Tuesday, October 20, 2009

सापेक्ष-ज्ञान ' पूर्ण ज्ञान ' का मात्र एक छोटा सा अंश है।

" ईश्वर तो ज्ञात से भी ' अधिक ज्ञात ' है ! "

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-" अद्वैतवादी कहते हैं, 'नाम-रूप' को अलग कर लेने पर क्या प्रत्येक वस्तु ब्रह्म नहीं है ? ' (४:३३)
" जिसके ह्रदय में अथाह प्रेम है, और जो सभी अवस्थाओं में ' अद्वैत तत्त्व ' का साक्षात्कार करता है, वही सच्चा ज्ञानी है। "(१०:३७४)
"मनुष्य तभी वास्तव में प्रेम करता है, जब वह देखता है कि उसके प्रेम का पात्र कोई क्षुद्र मर्त्य जीव नहीं है। ...वे ही लोग अपने महान शत्रुओं के प्रति भी प्रेमभाव रख सकेंगे, जो जानेंगे कि ये ' शत्रु ' भी साक्षात् 'ब्रह्म' स्वरूप हैं। वे ही लोग अत्यन्त अपवित्र व्यक्तियों से भी प्रेम करेंगे जो यह जान लेंगे कि इन महा दुष्टों के पीछे भी वे ही प्रभु विराजमान हैं। जिनका क्षुद्र अहं एकदम मर चुका है और उसके स्थान पर ईश्वर ने अधिकार जमा लिया है, वे ही लोग जगत के प्रेरक (नेता ) हो सकते हैं। उनके लिये समग्र विश्व दिव्य भाव में रूपांतरित हो जाएगा। (२:४०)
" कोई भी चीज उन्हें बदला लेने के लिये प्रवृत्त नहीं कर सकती। वे सर्वदा अनन्त प्रेमस्वरूप हैं, और प्रेम की शक्ति से सर्व शक्तिमान हो गये हैं। ... योगी के अतिरिक्त अन्य सभी तो मानो गुलाम हैं। खाने-पीने के गुलाम, अपनी स्त्री के गुलाम, अपने लड़के-बच्चों के गुलाम, जलवायु परिवर्तन के गुलाम,इस संसार के हजारों विषयों के गुलाम। जो मनुष्य इन बन्धनों में से किसी में भी नहीं फंसे, वे ही यथार्थ मनुष्य हैं- यथार्थ योगी हैं। जिनका मन साम्य भाव में स्थित है, उन्होंने यहीं संसार पर जय प्राप्त कर ली है। ब्रह्म निर्दोष और सम्भावापन्न है, इसलिए वे ब्रह्म में अवस्थित हैं। " (१०:३९१) गिता ५/१९ 
" जो ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गए हैं, - जहाँ न सृष्टि है, न सृष्ट, न स्रष्टा - जहाँ न ज्ञाता है, न ज्ञान और न ज्ञेय, जहाँ न 'मैं' है, न 'तुम' और न 'वह', जहाँ न प्रमाता है, न प्रमेय और न प्रमाण, जहाँ ' कौन किसको देखे '- वे पुरूष सबसे अतीत हो गये हैं, और वे वहाँ पहुँच गये हैं- ' जहाँ न वाणी पहुँच सकती है, न मन ' और श्रुति जिसे नेति,नेति कहकर पुकारती है।
....जब प्रह्लाद अपने आपको भूल गये, तो उनके लिए न सृष्टि रही और न उसका कारण, रह गया केवल नाम-रूप से अविभक्त एक अनन्त-तत्व। पर ज्यों ही उन्हें यह बोध हुआ कि मैं प्रह्लाद हूँ, त्योंही उनके सम्मुख जगत और कल्याणमय अनन्त-गुणागार ' जगदीश्वर ' प्रकाशित हो गये। "(४:१२) 
" इस अवस्था को प्राप्त कर लेने के बाद....तुम में इर्ष्या अथवा दूसरों पर शासन करने का भाव नहीं रहेगा; तब प्रेम इतना प्रबल हो जायेगा कि मानवजाति को सत्पथ पर चलाने के लिये फ़िर चाबुक कि आवश्यकता नहीं रह जायेगी। "(२:४१)

"जो कोई विषय हमारे मन के विषयीभूत हो जाता है, अर्थात मन के द्वारा सीमा बद्ध हो जाता है, हम उसी को जान सकते हैं। और जब वह हमारे मन के बाहर रहता है, अर्थात मन का विषय नहीं रहता, तब हम उसे नहीं जान सकते।...यदि ईश्वर ज्ञात हो जाय, तो उसका ईश्वरत्व फ़िर नहीं रहेगा- वह हमारे समान ही एक व्यक्ति हो जायगा। उसको जाना नहीं जा सकता, वह सर्वदा ही अज्ञेय है।....किन्तु तुम अज्ञेय-वादियों के समान कहीं यह धारणा मत बनालेना, कि ईश्वर अज्ञेय है।.
..अद्वैत-वादी कहते हैं कि ईश्वर तो ज्ञात से भी कुछ और ' अधिक ज्ञात ' है ! कैसे ? दृष्टान्त स्वरूप देखो- सामने कुर्सी है, मैं इसे जानता हूँ, यह मेरा ज्ञात पदार्थ है। पर ईश्वर तो इससे अधिक ज्ञात है, क्योंकि पहले उसे जानकर, उसी के माध्यम से हमे कुर्सी का ज्ञान प्राप्त करना होता है। वह साक्षी स्वरूप है, समस्त ज्ञान का वह साक्षीस्वरूप है। 
हम जो कुछ जानते हैं, वह सब पहले उसे जानकर, उसी के माध्यम से जानते हैं। ईश्वर हमारी आत्मा का सार-सत्ता स्वरूप है। वही हमारा वास्तविक ' अहं ' है। और वह ' अहं ' ही हमारे इस अहं (क्षुद्र अहं) का सारसत्ता-स्वरूप है; हम उस ' अहं ' के माध्यम से जाने बिना कुछ नहीं जान सकते, अतएव सभी कुछ हमे ब्रह्म के माध्यम से ही जानना पड़ेगा। " (२:८७-८८)
* " ज्ञान क्या है ? ज्ञान का अर्थ है, (पूर्व में देखी-सुनी) वस्तुओं की साहचर्य प्राप्ति। तुमने बहुत से मनुष्यों को देखा है, और प्रत्येक ने तुम्हारे मन पर एक संस्कार (छाप) डाला है, और तुम जैसे ही इस मनुष्य को देखते हो, इसेअपने चित्त(या स्मृति के भंडार घर) से सम्बद्ध करते हो, और वहाँ तुमको इसी प्रकार के बहुत से चित्र दिखाई पड़तेहैं। और उनके साथ इस नए चित्र को भी रख देते हो। (तब पहचान जाते हो कि दो हाथ दो पैर वाला यह एलियन नहीं मनुष्य है ) साहचर्य की इसी अवस्था को ज्ञान कहते हैं।
तुम्हारा मन समारम्भ के लिये- एक ' अनुत्किर्ण फलक ' (Tabula Rasa या कोरा स्लेट) नहीं है। अपने पास पहले से ज्ञान का एक भण्डार होना चाहिये, जिसके साथ किसी नये संस्कार को सम्बद्ध किया जा सके।कोई नवजात शिशु (जन्म से) पहले एक ऐसी अवस्था में अवश्य रहा होगा, जब कि उसके पास ( संचित अनुभवोंका ) कोई ज्ञान-कोष था। इस प्रकार ज्ञान कि वृद्धि शाश्वत रूप से होती रहती है।..यह एक गणितीय तथ्य है।" ... (४:२०६)
" Knowledge is the ' recognition ' of the new- by means of associations already existing in the mind. Recognition - is finding associations with similar impressions that one already has. Nothing further is meant by Knowledge.Knowledge means finding the association; that is why a drunken man naturally gravitates to the lowest slums of the city. "(C.W.2:447,78 )

" किसी व्यक्ति के पास पहले से जो संस्कार हैं, उनके तुल्य संस्कारों कि साहचर्य- प्राप्ति ही प्रति-अभिज्ञा (Recognition या मान्यता) कहलाती है। ज्ञान का अर्थ है, साहचर्य-प्राप्ति । इससे भिन्न ज्ञान का कोई दूसरा अर्थ नहीं है।  

