Thursday, October 27, 2016

'स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना ' [8] " स्वामीजी का आदर्श -अन्तर्निहित शक्ति का उद्घाटन " (व्यक्ति और मन ),

 'बनना और बनाना' - आपस में अभिन्न और अवियोज्य रूप से सम्बद्ध हैं।
स्वामी विवेकानन्द के महान व्यक्तित्व-सम्पन्न जीवन एवं संदेशों के विशाल भण्डार के समक्ष खड़े होते ही, मन में स्वतः यह प्रश्न उठने लगता है, कि स्वामीजी ने हमलोगों के सामने कौन सा आदर्श प्रस्तुत किया था? महापुरुषों के मन, वचन एवं कर्म में समरूपता रहती है। अतएव स्वामीजी के आदर्श को समझने के लिये हमलोगों को उनके विचारों, संदेशों तथा उनके कर्ममय जीवन को समानरूप से देखने-समझने की चेष्टा करनी होगी।
स्वामीजी के विचार बहु आयामी दिशा में धावित हुए थे,और उन्होंने मनुष्य-जीवन के प्रत्येक पहलु का बहुत सूक्ष्म अवलोकन किया था। जिसके फलस्वरूप उनके वास्तविक 'विवेकज-ज्ञान' के समक्ष  मनुष्य के विषय में स्पष्ट अवधारणा अनावृत (Exposed उद्घाटित) हो उठी थी।  इसिलिए उन्होंने अपनी वाणी के द्वारा मानव-मात्र के कल्याण के लिए मनुष्य-जीवन को सार्थक करने के सन्देशों का वितरण किया था। और अपने जीवन के माध्यम से उन्होंने यही दिखाने का प्रयास किया है कि कोई व्यक्ति उस पूर्णत्व की अभिव्यक्ति को कैसे संभव बना सकता है। इसीलिये उनके संदेशों के समान उनका जीवन भी हमलोगों के लिये एक आदर्श है।
बिल्कुल किसी नए ब्रांड का आविष्कार और उसे प्रस्थापित करने के मोह में पड़े बिना, जैसा एकमात्र सर्वश्रष्ठ आदर्श मानव-जीवन के लिये होना उचित है, उसे न समझ पाने के प्रति शंका, अश्रद्धा,उपेक्षा किये बिना, उसी का प्रचार स्वामी जी ने बिल्कुल निर्भय और निःसंकोच होकर  किया है। उनका कहना था कि- कोई मौलिक आदर्श, समाज के सामने अपना सिर नहीं झुकाएगा, बल्कि समाज को ही आदर्श (Ideal) के सम्मुख अपना सिर झुकाना होगा। और समाज जितनी जल्दी वैसा करने लगेगा,समाज का उतना ही अधिक कल्याण होगा। 
स्वामीजी के मतानुसार - वही समाज श्रेष्ठ समाज है, जिस समाज में श्रेष्ठ आदर्श को कार्यरूप देना संभव है। उन्हीं के शब्दों में तथा बहुत संक्षेप में उनके इस महान आदर्श को -'BE AND MAKE'! के द्वारा, अर्थात "मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ" के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है।   यह 'बनना और बनाना' - आपस में अभिन्न और अविभाज्य (जो अलग न हो सके ) रूप से सम्बद्ध हैं। विवेकानन्द कहते हैं,"मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े से शब्दों में कहा जा सकता है और वह है- मनुष्यजाति को उसके दिव्य स्वरुप का उपदेश देना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे प्रकट करने का उपाय बताना। " (माई आइडियल, इन्डिड, कैन बी पुट इन्टु अ फ्यू वर्ड्स, ऐंड  दैट इज टु प्रीच अन्टू मैनकाइंड देयर डिविनिटी, एंड हाउ टु मेक इट मेनिफेस्ट इन एव्री मूवमेन्ट ऑफ़ लाइफ। ) 
