Tuesday, March 30, 2010

" आन्दुल स्कूल के असाधारण शिक्षक गण " [जीवन नदी के हर मोड़ पर -5]

इस स्कूल के समस्त शिक्षकगण भी असाधारण थे और उनके पढ़ाने का तरीका भी निराला था! आन्दुल-मौड़ी ग्राम में आपको कई ऐसे परिवार मिल जायेंगे, जिनकी तीन पीढ़ियाँ इस स्कूल के एक ही  प्रधान शिक्षक के छात्र रहे हैं|हमारे परिवार की भी तीन पीढ़ियाँ इसी स्कूल के छात्र थे|
मेरे ' बड़दादू ' अर्थात पितामह के अग्रज थे यतीश चन्द्र, पितामह शिरीष चन्द्र, और उनसे भी छोटे भाई थे विभूति भूषण | विभूतिभूषण इसी स्कूल में पढ़े हैं| मेरे बाबूजी, मेरे दोनों काका अर्थात ' बड़दादू ' यतीश चन्द्र के दोनों पुत्र - देवदेव और राजराज भी इसी स्कूल में पढ़ते थे|पितामह के भगिना लोग भी इसी स्कूल में पढ़ते थे| इसीलिये हमलोगों के तीनपुरुष (तीन पीढ़ियाँ) इसी एक स्कूल में और एक ही प्रधान शिक्षक के छात्र रहे हैं| 
मेरे पितामह ने वर्ष १९०१ से इस स्कूल को ज्वाइन किया था, तब से वहाँ अध्यापन करना प्रारम्भ किये थे| वर्ष १९०२ में स्वामी विवेकानन्द ने जब अपना शरीर त्याग दिया तब, उन्होंने स्कूल में ही उनकी स्मृति में एक स्मरण-सभा का आयोजन भी किया था| उस सभा में स्कूल के प्रधान-शिक्षक ने अंग्रेजी में भाषण देते हुए अपने छात्रों को बताया था कि दक्षिणेश्वर के मन्दिर में (पंचवटी के निकट ) स्वामीजी को अपने सामने प्रत्यक्ष खड़े होकर भाषण देते हुए देखने और सुनने पर उन्हें किस अलौकिक आनन्द कि अनुभूति हुई थी। उस दिन कि स्मृति-सभा में कई असाधारण कोटि के छात्र भी उपस्थित थे, उन सबके बारे में यदि कहने लगूँ तो एक महाभारत की ही रचना हो जाएगी ! 
उन्हीं में से एक छात्र ने ' माष्टारमशाई '(शिक्षकमहोदय ) के मुख से जो भाषण सुना उसे उसे साथ ही साथ यथासंभव लिखते भी चले गये और बाद में उनको दिखला कर त्रुटिरहित बनाकर छपवाया| छात्रों के बीच उस भाषण का वितरण किया गया था| उस भाषण के साथ इस प्रसंग का उल्लेख, अध्यापक शैलेन्द्र नाथ धर ने अपनी पुस्तक- " A Comprehensive Biography of Swami Vivekananda " नामक ग्रन्थ में भी किया है| इसी अंचल (आन्दुल- मौड़ी) के एक व्यक्ति रामकृष्ण मठ मिशन में सन्यासी हुए थे| उनको भी कहीं से यह ज्ञात हो गया था कि जिस दिन पितामह दक्षिणेश्वर गये थे और स्वामीजी को देखे थे वह, दिन वर्ष १८९७ का ७ मार्च ही था| उन सन्यासी महाराज ने अमेरिका में रामकृष्ण मठ मिशन का कार्य काफी लम्बे समय तक किया था, और बाद में वहीँ उनका देहान्त भी हो गया था| 
उसी स्कूल में पढ़ाते हुए शिरीष चन्द्र काफी वर्ष बीता दिये थे| वे वहाँ पर शेक्सपीयर की उन्हीं  रचनाओं को पढ़ाते थे, जिसके ऊपर प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ते समय स्वयं अभिनय भी किये थे| वहाँ के छात्रों को शेक्सपीयर पढ़ाते समय उस स्व-अभिनीत नाटक ' हैमलेट ' के संवादों को बंगला में अनुवाद करके पढाया करते थे|एक बानगी देखिये -
" हउ तूमि स्वस्तिकात्मा कोन  
किम्वा कोन पिशाच पातकी
एने थाको साथे करे सवर्ग ह'ते सूपवन, किम्वा झंझावात नरकेर,
चाहे प्राण चाय सस्तुषी तोमाय, राजराजेश्वर ||"

" Be thou a spirit of health,
or goblin damned..
bring with thee airs from heaven, or blast from hell..
be thy intents wicked or charitable..
I'll call thee Hamlet..king,father..royal Dane."

हिन्दी अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा -
" हो कोई स्वस्तिक-आत्मा तुम,
या शापित प्रेतामात्मा हो तुम ?
संग में अपने स्वर्ग से सुगन्धित पवन लाते हो,
 या नरक से झुलसाने वाली झंझावात ?
मनोरथ चाहे तुम्हारा हितैषी हो या दुष्टता पूर्ण,
प्राण यही चाहता की पुकारूँ तुम्हें -
राजराजेश्वर ! पिता-हैमलेट !!"
 इतने ही प्रेम के साथ वे छात्रों को Gray's " Elegy Written in a Country in a churchyard " भी पढाया करते थे| उन्होंने सम्पूर्ण Gray's Elegy को बंगला में अनुवाद किया था|अभी कुछ ही समय पूर्व इस बंगला अनुवाद को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है|( Elegy का अर्थ होता है ' शोक गीत '  या मौत के अवसर पर पढ़ी जाने वाली ' मर्सिया ', इस शोक-गीत को कवि ने किसी गाँव के कब्रिस्तान में बैठ कर लिखा था, Thomas Gray's की इस रचना को सर्वप्रथम १७५१ ई में प्रकाशित किया गया था|)


{ An elegy is a poem which laments the dead.Gray's " Written in a Country Churchyard " is noteworthy in that it mourns the death not of great or famous people,but of common men. The speaker of this poem sees a country churchyard at sunset,which impels him to meditate on the nature of human mortality. 
The poem invokes the classical idea of ' memento mori ' - a Latin phrase which states plainly to all mankind, " Remember that you must die." The speaker considers the fact that in death, there is no difference between great and common people. Or the Death is a great leveler !

" Gray's Elegy " is one of the best-known poems about death in all of European literature.The poem presents the reflections of an observer who, passing by a Churchyard that is out in a country,stops for a moment to think about-the significance of the strangers buried there !!

Scholars of medieval times sometimes kept human skulls on there desktops,
to keep themselves conscious of the fact -that someday they, like the skulls' former  occupants, would die;from this practice we get the phrase 
- " Memento mori "
एक ग्राम्य कब्रिस्तान में बैठकर थॉमस ग्रे द्वारा लिखित शोकगीत

the Elegy Lines 1-4:

" The Curfew tolls the knell of parting day,
the lowing herd wind slowly o'er the lea,
the plowman plods his weary way,
And leaves the world to darkness and to me. "


In the first stanza, the speaker observes the signs
of a country day drawing to a close:
A curfew bell ringing, a herd of cattle moving across the pasture,
and a farm laborer returning home.

The speaker is then left alone to contemplate
the isolated rural scene.
the first line of the poem sets a distinctly somber tone:
The curfew bell does not simply ring;
it " Knells " - 
- a term usually applied to bells rung at a death or funeral.
in this way from the start of the poem, Gray reminds us-
of human mortality.}


इसी ' Gray's Elegy ' या किसी ग्राम्य कब्रिस्तान में बैठकर थॉमस ग्रे द्वारा लिखित शोकगीत को मेरे पितामह जब क्लास में पढ़ाते तो उसे बंगला में अनुवाद करके अपने छात्रों को पढ़ाते हुए इस प्रकार सुनाते थे - 

" सांझेर झाँजरे गाजे दिवा अवसान ,
मन्थरगामिनी गाभि प्रान्तरेर पारे;
हम्बा रवे डाकि डाकि चली आसे आँकीबाँकी,
श्रान्तपदे गृहमुखे फिरिछे कृषान
विसर्जि ब्रह्माण्ड एबे आँधारे आमारे || "


हिन्दी भावानुवाद :
" सांझ के समय गौओं की झुण्ड,
मंथर गति से ग्राम की और लौट रहीं हैं,
 ग्राम की टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों पर हम्बा-हम्बा कहकर
 लौटती हुई गौओं के पीछे-पीछे-
थाके-मांदे पग रखते हुए किसान भी 
अपने घर में लौट जाता है,
तब मेरे और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मानो अँधेरा छा जाता है !"
इस प्रकार कक्षा में वे छात्रों को पढ़ाते समय मन-प्राण निवेशित करके पढ़ाते थे| 

एक बार कक्षामें ' विद्यासागर महाशय ' (ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ) के सम्बन्ध में कुछ पढ़ा रहे थे| इनदिनों मेरी स्मरण शक्ति कुछ कमजोर हो गयी है, किन्तु उस दिन विद्यासागर महाशय के सम्बन्ध में पढ़ाते हुए जो बोले थे, उसे कोशिश करने से लगता है मैं आज भी दुहरा सकता हूँ -
" जिनके द्वारा रचित 'वर्ण परिचय ',
 बंग-वासियों का वर्ण परिचय हो गया
जिनके द्वारा रचित ' बोधोदय 'से , 

बंगाल के लोगों में बोधोदय हो गया, 
जिसके विवाह में ( विधवा -विवाह में), 
और बनवास में (सीता का बनवास में)
बंग-वासी आज भी रो पड़ते हैं, 
जिनके करुणा के सागर में प्रेमगगन
 रूपी नीलिमा मिश्रित हुई है'
" - सेई  विद्यासागर के प्रणाम ! "
- ऐसे विद्या के सागर को मैं अपना प्रणाम निवेदित करता हूँ !"
मेरा स्कूली जीवन जिस आनन्द में बीता है, उससे जुड़ी हुई जितनी यादें हैं, उन सब को पूरी तरह से बता पाना मेरे सामर्थ्य से बाहर है|
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" आन्दुल-मौड़ी प्रियूनिवर्सिटी स्कूल " जीवन नदी के हर मोड़ पर [4]


मेरे पितामह ने वकालत के पेशे को ठुकरा दिया: परवर्तीकाल में (प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढाई पूरी करने के बाद) पितामह ने "ओर्डिगनाम कम्पनी " (Orr Dignam & Co, The well -known Solicitors; as mentiond by Montague Massey.) में योगदान किया था, किन्तु इसी बीच मेरी पितामही की मृत्यु होगई| तब उन्होंने तय किया कि मैं अपनी आजीविका के लिये क़ानूनी पेशे में नहीं जाऊंगा, क्योंकि किसी विधवा की सम्पत्ति को हड़पने की नियत से कोई व्यक्ति मेरे पास मुकदमा लेकर आयेगा, तो मैं इस तरह के मुकदमों की पैरवी नहीं कर पाउँगा|
इस प्रकार क़ानूनी व्यवसाय को उन्होंने त्याग दिया| इसी बीच प्रसिद्ध अंग्रेजी अख़बार स्टेट्समैन में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ -" Wanted Headmaster for Andul H.C.E.School, Howrah, Consolidated pay Rs.100 " हावड़ा जिले के ' आन्दुल-मौड़ी ' को एक जुड़वे-ग्राम के रूप में जाना जाता था| 


(New Andul Higher Class School got its birth on 10th February 1941after the Kundu Chaudhurys renamed the century old ANDUL HIGHER CLASS ENGLISH SCHOOL to bear their flag. Behind the establishment of this school at this sight there was a long struggle of "Andul H.C.E. School Samman Rakshan Samity".)