यह दृष्टिगोचर जगत् तभी जाना जा सकता है, जब हम इसके साह्चर्यों को पा सकने में सफल हो जायेंगे। इसकी सच्ची पहचान, प्रतिभिग्या (Recognition) तो हम तभी कर पायेंगे जब हम इस विश्व एवं चेतना के परे चले जायेंगे और तब विश्व हमे स्वतः व्याख्यात हो जाएगा।
हमारी वर्त्तमान चेतना से पृथक, विश्व का यह टुकड़ा हमारे लिये विस्मयकारी नूतन पदार्थ है, क्योंकि हम अभी तक इसके साह्चर्यों को न पा सके हैं। अतएव हम इससे संघर्ष कर रहे हैं, और इसे भयावह, दुष्ट तथा बुरा समझते हैं- हमारा विचार सदैव यही रहता है कि यह अपूर्ण है।...क्योंकि चेतना का यह साधारण स्तर हमे इसके एक ही स्तर (Dimension) का प्रत्यक्ष बोध प्रदान कर पाता है। यही बात ईश्वर के सम्बन्ध में हमारे विचारों के लिये है। 
ईश्वर का जो कुछ  हमे दिखाई पड़ता है, वह अंश मात्र है, उसी प्रकार जिस प्रकार हम विश्व का केवल एक अंश (नाम-रूप) देखते हैं और शेष (अस्ति, भाति, प्रिय) मानव बोध से परे है। यही कारण है कि ईश्वर हमें अपूर्ण दिखाई पड़ता है, और हम उसे समझ नहीं पाते। 'उसे' तथा विश्व को समझने का एकमात्र उपाय यह है कि हम इस बुद्धि एवं चेतना के परे चले जायें।...जब हम इनके परे जाते हैं, तब हमें सामंजस्य की प्राप्ति होती है, इसके पूर्व नहीं।
..सूक्ष्म ब्रह्मांड (यापिण्ड -सूक्ष्म शरीर) के हम केवल एक अंश- मध्य भाग- को ही जानते हैं। अभी हम न अवचेतन को जानते हैं, न अतिचेतन को। हम केवल चेतन को ही जानते हैं। यदि कोई व्यक्ति कहता है, ' मैं पापी हूँ ', तो वह मिथ्या कथन करता है; क्योंकि वह अपने को नहीं जानता। क्योंकि वह जिस भूमि पर है, उसका ज्ञान केवल उसके एक ही पक्ष को स्पर्श करता है। ... यही बात विश्व के सम्बन्ध में है, बुद्धि द्वारा इसके केवल एक अंश को जानना सम्भव है, सम्पूर्ण को नहीं; क्योंकि विश्व का निर्माण अवचेतन, चेतन, अतिचेतन अथवा व्यक्तिगत महत्, सार्वभौम महत्, तथा परवर्ती परिणामों से होता है।"(४:२०६-२०७)
* " सापेक्ष-ज्ञान को- ' पूर्ण ज्ञान ' का एक छोटा सा अंश कहा जा सकता है। जिस प्रकार सोने की मुहर को भुना कर रुपया, आना, पैसा में बदला जा सकता है। उसी प्रकार इस पूर्ण ज्ञान की अवस्था (अतिचेतन) से सब प्रकार के ज्ञान में जाया जा सकता है।  इस अतिचेतन अवस्था को ज्ञानातीत या पूर्ण-ज्ञान की अवस्था कहते हैं- चेतन और अचेतन दोनों उसके अर्न्तगत आ जाते हैं। जो व्यक्ति इस पूर्ण ज्ञानावस्था को प्राप्त हो जाता है, उसमे यह सापेक्ष साधारण ज्ञान भी पूर्णरूप से विद्यमान रहता है। जब वह ज्ञान की दूसरी अवस्था - अर्थात हमारी परिचित सापेक्ष ज्ञानावस्था का अनुभव करना चाहता है, तो उसे एक सीढ़ी नीचे उतर आना पड़ता है। यह सापेक्ष ज्ञान तो एक निम्नतर अवस्था है- केवल माया (नाम-रूप या देश-काल-निमित्त) के भीतर ही इस प्रकार का ज्ञान हो सकता है। ( १०:३९७) 
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Sunday, October 18, 2009

सच्चा सुख अपने ही भीतर है !

" मैं जीवन से उच्चतर कोई 'वस्तु' हूँ ! " 
** मैं कौन हूँ और यह जीवन क्या है ?  इस प्रश्न के उत्तर में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " मैं जीवन से उच्चतर कोई वस्तु हूँ; जीवन सदैव दासता है। हम (और जीवन ) सदा घुल-मिल जाते हैं। "(४:१३६) 

" हम सबों में मुक्ति की भावना-स्वाधीनता की भावना हुआ करती है, उसी से यह संकेत मिलता है कि हमारे अन्तराल में, शरीर(Hand) और मन (Head) से परे भी कुछ और है। हमारी अन्तर्यामी आत्मा(Heart) स्वरूपतः स्वाधीन है और वही हममे मुक्ति की इच्छा जाग्रत करती है। " (१:२५६)

"हम विश्व के रहस्य को हल करने की चेष्टा करते हैं। ऐसा लगता है कि यह सब हमे अवश्य जान लेना चाहिए, हमे ऐसा कभी महसूस नहीं होता कि 'ज्ञान' कोई प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। ....किन्तु अति बलवान इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को, 'अवशीभूत मन' - रूपी शत्रु की सहायता से बाहर की विषयों में खींच लातीं हैं।

मनुष्य ऐसे स्थान में सुख की खोज करने लगता है, जहाँ वे हैं ही नहीं, जहाँ वह उन्हें कभी पा नहीं सकता। ...हम कुछ कदम आगे जाते हैं, कि अनादी-अनन्त कालरुपी प्राचीर व्यवधान बन जाता है; जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ते ही असीम देश का व्यवधान खड़ा हो जाता है, फ़िर यह सब कार्य-कारण रूपी दीवार द्वारा सुदृढ़ रूप से सीमा-बद्ध है !...तो भी हम संघर्ष करते हैं !" (२:७४)

" बुद्धदेव की जीवनी, ' ललित विस्तार ' के प्रसिद्द गीत में कहा गया है - बुद्ध ने मनुष्य जाती के परित्राता  या मार्गदर्शक ' नेता ' के रूप में जन्म लिया; किन्तु जब राज-प्रासाद की विलासिता में वे अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये देवदूतों ने एक गीत गाया, जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है - ' हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं; हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं- कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है; सारा संसार मृत्यु की ओर चला जा रहा है-सभी मरते हैं ! हमारी सभी प्रगति, व्यर्थ का आडम्बरी जीवन, हमारे समाज-सुधार ! हमारी विलासिता, हमारे ऐश्वर्य, हमारा ज्ञान - इन सबकी मृत्यु ही एक मात्र गति है ! हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं ? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते ?... यह हम नहीं जानते ! और यही माया है !! " (२:४७)

"जब मन किसी बाह्य-वस्तु का अध्यन करता है, तब वह उससे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है, और स्वयं लूप्त हो जाता है। यह 'मन' आत्मा का ' दिव्य चक्षू ' है ! हमारा  मन उस  स्फटिक खंड के समान है, जो अपने निकट की वस्तुका रंग ग्रहण कर लेता है। हम लोगों ने शरीर का रंग ग्रहण कर लिया है,अर्थात शरीर के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लिया है, और भूल गये हैं कि हम क्या हैं। ....हम लोग उसी प्रकार शरीर नहीं हैं, जिस प्रकार स्फटिक ' लाल फूल ' नहीं है।... आत्मा की स्वस्थतम अवस्था - तब है जब वह 'स्व' का चिन्तन कर रही हो और अपनी गरिमा में स्थित हो।" (४:१३१)

" भारतीय कुशल-प्रश्न है, ' आप स्वस्थ तो हैं ? '- जिसका अर्थ है आप अपने में स्थित हैं या देह में?...ध्यान करने का तात्पर्य है- आत्मा का अपने में (या स्व में) स्थित होने के लिए यत्न करना। "

" आधुनिक विकासवाद का सिद्धांत कहता है, हर कार्य पूर्ववर्ती कारण की आवृत्ति मात्र है। परिस्थिति या परिवेश के कारण रूप-परिवर्तन होता है। योनी-परिवर्तनों के कारण को खोजने सृष्टि से बाहर जाने की जरुरत नहीं है। कार्य में ही कारण श्रृंखला विद्यमान है। विश्व का मूल कारण, ऐसी कोई शक्ति नहीं है, या कोई सत्ता नहीं है, जो इससे अलग रह कर रिमोट से इसको चला रही है। " (२:२८२)

" क्रमविकास-वाद क्या है? उसके दो अवयव क्या हैं ? क है प्रबल अन्तर्निहित शक्ति, जो अपने को व्यक्त करने की चेष्टा कर रही है, और दूसरा है बाहर की परिस्थितियाँ, जो उसे अवरुद्ध किए हुये है, या वह परिवेश है जो उसे व्यक्त होने नहीं देता। अतः इन परिस्थितियों से युद्ध करने केलिये यह ' शक्ति ' नये नये शरीर धारण कर रही है। एक अमीबा इस संघर्ष में एक और शरीर धारण करता है, और कुछ बाधाओं पर जय-लाभ करता है, और इस प्रकार भिन्न भिन्न शरीर धारण करते हुये अन्त में मनुष्य में परिणत हो जाता है। " (२:९१)

