Tuesday, March 23, 2010

भारतीय नारी एक ही आधार में गुरु, जीवन साथी और माँ जैसी सेविका भी है -प्रव्राजिका देवात्मप्राणा


{प्रव्राजिका देवात्मप्राणा, रामकृष्ण सारदा मिशन विवेकानन्द विद्या भवन,दमदम|९ अक्टूबर २००९ को सारदा नारी संगठन के बीसवें वार्षिक महिला प्रशिक्षण शिविर में बंगला भाषा में प्रदत्त उद्घाटन भाषण का हिन्दी अनुवाद }
सारदा नारी संगठन के प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने वाली समस्त " सारदा-कन्याओं " को मैं अपनी हार्दिक शुभेच्छा और आन्तरिक स्नेहाशीष देती हूँ! उपस्थित अन्यान्य समस्त सुधि-वृन्द को यथायोग्य संभाषण एवं प्रेमपूर्ण नमस्कार निवेदित करती हूँ| ८ से ११ अक्टूबर २००९ तक चलने वाले इस चार दिवसीय प्रशिक्षण शिविर को सारदा नारी संगठन ने आयोजित किया है|चार दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण शिविर को परिचालित करना  निश्चित रूप से सांगठनिक शक्ति का द्योतक है, जिसमे शिविर के समाप्ति तक समस्त नारियाँ यहीं अवस्थान करेंगी|माँ से प्रार्थना करती हूँ कि यह शिविर निर्विघ्न सम्पन्न हो ताकि जिस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये यह शिविर आयोजित किया गया है वह पुर्णतः सफल हो ! अर्थात जो भी महिलायें और युवतियाँ यहाँ आयीं हैं उनमे से प्रत्येक का जीवन माँ के आलोक से आलोकित हो उठे, उनका जीवन धन्य हो जाये !  
आप सबों को चार दिनों तक इस शिविर में स्वेच्छा से बन्दी हो कर, कितनी ही असुविधाओं के बीच ये चार दिन बिताने होंगे| प्रातः काल से लेकर रात्रि पर्यन्त पूर्व-निर्दिष्ट कार्यक्रमों के अनुसार भलीभांति चलना होगा, यह उतना आसन कार्य नहीं है| किन्तु श्रद्धा के साथ,आग्रह के साथ आनन्द के साथ इन समस्त कार्यक्रमों में भाग लेने से- अपने जीवन की गति स्वतः शुभ-कर्म के पथ पर निर्दिष्ट हो जाएगी|
इस पवित्र वातावरण के शुभ भाव, शुद्ध भाव के बीच चार दिनों तक रह लेना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है! नारी संगठन ने इसका सुयोग कर दिया है, इस कार्य के लिये मैं उनको विशेष धन्यवाद देती हूँ !
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल द्वारा प्रकाशित इसके मुख-पत्र " विवेक-जीवन " को मैं नियमित रूप से पढ़ती हूँ| इसको पढने में बहुत अच्छा लगता है| इस मुख-पत्र में महामण्डल के द्वारा भारत के जिन राज्यों में शिविरों का आयोजन तथा विभिन्न आयोजन होते रहते हैं, उनमे क्या-क्या चर्चा होती है, क्या वक्तव्य दिये जाते हैं, शिविरार्थियों के द्वारा जो सब प्रश्न किये जाते हैं, उनके जो उत्तर दिये जाते हैं वह सब इसमें प्रकाशित किया जाता है| 
इसको पढने से यह पता चल जाता है कि ' युवा महामण्डल ' एक ऐसा यन्त्र है जो सारे भारतवर्ष में समस्त युवाओं के ह्रदय में स्वामी विवेकानन्द के भावों को भरने का प्रयास करता आ रहा है, ताकि उनका ह्रितपिण्ड स्वामीजी के भावों से अनुप्राणित हो जाये|और इस सारदा नारी संगठन के विकास और प्रगति के जड़ में भी यह अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की शक्ति ही उसकी प्रेरक-शक्ति बन कर कार्यशील है |
और इस सारदा नारी संगठन का क्या उद्देश्य है ? इस संगठन ने महिलाओं और युवतियों के ह्रदय में माँ को प्रतिष्ठित करा देने का व्रत लिया है ताकि नारियों के भीतर माताओं के भीतर माँ सारदा के भावों को विशेष रूप से क्रियाशील किया जा सके|
 इनलोगों ने (नारी-संगठन की वरिष्ठ दीदियों ने) माँ के आदर्श में अपने जीवन को अनुप्राणित किया है, एवं अन्य नारियों के ह्रदय में भी माँ के भावों का विस्तार करने के लिये आगे बढ़ी हैं|तथा इस शिविर में शामिल समस्त नारियों का यह दायित्व है कि वे भी श्री श्री माँ के आदर्श को अपने जीवन में रूपायित कर लें|
माँ के आदर्श के अनुसार अपना जीवन गठित करने के लिये सर्वप्रथम आवश्यकता है माँ को अपने ह्रदय से चाहना और उनपर श्रद्धा रखना; फिर शेष सब कुछ अपने आप हो जायेगा|माँ के प्रति थोड़ा भी प्रेम रखने से सब हो जायेगा! माँ तो हमलोगों पर कृपा करने के लिये उन्मुख होकर खड़ी हैं, हमे केवल अपनी अश्रद्धा को इस कार्य में बाधक बनने से रोकना है|
जिस महान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये यह शिविर आयोजित हुआ है, उसमे किन्तु कृतकार्य होने के लिये हमलोगों को सबसे पहला अपना शरीर स्वस्थ रखना होगा|क्योंकि यदि शरीर स्वस्थ न रहे तो किसी भी कार्य में मन नहीं लगेगा,यहाँ पर चल रही कक्षाओं में बताये जा रहे महत्वपूर्ण विषय भी मनोयोग पूर्वक हम सुन नहीं सकेंगे|
अतः जीवन-गठन का पहला सोपान है ' शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना ' यह होने के बाद ही हम परवर्ती सोपानों की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं|इसीलिये हमारे शास्त्रों में कहा गया है- " शरीरम आद्यं खलू धर्मसाधनम !" अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिये हमे सूर्योदय से पूर्व ही शैय्या को त्याग कर देने की आदत डालनी होगी, फिर कुछ हल्का शारीरिक व्यायाम करके अपने आहार-विहार को भी परिमित रखने का नियमित अभ्यास करना होगा| विशेष कर आहार-ग्रहण के सम्बन्ध में बहुत सावधान रहना होगा,जिन खाद्य पदार्थों को ग्रहण करने से शरीर अस्वस्थ हो जाने की सम्भावना होती है, किसी भी कारण से (स्वाद आदि के लोभवश ) उन खाद्य पदार्थों को ग्रहण नहीं करना है| शरीर को स्वस्थ रखने के लिये उपरोक्त दिनचर्या का नियमित अभ्यास करना हमारा विशेष दायित्व है, यह भी साधना के अन्तर्गत आता है, केवल जप-ध्यान करने से क्या होगा?