उनके इस आदर्श ' Be and Make ' को समझने की चेष्टा करने पर  सबसे पहले जिस बात पर दृष्टि जाती है, वह यह है कि - स्वामीजी ने मात्र किसी तात्विक-आदर्श की बात ही नहीं कही थी , बल्कि उस ज्ञान के व्यवहारिक उपयोग पर भी, साथ ही साथ अपना मन्तव्य स्पष्ट कर दिया था। क्योंकि, वैसा आदर्श जिसे अपने दैनंदिन जीवन में अपनाना ही संभव नहीं हो, तो उसे 'आदर्श' के नाम से पुकारना भी उचित नहीं है।  
 स्वामीजी ने जिस आदर्श को हमारे सामने प्रस्तुत किया था, वह जीवन के किसी एक क्षेत्र-विशेष का आदर्श नहीं है, बल्कि वह तो समग्र जीवन के लिए आदर्श है। यह आदर्श हमारे व्यक्ति-जीवन, सामाजिक-जीवन, राष्ट्रिय जीवन, एवं अन्तर्राष्ट्रीय जीवन --अर्थात व्यक्ति और सामाज जीवन के सभी क्षेत्रों में व्यवहारोपयोगी है। कई बार धर्म, राजनीति, अर्थनीति, न्याय-नीति, पारस्परिक सम्बन्ध (correlation) आदि विभिन्न क्षेत्रों में, हमलोग अलग अलग आदर्शों (मानकों) को प्रतिष्ठित होते देखते हैं। किन्तु जब किसी मनुष्य के जीवन में विभिन्न क्षेत्रों के सभी आदर्श किसी एक महत्तर और मूल आदर्श (मानदण्ड) के अनुरूप नहीं होते, उस समय उसके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में एक प्रकार का अन्तर्विरोध दिखाई देने लगता है। तथा कोई एक ही मनुष्य, जो अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के साथ विभिन्न रूपों में जुड़ा होता है, उसके जीवन और विविध आदर्शों (मापदण्डों ) में समन्वय का अभाव होने के कारण, एक प्रकार का संकट उपस्थित हो जाता है। इसीलिये चाहे कोई व्यक्ति हो या समाज, उसके निर्विघ्न प्रगति के लिये किसी मौलिक आदर्श (Archetype-आद्यरूप) का रहना आवश्यक हो जाता है। 
यदि वह आद्यरूप आदर्श, जो जीवन का केन्द्रबिन्दु है -- ऐसे किसी सत्य पर प्रतिष्ठित हो; तभी वह आदर्श जीवन का सर्वांगीन कल्याण करने में सक्षम होता है। स्वामीजी ने उसी प्रकार के एक केन्द्रीय सत्य या तत्व के प्रति  हमारी दृष्टि को आकर्षित कराया है, तथा उसी को जीवन के समस्त क्षेत्र-विशेष के मापदण्डों का नियामक के रूप में ग्रहण करने का परामर्श दिया है। वह केन्द्रीय सत्य या तत्व है - अनन्त ज्ञान, और अनन्त शक्ति, जो जाति-धर्म, वर्ण-लिंग-आदि भेद होने पर भी; प्रत्येक मनुष्य में अंतर्निहित है ! किन्तु जब तक मानवमात्र में अंतर्निहित इस 'डिविनिटी' (पूर्णता) के प्रति, हमलोगों में अटूट-विश्वास उत्पन्न नहीं हो जाता; तब तक- अपने मन से किसी वैसे मापदण्ड का आविष्कार करके, जो इस मौलिक तत्व में प्रतिष्ठित नहीं हो, किन्तु उसी को अपने जीवन के किसी क्षेत्र-विशेष का आदर्श मानकर, उसका अनुसरण क्यों न करते रहें, अस्थाई रूप से उस क्षेत्र-विषय में थोड़ी-बहुत प्रगति होने से भी, उस आदर्श के द्वारा मनुष्य को कभी उसकी पूर्णता में या उसकी स्व-महिमा में प्रतिष्ठित नहीं कराया जा सकता। अर्थात तब तक हमलोग यह नहीं कह सकते कि हमने (जीवन-गठन के लिए) किसी सच्चे आदर्श (मापदण्ड) का अनुसन्धान कर लिया है।
