Saturday, February 8, 2014

क्या ईश्वर-दर्शन मस्तिष्क का भ्रम है ?

दिन वृहस्पतिवार, २४ अगस्त १८८२ : अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण का प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम : 

"  संशयात्मा विनष्यति "
मणि (श्रीम) - घर वालों के प्रति कर्तवय कब तक रहता है ?
श्रीरामकृष्ण (विवेकानन्द के गुरु)  -उन्हें भोजन-वस्त्र का अभाव न हो, सन्तान जब स्वयं समर्थ होगी, तब भार ग्रहण करने कि अवश्यकता नहीं। फल होने पर फूल नहीं रह जाता। ईश्वरलाभ हो जाने से कर्म नहीं करना पड़ता, मन भी नहीं लगता। जीवन का उद्देश्य उपार्जन नहीं, मनुष्य को ही ईश्वर जानकर उसकी सेवा करना है। धन से यदि ईश्वर की सेवा होती है, तो उस धन को कमाने में दोष नहीं है।"
मणि - अच्छा, ईश्वरलाभ ( the realization of God) के क्या माने हैं ? ईश्वरदर्शन (God-vision) किसे कहते हैं और किस तरह होते हैं ?
श्रीरामकृष्ण - जो भजन-पूजन, जप-ध्यान, नाम-गुणकीर्तन आदि करता है, वह साधक है। किन्तु जो अपने आंतरिक अनुभव से जानता है, कि ईश्वर का ही अस्तित्व है, (मेरा अस्तित्व तो सच्चिदानन्द सापेक्ष है, उनके रहने के कारण है !) वह सिद्ध है। इसको वेदान्त में एक उपमा- के द्वारा समझाया गया है, वह यह- कि घर के अँधेरे कमरे में जाकर घर के मालिक सो गए हैं।
कोई टटोलकर उन्हें खोज रहा है। पलंग पर हाथ जाता है, तो वह मन ही मन कह उठता है- यह नहीं है, खिड़की छू जाता है तो भी कह उठता है- यह नहीं है; दरवाजे में हाथ लगता है तो यह भी नहीं है, -नेति नेति नेति। अन्त में जब मालिक के देह पर हाथ लगा तो बोल पड़ता है - यह- मालिक यह हैं ! अर्थात ' अस्ति-इति ' का बोध हुआ है। मालिक को प्राप्त तो किया है, किन्तु भली-भाँति जान-पहचान नहीं हुई। एक दर्जे के और लोग हैं, जो सिद्धों में सिद्ध कहलाते हैं। मालिक के साथ यदि विशेष वार्तालाप हो तो वह एक और अवस्था है। यदि ईश्वर के साथ प्रेम-भक्ति द्वारा विशेष परिचय हो जाय तो दूसरी ही अवस्था हो जाती है। जो सिद्ध है उसने ईश्वर को पाया तो है, किन्तु जो सिद्धों में सिद्ध है, उसका ईश्वर के साथ विशेष परिचय हो गया है। परन्तु उनको प्राप्त करने की इच्छा हो, तो एक न एक भाव का सहारा लेना पड़ता है, जैसे -शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य या मधुर।
" शान्त भाव या 'the serene attitude': प्राचीन काल के ऋषियों के मन में ईश्वर के प्रति यही भाव था। उनके मन में सांसरिक भोगों की कोई वासना न थी; ईश्वरनिष्ठा (अपने ईष्ट-ठाकुर) में ऐसी निष्ठा थी, जैसी पति पर स्त्री की होती है- ' single-minded devotion of a wife to her husband.' वह तो यही मानती है की मेरे पति ही साक्षात मदन (cupid या कामदेव) हैं !   