आन्दुल का राजमहल आज भी विद्यमान है, तथा मौड़ी ग्राम के जमींदारवंश के कुंडू चौधरी एवं मल्लिक वंश के योगेन्द्रनाथ मल्लिक काफी धनाड्य व्यक्ति थे, उन्होंने ही वर्ष १८४१ में इस स्कूल की स्थापना की थी| यह एक प्रि-यूनिवर्सिटी स्कूल था, (२०१६ में इसका १७५ वाँ वर्षगाँठ मनाया जायेगा -पूज्य नवनी दा भी जाने वाले हैं ) और उस समय वहाँ प्रधान शिक्षक का पद रिक्त था| उस समय तक भारतवर्ष में एक भी विश्वविद्यालय नहीं था| जहाँ तक मुझे याद है, वर्ष १८५९ में सर्वप्रथम तीन स्थानों पर -   कलकाता, बम्बई और मद्रास में, तीन यूनिवर्सिटी स्थापित हुई थी| इसके पूर्व तक भारतवर्ष में एक भी यूनिवर्सिटी नहीं था| किन्तु आन्दुल का यह स्कूल प्रि-यूनिवर्सिटी था ! 

और वर्ष १८५३ से १८५६ तक सर आशुतोष मुखोपाध्याय (जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता) के बड़ेचाचा दुर्गाप्रसाद मुखोपाध्याय इस स्कूल के प्रथम प्रधान शिक्षक थे; एवं आशुतोष मुखोपाध्याय के पिता गंगाप्रसाद मुखोपाध्याय इसी स्कूल के छात्र थे|  संस्कृत श्लोकों के उद्भट- संग्रह्कार, कविभूषण पूर्णचंद्र दे महाशय भी हमारे स्कूल में कुछ दिनों तक प्रधान शिक्षक रहे थे| उन्होंने सम्पूर्ण भारत में प्रचलित लगभग पाँचहजार उद्भट श्लोकों का संग्रह किया था| उनके द्वारा लिखित
' उद्भट-श्लोक-संग्रह ' नामक पुस्तिका में चुने हुए ३६० श्लोक हैं| कलकाता के किसी मकान में अनेक पण्डित आएथे, इनके माध्यम से ही उन्होंने लगभग ३००० श्लोकों का संग्रह किया था|
सधारायणतया ' उद्भट ' कहने से हमलोग अलौकिक या अद्भुत समझते हैं, यहाँ वैसा नहीं है फिर भी कई श्लोकों को तो निश्चय ही अद्भुत कहा जा सकता है| क्योंकि एक-एक श्लोकों में आश्चर्यजनक तरीके से किसी विशेष परिस्थिति में संकट एवं संकट-मोचन का सूत्र के रूप में अति सहज किन्तु कार्यकारी दिशा-निर्देश हर समय पाया जा सकता है, एक उदहारण देखिये- 

विद्या विवादाय धनं मादाय, शक्तिः परेषाम परपीड़नाय |
खलस्य साधोह  विपरीतम एतत , ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय    || 


- अर्थात विद्द्या, धनसम्पत्ति और शारीरिक शक्ति खल-व्यक्ति (या दुर्जन) और साधू-व्यक्ति (सज्जन) दोनों के लिये विपरीत अर्थात एकदम उलटे फल प्रदान करते हैं| दुर्जन या खल व्यक्ति को अगर विद्द्या मिल जाय तो विवाद करने में खर्च होती है, धन-सम्पत्ति यदि मिल जाय तो उनमे बहुत अहंकार भर जाता है, और अपनी शारीरिक-शक्ति का दुष्प्रयोग वे दूसरों को कष्ट पहुँचाने में करते हैं| जब की सज्जन व्यक्ति विद्या का उपयोग ज्ञान के लिये, धन को दान के लिये और शारीरिक शक्ति को दूसरों की रक्षा के लिये खर्च करते हैं|
शिरीषचन्द्र (पितामह) ने जब विज्ञापन देखा तो उस स्कूल में ' प्रधान-शिक्षक ' के पद पर नियुक्ति पाने के लिये अपना आवेदन-पत्र भेज दिया| वहाँ से साक्षात्कार का बुलावा आया, और वे वहाँ चले गये| वहाँ पर स्कूल से संबन्धित लोगों ने उन्हें सूचना दी कि यहाँ एक डाक्टर हैं जो इस स्कूल कि व्यवस्था भी देखते हैं, उनका नाम डा० बाबुराम मुखोपाध्याय है| वे केवल एक डाक्टर ही नहीं बल्कि विद्वान् व्यक्ति भी हैं, वे ही आपसे बातचीत करेंगे (या आपका साक्षात्कार लेंगे)|
उनके साथ मुलाकात हुई, बातचीत हुई| साक्षात्कार क्या लेंगे, बातचीत होने पर पता चला कि दोनों ही शेक्सपीयर के महान भक्त हैं और जो बाबुराम डाक्टर के नाम से वहाँ विख्यात थे उनका वास्तविक नाम अमर चाँद मुखोपाध्याय था और जिनसे बातचीत चल रही थी वे थे शिरीष चन्द्र मुखोपाध्याय ! दोनों के बीच शेक्सपीयर को लेकर बहुत लम्बे समय तक महाआनन्द-दायक बातें हुयीं, इस चर्चा में दोनों के आनंद का कोई ठिकाना न था| शेक्सपीयर के अतिरिक्त उन दोनों के बीच अन्य कोई बात तो हुई ही नहीं| और इस प्रकार वर्ष १९०१ में पितामह इस स्कूल के ' प्रधान-शिक्षक ' के पद पर नियुक्त हो गये, तथा तब से उस विद्यालय में उनका शिक्षादान चलने लगा |
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Monday, March 29, 2010

जीवन नदी के हर मोड़ पर [3] ' प्रेसिडेंसी कॉलेज का कम्बाइन्ड कोर्स 'जीवन नदी के हर मोड़ पर [3]

" हैमलेट का अन्तर्द्वन्द है - to Be or not to Be....?"

[हैमलेट शेक्सपीयर का लिखा एक प्रसिद्द नाटक है इसी नाटक में हैमलेट द्वारा अक्सर उधृत किया जाने वाला डॉयलॉग है- हैमलेट का एकालाप....to be or not to be.... यह हैमलेट के अंतर्द्वंद का चित्रण
 है। जिसमें हैमलेट तर्क देता  है कि जीवन बेहतर है या मृत्यु. इसी का एक अंश है जिसमें हैमलेट कहता है कि मृत्यु एक नींद है...पर नींद के बाद कैसे सपने आयेंगे...? यानी कि मृत्यु के बाद का जीवन, जिसे 'आफ्टर लाइफ़' कहते हैं उसके बाद क्या होता है ये भी नहीं पता है ? 
भगवद्गीता के आरम्भ में परस्पर–विरुद्ध दो धर्मों की उलझन में फँस जाने के कारण अर्जुन जिस तरह कर्त्तव्यमूढ़ हो गया था और उस पर जो मौक़ा आ पड़ा था, वह कुछ अपूर्व नहीं है। युद्ध के आरंभ में ही अर्जुन को कर्त्तव्य–जिज्ञासा और मोह हुआ। ऐसा मोह युधिष्ठिर को युद्ध में मरे हुए अपने रिश्तेदारों का श्राद्ध करते समय हुआ था। उसके इस मोह को दूर करने के लिए ‘शांति–पर्व’ कहा गया है। कर्माकर्म संशय के ऐसे अनेक प्रसंग ढूढ़कर अथवा कल्पित करके उन पर बड़े–बड़े कवियों ने सुरस काव्य और उत्तम नाटक लिखे हैं। उदाहरणार्थ, सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ नाटककार शेक्सपीयर का हैमलेट नाटक ही ले लीजिए। डेनमार्क देश के प्राचीन राजपुत्र हैमलेट के चाचा ने, राज्यकर्त्ता अपने भाई हैमलेट के बाप को मार डाला, हैमलेट की माता को अपनी स्त्री बना लिया और राजगद्दी भी छीन ली।
तब उस राजकुमार के मन में यह झगड़ा पैदा हुआ कि ऐसे पापी चाचा का वध करके पुत्र–धर्म के अनुसार अपने पिता के ऋण से मुक्त हो जाऊँ; अथवा अपने सगे चाचा, अपनी माता के पति और गद्दी पर बैठे हुए राजा पर दया करूं? इस मोह में पड़ जाने के कारण कोमल अंतःकरण के हैमलेट की कैसी दशा हुई। श्रीकृष्ण के समान कोई भी मार्ग–दर्शक और हितकर्त्ता न होने के कारण वह कैसे पागल हो गया और अंत में ‘जियें या मरें’ इसी बात की चिंता करते–करते उसका अंत कैसे हो गया, इत्यादि बातों का चित्र इस नाटक में बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया है।
पितामह और उनके अग्रज, दोनों भाई प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ते थे| उन दिनों प्रेसिडेंसी कॉलेज में दो प्रकार के कोर्स पढाये जाते थे, एक सिंगल कोर्स दूसरा कम्बाइन्ड कोर्स|दोनों भाइयों ने कम्बाइन्ड कोर्स में पढाई पूरी की थी|अतः उनको फिजिक्स,केमिस्ट्री और मैथेमेटिक्स के साथ साथ हिस्ट्री और फिलासफी पढने का भी अवसर मिला था, वहीँ अंग्रेजी साहित्य का विषय तो खैर दोनों ही कोर्स में अनिवार्य रूप से पढना पड़ता था| किन्तु अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर गण भी अंग्रेज ही हुआ करते थे, Tawney, Percival आदि अंग्रेजी साहित्य के बड़े प्रसिद्ध अंग्रेज अध्यापक थे| उनलोगों ने आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय से केमिस्ट्री पढ़ा था और आचार्य जगदीश चंद्र बसु उन्हें फिजिक्स पढाया करते थे, वहीँ Tawney, Percival जैसे प्राध्यापक उन्हें अंग्रेजी साहित्य पढ़ाते थे|
छात्र अवस्था में ही, अर्थात प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ते समय ही कोलकाता और आसपास के प्रबुद्ध समाज में दोनों भाइयों का नाम फ़ैल चुका था- कि दो बड़े ही अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न लड़के प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढाई कर रहे हैं| कॉलेज में एकबार शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ' हैमलेट ' के मंचन कि व्यवस्था हुई थी, और उस नाटक में पितामह ने बहुत सुन्दर, यादगार अभिनय कर के दिखाया था
उनके अभिनय को देखकर एक अंग्रेज अध्यापक ने उनके अभिनय से अभिभूत होकर कहा था- " He acted like Beerbohm Tree !" उस समय हर्बर्ट बिर्भोम ट्री (Herbert Beerbohm Tree) इंगलैंड में शेक्सपियर के नाटकों में अभिनय करने वाले एक विख्यात अभिनेता थे और विशेष तौर से ' हैमलेट ' का किरदार निभाने के लिये प्रसिद्ध थे| किन्तु पितामह के अभिनय को देखने के बाद सभी दर्शकों का यही कहना था कि - हैमलेट की भूमिका निभाते समय उनकी वेशभूषा और भावभंगिमा कुछ अलग हे ढंग की थी जिसने उनके अभिनय को हर्बर्ट बिर्भोम ट्री के जैसा जीवन्त बना दिया था!  
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Sir Herbert Beerbohm Tree

 (born Dec. 17, 1853, London, Eng. — died July 2, 1917,

London)




" That skull had a tongue in it, and could sing once ! " 

English actor Herbert Beerhohm Tree as Hamlet in c1892

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Sunday, March 28, 2010

" गिरीशचन्द्र घोष का नाटक- बिल्वमंगल " जीवन नदी के हर मोड़ पर [2]