अतः हमारे जीवन का मुख्य कार्य क्या होना चाहिये ? यही कि, यह जो जीवन का मूल तत्व, या मौलिक सत्य है (कि प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, इसी विवेक-प्रयोग की शक्ति) को अपने जीवन के प्रत्येक कर्म में, प्रत्येक अभिव्यक्ति में, प्रत्येक परीक्षण (Experiment) में प्रकट करना। हम इस बात को आसानी से समझ सकते हैं कि वह तत्व मनुष्य की अविनाशी सत्ता 'आत्मा' के उपर प्रतिष्ठित है, तथा वह कभी देश-काल (या नाम-रूपात्मक प्रपंच) में परिवर्तित हो जाने वाली वस्तु नहीं है। चाहे कोई मनुष्य पश्चमी गोलार्ध का हो, या पूर्वी गोलार्ध का हो, मनुष्य की सत्ता जो पहले थी, वही आज भी है। अतः यह तर्क देना कि स्वामीजी द्वारा प्रस्तुत यह मानक -'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है' - आज के युग में उपयोगी है या नहीं, बिलकुल अप्रासंगिक है। इस प्रकार के केन्द्रीय-सत्य में प्रतिष्ठित एक आदर्श (मानक) के साथ, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के छोटे छोटे आदर्श भी संयुक्त हो जाने के बाद, भले ही शाश्वत न हों, किन्तु दीर्घ काल तक प्रभावी बने रहेंगे। क्योंकि देश और युग (काल) की आवश्यकता के अनुसार साधारण परिवर्तन-सापेक्ष आदर्श (राम से रामकृष्ण, नवनी दा बनने पर भी) होने पर भी उनका मुख्य लक्ष्य रहेगा- मनुष्य में अन्तर्निहित 'पूर्णत्व '- अनन्त ज्ञान और शक्ति को प्रस्फुटित करने में सहायता करना। ऐसा होने से ही, विभिन्न क्षेत्रों के आदर्शों में सच्ची सहमति बनी रहेगी, तथा परस्पर पूरक के रूप में कार्य करते हुए, प्रत्येक क्षेत्र से जीवन को पूर्णत्व की दिशा में ले जायेंगे, तथा आपस में अन्तर्विरोध का भाव नहीं रहने के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र-विशेष का आदर्श कभी असफल नहीं होगा। 
इस मूलरूप आदर्श (आद्यरूप या Archetype) का सरल परिचय है- ' स्वयं मनुष्य बनने की चेष्टा करना और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करना।' क्योंकि सृष्टि और मानव-समाज के बीच एक प्रकार का अंतर्निहित एकत्व (Underlying unity) रहता है,इसीलिये कोई मनुष्य अकेले (या समाज से कट कर) अपना सुधार नहीं कर सकतामनुष्य बनने का अर्थ है- उस अन्तर्निहित सत्य या सत्ता के 'अनन्त ज्ञान, और अनन्त शक्ति का प्रकटीकरण' या उस दिव्यता की अभिव्यक्ति जिससे जीवन में पूर्णता आती हो।
इसी लक्ष्य पर अटल रहते हुए यदि मनुष्य के व्यक्तित्व को गठित किया जाय, उसके चरित्र का गठन किया जाय, शिक्षा अर्जित की जाय, और साथ ही साथ परिवार चलाने के लिये आवश्यक भोग-सामग्रियों का संग्रह भी किया जाय, तभी धीरे धीरे मनुष्य अपने यथार्थ आदर्श (मानक) में स्थित होने की ओर अग्रसर हो सकता है। इसीलिये स्वामीजी इस 'मनुष्य बनो और बनाओ' के आदर्श को ही आद्यरूप आदर्श (Archetype) कहते हैं। क्योंकि इस आदर्श का अनुसरण करने से मनुष्य का सामान्य जीवन (normal life) भी उपेक्षित नहीं होता है। किन्तु यदि कोई व्यक्ति सामान्य ढंग का किन्तु संयमित जीबन न जी कर, यदि असंयमित जीवन ही जीता रहे, लक्ष्यहीन हो, तो उसके जीवन को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचेगा। अतः प्रत्येक मनुष्य के लिए जीवन के इस 'यथार्थ मनुष्य बनने ' के लक्ष्य को, संयम को, नियम (यम-नियम) को अपने दैनंदिन जीवन में धारण करने की आवश्यकता