Wednesday, March 23, 2011

उद्दम एवं नेतृत्व -१


(' यदि पूरा है विश्वास, तो यह भी है आसान !' ' You Can Do It if you Believe You Can! ')
जब किसी मनुष्य का चरित्र सुन्दर रूप से गठित हो जाता है तब उसमें स्वनिर्भरता या आत्मनिर्भर रहने का गुण आ ही जाता है. इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कहते थे, यथार्थ शिक्षा प्राप्त करने से मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होना सीख लेता है. पैरों पर खड़े होने का अर्थ क्या केवल इतना ही है कि तब मनुष्य अपने देह के भार को पैरों पर डाल कर सीधा खड़ा हो जाता है ? नहीं, इसका सही अर्थ है, तब मनुष्य विवेक-प्रयोग करने में दक्ष हो जाता है और अपने जीवन को पूर्वनिर्धारित लक्ष्य की दिशा में अग्रसर रखने का सामर्थ्य प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक बना सकता है. 
और, मनुष्य जितना ही आत्मनिर्भर  होता जाता है, उतना ही उसके दुःख-भोग की संभावना कम होती जाती है. दुसरों के ऊपर हम जितना अधिक निर्भर रहेंगे, उनसे जो आशा-आकांक्षा है वो पूर्ण नहीं होने से दुःख पाने की संभावना भी उतनी ही अधिक बनी रहेगी. मनु महाराज बड़े ही सुन्दर ढंग से सुख और दुःख का लक्षण बताते हुए कहते हैं-
सर्वम परवशं दु:खं सर्वं आत्मवशं सुखं |
इति विद्यात समासेन  लक्षणं सुख-दुःखयो:||
- दूसरों के ऊपर निर्भर रहना ही सारे दु:खों का कारण है तथा ' आत्मा के वश में रहना या आत्मनिर्भर रहना ही सुखों का मूल है '. संक्षेप में सुखी या दु:खी मनुष्य की यही पहचान (लक्षण) है. 
जब कोई व्यक्ति 'विवेक-प्रयोग ' के द्वारा पर-निर्भर रहना छोड़ कर आत्मनिर्भर बन जाता है तो उसके ह्रदय में स्वतः ही आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है. आत्मविश्वास का अर्थ है- अपनी अन्तर्निहित शक्ति और  सामर्थ्य, क्षमता में अटूट आस्था या विश्वास. वह अपने अनुभव से इस बात को समझ लेता है कि - ' मैं यदि अपने अन्तर्निहित विवेक-प्रयोग ( श्रेय-प्रेय का विवेक-विचार करने )की शक्ति की सहायता से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने का दृढ-संकल्प अपने मन में धारण कर लूँ, तो मैं उसे अवश्य प्राप्त कर सकता हूँ.'  इस प्रकार आत्मविश्वास का अर्थ है- " अपने आप पर विश्वास ". स्वामी विवेकानन्द कहते थे, ' पहले अपने आप पर विश्वास, उसके बाद ईश्वर के ऊपर विश्वास. तुम यदि अपने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं तथा बीच-बीच में घुसा दिए गए अन्य विदेशों से आयातित देवताओं पर विश्वास करो पर यदि तुम्हें अपने आप विश्वास नहीं है तो तुम्हारी मुक्ति सम्भव नहीं है.'इससे, हम यह समझ सकते हैं, कि स्वामीजी आत्मविश्वास को कितना मूल्यवान समझते थे. उनमें स्वयं के ऊपर अद्भुत आत्मविश्वास था तभी तो उन्होंने अत्यन्त ही प्रतिकूल परिस्थितिओं के बीच रहते हुए भी पुरे संसार को झकझोर कर रख दिया था. तथा अपने भावी अनुयायियों 
(भावी नेताओं) को जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा था-
" दुर्बल मनुष्यों को यही सुनाते रहो- लगातार सुनाते रहो- ' तुम शुद्धस्वरूप हो, उठो, जाग्रत हो जाओ. हे शक्तिमान (विवेक-प्रयोग की शक्ति से युक्त सर्वश्रेष्ठ मनुष्य ), यह नींद तुम्हें शोभा नहीं देती. जागो, उठो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता. तुम अपने को दुर्बल और दुखी मत समझो. हे सर्वशक्तिमान, उठो, जाग्रत होओ, अपना स्वरुप प्रकाशित करो. तुम अपने को पापी समझते हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता. तुम अपने को दुर्बल समझते हो, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है.' जगत से यही कहते रहो, अपने से यही कहते रहो- देखो, इसका क्या व्यावहारिक फल होता है, देखो, कैसे बिजली के प्रकाश से सभी वस्तुएँ प्रकाशित हो उठती हैं, और सब कुछ कैसे परिवर्तित हो जाता है. मनुष्य जाती से यह बतलाओ (मानव-मात्र के भीतर विवेक-शक्ति अन्तर्निहित है ) और उसे उसकी शक्ति दिखा दो. तभी हम अपने दैनंदिन जीवन में उसका (विवेक) प्रयोग करना सिख सकेंगे." ( वि० सा० ख० ८: १५) 
जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास नहीं है, वह किसी महान उद्देश्य (या लक्ष्य) को प्राप्त करने के लिए न तो उद्दम कर सकता है, और न ही किसी आन्दोलन को सफल बनाने में कुशल नेतृत्व ही प्रदान कर सकता है. किसी भी उपक्रम (या मनुष्य निर्माण आन्दोलन) को सफल बनाने के लिए नेतृत्व  (Leadership अगुआई करने की क्षमता) मूलभूत आवश्यकता है, एवं उद्दम (Initiative) ही वह बुनियाद है जिसके ऊपर नेतृत्व-क्षमता का निर्माण होता है.
'उद्दम'  वह अत्यन्त दुर्लभ/ असाधारण गुण है, जो किसी मनुष्य को उस उपयुक्त कार्य को करने में नियोजित करा देता है, जिसे बिना किसी के कहे ही करना आवश्यक हो. प्रसिद्द अंग्रेजी पुस्तक ' Laws Of Success ' (सफलता के नियम) के लेखक Napoleon Hill (नेपोलियन हिल ) कहते हैं- " Initiative is that exceedingly rare quality that impels a person to do that which ought to be done without being told to do it. " अर्थात किसी उपयुक्त कार्य को बिना किसी के कहे ही करने के गुण को उद्दम कहते हैं. 
दूसरी श्रेणी में वैसे लोग आते हैं जो बिना कहे कोई उपयुक्त कार्य तो नहीं करते परन्तु केवल एक बार कह देने से उसे अवश्य करते हैं. ये लोग सन्देश-वाहकों की श्रेणी में आते हैं. जो लोग किसी सन्देश को प्रसारित करने की क्षमता रखते हैं, उन्हें ऊँचा सम्मान प्राप्त होता है, किन्तु उनका मेहनताना सर्वदा समानुपाती नहीं होता है. 
तीसरी श्रेणी वैसे लोगों की है जो तबतक कोई उपयुक्त कार्य नहीं करते जबतक विवशता उन्हें पीछे से लात नहीं मारती. इन्हें सम्मान के स्थान पर उपेक्षा ही प्राप्त होती है, तथा मेहनताने में कोई तुच्छ पारितोषिक ही  मिल पाता है. इस श्रेणी के जन अपना अधिकांश समय दुर्भाग्य का रोना रोते हुए बिताते हैं.
 इससे भी निचले पैमाने पर वैसे लोग हैं जो किसी के द्वारा उपयुक्त कार्य करने के ढंग को खुद करके प्रदर्शित करने तथा अपनी निगरानी में पूरा करने का अवसर देने के बाद भी नहीं करते. ऐसा व्यक्ति सर्वदा बेरोजगार ही रहता है, तथा उसके पीछे यदि कोई धनाड्य रिश्तेदार खड़ा न रहे तो उसे यथोचित अपमान झेलना पड़ता है, एवं नियति (भाग्य) अपने हाथो में मुद्गर ले कर धैर्यपूर्वक उसका इंतजार भी करती रहती है.
अब प्रश्न यह है कि आप किस श्रेणी के साथ सम्बन्धित हैं ?  
नेतृत्व के विशिष्ट लक्षणों में से एक विशिष्ट लक्षण तो यह है सच्चाई है कि, जो व्यक्ति उद्दम करने की आदत को अपनी प्रवृत्ति नहीं बना लेता उसमें कभी नेतृत्व करने की क्षमता भी नहीं आ सकती.नेतृत्व कोई ऐसी चीज है, जिसे आपके ऊपर कभी थोपा नहीं जा सकता, आपको स्वयं आगे बढ़ कर किसी उपयुक्त कार्य में अपने कन्धों को भिड़ा देना होता है.
जिन नेताओं को आप जानते हैं, यदि ध्यानपूर्वक उनका विश्लेष्ण करें तो आप पाएंगे कि उन्होंने न केवल उद्दम के गुण का भरपूर इस्तेमाल किया था, बल्कि अपने मन में एक निश्चित लक्ष्य को पाने का संकल्प ले कर ही उस विशेष कर्मक्षेत्र में अपने कन्धों को भिड़ा दिया था. आप यह भी देख पाएंगे कि उन सबों में आत्मविश्वास का गुण भी कूट-कूट कर भरा हुआ था. 
     

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