Tuesday, March 30, 2010

" आन्दुल स्कूल के असाधारण शिक्षक गण " [जीवन नदी के हर मोड़ पर -5]

इस स्कूल के समस्त शिक्षकगण भी असाधारण थे और उनके पढ़ाने का तरीका भी निराला था! आन्दुल-मौड़ी ग्राम में आपको कई ऐसे परिवार मिल जायेंगे, जिनकी तीन पीढ़ियाँ इस स्कूल के एक ही  प्रधान शिक्षक के छात्र रहे हैं|हमारे परिवार की भी तीन पीढ़ियाँ इसी स्कूल के छात्र थे|
मेरे ' बड़दादू ' अर्थात पितामह के अग्रज थे यतीश चन्द्र, पितामह शिरीष चन्द्र, और उनसे भी छोटे भाई थे विभूति भूषण | विभूतिभूषण इसी स्कूल में पढ़े हैं| मेरे बाबूजी, मेरे दोनों काका अर्थात ' बड़दादू ' यतीश चन्द्र के दोनों पुत्र - देवदेव और राजराज भी इसी स्कूल में पढ़ते थे|पितामह के भगिना लोग भी इसी स्कूल में पढ़ते थे| इसीलिये हमलोगों के तीनपुरुष (तीन पीढ़ियाँ) इसी एक स्कूल में और एक ही प्रधान शिक्षक के छात्र रहे हैं| 
मेरे पितामह ने वर्ष १९०१ से इस स्कूल को ज्वाइन किया था, तब से वहाँ अध्यापन करना प्रारम्भ किये थे| वर्ष १९०२ में स्वामी विवेकानन्द ने जब अपना शरीर त्याग दिया तब, उन्होंने स्कूल में ही उनकी स्मृति में एक स्मरण-सभा का आयोजन भी किया था| उस सभा में स्कूल के प्रधान-शिक्षक ने अंग्रेजी में भाषण देते हुए अपने छात्रों को बताया था कि दक्षिणेश्वर के मन्दिर में (पंचवटी के निकट ) स्वामीजी को अपने सामने प्रत्यक्ष खड़े होकर भाषण देते हुए देखने और सुनने पर उन्हें किस अलौकिक आनन्द कि अनुभूति हुई थी। उस दिन कि स्मृति-सभा में कई असाधारण कोटि के छात्र भी उपस्थित थे, उन सबके बारे में यदि कहने लगूँ तो एक महाभारत की ही रचना हो जाएगी ! 
उन्हीं में से एक छात्र ने ' माष्टारमशाई '(शिक्षकमहोदय ) के मुख से जो भाषण सुना उसे उसे साथ ही साथ यथासंभव लिखते भी चले गये और बाद में उनको दिखला कर त्रुटिरहित बनाकर छपवाया| छात्रों के बीच उस भाषण का वितरण किया गया था| उस भाषण के साथ इस प्रसंग का उल्लेख, अध्यापक शैलेन्द्र नाथ धर ने अपनी पुस्तक- " A Comprehensive Biography of Swami Vivekananda " नामक ग्रन्थ में भी किया है| इसी अंचल (आन्दुल- मौड़ी) के एक व्यक्ति रामकृष्ण मठ मिशन में सन्यासी हुए थे| उनको भी कहीं से यह ज्ञात हो गया था कि जिस दिन पितामह दक्षिणेश्वर गये थे और स्वामीजी को देखे थे वह, दिन वर्ष १८९७ का ७ मार्च ही था| उन सन्यासी महाराज ने अमेरिका में रामकृष्ण मठ मिशन का कार्य काफी लम्बे समय तक किया था, और बाद में वहीँ उनका देहान्त भी हो गया था| 
उसी स्कूल में पढ़ाते हुए शिरीष चन्द्र काफी वर्ष बीता दिये थे| वे वहाँ पर शेक्सपीयर की उन्हीं  रचनाओं को पढ़ाते थे, जिसके ऊपर प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ते समय स्वयं अभिनय भी किये थे| वहाँ के छात्रों को शेक्सपीयर पढ़ाते समय उस स्व-अभिनीत नाटक ' हैमलेट ' के संवादों को बंगला में अनुवाद करके पढाया करते थे|एक बानगी देखिये -
" हउ तूमि स्वस्तिकात्मा कोन  
किम्वा कोन पिशाच पातकी
एने थाको साथे करे सवर्ग ह'ते सूपवन, किम्वा झंझावात नरकेर,
चाहे प्राण चाय सस्तुषी तोमाय, राजराजेश्वर ||"

" Be thou a spirit of health,
or goblin damned..
bring with thee airs from heaven, or blast from hell..
be thy intents wicked or charitable..
I'll call thee Hamlet..king,father..royal Dane."