है। और जो वस्तु हमारे जीवन को लक्ष्याभिमुखी बनाती है, उसे समग्र रूप से धारण करती है, उसे नियंत्रित करती है- उसी का नाम तो धर्म है। इसीलिये स्वामीजी (मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेता पूज्य नवनी दा) धर्म क्या है, इस बारे में बहुत प्रकार से समझाने की चेष्टा जीवन के अंतिम क्षणों तक करते रहते हैं। किन्तु उन्होंने कभी धार्मिक आचार-अनुष्ठान को ही धर्म का मूल बात नहीं कहा है। हमलोग कहीं यह भूल न कर बैठें,इसीलिये स्वामीजी अक्सर धर्म (region) की बात न कहकर आध्यात्मिकता (spirituality) की बात करते थे।
आध्यात्मिकता क्या है ? जब हमलोग मनुष्य की आत्मा को, उसके मूल तत्व को, उसमें अन्तर्निहित अनन्त ज्ञान और अनंत शक्ति को अभिव्यक्त करने की चेष्टा करते हैं, उसी को आध्यात्मिकता कहते हैं। इसीलिये स्वामीजी जब सम्पूर्ण राष्ट्र को पुनरुज्जीवित करने की बात कहते हैं, सम्पूर्ण राष्ट्र को जब जाग्रत करने की बात कहते हैं, या राष्ट्र को उन्नत बनाने की बात कहते हैं, तो सब कुछ से पहले देश को इसी आध्यात्मिकता की बाढ़ में प्लावित कर देने पर जोर देते हैं।
स्वामीजी के मन में मनुष्य-मात्र के लिये ऐसा महान आदर्श सर्वदा जाग्रत रहता था, इसीलिये अनन्त शक्ति,अनन्त ज्ञान से सम्पन्न मनुष्य को जब वे दुर्बल,असहाय, निराश, दुःख-कष्ट में गिरा देखते थे, तो उनको बहुत कष्ट पहुँचता था। मनुष्य-मात्र के प्रति अथाह ममता और सहानुभूति से भरा हृदय रहने के कारण, उसकी दुर्बल अवस्था को देखने से उनकी आँखों से अश्रु झरते थे। किन्तु स्वामीजी का वह मानव-प्रेम, इन्द्रिय-प्रकृति के दासरूपी मनुष्य के काल्पनिकआदर्श मूर्ति की आराधना नहीं थी, बल्कि सर्वशक्ति ज्ञानाधार मनुष्य के स्वराज्य-च्यूत, धूलि धूसरित किन्तु संभावनाओं से परिपूर्ण जीवन्त शरीर-मन आश्रित 'सत्ता' की पूजा करना ही स्वामी विवेकानन्द की मानवता है।
जो मनुष्य अपनी सत्ता के सम्बन्ध में सोया हुआ है, जो अपनी गरिमा के प्रति सचेत (मान-हूँश) नहीं है, अनन्त सम्भावना की खोज नहीं करता, वह स्वाभाविक रूप से स्वयं को दुर्बल सोचता है, तुच्छ समझता है।  तथा इस असहाय भाव का अतिक्रमण करने को कठिन समझकर स्वार्थ को ही परमार्थ समझने लगता है,  और स्वयं को दिनोंदिन गहरे अंधकार में निमग्न करता चला जाता है। इस स्वार्थ को त्याग करके हमलोग परमार्थ की ओर, आदर्श की ओर, पूर्णता की ओर, अनन्त शक्ति को उद्घाटित करने के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। इसीलिये स्वामीजी के मतानुसार निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है। हम लोग जिस स्वार्थपरता (नाम-रूप में आसक्ति), संकीर्णता, हीनभावना (Inferiority complex) का त्याग करते हुए, अपनी वृहत सत्ता की ओर,पूर्णता की ओर, सत्य के मार्ग पर अग्रसर होते जाते हैं, वही हमलोगों का यथार्थ त्याग है। और इसी मार्ग पर आगे बढ़ने में दूसरों की सहायता करना ही उच्च स्तर की समाज-सेवा है। हमलोग जैसे जैसे वृहत की ओर, पूर्णता की ओर, निःस्वार्थपरता की ओर, अन्तर्निहित सत्ता की ओर, परायों को भी अपना बना लेने की दिशा में