Thursday, February 6, 2014

" सांख्य एवं वेदान्त " (स्वामी विवेकानन्द द्वारा १५ जनवरी १८९६ को न्यूयार्क में दिया गया भाषण)

" अंतःप्रज्ञा ( intuition), तर्कशील बुद्धि (reason) या सहज-वृत्ति (instinct) "
 पिछले वक्तव्य में हम जिस सांख्य-दर्शन पर विचार कर रहे थे, उसके सारांश (resume) को संक्षेप में पुनः एक बार कहूंगा।  इस व्याख्यान में हम यह दिखलाना चाहते हैं कि सांख्य-दर्शन की अपूर्णता कहाँ है, और वेदान्त ने आकर उन कमियों को किस प्रकार परिपूर्ण कर दिया है ?  तुमको स्मरण होगा कि सांख्य दर्शन के अनुसार -विचार, बुद्धि, तर्क, राग, द्वेष, स्पर्श, रस, इन्द्रिय, तन्मात्रा, (शरीर से संलग्न आँख, नाक आदि स्थूल यन्त्र, ) इन सब अभिव्यक्तियों का कारण एक मात्र प्रकृति ही है। यह प्रकृति सत्व, रज और तम नामक तीन प्रकार के तत्वों से गठित है। ये तीनों गुण (लक्षण,विशेषता या qualities) नहीं हैं, बल्कि तत्व (elements) हैं, जगत् के उपादान हैं, जिनसे समग्र ब्रह्माण्ड विकसित हुआ है। कल्प के प्रारम्भ में ये तीनों उपादान संतुलन (equilibrium या साम्य ) की अवस्था में रहते हैं, और जब सृष्टि का प्रारम्भ होता है, ये उपादान परस्पर संघटित और पुनर्संघटित होकर इस ब्रह्माण्ड के रूप में अभिव्यक्त या प्रकट (manifest) होते हैं। 
इसकी प्रथम अभिव्यक्ति (स्वरुप प्रकाश या manifestation) महत् या ब्रह्माण्डीय बुद्धि है, और फिर उससे अहंकार ('मैं' कुछ हूँ की चेतना - consciousness) की उत्पत्ति होती है। अहंकार ('मैं'-पन) को भी सांख्य एक तत्व (element) मानता है, उससे सर्वव्यापी मनस्तत्व (चित्त या मनवस्तु जिससे मन बनता है) और मन का उद्भव होता है। इस अहंकार से ही ज्ञान और कर्म के इन्द्रिय (मस्तिष्क में स्थित दर्शन, श्रवण आदि नाड़ी-केन्द्र) तथा तन्मात्रा अर्थात 'particles of sound, touch, etc.' शब्द, स्पर्श, रस आदि के सूक्ष्म परमाणुओं की उत्पत्ति होती है; फिर ये सूक्ष्म परमाणु ही स्थूल परमाणुओं में रूपान्तरित हो जाते हैं।  इन तन्मात्राओं (सूक्ष्म परमाणुओं) को देखा नहीं जा सकता है, किन्तु जब वे स्थूल परमाणु बन जाते हैं, तब हम उन्हें अनुभव और इन्द्रियगोचर कर सकते हैं। मनस या मनवस्तु जिसे 'चित्त' कहते हैं, जो स्पन्दित होकर मन, बुद्धि और अहंकार -इन तीन माध्यमों से कार्य करके 'प्राण' नामक शक्ति का निर्माण करता है। 
तुम्हें इस धारणा को इसी समय त्याग देना चाहिये कि प्राण का अर्थ श्वसन (breath) है। श्वसन क्रिया तो प्राण का एक कार्य (effect) मात्र है। यहाँ 'प्राण' शब्द से उन समस्त नाड़ी-शक्तियों (nervous forces) का बोध होता है, जो सम्पूर्ण शरीर का शासन और परिचालन करती हैं, एवं स्वयं को निरंतर गतिशील विचारों (thoughts) के रूप में अभिव्यक्त कर रही है। किन्तु प्राण का प्रधान और सबसे स्पष्ट रूप 'श्वसन गति' में ही दृष्टिगोचर होता है। इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि 'श्वसन गति' में प्राण ही वायु पर कार्य कर रहा है प्राण के ऊपर वायु कार्य नहीं कर रहा है। (Prana acts upon air, and not air upon it.) "श्वसन गति" या सांस लेने की गति को नियंत्रित करना ही प्राणायाम है श्वसन गति पर अधिकार प्राप्त करने के लिये ही प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। प्राणायाम का उद्देश्य केवल श्वसन गति का नियमन करना या फेफड़ों को सबल बनाना ही नहीं है। वह तो केवल डेल्टा-शोर है (Delsarte=delta noise?) प्राणायाम नहीं है। 