 यह ठीक है कि जपध्यान करने से मन एकाग्र, पवित्र और शान्त होता है, किन्तु यदि हमारा शरीर ही स्वस्थ न हो तो जप ध्यान में मन नहीं लगेगा|सर्वप्रथम हमे अपने शरीर को स्वस्थ रखने का उत्तरदायित्व ग्रहण करना होगा, उसके बाद ही जपध्यान कि ओर अग्रसर होने का प्रश्न उठेगा|स्वामीजी ने भी तो कहा था न, " शरीर में बल नहीं, ह्रदय में उत्साह नहीं, मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं, क्या होगा रे ऐसे जड़ पिण्डों के द्वारा ? " 
इसीलिये सबसे पहले शरीर गठन करना होगा|स्वामी विवेकानन्द अपने कर्मियों (संतानों) की स्नायू -पेशियाँ बज्र के समान फौलादी देखने की कामना करते थे; अतः इन सबको शक्तिशाली बनाना होगा|नहीं बनाने से क्या होगा ? यदि हमारी स्नायू-पेशियाँ बज्र-सम उपादानो से न गठित हों तो सांसारिक और परिपार्श्विक घात-प्रतिघातों के प्रतिक्रिया के फल स्वरूप हमारा मन सदैव उद्वेलित बना रहेगा|

हमे प्रतिक्रिया किये बिना अविचलता (Poise ) का गुण धारण करने की शक्ति अपने भीतर रखनी होगी; इसीलिये जिन सब दिनचर्या को जीवन में धारण करने से हमलोगों का शरीर स्वस्थ और सबल रहे उस ओर विशेष ध्यान देना होगा| 
किस प्रकार से गठित जीवन को " आदर्श-चरित्र " कहा जा सकता है ? उसीका चरित्र आदर्श माना जा सकता है जिसके जीवन में चारों योगों का समन्वय रहता है | योग किसे कहते हैं? - उपाय या पथ को योग कहते हैं| किस चीज का उपाय? किस लक्ष्य तक पहुँचने का पथ?  आदर्श चरित्र के अनुरूप सुन्दर जीवन गठित करने के जो उपाय या पथ हैं उनको ही " योग " कहते हैं| 


 आत्मज्ञान ज्ञान प्राप्त करने से  या आत्मस्वरूप की उपलब्धि करने से जो आदर्श चरित्र गठित होता है,उसी आत्मसाक्षात्कार करने के उपाय को योग कहते हैं |चार प्रकार के योग कहे गये हैं, उनके नाम क्या क्या हैं ? कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, राजयोग| ज्ञानयोग क्या है ? 

" ईश्वर ही सत्य हैं, और सबकुछ ( गो गोचर जहँ लग मन जाई सो सब माया जान हु भाई ) अनित्य है !" इस तथ्य को अपने अनुभव से जान लेना होगा ! (नेति-नेति) विवेक -विचार करते हुए इस सिद्धान्त (परम-सत्य या त्रिकाल-बाधित सत्य) तक नेति-नेति विचार करते हुए पहुँच जाने के पथ को ही ज्ञानयोग कहते हैं|
 ' ईश्वर ही सत्य हैं, और सब अनित्य (मिथ्या है पर असत नहीं है) है ' - इसीके ऊपर निरन्तर चिन्तन-मनन करके इस तथ्य (सच्चिदानन्द) को एक बार अवश्य समझ लेना होगा कि ( ब्रह्माजी से लेकर दूर्वा तक में ) सभी वस्तुओं में वे ईश्वर ही अनुष्युत हैं| (Energy is equal to matter या E = M या " रज्जू-सर्प विवेक "  करते हुए या सत-असत और अनित्य या मिथ्या के अन्तर को, अर्थात  परिणाम-वाद और विवर्त-वाद के अन्तर को ठीक से समझ कर " सत-वस्तु " को केवल बुद्धि से जान लेना नहीं, बल्कि अपने अनुभव से पहचान लेना होगा कि यह - " जगत भी ब्रह्म ही हैं !") " ईश्वर सत्य हैं और सब अनित्य है !"   
'ईश्वरई सत्य आर सब अनित्य '  - येइटी विचार करा, येइटी बोधे बोध करा, " ता बुझे फेला "- जे सब वस्तुते सेई ईश्वरई रयेछे |'- अर्थात यह विचार करना, अपने स्वयं के अनुभव से यह जान लेना, " ता बुझे फेला " - इस बात को अच्छी तरह से समझ लेना कि [ दृष्टिगोचर प्रत्येक ' नाम-रूप ' के पीछे वही ' अस्ति-भाति-प्रिय ' हैं] - सभी वस्तुओं में वही ईश्वर ओत-प्रोत हैं ! 
और कर्मयोग क्या है ?

हमलोग जो भी कार्य करते हों - उसी कार्य को निष्काम भाव से करना होगा|मेरे सामने अभी जो कार्य आ गया है या अभी जिस कार्य में मैं लगी हुई हूँ उसको मैं इसलिए नहीं कर रही हूँ मुझे कहीं से कुछ प्राप्त हो जायेगा, बल्कि जिस कार्य को मैं कर रही हूँ उसके फल को भी मैं अपने लिये नहीं चाहती हूँ| हमे ऐसे मनोभाव को रख कर कर्म करना चाहिये कि मैं जिस कार्य को कर रहा /या रही हूँ उसे मैं किसी निजी स्वार्थ के लिये नहीं बल्कि भगवान में प्रीति के लिये (भगवान कि प्रसन्नता के लिये) या सबों के कल्याण के लिये कर रही हूँ|इस मनोभाव के साथ हमलोग कोई भी कर्म करें तो हम भगवान के साथ जुड़ जायेंगे, या भगवान के साथ मेरा योग हो जायेगा| 

