Thursday, October 15, 2009

प्रारंभिक अवस्था में मूर्ति पूजा क्यों आवश्यक है ?

साकार मूर्ति की पूजा निराकार 'ब्रह्म' या 'अल्ला' की धारणा में सहायक है !

हजार सालों की गुलामी के कारण पाश्चात्य शिक्षा और सेमेटिक भावों से प्रभावित होकर कुछ अत्यन्त तर्कवादी और उच्च डिग्रीधारी समाज-सुधारक नेताओं ने ब्रह्म-समाज और आर्य-समाज जैसे मूर्तिपूजा-विरोधी आंदोलन का सूत्रपात किया था। जिसके फलस्वरूप तथाकथित बुद्धिजीवी या (elite group) में माँ काली की मूर्ति पर से विश्वास उठता जा रहा था। इसीलिये अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण को अनपढ़ के रूप में अवतरित होना पड़ा और आचार्य केशव सेन और नरेन्द्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानन्द) अंग्रेजी भाषा में पढ़े-लिखे, उच्च-डिग्री प्राप्त लोगों को भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार मनःसंयोग या मन को एकाग्र करने का प्रशिक्षण देना पड़ा। 
अब तर्क-वादी आर्यसमाज और ब्रह्मसमाज के अनुयायी नरेन्द्रनाथ जैसे युवाओं के मन में संघर्ष होने लगा कि मेन्टल कान्सन्ट्रेशन का अभ्यास करते समय, प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियों से मन को खींचकर अपने हृदय में धारण करने का अभ्यास या ' धारणा ' के लिए किसी मूर्त आदर्श का चयन करें या अमूर्त आदर्श , जैसे ॐ आदि का ?  
"मूर्ति-पूजा " करना भी जीवन की एक आवश्यक अवस्था है। किसी (' नर-देव ' या ' पुरुषोत्तम ' की ) मूर्ति पर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करने का तात्पर्य है, अपने ' दिव्य-स्वरूप ' को किसी - ' दिव्य-मूर्ति ' के अनुरूप मान कर ध्यान करने से आगे बढ़ने में सहायता मिलती है। उनका दिव्य गुण हमारे भीतर आने लगता है।
स्थूल भौतिक मूर्ति पर ध्यान (मनःसंयोग) करने से - ' सहचर्य ' (Law of Association ) के नियमानुसार उस ध्यान की 'वस्तु ' के अनुरूप मानसिक भावाविशेष का उद्दीपन हो जाताहै। और यदि कोई उस अवस्था के भी परे पहुँच गया है, तब भी उसके लिए मूर्ति-पूजा या मूर्ति पर ध्यान करने को भ्रमात्मक कहना उचित नहीं है।
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा है," जो लोग मूर्ति पूजा पर विश्वास नहीं करते वे - ईश्वर के ' सर्वव्यापित्व' का क्या अर्थ समझते हैं ? क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल है ? अपनी मानसिक संरचना के नियमानुसार, हमें अनन्तता का भाव लानेके लिए नील-आकाश या अपार-समुद्र की कल्पना से जोड़ना ही पड़ता है। मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार करके दिव्य बनना है। मूर्तियाँ, मन्दिर, ग्रन्थ, या गिरजाघर तो धर्मजीवन की शिशु-पाठशाला के सहायक उपकरण मात्र हैं; पर उसे जीवन भर वहीं पड़े नहीं रहना चाहिए, उसे तो वहाँ से आगे बढ़ कर उत्तरोत्तर उन्नति ही करनी चाहिए। " (वि० सा० ख०१:१७,१८)
" बालक ही मनुष्य का जनक है  - तो क्या किसी वृद्धपुरुष के लिए बचपन या युवावस्था को पाप समझना उचित होगा ? मन में किसी मूर्ति का ध्यान आए बिना कुछ सोंच सकना उतना ही असंभव है, जितना श्वांस लिए बिना जीवित रहना। अपनी आंखों को बंद करके यदि मैं अपने अस्तित्व - ' मैं ' क्या हूँ; को समझने का प्रयत्न करूँ, तो मुझमे किस भाव का उदय होगा ? इस भाव कि मैं (M/F) शरीर हूँ। तो क्या मैं भौतिक पदार्थों केसंघात के सिवा और कुछ नहीं हूँ ? वेदों कि घोषणा है- नहीं ! मैं शरीर में रहने वाली ' आत्मा ' हूँ ! मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर मर जायगा,  पर ' मैं ' नहीं मरूँगा !" (१:८) ' 
" निरपेक्ष ब्रह्मत्व का साक्षात्कार, चिन्तन या वर्णन केवल सापेक्ष के सहारे ही हो सकता है, और मूर्तियाँ, क्रूस या नवोदित चंद्र-सितारा केवल प्रतीक हैं, जिनको अब इन प्रतीकों की सहायता की आवश्यकता नहीं है, उन्हें यह कहने का अधिकार नहीं के वे ग़लत हैं, जिनको इसकी आवश्यकता है। "(१:१९)
'मूर्तिपूजा सबसे नीचे की अवस्था है, आगे बढ़ते समय मानसिक जप-ध्यान साधना की दूसरी अवस्थाहै।  ' उत्तमो ब्रह्म सद्भावों ' - सबसे उच्च अवस्था तो वह है, जब परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाय।' (१:१७)
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " संसार के समस्त धर्म -ग्रंथों में केवल वेद ही ऐसा ग्रन्थ है, जिसमे बारम्बार यह कहा गया है कि - ' तुम्हें वेदों के भी अतीत हो जाना चाहिए '। वेद कहते हैं कि वे केवल बाल-बुद्धि रखने वाले व्यक्ति की सहायता के लिए लिखे गए हैं, इस लिए जब तुम स्वयं आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो जाते हो, तो तुम्हें वेदों के भी परे जाना पड़ेगा। " (१०: ३७७)
" मन को एकाग्र करने की विद्या में सिद्ध " ऋषिगण यहाँ समस्त संसार को एक चुनौती दे रहे हैं-... हमने उस रहस्य का पता लगा लिया है, जिसके द्वारा स्मृति-सागर की गंभीरतम गहराई तक मंथन किया जा सकता है-उसका प्रयोग कीजिये और आप अपने (यथार्थ स्वरूप की या) पूर्व जन्मोंकी सम्पूर्ण संस्मृति प्राप्त कर लेंगे। ( श्वेताशतर२/५)." (१:१०) 
" एक ऋषि कहते हैं कि - तुम इस विश्व का कारण नहीं जानते; इसीलिये तुम्हारे और मेरे बीच में बड़ा भारी अन्तर उत्पन्न हो गया है ; ऐसा क्यों ? इसलिए कि तुम केवल इन्द्रिय-परक बातों की चर्चा करते हो, और इन्द्रिय विषयों तथा धार्मिक कर्म- कांडों में ही संतुष्ट रहते हो, जबकि - मैंने उस द्वन्द्वातीत पुरूष को जान लिया है।" (१:२५१)
' चेतना मानस-सागर की सतह मात्र है और भीतर उसकी गहराई में, हमारी समस्त अनुभव-राशिस्मृतियाँ संचित हैं। केवल प्रयत्न तथा उद्यम कीजिये, वे सब ऊपर उठ आयेंगे, और आप अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान भी प्राप्त कर सकेंगे। ' (१:१०)
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