ये पंच-प्राण ही जीवनी-शक्ति (vital forces) हैं, जो समस्त शरीर को कुशलतापूर्वक संचालित करते हैं, और इसके बदले में वह मन तथा अन्य आंतरिक इन्द्रियों का कुशल संचालन करता है। यहाँ तक यह मनोविज्ञान बहुत स्पष्ट और असंदिग्ध है, इसके साथ ही साथ यह विश्व की प्राचीनतम तर्क-संगत विचारधारा भी है! पाइथागोरस ने भारत आकर इस विद्या को सीखा था, और ग्रीस जाकर इसीको पढ़ाया था। आगे चलकर प्लेटो को इस विद्या में निहित गूढ़ तत्वों का आभास हुआ, और भी आगे चलकर नास्टिकस (Gnostics) लोग सिकन्दरिया ले गये, और वहाँ से यह विचारधारा यूरोप पहुंची। इस प्रकार दर्शन और मनोविज्ञान के क्षेत्र में जहाँ भी कोई प्रयास किया जाता है तो, यह बात सिद्ध हो जाती है कि उसके पितामह परमर्षि कपिल ही हैं। अब तक हमने देखा कि यह मनोविज्ञान अत्यन्त प्रशंसनीय है, किन्तु यहाँ के बाद आगे बढ़ते समय हमें कुछ बिंदुओं पर, इससे भिन्न मत का अवलम्बन करना होगा। हम देखते हैं, कि कपिल का प्रधान मत है ---परिणाम। वे कहते हैं - 
' कारणभावाच्च ।' 
{सांख्यसूत्र-१.११८ /असत्कार्यवादनिराकरणं}   
अर्थात हर वस्तु किसी दूसरी वस्तु का परिणाम अथवा विकार है; क्योंकि उनके मत के अनुसार कार्य-कारण वाद का लक्षण यह है कि ' कार्य अन्य रूप में परिणत कारण मात्र है।' क्योंकि हम जहाँ तक देख पाते हैं, समग्र जगत् विकारशील और प्रगतिशील है। जैसे हम मिटटी को ही अन्य रूप में देखकर घड़ा कहते हैं। मिटटी है कारण, घड़ा है कार्य। इससे अधिक कारणता की कोई धारणा नहीं की जा सकती। यह समग्र ब्रह्माण्ड निश्चित रूप से एक उपादान से अर्थात प्रकृति के परिणाम से उतपन्न हुआ है। अतएव यह ब्रह्माण्ड अपने कारण से स्वरुपतः कभी भिन्न नहीं हो सकता।  परमर्षि कपिल के अनुसार, अव्यक्त प्रकृति से चित्त, बुद्धि, अहंकार तक कोई भी वस्तु वास्तविक भोक्ता "enjoyer" या भीतर से ज्ञान देने वाला "Enlightener" नहीं है। जैसा कोई मिट्टी का ढेला होता है, यह मन भी ठीक उसी प्रकार की जड़ वस्तु है। 
स्वरूपतः मन में अपना आलोक या चैतन्य नहीं है, किन्तु हम देखते हैं कि हमारा मन-- यह क्या है, वह क्या है ? आदि प्रश्न पूछता रहता है, तर्कना करता ही रहता है। इसलिए इसके पीछे, निश्चित रूप से ऐसी कोई सत्ता होनी चाहिये, जिसका आलोक महत (बुद्धि), अहंभाव (consciousness) और अन्य परवर्ती परिणामों के माध्यम से व्यक्त हो रहा है। उसी सत्ता को कपिल 'पुरुष' कहते हैं, और वेदान्ती उसे आत्मा कहते हैं।
कपिल के अनुसार, 'पुरुष' एक परिशुद्ध अस्तित्व (simple entity) है, वह यौगिक पदार्थ (compound) नहीं है, वही एकमात्र अभौतिक (या आत्मिक immaterial) तत्व है, और सब विभिन्न प्रपंच (नाम-रूप आदि) जड़ हैं। मान लो, हम एक काले बोर्ड को देख रहे हैं। हमारे बाह्य उपकरण (रेटिना), उस संवेदना को सबसे पहले, मस्तिष्क में स्थित तंत्रिका-केंद्र (ऑप्टिक नर्भ) में (कपिल के मत से दर्शन इन्द्रिय) में भेज देंगे, फिर संवेदना की छाप उस केन्द्र से संलग्न मन के ऊपर आघात करेगा, मन फिर उसे बुद्धि को समर्पित कर देगा। किन्तु बुद्धि में निर्णय लेने की क्षमता स्वतः क्रियाशील नहीं है---उसकी पृष्ठभूमि में जो पुरुष विदयमान है, उसीसे मानो क्रियाशीलता आती है। ये सब मानो उसके सेवक हैं, संवेदना (sensations) को उसके समीप ला देते हैं। और वह मानो आदेश देता है, प्रतिक्रिया करता है।