" मनुष्य दिव्य है, यह दिव्यता ही हमारा स्वरूप है। अन्य जो कुछ है वह अध्यास मात्र है। उसके दिव्य स्वरूप काकभी भी नाश नहीं होता। यह जिस प्रकार ' परम-संत ' में है, वैसे ही ' महा-अधम ' व्यक्ति में भी है। हमे अपने इसदेव-स्वभाव का केवल आह्वान करना होगा, और वह स्वयं ही अपने को प्रकट कर देगा।चकमक पत्थर और सूखी- लकड़ी में आग रहती है, पर उस आग को बाहर निकालने के लिये घर्षण आवश्यक था। नीचे धरती पर रेंगने वाला क्षुद्र कीड़ा और स्वर्ग का श्रेष्ठतम देवता इन दोनों में ज्ञान का भेद प्रकार्गत नहीं, परिणाम गत है। " (२:१८२)

" अगर कोई व्यक्ति हत्यारा है, तो उसमे प्रतिफलक (मन-दर्पण) बुरा है, न कि आत्मा। दूसरी ओर अगर कोई साधू है तो उसमे प्रतिफलक शुद्ध है। सत्ता केवल एक ही है जो कीट से लेकर पूर्णतया विकसित मनुष्य (बुद्ध या ईशा) तक में प्रतिबिम्बित है। इस तरह सम्पूर्ण विश्व एक एकत्व, एक सत्ता है- भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, हर दृष्टि से। इस एक सत्ता को ही हम विभिन्न रूपों में देखते हैं। " (२:११२)

" देश-काल-निमित्त या नाम-रूप के साँचे से जब ' वह ' जो इच्छा रूप में परिणत हो जाता है, जो पहले इच्छा के रूपमें नहीं था, परन्तु बाद में देश-काल-निमित्त के साँचे में पड़ने से जो मानवीय इच्छा हो गया, वह अवश्य स्वाधीनहै। और जब यह इच्छा इस वर्तमान नाम-रूप या देश-काल-निमित्त के साँचे से मुक्त हो जायगी तो ' वह ' पुनःस्वतंत्र हो जाएगा। " (३:६९)

" अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें जरुरी है। यह इच्छा- अहं तत्त्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। औरअहं तत्व का सृजन उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और यह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणामहै।"(४:२०४)
" यह मानव आत्मा देह से देहान्तर में संक्रमित हो रही है, इस प्रवास में वह कितने ही भिन्न भिन्न रूपों में व्यक्त हुई है एवं होगी। आध्यात्मिक विकास के उस महान नियमानुसार वह अधिकाधिक अभिव्यक्त हो रही है। परन्तु जब वह सम्पूर्ण अभिव्यक्त हो जायेगी, तब उसमे और अधिक परिणाम न होगा। (१:२५४)

" (यदि कार्य-कारण वाद या परिणाम वाद सच है) तो हमे अपने पूर्व जन्मों का कुछ भी स्मरण क्यों नहीं है?
मनः समुद्र की उपरी सतह का नाम ही चेतन अवस्था है। किन्तु उसकी गहराई में (अवचेतन मन में) संचित है, मानव के समस्त सुखात्मक और दुखात्मक अनुभव। मानव आत्मा कुछ ऐसी वस्तु पाने की इच्छा करती है, जोअचल हो, अविनाशी हो।जबकि हमारा यह शरीर और मन ही क्या, नाना रूपात्मक यह समस्त प्रकृति ही अनवरत परिवर्तनशील है। पर हमारी अन्तरात्मा की सर्वोच्च अभिलाषा (या तड़प) यही है, कि उसे कुछ ऐसा प्राप्त हो जाये, जिसका परिवर्तन नहीं होता, जो चिर(शान्ति) पूर्णता को पा चुकी हो। और यही है उस असीम के लिये मानवात्मा कि अभीप्सा ! हमारा नैतिक और मानसिक विकास (अर्थात चरित्र-निर्माण) जितना ही सूक्ष्मतर होता जायेगा, उस अपरिवर्तनशील सत्ता के प्रति हमारी अभीप्सा (व्याकुलता) भी उतनी ही दृढ़ होती जायेगी। "(१:२५५)
" हमारा यह शरीर वृद्धि और क्षय के नियमों से बद्ध है, - जिसकी जन्म और वृद्धि है, उसका क्षय भी अवश्यमेव होगा। परन्तु देहमध्यस्त आत्मा तो असीम एवं सनातन है, वह अनादी और और अनन्त है। ...काल कि गति काशाश्वत सत्ता पर कोई असर नहीं होता।....मानव-बुद्धि के लिये सर्वथा अगम्य जो ' अतीन्द्रिय-भूमि ' है, वहाँ न तोभूत है न भविष्य। वेदों का कथन है कि मानव कि आत्मा अमर है। "(१:२५४)
" हमारे ऋषि तो यह कहते हैं, कि इन्द्रियजन्य सुखों में तृप्त रहना उन कारणों में से एक है, जिसने सत्य और हमारे बीच परदा सा डाल दिया है। केवल कर्म-कांडों में रूचि, इन्द्रियों में तृप्ति तथा नाना प्रकार मतवादों ने हमारे और सत्य के बीच एक आवरण डाल रखा है।' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' - सत्ता केवल एक है, ऋषिगण उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।...सत्य तो चिरकाल से ही विद्यमान था, केवल इस (नाम-रूप) के आवरण ने ही उसे ढँक रखा था। " (१:२५५) 
" यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फ़िर से प्राप्त कर लेने के लिये सतत् चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खींचे रहती हैं। चित्त में बाहर जाने और विषय भोगों में चिपके रहने की जो प्रवृत्ति है- उसका दमन करना होगा और उसकेबहिर्मुखी प्रवाह (पर वैराग्य का फाटक लगा कर, या लालच को कम करके ) को आत्मा की ओर मोड़देना होगा। यही योग का पहला सोपान है। "(१:११८)

" इन्द्रियपरायण जीवन से अतीत होने की हमारी असमर्थता, और शारीरक विषय-भोगों के लिये उद्यमही संसार में सभी प्रकार के आतंकों (भ्रष्टाचार) तथा दुखों का कारण है। "(४:११४)


" स्वाधीनता ही उच्च जीवन की कसौटी है।आध्यात्मिक जीवन उस समय प्रारम्भ होता है, जिस समय तुम अपने को इन्द्रिय बन्धनों से मुक्त करलेते हो। जो इन्द्रियों के अधीन है, वही संसारी है, वही दास है। " (४:४३)
" असीम शक्ति का एक स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। और ज्यों ज्यों यह फैलता है, त्यों त्यों एक के बाद दूसरा शरीर अपर्याप्त होता जाता है, वहउनका परित्याग कर उच्चतर शरीर धारण करता है। यही है मनुष्य का धर्म, सभ्यता या प्रगति काइतिहास। वह भीमकाय ' प्रोमिथियस ' (एक यूनानी देवता जिसने olampious से चुराई हुई अग्नि मनुष्य को दिया और जिसे दंड स्वरूप जंजीरों में जकड़ दिया गया) मानो अपने को बंधन मुक्त कर रहाहै। " (९:१५६)

" प्रकृति हमे चारो ओर से दमित करने का प्रयास कर रही है, और आत्मा अपने को अभिव्यक्त करनाचाहती है। प्रकृति कहती है - ' मैं विजयी होउंगी ' ; आत्मा कहती है- ' विजयी मुझे होना है '। प्रकृतिकहती है- ठहरो, मैं तुम्हे चुप रखने के लिये थोड़ा सुख भोग दूंगी। आत्मा को थोड़ा मज़ा आता है, क्षण भरके लिये वह धोखे में पड़ जाती है, पर दुसरे ही क्षण वह फ़िर मुक्ति के लिये चीत्कार कर उठती है।" (३:१७३) 

" एक अन्तर्निहित शक्ति मानो लगातार अपने स्वरूप में व्यक्त होने के लिये - अविराम चेष्टा कर रही है, और बाह्य परिवेश उसको दबाये रखने के लिये प्रयासरत है, बाहरी दबाव को हटा कर प्रस्फुटित हो जानेकी इस चेष्टा का नाम ही जीवन है।" (विवेकानन्द चरित-पृष्ठ १०८)
" हमारे इस अविराम,कठोर जीवन-संग्राम का लक्ष्य है, अंत में उनके निकट पहुँच कर उनके साथ एकीभूत हो जाना। " (४:५०)

" जीवन का अर्थ ही वृद्धि अर्थात विस्तार यानि प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है, यही जीवन का एकमात्रनियम है, और स्वार्थपरता ही मृत्यु है। परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। ...जीसमे प्रेम नहीं वह जी भी नहीं सकता। ( ३:३३३)
" एकमात्र परोपकार को ही मैं कार्य मानता हूँ, बाकि सब कुकर्म है। " (४:२९८)
" आगे बढ़ो ! सैकड़ो युगों तक संघर्ष करने से एक चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ! सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। सत्य अविनाशी है, पुण्य अनश्वर है,पवित्रता अनश्वर है। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोर चेले नहीं चाहोये। ... सदाचार सम्बन्धी जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, भविष्य की उन्नति के लिए जो बिल्कुल चेष्टा नहीं करते, और भलाई करने वालों को धर दबाने में जो हमेशा तत्पर हैं- ऐसे ' मृत-जड़पिण्डों ' के भीतर क्या तुम प्राण का संचार कर सकते हो ? क्या ' तुम ' उस वैद्य की जगह ले सकते हो, जो लातें मारते हुए उदण्ड बच्चे के गले में दवाई डालने कीकोशिश करता हो ? भारत को नव-विद्युत की आवशयकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नविन चेतना कासंचार कर सके। यह काम हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और होगा। " ( ३:३४४)

" जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे सर्वभूतों कि सेवा में न्योछावर कर दिया जाये।"(४:५८)
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Friday, October 16, 2009

' निमित्त ' अथवा कार्य-कारणवाद [टाइम-स्पेस एण्ड कॉज़ैशन में कॉज़ैशन क्या है ?]