हम जितना अधिक अग्रसर होते जाते हैं, उतना ही हम निर्भय होते जाते हैं,उतना ही अधिक ज्ञानालोक पाते रहते हैं, उतने ही अधिक शक्तिशाली होते जाते हैं। और हमलोगों के समस्त कार्यों में, हमलोगों की अन्तर्निहित निष्कलंक सुन्दरता, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति, उतना ही अधिक प्रस्फुटित होने लगती है। ऐसे मनुष्य के लिये कुछ भी असंभव नहीं है, कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह जाती है, नैराश्य और विषाद आदि तो कभी उसके पास भी नहीं फटकते
स्वामीजी ने दिलोजान से चाहा था, कि यह सरल किन्तु सबल विचार-धारा, प्रत्येक मनुष्य तक, ग्रामों की साधारण जनता तक, उदारता के साथ, बिना ऊँच-नीच का भेद किये वितरित किया जाय। और " एक नवीन भारत निकल पड़े- निकले हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुआ, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से। निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से। "
स्वामीजी ने चाहा था, कि हमारी शिक्षानीति ऐसी बने जिससे प्रत्येक मनुष्य अपनी अनन्त सम्भावनाओं को अभिव्यक्त करने में समर्थ हो जाये। हमारी राजनीति इतनी स्वच्छ हो, जिसमें सभी मनुष्यों को अपनी अन्तर्निहित शक्ति को जाग्रत करने का अवसर प्राप्त हो सके। सामाज-सेवा की ऐसी नीति प्रचलित हो, जिसमें ऊँच-नीच, धनी-दरिद्र, विद्वान-मूर्ख के भेद एवं समस्त प्रकार के विशेषाधिकार के दावों का अवसान हो जाये। अर्थिक-नीति में ऐसा परिवर्तन हो, जिसमें शोषण-ठगी, लूट-घोटाला समाप्त हो जाय, और हमारे प्रत्येक देशवासियों के लिये कम से कम दोनों शाम का भोजन का प्रबंध अवश्य हो जाये।
कुमारी मेरी हेल को १ नवम्बर १८९६ को लिखित एक पत्र में स्वामीजी कहते हैं, " एक ही वर्ग का व्यक्ति सदा सुख या दुःख भोगता रहे, उससे तो अच्छा है कि सुख-दुःख बारी बारी से सबों में विभक्त किया जाये। इस दुःखी संसार में सबको सुख-भोग का अवसर दो, जिससे इस तथाकथित सुख का अनुभव कर लेने के बाद,वे संसार, शासन-विधि और अन्य सब झंझटों को छोड़ कर परमात्मा के पास आ सकें। " ५/३८७  ऐसी धर्मनीति आचरित हो, जिससे कूसंस्कार दूर हो सके, धार्मिक कट्टरता समाप्त हो जाय, मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ प्रेम बढ़े, भोग में संयम रहे, परार्थता में स्वार्थ-बुद्धि हो, त्याग के महत्व का प्रचार हो, मनुष्य की सच्ची सेवा के प्रति हृदय में प्रेम का उन्मेष हो, हृदय का प्रसार हो।
स्वामीजी के आदर्श में निद्रा का स्थान नहीं है, आलस्य का स्थान नहीं है। " कायर और मूर्ख लोग ही भाग्य की दुहाई देते हैं। वीर तो सिर ऊँचा करके बोलता है- मैं स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करूँगा। " स्वामीजी का आदर्श इसी शक्ति को उद्घाटित कर देने का आदर्श है। " शक्ति ही सुख और आनन्द है, शक्ति ही अनन्त और अविनाशी जीवन है।"  ईश्वर करें, कि हमलोगों का आदर्श दीप्तिमान हो, हमारा जीवन विकसित हो, हम लोगों की शक्ति उद्घाटित हो, और हमारी शक्ति-आराधना सार्थक हो ! 
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