*परिच्छेद ~ १२२*
(१)
सुरेन्द्र की भक्ति। गीता
आज विजयादशमी है । 18 अक्टूबर,1885। श्रीरामकृष्ण श्यामपुकुर वाले मकान में हैं । शरीर अस्वस्थ रहता है, कलकत्ते में चिकित्सा कराने के लिए आये हैं । भक्तगण निरन्तर रहते और उनकी सेवा किया करते हैं । भक्तों में से अभी तक किसी ने संसार का त्याग नहीं किया । वे लोग अपने घर से आया-जाया करते हैं ।
जाड़े का मौसम है, सबेरे आठ बजे का समय है । श्रीरामकृष्ण अस्वस्थ हैं, बिस्तर पर बैठे हुए हैं, जैसे पाँच वर्ष का बालक जो माता के सिवा और कुछ नहीं जानता । सुरेन्द्र आये और आसन ग्रहण किया । नवगोपाल, मास्टर तथा और भी कई लोग उपस्थित हैं । सुरेन्द्र के यहाँ दुर्गापूजा हुई थी । श्रीरामकृष्ण नहीं जा सके; भक्तों को प्रतिमा के दर्शन करने के लिए भेजा था । आज विजयादशमी है, इसीलिए सुरेन्द्र का मन कुछ उदास है ।
सुरेन्द्र - मैं घर से भाग आया ।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - प्रतिमा पानी में डाल दी गयी तो क्या, माँ बस हृदय में विराजती रहें ।
सुरेन्द्र ‘माँ माँ’ करके जगदीश्वरी के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहने लगे । श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र को देखते हुए आँसू बहाने लगे । मास्टर की ओर देखकर गद्गद स्वर से कहने लगे, “अहा ! कैसी भक्ति है ! ईश्वर के लिए कैसा अगाध प्रेम !”
श्रीरामकृष्ण - कल साढ़े सात बजे के लगभग मैने देखा, तुम्हारे दालान में श्रीदेवीप्रतिमा है, चारों ओर ज्योति हो ज्योति है । सब एकाकार हो गया है - यह और वह । दोनों जगह के बीच मानो ज्योति की एक तरंग बह रही है - इस घर से तुम्हारे उस घर तक ।
सुरेन्द्र - उस समय मैं देवोजीवाले दालान में खड़ा हुआ “माँ माँ” कहकर उन्हें पुकार रहा था । मेरे भाई मुझे छोड़कर ऊपर चले गये थे । मेरे मन में ऐसा जान पड़ा कि माँ कह रही हैं, ‘मैं फिर आऊँगी ।’
दिन के ग्यारह बजे का समय है । श्रीरामकृष्ण को पथ्य दिया गया । मणि मुँह धुलाने के लिए उनके हाथों पर पानी डाल रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) - चने की दाल खाकर राखाल कुछ अस्वस्थ है । आहार सात्विक करना अच्छा है । तुमने गीता में नहीं देखा ? क्या तुम गीता नहीं पढ़ते ?
मणि - जी हाँ, युक्ताहार (भोजन में संयम) की बातें हैं । सात्विक आहार, राजसिक आहार और तामसिक आहार; और सात्त्विक दया, राजसिक दया और तामसिक दया भी हैं । सात्विक अहं आदि सब है ।
श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे पास गीता है ?
मणि - जी हाँ, है ।
श्रीरामकृष्ण - उसमें सब शास्त्रों का सार है ।
मणि - जी हाँ, ईश्वर को अनेक प्रकार से देखने की बातें लिखी हैं; आप जैसा कहते हैं, अनेक मार्गों से उनके पास जाना; ज्ञान, भक्ति, कर्म, ध्यान आदि अनेक मार्गों से ।
श्रीरामकृष्ण - कर्मयोग का अर्थ जानते हो ? सब कर्मों का फल ईश्वर को समर्पण कर देना ।
मणि - जी हाँ, मैंने देखा है । गीता में लिखा है, कर्म भी तीन तरह से किये जा सकते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - किस किस तरह से ?