मेरे पितामह, अर्थात दादाजी महिमाचरण के जमाता (दामाद) थे, और उन्होंने स्वयं भी स्वामी विवेकानन्द को देखा था|जिस तिथी को उन्होंने स्वामीजी को देखा था, मैंने उस तिथी का पता भी लगा लिया है, और वह तिथी थी- ७ मार्च १८९७ ! 
उस समय तक बेलुड़ मठ स्थापित नहीं हुआ था , इसीलिये ठाकुर का जन्मोत्सव दक्षिणेश्वर के भवतारिणी मन्दिर के परिशर में ही आयोजित हुआ करता था| उस दिन दक्षिणेश्वर के मन्दिर में स्वामीजी आने वाले हैं- मेरे पितामह को इसकी सूचना नाट्यकार महाकवि श्री गिरीशचंद्र घोष से प्राप्त हुई थी, जिनके साथ मेरे पितामह की गहरी अंतरंगता थी|
यह अंतरंगता केवल पितामह के साथ ही नहीं, बल्कि मेरे पितामह के अग्रज - यतीशचन्द्र  विद्यार्नव तथा मेरे पितामह शिरीषचन्द्र मुखोपाध्याय दोनों के साथ थी| तथा इन दोनो को गिरीशचन्द्र घोष " खड़दा के राम-लक्ष्मण " कह कर बुलाया करते थे|गिरीशचन्द्र ने बहुत सारे नाटक लिखे हैं, इसके साथ ही साथ उन्होंने कितने ही कविताओं और गानों की रचना भी की है| 

[ Girish Chandra Ghosh. February 28, 1844 - February 8, 1912) 
“ There is no sin which I have not committed,but still there is no end of Grace I have received from the Master.”  - Girish Chandra Ghosh. 
We read page after page of scriptures. How much do we actually assimilate in our lives? Sri Ramakrishna once said to Girish Ghosh:'What are you talking about the knowledge of Brahman! Sukadeva only saw and touched the ocean of Knowledge. Lord Shiva drank only three handfuls of its water and became unconscious.'
Girish Ghosh clasped his head and exclaimed: 'Say no more, sir! My brain is reeling." 
Try to understand this. Try to understand Girish Ghosh also.What a great mind he had. And how he could assimilate spiritual teaching! With us it enters one ear and goes out the other. 
Think of Suka! How great he was! He did not want to be born in this world because he realized that it was illusory. 'And he only saw and touched the ocean of Brahman ! And Lord Shiva is the God of gods. He could only sip its water three times ! How true! One's head would reel to think of it!' 

If one is in the company of Girish Babu for even five minutes, one gets freed from worldly delusion.. .He has such keen insight that he can see at a glance the innermost recess of a man's heart, and by virtue of this powerful insight he was able to recognise the Master as an Avatar.
— Nag Mahashay]
 the devotional drama "BILVAMANGAL THAKUR !"
It was staged on the 12th June, 1886, the theme being taken from the religious book Bhaktmal. The hero, a dissolute Brahmin youth, squandered everything on Chintamoni, a dancing girl, who lived on the other side of the Ganges. 
One day after haying performed the Sradh Ceremony, he came on the banks of the river in the evening to cross it and come to Chintamoni. But the river heaved and assumed a threatening aspect owing to heavy storm and rain and there, was no boat, nor even a piece of wood there. It was all dark and he crossed the river at last, mostly with the help of a corpse which he found In the mid-stream and took it for a log of wood.

Next, when ho arrived at Chintamoni's house at dead of night, he found the door bolted from inside but a deadly snake was there dangling from the window.
 Bilwa took it for a piece of string left by Chintamoni  for him and holding fast by it, climbed up the window into the room. Now the presence of Bilwa smelling 
so nesty with the worm-eaten decomposed body annoyed Chintamoni beyond the measure and the sight of the snake next bewildered her. At that psychological moment she scolded him  in these words:- "this mind of yours if were so deeply devoted to God, instead of to a woman of my origin, would do you good." 
These few words brought him to senses and led him to think of "Krsna, the All-shelter". The next is the history of his struggle, ups and down again, and how ultimately he was blessed with the beautiful vision of Srikrsna and Radha. 
The above story Girish developed into an intensely devotional and lofty 
drama with an exquisite art that defies all critical analysis. 
The world -renowned Swami Vivekananda used to say of it, "Fifty times I have read the drama,  and each time I find new light in it". 
Sister Nivedita, Vivekananda's disciple and devoted to Girish as a daughter, was so much charmed with it that she actually translated a considerable portion of the drama into her own language. It is worthy of mention here that Bilwa- mangal was practically the first drama written by Girish after he obtained Ramkrishna Deb's blessings and accepted him as his Guru.
Songs of Pagalini and the teachings of Soingui represent the great Paramhansa in his various phases and the highest truth of Vedantism Nirbikalpa Samadhi is reflect- ed in the words of Pagalini .

"Kabhu Ekakar 
Nahi ar Killer Gaman 
Nuhi Hillol Kallol 
Sthir Sthir Samudoy 
Nahi Nuhi Phuraila Bak 
Bartaman Birajita." 


"All is one and there is no distinction of night and day, present and past. That state is Nirvana, when there is no stir, no noise and there is an end of the individual consciousness and one is immersed in the mighty ocean of supreme and divine bliss when every thing melts into Him". 
Indeed Bilwamangal is not only rich in deep religious sentiments and lofty philosophical thoughts 
* Bilwamangal : Amrita Mittra, Sadhak :Bel Babu, Bhikshuk Aghore Pathak, Banik Upendra Mitra, Shomgiri Probodh Ghose, Ahalya Bhuni ( Bonabiharini ), 
Thaka Khetromoni, Purohit Shyam Kundu, Maiigala Khonra Kusum, Dewan Mohendra Chowdhuri, Pagalinl Gangamoni, Servant Paran Sil, Chintamoni : Binodini, Daroga Upendra Mitra, Chaukidar, SiSyas Ramtaran, Shyam Kundu, Rakhal ( cowherd boy ) Kashi Chatterji Janaika Sthri Promoda Sundarj., 

In Kdlapahar, "Chintamoni' speaks to "Leto" "Poor Leto, you differentiate Between a God and Allah " There is one God,"various people Call him in various names".
"As water is named in various words. Jal, Acqua, Pani, so is God, even if
to some he is God to others Hari, Allah or Iswara, Jesus or Jehova. It is the narrow-minded only who try to form parties but the true worshippers of God entertain no feeling of difference between their own methods and those of others." 
 Girish was preaching this ' principle of Religious unity 'from the stage,that we fight over names, ver differences without any distinction,when 
"Swami Vivekananda was preaching the same thing at the "Parliament of Religions held at Chicago and both of them were echoing the lessons given to them and to all by their common Guru Ramkrishna Deb"As many are ways as there are views." "Jata mat tata path."
Now Girish wants to make clear that what is true in the domain of religion is also true in the sphere of politics and nationalism. He deprecates that kind of unity between Hindus and Mohammedans which consists in shaking each others' hands in public meetings, but cherishing feelings of enmity in private life, and in communal interests. Thus in the Mayabasan Kalikinkar says " Excepting religious unity no other unity is possible." 
What he means is this : "Hindus, Mohornedans, Christians and even the Brahmos are divided into various sects. Hindus again are sub-divided into various sub-sects and classes. There is an interminable quarrel between the Saktas and the Vaisnavas.To one sect the other is damnable.
 If, however, we all consider that God is one and that we be we Hindus or Mohammedans, Christians or Jains are only His  sons, then alone is unity possible,but until that is achieved, there is no hope." 
Indeed this only can bring our regeneration and an instance may be quoted in 
support of Girish's theory of unity. The Turkish delegation who came to India last yearstated in answerto the invitation of a section of the Mohammedan community 
"We are Turks first and Mohammedans afterward." Similarly,if reli- gious unity is achieved,we Hindus and Mohammedans would then be in a position plainly to say that we are Indians first,and Hindus and Mohammedans afterward. 
In 1884 Sri Ramakrishna came to see a play and visited Binodini backstage afterwards. This was an event, which left a deep impression on the actress who became an ardent devotee of Ramkrishna. In her time she was called the Flower of the Native Stage and the Moon of  the Star Theatre. She introduced the modern techniques of stage make-up blending European and indigenous styles, at a time when there was no role model before her. Thus to a very great degree Chaitanya Lila contributed to the Hindu-awakening and Hindu revival.  "

 
Truth is indeed stranger than fiction. So was the life of Binodini Dasi (1863-1941), a scarlet woman -turned-actress who dominated the Kolkata stage for a little more than a decade. Legend says Binodini quits the stage at the peak of her career. Binodini quits the theatre scene when she found herself moving towards spiritualism. Once, after portraying the title role of Sri Chaitanya in the play Chaitanya Lila, (the great saint who founded the Vaishnava philosophy in Bengal), Sri  Ramkrishna Paramahamsa who had come to watch the play, walked up to the stage to bless her for her brilliant performance. Chaitnya Lila spread far and wide, the great Ram Krishna Paramhansha one night came with his disciples to see its performance. Girish gave an account of thisvisit in his reminiscences about Sri Ramkrishna....When a disciple asked him "How didyou find it ?",
 Paramhansha Dev replied - " Ashal Nakal Ek Dekhlam " "I found the imitation and the real to be identi- cally the same " 

After the play was over, Binodini had the good luck of a darshan (look) of him. She touched his feet Sri Ramkrishna blessed her : "May you attain Chaityana " or knowledge i.e. self-consciousness," * For a full description we refer to our readers 6V7 Sri Ramkrsna Kathamrta, 2nd part. It was a red-letter day for the Bengali Stage that it was favoured and blessed by so saintly a person (whom thousands went to see and to touch his feet) that came to seek his own dear one from the obscurity and impure elements of the stage. The great devotee and Yogi Bijoy Krishna Goswami, on seeing a performance of the same on an occasion, danced as if in a trance. She flowered into a versatile actress-star under the able guidance of none other than -


‘Nata-Samrat’ Girish Chandra Ghosh (1844-1912).

" Chaitanya Lila " also acted as a renaissance of Hindu religion and culture at that critical time in the national history of Bengal, when young Bengal, England-returned anglicised Balms and the Brahmos predominated in the educated society. The reli- gious faith of the whole Hindu community was greatly revived by the religious sentiments so deeply incorporated in the drama. Thus says Babu Amritalal Bose about it : "In cities and villages Jatra parties were formed, various editions of the Gitti and Chaitanya's life flooded the country. Even an England-returned Bengali instead of feeling any sense of shame rather proudly began to proclaim himself as a Hindu". His 'Ode to Girish' also composed after the latter's death, conveys the same idea : 
"Who else but Girish of Bengal Will play upon the lyre ? The stage became a shrine of pilgrimage, And the theatre, a resort of the devotees ! The dniina of Chaitanya Llla which practically rledrified the whole country was the chief topic of the day.} 
 **With thanks to https://archive.org/THE INDIAN STAGE 
Vol. Ill ] ]

