Sunday, January 23, 2011

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर कृत वर्ण-परिचय

वर्ण-परिचय 
स्वामी विवेकानन्द भारत का भविष्य नामक भाषण में कहते हैं- " शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूँस दी जाएँ कि मन में अन्तर्द्वन्द्व चलने लगे, और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर पचा न सके.  जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और उसमे निहित भावों को आत्मसात कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है. यदि तुम पाँच ही भावों को पचाकर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी कि अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरे पुस्तकालय को कंठस्त कर रखा है...यदि बहुत तरह की तथ्यों का संचय करना ही शिक्षा है, तब तो ये पुस्तकालय संसार में सर्वश्रेष्ठ मुनी हैं और विश्वकोष ही ऋषि हैं !"(५:१९५)  
बचपन में जब हमलोग वर्ण-परिचय की छोटी सी पुस्तिका से - क,ख,ग,य़ा अ,आ,इ,ई से पढ़ाई शुरू करते हैं, तब पहले दो अक्षर के शब्द को लिख कर, उसका उच्चारण करना सीखते हैं. फिर तीन अक्षर के शब्द को लिखना और पढना सीखते हैं; क्रमशः हमें छोटे छोटे वाक्यों की लिखना और उसका reading करना सिखया जाता हैबंगाल के बच्चों को ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा लिखित वाक्य-विन्यास की पुस्तिका से पढ़ाई शुरू की जाती है. उनकी पुस्तिका में छोटे-छोटे वाक्यों में जो महत भाव दिये गये हैं, यदि उनमें निहित भावों को, उनके माता-पिता य़ा शिक्षक, आत्मसात कर लेने को इस प्रकार अनुप्रेरित करें, कि वे भाव उनके रक्त में मिल कर उनकी नस-नाड़ियों में संचारित होने लगे, तब इसी को भावों का आत्मसातीकरण कहते हैं. 
यदि सम्पूर्ण भारत के बच्चों को, मन को एकाग्र करने का प्रशिक्षण देने के साथ साथ, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा बंगला में रचित वर्ण-परिचय पुस्तिका का हिन्दी अनुवाद कर, बचपन से ही उसमे निहित भावों को, आत्मसात करने की शिक्षा दी जाय , तथा केवल निम्न लिखित १० पाठ को ही आत्मसात करवा दिया जाये, तो भारत आज इतने बड़े पैमाने पर जिस भ्रष्टाचार की समस्या से जूझ रहा है, क्रमशः यह बिल्कुल मिट जाएगी
आइये हमलोग देखते हैं कि ईश्वर चन्द्र विद्यासागर बच्चों को शिक्षा देने के लिये, उनके माता-पिता तथा गुरु से बचपन में ही किन वाक्यों का Reading का अभ्यास कराकर उनका चरित्रगठन करने को प्रेरित करते हैं। 
 प्रथम पाठ
१. कभी किसी को कटु-वचन मत कहना. कटु-वचन बोलना बहुत बड़ा दोष है। जो कड़वी बोली बोलता है, कोई उसको देखना भी पसन्द नहीं करता।

२. सदा सत्य बोलना चाहिये। जो सत्य बोलता है, सभी लोग उससे प्रेम करते हैं। जो झूठ बोलता है, कोई उसको प्यार नहीं करता, सभी उससे घृणा करते हैं। तुम कभी झूठ मत बोलना।

३. बचपन में, मन लगा कर पढना-लिखना सीखो।पढना-लिखना सीखने से सभी लोग तुमको प्यार करेंगे। जो पढने-लिखने में आलस्य करता है, कोई उसको प्यार नहीं करता। तुम कभी लिखने-पढने में आलस्य मत करना।

४. प्रतिदिन जो पढ़ाई करोगे, उसका अभ्यास (होम-वर्क) भी उसी दिन करना। कल कर लूँगा- ऐसा सोंच कर कल पर मत टालना।जिस पाठ को कल पर टाल दोगे, उसका अभ्यास फिर नहीं कर सकोगे।

५.कभी माता पिता की आज्ञा की अवहेलना मत करना। वे जिस समय जो आज्ञा दें, उस समय वही काम करना। कभी उनके आदेश की अवहेलना मत करना. माता पिता की बात नहीं मानोगे, तो वे तुमको प्यार नहीं करेंगे।

६. अबोध बालक, पढने-लिखने में अपना मन नहीं लगाते,सारा दिन खेल-कूद में ही बीता देते हैं। इसीलिये वे हमेशा दुःख पाते हैं। जो बच्चे मन लगा कर पढना-लिखना सीखते हैं, वे हमेशा सुख से रहते हैं।
२रा पाठ 
१. बिना परीश्रम किये, पढ़ाई-लिखाई नहीं होती. जो बच्चा परिश्रम करता है, वही पढना-लिखना सीख सकता है. परीश्रम (मेहनत) करो, तुम भी पढना-लिखना सीख जाओगे.