" दास्य भाव- जैसे हनुमान का; रामकाज करते समय सिंहतुल्य ! स्त्रियों का भी दास्य भाव होता है, -पति की हृदय खोलकर सेवा करती है। माता में भी यह भाव कुछ कुछ रहता है,-यशोदा में था। 
" सख्य-मित्रभाव : जैसे कहते हैं, आओ, पास बैठो ! सुदामा आदि कृष्ण को कभी जूठे फल खिलते थे, कभी उनके कन्धे पर चढ़ते थे। 
" वात्सल्य- जैसे यशोदा का। स्त्रियों का भी कुछ कुछ होता है। अपने स्वामी (husband या पति) को खिलाते समय मानो, अपना सारा लाड़ उड़ेल देती हैं ! लड़का जब भरपेट भोजन कर लेता है, तभी माँ को सन्तोष होता है। यशोदा कृष्ण को खिलाने के लिये मक्खन हाथ में लिये घूमती फिरती थी।
" मधुर भाव : अपने उपपति या अवैध-प्रेमी के प्रति जैसा भाव, जैसे श्रीराधिका का; ' the attitude of a woman toward her paramour' पत्नी भी अपने पति के लिये इसी भाव का अनुभव करती है। This attitude includes all the other four - इस भाव में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य सब भाव है। "
मणि : क्या ईश्वर के दर्शन इन्हीं नेत्रों से होते हैं ?
श्रीरामकृष्ण- चर्मचक्षु से उन्हें कोई नहीं देख सकता। साधना करते करते शरीर प्रेम का हो जाता है। आँखें प्रेम की कान प्रेम के। उन्हीं आँखों से वे वे दिख पड़ते हैं, उन्हीं कानों से उनकी वाणी सुन पड़ती है। और प्रेम का लिंग और योनि भी होती है।" One even gets a 'sexual organ' made of love, यह सुनकर मणि खिलखिलाकर हँस पड़े। श्रीरामकृष्ण जरा भी नाराज न होकर फिर कहने लगे.……
श्रीरामकृष्ण - इस प्रेम के शरीर में आत्मा, भगवान के साथ बातचीत करता है। With this 'love body' the soul communes with God."  मणि फिर गम्भीर हो गए। " ईश्वर को बिना खूब प्यार किए दर्शन नहीं होते। खूब प्यार करने से चारों ओर ईश्वर ही ईश्वर दिखते हैं। जिसे पीलिया हो जाता है उसे चारों ओर पीला दिखाई पड़ता है।
" तब ' मैं वही हूँ ' यह बोध भी हो जाता है। मतवाले का नशा जब खूब चढ़ जाता है तब वह कहता है, ' मैं ही काली हूँ'। गोपियाँ प्रेमोन्मत्त होकर कहने लगीं- ' मैं ही कृष्ण हूँ'।
दिनरात उन्हीं की चिन्ता करने से चारों ओर वे ही दिख पड़ते हैं। जैसे थोड़ी दीपशिखा या मोमबत्ती की लौ की ओर ताकते रहो, तो फिर चारों ओर सब कुछ शिखामय ही दिखायी देता है। " यह सुनकर मणि सोचते हैं, कि वह शिखा तो सत्य शिखा नहीं है ?
अंतर्यामी श्रीरामकृष्ण कहने लगे- " चैतन्य की चिन्ता करने से चारों ओर कोई अचेत नहीं हो जाता। शिवनाथ ने कहा था, ' ईश्वर की बार बार चिन्ता करने से लोग पागल हो जाते हैं।' मैंने उससे कहा, ' चैतन्य की चिन्ता करने से क्या कभी कोई चैतन्यहीन होता है ? "
मणि-जी, समझा। यह तो किसी अनित्य विषय की चिन्ता है नहीं; जो नित्य और चेतन हैं उनमें मन लगाने से मनुष्य अचेतन क्यों होने लगा ?