भगवान कपिल ही दर्शन शास्त्र के पितामह हैं !
* टाइम-स्पेस एण्ड कॉज़ैशन में कॉज़ैशन (the act of causing something to happen) या 'निमित्त' क्या है ?
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " एक पत्थर गिरा और हमने प्रश्न किया- इसके गिरने का कारण क्या है? हम यह निश्चित रूप से जानते हैं कि - बिना कारण कुछ कुछ भी घटित नहीं होता। मेरा अनुरोध है कि इस ' क्यों ' कि धारणा को खूब स्पष्ट रूप से समझ लो। जब हम यह प्रश्न करते हैं कि यह घटना क्यों हुई? तब यह मान लेते हैं, कि सभी घटनाओं का एक ' क्यों ' रहता ही है। अर्थात उसके घटित होने के पूर्व और कुछ अवश्य हुआ होगा, जिसने कारण का कार्य किया। इसी पूर्ववर्तिता और परवर्तिता के अनुक्रम को ही ' निमित्त ' अथवा कार्य-कारणवाद कहते हैं। " (२:८६) 
' बाह्य-जगत्'  तो तुम्हे अपने मन के अध्यन में प्रेरित करने के लिए एक उद्दीपक तथा अवसर मात्र है। सेब के गिरने ने न्यूटन को एक उद्दीपक प्रदान किया, उसने अपने मन का अध्यन किया और गुरुत्वाकर्षण का नियम मिल गया। ' (३:४)
" यह सम्पूर्ण बाह्य-जगत्, अन्तर्जगत् या सूक्ष्मजगत् का स्थूल विकास मात्र है। विकसित होने या अभिव्यक्त होने की प्रक्रिया की सभी अवस्थाओं में सूक्ष्म को ' कारण ' और स्थूल को ' कार्य ' समझना होगा। इस नियम से, बाह्य-जगत् कार्य है और अन्तर्जगत् कारण। " (१:४२)

स्वामी विवेकानन्द कहते है- " शापेनहावर ने यह निष्कर्ष निकला कि ' इच्छा ' (Will) ही सभी चीजों का कारण है। ' होने ' की इच्छा से ही हमारी अभिव्यक्ति होती है"- किन्तु हम इससे इन्कार करते हैं। वास्तव में इच्छा और प्रेरक-नाड़ी (Motor-nerve) एक रूप है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं, तो इसमे इच्छा की कोई बात नहीं होती, जब इसकी संवेदनायें मस्तिष्क में स्थित दर्शन इन्द्रिय तक पहुँचती हैं- तब प्रतिक्रिया स्वरूप बुद्धि निर्णय करती है - 'यह करो ' अथवा ' यह न करो '। अहं तत्व की इस अवस्था को ही इच्छा कहते हैं। इच्छा का एक भी कण ऐसा नहीं है, जो प्रतिक्रिया का फल न हो। अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें रहनी आवश्यक हैं। यह ' इच्छा ' अहं तत्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। और अहं तत्व का सृजन - उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और वह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणाम है। मनुष्य में महत्, महान् तत्व ( the  Great Principle) या बुद्धि (the Intelligence) सम्बन्धी बात को समझना बहुत आवश्यक है। " (वि० सा० ख ० ४: २०४ )

" मैं तुम लोगों को देख रहा हूँ। इस दर्शन-क्रिया के लिए किन किन बातों की आवश्यकता है ? पहले तो आँख --आँखें रहनी ही चाहिए। मेरी अन्य सब इन्द्रियाँ भले ही अच्छी रहें, पर यदि मेरी आँखें न हों, तो मैं तुम लोगों को न देख सकूँगा। अतएव पहले मेरी आँखें अवश्य रहनी चाहिए। दुसरे, आंखों के पीछे और कुछ रहने की आवश्यकता है, और वास्तव में वही तो दर्शन-इन्द्रिय है। यह यदि हममे न हो, तो दर्शन -क्रिया असंभव है। वस्तुतः आँखें इन्द्रिय नहीं हैं, वे तो दृष्टि की यंत्र मात्र हैं। यथार्थ इन्द्रिय आंखों के पीछे, हमारे मस्तिष्क में अवस्थित इसका नाड़ी-केन्द्र (Optic- nerve) है। यदि यह केन्द्र किसी प्रकार नष्ट हो जाये, तो दोनों आँखें रहते हुए भी मनुष्य कुछ देख न सकेगा।
अतएव दर्शन क्रिया के लिए इस असली इन्द्रिय का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है। हमारी अन्यान्य इन्द्रियों के बारे में भी ठीक ऐसा ही है। बाहर के कान धवनी-तरंगों को भीतर ले जाने के यन्त्र मात्र हैं, पर उस ध्वनी-तरंग को मस्तिष्क में अवस्थित उसके नाड़ी-केन्द्र या श्रवण - इन्द्रियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए। पर इतने से ही श्रवण-क्रिया पूर्ण नहीं हो जाती।
कभी-कभी ऐसा होता है कि पुस्तकालय में बैठ कर तुम ध्यान से कोई पुस्तक पढ़ रहे हो,घड़ी में बारह बजने का टंकार पड़ता है, पर तुम्हे वह ध्वनी सुनायी नहीं देती। क्यों ? वहाँ ध्वनी तो है, वायु-स्पन्दन, कान और केन्द्र भी वहाँ हैं और कान के मध्यम से मस्तिष्क में अवस्थित उसके नाड़ी-केन्द्र तक स्पन्दन पहुँच भी गए हैं, पर तो भी तुम उसे सुन नहीं सके। किस चीज कि- कमी थी ? 
इस इन्द्रिय के साथ मन का योग नहीं था। अतएव हम देखते हैं कि मन का रहना भी नितान्त आवश्यक है।पहले चाहिए यह बहिर्यंत्र, जो मानो विषय को वहन करके नाड़ी-केन्द्र या इन्द्रिय के निकट ले जाता है। फ़िर(स्थूल शरीर में अवस्थित) उस इन्द्रिय (Optic-nerve) के साथ (सूक्ष्म-शरीर में अवथित) मन को भी  युक्त रहना चाहिए।
जब मस्तिष्क में अवस्थित इन्द्रिय से मन का योग नहीं रहता, तब कर्ण-यन्त्र और मस्तिष्क के केन्द्र पर भले ही कोई विषय आकर टकराये, पर हमें उसका अनुभव न होगा। मन भी केवल एक वाहक है, वह इस विषय की संवेदना को और भी आगे ले जा कर बुद्धि को ग्रहण कराता है। बुद्धि उसके सम्बन्ध में निश्चय करती है, पर इतने से ही नहीं हुआ। 
बुद्धि को उसे फ़िर और भी भीतर ले जाकर (स्थूल और सूक्ष्म दोनों) शरीर के राजा आत्मा के पास पहुँचाना पड़ता है। उसके पास पहुँचने पर वह आदेश देती है, ' हाँ, यह करो' या 'मत करो'। तब जिस क्रम में वह विषय संवेदना आत्मा तक गयी थी, ठीक उसी क्रम से वह बहिर्यंत्र में आती है- पहले बुद्धि में, उसके बाद मन में, फ़िर मस्तिष्क-केन्द्र में और अन्त में बहिर्यंत्र में; तभी विषय-ज्ञान की क्रिया पूरी होती है। " (२: १०९-१०)
** 'सूक्ष्म-शरीर' क्या है ? " ये सब यंत्र आँख, कान, नाक आदि और उनका मस्तिष्क में स्थित स्नायु केन्द्र अथवा ' इन्द्रिय ' मनुष्य के स्थूल देह में अवस्थित है, पर मन और बुद्धि नहीं। मन और बुद्धि तो उसमें है, जिसे हिंदूशास्त्र - 'सूक्ष्म-शरीर' कहते हैं और इसाई शास्त्र 'आध्यात्मिक-शरीर' कहते हैं। वह इस स्थूल शरीर से अवश्य बहुत ही सूक्ष्म है, परन्तु फ़िर भी आत्मा नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार शरीर कभी सबल कभी दुर्बल होता है, उसी प्रकार मन भी कभी सबल कभी निर्बल हो जाता है। अतः मन आत्मा नहीं है, क्योंकि आत्मा कभी जीर्ण या क्षयग्रस्त नहीं होती। आत्मा इन सबके अतीत है। "(२:११०)
" मन, अहं-बोध, मस्तिष्क स्नायु-केन्द्र या इन्द्रिय, और प्राण - इन सबके संयोग से ' सूक्ष्म-शरीर ' बनता है, जिसे इसाई दर्शन में मानव का आध्यात्मिक देह कहते हैं। इस देह (सूक्ष्म शरीर या मन ) को ही उद्धार और दण्ड प्राप्त होता है, इसका ही बार- बार जन्म और पुनर्जन्म होता है। " (४:२१३)