२. जो बच्चा प्रतिदिन, मन लगा कर, पढना-लिखना सीखता है, वह सबों का प्रिय होता है. तुम प्रतिदिन मन लगा कर लिखना-पढना सीखो, सभी लोग तुमको प्यार करेंगे.

३. जिस समय पढ़ाई करने बैठोगे, मन को अन्य किसी विषय में- मत जाने देना. मन यदि दूसरे विषयों में चला जायेगा, तो शीघ्रता से अभ्यास नहीं कर पाओगे; अधिक दिनों तक याद भी नहीं रहेगा; पाठ सुनाने के समय, ठीक से बोल नहीं पाओगे.

४. कभी किसी के साथ झगड़ा मत करना. झगड़ालू होना बहुत बड़ा दोष है.जो हमेशा सबों के साथ झगड़ता रहता है, कोई उसका मित्र नहीं होता. सभी उसके शत्रू बन जाते हैं. 

५. दूसरों के द्रव्य पर हाथ मत लगाना. बिना बताये दूसरे की कोई वस्तु ले लेने को चोरी करना कहते हैं. चोरी करना बहुत बड़ा दोष है. जो चोरी करता है, चोर समझ कर सभी उससे घृणा करते हैं.चोर के ऊपर कोई कभी विश्वास नहीं करता. 

६. जो चोरी करता है, झूठ बोलता है, झगड़ा करता है, दूसरों को गाली-गलौज देता है, मारा-पीटी करता है, उसको असभ्य (जंगली) कहते हैं. तुम कभी असभ्य मत होना; जंगली लडकों की संगत में मत रहना. यदि तुम असभ्य बन जाओगे, य़ा अभद्र लडकों की संगति में रहोगे, कोई तुमको अपने निकट बैठने नहीं देगा, तुम्हारे साथ बात-चीत नहीं करेगा, सभी तुमसे घृणा करेंगे.
३रा पाठ 
१. सुशील बालक  माता पिता से बहुत प्यार करता है. वे जो भी उपदेश देते हैं, उनके उपदेशों को, वह सदा याद रखता है, उन्हें कभी नहीं भूलता. वे जिस समय जो काम करने को कहते हैं, वह तुरन्त उनकी आज्ञा का पालन करता है; जिस काम को करने से मना करते हैं, उस काम को कभी नहीं करता.

२. वह मन लगा कर पढ़ता-लिखता है, पढ़ाई की कभी उपेक्षा नहीं करता. वह हर समय सोचता है,कि यदि पढना-लिखना न सीखेंगे, तो हमेशा दुःख भोगना होगा.

३. वह अपने भाई और बहन से बहुत प्यार करता है, कभी उनके साथ झगड़ा नहीं करता, उनके ऊपर कभी हाथ नहीं उठाता. खाने की कोई भी वस्तु मिलने से, अकेले नहीं खाता, उनलोगों को देने के बाद ही खाता है.

४. वह कभी झूठ नहीं बोलता. वह जानता है, जो लोग झूठ बोलते हैं, कोई उनसे प्यार नहीं करता, कोई उनकी बात पर विश्वास नहीं करता, सभी वैसे लोगों से घृणा करते हैं. 

५. वह कभी कोई गलत काम नहीं करता. यदि कभी उससे कोई भूल हो भी जाति है,और उसके माता पिता उसे डांटते हैं,तो वह क्रोध नहीं करता. वह यही सोचता है, कि गलत काम किया था, इसीलिये माँ-पिताजी ने डांट लगाई है, अब आगे से वैसा काम कभी नहीं करूंगा. 

६. वह कभी किसी से कटु-वचन नहीं बोलता, कभी अशिष्ट भाषा में गाली-गलौज नहीं करता.  किसी के साथ झगड़ा य़ा मार-पीट नहीं करता, जिस काम से किसी को क्लेश पहुँचता हो, वैसे काम कभी नहीं करता.

७. वह कभी दूसरे कि वस्तु को हाथ नहीं लगाता. वह जानता है,कि बिना बताये दूसरों की कोई वस्तु ले लेने को- चोरी कहते हैं. चोरी करना बहुत बड़ा दोष है, जो लोग चोरी करते हैं सभी उनलोगों से घृणा करते हैं.

८. वह अपना समय आलस्य में, कभी नहीं बिताता है. जिस समय जो काम करना जरुरी है, उस समय उसी काम को,वह पूरा मन लगा कर करता है. वह पढने-लिखने के समय, पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर, कभी खेलने नहीं जाता.

९. वह कभी दुश्चरित्र लडकों की संगति में नहीं रहता है, उनके साथ खेलने के लिये कहीं नहीं जाता है.वह जानता है, कि बुरे-चरित्र वाले लडकों के साथ खेलने य़ा घूमने-फिरने से, मैं भी दुश्चरित्र बन जाऊंगा. 