मनुष्य की आत्मा या पुरुष ही सिंहासन पर बैठा हुआ राजा, यथार्थ सत्ता, भोक्ता (enjoyer), द्रष्टा और ज्ञाता (perceiver) है, और वह अभौतिक (immaterial) है। क्योंकि वह अभौतिक है, इसलिए उसे अवश्य ही अनन्त भी होना ही चाहिए; वह जो भी हो किन्तु उसकी कोई सीमा नहीं हो सकती, उसे तो असीम होना ही चाहिये। इन पुरुषों में प्रत्येक ही सर्वव्यापी है, हम सब सर्वव्यापी हैं, किन्तु हम केवल लिंग-शरीर (सूक्ष्म-शरीर या fine body) के माध्यम से ही कार्य कर सकते हैंचित्त, मन, बुद्धि, अहंकार, मस्तिष्क-केन्द्र अथवा इन्द्रियाँ, तथा प्राण इन सबके संयोग से सूक्ष्म-शरीर या कोष (आवरण या sheath) बनता है, इसीको ईसाई-दर्शन में मानव की 'अध्यात्मिक देह ' 
(spiritual body) कहते हैं। इस देह को ही उद्धार अथवा दण्ड प्राप्त होता है, यही विभिन्न स्वर्गों में जाती रहती है, इसका ही बार बार जन्म और पुनर्जन्म होता है। 
क्योंकि हम पहले से ही  देखते आये हैं कि पुरुष या आत्मा तो अनन्त है, अतः उसके लिये आवागमन असम्भव है। गति का अर्थ है आना-जाना, और जो एक स्थान से दूसरे स्थान में जाता है, वह कभी सर्वव्यापी (omnipresent) नहीं हो सकता। कपिल के दर्शन में यहाँ तक हमने देखा कि आत्मा अनन्त है, और एकमात्र वही प्रकृति का परिणाम नहीं है। एकमात्र वही प्रकृति के बाहर है, किन्तु जाहिरा तौर पर देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि वह भी प्रकृति से बद्ध हो गया है। प्रकृति ने पुरुष पर आवरण डाल दिया है, और पुरुष का प्रकृति के साथ तादात्म्य हो गया है। 'पुरुष' सोचते हैं, ' हम लिंग शरीर हैं' , 'हम स्थूल शरीर' हैं, इसीलिये वे सुख-दुःख भोग रहे हैं; किन्तु वास्तव में 'पुरुष' तो आनंद स्वरुप हैं, सुख-दुःख से परे हैं, सुख-दुःख पुरुष का नहीं है, वह लिंग शरीर या सूक्ष्म शरीर का है। 
योगी समाधि अवस्था को सर्वोच्च अवस्था मानता है। वह समाधी अवस्था (meditative state) न सक्रीय है, न निष्क्रिय और उसमें हम पुरुष के निकटतम पहुँच जाते हैं। पुरुष में सुख-दुःख कुछ नहीं है, वह सभी तत्वों, सभी कर्मों का शाश्वत साक्षी (eternal witness) है, किसी कार्य के फल को वह ग्रहण नहीं करता।  
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । 
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥कठ २. २. ११॥ 
जिस प्रकार समस्त ब्रह्मांड का प्रकाशक सूर्यदेवता सभी नेत्रों की दृष्टि का कारण है, किन्तु नेत्र के किसी भी दोष से अप्रभावित रहता है। उसी प्रकार सब प्राणियों का अंतरात्मा एक परब्रह्म परमात्मा लोगों के दुखों से लिप्त नहीं होता क्योकि सबमें रहता हुआ भी वह सबसे अलग है।
कुसुमवच्च मणिः । सांख्यसूत्र-२.३५ ।
(वृत्त्युपसंहारदशायामेव पुरुषस्य स्वरूपे ऽवस्थितिः)
