग में, उसी प्रकार इस नश्वर जगत में भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, क्योंकि अनन्त काल के लिए जगत में तुम्हारी ही महिमा घोषित हो रही है एवं सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है।
  • पवित्रता, दृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ।
  • भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है। पीछे मुडकर मत देखो आगे, अपार शक्ति, अपरिमित उत्साह, अमित साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है- और तभी महत कार्य निष्पन्न किये जा सकते हैं। हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है।
  • पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं।
  • साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना -- यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे -- माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे।
  • बच्चों, जब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरू में, भक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगा, तब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है।
  • महाशक्ति का तुममें संचार होगा -- कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ।
  • बिना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही।
  • धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपये - पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी।
  • ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो -- संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो।
  • पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।
  • यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले 'अहं' ही नाश कर डालो।
  • पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा।
  • यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान् पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।
  • गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है।
  • बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।
  • किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रेसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बडा हाथ है।
  • किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।
  • क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुध्दिमानी नहीं है। बुध्दिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।
  • बच्चे, जब तक हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास - ये तीनों वस्तुयें  रहेंगी - तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।
  • आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ -- इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा।
  • न टालो, न ढूँढों -- भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेहे, उसके लिए प्रतिक्षा करते रहो, यही मेरा मूलमंत्र है।
  • शक्ति और विशवास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठा, पवित्र और निर्मल रहो, तथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।
  • एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे।
  • मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है - मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना।
  • जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँ, जो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली है, तो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँ, यही आश्चर्य की बात है।
  • हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है -- उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे।
  • यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है-- वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो-- तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोक-टोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता है? आइए, देखिए तो सही, दक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं। ...वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँ? हें भगवान, कब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा।
  • यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे - स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।
मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? ... जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? ...किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी - गीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी - जान से तडप रहे हो -- यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ' रोटी दो, रोटी दो ' चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उन्के हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड - मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि 'हाँ' तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क - वाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है..

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