१०. वह जब विद्यालय में रहता है, उस समय शिक्षक महोदय जो भी आज्ञा देते हैं, वह उसे बड़े प्रफुल्ल मन से करता है. वह कभी उनकी आज्ञा का उलंघन नहीं करता है, इसीलिये वे उसको प्यार करते हैं. 
          ४था पाठ
चंचल नाम का एक लड़का था, उसकी आयू आठ वर्ष थी. चंचल के पिता उसको प्रतिदिन विद्यालय भेजते थे. किन्तु चंचल लिखने-पढने में मन नहीं लगाता था. वह, एक भी दिन विद्यालय नहीं जाता था, गली-कुँचो में खेलता रहता था. 

विद्यालय से छुट्टी होने पर, जब सभी लड़के घर जाते थे, चंचल भी उसी समय घर पहुँच जाता था. उसके माता पिता सोचते थे, चंचल विद्यालय से लिखना-पढना सीख कर घर आया है. इस प्रकार वह प्रतिदिन अपने माँ बाप को धोखा दिया करता था.

एक दिन चंचल ने देखा, कि भुवन नामक एक बालक पढने जा रहा है. वह उससे बोला, भुवन, आज तुम पाठशाला मत जाओ. आओ दोनों मिलकर यहाँ खेलते हैं. पाठशाला से छुट्टी होने पर, जब सभी लड़के घर जायेंगे, हमलोग भी उसी समय घर चले जायेंगे. 

भुवन ने कहा, नहीं भाई, मैं नहीं खेलूँगा. सारा दिन खेलते रहने से, पढ़ाई तो नहीं हो सकेगी. कल पाठशाला जाने से शिक्षक महोदय की डांट खानी होगी, और यदि पिताजी ने सुन लिय़ा, तो बहुत गुस्सा करेंगे. मैं अब और देरी नहीं करूँगा, मैं पाठशाला जा रहा हूँ. ऐसा कह कर भुवन चला गया. 

और एक दिन, चंचल ने देखा, अभय नामक एक बालक पढने जा रहा है. उसने उससे कहा, अभय, आज पढने मत जाओ. आओ दोनों मिल कर खेलते हैं. अभय ने कहा, नहीं भाई, तुम बहुत बुरे  लड़के हो, तुम एक भी दिन पढने के विद्यालय नहीं जाते. तुम्हारे साथ खेलने से, तो मैं भी खराब हो जाऊंगा. तुम्हारी तरह गली-कूंचों में खेलते रहने से, कुछ भी लिखना-पढना नहीं सीख पाउँगा. कल ही गुरु महाशय ने कहा है, बचपन में मन लगा कर पढ़ाई-लिखाई नहीं करने से, हमेशा दुःख भोगना पड़ता है. 

यह कह कर, जब वह चलने को हुआ, तब चंचल खींच-तीर करने लगा. अभय, उससे अपना हाथ छुड़ा कर, चला गया. जाते समय उसने कहा, आज मैं गुरु महाशय से तुम्हारी सारी बातें कह दूंगा. अभय विद्यालय पहुंचकर, गुरु महोदय को, चंचल की बात कह सुनाई. गुरु महोदय ने चंचल के पिता के पास यह खबर पहुँचा दिया, कि आपका बेटा एक भी दिन पढने नहीं आता है. सारे दिन सडकों पर आवारा लडकों की तरह, घूमता य़ा खेलता रहता है. खुद भी नहीं पढने आता है, और दूसरे बच्चों को भी विद्यालय आने से रोकता है. 

चंचल के पिता ने जब यह सुना, तो बहुत क्रोधित हो गये, उसको बहुत डांट-फटकर लगाये, कोपी-किताब कलम आदि जो भी कुछ खरीद कर दिये थे, सब छीन लिये. उस समय के बाद से, वे उसको प्यार करना छोड़ दिये, अपने निकट आने भी नहीं देते थे, सामने आ जाता, तो भी उसे दुत्कार कर भगा देते थे. 
   ५वाँ पाठ  
        एक लड़का था, जिसका नाम नवीन था. उसकी उम्र नौ वर्ष थी. उसे खेल-कूद करना इतना पसन्द था, कि वह सारा दिन रास्ते-चौराहों पर खेल-कूद मचाता रहता था, एक बार भी पढ़ा-लिखाई की तरफ ध्यान नहीं देता था. 

इसीलिये वह पढने-लिखने में एक दम फिसड्डी था, कुछ भी सीख नहीं पाता था. गुरु महाशय प्रतिदिन उसको डांट-फटकार लगाते थे. डांट खाने के डर से उसने विद्यालय जाना ही छोड़ दिया. एक दिन नवीन ने देखा, एक बालक अध्यन करने के लिये विद्यालय जा रहा है. 

उसने उसको पुकार कर कहा, अरे भाई, आओ, दोनों मिल कर थोड़ी देर खेलते हैं. उसने कहा, मैं पढने जा रहा हूँ, अभी नहीं खेल सकूंगा. यदि पढने के समय खेल-कूद करूंगा, तो पढ़ाई-लिखाई नहीं सीख पाउँगा. पिताजी ने मुझको आदेश दिया है, कि पढने के समय पढना, और खेलने के समय पर ही खेलने जाना.