... वयोवृद्ध और अत्यन्त पवित्र महर्षि भी इन प्रश्नों (सृष्टी) का समाधान करने में असमर्थ हो रहे हैं; पर तभी एक ' युवक ' - उनके बीच खड़ा हो कर घोषणा करता है- ' हे अमृत के पुत्र सुनो, हे दिव्यधाम के निवासी सुनो - मुझे मार्ग मिल गया है ! जो अंधकार या अज्ञान के परे है, उसे जान लेने पर ही हम मृत्यु के परे जा सकते हैं, अन्य कोई मार्ग नहीं है। " (श्वेताशतर२/५/३-८) (वि० सा० ख० २:५८)

* " ब्रह्माण्ड का विधान (Cosmic-Plan) है- ' यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे ' - जो ब्रह्माण्ड में है, वह अवश्य पिण्ड में भी होगी। (What is in The Cosmos must also be microcosmic.) उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति (Individual) को लो; उसमे निहित वह भौतिक प्रकृति (अव्यक्त) इस ' सार्वभौम बुद्धि ' या महत् के एक लघु कण में परिवर्तित हो जाती है (That material Nature in him becomes changed into this mahat, a small particle of this Universal Intelligence) । फ़िर उस सार्वभौम बुद्धि का या लघु कण ' अहं तत्त्व ' में परिणत हो जाता है, यह ' अहं ' ही उस व्यक्ति के स्थूल एवं सूक्ष्म भौतिक शरीर का संयोजन और निर्माण करते हैं। " (४:२०३)

" इसे (परिणामवाद को) समझना तुम्हारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि समस्त विश्व में कोई ऐसा दर्शन नहीं है जो कपिल का ऋणी न हो। पाइथागोरस भारत आये और उन्होंने इस दर्शन का अध्यन किया। और वही ग्रीक लोगों के दार्शनिक विचारों का समारंभ था। " (४:२०४)
भगवान कपिल ही दर्शन शास्त्र के पितामह हैं, वे व्यासदेव से भी प्राचीन हैं, इसीलिये हम उनकी बात सुनने के लिये बाध्य हैं। कपिल का ' सांख्य-दर्शन ' ही विश्व का ऐसा सर्वप्रथम दर्शन है, जिसने युक्ति-विचार पद्धति से जगत् की उत्पत्ति और लय के सम्बन्ध में विचार किया गया है। विश्व के प्रत्येक तत्त्व जिज्ञाषु- वैज्ञानिक को उनके प्रति श्रद्धांजली अर्पित करनी चाहिये।" (४:२०४) "

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " कपिल का प्रधान मत है- परिणाम-वाद। इस कार्य-कारण वाद या ' परिणाम- वाद ' से तात्पर्य है- 'कार्य' भी अन्य रूप में परिणत ' कारण ' मात्र ही है। जैसे ' घड़ा ' कार्य है, और ' मिट्टी ' है उसका कारण। कपिल के अनुसार अव्यक्त प्रकृति से ले कर चित्त,मन, बुद्धि, अहंकार तक कोई भी वस्तु पुरूष अर्थात भोक्ता या प्रशासक नहीं है। स्वरूपतः मन में चैतन्य नहीं है; किन्तु हम देखते हैं कि वह तर्कना करता है। अतएव उसके परे, निश्चित रूप से ऐसी कोई ' सत्ता ' होनी चाहिए, जिसका आलोक- महत्, बुद्धि, अहं-ज्ञान और अन्य परवर्ती परिणामों में व्याप्त है। इस सत्ता को कपिल ' पुरूष ' कहते हैं, वेदान्ती उसी को ' आत्मा ' कहते हैं।...बुद्धि स्वतः क्रियाशील नहीं है- उसकी पृष्ठ भूमि में जो पुरूष विद्यमान हैं, उसीसे मानो उसमे कार्यशीलता आती है। " (४:२१२) 

"आजकल हम जिसे जड़-पदार्थ (matter) कहते हैं, उसे प्राचीन हिंदू भूत अर्थात बाह्य तत्व कहते थे। उनके मतानुसार एक तत्व नित्य है, शेष सब इसी एक से उत्पन्न हुए हैं। इस मूल तत्व को ' आकाश ' की संज्ञा प्राप्त है। आजकल ईथर शब्द से जो भाव व्यक्त होता है, यह बहुत कुछ उसके सदृश है, यद्दपि पुर्णतः नहीं। इस तत्व के साथ प्राण नाम की आद्य उर्जा रहती है। प्राण(force) और आकाश(matter) संघटित और पुनः संघटित हो कर शेष तत्वों (वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी) का निर्माण करते हैं। कल्पान्त में सबकुछ प्रलयगत हो कर आकाश और प्राण में लौट जाता है। " (४:१९४) 



*" प्रकृति या Nature का अधिक वैज्ञानिक नाम है- ' अव्यक्त '। जो अभिव्यक्त या प्रकट नहीं या भेदात्मक नहीं है, उससे ही सब पदार्थ उत्पन्न हुये हैं। उसीसे अणु-परमाणु, जड़-पदार्थ, शक्ति, मन, बुद्धि सब प्रसूत हुये हैं। सांख्यों ने अव्यक्त का लक्षण बताया है, त्रि-शक्तियों की (तीन शक्ति -सत्, रज, तम) साम्यावस्था। जब आकर्षण-शक्ति (Centripetal-force) अर्थात ' तमस ' और विकर्षण-शक्ति (Centrifugal-force) अर्थात ' रजस ' - जब पूरी तरह से ' सत्व ' के द्वारा संयत रहतीं हैं, अथवा पूर्ण साम्य की अवस्था में रहतीं हैं, तब सृष्टि का अस्तित्व नहीं रहता। किन्तु यह साम्यावस्था ज्योंही नष्ट होती है, उनका संतुलन भंग हो जाता है, और उनमे से एक शक्ति दूसरे से प्रबलतर हो उठती है, त्योंही गति (प्राण) का आरम्भ होता है और सृष्टि होने लगती है ।" (४:१९३)

*" प्रकृति या अव्यक्त ...एक सर्वव्यापी जड़-राशिस्वरूप है। इसी अव्यक्त या प्रकृति में बाह्य-जगत् के समस्त वस्तुओं के ' कारण ' विद्यमान हैं। व्यक्त अवस्था की सूक्ष्म दशा को- ' कारण ' कहते हैं, यह उस वस्तु की अन्-अभिव्यक्त अवस्था है, जो अभिव्यक्ति को प्राप्त होती है।...कारण में प्रत्यावर्तन का नाम ही विनाश है। " (४:२०१)" अव्यक्त (Nature) अर्थात एक अखण्ड, अविभक्त (द्रव्य या ) जड़-राशि के उस सर्वव्यापी विस्तार की कल्पना करो - जो प्रत्येक वस्तु की प्रथम अवस्था है, और यह उसी प्रकार परिवर्तित होने लगता है, जिस प्रकार दूध परिवर्तित हो कर दही बन जाता है।
ब्रह्माण्ड (Cosmos) में इस Nature या अव्यक्त की प्रथम अभिव्यक्ति को सांख्य के शब्दों में - ' महत् ' कहा जाता है। ' महत् ' तत्त्व का शाब्दिक अर्थ है,' महान आधारभूत कारण (The Ultimate Source) ' - हम इसे बुद्धि (Intelligence) कह सकते हैं। अर्थात प्रकृति में जो प्रथम परिवर्तन हुआ उससे ' बुद्धि ' की उत्पत्ति हुई।मैं उस ' महान आधारभूत कारण ' या महत् को अंग्रेजी में ' Self-
Consciousness ' चेतना या आत्म-चेतना नहीं कह सकता, क्योंकि वह ग़लत होगा। चेतना तो इस 
' सार्वभौम बुद्धि ' का अंशमात्र है। महत् तत्व सर्वव्यापी है, अवचेतन (Sub-Consciousness), चेतन (Consciousness), और अतिचेतन (Super-Consciousness) सब (बुद्धि के सारे स्तर) इसके अर्न्तगत आ जाते हैं।
इसीलिये इस महत् या ' महान आधारभूत कारण ' के लिए चेतना की किसी अकेली अवस्था मात्र के लिए प्रयुक्त करना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। फ़िर यह महत् पदार्थ या ' बुद्धि ' जब (दूध से दही के समान) स्थूलतर पदार्थ(Grosser Matter) में परिवर्तित होता है, तब प्रकृति या अव्यक्त के दुसरे परिवर्तन को ' अहं तत्व '(Egoism) कहते हैं।