मणि – प्रथम, ज्ञान के लिए । दूसरा, लोक-शिक्षा के लिए । तीसरा, स्वभाववश ।
(२)
[(18 अक्टूबर, 1885) श्री रामकृष्ण वचनामृत-122]
🔱🙏श्रीरामकृष्ण तथा अवतारवाद🔱🙏
श्रीरामकृष्ण मास्टर से डाक्टर सरकार की बातें कह रहे हैं । पहले दिन मास्टर श्रीरामकृष्ण का हाल लेकर डाक्टर सरकार के पास गये थे ।
श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे साथ क्या-क्या बातें हुई ?
मास्टर - डाक्टर के यहाँ बहुत सी पुस्तकें हैं । मैं वहाँ बैठा हुआ एक पुस्तक पढ़ रहा था । उसी से कुछ अंश पढ़कर डाक्टर को सुनाने लगा । सर हम्फ्री डेवी की पुस्तक है । उसमें अवतार की आवश्यकता पर लिखा गया है ।
श्रीरामकृष्ण – हाँ ? तुमने क्या कहा था ?
मास्टर - उसमें एक बात यह है कि ईश्वर की वाणी [महावाक्य] आदमी के भीतर से होकर बिना आये मनुष्य उसे समझ नहीं सकते । इसीलिए अवतार (या नेता) की आवश्यकता है ।
श्रीरामकृष्ण – वाह! ये सब तो बड़ी अच्छी बातें हैं ।
मास्टर - लेखक ने उपमा दी है कि सूर्य की ओर कोई देख नहीं सकता, परन्तु सूर्य की किरणें जिस जगह पर पड़ती है (Reflected Rays) वहाँ लोग देख सकते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - यह तो बड़ी अच्छी बात है, कुछ और है ?
मास्टर - एक दूसरी जगह लिखा था, यथार्थ ज्ञान विश्वास है ।
श्रीरामकृष्ण - ये तो बहुत सुन्दर बातें है । विश्वास हुआ तब तो सब कुछ हो गया ।
मास्टर - लेखक ने स्वप्न में रोमन देव-देवियों को देखा था ।
श्रीरामकृष्ण - क्या इस तरह की पुस्तकें निकल रही हैं ? ऐसी जगह वे ही (ईश्वर) काम कर रहे हैं। और भी कोई बात हुई ?
मास्टर - वे लोग कहते हैं, हम संसार का उपकार करेंगे । तब मैंने आपकी बात कही ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - कौनसी बात ?
मास्टर - शम्भु मल्लिक-वाली बात । उसने आपसे कहा था, ‘मेरी इच्छा होती है कि रुपये लगाकर कुछ अस्पताल और दवाखाने, स्कूल आदि बनवा दूँ । इससे बहुतों का उपकार होगा ।’ आपने उससे कहा था, ‘अगर ईश्वर सामने आये तो क्या तुम कहोगे, मेरे लिए कुछ अस्पताल, दवाखाने और स्कूल बनवा दो ?’ एक बात मैंने और कही थी ।
श्रीरामकृष्ण - जो कर्म करने के लिए आते हैं उनका दर्जा अलग है । हाँ, कौनसी बात ?
मास्टर – मैंने कहा, ‘यदि आपका उद्देश्य श्रीकाली की मूर्ति का दर्शन करना है तो सड़क के किनारे खड़े होकर गरीबों को भीख बाँटने में ही अपना सब समय लगा देने से क्या लाभ होगा ? पहले आप किसी प्रकार मूर्ति के दर्शन कर लें । फिर जी भर के भीख दें !’
श्रीरामकृष्ण - और भी कोई बात हुई ?
मास्टर - आपके पास जो लोग आते हैं, उनमें बहुतों ने काम को जीत लिया है, यह बात हुई । डाक्टर ने कहा, ‘मेरा भी कामभाव दूर हो गया है, इतना समझ लेना ।’ मैंने कहा, ‘आप तो बड़े आदमी हैं । आपने काम को जीत लिया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । क्षुद्र प्राणियों में भी, उनके पास रहकर, इन्द्रियों को जीतने की शक्ति आ रही है, यही आश्चर्य है ।’ फिर मैंने वह बात कही जो आपने गिरीश घोष से कही थी ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - क्या कहा था ?