जिस समय जो करना चाहिये,मैं उस समय वही काम करता हूँ. इसीलिये पिताजी मुझे प्यार करते हैं. मैं उनसे जब भी जो कुछ मांगता हूँ, वे मुझे वही खरीद देते हैं.यदि मैं अभी पढने के बदले तुम्हारे साथ खेलने लगूंगा, तो पिताजी मुझसे प्यार नहीं करेंगे. उन्होंने कहा है, पढ़ाई-लिखाई की उपेक्षा  करके, सारा दिन खेल-कूद करते रहोगे, तो बाद में सारा जीवन दुःख उठाना पड़ेगा.
इसलिए, मैं चला पढ़ाई करने. यह कह कर वह तुरन्त चला गया.

नवीन थोड़ी दूर जाने पर देखा, एक बालक चला जा रहा है. उसको रोक कर पूछा, भाई तुम कहाँ जा रहे हो?उसने कहा, पिताजी ने मुझे बाजार से एक सामान लाने के लिये कहा है. मैं वहीं जा रहा हूँ.  तब नवीन बोला, तुम थोड़ी देर बाद वह सामान लेने जाना,आओ हमलोग अभी मिलकर कुछ मजेदार खेल खेलते हैं.

उस बालक ने कहा, नहीं भाई, इस समय मैं खेल नहीं सकता. पिताजी ने जो कार्य करने को कहा है, पहले मैं उसीको करूँगा. पिताजी ने कहा है, किसी भी काम को टालना ठीक नहीं. मैं काम के समय काम करता हूँ, खेल के समय खेलता हूँ. काम के समय काम न करके यदि खेलने में समय गँवा दोगे, तो हमेशा दुःख पाओगे. मैं किसी भी काम को पूरे मनोयोग पूर्वक करता हूँ. जिस समय जो काम करना प्रयोजनीय है, उस समय वही काम करता हूँ. मैं तुम्हारी बातों में फंस कर, अपने काम की अवहेलना नहीं करूंगा.

यह बात सुन कर, नवीन वहाँ से चला गया. थोड़ी दूर जाने पर एक चरवाहा मिला, उसको देख कर बोला, आओ न भाई दोनों जन मिलकर खेलते हैं. चरवाहे ने कहा, मैं अभी गायों को चराने जा रहा हूँ, इस समय मैं नहीं खेल सकता. यदि खेलने लगूंगा, तो गौओं को, चरा नहीं पाउँगा. मेरे मालिक नाराज हो जायेंगे, और मुझे डांटे-फटकार लगायेंगे. 

मैं अपने काम के समय फाँकी नहीं मार सकता. काम के समय काम करूंगा, खेलने के समय खेलूँगा. मेरे बाबूजी ने एक दिन कहा था, काम के समय काम न कर के, सारा दिन खेलते रहने से, हमेशा दुःख भोगना पड़ता है. तुम अपना रास्ता देखो, इस समय मैं नहीं खेल सकता.

इसप्रकार, तीन लडकों से, क्रमशः  एक समान उत्तर पा कर, नवीन मन ही मन सोचने लगा, सभी लोग काम के समय काम करते हैं. कोई लड़का अपने काम की उपेक्षा करके सारा दिन खेलने में नहीं बीतता. केवल मैं ही सारा दिन, खेल-कूद में समय बीता देता हूँ. सभी कह रहे थे, काम के समय काम नहीं करने से, हमेशा दुःख भोगना पड़ता है.इसीलिये वे सारा दिन खेलने में बर्बाद नहीं करते हैं.

मैं यदि, पढ़ाई-लिखाई के समय, पढना-लिखना छोड़ कर, केवल खेलने में समय बीता दूंगा, तो मुझे भी हमेशा दुःख भोगना होगा. पिताजी अगर जान जायेंगे, तो मुझे प्यार नहीं करेंगे, डांट-फटकार लगायेंगे, हुआ तो पिटाई भी करेंगे, कभी उनसे कुछ मागुंगा, तो देंगे भी नहीं; मैं अब पढ़ाई-लिखाई की उपेक्षा नहीं करूंगा. आज से पढने-लिखने के समय, केवल पढ़ाई ही करूंगा. 

ऐसा विचार करके, उस दिन के बाद से, वह पढ़ाई-लिखाई में मन लगाने लगा. अब वह सारा दिन, खेल-कूद में नहीं बीताता. कुछ ही दिनों में नवीन, बहुत कुछ पढना-लिखना सीख गया. यह देख कर सभी नवीन की प्रशंसा करने लगे. इसप्रकार, पढ़ाई-लिखाई में परिश्रम करने से,  नवीन भी धीरे धीरे कई प्रकार की विद्या सीख गया था.       
६ठा पाठ
  माधव नामका एक लड़का था. इसकी उम्र १० वर्ष थी. उसके पिता ने उसे शिक्षा ग्रहण करने के लिये विद्यालय भेजा था. वह प्रतिदिन विद्यालय जाता था, एवं मन लगा कर पढना-लिखना सीखता था; वह कभी किसी के साथ झगड़ा य़ा मार-पीट नहीं करता था; इसीलिये, सभी लोग उसको प्यार भी करते थे. 