" अथवा जैसे लाल या नीले फूल स्वच्छ स्फटिक मणि के सामने रख दिये जाने  पर, स्फटिक लाल या नीला प्रतीत होने लगता है; किन्तु फूल के हट जाने पर वह अपने स्वरुप में स्वच्छ प्रतीत होने लगता है-उसके वास्तविक स्वरुप में कोई अन्तर नहीं आता। इसी प्रकार अभौतिक (चेतन) 'पुरुष' भी भौतिक (अचेतन) इन्द्रिय वृत्तियों से तादात्म्य कर लेने के कारण सक्रीय-निष्क्रिय प्रतीत होता है, पर वह है इन दोनों से परे। समाधीलाभ द्वारा, इन्द्रिय-वृत्तियों के हट जाने पर, वह 'पुरुष' (अहंभाव नहीं) अपने चेतन-स्वरुप का साक्षात्कार करता है। स्फटिक मणि के समान उसके वास्तविक स्वरुप में कभी कोई अन्तर नहीं आता। वृत्तिस्वरूपता में भी उसका चेतनस्वरूप तद्वस्थ रहता है। वृत्तियों का हट जाना ही उसका स्वरुप में अवस्थित होना कहा जाता है। पुरुष की इसी अवस्था को समाधी कहकर व्यक्त किया जा सकता है। यही सांख्य दर्शन है।
इसके पश्चात् सांख्यवादी यह भी कहते हैं कि प्रकृति का यह स्वरुप प्रकाश केवल आत्मा के लिए है; विभिन्न उपादानों के समस्त संघात, उससे स्वतंत्र और किसी अन्य सत्ता (third person-'पुरुष' ) के लिये हैं। ये नाना प्रकार के संघात, जिसे हम प्रकृति अथवा जगत्प्रपञ्च कहते हैं, ये सब परिवर्तन, आत्मा के भोग, अपवर्ग अथवा मुक्ति के लिये क्रम से चल रहे हैं; जिससे आत्मा निम्नतम अवस्था से सर्वोत्तम अवस्था तक का अनुभव प्राप्त कर सकें। (दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति ही अपवर्ग है, और दु:खोत्पत्ति के कारण का अभाव ही आत्यन्तिक दु:खनिवृत्ति है।आत्मा और अपवर्ग ही उपादेय (ग्रहण करने योग्य) हैं। ) जब आत्मा यह अनुभव प्राप्त करती है, तब वह समझ सकती है कि वह किसी काल में प्रकृतिबद्ध नहीं थी; वह हर 'नाम-रूप' से सर्वदा ही पूर्णरूप से स्वतंत्र थी --वह अविनाशी है, उनका आना-जाना कुछ भी नहीं है। स्वर्ग में जाना, फिर यहाँ आकर उतपन्न होना, यह सब प्रकृति का है --आत्मा का नहीं है। तब आत्मा मुक्त हो जाती है। इसी प्रकार समस्त प्रकृति आत्मा का भोग अथवा अनुभव का संचय करने के लिये काम करती जा रही है। आत्मा उसी चरम लक्ष्य- जो मोक्ष या स्वतंत्रता है, तक पहुँचने के लिये यह अनुभव प्राप्त कर रही है। सांख्य दर्शन के अनुसार इस आत्मा की संख्या अनेक है। अनन्त संख्यक आत्मायें विदयमान हैं।
कपिल का एक और सिद्धान्त यह है कि ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता के रूप में कोई ईश्वर नहीं है। प्रकृति ही इन सब विभिन्न नाम-रूपों का सृजन करने में समर्थ है। सांख्यवादी कहते हैं, ईश्वर को स्वीकार करने का कोई प्रयोजन नहीं सधता है। वेदान्त का कहना है कि आत्मा स्वरूपतः परम सत् (Existence absolute),परम चित् (Knowledge absolute) और परम आनन्द (Bliss absolute) है; किन्तु ये आत्मा के गुण नहीं हैं; वे तीन नहीं, एक हैं--'आत्मा' का सार तत्व ही 'सच्चिदानन्द'-स्वरुप है ! तथापि सांख्य के अनुसार ही वेदान्त भी इस बात में एकमत है कि बुद्धि भी, जहाँ तक वह प्रकृति से उत्पन्न है, (चित्त शुद्धि होने तकप्रकृति की ही वस्तु है।