यह प्रकृति अपने तीसरे और अन्तिम परिवर्तन में स्वयं को - ' सार्वभौम संवेदक इन्द्रियों(Universal Sense-Organs) ' तथा ' सार्वभौम तन्मात्राओं(Universal Fine-Particles) ' के रूप में अभिव्यक्त करती है। और ये अन्तिम वस्तुएं पुनः संयुक्त हो कर इस स्थूल-' बाह्य जगत् ' में परिणत हो जातीं हैं। 
इस प्रकार वह ' महत् ' तत्त्व ही बाह्य ' जगत् ' के रूप में (दूध से दही के समान) परिणत हो गया है। जड़-पदार्थों और मन में परिणामगत भेद के अतिरिक्त कोई भेद नहीं है। सूक्ष्म एवं स्थूल स्वरूप में एक ही पदार्थ है, एक ही दुसरे में बदल जाता है।... मन (mind) और मस्तिष्क(Brain) में अन्तर नहीं है, दोनों जड़ पदार्थ हैं, मन सूक्ष्म जड़ है, मस्तिष्क स्थूल जड़ है। " (वि० सा० ख० ४: २०२)

" सत्व,रज और तम- जगत के उपादान हैं, जिनसे समग्र विश्व विकसित हुआ है। कल्प के प्रारम्भ में ये साम्यावस्था में रहते हैं। सृष्टि का आरम्भ होने पर ही ये उपादान परस्पर अनन्त प्रकार से संयुक्त हो कर इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं। इसका प्रथम विकास महत् अथवा सर्वव्यापी बुद्धि है, और उससे अंहकार की उत्पत्ति होती है। अंहकार से मन अथवा सर्वव्यापी मनस-तत्व (चित्त?)का उद्भव होता है। इस अहंकार से ही, मस्तिष्क में अवस्थित ज्ञान और कर्म के स्नायू-केन्द्रों या इन्द्रियों तथा तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओं को प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता, किन्तु वे जब स्थूल परमाणु बन जाते हैं, तब हम उन्हें अनुभव और इन्द्रियगोचर कर सकते हैं। 
बुद्धि, अंहकार और मन - इन तीन माध्यमों से कार्य करने वाला, ' चित्त ' - ही प्राण नामक शक्तियों की सृष्टि कर के उन्हें परिचालित कर रहा है। तुम्हे इस कुसंस्कार को अवश्य त्याग देना चाहिए कि प्राण केवल श्वास-प्रश्वास (Breath) है, श्वास-प्रश्वास तो प्राण का कार्य मात्र है। प्राण ही वायु पर कार्य कर रहा है, वायु प्राण के ऊपर नहीं। " (४:२११)
" ब्रह्माण्ड में जो उर्जा व्याप्त है, उसका नाम है प्राण और वह इन भूतों में शक्ति के रूप में निवास करती है। प्राण के प्रयोग का महान उपकरण है मन। मन भी भौतिक पदार्थ है। मन से परे है आत्मा, जो प्राण को धारण करता है। आत्मा वह ' विशुद्ध बुद्धि ' है जिससे प्राण नियंत्रित और निर्दिष्ट होता है। मन अत्यन्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थ है, जो प्राण को अभिव्यक्त करने का एक उपकरण है। अभिव्यक्ति के लिए शक्ति (force) को भौतिक पदार्थ (matter) की आवश्यकता होती है। " (४:९७) 
" प्राण का अभिप्राय है शक्ति (force)- जो सभी तरह की गति या सम्भाव्य गति, शक्ति या आकर्षण के रूपों में अपने को अभिव्यक्त करता है। "(४:१५२)
 ' नाशः कारणलयः ' - नाश (मृत्यु) का अर्थ है कारण में लय हो जाना। (वि० सा० ख० २:१०१) 


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Thursday, October 15, 2009

प्रारंभिक अवस्था में मूर्ति पूजा क्यों आवश्यक है ?

साकार मूर्ति की पूजा निराकार 'ब्रह्म' या 'अल्ला' की धारणा में सहायक है !

हजार सालों की गुलामी के कारण पाश्चात्य शिक्षा और सेमेटिक भावों से प्रभावित होकर कुछ अत्यन्त तर्कवादी और उच्च डिग्रीधारी समाज-सुधारक नेताओं ने ब्रह्म-समाज और आर्य-समाज जैसे मूर्तिपूजा-विरोधी आंदोलन का सूत्रपात किया था। जिसके फलस्वरूप तथाकथित बुद्धिजीवी या (elite group) में माँ काली की मूर्ति पर से विश्वास उठता जा रहा था। इसीलिये अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण को अनपढ़ के रूप में अवतरित होना पड़ा और आचार्य केशव सेन और नरेन्द्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानन्द) अंग्रेजी भाषा में पढ़े-लिखे, उच्च-डिग्री प्राप्त लोगों को भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार मनःसंयोग या मन को एकाग्र करने का प्रशिक्षण देना पड़ा। 
अब तर्क-वादी आर्यसमाज और ब्रह्मसमाज के अनुयायी नरेन्द्रनाथ जैसे युवाओं के मन में संघर्ष होने लगा कि मेन्टल कान्सन्ट्रेशन का अभ्यास करते समय, प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियों से मन को खींचकर अपने हृदय में धारण करने का अभ्यास या ' धारणा ' के लिए किसी मूर्त आदर्श का चयन करें या अमूर्त आदर्श , जैसे ॐ आदि का ?  
"मूर्ति-पूजा " करना भी जीवन की एक आवश्यक अवस्था है। किसी (' नर-देव ' या ' पुरुषोत्तम ' की ) मूर्ति पर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करने का तात्पर्य है, अपने ' दिव्य-स्वरूप ' को किसी - ' दिव्य-मूर्ति ' के अनुरूप मान कर ध्यान करने से आगे बढ़ने में सहायता मिलती है। उनका दिव्य गुण हमारे भीतर आने लगता है।
स्थूल भौतिक मूर्ति पर ध्यान (मनःसंयोग) करने से - ' सहचर्य ' (Law of Association ) के नियमानुसार उस ध्यान की 'वस्तु ' के अनुरूप मानसिक भावाविशेष का उद्दीपन हो जाताहै। और यदि कोई उस अवस्था के भी परे पहुँच गया है, तब भी उसके लिए मूर्ति-पूजा या मूर्ति पर ध्यान करने को भ्रमात्मक कहना उचित नहीं है।
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा है," जो लोग मूर्ति पूजा पर विश्वास नहीं करते वे - ईश्वर के ' सर्वव्यापित्व' का क्या अर्थ समझते हैं ? क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल है ? अपनी मानसिक संरचना के नियमानुसार, हमें अनन्तता का भाव लानेके लिए नील-आकाश या अपार-समुद्र की कल्पना से जोड़ना ही पड़ता है। मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार करके दिव्य बनना है। मूर्तियाँ, मन्दिर, ग्रन्थ, या गिरजाघर तो धर्मजीवन की शिशु-पाठशाला के सहायक उपकरण मात्र हैं; पर उसे जीवन भर वहीं पड़े नहीं रहना चाहिए, उसे तो वहाँ से आगे बढ़ कर उत्तरोत्तर उन्नति ही करनी चाहिए। " (वि० सा० ख०१:१७,१८)
" बालक ही मनुष्य का जनक है  - तो क्या किसी वृद्धपुरुष के लिए बचपन या युवावस्था को पाप समझना उचित होगा ? मन में किसी मूर्ति का ध्यान आए बिना कुछ सोंच सकना उतना ही असंभव है, जितना श्वांस लिए बिना जीवित रहना। अपनी आंखों को बंद करके यदि मैं अपने अस्तित्व - ' मैं ' क्या हूँ; को समझने का प्रयत्न करूँ, तो मुझमे किस भाव का उदय होगा ? इस भाव कि मैं (M/F) शरीर हूँ। तो क्या मैं भौतिक पदार्थों केसंघात के सिवा और कुछ नहीं हूँ ? वेदों कि घोषणा है- नहीं ! मैं शरीर में रहने वाली ' आत्मा ' हूँ ! मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर मर जायगा,  पर ' मैं ' नहीं मरूँगा !" (१:८) ' 
" निरपेक्ष ब्रह्मत्व का साक्षात्कार, चिन्तन या वर्णन केवल सापेक्ष के सहारे ही हो सकता है, और मूर्तियाँ, क्रूस या नवोदित चंद्र-सितारा केवल प्रतीक हैं, जिनको अब इन प्रतीकों की सहायता की आवश्यकता नहीं है, उन्हें यह कहने का अधिकार नहीं के वे ग़लत हैं, जिनको इसकी आवश्यकता है। "(१:१९)
'मूर्तिपूजा सबसे नीचे की अवस्था है, आगे बढ़ते समय मानसिक जप-ध्यान साधना की दूसरी अवस्थाहै।  ' उत्तमो ब्रह्म सद्भावों ' - सबसे उच्च अवस्था तो वह है, जब परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाय।' (१:१७)
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " संसार के समस्त धर्म -ग्रंथों में केवल वेद ही ऐसा ग्रन्थ है, जिसमे बारम्बार यह कहा गया है कि - ' तुम्हें वेदों के भी अतीत हो जाना चाहिए '। वेद कहते हैं कि वे केवल बाल-बुद्धि रखने वाले व्यक्ति की सहायता के लिए लिखे गए हैं, इस लिए जब तुम स्वयं आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो जाते हो, तो तुम्हें वेदों के भी परे जाना पड़ेगा। " (१०: ३७७)
" मन को एकाग्र करने की विद्या में सिद्ध " ऋषिगण यहाँ समस्त संसार को एक चुनौती दे रहे हैं-... हमने उस रहस्य का पता लगा लिया है, जिसके द्वारा स्मृति-सागर की गंभीरतम गहराई तक मंथन किया जा सकता है-उसका प्रयोग कीजिये और आप अपने (यथार्थ स्वरूप की या) पूर्व जन्मोंकी सम्पूर्ण संस्मृति प्राप्त कर लेंगे। ( श्वेताशतर२/५)." (१:१०) 
" एक ऋषि कहते हैं कि - तुम इस विश्व का कारण नहीं जानते; इसीलिये तुम्हारे और मेरे बीच में बड़ा भारी अन्तर उत्पन्न हो गया है ; ऐसा क्यों ? इसलिए कि तुम केवल इन्द्रिय-परक बातों की चर्चा करते हो, और इन्द्रिय विषयों तथा धार्मिक कर्म- कांडों में ही संतुष्ट रहते हो, जबकि - मैंने उस द्वन्द्वातीत पुरूष को जान लिया है।" (१:२५१)
' चेतना मानस-सागर की सतह मात्र है और भीतर उसकी गहराई में, हमारी समस्त अनुभव-राशिस्मृतियाँ संचित हैं। केवल प्रयत्न तथा उद्यम कीजिये, वे सब ऊपर उठ आयेंगे, और आप अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान भी प्राप्त कर सकेंगे। ' (१:१०)
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Monday, October 12, 2009