महाकवि गिरीशचन्द्र घोष केवल एक नाट्यकार या अभिनेता (नट) मात्र ही नहीं थे| वे जब कभी किसी नये नाटक आदि की रचना करते तो उसे छपने से पूर्व इन दोनों भाइयों, " खड़दा के राम-लक्ष्मण " के पास उनका मन्तव्य जानने के लिये भिजवा दिया करते थे| जब ये लोग उसे भली भाँति देखकर अपना मन्तव्य दे देते, साधारणतया वे उसके बाद ही उसे छपने के लिये भेजते थे| 
इसीतरह जब ' बिल्वमंगल ' नाटक भी लिखा गया तो इसके बारे में एक पत्र उन्होंने खड़दा भेजा था, उस पत्र को मैंने भी देखा है| गिरीशचन्द्र घोष की रचनाओं तथा उनके कार्यक्रमों की देख-भाल करने के लिये उनके निजी सचिव के तौर पर जो सज्जन नियुक्त थे उनका नाम अविनाश गांगुली था| वे भी खड़दा के राम-लक्ष्मण को गिरीशचन्द्र घोष की तरफ से पत्र दिया करते थे, और स्वयं गिरीशचन्द्र भी उनको पत्र लिखा करते थे, उनके द्वारा लिखित दस-बारह चिट्ठियां तो मैंने भी देखी हैं|एक पत्र में उनके सेक्रेट्री लिखते हैं कि - गिरीशबाबू यथाशीघ्र आप दोनों से मिलना चाहते हैं, जितनी जल्दी संभव हो आप लोग  चले आइये! 
 उन दिनों किन्तु कोलकाता से खड़दा तक चिट्ठी पहुँचने में मात्र एक ही दिन लगता था, उस पत्र के ऊपर जिस दिन कोलकाता के डाकखाने का मुहर पड़ा था, मैंने स्वयं देखा है कि उसके दूसरे ही दिन सुबह में वह पत्र खड़दा में मिल गया था| किन्तु किसी कारणवश दोनों भाई तो नहीं जा सके थे, मेरे पितामह अर्थात शिरीषचन्द्र मुखोपाध्याय अकेले ही गये थे|गिरीशचन्द्र ने बिल्वमंगल नाटक की पाण्डुलिपि मेरे पितामह को देते हुए कहा कि, आप इसे देख कर अपने विचारों से मुझे तुरत अवगत करा दीजियेगा ताकि मैं इसे यथाशीघ्र छपने भेज सकूँ, क्योंकि इसबार इसके मंचन की तिथी पहले से ही निर्धारित हो चुकी है| 
उस पाण्डुलिपि को लेकर पितामह घर आ गये और दो-चार दिनों के भीतर ही पूरी पुस्तक को समाप्त करके जब लौटाने गये तो गिरीशचन्द्र को देख कर उन्हें ऐसा लगा,  मानो बड़ी व्यग्रता के साथ वे उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे हों|पहुँचते ही जिज्ञाषा किये- ' आपने इसे ठीक से पढ़ तो लिया है न, कहिये इसके बारे में आपकी क्या राय है?' 
पितामह ने कहा -" सम्पूर्ण रचना अतिसुन्दर हुई है, किन्तु आपके इस नाटक का सर्वश्रेष्ठ अंश वह है- जहाँ बिल्वमंगल एक पतिता रमणी के चरणों का स्पर्श कर उसे प्रणाम करते हैं|" गिरीशचंद्र बैठे हुए थे, उनकी मुखाकृति जितनी भारीभरकम थी, उनकी दृष्टि भी उतनी ही गंभीर थी- वे उठ खड़े हुए, और दोनों हाथों को ऊँचा उठाकर बोले - 
 " जय श्रीरामकृष्ण ! Even Vivekananda could not tell me that, अविनाश , इस पाण्डुलिपि को तुम अभी तुरन्त प्रेस में भिजवा दो! "
हमलोग महेंद्रनाथ दत्त (स्वामीजी के भाई?) द्वारा लिखित प्रबन्ध में इस बात का उल्लेख पाते हैं कि गिरीशचंद्र को बिल्वमंगल नाटक लिखने के लिये स्वयं श्रीरामकृष्ण देव ने ही अनुप्रेरित किया था, और नाटक लिखने के बाद, गिरीशचन्द्र ने उसकी पाण्डुलिपि को पढने के लिये स्वामी विवेकानन्द को भी दिया था|
{ श्रीरामकृष्ण वचनामृत : तृतीय खण्ड के पृष्ठ ४३८ पर ठाकुर ने " भक्त बिल्वमंगल की कथा "  कही है}
डाक्टर- क्यों, कहेंगे क्यों नहीं ? हम उनकी (ईश्वर की) गोद में हैं, उनकी गोद में खाते-पीते हैं, बीमारी होने पर उनसे नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे ?
श्रीरामकृष्ण - ठीक है, कभी कभी कहता हूँ, परन्तु कहीं कुछ होता नहीं |
डाक्टर- और कहना भी क्यों, क्या वे जानते नहीं?
श्रीरामकृष्ण -(सहास्य) एक मुसलमान नमाज पढ़ते समय ' हो अल्ला, हो अल्ला ' कह कर अजान दे रहा था| उससे एक आदमी ने कहा, ' तू अल्ला को पुकार रहा है तो इतना चिल्लाता क्यों है? क्या तुझे नहीं मालूम की उन्हें चींटी के पैरों के नुपूरों की आह्ट भी मिल जाती है ?' " जब उनमे मन लीन हो जाता है, तब मनुष्य ईश्वर को बहुत समीप में देखता है| परन्तु एक बात है, जितना ही यह योग होगा, उतना ही बाहर की चीजों से मन हटता जायेगा|
' भक्तमाल ' में बिल्वमंगल नामक एक भक्त की बात लिखी हुई है| वह वेश्या के घर जाया करता था| एक दिन बहुत रात हो गयी थी, और वह वेश्या के घर जा रहा था| घर में माँ-बाप का श्राद्ध था, इसलिए देर हो गयी थी| श्राद्ध की पूड़ियाँ वेश्या को खिलाने के लिये ले जा रहा था| वेश्या के ऊपर उसका इतना मन था कि किसके ऊपर से और कहाँ से होकर वह जा रहा था, उसे कुछ भी ज्ञान न था, कुछ होश ही न था |
रास्ते में एक योगी आँखे बन्द किये ईश्वर का ध्यान कर रहा था, उसे भी बेहोशी कि हालत में लात मारकर निकल गया| योगी गुस्से में आकर बोल उठा, ' क्या तू देखता नहीं? मैं ईश्वर -चिन्तन कर रहा हूँ, और तू लात मार कर चला जा रहा है?'
तब उस आदमी ने कहा- ' मुझे क्षमा कीजिये, परन्तु मैं आपसे एक बात पूछता हूँ- वेश्या की चिन्ता करके तो मुझे होश नहीं, और आप ईश्वर की चिन्ता कर रहे हैं, फिर भी आपको बाहरी दुनिया का होश है ! यह कैसी ईश्वर-चिन्ता है ?'
अन्त में वह भक्त बिल्वमंगल -संसार का त्याग करके ईश्वर की आराधना करने चला गया; जाने से पहले उसने वेश्या से कहा था, ' तुम मेरी ज्ञानदात्री हो, तुम्हीं ने मुझे सिखलाया कि ईश्वर के ऊपर किस तीव्रता से अनुराग किया जाता है !' और वेश्या को माता कह कर उसने उसका त्याग किया था|"
डाक्टर - " यह तान्त्रिक उपासना है, इसके अनुसार स्त्री को माता कह कर संबोधन किया जाता है|"]

 तो इसी बिल्वमंगल नाटक के लेखक गिरीशचन्द्र घोष ने एक दिन मेरे पितामह से कहा था- " अगले ७ मार्च (१८९७) को दक्षिणेश्वर में ठाकुर का जन्मोत्सव मनाया जायेगा, उसमे भाग लेने के लिये स्वामी विवेकानन्द आ रहे हैं| मेरे साथ आप भी वहाँ चलना चाहेंगे क्या ?" उस दिन भी वहाँ पर स्वामीजी का कोई भाषण आदि का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम नहीं था| 
उस शुभ अवसर पर दक्षिणेश्वर में ठाकुर के बहुत सारे भक्तगण एकत्र हुए हैं, माँ भवतारिणी का दर्शन किये हैं, प्रसाद पाये हैं, द्वादश शिवमन्दिर में प्रणाम किये हैं, और मन्दिर परिशर के आसपास चारों ओर घूम रहे हैं|तब का दक्षिणेश्वर मन्दिर भी आज से बिल्कुल भिन्न रहा होगा! हमलोगों ने भी अपने बचपन में दक्षिणेश्वर मन्दिर का जो चेहरा देखा था, उसका वह चेहरा पहले से कितना बदल गया है, पहले जैसा तो अभी बिल्कुल नहीं लगता| 

The panchavati hut where Ramakrishna 
practiced his spiritual practices
जो हो उसदिन स्वामीजी भी टहलते टहलते पंचवटी के निकट पहुँचे हैं, उनको देख कर जो भक्तगण इधर-उधर घूम रहे थे वे उनके आकर्षण में बंध कर उनके निकट खींचे चले आये हैं| सभी लोग उनसे अनुरोध करते हैं- ' स्वामीजी आप कुछ कहिये ' | और स्वामीजी कुछ सुनाते हैं! उस दिन मेरे पितामह ने स्वामीजी के जिस भाषण को बिल्कुल आमने-सामने खड़े होकर सुना था, उसका वर्णन तो वे अनेक दिनों बाद तक किया करते थे- वह एक अलग प्रसंग है| 

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Tuesday, March 23, 2010

भारतीय नारी एक ही आधार में गुरु, जीवन साथी और माँ जैसी सेविका भी है -प्रव्राजिका देवात्मप्राणा


{प्रव्राजिका देवात्मप्राणा, रामकृष्ण सारदा मिशन विवेकानन्द विद्या भवन,दमदम|९ अक्टूबर २००९ को सारदा नारी संगठन के बीसवें वार्षिक महिला प्रशिक्षण शिविर में बंगला भाषा में प्रदत्त उद्घाटन भाषण का हिन्दी अनुवाद }
सारदा नारी संगठन के प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने वाली समस्त " सारदा-कन्याओं " को मैं अपनी हार्दिक शुभेच्छा और आन्तरिक स्नेहाशीष देती हूँ! उपस्थित अन्यान्य समस्त सुधि-वृन्द को यथायोग्य संभाषण एवं प्रेमपूर्ण नमस्कार निवेदित करती हूँ| ८ से ११ अक्टूबर २००९ तक चलने वाले इस चार दिवसीय प्रशिक्षण शिविर को सारदा नारी संगठन ने आयोजित किया है|चार दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण शिविर को परिचालित करना  निश्चित रूप से सांगठनिक शक्ति का द्योतक है, जिसमे शिविर के समाप्ति तक समस्त नारियाँ यहीं अवस्थान करेंगी|माँ से प्रार्थना करती हूँ कि यह शिविर निर्विघ्न सम्पन्न हो ताकि जिस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये यह शिविर आयोजित किया गया है वह पुर्णतः सफल हो ! अर्थात जो भी महिलायें और युवतियाँ यहाँ आयीं हैं उनमे से प्रत्येक का जीवन माँ के आलोक से आलोकित हो उठे, उनका जीवन धन्य हो जाये !  
आप सबों को चार दिनों तक इस शिविर में स्वेच्छा से बन्दी हो कर, कितनी ही असुविधाओं के बीच ये चार दिन बिताने होंगे| प्रातः काल से लेकर रात्रि पर्यन्त पूर्व-निर्दिष्ट कार्यक्रमों के अनुसार भलीभांति चलना होगा, यह उतना आसन कार्य नहीं है| किन्तु श्रद्धा के साथ,आग्रह के साथ आनन्द के साथ इन समस्त कार्यक्रमों में भाग लेने से- अपने जीवन की गति स्वतः शुभ-कर्म के पथ पर निर्दिष्ट हो जाएगी|
इस पवित्र वातावरण के शुभ भाव, शुद्ध भाव के बीच चार दिनों तक रह लेना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है! नारी संगठन ने इसका सुयोग कर दिया है, इस कार्य के लिये मैं उनको विशेष धन्यवाद देती हूँ !
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल द्वारा प्रकाशित इसके मुख-पत्र " विवेक-जीवन " को मैं नियमित रूप से पढ़ती हूँ| इसको पढने में बहुत अच्छा लगता है| इस मुख-पत्र में महामण्डल के द्वारा भारत के जिन राज्यों में शिविरों का आयोजन तथा विभिन्न आयोजन होते रहते हैं, उनमे क्या-क्या चर्चा होती है, क्या वक्तव्य दिये जाते हैं, शिविरार्थियों के द्वारा जो सब प्रश्न किये जाते हैं, उनके जो उत्तर दिये जाते हैं वह सब इसमें प्रकाशित किया जाता है| 
इसको पढने से यह पता चल जाता है कि ' युवा महामण्डल ' एक ऐसा यन्त्र है जो सारे भारतवर्ष में समस्त युवाओं के ह्रदय में स्वामी विवेकानन्द के भावों को भरने का प्रयास करता आ रहा है, ताकि उनका ह्रितपिण्ड स्वामीजी के भावों से अनुप्राणित हो जाये|और इस सारदा नारी संगठन के विकास और प्रगति के जड़ में भी यह अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की शक्ति ही उसकी प्रेरक-शक्ति बन कर कार्यशील है |
और इस सारदा नारी संगठन का क्या उद्देश्य है ? इस संगठन ने महिलाओं और युवतियों के ह्रदय में माँ को प्रतिष्ठित करा देने का व्रत लिया है ताकि नारियों के भीतर माताओं के भीतर माँ सारदा के भावों को विशेष रूप से क्रियाशील किया जा सके|
 इनलोगों ने (नारी-संगठन की वरिष्ठ दीदियों ने) माँ के आदर्श में अपने जीवन को अनुप्राणित किया है, एवं अन्य नारियों के ह्रदय में भी माँ के भावों का विस्तार करने के लिये आगे बढ़ी हैं|तथा इस शिविर में शामिल समस्त नारियों का यह दायित्व है कि वे भी श्री श्री माँ के आदर्श को अपने जीवन में रूपायित कर लें|
माँ के आदर्श के अनुसार अपना जीवन गठित करने के लिये सर्वप्रथम आवश्यकता है माँ को अपने ह्रदय से चाहना और उनपर श्रद्धा रखना; फिर शेष सब कुछ अपने आप हो जायेगा|माँ के प्रति थोड़ा भी प्रेम रखने से सब हो जायेगा! माँ तो हमलोगों पर कृपा करने के लिये उन्मुख होकर खड़ी हैं, हमे केवल अपनी अश्रद्धा को इस कार्य में बाधक बनने से रोकना है|
जिस महान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये यह शिविर आयोजित हुआ है, उसमे किन्तु कृतकार्य होने के लिये हमलोगों को सबसे पहला अपना शरीर स्वस्थ रखना होगा|क्योंकि यदि शरीर स्वस्थ न रहे तो किसी भी कार्य में मन नहीं लगेगा,यहाँ पर चल रही कक्षाओं में बताये जा रहे महत्वपूर्ण विषय भी मनोयोग पूर्वक हम सुन नहीं सकेंगे|
अतः जीवन-गठन का पहला सोपान है ' शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना ' यह होने के बाद ही हम परवर्ती सोपानों की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं|इसीलिये हमारे शास्त्रों में कहा गया है- " शरीरम आद्यं खलू धर्मसाधनम !" अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिये हमे सूर्योदय से पूर्व ही शैय्या को त्याग कर देने की आदत डालनी होगी, फिर कुछ हल्का शारीरिक व्यायाम करके अपने आहार-विहार को भी परिमित रखने का नियमित अभ्यास करना होगा| विशेष कर आहार-ग्रहण के सम्बन्ध में बहुत सावधान रहना होगा,जिन खाद्य पदार्थों को ग्रहण करने से शरीर अस्वस्थ हो जाने की सम्भावना होती है, किसी भी कारण से (स्वाद आदि के लोभवश ) उन खाद्य पदार्थों को ग्रहण नहीं करना है| शरीर को स्वस्थ रखने के लिये उपरोक्त दिनचर्या का नियमित अभ्यास करना हमारा विशेष दायित्व है, यह भी साधना के अन्तर्गत आता है, केवल जप-ध्यान करने से क्या होगा?