और भक्ति-योग क्या है ?ईश्वर के जिस नाम-रूप में मेरी निष्ठा है, अर्थात ईश्वर के जिस रूप को मैं अपना इष्ट मानती हूँ, सबों के ह्रदय में वे ही विराजित हैं, जो मुझे सबसे अच्छे लगते हैं -  उनके प्रेम में उनके चरणों में आत्मनिवेदन कर देना ही भक्ति-योग है|जिनको मैं अपना इष्ट (ठाकुर) मानती हूँ उनसे बढ़ कर मेरा अपना और कोई भी नहीं है|

वे ही मेरे प्रेमास्पद हैं, उनसे मैं बहुत प्रेम करती हूँ |सभी प्रेम के केंद्र बिन्दु 'वे ' ही हैं, ( संसार के जिस किसी व्यक्ति या वस्तु से मैं प्रेम करती हूँ वह यही समझ कर करती हूँ कि सभी के केंद्र या ह्रदय में वे ही विराजमान हैं)|मैं जो कुछ भी करती हूँ, जितना भी कार्य करती हूँ - वह सब अपने इष्ट की प्रसन्नता के लिये करती हूँ| उनके प्रेम में आत्म निवेदन कर रही हूँ!( मेरे तो गिरिधर-गोपाल दूसरो न कोय - आशिक (प्रेमी) है ? तो माशूक (प्रेमास्पद) को हर रूप में पहचान !) इसको ही भक्ति योग कहते हैं|        
और राजयोग क्या है ?(द्रष्टा-दृश्य विवेक - ' घट द्रष्टा घटात भिन्नः ' का बोध न रहने के कारण ) माया का राज्य हमलोगों के चित्त को विक्षिप्त कर देता है| प्रत्येक क्षण ऐसा प्रतीत होता है कि कोई स्पष्ट कारण न रहने के बाद भी मेरा चित्त इतना विक्षुब्ध (बहिर्मुखी) हुआ जा रहा है कि मैं उसको संयत नहीं कर पा रही हूँ|अपने चित्त को विक्षिप्त होने (बहिर्मुखी बने रहने ) से रोककर, इन्द्रिय विषयों में जाने से रोक कर, विषयों से वापस खींच कर (उसे अन्तर्मुखी बना कर) अपने यथार्थ स्वरूप में निविष्ट कर देना, मन को तैल-धारवत एकाग्र रखना या मन कि एकाग्रता को ध्यान में परिणत कर लेना ही राजयोग है| 

 आप सबों ने ' रामकृष्ण मिशन ' का प्रतीक चिन्ह अवश्य ही देखा होगा|
 [ The emblem of the Ramakrishna Order designed by Swamiji is a unique and unparalleled work of art created by one of the richest minds in contemporary history in an exalted mood of spiritual inspiration. It is a profound symbol of harmony and synthesis for reverential meditation in this present age of conflict and disharmony. This symbol is the epitome of Swamiji's message of harmony and synthesis, leading to life's fulfilment. This is indeed the most eloquent expression of what he really preached, what he wanted every man and woman to be, to realize, either in the East or in the West. The goal is to realize, even in this very life, one's real Self, the self-effulgent Atman, the Swan in the emblem and through this realization to be free of all limitations, all bondages, all littleness. This spiritual freedom is one thing to be aspired for and achieved in this very life. It releases one from one's prison-house of limited individuality and confers upon him or her, the blessing of universal existence. He then becomes one with Existence-Knowledge-Bliss Absolute. 'Be free. This is the whole of religion' said Swamiji.
The meaning behind this emblem, in the language of Vivekananda himself:
"The wavy waters in the picture are symbolic of Karma, the lotus of Bhakti, and the rising-sun of Jnana. The encircling serpent is indicative of Yoga and awakened Kunadalini Shakti, while the swan in the picture stands for Paramatman. Therefore, the ideal of the picture is that by the union of Karma, Jnana, Bhakti and Yoga, the vision of the Paramatman is obtained"]
 उसमे जो तरंगायित जलराशि दिखायी दे रही है वह कर्म का प्रतीक है|उसके भीतर एक प्रस्फुटित कमल का फूल है, वह भक्ति का प्रतीक है|उसके पीछे उदीयमान सूर्य   है, वह ज्ञान का प्रतीक है|सब को घेरे हुए एक कुण्डलीकृत सर्प है, वह योग का प्रतीक है| चित्र के मध्य में एक हंस है, वह परमात्मा का प्रतीक है| अर्थात यदि किसी व्यक्ति के चरित्र में कर्म, ज्ञान, भक्ति और योग चारों का समन्वय हो जाये तो उनको परमात्मा की उपलब्धि प्राप्त हो जाएगी |
उसी प्रकार अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के प्रतीक चिन्ह को भी आप लोगों ने अवश्य देखा होगा, वहाँ भारतवर्ष के मानचित्र के भीतर परिव्राजक के रूप में स्वामी विवेकानन्द का चित्र है|

The Emblem
The emblem of the Mahamandal, which appears at the upper right corner of the webpage, shows Swami Vivekananda as an itinerant monk standing at Kanyakumari at the southernmost part of India, which is represented through the line map on the earth. On the top is written : Charaiveti Charaiveti (Onward! Onward!) and at the bottom: BE AND MAKE. The rest of the circle representing the earth is encapsulated with a series of small Vajras.

उसके ऊपर में लिखा है- " चरैवेति चरैवेति " और नीचे लिखा है, महान भारत का निर्माण करने के लिये स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त ' भारत-निर्माण सूत्र ' - " Be and Make " ! जिसका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण भारतवर्ष स्वामीजी कि मनुष्य निर्माणकारी और चरित्र निर्माणकारी शिक्षाओं से अनुप्राणित होकर - स्वयं (यथार्थ) मनुष्य बनने और और दूसरों को भी यथार्थ मनुष्य बनाने की दिशा में क्रमशः आगे बढ़ता रहे! अर्थात जिस किसी व्यक्ति का जीवन दीप स्वामीजी के भाव में प्रज्वलित हो चुका है, वह अन्य एक जीवन दीप को भी प्रज्वलित करे !
इस शिविर में आपलोगों ने ' सारदा नारी संगठन ' के प्रतीक चिन्ह को भी अवश्य देखा है : श्री माँ की ध्यानस्थ मूर्ति है, जिसके ऊपर " चरैवेति " लिखा है और नीचे " Be and Make " लिखा है| अर्थात समस्त नारियों (मात्री-मूर्तियों) के ह्रदय में वही " ज्ञानदायनी " सारदा सरस्वती विराजित हो जाएँ, जो मेरे ह्रदय में विराजित हैं! इसी अदम्य इच्छा या भावना को लेकर आगे बढ़ते रहें| जो नारी इस दिशा में उन्नत होने के मार्ग पर अग्रसर हो चुकी हैं, जिनका ह्रदय दीप " माँ " के भाव में प्रज्वलित हो उठा है वे और एक दीप को प्रज्वलित करें! 