परन्तु केवल इन गुणों के रहने से ही क्या होता है, माधव में एक बहुत बड़ा दोष भी था.उसे दूसरों की चीजें उठा लेना बहुत पसन्द था. मौका मिलते ही, वह किसी दिन किसी लड़के की पुस्तक उठा  लेता, कभी किसी की कलम उठा लेता, तो किसी की कॉपी उठा लेता, किसी दिन किसी लड़के की पेन्सिल-कटर भी ले लेता था. इसीप्रकार, लगभग प्रतिदिन, वह किसी न किसी लड़के की कोई न कोई वस्तु चुरा ही लेता था. 

माधव जिस लड़के का कोई चीज चुरा लेता, वह यदि शिक्षक महाशय के पास जा कर कहता,महाशय,  मेरी अमुक वस्तु किसी ने चोरी कर ली है. किन्तु माधव, चोरी करने के बाद उस वस्तु को इस तरह छुपा देता था, की शिक्षक महाशय बहुत कोशिश करने परभी उसे ढूंढ़ नहीं पाते थे. जब यह पता नहीं चलता, कि चोरी किसने की, तो वे सभी लड़कों को डांट-डपट किया करते थे. 

शिक्षक महोदय से रोज रोज डांट खा कर, कुछ लडकों ने आपस में परामर्श किया, आज से हमलोग सतर्क रह कर यह देखेंगे,कि कौन चोरी करता है ? दो तीन दिन के भीतर ही, उनलोगों ने माधव को पहचान लिया, कि वही चोर है. उसदिन, माधव ने एक लड़के की एक पुस्तक चुरा ली थी. 
शिक्षक महोदय, उसको चोर कह कर बुरा-भला कहने लगे.तब माधव ने कहा, मैंने चुराया नहीं था, भूल से वह पुस्तक मैंने रख लिया था.शिक्षक महाशय ने उस दिन उसको क्षमा कर दिया, और चेतावनी देते हुए कहा, आज के बाद तुम किसी के कोई चीज पर हाथ मत लगाना. माधव ने आश्वासन देते हुए कहा, आज के बाद से मैं   किसी की, कोई वस्तु नहीं लूँगा. 

दो तीन दिनों तक, किसी की कोई वस्तु गुम नहीं हुई. किन्तु बाद में, पुनः, विद्यालय से लडकों की चीजें गायब होने लगीं. माधव, फिर एक बार चोर के रूप में पकड़ा गया.उस बार भी, शिक्षक महाशय ने उसे क्षमा कर दिया, और बहुत समझा-बुझा कर कहा, यदि तुम ने फिर से चोरी की, तो तुमको इस बार विद्यालय से बहिष्कृत कर दूंगा. उसने वादा किया, अब मैं कभी चोरी नहीं करूंगा. ' अब कभी चोरी नहीं करने की प्रतिज्ञा, उसने शिक्षक महाशय के सामने तो कर लिया, किन्तु फिर थोड़े ही दिनों बाद, फिर चोरी किया, और पकड़ा गया, की वही चोर है. 

इसप्रकार बारम्बार चोरी करने के कारण, शिक्षक महाशय ने उसको विद्यालय से बहिष्कृत कर दिया. उसके पिता ने जब यह सारा वृतान्त सुना, तो यथेष्ट डांट-फटकार लगाई और जबर्दस्त पिटाई भी किया.कुछ दिनों बाद, उन्होंने उसको एक दूसरे विद्यालय में पढने भेजा. परन्तु, वह वहाँ भी चोरी करने लगा.उस विद्यालय के शिक्षक महाशय ने, उसको अतिशय फटकार और पिटाई करके वहाँ से निकाल दिया.

यह सब देख सुन कर, उसके पिता के मन में उसके प्रति, बहुत घृणा उत्पन्न हुई.क्रोधित होकर उन्होंने उसको घर से बाहर निकाल दिया.बचपन से ही माधव को चोरी करने की आदत हो गयी थी, इसीलिये वह अपनी उस आदत को छोड़ नहीं सका. क्रमशः, जैसे जैसे वह बड़ा होने लगा, वैसे वैसे उसकी प्रवृत्ति और बढती गयी.

अब वह मौका मिलते ही,किसी के घर में घुस कर चोरी करने लगा. इसीलिये जो भी उसको देखता, वही उससे घृणा करता. कोई उस पर विश्वास नहीं करता था. किसी के घर जाता, तो वे उसको दुत्कार कर भगा देते थे.