 यह ठीक है कि जपध्यान करने से मन एकाग्र, पवित्र और शान्त होता है, किन्तु यदि हमारा शरीर ही स्वस्थ न हो तो जप ध्यान में मन नहीं लगेगा|सर्वप्रथम हमे अपने शरीर को स्वस्थ रखने का उत्तरदायित्व ग्रहण करना होगा, उसके बाद ही जपध्यान कि ओर अग्रसर होने का प्रश्न उठेगा|स्वामीजी ने भी तो कहा था न, " शरीर में बल नहीं, ह्रदय में उत्साह नहीं, मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं, क्या होगा रे ऐसे जड़ पिण्डों के द्वारा ? " 
इसीलिये सबसे पहले शरीर गठन करना होगा|स्वामी विवेकानन्द अपने कर्मियों (संतानों) की स्नायू -पेशियाँ बज्र के समान फौलादी देखने की कामना करते थे; अतः इन सबको शक्तिशाली बनाना होगा|नहीं बनाने से क्या होगा ? यदि हमारी स्नायू-पेशियाँ बज्र-सम उपादानो से न गठित हों तो सांसारिक और परिपार्श्विक घात-प्रतिघातों के प्रतिक्रिया के फल स्वरूप हमारा मन सदैव उद्वेलित बना रहेगा|

हमे प्रतिक्रिया किये बिना अविचलता (Poise ) का गुण धारण करने की शक्ति अपने भीतर रखनी होगी; इसीलिये जिन सब दिनचर्या को जीवन में धारण करने से हमलोगों का शरीर स्वस्थ और सबल रहे उस ओर विशेष ध्यान देना होगा| 
किस प्रकार से गठित जीवन को " आदर्श-चरित्र " कहा जा सकता है ? उसीका चरित्र आदर्श माना जा सकता है जिसके जीवन में चारों योगों का समन्वय रहता है | योग किसे कहते हैं? - उपाय या पथ को योग कहते हैं| किस चीज का उपाय? किस लक्ष्य तक पहुँचने का पथ?  आदर्श चरित्र के अनुरूप सुन्दर जीवन गठित करने के जो उपाय या पथ हैं उनको ही " योग " कहते हैं| 


 आत्मज्ञान ज्ञान प्राप्त करने से  या आत्मस्वरूप की उपलब्धि करने से जो आदर्श चरित्र गठित होता है,उसी आत्मसाक्षात्कार करने के उपाय को योग कहते हैं |चार प्रकार के योग कहे गये हैं, उनके नाम क्या क्या हैं ? कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, राजयोग| ज्ञानयोग क्या है ? 

" ईश्वर ही सत्य हैं, और सबकुछ ( गो गोचर जहँ लग मन जाई सो सब माया जान हु भाई ) अनित्य है !" इस तथ्य को अपने अनुभव से जान लेना होगा ! (नेति-नेति) विवेक -विचार करते हुए इस सिद्धान्त (परम-सत्य या त्रिकाल-बाधित सत्य) तक नेति-नेति विचार करते हुए पहुँच जाने के पथ को ही ज्ञानयोग कहते हैं|
 ' ईश्वर ही सत्य हैं, और सब अनित्य (मिथ्या है पर असत नहीं है) है ' - इसीके ऊपर निरन्तर चिन्तन-मनन करके इस तथ्य (सच्चिदानन्द) को एक बार अवश्य समझ लेना होगा कि ( ब्रह्माजी से लेकर दूर्वा तक में ) सभी वस्तुओं में वे ईश्वर ही अनुष्युत हैं| (Energy is equal to matter या E = M या " रज्जू-सर्प विवेक "  करते हुए या सत-असत और अनित्य या मिथ्या के अन्तर को, अर्थात  परिणाम-वाद और विवर्त-वाद के अन्तर को ठीक से समझ कर " सत-वस्तु " को केवल बुद्धि से जान लेना नहीं, बल्कि अपने अनुभव से पहचान लेना होगा कि यह - " जगत भी ब्रह्म ही हैं !") " ईश्वर सत्य हैं और सब अनित्य है !"   
'ईश्वरई सत्य आर सब अनित्य '  - येइटी विचार करा, येइटी बोधे बोध करा, " ता बुझे फेला "- जे सब वस्तुते सेई ईश्वरई रयेछे |'- अर्थात यह विचार करना, अपने स्वयं के अनुभव से यह जान लेना, " ता बुझे फेला " - इस बात को अच्छी तरह से समझ लेना कि [ दृष्टिगोचर प्रत्येक ' नाम-रूप ' के पीछे वही ' अस्ति-भाति-प्रिय ' हैं] - सभी वस्तुओं में वही ईश्वर ओत-प्रोत हैं ! 
और कर्मयोग क्या है ?

हमलोग जो भी कार्य करते हों - उसी कार्य को निष्काम भाव से करना होगा|मेरे सामने अभी जो कार्य आ गया है या अभी जिस कार्य में मैं लगी हुई हूँ उसको मैं इसलिए नहीं कर रही हूँ मुझे कहीं से कुछ प्राप्त हो जायेगा, बल्कि जिस कार्य को मैं कर रही हूँ उसके फल को भी मैं अपने लिये नहीं चाहती हूँ| हमे ऐसे मनोभाव को रख कर कर्म करना चाहिये कि मैं जिस कार्य को कर रहा /या रही हूँ उसे मैं किसी निजी स्वार्थ के लिये नहीं बल्कि भगवान में प्रीति के लिये (भगवान कि प्रसन्नता के लिये) या सबों के कल्याण के लिये कर रही हूँ|इस मनोभाव के साथ हमलोग कोई भी कर्म करें तो हम भगवान के साथ जुड़ जायेंगे, या भगवान के साथ मेरा योग हो जायेगा| 

और भक्ति-योग क्या है ?ईश्वर के जिस नाम-रूप में मेरी निष्ठा है, अर्थात ईश्वर के जिस रूप को मैं अपना इष्ट मानती हूँ, सबों के ह्रदय में वे ही विराजित हैं, जो मुझे सबसे अच्छे लगते हैं -  उनके प्रेम में उनके चरणों में आत्मनिवेदन कर देना ही भक्ति-योग है|जिनको मैं अपना इष्ट (ठाकुर) मानती हूँ उनसे बढ़ कर मेरा अपना और कोई भी नहीं है|

वे ही मेरे प्रेमास्पद हैं, उनसे मैं बहुत प्रेम करती हूँ |सभी प्रेम के केंद्र बिन्दु 'वे ' ही हैं, ( संसार के जिस किसी व्यक्ति या वस्तु से मैं प्रेम करती हूँ वह यही समझ कर करती हूँ कि सभी के केंद्र या ह्रदय में वे ही विराजमान हैं)|मैं जो कुछ भी करती हूँ, जितना भी कार्य करती हूँ - वह सब अपने इष्ट की प्रसन्नता के लिये करती हूँ| उनके प्रेम में आत्म निवेदन कर रही हूँ!( मेरे तो गिरिधर-गोपाल दूसरो न कोय - आशिक (प्रेमी) है ? तो माशूक (प्रेमास्पद) को हर रूप में पहचान !) इसको ही भक्ति योग कहते हैं|        
और राजयोग क्या है ?(द्रष्टा-दृश्य विवेक - ' घट द्रष्टा घटात भिन्नः ' का बोध न रहने के कारण ) माया का राज्य हमलोगों के चित्त को विक्षिप्त कर देता है| प्रत्येक क्षण ऐसा प्रतीत होता है कि कोई स्पष्ट कारण न रहने के बाद भी मेरा चित्त इतना विक्षुब्ध (बहिर्मुखी) हुआ जा रहा है कि मैं उसको संयत नहीं कर पा रही हूँ|अपने चित्त को विक्षिप्त होने (बहिर्मुखी बने रहने ) से रोककर, इन्द्रिय विषयों में जाने से रोक कर, विषयों से वापस खींच कर (उसे अन्तर्मुखी बना कर) अपने यथार्थ स्वरूप में निविष्ट कर देना, मन को तैल-धारवत एकाग्र रखना या मन कि एकाग्रता को ध्यान में परिणत कर लेना ही राजयोग है| 