श्रीरामकृष्ण (प्रसन्न होकर ) बोले- यह उनकी कृपा है। बिना उनकी कृपा के सन्देह भंजन नहीं होता।
" आत्मदर्शन के बिना सन्देह दूर नहीं होता।
और उनकी कृपा के बिना सन्देह  दूर नहीं होता। वे यदि कृपा करके संशय दूर कर दें, और दर्शन दें, तो फिर कोई दुख नहीं। परंतु उन्हें पाने के लिये खूब व्याकुल होकर पुकारना चाहिये-साधना करनी चाहिये। तब उनकी कृपा होती है। पुत्र को दौड़ते हाँफते देख माता को द्या आ जाती है। माँ छिपी थी, सामने प्रकट हो जाती है।"
मणि मन ही मन सोचने लगे --' ईश्वर इतनी दौड़धूप करवाते ही क्यों हैं ?
श्रीरामकृष्ण तुरन्त कहने लगे, " उनकी इच्छा कि कुछ देर तक दौड़-धूप हो,तो आनन्द मिले। लीला से उन्होने इस संसार की रचना की है। इसी का नाम महामाया है। अतएव उस शक्तिरूपिणी महामाया की शरण लेनी पड़ती है। माया के पाशों ने बाँध लिया है, फाँस काटने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। "
आद्द्याशक्ति महामाया एवं शक्ति साधना 
श्रीरामकृष्ण- " कोई ईश्वर की कृपा प्राप्त करना चाहे, तो उसे पहले आद्द्याशक्तिरूपिणी महामाया को प्रसन्न करना चाहिये। वे संसार को मुग्ध करके सृष्टि, स्थिति, और प्रलय कर रही हैं। उन्होंने सबको अज्ञानी बना डाला है। वे जब द्वार से हट जायेंगी, तभी जीव भीतर जा सकता है। बाहर पड़े रहने से केवल बाहरी वस्तुएं देखने को मिलती हैं, नित्य-सच्चिदानन्द पुरुष नहीं मिलते। इसिलिये पुराणों में है--  श्री दुर्गा सप्तशती में : मधुकैटभ का वध करते समय ब्रह्मादि देवता महामाया की स्तुति कर रहे है, ब्रह्मोवाच --
' त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका।
 सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता॥२॥
"संसार की मूलाधार शक्ति ही है। उस आद्द्या शक्ति के भीतर विद्या और अविद्या दोनों हैं- अविद्या मोहमुग्ध करती है। अविद्या वह है जिससे कामिनी और कांचन उत्पन्न हुए हैं, वह मुग्ध करती है। और विद्या वह है जिससे भक्ति, दया, ज्ञान और प्रेम की उत्पत्ति हुई है; वह ईश्वर के मार्ग पर ले जाती है।
"उस अविद्या को प्रसन्न करना होगा। इसिलिये शक्ति की पुजापाद्धति हुई।
" उन्हें प्रसन्न करने के लिये नाना भावों से पूजन किया जाता है।जैसे दासी भाव, वीरभाव, सन्तानभाव। वीरभाव अर्थात रमण के द्वारा उन्हें प्रसन्न करना। "
" शक्ति साधना -सबसे विकट साधनायें थीं, दिल्लगी नहीं। 
"मैं माँ के दासी भाव से और सखी भाव से दो वर्ष तक रहा। परन्तु मेरा सन्तान भाव है। स्त्रियों के स्तनों को मातृ-स्तन समझता हूँ।
" लड़कियाँ शक्ति की एक एक मूर्ति हैं। पश्चिममें विवाह के समय वर के हाथ में तलवार रहता है, (उसके ऊपर कसैली खोसकर वर माँ जगदम्बा से आशीर्वाद लेने जाता है।शरीर के साथ यह तादात्म्य ही क्लेश का कारण, इसी गाँठ को वर-वधु ज्ञान की तलवार से मिलकर काट देते है !) बंगाल में सरौता-अर्थात उस शक्ति रूपिणी कन्या की सहायता से वर मायापाश काट सकेगा। यह वीरभाव है। मैंने वीरभाव की पुजा नहीं की। मेरा सन्तान भाव था।
" कन्या शक्तिस्वरूपा है। विवाह के समय तुमने नहीं देखा- वर अहमक़ की तरह पीछे बैठता है; किन्तु कन्या निःशंक रहती है।

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