' स्वतंत्रता-दिवस '

" उत्साह की अग्नि से ह्रदय को भर लो और देश के कोने-कोनेतक फ़ैल जाओ !"
' स्वतंत्रता-दीवस ' को धूम-धाम से मनाने की प्रथा का निर्वहन प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी आमतौर से कर लिया गया है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी स्वाधीनता-दीवस की पूर्वसंध्या पर भारत की गरीब अशिक्षित जनता के उत्थान के लिए लम्बे-चौड़े वादे करने की प्रथा को भी एक बार फिर से दुहरा जरुर लिया गया था।  
किन्तु आजके दिन हमलोग उन शहीदों को याद करना आवश्यक नहीं समझते, जिन्होंने स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने जीवन का उत्सर्ग किया था। हो सकता है कि हमारी इन उक्तियों को कुछ लोग नकारात्मक भी कहें। परन्तु किसी राष्ट्र के लिए ' स्वतंत्रता ' का क्या मूल्य है इस बात को हम ठीक से समझ नहीं सके हैं। क्योंकि इसे प्राप्त करने के लिए हमने यथेष्ट मूल्य नहीं चुकाया है। इसीलिये स्वतंत्रता कि उल्टी गिन्ती का प्रारम्भ होते समय ही हमलोग डगमगा गए थे; जिसके परिणाम स्वरुप ब्रिटिश संसद ने भारतवर्ष को तीन  टुकड़ों में बाँट कर दी जाने इस आजादी को  " India Independence Act "  बिल पास करवा कर, हमारे ऊपर जबरन थोप दिया था। 
यह आजादी अंग्रेजों को इसीलिये देनी पड़ी, क्योंकि नेताजी सुभाष के नेतृत्व में हिन्दू-मुसलमानों ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए, मिलजुल कर " आज़ाद हिन्द फ़ौज " का निर्माण किया था, एवं राष्ट्र को स्वाधीन करवाने के लिए ' सर्वोच्च बलिदान ' का जैसा उदाहरण प्रस्तुत किया था ; उसके कारण जो भारतीय सैनिक ब्रिटश-राज के प्रति वफादार थे,  उनके वफ़ादारी की वह ' बुनियाद ' ही हिल चुकी थी जिनके दम पर अंग्रेज-सरकार अभी तक टिकी हुई थी, टूट-टूट कर बिखरने लगी थी।उधर हँसते हँसते फाँसी के फंदों पर झूल जाने वाले क्रन्तिकारी शहीदों के भूत से भी ब्रिटिश राज-शाही भयभीत हो गयी थी। द्वितीय-विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश-राजशाही की कमर को ही तोड़ डाला था। वे जान चुके थे कि उनका खेल अब ख़त्म हो चुका है। 
और इस प्रकार ' ब्रिटिश-राष्ट्रमंडल ' (British Commonwealth) के अर्न्तगत १४ एवं १५ अगस्त १९४७ को दो " स्वतंत्र उपनिवेशों " (Independent Dominions) का जन्म हुआ। विभाजित भारतवर्ष के बड़े भूखंड को ही ' India ' कहा जाने लगा, और स्वतंत्र India  के चाटुकारों ने अन्तिम ब्रिटिश वाइसराय " British Viceroy "  या " बड़े लाट-साहब " को अपना पहला गवर्नर जनरल (first Governor General ) बनने के लिए आमन्त्रित किया ! 
 अंग्रेजों की ' फूट डालो और राज करो ' की नीति के कारण जो भारत सन्तानें (हिन्दू-मुसलमान) आपस में लड़ते रहते थे, उनको नेताजी ने 'आजाद हिन्द फौज़ ' का निर्माण करके फिर से एक कर दिया था। किन्तु अंग्रेजों ने इस देश को स्थाई रूप से कमजोर बना देने की एक चाल चली; तथा इस देश को तीन टुकड़ों में बाँट दिया - ताकि ये दोनों भाई धर्म और भाषा के नाम पर, अनादि काल तक एक दुसरे से झगड़ते रहें।इस प्रकार देश को छोड़ने के पहले अंग्रेजों ने,हिंदुस्तान-पाकिस्तान-बंगलादेश की बुनियाद डाल कर भारतवर्ष के उन सन्तानों के बीच ही फूट पैदा करवा दिया। 
अन्ततोगत्वा - इसी अन्तिम British Viceroy ने हमारे एकमात्र संगठित राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अन्तिम अवशेष ' आज़ाद हिन्द फ़ौज ' को चतुराई से ( नेहरू-एडविना प्रसंग को प्रोत्साहित कर ) धूल में मिला दिया। उनके द्वारा लूट लिए जाने के बाद भी हम लोगगर्वान्वित थे और हमे किसी बात की कोई चिंता नहीं थी। और हमारे तत्कालीन बूढ़े, थके-माँदे, सौदेबाज तथा सत्ता के लोभी नेताओं ने ' भारत माता ' को इस प्रकार तीन टुकडों में काटे जाना स्वीकार भी कर लिया।

 इसके बाद हमलोगों ने उद्दात लक्ष्य एवं सिद्धान्तों से भरपूर, संसार के सबसे भारी- भरकम संविधान के रूप में ' Constitution of India ' की रचना की। इस संविधान द्वारा निर्धारित राष्ट्र को संचालित करने की पद्धति पूरी तरहसे पाश्चात्य देशों, विशेष कर England के संविधान को आँख मूंद कर की गई नक़ल है।सच्चाई तो यह है कि भारत की राष्ट्रीयता (Nationality of India) क्या है ? - हम लोग पहले एक भारतीय हैं, या किसी खास राज्य के नागरिक - बिहारी, बंगाली,गुजराती, या मराठी-मानुष हैं ?  ' एक भारत एक-राष्ट्र ' के गौरव  को आज तक हम भारतियों को समझने ही नहीं दिया गया है।