मास्टर- आपने गिरीश घोष से कहा था, ‘डाक्टर तुमसे ऊँचे नहीं चढ़ सका ।’ वही अवतार वाली बात ।
श्रीरामकृष्ण - अवतार की बात उससे (डाक्टर से) कहना । अवतार वे हैं जो तारते हैं । इस तरह दस अवतार हैं, चौबीस अवतार है और असंख्य अवतार भी हैं ।
मास्टर - गिरीश घोष की वे (डा. सरकार) खूब खबर रखते हैं । यही पूछते रहे कि गिरीश घोष ने क्या बिलकुल शराब पीना छोड़ दिया ? उन पर खूब नजर है ।
श्रीरामकृष्ण - क्या गिरीश घोष से यह बात तुमने कही थी ?
मास्टर - जी हाँ, कही थी, और बिलकुल शराब छोड़नेवाली बात भी ।
श्रीरामकृष्ण - उसने क्या कहा ?
मास्टर - उन्होंने कहा, ‘तुम लोग जब कह रहे हो, तो इस दशा में इसे श्रीरामकृष्ण की बात समझकर मान लेता हूँ - परन्तु मैं स्वयं अब जोर देकर कोई बात न कहूँगा ।’
श्रीरामकृष्ण - (आनन्दपूर्वक) - कालीपद ने कहा है, उसने एकदम शराब पीना छोड़ दिया है ।
(३)
[(18 अक्टूबर, 1885) श्री रामकृष्ण वचनामृत-122]
* नित्य-लीला-योग*
दिन का पिछला पहर है, डाक्टर आये हुये हैं । अमृत (डाक्टर के लड़के) और हेम भी डाक्टर के साथ आये हैं । नरेन्द्र आदि भक्त भी उपस्थित हैं । श्रीरामकृष्ण एकान्त में अमृत के साथ बातचीत कर रहे हैं । पूछ रहे हैं, ‘क्या तुम्हें ध्यान जमता है?’ और कह रहे हैं, ‘क्या जानते हो, ध्यान की अवस्था कैसी होती है ? मन तैलधारा की तरह हो जाता है । ईश्वर की ही चिन्ता रह जाती है । उसमें कोई दूसरी चिन्ता नहीं आती ।’ अब श्रीरामकृष्ण दूसरों से बातचीत कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण (डाक्टर से) - तुम्हारा लड़का अवतार नहीं मानता । यह अच्छी बात है । नहीं मानता तो न सही ।
“तुम्हारा लड़का बड़ा अच्छा है । और होगा भी क्यों नहीं ? बम्बई-आम के पेड़ में कभी खट्टे आम भी लगते हैं ? ईश्वर पर उसका कैसा विश्वास है ! ईश्वर पर जिसका मन है, आदमी तो बस वही है। मनुष्य और मन-होश । जिसमें होश है - चैतन्य है, जो निश्चयपूर्वक जानता है कि ईश्वर सत्य हैं और सब अनित्य, वही वास्तव में मनुष्य है । अवतार नहीं मानता तो इसमें क्या दोष ?