हिन्दी अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा -
" हो कोई स्वस्तिक-आत्मा तुम,
या शापित प्रेतामात्मा हो तुम ?
संग में अपने स्वर्ग से सुगन्धित पवन लाते हो,
 या नरक से झुलसाने वाली झंझावात ?
मनोरथ चाहे तुम्हारा हितैषी हो या दुष्टता पूर्ण,
प्राण यही चाहता की पुकारूँ तुम्हें -
राजराजेश्वर ! पिता-हैमलेट !!"
 इतने ही प्रेम के साथ वे छात्रों को Gray's " Elegy Written in a Country in a churchyard " भी पढाया करते थे| उन्होंने सम्पूर्ण Gray's Elegy को बंगला में अनुवाद किया था|अभी कुछ ही समय पूर्व इस बंगला अनुवाद को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है|( Elegy का अर्थ होता है ' शोक गीत '  या मौत के अवसर पर पढ़ी जाने वाली ' मर्सिया ', इस शोक-गीत को कवि ने किसी गाँव के कब्रिस्तान में बैठ कर लिखा था, Thomas Gray's की इस रचना को सर्वप्रथम १७५१ ई में प्रकाशित किया गया था|)


{ An elegy is a poem which laments the dead.Gray's " Written in a Country Churchyard " is noteworthy in that it mourns the death not of great or famous people,but of common men. The speaker of this poem sees a country churchyard at sunset,which impels him to meditate on the nature of human mortality. 
The poem invokes the classical idea of ' memento mori ' - a Latin phrase which states plainly to all mankind, " Remember that you must die." The speaker considers the fact that in death, there is no difference between great and common people. Or the Death is a great leveler !

" Gray's Elegy " is one of the best-known poems about death in all of European literature.The poem presents the reflections of an observer who, passing by a Churchyard that is out in a country,stops for a moment to think about-the significance of the strangers buried there !!

Scholars of medieval times sometimes kept human skulls on there desktops,
to keep themselves conscious of the fact -that someday they, like the skulls' former  occupants, would die;from this practice we get the phrase 
- " Memento mori "
एक ग्राम्य कब्रिस्तान में बैठकर थॉमस ग्रे द्वारा लिखित शोकगीत

the Elegy Lines 1-4:

" The Curfew tolls the knell of parting day,
the lowing herd wind slowly o'er the lea,
the plowman plods his weary way,
And leaves the world to darkness and to me. "


In the first stanza, the speaker observes the signs
of a country day drawing to a close:
A curfew bell ringing, a herd of cattle moving across the pasture,
and a farm laborer returning home.

The speaker is then left alone to contemplate
the isolated rural scene.
the first line of the poem sets a distinctly somber tone:
The curfew bell does not simply ring;
it " Knells " - 
- a term usually applied to bells rung at a death or funeral.
in this way from the start of the poem, Gray reminds us-
of human mortality.}


इसी ' Gray's Elegy ' या किसी ग्राम्य कब्रिस्तान में बैठकर थॉमस ग्रे द्वारा लिखित शोकगीत को मेरे पितामह जब क्लास में पढ़ाते तो उसे बंगला में अनुवाद करके अपने छात्रों को पढ़ाते हुए इस प्रकार सुनाते थे - 

" सांझेर झाँजरे गाजे दिवा अवसान ,
मन्थरगामिनी गाभि प्रान्तरेर पारे;
हम्बा रवे डाकि डाकि चली आसे आँकीबाँकी,
श्रान्तपदे गृहमुखे फिरिछे कृषान
विसर्जि ब्रह्माण्ड एबे आँधारे आमारे || "


हिन्दी भावानुवाद :
" सांझ के समय गौओं की झुण्ड,
मंथर गति से ग्राम की और लौट रहीं हैं,
 ग्राम की टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों पर हम्बा-हम्बा कहकर
 लौटती हुई गौओं के पीछे-पीछे-
थाके-मांदे पग रखते हुए किसान भी 
अपने घर में लौट जाता है,
तब मेरे और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मानो अँधेरा छा जाता है !"
इस प्रकार कक्षा में वे छात्रों को पढ़ाते समय मन-प्राण निवेशित करके पढ़ाते थे| 

एक बार कक्षामें ' विद्यासागर महाशय ' (ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ) के सम्बन्ध में कुछ पढ़ा रहे थे| इनदिनों मेरी स्मरण शक्ति कुछ कमजोर हो गयी है, किन्तु उस दिन विद्यासागर महाशय के सम्बन्ध में पढ़ाते हुए जो बोले थे, उसे कोशिश करने से लगता है मैं आज भी दुहरा सकता हूँ -
" जिनके द्वारा रचित 'वर्ण परिचय ',
 बंग-वासियों का वर्ण परिचय हो गया
जिनके द्वारा रचित ' बोधोदय 'से , 

बंगाल के लोगों में बोधोदय हो गया, 
जिसके विवाह में ( विधवा -विवाह में), 
और बनवास में (सीता का बनवास में)
बंग-वासी आज भी रो पड़ते हैं, 
जिनके करुणा के सागर में प्रेमगगन
 रूपी नीलिमा मिश्रित हुई है'
" - सेई  विद्यासागर के प्रणाम ! "
- ऐसे विद्या के सागर को मैं अपना प्रणाम निवेदित करता हूँ !"
मेरा स्कूली जीवन जिस आनन्द में बीता है, उससे जुड़ी हुई जितनी यादें हैं, उन सब को पूरी तरह से बता पाना मेरे सामर्थ्य से बाहर है|
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