माधव के दुःख की सीमा नहीं थी. वह भोजन नहीं मिलने के कारण, पेट की ज्वाला से व्याकुल हो कर रोता हुआ, दरवाजे दरवाजे मारा-मारा फिरता था, फिर भी किसी के मन में उसके प्रति कोई स्नेह य़ा दया नहीं उपजती थी.
७वाँ पाठ
अप्रिय सत्य मत बोलो 
राम एक बहुत सुबोध लड़का है. वह कभी अपने माता-पिता की आज्ञा का उलंघन नहीं करता है. वे जब कभी, राम से कुछ भी करने को कहते हैं,वह उसी समय उसे कर देता है, उनकी आज्ञा के विपरीत वह कुछ भी नहीं करता. वे लोग जिस काम को करने के लिये, एक बार मना कर देते हैं, वह उस काम को फिर कभी नहीं करता.

इसीलिये उसके माता पिता उससे अतिशय प्यार करते हैं. राम अपने भाई-बहनों के प्रति बहुत दयालु है. वह अपने बड़े भाई और बहनों का कहना मानता है, कभी उनलोगों का अनादर नहीं करता, छोटे भाई और छोटी बहनों से बहुत प्यार करता है, कभी उनलोगों को तंग नहीं करता, उनके शरीर पर कभी हाथ नहीं उठाता.

राम अपने जिन समवयस्क (हमउम्र) दोस्तों के साथ खेलता है, वह उन सबों को अपने ही भाइयों जैसा प्यार करता है, कभी उनलोगों के साथ झगड़ा य़ा मारपीट नहीं करता.जैसा व्यवहार करने से वे लोग संतुष्ट हों, वह उनके साथ सदा वैसा ही व्यवहार करता है. जिन कर्मों से वे असंतुष्ट होते हों, वैसा कोई कर्म वह नहीं करता. इसीलिये वे सभी राम से बहुत प्यार करते हैं. राम को देखने से ही वे बहुत आल्हादित हो जाते हैं. 

राम पढने-लिखने में बहुत परिश्रम करता है. वह कभी पढने-लिखने में लापरवाही नहीं करता. वह अपने शिक्षकों की अतिशय भक्ति करता है. वे लोग जब कोई उपदेश देते हैं, वह उन्हें मन लगा कर सुनता है, इसीलिये वह उनके उपदेशों को कभी भूलता.

राम कभी कोई बुरा कर्म नहीं करता. संयोग से कभी भूल हो जाये, तो एक बार मना कर देने पर, दुबारा उस काम को कभी नहीं करता. यदि कभी, उसके माता पिता य़ा शिक्षक कहते है, राम, तुमने बहुत गलत काम किया है; तब वह कहता है, मैंने नासमझी वश कर दिया है, अब कभी वैसा काम नहीं करूंगा, इस बार मुझको क्षमा कर दीजिये. उसके बाद राम वैसा काम दुबारा कभी नहीं करता. 

जिस बात को सुनने से, दूसरों के मन में क्लेश हो, राम वैसी बात कभी किसी से नहीं कहता; वह कभी अप्रिय सत्य नहीं बोलता. किसी काने व्यक्ति को काना, य़ा लंगड़े को लंगड़ा नहीं कहता. काने को काना, और लंगड़े को लंगड़ा कहने से वे बहुत दुखी हो जाते हैं. इसीलिये किसी को इसप्रकार के अशिष्ट शब्द से नहीं बुलाना चाहिये. राम के मुख से, कभी कोई कटू, अप्रिय, य़ा अश्लील शब्द सुन नहीं सकता. 
८वाँ पाठ 
सूसन्तान बनो !
देखो बच्चों, माता-पिता से बढ़ कर इस पृथ्वी पर दूसरा कुछ भी नहीं है.उन लोगों ने कितना कष्ट सह कर, कितने जतन से, पाल-पोष कर तुम्हें बड़ा किया है. वे लोग यदि, उतना कष्ट सह कर, उतने जतन से, तुम्हारा लालन पालन नहीं करते, तो किसी भी हालत में तुम्हारे प्राणों की रक्षा नहीं हो सकती थी. 

वे तुमसे जितना अधिक प्रेम करते हैं, पृथ्वी पर और कोई भी तुमलोगों को उतना प्रेम नहीं करता. क्या करने से तुमलोगों को सुख और आनन्द मिलेगा, वे लोग सर्वदा उसीकी चेष्टा करते हैं. तुम लोगों को प्रसन्न और सुखी देखने से, उनको जितना आनन्द होता है, उतना और किसी को नहीं होता. 

वे लोग तुम्हारे ऊपर जितने दयावान हैं, वैसा और कोई नहीं है. जिस बात से तुमलोगों का मंगल होता हो, उसीके लिये वे लोग सतत कितना प्रयास करते हैं. तुम लोग विद्या अर्जित कर लोगे,तो चिरकाल तक सुख से जीवन बीता सकोगे, इसीलिये उन्होंने तुम्हें पाठशाला भेजा है. तुम लोग जब मन लगा कर पढना-लिखना सीख जाते हो, तो उनको कितनी प्रसन्नता होती है.