‘ईश्वर हैं, यह सम्पूर्ण जीव-जगत् उनका ऐश्वर्य है, ‘इसे मानने से ही हो गया । - जैसे कोई बड़ा आदमी और उसका बगीचा ।
“बात यह है कि दस अवतार हैं, चौबीस अवतार हैं और फिर असंख्य अवतार भी हैं । जहाँ कहीं उनकी शक्ति का विशेष प्रकाश है, वहीं अवतार हैं । मेरा यही मत है ।
“एक बात और है, जो कुछ देख रहे हो यह सब वे ही हुए हैं । - जैसे बेल के बीज, खोपड़ा, गूदा, तीनों को मिलाकर एक बेल है । जिनकी नित्यता है, उन्हीं की लीला भी है । नित्य को छोड़कर केवल लीला समझ में नहीं आती। लीला के रहने के कारण ही, लीला को छोड़-छोड़कर लोग नित्य में जाया करते हैं ।
"जब तक 'अहं बुद्धि' रहती है तब तक लीला के परे मनुष्य नहीं जा सकता । ‘नेति नेति’ करके ध्यान-योग द्वारा नित्य में लोग पहुँच सकते हैं, परन्तु कुछ भी छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि यह सब वे ही हुए हैं - जैसा मैंने कहा – बेल ।”
डाक्टर - बहुत ठीक है ।
श्रीरामकृष्ण - कचदेव निर्विकल्प समाधि में थे । जब समाधि छूटी तब एक ने पूछा, ‘आप इस समय क्या देखते हैं ?’ कचदेव ने कहा, ‘मैं देख रहा हूँ, संसार मानो उनसे मिला हुआ है । वे ही पूर्ण हैं । जो कुछ देख रहा हूँ, सब वे ही हुए हैं । इसमें से क्या छोडूँ और क्या पकडूँ, कुछ समझ में नहीं आता ।’
[कच # पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार देवताओं के गुरु बृहस्पति के पुत्र थे। इन्होंने दैत्य गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त की थी।]
“बात यह है कि नित्य (निराकार-सच्चिदानन्द) और लीला (साकार-श्रीरामकृष्ण) का दर्शन करके दास-भाव में रहना चाहिए । हनुमान ने साकार और निराकार दोनों का साक्षात्कार किया था । इसके बाद, दास-भाव से - भक्त के भाव से रहे थे।”
मणि (स्वगत) - नित्य और लीला, दोनों को लेना होगा । जर्मनी में वेदान्त के प्रवेश के समय से यूरोपीय पण्डितों में भी किसी किसी का मत ऐसा ही है; परन्तु श्रीरामकृष्ण ने तो कहा है कि सम्पूर्ण रूप से त्याग – कामिनी-कांचन का त्याग - हुए बिना नित्य और लीला का साक्षात्कार नहीं होता । सच्चे साधक को ठीक ठीक त्यागी, सम्पूर्ण अनासक्त होना चाहिए । यहीं पर उनमें तथा हेगल जैसे यूरोपीय पण्डितों में भेद है ।
(४)
[(18 अक्टूबर, 1885) श्री रामकृष्ण वचनामृत-122]
*श्रीरामकृष्ण तथा ज्ञानयोग*
डाक्टर कह रहे है, ‘ईश्वर ने हमारी सृष्टि की है, और हम सब लोगों की आत्माएँ अनन्त उन्नति करेंगी ।’ वे यह मानने के लिए राजी नहीं कि एक आदमी किसी दूसरे आदमी से बड़ा है । इसीलिए वे अवतार नहीं मानते ।
डाक्टर - अनन्त उन्नति । यह अगर न हो तो पाँच-सात वर्ष और बचकर क्या होगा ? इससे तो मैं गले में रस्सी की फाँसी लगाकर मर जाना बेहतर समझता हूँ !
“अवतार फिर है क्या ? जो मनुष्य शौच जाता है - पेशाब करता है, उसके पैरों सिर झुकाऊँ ! हाँ, परन्तु यह मानता हूँ कि मनुष्य में ईश्वर की ज्योति प्रतिबिम्बित होती है ।”
गिरीश (हँसकर) - आपने ईश्वरी ज्योति कभी देखी नहीं –
डाक्टर उत्तर देने से पहले कुछ इधर-उधर करने लगे । पास ही एक मित्र बैठे हुए थे - धीरे धीरे उन्होंने कुछ कहा ।
डाक्टर (गिरीश के प्रति) - आपने भी तो प्रतिबिम्ब के सिवा और कुछ नहीं देखा ।
गिरीश - मैं देखता हूँ ! वह ज्योति में देखता हूँ ! श्रीकृष्ण अवतार हैं, यह मैं प्रमाणित कर दूँगा, नहीं तो अपनी जीभ काटकर फेंक दूँगा !