यही है लक्ष्य - अपने नारी जीवन को सार्थक करने का लक्ष्य ! इस शिविर में भाग लेने वाली प्रत्येक नारी के ह्रदय में यही अदम्य इच्छा रहनी चाहिये कि मुझे भी इसी लक्ष्य तक पहुँचना है! इसी आदर्श को स्थापित करने की दिशा में यह संगठन भी क्रमशः आगे बढ़ता जा रहा है!

श्री रामकृष्ण (ठाकुर) ने जिस सत्य की उपलब्धि की थी- स्वामी विवेकानन्द (स्वामीजी) ने उन्ही की शिक्षाओं को सम्पूर्ण विश्व में प्रचारित किया है| माँ ने उसी  " सत्य " को अपने जीवन में उतार कर दिखा दिया है ! ठाकुर से कोई यदि यह पूछता कि - आपकी शिक्षा (उपदेश) क्या है? तो श्री रामकृष्ण बड़े विरक्त हो उठते थे |
 और किसी शिशु के जैसी नाराजगी दिखाते हुए कहते थे- ' लो देखो इसकी बात, भला मैं क्या शिक्षा दूंगा ? मेरी शिक्षा या उपदेश जैसा तो कुछ भी नहीं है, मैं तो बस खाता-पीता हूँ और माँ को पुकारता रहता हूँ|' " माँ'र छेले श्रीरामकृष्ण देव " - अर्थात साक्षात् " जगदम्बा के पुत्र श्रीरामकृष्ण देव " ने अपने जीवन में कभी भी बहुत बड़े पंडाल में सभा बुला कर और हजारो हजार मनुष्यों के सामने मंच पर बैठ कर अपने उपदेशों को नहीं सुनाया था| 

दक्षिणेश्वर के जिस कमरे में वे रहते थे, वहाँ कुछ इने-गिने चुने हुए मनुष्य आया करते थे| उनके साथ नित्य चर्चाएँ किया करते थे, बातचीत के क्रम में कुछ कहानियाँ आदि भी  सुनाया करते थे| भाषण आदि देने के लिये दूर-दूर तक जाते रहे हों, ऐसी कोई बात नहीं थी| हाँ, यदि उन्हें कभी यह पता चल जाता कि अमुक मनुष्य भगवान से बहुत प्रेम करता है, तो केवल उनको देखने के लिये दौड़े-दौड़े जाते थे|

 या किसी व्यक्ति के बारे में यह सुनते कि अमुक आदमी मनुष्यों की बहुत सेवा करते हैं - तो उनको देखने के लिये भी गये हैं| इस प्रकार के कुछ गिने-चुने भक्तों के घर में ही उनका आगमन हुआ था| किन्तु उन्ही कतिपय अल्प मनुष्यों को दिये उनके उपदेश परवर्ती काल में स्वामीजी के माध्यम से सम्पूर्ण जगत में तुमुल निनाद बन कर गुंजायमान हुआ है| 

और आज सम्पूर्ण जगत इस बात को स्वीकार कर रहा है कि केवल यह शिक्षा (जितने मत उतने पथ) ही इस जगत को विनाश से बचा सकती है|अन्य कोई उपाय नहीं है, यही (सर्वधर्म समन्वय ) ही एकमात्र पथ है|  
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -" My ideal indeed can be put into a few words and that is to preach unto mankind their divinity and how to manifest it in every movement of life." - अर्थात " मेरे आदर्श को ( मेरे सम्पूर्ण वांगमय को) वस्तुतः अत्यन्त संक्षेप में (' बनो और बनाओ ' के रूप में ) प्रस्तुत किया जा सकता है, और वह है - समस्त मनुष्यों को उनमे अन्तर्निहित देवत्व का उपदेश देना और जीवन के हर कदम पर ( जिवनेर प्रति पद्क्षेपे ) उसी देवत्व को अभिव्यक्त करने की पद्धति या उपाय ( है  - ' तुम स्वयं चरित्रवान मनुष्य बनो और दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो ') समझा देना |" 
श्रीरामकृष्ण देव ने कहा था- " ईश्वर लाभ करना ही मनुष्य जीवन चरम लक्ष्य है! " ईश्वर-लाभ रूपी जीवन आदर्श को पकड़ कर चलने (या चरित्रवान मनुष्य बनने ) के जिस आदर्श को श्रीरामकृष्ण देव ने अपने जीवन में उतार कर प्रचारित किया था; उनकी उसी आदर्श शिक्षा पद्धति - (" Be and Make ") को स्वामीजी ने अन्य भाषा में जगत के समक्ष प्रस्तुत किया था| 

धर्म ( या चरित्र ) ही भारत का मेरुदण्ड है, आध्यात्मिकता ही भारत का प्राण है| धर्म क्या है ? सभी धर्मों में कुछ बहिरंग भाग (पूजा-अनुष्ठान पद्धति और पुस्तक आदि) रहता है, किन्तु उस बहिरंग रूप को ही यथार्थ धर्म नहीं कहा जा सकता|फिर भी साधारण मनुष्य उसी बहिरंग के आचार-अनुष्ठान का पालन करने को ही धर्म समझकर बहिरंग के अनुष्ठानों में ही अपना पूरा जीवन नष्ट कर लेता है| और असली धर्म आचरण से दूर ही रह जाता है| 

यथार्थ धर्म क्या है? मन,वचन और कर्म से धार्मिक होना, अर्थात बोली में, विचारों में, आचरण में या व्यवहार में, सही ढंग से धर्म का पालन करना; किसी भी कार्य को करते समय - सत्य, न्याय और निःस्वार्थपरता का पालन करते हुए सेवा के आदर्श को दृढ़ता से पकड़कर कार्य करते जाना| हम चाहे किसी भी कार्य-क्षेत्र में नियुक्त क्यों न हों, चाहे किसी ऑफिस में कार्य करूँ या घर-गृहस्ती का कार्य करूँ, परिवार के बीच रहूँ या कारखाने में रहूँ या मन्दिर में रहूँ - हर जगह सत्य को पकड़े रहना होगा,( अर्थात हर समय अपने आत्मस्वरूप के प्रति सचेतन रहना होगा)| 