 आप सबों ने ' रामकृष्ण मिशन ' का प्रतीक चिन्ह अवश्य ही देखा होगा|
 [ The emblem of the Ramakrishna Order designed by Swamiji is a unique and unparalleled work of art created by one of the richest minds in contemporary history in an exalted mood of spiritual inspiration. It is a profound symbol of harmony and synthesis for reverential meditation in this present age of conflict and disharmony. This symbol is the epitome of Swamiji's message of harmony and synthesis, leading to life's fulfilment. This is indeed the most eloquent expression of what he really preached, what he wanted every man and woman to be, to realize, either in the East or in the West. The goal is to realize, even in this very life, one's real Self, the self-effulgent Atman, the Swan in the emblem and through this realization to be free of all limitations, all bondages, all littleness. This spiritual freedom is one thing to be aspired for and achieved in this very life. It releases one from one's prison-house of limited individuality and confers upon him or her, the blessing of universal existence. He then becomes one with Existence-Knowledge-Bliss Absolute. 'Be free. This is the whole of religion' said Swamiji.
The meaning behind this emblem, in the language of Vivekananda himself:
"The wavy waters in the picture are symbolic of Karma, the lotus of Bhakti, and the rising-sun of Jnana. The encircling serpent is indicative of Yoga and awakened Kunadalini Shakti, while the swan in the picture stands for Paramatman. Therefore, the ideal of the picture is that by the union of Karma, Jnana, Bhakti and Yoga, the vision of the Paramatman is obtained"]
 उसमे जो तरंगायित जलराशि दिखायी दे रही है वह कर्म का प्रतीक है|उसके भीतर एक प्रस्फुटित कमल का फूल है, वह भक्ति का प्रतीक है|उसके पीछे उदीयमान सूर्य   है, वह ज्ञान का प्रतीक है|सब को घेरे हुए एक कुण्डलीकृत सर्प है, वह योग का प्रतीक है| चित्र के मध्य में एक हंस है, वह परमात्मा का प्रतीक है| अर्थात यदि किसी व्यक्ति के चरित्र में कर्म, ज्ञान, भक्ति और योग चारों का समन्वय हो जाये तो उनको परमात्मा की उपलब्धि प्राप्त हो जाएगी |
उसी प्रकार अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के प्रतीक चिन्ह को भी आप लोगों ने अवश्य देखा होगा, वहाँ भारतवर्ष के मानचित्र के भीतर परिव्राजक के रूप में स्वामी विवेकानन्द का चित्र है|

The Emblem
The emblem of the Mahamandal, which appears at the upper right corner of the webpage, shows Swami Vivekananda as an itinerant monk standing at Kanyakumari at the southernmost part of India, which is represented through the line map on the earth. On the top is written : Charaiveti Charaiveti (Onward! Onward!) and at the bottom: BE AND MAKE. The rest of the circle representing the earth is encapsulated with a series of small Vajras.

उसके ऊपर में लिखा है- " चरैवेति चरैवेति " और नीचे लिखा है, महान भारत का निर्माण करने के लिये स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त ' भारत-निर्माण सूत्र ' - " Be and Make " ! जिसका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण भारतवर्ष स्वामीजी कि मनुष्य निर्माणकारी और चरित्र निर्माणकारी शिक्षाओं से अनुप्राणित होकर - स्वयं (यथार्थ) मनुष्य बनने और और दूसरों को भी यथार्थ मनुष्य बनाने की दिशा में क्रमशः आगे बढ़ता रहे! अर्थात जिस किसी व्यक्ति का जीवन दीप स्वामीजी के भाव में प्रज्वलित हो चुका है, वह अन्य एक जीवन दीप को भी प्रज्वलित करे !
इस शिविर में आपलोगों ने ' सारदा नारी संगठन ' के प्रतीक चिन्ह को भी अवश्य देखा है : श्री माँ की ध्यानस्थ मूर्ति है, जिसके ऊपर " चरैवेति " लिखा है और नीचे " Be and Make " लिखा है| अर्थात समस्त नारियों (मात्री-मूर्तियों) के ह्रदय में वही " ज्ञानदायनी " सारदा सरस्वती विराजित हो जाएँ, जो मेरे ह्रदय में विराजित हैं! इसी अदम्य इच्छा या भावना को लेकर आगे बढ़ते रहें| जो नारी इस दिशा में उन्नत होने के मार्ग पर अग्रसर हो चुकी हैं, जिनका ह्रदय दीप " माँ " के भाव में प्रज्वलित हो उठा है वे और एक दीप को प्रज्वलित करें! 

यही है लक्ष्य - अपने नारी जीवन को सार्थक करने का लक्ष्य ! इस शिविर में भाग लेने वाली प्रत्येक नारी के ह्रदय में यही अदम्य इच्छा रहनी चाहिये कि मुझे भी इसी लक्ष्य तक पहुँचना है! इसी आदर्श को स्थापित करने की दिशा में यह संगठन भी क्रमशः आगे बढ़ता जा रहा है!

श्री रामकृष्ण (ठाकुर) ने जिस सत्य की उपलब्धि की थी- स्वामी विवेकानन्द (स्वामीजी) ने उन्ही की शिक्षाओं को सम्पूर्ण विश्व में प्रचारित किया है| माँ ने उसी  " सत्य " को अपने जीवन में उतार कर दिखा दिया है ! ठाकुर से कोई यदि यह पूछता कि - आपकी शिक्षा (उपदेश) क्या है? तो श्री रामकृष्ण बड़े विरक्त हो उठते थे |
 और किसी शिशु के जैसी नाराजगी दिखाते हुए कहते थे- ' लो देखो इसकी बात, भला मैं क्या शिक्षा दूंगा ? मेरी शिक्षा या उपदेश जैसा तो कुछ भी नहीं है, मैं तो बस खाता-पीता हूँ और माँ को पुकारता रहता हूँ|' " माँ'र छेले श्रीरामकृष्ण देव " - अर्थात साक्षात् " जगदम्बा के पुत्र श्रीरामकृष्ण देव " ने अपने जीवन में कभी भी बहुत बड़े पंडाल में सभा बुला कर और हजारो हजार मनुष्यों के सामने मंच पर बैठ कर अपने उपदेशों को नहीं सुनाया था| 

दक्षिणेश्वर के जिस कमरे में वे रहते थे, वहाँ कुछ इने-गिने चुने हुए मनुष्य आया करते थे| उनके साथ नित्य चर्चाएँ किया करते थे, बातचीत के क्रम में कुछ कहानियाँ आदि भी  सुनाया करते थे| भाषण आदि देने के लिये दूर-दूर तक जाते रहे हों, ऐसी कोई बात नहीं थी| हाँ, यदि उन्हें कभी यह पता चल जाता कि अमुक मनुष्य भगवान से बहुत प्रेम करता है, तो केवल उनको देखने के लिये दौड़े-दौड़े जाते थे|

 या किसी व्यक्ति के बारे में यह सुनते कि अमुक आदमी मनुष्यों की बहुत सेवा करते हैं - तो उनको देखने के लिये भी गये हैं| इस प्रकार के कुछ गिने-चुने भक्तों के घर में ही उनका आगमन हुआ था| किन्तु उन्ही कतिपय अल्प मनुष्यों को दिये उनके उपदेश परवर्ती काल में स्वामीजी के माध्यम से सम्पूर्ण जगत में तुमुल निनाद बन कर गुंजायमान हुआ है| 

और आज सम्पूर्ण जगत इस बात को स्वीकार कर रहा है कि केवल यह शिक्षा (जितने मत उतने पथ) ही इस जगत को विनाश से बचा सकती है|अन्य कोई उपाय नहीं है, यही (सर्वधर्म समन्वय ) ही एकमात्र पथ है|  
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -" My ideal indeed can be put into a few words and that is to preach unto mankind their divinity and how to manifest it in every movement of life." - अर्थात " मेरे आदर्श को ( मेरे सम्पूर्ण वांगमय को) वस्तुतः अत्यन्त संक्षेप में (' बनो और बनाओ ' के रूप में ) प्रस्तुत किया जा सकता है, और वह है - समस्त मनुष्यों को उनमे अन्तर्निहित देवत्व का उपदेश देना और जीवन के हर कदम पर ( जिवनेर प्रति पद्क्षेपे ) उसी देवत्व को अभिव्यक्त करने की पद्धति या उपाय ( है  - ' तुम स्वयं चरित्रवान मनुष्य बनो और दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो ') समझा देना |" 
श्रीरामकृष्ण देव ने कहा था- " ईश्वर लाभ करना ही मनुष्य जीवन चरम लक्ष्य है! " ईश्वर-लाभ रूपी जीवन आदर्श को पकड़ कर चलने (या चरित्रवान मनुष्य बनने ) के जिस आदर्श को श्रीरामकृष्ण देव ने अपने जीवन में उतार कर प्रचारित किया था; उनकी उसी आदर्श शिक्षा पद्धति - (" Be and Make ") को स्वामीजी ने अन्य भाषा में जगत के समक्ष प्रस्तुत किया था| 

धर्म ( या चरित्र ) ही भारत का मेरुदण्ड है, आध्यात्मिकता ही भारत का प्राण है| धर्म क्या है ? सभी धर्मों में कुछ बहिरंग भाग (पूजा-अनुष्ठान पद्धति और पुस्तक आदि) रहता है, किन्तु उस बहिरंग रूप को ही यथार्थ धर्म नहीं कहा जा सकता|फिर भी साधारण मनुष्य उसी बहिरंग के आचार-अनुष्ठान का पालन करने को ही धर्म समझकर बहिरंग के अनुष्ठानों में ही अपना पूरा जीवन नष्ट कर लेता है| और असली धर्म आचरण से दूर ही रह जाता है| 

यथार्थ धर्म क्या है? मन,वचन और कर्म से धार्मिक होना, अर्थात बोली में, विचारों में, आचरण में या व्यवहार में, सही ढंग से धर्म का पालन करना; किसी भी कार्य को करते समय - सत्य, न्याय और निःस्वार्थपरता का पालन करते हुए सेवा के आदर्श को दृढ़ता से पकड़कर कार्य करते जाना| हम चाहे किसी भी कार्य-क्षेत्र में नियुक्त क्यों न हों, चाहे किसी ऑफिस में कार्य करूँ या घर-गृहस्ती का कार्य करूँ, परिवार के बीच रहूँ या कारखाने में रहूँ या मन्दिर में रहूँ - हर जगह सत्य को पकड़े रहना होगा,( अर्थात हर समय अपने आत्मस्वरूप के प्रति सचेतन रहना होगा)| 

हमे पक्षपाती न बनकर न्याय-परायण बनना होगा, निःस्वार्थपर होना होगा| मन में सेवा का भाव (शिवज्ञान से जीव सेवा का भाव) रखना होगा| स्वामीजी ने कहा है, " तुमलोगों की आध्यात्मिकता के ऊपर केवल भारत का ही नहीं सम्पूर्ण जगत का कल्याण निर्भर करता है| "

' आध्यात्मिकता ' - क्या है? अपने " यथार्थ स्वरूप " के सम्बन्ध में सदैव सचेतन रहना ! सदैव इस सत्य में स्थित रहना कि मैं अविनाशी या नित्य परमेश्वर के साथ एकात्म हूँ, मैं कोई अनित्य या मरणधर्मा जड़ शरीर नहीं हूँ| मैं एक साढ़े तीन हाथ के छोटे से शरीर में या इन्द्रियों में आबद्ध अहं-सर्वस्व (अपने को केवल शरीर मानने वाला) कोई जड़ पदार्थ नहीं हूँ|( शरीर तो जड़ है किन्तु मैं चेतन हूँ, जड़ घट को देखने वाला चेतन है) वास्तव में मैं ही ' वह ' परम आनन्दमय, सत-चित-आनन्द-स्वरूप हूँ ! 