श्रीरामकृष्ण - यह सब जो बातचीत हो रही है, कुछ भी नहीं है । यह सब सन्नीपात-ग्रस्त रोगी की बकवाद है ।
“विकार के रोगी ने कहा था, ‘मैं घड़ा भर पानी पिऊँगा, हण्डी भर भात खाऊँगा ।’ वैद्य ने कहा, ‘अच्छा, खाना तब खाना । अच्छे हो जाने के बाद जो कुछ तू कहेगा, वैसा ही किया जायगा ।’
“जब घी कच्चा रहता है, तभी तक उसमें कलकलाहट होती है । पक जाने पर फिर आवाज नहीं निकलती । जिसका जैसा मन है, वह ईश्वर को उसी तरह देखता है । मैंने देखा है, बड़े आदमी के घर में रानी की तस्बीर आदि - यह सब है और भक्तों के यहाँ देव-देवियों की तस्वीरें हैं ।
“लक्ष्मण ने कहा था, ‘हे राम, वशिष्ठदेव जैसे पुरुष को भी पुत्रों का शोक हो रहा है ।’ राम ने कहा, ‘भाई, जिसमें ज्ञान है उसमें अज्ञान भी है । जिसे उजाले का ज्ञान है, उसे अँधेरे का भी ज्ञान है । इसलिए ज्ञान और अज्ञान से परे हो जाओ ।’ ईश्वर को विशेष रूप से जान लेने पर यह अवस्था प्राप्त हो जाती है । इसे ही विज्ञान कहते हैं ।
“पैर में काँटा चुभ जाने से, उसे निकालने के लिए एक और काँटा ले आना पड़ता है । निकालने के बाद फिर दोनों काँटे फेंक दिये जाते हैं । ज्ञानरूपी काँटे से अज्ञानरूपी काँटा निकालकर, ज्ञान और अज्ञानरूपी दोनों काँटे फेंक दिये जाते हैं ।
“पूर्ण ज्ञान के कुछ लक्षण हैं । उस समय विचार बन्द हो जाता है । पहले जैसा कहा, कच्चा रहने से ही घी में कलकलाहट रहती है ।”
डाक्टर - पूर्ण ज्ञान रहता कहाँ है ? सब ईश्वर है, तो फिर आप परमहंस का काम क्यों करते हैं ? और ये लोग आकर आपकी सेवा क्यों करते हैं ? आप चुप क्यों नहीं रहते ?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - पानी स्थिर रहने पर भी पानी है, और तरंग-रूप से हिलने-डुलने पर भी वह पानी ही है ।
“एक बात और । महावत-नारायण की बात भी क्यों न मानी जाय ? गुरु ने शिष्य को समझाया था कि सब नारायण हैं । पागल हाथी आ रहा था, शिष्य गुरु की बात पर विश्वास करके वहाँ से नहीं हटा । यही सोचकर कि हाथी भी नारायण है ! महावत इधर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था, ‘सब लोग हट जाओ - रास्ते से सब हट जाओ ।’ पर शिष्य नहीं हटा । हाथी आया और उसे एक ओर फेंककर चला गया । शिष्य को बड़ी चोट लगी, केवल जान ही नहीं निकली । मुँह पर पानी के छींटे लगाने से उसे चेत हुआ । जब उससे पूछा गया कि तुम हटे क्यों नहीं, तब उसने कहा, ‘क्यों, गुरु महाराज ने तो कहा था सब नारायण हैं ।’ गुरु ने कहा, ‘बेटा, अगर ऐसा ही था तो तुमने महावत नारायण की बात क्यों नहीं मानी ? महावत भी तो नारायण हुआ ।’ वे ही शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि होकर भीतर वास करते हैं । मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री हैं । मैं घर हूँ, वे मालिक। वे (ईश्वर) ही महावतनारायण हैं ।”
डाक्टर - और एक बात कहूँगा, आप फिर मुझसे ऐसा क्यों कहते हैं- कि रोग अच्छा कर दो ?