हमे पक्षपाती न बनकर न्याय-परायण बनना होगा, निःस्वार्थपर होना होगा| मन में सेवा का भाव (शिवज्ञान से जीव सेवा का भाव) रखना होगा| स्वामीजी ने कहा है, " तुमलोगों की आध्यात्मिकता के ऊपर केवल भारत का ही नहीं सम्पूर्ण जगत का कल्याण निर्भर करता है| "

' आध्यात्मिकता ' - क्या है? अपने " यथार्थ स्वरूप " के सम्बन्ध में सदैव सचेतन रहना ! सदैव इस सत्य में स्थित रहना कि मैं अविनाशी या नित्य परमेश्वर के साथ एकात्म हूँ, मैं कोई अनित्य या मरणधर्मा जड़ शरीर नहीं हूँ| मैं एक साढ़े तीन हाथ के छोटे से शरीर में या इन्द्रियों में आबद्ध अहं-सर्वस्व (अपने को केवल शरीर मानने वाला) कोई जड़ पदार्थ नहीं हूँ|( शरीर तो जड़ है किन्तु मैं चेतन हूँ, जड़ घट को देखने वाला चेतन है) वास्तव में मैं ही ' वह ' परम आनन्दमय, सत-चित-आनन्द-स्वरूप हूँ ! 

किन्तु मैं इस बात को कहीं से सुन कर या रट कर नहीं बोल रही हूँ | यह केवल मुख से कहने वाली बात नहीं है| मैं इस बात को अपने अनुभव के आधार पर कह रही हूँ, यह मेरी उपलब्धि (आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अपने स्वरूप को जानना ) है ! इस अवस्था में सदैव जाग्रत रहने को ' सचेतनता ' कहते हैं| यही है आध्यात्मिकता |
 ( मानव जाती के सच्चे नेताओं में यह आध्यात्मिकता या 'आध्यात्मिक-शक्ति' अनिवार्य रूप से रहनी चाहिये|) मनुष्य अपने छोटे अहं (कच्चा मैं के भ्रम या स्वयं को M/F मानने के भ्रम से ) से जितना दूर होता जाता है, उतने ही परिमाण में क्रमशः उसके भीतर ईश्वर का प्रकाश आविर्भूत होता जाता है| इसीलिये इस आध्यात्मिक दृष्टि को प्राप्त करके ( दृष्टिम ज्ञानमयी कृत्वा पश्येत ब्रह्ममय जगत ) सेवा कर्म में (शिवज्ञान से जीव सेवा कर्म में) निरत रहना एवं आत्मनिवेदन कर देना ही आध्यात्मिक जीवन है | धर्म का अर्थ है चरित्र, और यही वह यथार्थ शक्ति है जो हमे सुख-दुःख में सम रहने की योग्यता प्रदान करता है !
हमलोगों में से कोई भी व्यक्ति दुःख नहीं पाना चाहता है, दुःख के नाम से शिहर उठते हैं| बोल पड़ते हैं- अरे बाप ! इस प्रकार जीवन जीने या इस पथ पर चलने से तो मुझे दुःख उठाना पड़ सकता है, इसलिए मुझे इस रास्ते से लाख हाथ दूर ही घिसक जाना चाहिये| हमलोगों में से कोई नहीं चाहता कि मेरे सन्तान को जीवन में थोड़ा भी दुःख-कष्ट प्राप्त हो| हमलोग ऐसी व्यवस्था करने कि चेष्टा करते हैं, जिससे उसका सारा जीवन सुख में बीते| हम सभी मनुष्य सुख पाने की ही कामना करते हैं, किन्तु जीवन में दुःख की भी उपयोगिता है| 

किन्तु यदि किसी व्यक्ति के जीवन में लेश मात्र भी दुःख नहीं प्राप्त हो, तो उसके जीवन की बुनियाद ही कच्ची रह जाएगी| अर्थात जीवन के जो रिपू(काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह, और मत्सर आदि) हैं, वे नष्ट नहीं हो पाते| इसलिए जीवन-गठन में दुःख की भी एक बड़ी भूमिका है| जीवन को चट्टानी बुनियाद पर गठित करना आवश्यक है| यदि बाहरी आंधी-तूफान जीवन में न भी आये तो भी, दुःख को ग्रहण करना होगा|
क्यों कि दुःख के बिना जीवन गठित नहीं होता है, अभिमान (अहंकार) नहीं जाता है|जीवन में दुःख भोग किये बिना रिपुओं का नाश भी नहीं होता है|इसीलिये तुमलोग भी अपने जीवन में केवल सुख, केवल सम्मान केवल आदर-सत्कार पाने की ही इच्छा मत करना| क्योंकि वैसा करने से तुमलोग यथार्थ मनुष्य बनने के बजाय दिनोदिन अधिक हीन, और ज्यादा क्षुद्र, और अधिक स्वार्थपर बन जाओगी| और दुःख-सुख में जितना सम या संतुलित रह सकोगी, जीवन में आघात-अपमान मिलने पर जितने शान्त मन से उनका वरण करोगी उतना ही देख पाओगी कि वे समस्त आघात-अपमान - तूफान के अन्त में पेंड़ से झड़े पत्तों के जैसे तुम्हारे ही चरण तले आकर आश्रय ग्रहण कर रहे हैं! 

( मन को एकाग्र रखने की) साधना के द्वारा ही समस्त प्रकार के दुखों से परित्राण (छुटकारा) प्राप्त कर सकता है | तुमलोग अपने को दिनोदिन अधिक उदार, पवित्र, सहिष्णु और अभिमान शून्य बनाने की साधना करती रहो; तभी भगवान तुम्हारे ह्रदय में प्रतिष्ठित हो सकेंगे|