किन्तु मैं इस बात को कहीं से सुन कर या रट कर नहीं बोल रही हूँ | यह केवल मुख से कहने वाली बात नहीं है| मैं इस बात को अपने अनुभव के आधार पर कह रही हूँ, यह मेरी उपलब्धि (आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अपने स्वरूप को जानना ) है ! इस अवस्था में सदैव जाग्रत रहने को ' सचेतनता ' कहते हैं| यही है आध्यात्मिकता |
 ( मानव जाती के सच्चे नेताओं में यह आध्यात्मिकता या 'आध्यात्मिक-शक्ति' अनिवार्य रूप से रहनी चाहिये|) मनुष्य अपने छोटे अहं (कच्चा मैं के भ्रम या स्वयं को M/F मानने के भ्रम से ) से जितना दूर होता जाता है, उतने ही परिमाण में क्रमशः उसके भीतर ईश्वर का प्रकाश आविर्भूत होता जाता है| इसीलिये इस आध्यात्मिक दृष्टि को प्राप्त करके ( दृष्टिम ज्ञानमयी कृत्वा पश्येत ब्रह्ममय जगत ) सेवा कर्म में (शिवज्ञान से जीव सेवा कर्म में) निरत रहना एवं आत्मनिवेदन कर देना ही आध्यात्मिक जीवन है | धर्म का अर्थ है चरित्र, और यही वह यथार्थ शक्ति है जो हमे सुख-दुःख में सम रहने की योग्यता प्रदान करता है !
हमलोगों में से कोई भी व्यक्ति दुःख नहीं पाना चाहता है, दुःख के नाम से शिहर उठते हैं| बोल पड़ते हैं- अरे बाप ! इस प्रकार जीवन जीने या इस पथ पर चलने से तो मुझे दुःख उठाना पड़ सकता है, इसलिए मुझे इस रास्ते से लाख हाथ दूर ही घिसक जाना चाहिये| हमलोगों में से कोई नहीं चाहता कि मेरे सन्तान को जीवन में थोड़ा भी दुःख-कष्ट प्राप्त हो| हमलोग ऐसी व्यवस्था करने कि चेष्टा करते हैं, जिससे उसका सारा जीवन सुख में बीते| हम सभी मनुष्य सुख पाने की ही कामना करते हैं, किन्तु जीवन में दुःख की भी उपयोगिता है| 

किन्तु यदि किसी व्यक्ति के जीवन में लेश मात्र भी दुःख नहीं प्राप्त हो, तो उसके जीवन की बुनियाद ही कच्ची रह जाएगी| अर्थात जीवन के जो रिपू(काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह, और मत्सर आदि) हैं, वे नष्ट नहीं हो पाते| इसलिए जीवन-गठन में दुःख की भी एक बड़ी भूमिका है| जीवन को चट्टानी बुनियाद पर गठित करना आवश्यक है| यदि बाहरी आंधी-तूफान जीवन में न भी आये तो भी, दुःख को ग्रहण करना होगा|
क्यों कि दुःख के बिना जीवन गठित नहीं होता है, अभिमान (अहंकार) नहीं जाता है|जीवन में दुःख भोग किये बिना रिपुओं का नाश भी नहीं होता है|इसीलिये तुमलोग भी अपने जीवन में केवल सुख, केवल सम्मान केवल आदर-सत्कार पाने की ही इच्छा मत करना| क्योंकि वैसा करने से तुमलोग यथार्थ मनुष्य बनने के बजाय दिनोदिन अधिक हीन, और ज्यादा क्षुद्र, और अधिक स्वार्थपर बन जाओगी| और दुःख-सुख में जितना सम या संतुलित रह सकोगी, जीवन में आघात-अपमान मिलने पर जितने शान्त मन से उनका वरण करोगी उतना ही देख पाओगी कि वे समस्त आघात-अपमान - तूफान के अन्त में पेंड़ से झड़े पत्तों के जैसे तुम्हारे ही चरण तले आकर आश्रय ग्रहण कर रहे हैं! 

( मन को एकाग्र रखने की) साधना के द्वारा ही समस्त प्रकार के दुखों से परित्राण (छुटकारा) प्राप्त कर सकता है | तुमलोग अपने को दिनोदिन अधिक उदार, पवित्र, सहिष्णु और अभिमान शून्य बनाने की साधना करती रहो; तभी भगवान तुम्हारे ह्रदय में प्रतिष्ठित हो सकेंगे|

बहुत से लोग धर्म साधना में अतिकष्टकर साधन-प्रणाली को ही धर्मलाभ की अन्यतम शर्त मान लेते हैं| वे लोग सोंचते हैं - प्रत्येक रविवार को गंगा-स्नान के लिये जाना होगा, दिन में केवल एक बार ही खाना होगा, शैया पर नहीं सोना होगा, वृक्ष के तले शयन करना होगा, अथवा मौन रहना होगा- आदि आदि| यह सब करने से इन्द्रियों पर विजय पाने में कुछ सहायता अवश्य मिल सकती है, किन्तु इसको ही धर्म का सर्वस्व नहीं समझना चाहिये| 
जिस प्रकार मेरी साधना का उद्देश्य कष्टकर साधनों में ही निरत रहना नहीं है उसी प्रकार विलासितापूर्ण जीवन बिताना भी नहीं है| विलासितापूर्ण जीवन हमारे चरित्र को और भी नीचे गिरा देती है| अतः हमलोगों को न तो अधिक कष्टकर जीवन बिताना चाहिये, न तो विलासिता में जीने की इच्छा करनी चाहिये| हमलोगों के जीवन का मूल उद्देश्य है- ज्ञान लाभ, भक्ति लाभ, भगवान की ओर (मुड़ जाना ) आगे बढ़ जाना|
इसका प्रथम सोपान है - जीवन को आनन्द पूर्वक जीना| और उसका उपाय है- पवित्रता, शरीर-मन-वचन से सदैव पवित्र रहने की चेष्टा करना| मेरे भीतर (मन में ) काम,क्रोध,लोभ,मद, मोह, मात्सर्य आदि जो षडरिपू निवास करते हैं, उनसबको मैं अपने नियन्त्रण में रखूंगी | पवित्रता (का पालन करना) - इसीको कहते हैं! मैं षडरिपुओं के वशीभूत होकर (या मन और इन्द्रियों की गुलाम बनकर) कोई भी आचरण नहीं करुँगी|
दूसरा सोपान है मन के ऊपर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त कर लेना, इसके लिये मुझे मन को एकाग्र रखने का अभ्यास (अनुशीलन) करना होगा| मेरे मन में क्या चल रहा है, इसको बाहर से नहीं समझा जा सकता|निरन्तर मन ही मन अनुशीलन न चलने से कोई व्यक्ति धार्मिक जीवन जी ही नहीं सकता| वाह्यप्रकृति (बहिरंग को) और अन्तः प्रकृति (अन्तरंग को) को हमे अपने नियन्त्रण में रखना ही होगा| {जब चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण गुण ' Poise ' या ' सन्तुलन ' हमारे जीवन का अंग बन जायेगा, या अपने मन के ऊपर हमारा पूर्ण नियन्त्रण हो जायेगा तब} मेरी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी होने के साथ ही साथ - (सास या बहु की भूमिका निभाते समय) मैं कभी ' Outburst ' नहीं करुँगी अर्थात अपना आपा नहीं खोउंगी !

 किन्तु यदि मन को एकाग्र रखने या अपने नियन्त्रण में रखने की साधना- " मनः संयोग " का नियमित अभ्यास न करूँ तो जीवन की हर परिस्थितियों में शान्त और संतुलित रह पाना कभी संभव न हो सकेगा| सत, असत का विवेक-विचार करना चाहिये| सत क्या है ? जो हमें ईश्वर की ओर ले जाता हो, विकास की ओर ले जाता हो| हमे अपने ह्रदय का निरिक्षण करना चाहिये कि वह बड़ा हो रहा है या नहीं, अर्थात मैं दूसरों के साथ एकात्मबोध करने में सक्षम हो पा रहा हूँ या नहीं, मैं सन्मार्ग पर चल रही हूँ या असत के पथ पर, या कहीं मैं और भी अधिक संकीर्णता के पथ पर या स्वार्थपरता की दिशा में तो अग्रसर नहीं हो रही हूँ| 
अपने मन को सदैव ऊंच्च भावों से परिपूर्ण रखना होगा, अर्थात हर समय केवल यह अनुभव करना होगा कि - ईश्वर ही एक मात्र सत्य वस्तु हैं और सब अनित्य है!यदि क्षण भर के लिये भी तुम्हारे मन में यह विचार उठे, यदि एक बार भी तुम यह सोचो कि तुम ईश्वर नहीं हो, (ईश्वर से भिन्न जड़ शरीर मात्र हो) तो तुम महाभय से (मृत्यु के भय से) आक्रान्त हो जाओगी ! और जैसे ही तुम्हारे मन में यह बोध जाग्रत हो जायेगा कि - " सोअहम " ; अर्थात मैं ही वह हूँ (" I am He "), ' मैं ही ईश्वर हूँ ' यह बोध जाग्रत होते ही मन अपूर्व आनन्द और शान्ति से भर उठेगा|
रात दिन हर समय ' भगवान, भगवान ' करते हुए आनन्द कितनो को होता है? बहुत अधिक जप- ध्यान कौन कर सकता है ? हर समय वैसा करना संभव नहीं होता| इसीलिये हमलोगों को जीवन के विस्तार के मार्ग से या ह्रदय को विस्तार करने के पथ- (" Be and Make ") से हो कर जाना ही पड़ेगा| इसीलिये स्वामीजी ने कर्म, भक्ति और ज्ञान को ह्रदय के विस्तार के साथ जोड़ दिया है, उन्होंने नारायण ज्ञान से नर सेवा करने को - ' सेवा योग ' कहा है| इसी को आश्रय करो, अर्थात ' सारदा नारी संगठन ' से जुड़ कर इसके माध्यम से सभी नारियों के ह्रदय में माँ को प्रतिष्ठित कराने का कार्य करती रहो- और कुछ भी करना नहीं पड़ेगा|
यदि हमलोग इस ' सेवा-योग ' को ग्रहण कर लें तो मन के ऊपर नियन्त्रण, श्रद्धा, तितिक्षा सब कुछ प्राप्त हो जायेगा| इस योग का अनुशीलन अन्नदान, विद्यादान, धर्म दान के माध्यम से किया जाता है|
अन्नदान क्या है ? अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिये तुम्हें जिन खाद्य पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है, उन सामग्रियों के द्वारा दूसरों की सहायता करना या यथा-संभव उन्हें दूसरों में वितरित करना| 

विद्या का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के जागतिक विद्या (रोजगार-उन्मुख विद्या) से है, जैसे कृषि विद्या, अर्थ-विद्या, राष्ट्र-विद्या, पदार्थ विद्या, रसायन विद्या, चिकित्सा विद्या, कारीगरी विद्या आदि से है|इन में से किसी एक विद्या को भी भली-भाँति ग्रहण कर लो| उस विद्या के माध्यम से तुम्हें अपनी जीविका तो प्राप्त होगी ही, समाज की सेवा भी कर सकोगी|

इसके बाद आता है- धर्मदान,  यही सर्व श्रेष्ठ दान है |अन्य प्रकार का दान- अन्न दान या विद्या दान चाहे कितना भी किया जाय किन्तु, ' धर्मदान ' किये बिना मनुष्य के किसी भी आभाव को यथार्थ रूप से मिटाया नहीं जा सकता, बल्कि वह पहले की अपेक्षा और भी ज्यादा स्वार्थपर बन जायेगा|जिस मनुष्य के पास अन्न और विद्या तो प्रचूर मात्रा में हो किन्तु उसमे धर्म (अर्थात चरित्र) रत्तीभर भी न हो तो उसका जीवन मनुष्य का न रहकर पशु के जैसा (घोर स्वार्थी) बन जायेगा| अतः इसी ' धर्मदान ' रूपी (या इसप्रकार के चरित्र निर्माणकारी शिविर रूपी ) यथार्थ लोककल्याण के कार्य - में आत्मनिवेदन कर देना ही 'सेवा-योग ' है| 
शिव ज्ञान से जीव सेवा - इस सेवा-योग को स्वामीजी ने ठाकुर से प्राप्त किया था|जब स्वामीजी ने दक्षिणेश्वर में ठाकुर के मुख से निसृत इस अमृत-वचन को पहली बार सुना था, उस समय ही उन्होंने कहा था (वे तब केवल मात्र एक तरुण ही थे) - " यदि कखनो भगवान सूयोग देन, ताहले एई सत्य आमी काजे परिणत करबो एवं जगत्वासी के शोनाबो ! " अर्थात " कभी यदि भगवान सूयोग दें तो मैं इस सत्य को कार्य में परिणत करूँगा (Be ) और सम्पूर्ण जगत को सुनाऊंगा (Make )! " और भगवान ने अपने भक्त को वह सूयोग दिया था |