श्रीरामकृष्ण - जब तक ‘मैं’ रूपी घट है, तभी तक ऐसा हो रहा है । सोचो, एक महासमुद्र है, ऊपर-नीचे जल से पूर्ण है । उसके भीतर एक घट है । घर के भीतर बाहर पानी है; परन्तु उसे बिना फोड़े यथार्थ में एकाकार नहीं होता । उन्हीं ने इस ‘मैं’ – घट को रख छोड़ा है ।
डाक्टर - तो यह ‘मैं’ जो आप कह रहे हैं, यह सब क्या है ? इसका भी तो अर्थ कहना होगा । क्या वे (ईश्वर) हमारे साथ कोई मजाक कर रहे हैं ?
गिरीश - (डाक्टर से) - महाशय, आपको कैसे मालूम हुआ कि वह मजाक नहीं है ?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - इस ‘मैं’ को उन्हीं ने रख छोड़ा है । उनकी क्रीड़ा – उनकी लीला !“एक राजा के चार लड़के थे । सब थे तो राजा के लड़के, परन्तु उन्हीं में कोई मन्त्री, कोई कोतवाल, इसी तरह बन-बनकर खेल रहे थे । राजकुमार (सिंह-शावक, राजा के लड़के) होकर कोतवाल का खेल !
(डाक्टर से) “सुनो, यदि तुम्हें आत्म-साक्षात्कार हो जाय तो यह सब तुम मानने लग जाओगे । उनके दर्शन से सब संशय दूर हो जाते हैं ।
डाक्टर - सब सन्देह कहाँ जाता है ?
श्रीरामकृष्ण- मेरे पास इतना ही सुन जाओ । इससे अधिक कुछ जानना चाहो तो अकेले में उनसे (ईश्वर से) कहना । उनसे पूछना, क्यों उन्होंने ऐसा किया है ।
“लड़का भिक्षुक को मुट्ठी भर चावल ही दे सकता है । अगर रेल के किराये की उसे आवश्यकता होती है, तो यह बात मालिक के कान तक पहुँचायी जाती है ।”
डाक्टर चुप हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, तुम्हें विचार प्यारा है, तो सुनो कुछ विचार करता हूँ । ज्ञानी के मत से अवतार नहीं है । कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, ‘तुम मुझे अवतार-अवतार कह रहे हो, आओ, तुम्हें एक दृश्य दिखलाऊँ ।’ अर्जुन साथ-साथ गये । कुछ दूर जाने पर कृष्ण ने पूछा, ‘क्या देखते हो?’
अर्जुन ने कहा, ‘एक बहुत बड़ा पेड़ है और उसमें गुच्छे के गुच्छे जामुन लटक रहे हैं ।’ कृष्ण ने कहा, ‘वे जामुन नहीं हैं । जरा और बढ़कर देखो ।’ तब अर्जुन ने देखा, गुच्छों में कृष्ण फले हुए थे। कृष्ण ने कहा, ‘अब देखा ? - मेरी तरह कितने कृष्ण फले हुए हैं !”
"कबीरदास ने कृष्ण की बात पर कहा था, ‘वह तो गोपियों की तालियों पर बन्दर-नाच नाचा था !’