बहुत से लोग धर्म साधना में अतिकष्टकर साधन-प्रणाली को ही धर्मलाभ की अन्यतम शर्त मान लेते हैं| वे लोग सोंचते हैं - प्रत्येक रविवार को गंगा-स्नान के लिये जाना होगा, दिन में केवल एक बार ही खाना होगा, शैया पर नहीं सोना होगा, वृक्ष के तले शयन करना होगा, अथवा मौन रहना होगा- आदि आदि| यह सब करने से इन्द्रियों पर विजय पाने में कुछ सहायता अवश्य मिल सकती है, किन्तु इसको ही धर्म का सर्वस्व नहीं समझना चाहिये| 
जिस प्रकार मेरी साधना का उद्देश्य कष्टकर साधनों में ही निरत रहना नहीं है उसी प्रकार विलासितापूर्ण जीवन बिताना भी नहीं है| विलासितापूर्ण जीवन हमारे चरित्र को और भी नीचे गिरा देती है| अतः हमलोगों को न तो अधिक कष्टकर जीवन बिताना चाहिये, न तो विलासिता में जीने की इच्छा करनी चाहिये| हमलोगों के जीवन का मूल उद्देश्य है- ज्ञान लाभ, भक्ति लाभ, भगवान की ओर (मुड़ जाना ) आगे बढ़ जाना|
इसका प्रथम सोपान है - जीवन को आनन्द पूर्वक जीना| और उसका उपाय है- पवित्रता, शरीर-मन-वचन से सदैव पवित्र रहने की चेष्टा करना| मेरे भीतर (मन में ) काम,क्रोध,लोभ,मद, मोह, मात्सर्य आदि जो षडरिपू निवास करते हैं, उनसबको मैं अपने नियन्त्रण में रखूंगी | पवित्रता (का पालन करना) - इसीको कहते हैं! मैं षडरिपुओं के वशीभूत होकर (या मन और इन्द्रियों की गुलाम बनकर) कोई भी आचरण नहीं करुँगी|
दूसरा सोपान है मन के ऊपर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त कर लेना, इसके लिये मुझे मन को एकाग्र रखने का अभ्यास (अनुशीलन) करना होगा| मेरे मन में क्या चल रहा है, इसको बाहर से नहीं समझा जा सकता|निरन्तर मन ही मन अनुशीलन न चलने से कोई व्यक्ति धार्मिक जीवन जी ही नहीं सकता| वाह्यप्रकृति (बहिरंग को) और अन्तः प्रकृति (अन्तरंग को) को हमे अपने नियन्त्रण में रखना ही होगा| {जब चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण गुण ' Poise ' या ' सन्तुलन ' हमारे जीवन का अंग बन जायेगा, या अपने मन के ऊपर हमारा पूर्ण नियन्त्रण हो जायेगा तब} मेरी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी होने के साथ ही साथ - (सास या बहु की भूमिका निभाते समय) मैं कभी ' Outburst ' नहीं करुँगी अर्थात अपना आपा नहीं खोउंगी !

 किन्तु यदि मन को एकाग्र रखने या अपने नियन्त्रण में रखने की साधना- " मनः संयोग " का नियमित अभ्यास न करूँ तो जीवन की हर परिस्थितियों में शान्त और संतुलित रह पाना कभी संभव न हो सकेगा| सत, असत का विवेक-विचार करना चाहिये| सत क्या है ? जो हमें ईश्वर की ओर ले जाता हो, विकास की ओर ले जाता हो| हमे अपने ह्रदय का निरिक्षण करना चाहिये कि वह बड़ा हो रहा है या नहीं, अर्थात मैं दूसरों के साथ एकात्मबोध करने में सक्षम हो पा रहा हूँ या नहीं, मैं सन्मार्ग पर चल रही हूँ या असत के पथ पर, या कहीं मैं और भी अधिक संकीर्णता के पथ पर या स्वार्थपरता की दिशा में तो अग्रसर नहीं हो रही हूँ| 
अपने मन को सदैव ऊंच्च भावों से परिपूर्ण रखना होगा, अर्थात हर समय केवल यह अनुभव करना होगा कि - ईश्वर ही एक मात्र सत्य वस्तु हैं और सब अनित्य है!यदि क्षण भर के लिये भी तुम्हारे मन में यह विचार उठे, यदि एक बार भी तुम यह सोचो कि तुम ईश्वर नहीं हो, (ईश्वर से भिन्न जड़ शरीर मात्र हो) तो तुम महाभय से (मृत्यु के भय से) आक्रान्त हो जाओगी ! और जैसे ही तुम्हारे मन में यह बोध जाग्रत हो जायेगा कि - " सोअहम " ; अर्थात मैं ही वह हूँ (" I am He "), ' मैं ही ईश्वर हूँ ' यह बोध जाग्रत होते ही मन अपूर्व आनन्द और शान्ति से भर उठेगा|
रात दिन हर समय ' भगवान, भगवान ' करते हुए आनन्द कितनो को होता है? बहुत अधिक जप- ध्यान कौन कर सकता है ? हर समय वैसा करना संभव नहीं होता| इसीलिये हमलोगों को जीवन के विस्तार के मार्ग से या ह्रदय को विस्तार करने के पथ- (" Be and Make ") से हो कर जाना ही पड़ेगा| इसीलिये स्वामीजी ने कर्म, भक्ति और ज्ञान को ह्रदय के विस्तार के साथ जोड़ दिया है, उन्होंने नारायण ज्ञान से नर सेवा करने को - ' सेवा योग ' कहा है| इसी को आश्रय करो, अर्थात ' सारदा नारी संगठन ' से जुड़ कर इसके माध्यम से सभी नारियों के ह्रदय में माँ को प्रतिष्ठित कराने का कार्य करती रहो- और कुछ भी करना नहीं पड़ेगा|
यदि हमलोग इस ' सेवा-योग ' को ग्रहण कर लें तो मन के ऊपर नियन्त्रण, श्रद्धा, तितिक्षा सब कुछ प्राप्त हो जायेगा| इस योग का अनुशीलन अन्नदान, विद्यादान, धर्म दान के माध्यम से किया जाता है|
अन्नदान क्या है ? अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिये तुम्हें जिन खाद्य पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है, उन सामग्रियों के द्वारा दूसरों की सहायता करना या यथा-संभव उन्हें दूसरों में वितरित करना| 

विद्या का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के जागतिक विद्या (रोजगार-उन्मुख विद्या) से है, जैसे कृषि विद्या, अर्थ-विद्या, राष्ट्र-विद्या, पदार्थ विद्या, रसायन विद्या, चिकित्सा विद्या, कारीगरी विद्या आदि से है|इन में से किसी एक विद्या को भी भली-भाँति ग्रहण कर लो| उस विद्या के माध्यम से तुम्हें अपनी जीविका तो प्राप्त होगी ही, समाज की सेवा भी कर सकोगी|