इसलिए ' रामकृष्ण मिशन ' की स्थापना हो गयी थी, और तब से यह सेवा-योग सम्पूर्ण जगत में चलाया जा रहा है| और स्वामीजी की प्रेरणा से ही यह ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' तथा यह ' सारदा नारी संगठन ' भी उसी सेवा-योग से युक्त है| ये दोनों ही संगठन - ' शिव ज्ञान से जीवसेवा ' - रूपी यज्ञ करते चले आ रहे हैं और हमलोगों के सामने भी उसी सेवा-योग से जुड़ जाने का ' सूयोग ' प्रस्तुत कर रहे हैं|
प्राचीन युग में इसी भारतवर्ष में अनेकों ' महीयसी ' नारियों का जन्म हुआ था| भावी युग में यहाँ की नारियां कैसी होंगी ? स्वामीजी के मतानुसार  - ' भावी युग की नारियों के भीतर - अतीत और वर्तमान दोनों के संयुक्त भावों का विकास और समन्वय घटित होगा| प्राचीन युग की नारियों के लिये  - ध्यानपरायणता, माधुर्य, निष्ठा को ही यथार्थ आदर्श माना जाता था|

किन्तु वर्तमान युग में पाश्चात्य देशों से प्राप्त आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षाओं को भी प्राप्त करने की आवश्यकता है|आधुनिक युग की लड़कियों के लिये जो शिक्षा-नीति बनेगी उसमे एक ओर जहाँ वीरोचित दृढ-संकल्प की शिक्षा दी जाएगी वहीँ दूसरी ओर जननी (जन्म देनेवाली) के जैसा कोमल-ह्रदय बनने की शिक्षा भी दी जाएगी| भविष्य की भारतीय नारियों के भीतर मित्रता, कोमलता, माधुर्य के साथ-साथ स्वाधीनता, तेजस्विता, और आत्मनिर्भरता भी प्रचूर मात्रा में विद्यमान रहेगी|
स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता को लिखित पत्र के माध्यम से अपने आशीर्वचन दिये थे, उसमे उन्होंने स्पष्ट रूप से बता दिया था कि इस युग में ' भारतीय- नारी ' को किस प्रकार की भूमिका (Role) निभानी होगी| आशीर्वाद देते हुए लिखते हैं-  
वीरेर संकल्प आर मायेर ह्रदय,
दक्षिनेर समीरन - मृदूमधुमय,
आर्यवेदी' परे दीप्त मुक्त होमानले 
ये पुन्य सौन्दर्य आर जे शोर्य विराजे-
सकली तोमार होक, आरो, आरो किछू 
स्वपनेऊ भावेनि जाहा अतीतेर केह|
भारतेर भविष्यत् सन्तानेर तरे
तुमि हउ  ' बंधू,दासी, गुरु ' - एकाधारे!
                              
 इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि जो भी लड़कियां, महिलायें या नारियां इस ' सारदा नारी संगठन ' में एक सदस्या के रूप में जुड़ गयीं हैं उनमे से प्रत्येक को अपने जीवन में यही एक ' भूमिका ' निभानी होगी|
 वे कभी अपने आसपास रहने वाले लोगों के प्रति ' उदासीन ' होकर नहीं रहेंगी, बल्कि वे अपने आसपास रहने वाले मनुष्यों (पास-पड़ोस में रहने वाले लोगों) के लिये एक ही साथ कभी सेविका की भूमिका में होंगी, तो कभी बान्धवी (दोस्त) होंगी, तो कभी जननी (गुरु) की भूमिका निभाएंगी| 

दूसरों के सुख को अपना सुख मान कर उनके साथ-साथ वे भी आनन्द मनाएंगी, और उनके दुःख को भी अपना दुःख मानकर उनके निकट खड़ी रहकर वे भी उनके दुःख को महसूस कर सकेंगी |
 {" सारदा " }नारी-संगठन से जुड़ी हुई सभी सदस्याओं का ह्रदय ऐसा ही विशाल और उदार हो जाये यही स्वामीजी चाहते थे| और Sister'जी को इसी कार्य में नियुक्त रहने का आशीर्वाद दिये हैं! उनका यह आशीर्वाद कालजयी है, और आने वाले हर युग की नारियों के लिये है| यह आशीर्वाद चिरकाल से समस्त नारियों के लिये बरसता आ रहा है!
वर्तमान युग की नारियों के जीवन का आदर्श ' श्रीश्रीमाँ ' ही हैं! Sister कहती हैं- " She is Sri Ramakrishna's final word as to the ideal of Indian womanhood."
भगिनी निवेदिता ने कहा है- ' इस युग की भारतीय- नारियों के आदर्श के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण द्वारा दिया गया अन्तिम उपदेश - सारदादेवी ही हैं|" अर्थात भारत की नारियाँ - माँ के जीवन को अपना आदर्श मान कर, उन्हीं के सांचे में अपना जीवन ढाल लेंगी! उन्ही के आदर्श में अपने तन-मन को रंग लेंगी! निवेदिता ने कहा है,
' मैं उस भारतवर्ष को प्रेम करती हूँ जहाँ के लोग बड़े सरल होते हैं, जो अपनी जीवनयात्रा को बिना आडम्बर दिखाए पूर्ण करते हैं, और जहाँ पारिवारिक शान्ति को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है| ' और इस पारिवारिक शान्ति की  आधार-स्तम्भ किन्तु नारियाँ ही होतीं हैं| इसीलिये नारियों के ऊपर एक बहुत बड़ा दायित्व भी है- और वह है परिवार के सभी सदस्यों में शान्ति और सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध को बनाये रखना|
 आज की नारियाँ घर से बाहर बड़े बड़े कार्य-क्षेत्रों से संयुक्त हैं और वहाँ भी वे सफल सिद्ध हो रहीं हैं|किन्तु बहिर्जगत के कार्यक्षेत्र में सफलता पूर्वक अपना दायित्व निभाने के साथ ही साथ उनको सबसे अधिक महत्व अपने परिवार को ही देना होगा| क्योंकि, पारिवारिक अनुशासन, उसकी शान्ति, परिवार के सभी सदस्य अपने अपने कार्यों को बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण करें, सभी लोग जिस प्रकार शान्ति और आनन्दपूर्वक जीवन-यापन करते रहें- यही नारियों का सबसे बड़ा दायित्व है! और मुझमे इसके लिये जितना कुछ करने की शक्ति भगवान ने दी है, उसे बिना कुछ पाने की आशा रखे करते रहना ही नारियों का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है|
आप देखिये कि - श्रीमाँ का कार्य-क्षेत्र कितना बड़ा था! " ...सेखाने जे एसेछे, ताकेई तिनी 
भालबेसे " बाछा" बले एकेबारे कोले तूले नियेछेन, सबाई आनन्द पेयेछे | " अर्थात श्रीश्री माँ के पास जो कोई भी चला जाता उसको ही माँ बड़े प्रेम से - " अरे मेरा बच्चा " कहकर अपने गोद में बैठा लेतीं थीं! और सबों को - ' अपनी माँ कि गोद में होने का आनन्द ' प्राप्त होता था| इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमलोगों के ऊपर भी अपने ह्रदय को माँ के जैसा बनाने का बहुत बड़ा दायित्व है|
" भगिनी जा देखे मूग्ध हयेछेन, सेई भाव जेन आजऊ थाके " अर्थात भगिनी निवेदिता भारतीय नारी के जिस मातृ-रूप को श्रीश्रीमाँ के भीतर देख कर अभिभूत हो गयीं थीं - आज की नारियों में भी वही भाव बना रहना चाहिये |
 इसमें कृतकार्य होने के लिये हमलोगों को भी ' आध्यत्मिक-शक्ति ' से सम्पन्न होना होगा, अर्थात ' आत्मबल ' प्राप्त करके हमलोगों को भी बलवान बन जाना होगा| यह न होने से कुछ भी करना संभव न होगा| मैं इस शिविर में भाग लेकर बहुत सारी अच्छी बातों को सुनती हूँ, पुस्तकें पढ़ती हूँ, भाषण देती हूँ, किन्तु यदि मेरे ह्रदय में अभी तक ' आत्मबल ' ही प्रकट न हो सका, यदि मेरे ह्रदय में प्रेम का पुष्प ही प्रस्फुटित न हो सका, तो मैं अपना सौरभ किसे दे पाऊँगी? और मेरा ह्रदय-रूपी ' प्रेम-कमल ' जब प्रस्फुटित हो जायेगा तो उसके सौरभ को पाने के लिये अनेक अनेक भ्रमर (तत्व-जिज्ञाषु) दौड़े चले आयेंगे| 
और अब अपने भाषण के अन्त में - मैं इस नारी-संगठन की तरफ से आप सबके हाथों में एक एक उपहार दूंगी| वह क्या है? आप सबके हाथों में तीन-तीन ' cheque ' दूंगी; एक माँ के Account से, एक पिताजी के Account से, और एक cheque अपने ' दादा या भैया ' स्वामीजी के Account से भी दूंगी| (चूँकि वे हमारे अपने माँ,पिताजी और बड़े भाई हैं - अतः) उनका Account भी हमलोगों का ही है|
हमारे भीतर अनेक सम्पदा है, किन्तु हमे उसका पता नहीं है| इसीलिये ' cheque ' भुना नहीं पा रही हूँ, और गरीबी में दुःख-कष्ट पा रही हूँ| मेरे पुत्र को बाद में कष्ट न भोगना पड़े- इसके लिये सांसारिक पिता कितना ही बड़ा बैंक बैलेंस छोड़ जाते हैं! हमलोगों के आध्यात्मिक पिता भी हमलोगों के लिये बहुत बड़ा बैंक बैलेंस छोड़ गये हैं|
मैं उसी खाते का cheque आप सबों के हाथों में पकड़ा रही हूँ, आवश्यकता पड़ने से आप सब उसे भुना सकती हैं| प्रथम है माँ के Account से; और वह है- " जे सत्य कथाटि धरे आछे, से भगवानेर कोले शुये आछे "(' जिसने हर हाल में सत्य को थामे रखा है, वह तो मानो भगवान की गोद में ही सोया हुआ है!')
दूसरा cheque है ठाकुर के Account से- " पिंपडेर मतो संसारे थाक| एई संसारे नित्य अनित्य मिशिये रयेछे, बालिते चिनिते मिशे आछे| पिंपड़र मतो चिनिटि के ग्रहन करो| संसारे वास करते गेले भाल मन्द आछे, सुख दुःख आछे| बोकार मतो बालिटा मुखे निये कष्ट पेयो ना| चिनिटुकू ग्रहन करो !" और स्वामीजी के Account से भी दे रही हूँ- 
" भिक्षूकेर कबे बलो सुख ? कृपापात्र हये किबा फल ?
दाउ आर फिरे नाहि चाउ, थाके यदि हृदये सम्बल !
अनंतेर तूमि अधिकारी, प्रेमसिन्धु हृदये विद्यमान, 
' दाउ, दाउ ' - जेबा फिरे चाय, तार सिन्धु बिन्दु हये जाये !
हमलोगों के ह्रदय में प्रेम का सागर लहरा रहा है! हमलोग अनन्त प्रेम के अधिकारी हैं ! अनन्त- प्रेम करने का हमलोगों के पास अधिकार है | क्षुद्रता हमारे स्वरूप में है ही नहीं ! कितने बड़े उत्स से हमलोग प्रक्षिप्त हुए हैं ! हमलोग उसी में निवास कर रहे हैं, वहीँ से हमने जन्म लिया है, और पुनः उसी के साथ एक हो जाना है! उसी में लीन हो जाना है ! उसी अनन्त के भीतर हम सभी एक हैं !