वे लोग यदि दया करके, तुमलोगों को भोजन वस्त्र नहीं देते,तो तुम लोगों के दुःख-कष्ट की सीमा नहीं रहती. कोई स्वास्थ्यवर्धक वस्तु मिलने पर, वे लोग स्वयं न खा कर, तुमलोगों को देते हैं. अच्छे वस्त्रों को पहनने से तुम लोग आल्हादित होते हो, इसीलिये वे तुम लोगों को अच्छे अच्छे  वस्त्र खरीद देते हैं. 

तुमलोगों कहीं दर्द होता है, तो उनके मन में कितना कष्ट और कितना दुश्चिंता हो जाती है. तुमलोगों को दर्द से छुटकारा दिलाने के लिये, वे लोग कितना प्रयत्न, कितनी दौड़-धूप करते हैं. जबतक तुमलोग पूर्ण स्वस्थ नहीं हो जाते, तबतक वे लोग स्थिर और निश्चिन्त नहीं हो पाते हैं. तुम लोगों को स्वस्थ देखने से उनकी आल्हाद की सीमा नहीं रहती.

इसलिए तुमलोग कभी अपने माता-पिता के आज्ञा की उपेक्षा मत करना. वे लोग जैसा आदेश देंगे, वैसा ही करना. जिस काम को करने से मना कर देंगे, उस काम को कभी मत करना. जैसा करने से वे लोग संतुष्ट रहें, सर्वदा उसीकी चेष्टा करना. किस काम को करने से वे असंतुष्ट हों, उस काम को कदापि मत करना. जो लोग इस प्रकार का आचरण करते हैं, उनको सूसन्तान कहा जाता है. सूसन्तान होने से , माता पिता के सुख और आल्हाद की सीमा नहीं रहती. 
९वाँ पाठ 
सुरेन्द्र, मेरे पास आओ; मुझे तुमसे कुछ पूछना है.इतना सुनते ही, सुरेन्द्र तत्काल शिक्षक महाशय के पास उपस्थित हुआ. उन्होंने कहा, मैंने सुना है, कल तुम तालाब के किनारे खड़े हो कर, ढेला फेंक रहे थे; इससे मैं बहुत दुखी और असंतुष्ट हुआ हूँ. अभी मैं तुमसे पूछता हूँ, यह बात सत्य है य़ा नहीं?
सुरेन्द्र ने कहा, हाँ महाशय आपने जो सुना है, वह सत्य है; मैंने ढेला फेंका था. ढेला फेंकना कोई गलत बात है, वह मैं नहीं समझ सका. गाँछ की डाली पर एक पंछी बैठा था, उसको मारने के लिये मैंने ढेला फेंका था.

यह बात सुन कर, शिक्षक बोले, सुरेन्द्र, तुमने बहुत गलत काम किया है. पंछी ने तुम्हारा कुछ बिगाड़ा नहीं था, किस लिये तुम उसको ढेले से मारने की कोशिश कर रहे थे? यदि उसके देह पर ढेला लग जाता, तो उसे कितना कष्ट होता? यदि दूसरा कोई व्यक्ति ढेला चलाये और वह तुम्हारे शरीर पर लगे, तो तुमको कितना कष्ट होगा? मैं तुमको चेतावनी देता हूँ, कि आगे से तुम किसी पक्षी य़ा किसी भी जन्तु को कभी ढेले से नहीं मारोगे.

सुरेन्द्र यह सुन कर, अत्यंत लज्जित हुआ; एवं कहा, महाशय, मैं अबसे और किसी भी प्राणी को ढेला नहीं मारूंगा. बहुत से लड़के ऐसा करते हैं, उन्ही को देख कर मैंने भी वैसा कर दिया था. अब मैं समझ गया हूँ, कि किसी को ढेले से मारना अच्छी बात नहीं है. 

तब शिक्षक बोले, तुम्हारी यह बात सुनकर मैं संतुष्ट हुआ हूँ. किन्तु तुमने, जिस पक्षी को लक्ष्य करके ढेला चलाया था, वह ढेला उसके शरीर पर नहीं लगा. निकट में ही एक बालक खड़ा था, ढेला उसके सर पर लगा, उसका सर फुट गया और रक्त गिरने लगा. यदि उसके आँख पर लग जाता, तो वह जन्मजात काना हो सकता था. बालक दर्द से व्याकुल होकर कितना रोया है. अब तुम्ही देखो, ढेला चलाना कितनी बुरी बात है.