इसके बाद आता है- धर्मदान,  यही सर्व श्रेष्ठ दान है |अन्य प्रकार का दान- अन्न दान या विद्या दान चाहे कितना भी किया जाय किन्तु, ' धर्मदान ' किये बिना मनुष्य के किसी भी आभाव को यथार्थ रूप से मिटाया नहीं जा सकता, बल्कि वह पहले की अपेक्षा और भी ज्यादा स्वार्थपर बन जायेगा|जिस मनुष्य के पास अन्न और विद्या तो प्रचूर मात्रा में हो किन्तु उसमे धर्म (अर्थात चरित्र) रत्तीभर भी न हो तो उसका जीवन मनुष्य का न रहकर पशु के जैसा (घोर स्वार्थी) बन जायेगा| अतः इसी ' धर्मदान ' रूपी (या इसप्रकार के चरित्र निर्माणकारी शिविर रूपी ) यथार्थ लोककल्याण के कार्य - में आत्मनिवेदन कर देना ही 'सेवा-योग ' है| 
शिव ज्ञान से जीव सेवा - इस सेवा-योग को स्वामीजी ने ठाकुर से प्राप्त किया था|जब स्वामीजी ने दक्षिणेश्वर में ठाकुर के मुख से निसृत इस अमृत-वचन को पहली बार सुना था, उस समय ही उन्होंने कहा था (वे तब केवल मात्र एक तरुण ही थे) - " यदि कखनो भगवान सूयोग देन, ताहले एई सत्य आमी काजे परिणत करबो एवं जगत्वासी के शोनाबो ! " अर्थात " कभी यदि भगवान सूयोग दें तो मैं इस सत्य को कार्य में परिणत करूँगा (Be ) और सम्पूर्ण जगत को सुनाऊंगा (Make )! " और भगवान ने अपने भक्त को वह सूयोग दिया था |

इसलिए ' रामकृष्ण मिशन ' की स्थापना हो गयी थी, और तब से यह सेवा-योग सम्पूर्ण जगत में चलाया जा रहा है| और स्वामीजी की प्रेरणा से ही यह ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' तथा यह ' सारदा नारी संगठन ' भी उसी सेवा-योग से युक्त है| ये दोनों ही संगठन - ' शिव ज्ञान से जीवसेवा ' - रूपी यज्ञ करते चले आ रहे हैं और हमलोगों के सामने भी उसी सेवा-योग से जुड़ जाने का ' सूयोग ' प्रस्तुत कर रहे हैं|
प्राचीन युग में इसी भारतवर्ष में अनेकों ' महीयसी ' नारियों का जन्म हुआ था| भावी युग में यहाँ की नारियां कैसी होंगी ? स्वामीजी के मतानुसार  - ' भावी युग की नारियों के भीतर - अतीत और वर्तमान दोनों के संयुक्त भावों का विकास और समन्वय घटित होगा| प्राचीन युग की नारियों के लिये  - ध्यानपरायणता, माधुर्य, निष्ठा को ही यथार्थ आदर्श माना जाता था|

किन्तु वर्तमान युग में पाश्चात्य देशों से प्राप्त आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षाओं को भी प्राप्त करने की आवश्यकता है|आधुनिक युग की लड़कियों के लिये जो शिक्षा-नीति बनेगी उसमे एक ओर जहाँ वीरोचित दृढ-संकल्प की शिक्षा दी जाएगी वहीँ दूसरी ओर जननी (जन्म देनेवाली) के जैसा कोमल-ह्रदय बनने की शिक्षा भी दी जाएगी| भविष्य की भारतीय नारियों के भीतर मित्रता, कोमलता, माधुर्य के साथ-साथ स्वाधीनता, तेजस्विता, और आत्मनिर्भरता भी प्रचूर मात्रा में विद्यमान रहेगी|
स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता को लिखित पत्र के माध्यम से अपने आशीर्वचन दिये थे, उसमे उन्होंने स्पष्ट रूप से बता दिया था कि इस युग में ' भारतीय- नारी ' को किस प्रकार की भूमिका (Role) निभानी होगी| आशीर्वाद देते हुए लिखते हैं-  
वीरेर संकल्प आर मायेर ह्रदय,
दक्षिनेर समीरन - मृदूमधुमय,
आर्यवेदी' परे दीप्त मुक्त होमानले 
ये पुन्य सौन्दर्य आर जे शोर्य विराजे-
सकली तोमार होक, आरो, आरो किछू 
स्वपनेऊ भावेनि जाहा अतीतेर केह|
भारतेर भविष्यत् सन्तानेर तरे
तुमि हउ  ' बंधू,दासी, गुरु ' - एकाधारे!
                              
 इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि जो भी लड़कियां, महिलायें या नारियां इस ' सारदा नारी संगठन ' में एक सदस्या के रूप में जुड़ गयीं हैं उनमे से प्रत्येक को अपने जीवन में यही एक ' भूमिका ' निभानी होगी|
 वे कभी अपने आसपास रहने वाले लोगों के प्रति ' उदासीन ' होकर नहीं रहेंगी, बल्कि वे अपने आसपास रहने वाले मनुष्यों (पास-पड़ोस में रहने वाले लोगों) के लिये एक ही साथ कभी सेविका की भूमिका में होंगी, तो कभी बान्धवी (दोस्त) होंगी, तो कभी जननी (गुरु) की भूमिका निभाएंगी| 