"जितना ही बढ़ जाओगे, ईश्वर की उपाधि उतनी ही कम देखोगे । भक्त को पहले दशभुजा के दर्शन हुए । और भी बढ़कर उसने देखा, षड़भुजा देवी मूर्ति । और भी बढ़कर देखा, द्विभुज गोपाल । जितना ही बढ़ रहा है, उतना ही ऐश्वर्य घट रहा है । और भी बढ़ा तब ज्योति के दर्शन हुए - कोई उपाधि नहीं ।
“जरा वेदान्त का भी विचार सुनो । किसी राजा को एक आदमी इन्द्रजाल दिखाने के लिए आया था। उसके जरा हट जाने पर राजा ने देखा, एक सवार आ रहा है – घोड़े पर बड़े रोब-दाब से, हाथ में अस्त्र-शस्त्र लिये हुए । सभा भर के आदमी और राजा विचार करने लगे कि इसके भीतर क्या सत्य है । वह घोड़ा? तो सत्य नहीं है, वह साज-बाज ? सत्य नहीं है, वे अस्त्र-शस्त्र ? भी सत्य नहीं हैं । अन्त में सचमुच देखा, सवार ही अकेला खड़ा था और कुछ नहीं । अर्थात् ब्रह्म सत्य है, संसार मिथ्या । विचार करना चाहो तो फिर और कोई चीज नहीं टिकती ।”
डाक्टर - इसमें मेरी ओर से कोई आपत्ति नहीं ।
श्रीरामकृष्ण परन्तु यह भ्रम सहज ही दूर नहीं होता । ज्ञान के बाद भी कुछ कुछ रहता है । स्वप्न में अगर कोई बाघ देखता है तो आँख खुलने के बाद भी छाती धड़कती रहती है ।
“चोर खेत में चोरी करने के लिए गये हुए थे । वहाँ आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा कर दिया गया था, डरवाने के लिए । चोर मारे डर के घुस नहीं रहे थे । एक ने पास जाकर देखा तो केवल घास ! - आदमी के शक्ल की बाँधकर खड़ी कर दी गयी थी ।
उसने वहाँ से आकर अपने साथियों से कहा कि डरने की कोई बात नहीं । किन्तु फिर भी वे लोग मारे डर के कदम आगे नहीं बढ़ा रहे थे । कहते थे, ‘छाती धड़कती है ।’ तब जिसने पास जाकर देखा था, उसने उस गड़े हुए आकार को जमीन में सुला दिया और - कहने लगा, ‘यह कुछ नहीं है, यह कुछ नहीं हैं’ – ‘नेति’ ‘नेति’ ।”
डाक्टर - यह तो बड़ी सुन्दर बात है !
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ, कैसी बात है ?
डाक्टर - बड़ी सुन्दर है ।
श्रीरामकृष्ण - एक बार थैन्क यू (Thank you) भी तो कहो ।
डाक्टर - क्या आप मेरे मन का भाव नहीं समझ रहे हैं ? इतना कष्ट करके आपको यहाँ देखने के लिए आता हूँ !
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, मूर्ख के कल्याण के लिए भी तो कुछ कहो । विभीषण ने लंका का राजा होना अस्वीकृत कर दिया था, कहा था, ‘राम, मैं तुम्हें जब पा गया तो अब राज्य से क्या काम ?’ राम ने कहा, "विभीषण, तुम मूर्खों के लिए राजा बनो । जो लोग कह रहे हैं, ‘तुमने राम की इतनी सेवा की, परन्तु तुम्हें ऐश्वर्य क्या मिला ?’- उनकी शिक्षा के लिए तुम राजा बनो ।”
डाक्टर - यहाँ उस तरह का मूर्ख है कौन ?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, यहाँ शंख भी हैं और शम्बुक भी है ! (सब हँसते हैं)
(५)
[(18 अक्टूबर, 1885) श्री रामकृष्ण वचनामृत-122]
*डाक्टर के प्रति उपदेश
डाक्टर सरकार होमियोपैथी के डॉक्टर थे, उन्होंने श्रीरामकृष्ण के लिए दवा दी, दो प्रकार की छोटी गोलियाँ (globules) , कहने लगे, ‘ये गोलियाँ दी हैं - पुरुष और प्रकृति !’ (सब हँसते हैं)
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ, पुरुष और प्रकृति एक ही साथ रहते हैं । तुमने कबूतरों को नहीं देखा? नर तथा मादी अलग नहीं रह सकते । जहाँ पुरुष है, वहीं प्रकृति भी है । जहाँ प्रकृति है, वहीं पुरुष भी है ।