सुरेन्द्र यह सुनकर बहुत दुखी हुआ, एवं मैंने बहुत बड़ी गलती कि है, यह कह कर रोने लग पड़ा. कुछ देर बाद उसने कहा, महाशय, नासमझी के कारण मैंने यह दुष्कर्म किया है. आपके सामने वचन देता हूँ, फिर कभी ऐसा बुरा कर्म नहीं करूंगा. इस बार आप मुझे क्षमा कर दीजिये. 
शिक्षक यह सुन कर बहुत संतुष्ट हुए; एवं बोले, सुरेन्द्र, तुमने गलती करके, उसे स्वीकार कर लिया है, इससे मैं अतिशय संतुष्ट हुआ हूँ. देखो, ढेला चलाना अच्छी बात नहीं है, इस बात को फिर कभी  भूल मत जाना. 
१०वाँ पाठ 
चोरी करना कदापि उचित नहीं है ! 
बिना बताये दूसरों की कोई वस्तु ले लेने को चोरी कहते हैं.चोरी करना बहुत बड़ा दोष है. जो चोरी करता है,उसको चोर कहते हैं.चोर पर कोई विश्वास नहीं करता.चोरी करने के बाद, यदि चोर पकड़ा जाता है, तो उसके दुर्गति की कोई सीमा नहीं रहती. बच्चों के लिये यही उचित है,कि कभी चोरी न करे.

माता-पिता का यही कर्तव्य है,कि यदि अपने बच्चों को किसी की कोई वस्तु चोरी करते देख ले,तो उसको डांट-फटकार लगाये, एवं चोरी करने से क्या हानी होती है, इस बात को उन्हें अच्छी तरह से समझा दें. 

एक बार, एक बालक विद्यालय से, किसी दूसरे सहपाठी की पुस्तक चुरा कर घर ले आया. बहुत बचपन में ही इस बालक के माता पिता की मृत्यु हो गयी थी. उसकी मौसी ने उसको पाल-पोष कर बड़ा किया था. मौसी ने, उसके हाथ में वह पुस्तक देख कर पूछा, भुवन, तुमको यह पुस्तक कहाँ से मिली ? उसने कहा कि, यह पुस्तक मेरे विद्यालय के एक लड़के की है. 

वह समझ गयी, कि भुवन उस पुस्तक को कहीं से चुरा कर लाया है. किन्तु मौसी ने उससे पुस्तक को वापस कर देने के लिये नहीं कहा, भुवन को कोई डांट-फटकार भी नहीं लगायी, य़ा भुवन को आगे से चोरी करने को मना भी नहीं किया.

इसी बात से भुवन की हिम्मत और बढ़ गयी. वह जितने दिन विद्यालय में रहा, मौका मिलते ही, चोरी कर लेता था. इसी प्रकार करते करते वह क्रमशः, एक शातिर चोर बन गया. सभी लोग इस बात को जान गये, कि भुवन एक बहुत बड़ा चोर बन गया है. 
यदि किसी की कोई वस्तु कभी खो जाती, तो उसी को चोर समझ कर, सभी उसके ऊपर ही संदेह करते थे. जब भुवन किसी के घर जाता, तो उस घर के लोग, इस भय से बहुत सतर्क हो जाते कि यह कहीं कुछ चुरा तो नहीं लेगा; इसीलिये वे उसको दुत्कार कर, य़ा जरुरी लगा तो मारपीट कर अपने घर से भगा देते थे. 

कुछ समय के बाद, राजा के सिपाहियों ने भुवन को चोर समझ कर पकड़ लिया. तथा यह प्रमाणित भी हो गया, कि वह बहुत समय से चोरी करता आ रहा है, एवं कई लोगों की बहुत सारी चीजें चोरी कर ली है. न्यायधीश ने भुवन को फाँसी की सजा सुना दी. उस समय भुवन को होश हुआ. जिस स्थान पर अपराधियों को फांसी दी जाती है, जब उसको भी वहाँ ले जाया गया, तब भुवन राजा से बोला, आप दया करके, मेरी एक अन्तिम ईच्छा पूरी कर दीजिये, एक बार मुझे अपनी मौसी से मिलवा दीजिये. 

भुवन की मौसी को उस स्थान पर ले आया गया, वे भुवन को उस हालत में देख कर जोर जोर से रोने लगी, और रोते रोते भुवन के पास पहुंची. भुवन ने कहा, मौसी, अब रोने से क्या होगा. मेरे पास आओ तुम्हारे कान में मैं एक बात कहना चाहता हूँ. मौसी जब नजदीक पहुंची तो भुवन अपना मुख उनके कान के पास ले गया, एवं अपने दातों से कसकर, उसका एक कान ही काट लिया. तथा  उसकी भर्त्सना करता हुआ बोला, मौसी, आज जो मुझे फाँसी पर चढना पड़ रहा है, उसका एकमात्र कारण केवल तुम ही हो.

जिस दिन मैंने पहली बार चोरी की थी, तुम उसे जान गयी थी. उसी समय यदि तुम मुझ पर कड़ाई करती, कोई दण्ड दे देती, तो आज मेरी यह दशा नहीं होती. तुमने वैसा नहीं किया, इसीलिये मैंने तुमको यह पुरष्कार दिया है. 
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