दूसरों के सुख को अपना सुख मान कर उनके साथ-साथ वे भी आनन्द मनाएंगी, और उनके दुःख को भी अपना दुःख मानकर उनके निकट खड़ी रहकर वे भी उनके दुःख को महसूस कर सकेंगी |
 {" सारदा " }नारी-संगठन से जुड़ी हुई सभी सदस्याओं का ह्रदय ऐसा ही विशाल और उदार हो जाये यही स्वामीजी चाहते थे| और Sister'जी को इसी कार्य में नियुक्त रहने का आशीर्वाद दिये हैं! उनका यह आशीर्वाद कालजयी है, और आने वाले हर युग की नारियों के लिये है| यह आशीर्वाद चिरकाल से समस्त नारियों के लिये बरसता आ रहा है!
वर्तमान युग की नारियों के जीवन का आदर्श ' श्रीश्रीमाँ ' ही हैं! Sister कहती हैं- " She is Sri Ramakrishna's final word as to the ideal of Indian womanhood."
भगिनी निवेदिता ने कहा है- ' इस युग की भारतीय- नारियों के आदर्श के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण द्वारा दिया गया अन्तिम उपदेश - सारदादेवी ही हैं|" अर्थात भारत की नारियाँ - माँ के जीवन को अपना आदर्श मान कर, उन्हीं के सांचे में अपना जीवन ढाल लेंगी! उन्ही के आदर्श में अपने तन-मन को रंग लेंगी! निवेदिता ने कहा है,
' मैं उस भारतवर्ष को प्रेम करती हूँ जहाँ के लोग बड़े सरल होते हैं, जो अपनी जीवनयात्रा को बिना आडम्बर दिखाए पूर्ण करते हैं, और जहाँ पारिवारिक शान्ति को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है| ' और इस पारिवारिक शान्ति की  आधार-स्तम्भ किन्तु नारियाँ ही होतीं हैं| इसीलिये नारियों के ऊपर एक बहुत बड़ा दायित्व भी है- और वह है परिवार के सभी सदस्यों में शान्ति और सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध को बनाये रखना|
 आज की नारियाँ घर से बाहर बड़े बड़े कार्य-क्षेत्रों से संयुक्त हैं और वहाँ भी वे सफल सिद्ध हो रहीं हैं|किन्तु बहिर्जगत के कार्यक्षेत्र में सफलता पूर्वक अपना दायित्व निभाने के साथ ही साथ उनको सबसे अधिक महत्व अपने परिवार को ही देना होगा| क्योंकि, पारिवारिक अनुशासन, उसकी शान्ति, परिवार के सभी सदस्य अपने अपने कार्यों को बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण करें, सभी लोग जिस प्रकार शान्ति और आनन्दपूर्वक जीवन-यापन करते रहें- यही नारियों का सबसे बड़ा दायित्व है! और मुझमे इसके लिये जितना कुछ करने की शक्ति भगवान ने दी है, उसे बिना कुछ पाने की आशा रखे करते रहना ही नारियों का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है|
आप देखिये कि - श्रीमाँ का कार्य-क्षेत्र कितना बड़ा था! " ...सेखाने जे एसेछे, ताकेई तिनी 
भालबेसे " बाछा" बले एकेबारे कोले तूले नियेछेन, सबाई आनन्द पेयेछे | " अर्थात श्रीश्री माँ के पास जो कोई भी चला जाता उसको ही माँ बड़े प्रेम से - " अरे मेरा बच्चा " कहकर अपने गोद में बैठा लेतीं थीं! और सबों को - ' अपनी माँ कि गोद में होने का आनन्द ' प्राप्त होता था| इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमलोगों के ऊपर भी अपने ह्रदय को माँ के जैसा बनाने का बहुत बड़ा दायित्व है|
" भगिनी जा देखे मूग्ध हयेछेन, सेई भाव जेन आजऊ थाके " अर्थात भगिनी निवेदिता भारतीय नारी के जिस मातृ-रूप को श्रीश्रीमाँ के भीतर देख कर अभिभूत हो गयीं थीं - आज की नारियों में भी वही भाव बना रहना चाहिये |
 इसमें कृतकार्य होने के लिये हमलोगों को भी ' आध्यत्मिक-शक्ति ' से सम्पन्न होना होगा, अर्थात ' आत्मबल ' प्राप्त करके हमलोगों को भी बलवान बन जाना होगा| यह न होने से कुछ भी करना संभव न होगा| मैं इस शिविर में भाग लेकर बहुत सारी अच्छी बातों को सुनती हूँ, पुस्तकें पढ़ती हूँ, भाषण देती हूँ, किन्तु यदि मेरे ह्रदय में अभी तक ' आत्मबल ' ही प्रकट न हो सका, यदि मेरे ह्रदय में प्रेम का पुष्प ही प्रस्फुटित न हो सका, तो मैं अपना सौरभ किसे दे पाऊँगी? और मेरा ह्रदय-रूपी ' प्रेम-कमल ' जब प्रस्फुटित हो जायेगा तो उसके सौरभ को पाने के लिये अनेक अनेक भ्रमर (तत्व-जिज्ञाषु) दौड़े चले आयेंगे| 
और अब अपने भाषण के अन्त में - मैं इस नारी-संगठन की तरफ से आप सबके हाथों में एक एक उपहार दूंगी| वह क्या है? आप सबके हाथों में तीन-तीन ' cheque ' दूंगी; एक माँ के Account से, एक पिताजी के Account से, और एक cheque अपने ' दादा या भैया ' स्वामीजी के Account से भी दूंगी| (चूँकि वे हमारे अपने माँ,पिताजी और बड़े भाई हैं - अतः) उनका Account भी हमलोगों का ही है|
हमारे भीतर अनेक सम्पदा है, किन्तु हमे उसका पता नहीं है| इसीलिये ' cheque ' भुना नहीं पा रही हूँ, और गरीबी में दुःख-कष्ट पा रही हूँ| मेरे पुत्र को बाद में कष्ट न भोगना पड़े- इसके लिये सांसारिक पिता कितना ही बड़ा बैंक बैलेंस छोड़ जाते हैं! हमलोगों के आध्यात्मिक पिता भी हमलोगों के लिये बहुत बड़ा बैंक बैलेंस छोड़ गये हैं|
मैं उसी खाते का cheque आप सबों के हाथों में पकड़ा रही हूँ, आवश्यकता पड़ने से आप सब उसे भुना सकती हैं| प्रथम है माँ के Account से; और वह है- " जे सत्य कथाटि धरे आछे, से भगवानेर कोले शुये आछे "(' जिसने हर हाल में सत्य को थामे रखा है, वह तो मानो भगवान की गोद में ही सोया हुआ है!')
दूसरा cheque है ठाकुर के Account से- " पिंपडेर मतो संसारे थाक| एई संसारे नित्य अनित्य मिशिये रयेछे, बालिते चिनिते मिशे आछे| पिंपड़र मतो चिनिटि के ग्रहन करो| संसारे वास करते गेले भाल मन्द आछे, सुख दुःख आछे| बोकार मतो बालिटा मुखे निये कष्ट पेयो ना| चिनिटुकू ग्रहन करो !" और स्वामीजी के Account से भी दे रही हूँ- 
" भिक्षूकेर कबे बलो सुख ? कृपापात्र हये किबा फल ?
दाउ आर फिरे नाहि चाउ, थाके यदि हृदये सम्बल !
अनंतेर तूमि अधिकारी, प्रेमसिन्धु हृदये विद्यमान, 
' दाउ, दाउ ' - जेबा फिरे चाय, तार सिन्धु बिन्दु हये जाये !
हमलोगों के ह्रदय में प्रेम का सागर लहरा रहा है! हमलोग अनन्त प्रेम के अधिकारी हैं ! अनन्त- प्रेम करने का हमलोगों के पास अधिकार है | क्षुद्रता हमारे स्वरूप में है ही नहीं ! कितने बड़े उत्स से हमलोग प्रक्षिप्त हुए हैं ! हमलोग उसी में निवास कर रहे हैं, वहीँ से हमने जन्म लिया है, और पुनः उसी के साथ एक हो जाना है! उसी में लीन हो जाना है ! उसी अनन्त के भीतर हम सभी एक हैं !                
       

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