आज विजयादशमी है । श्रीरामकृष्ण ने डाक्टर से कुछ मिष्टान्न खाने के लिए कहा । भक्तगण मिष्टान लाकर देने लगे ।
डाक्टर (खाते हुए) - भोजन के लिए थैन्क यू (Thank you) कहता हूँ; आपने जो ऐसा उपेदश दिया, उसके लिए नहीं । वह थैन्क यू मुँह से क्यों निकाला जाय ?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - उनमें मन रखना । और क्या कहूँ, और थोड़ी थोड़ी देर के लिए ध्यान करना । (छोटे नरेन्द्र को दिखलाकर) देखो, इसका मन ईश्वर में बिलकुल लीन हो जाता है । जो सब बातें तुमसे कही गयी थीं –
डाक्टर - अब इन लोगों से कहिये ।
श्रीरामकृष्ण - जिसे जैसा सह्य है उसके लिए वैसी ही व्यवस्था की जाती है । वे सब बातें ये सब लोग~ क्या कभी समझ सकते हैं ? तुमसे कही गयी थीं, वह और बात है । लड़के को जो भोजन रुचता है और जो उसे सह्य है वही भोजन उसके लिए माँ पकाती है। (सब हँसते हैं)
डाक्टर चले गये । विजया के उपलक्ष्य में सब भक्तों ने श्रीरामकृष्ण को साष्टांग प्रणाम करके उनके पैरों की धूल लेकर सिर से लगायी । फिर एक दूसरे को सप्रेम भेंटने लगे । आनन्द की मानो सीमा नहीं रहीं । श्रीरामकृष्ण को इतनी सख्त बीमारी है, परन्तु वे जैसे सब भूल गये हों । प्रेमालिंगन और मिष्टान्न भोजन बड़ी देर तक चल रहा है । श्रीरामकृष्ण के पास छोटे नरेन्द्र, मास्टर तथा दो-चार भक्त और बैठे हुए हैं । श्रीरामकृष्ण आनन्द से बातचीत कर रहे हैं । डाक्टर के बारे में बातचीत होने लगी ।
श्रीरामकृष्ण - डाक्टर को और अधिक कुछ कहना न होगा । पेड़ का काटना जब समाप्त हो आता है तब जो आदमी काटता है वह जरा हटकर खड़ा हो जाता है । कुछ देर बाद पेड़ आप ही गिर जाता है ।
(मास्टर से) “डाक्टर बहुत बदल गया है ।”
मास्टर - जी हाँ ! यहाँ आने पर उसकी अक्ल ही मारी जाती है । क्या दवा दी जानी चाहिए, इसकी बात ही नहीं उठाते । हम लोग जब याद दिलाते हैं, तब कहते हैं – ‘हाँ-हाँ, दवा देनी है ।’
बैठकखाने में कोई कोई भक्त गा रहे थे । श्रीरामकृष्ण जिस कमरे में हैं, उसी में सब के आने पर श्रीरामकृष्ण कहने लगे - “तुम सब गा रहे थे - ताल ठीक क्यों नहीं रहता था ? कोई एक बेतालसिद्ध था - यह भी वैसी ही बात हुई !” (सब हंसते हैं)
छोटे नरेन्द्र का आत्मीय एक लड़का आया हुआ है । खूब भड़कीली पोशाक पहने और नाक पर चश्मा लगाये । श्रीरामकृष्ण छोटे नरेन्द्र से बातचीत कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - देखो, इसी रास्ते से एक जवान आदमी जा रहा था । उसकी कमीज की आस्तीनों में ‘प्लेट’ पड़ी थी । उसके चलने का ढंग भी कैसा था ! रह-रहकर वह चादर हटाकर अपनी कमीज दिखाता था और इधर-उधर देखता था कि कोई उसकी कमीज देखता भी है या नहीं ! परन्तु जब वह चलता था तो साफ मालूम हो जाता था कि उसके पैर टेढ़े हैं ! मोर अपने पंख तो दिखलाता है, पर उसके पैर बड़े गन्दे होते हैं । इसी प्रकार ऊँट भी बड़ा भद्दा होता है, उसके सब अंग कुत्सित होते हैं ।
नरेन्द्र का आत्मीय - परन्तु आचरण अच्छे होते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा है, परन्तु ऊँट कंटीली घास खाता है - मुख से धर-धर खून गिरता है, फिर भी वही घास खाता जाता है । आँख के सामने लड़का मरा, फिर भी संसारी ‘लड़का-लड़का’ की ही रट लगाये रहता है ।
======