क्योंकि जिन दिनों England के संविधान का अन्धानुकरण किया जा रहा था, उस समय भारत की  साधारण जनता से लेकर यहाँ के नेता तक - हम सभी लोग, किसी भी British चीज की नक़ल करने में अपनी शान समझते थे। आजकल हम लोग England का अन्धानुकरण करने के बदले US का अन्धानुकरण करने में अपनी शान समझते हैं।
किन्तु स्वामी विवेकानन्द ने विदेशी शासन के कारण मिलने वाली गुलामी या परतन्त्रता के दमनकारी टीस या कसक को बहुत गहराई से महसूस किया था। उन्होंने भारत वासियों के ह्रदय में ' राष्ट्रीय- गौरव ' की चेतना को जाग्रत कराया था, तथा भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करवाने के लिए युवाओं को ' युग-नायक ' ने समस्त भारतियों को एक सच्चा देश-भक्त (Hero) बनने का आह्वान करते हुए कहा था -" उत्तिष्ठत् ! जाग्रत् ! प्राप्य वरान्नी बोधत ! "
उन्होंने ' भारत माता ' से ही प्रेम करने को कहा था, इस एकमात्र जाग्रत आराध्या देवी के लिए आहुतिप्रदान करने को कहा था।उन्होंने राष्ट्र के युवाओं को, भारत के ग्रामो की झोपड़ीयों में निवास करने वाले करोडों पददलित जाग्रत देवी-देवताओं की सेवा तन मन धन से करने के लिए पुकारा था। " उत्तिष्ठत् ! जाग्रत् ! प्राप्य वरान्नी बोधत ! " - अर्थात उठो ! जागो ! और लक्ष्य प्राप्त किए बिना विश्राम मत लो ! और उनके इस आह्वान को नेताजी ' सुभाष ' ने विशेष रूप से अपने ह्रदय में धारण कर लिया था। आज एक बार फ़िर उसी राष्ट्र-चेतना को पुनरुज्जीवित करने की आवश्यकता है। 
किन्तु स्वतंत्र भारत के क्रमशःविकसित होते हुए इतिहास में ' सच्चा राष्ट्रवाद ' विकसित नहीं हो सका है।देश के विकास की योजनाओं में शिक्षा और स्वाथ्य को बहुत कम महत्व दिया गया।नैतिकता या युवाओं के चरित्र-निर्माण के लिए स्वतंत्र भारत की शिक्षा-निति में कोई स्थान नहीं दिया गया। जिसके फलस्वरूप आजादी के प्रारंभिक दिनों में " भ्रष्टाचार " को कुछ हद तक बर्दास्त किया जाने लगा, किन्तु बाद में भ्रष्टाचार को प्रत्येक स्तर पर व्याप्त ' एक आवश्यक बुराई(Necessary Evil) ' के रूप में स्वीकृति प्रदान कर दी गई।
और स्वतंत्र भारत में ' नेताजी ' को नगण्य बना दिया गया। किन्तु यदि सचमुच वे एक ' नाचीज़ ' हैं, तो उनसे जुड़ी हुयी समस्त फाइलों को अनन्त कल तक ' गोपनीय ' रखना क्यों आवश्यक है ? पिछले जाँच आयोग के अनुसार - ' नेताजी ' उस हवाई जहाज दुर्घटना में मर गए जो कभी दुर्घटना ग्रस्त हुआ ही नहीं था।और ' स्वामीजी ' ? स्वतंत्र भारत में स्वामी विवेकानन्द को केवल एक हिन्दू आध्यात्मिक नेता का तगमा लगाकर किनारे कर दिया गया।
भारत के जन-जन में ' सच्चे राष्ट्रवाद ' की चेतना को जाग्रत करा देने में समर्थ - स्वामी विवेकानन्द द्वारारचित जिस ' स्वदेश मन्त्र ' को पढने से श्री मोहनदास करमचंद गाँधी की राष्ट्र भक्ति हज़ार गुना बढ़ गई थी, उसे आजादी के बाद - ' स्वाधीन भारत की शिक्षा व्यवस्था ' में उचित स्थान देना भी आवश्यक नहीं समझा गया।
 उसी प्रकार राजनैतिक तथा राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त  भारत-निर्माण सूत्र -' Be & Make ' -' तुम स्वयंमनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो ' को शिक्षा व्यवस्था में जोड़ने का प्रयास अभी तक नहीं किया गया ? किन्तु भारत की जनता इतनी मूर्ख नहीं है, धीरे धीरे शिक्षा-व्यवस्था की सच्चाई साधारण जनता के सामने आ रही है।अब यह समय आ गया है कि भारत के युवा स्वयं अपने ' heroes ' का चुनाव करें। क्योंकि युवा काल में तुम इसी तरह अपने आदर्श का चुनाव करते हो। इस समय तुम जिसे अपने ' आदर्श-पुरूष ' के रूप में चुन लोगे वही तुम्हारे भावी जीवन की क्रिया-कलापों को निर्देशित करेगा।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के शीर्षस्थ अर्थ-शास्त्री भले ही यह सोंचे,कि ' वैश्विक आर्थिक मन्दी ' अब समाप्त हो चुकी है; किन्तु विश्व-व्याप्त  'भुखमरी ' को समाप्त होने में अभी बहुत लम्बा समय लगेगा। हमारे देश के बहुत से राज्यों में यह बढ़ रही है। भारत में २३ करोड़ मनुष्य कुपोषण के शिकार हैं। दीर्घ दिनों तक खाली पेट रहने से गंभीर तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न हो जातीं हैं, जिसके कारण अक्सर मौत भी हो जाती है। किन्तु ' लाल-फीता शाही ' इस मौत को, कभी - भूख से हुई मौत को नहीं मानती है; वे कहते हैं, यहाँ (झारखण्ड ) की आदिवासी- दरिद्र जनता को क्या कहना चाहिये यह पता नहीं है, जंगल के जहरीले जड़ी-बूटी या गुठली खाने से मौतें होती हैं।

किन्तु क्या हम लोग, भारत की सामान्य जनता - देश की युवा शक्ति इस सीधी सी सच्चाई भी नहीं देख सकते ? वैश्विक भूख सूचकांक ( Global Hunger Index ) में शामिल ११९ देशों की सूचि में भारत ९४ वें क्रम में है। विश्व खाद्य परियोजना(World Food Program)द्वारा जारी " वर्ष २००९ के ग्रामीण भारत में खाद्य-असुरक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट-( The State of Food Insecurity in Rural report 2009) में- न्यून-पोषित मनुष्यों की बढती हुई संख्या, गरीबग्रामीण-जनता की क्रय शक्ति (Purchasing Power) में ह्रास, खाद्य सामग्रियों के कीमतों में वृद्धि, बढती हुई बेरोजगारी की ' विकट-संकटावस्था ' को चित्रित किया गया है ।  
इस रिपोर्ट में कहा गया है-" दक्षिण एशिया में न्यून -पोषित (undernourished) मनुष्यों की संख्या में अभी तक हुई वृद्धि का सर्वाधिक अंशदान भारत में खाद्य एवं पौष्टिक-आहार सुरक्षा की स्थिति में बदलाव के कारण रहा है। " एक अग्रणी आर्थिक समाचार पत्र का रिपोर्ट है- "समालोचकों का कहना है कि उच्च आर्थिक विकास दर (High growth rates) केवल IT outsourcing तथा दूरसंचार (Telecommunications) जैसे कुछ अद्यौगिक एवं सेवा क्षेत्रों तक ही सीमित है; जबकि ग्रामीण भारतीय अर्थव्यवस्था में केवल २% के दर से वृद्धि हो रही है।
उनका यह भी कहना है कि पौष्टिक-खुराक योजनायें (Feeding Schemes) गाँवों कि गरीब जनता तक पहुँचने के पहले ही अक्सर कुछ भ्रष्ट राजनीतिज्ञों तथा नौकरशाहों के लूट की शिकार हो जातीं हैं। ' इस वर्ष हमलोग जब स्वाधीनता दिवस  मना रहे थे, तब आधा भारत घोर सूखे की चपेट में था। हमारे जो देश वासी सर्वाधिक कष्ट झेलने के लिए मजबूर हैं, उनकेलिए किसका ह्रदय रोता है ? और कब तक देश में इस प्रकार लूट-खसोट जारी रखने की अनुमति दीजायेगी ? कब तक ?

जबकि हमारा देश उच्च विकास दर को पाने की दिशा में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है, क्या स्वाधीनभारत के करोड़ो मनुष्यों के लिए दोनों शाम बिना रोटी, बिना पीने का पानी, बिना स्वास्थ्यकर-शौचालय (Hygienic toilet), बिना चिकित्सा सुविधा , तथा बहुत थोड़ी सी वह भी घटिया स्तर की प्राथमिक शिक्षा के साथ- जीना ही उनकी नियति बनी रहेगी ? क्या हम लोग स्वतंत्र हैं ? क्या हमलोग स्वतंत्रता के अर्थ और महत्व को समझते भी हैं ?
" हे भारत के युवाओं ! एक बार फ़िर - उठ कर खड़े हो जाओ ! सारी जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले लो ! और इस बात को अच्छीतरह से जान लो, कि भारत कि साधारण जनता के दुःख-दर्द को अपने ह्रदय में महसूस कर उसको दूर हटाने के लिए उच्चतम प्रयास करने वाला, तुम्हारे सिवा और दूसरा कोई मनुष्य शायद ही कहीं है। इससम्बन्ध में तुम्हारी ओर से दिखाई गई थोड़ी भी सुस्ती या लापरवाही देश के भविष्य को संकट में डालदेगा।
आज यदि स्वामी विवेकानन्द आज शरीर में रहते तो तुमसे यही कहते कि," उत्साह कि अग्नि से ह्रदय को भर लो और देश के कोने-कोने तक फ़ैल जाओ। " केवल युवाओं के भीतर रहने वाला अनम्य और हठीला (Uncompromising) जीवन-व्रत (missionary zeal) ही उन भारतवासियों के लिए भी एक उज्जवल भविष्य का निर्माण कर सकता है, जिन्हें आजतक सुख-आराम को देखने का अवसर नहीं मिला है।पहले अपने जीवन का गठन करो ! अपने चरित्र को सुंदर ढंग से गढो ! विध्वंषक नहीं, किन्तु ओजस्वी मनोभाव धारण करो। युवा-उत्साह और स्फूर्ति कि अग्नि से भारत के पुनर्निमाण के लिए कार्य करो ! कोई भी शक्ति अब हमे सफल होने से रोक नहीं सकती ! "