वेदान्त यह भी सिद्ध करता है कि बुद्धि एक यौगिक वस्तु (compound) है। उदाहरण के लिए, हम किसी वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान ( perception) कैसे प्राप्त करते हैं-- इसी संवेदन की प्रक्रिया पर विचार करो। मैं एक ब्लैकबोर्ड देखता हूँ। यह ज्ञान कैसे होता है कि मैं ब्लैकबोर्ड ही देख रहा हूँ? ब्लैकबोर्ड का 'वह' --जिसे जर्मन दार्शनिक वस्तुरूप " the thing-in-itself " कहते हैं, अज्ञात है; 'मैं' वहाँ तक कभी पहुँच ही नहीं सकता, 'मैं' (अहं) उसे कभी नहीं जान नहीं सकता। मान लो वह 'क' है। ब्लैकबोर्ड का वह 'क' हमारे चित्त के ऊपर आघात करता है, और चित्त तरंगायित होकर मन बन जाता है। चित्त की उपमा एक शान्त सरोवर से दी जाती है। सरोवर में एक ढेला फेंकने पर सरोवर की प्रतिक्रियास्वरूप एक तरंग पत्थर के उस ढेले की ओर आती है। यह तरंग उस पत्थर के समान जरा भी नहीं है -- वह केवल एक प्रतिक्रियारूपी तरंग है। ब्लैकबोर्ड का वह 'क' जब पत्थर के रूप में चित्त के ऊपर आघात करता है, तो चित्त भी उसकी दिशा में एक तरंग फेंकता है, और इस तरंग को ही हम ब्लैकबोर्ड की संज्ञा देते हैं। " You, as reality are unknown and unknowable" हम तुमको देख रहे हैं। तुम स्वरूपतः जो हो, वह अज्ञात और अज्ञेय है। तुम वही अज्ञात सत्ता 'क' हो, -तुम हमारे चित्त पर आघात करते हो, और मेरा चित्त आघात प्राप्त होने की दिशा में  प्रतिक्रियास्वरूप एक तरंग निक्षेप करता है, और बुद्दि उस तरंग के नाम-रूप को पहचानकर उसे श्री या श्रीमती अमुक कहती है। (वैसे ही अहंकार आकर कहता है, मैं पहचान गया, आप श्री या श्रीमती अमुक ही हैं ! इस प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया (Perception) के दो उपादान हैं, एक बाहर से मिलने वाला आघात और दूसरा भीतर से उठने वाली प्रतिक्रिया-तथा इन दोनों का मिश्रण "{ 'क' (नाम-रूप) + चित्त (मन,बुद्धि अहंकार)}" ही हमारा बाह्य ब्रह्माण्ड (external universe) है ! हमारा सम्पूर्ण ज्ञान चित्त की प्रतिक्रिया का फल है।
व्हेल मछली के सम्बन्ध में वैज्ञानिक गणना के अधर पर यह निर्धारित किया गया है, कि उसकी पूंछ में आघात होने के कितने क्षणों के बाद उसका मन पूँछ पर प्रतिक्रिया करता है, तब उस व्हेल को पीड़ा की संवेदना होती है। यही बात आन्तरिक अनुभूति जन्य अवधारण (internal - perception) के विषय में भी सत्य है। जब हम अपने को 'अमुक ' नाम-रूप वाले व्यक्ति-विशेष (स्त्री/पुरुष) के रूप में जानते हैं, तब वह 'क'+ मन होता है। हमारी अन्तर्निहित यथार्थ आत्मा (सच्चिदानन्द स्वरुप real self) भी इसी प्रकार अज्ञात (unknown) और अज्ञेय (unknowable) है। उसे (नाम-रूप से पीछे की सत्ता अस्ति-भाति-प्रिय को) 'ख' कहा जाय। यह 'ख' चित्त पर भीतर से आघात करता है। अतः हमारा समग्र जगत् 'क' + मन (बाह्य जगत् ) है, और 'ख' + मन (अन्तर्जगत) है। 'क' + 'ख' (बाह्य जगत् और अन्तर्जगत) के पीछे 'वह' है, जिसे हम वस्तुरूप (रजत का रजतत्व या सर्प का सर्पत्व)  " the thing-in-itself " कह सकते हैं। 
वेदान्त के अनुसार अहंभाव (consciousness) के तीन मौलिक तथ्य हैं-- मैं सत् हूँ ( I exist), मैं चित् हूँ (I know) और मैं आनन्दस्वरुप हूँ (I am blessed)! कभी कभी हमारे मन में ऐसे  विचार आते हैं, कि " मुझे कोई अभाव नहीं है; मैं शान्तिपूर्ण हूँ, मैं पूर्णसन्तुष्ट हूँ, मुझे न मोह है न शोक है, मुझे कोई भी परिस्थिति विचलित नहीं कर सकती है"। और यही भाव हमारे अस्तित्व का केन्द्रीय तथ्य है, हमारे जीवन का आधारभूत तत्व है, किन्तु जब असीमता का यह भाव सीमित रूप ले लेती है, और यौगिक बन जाती है, तो यह स्वयं को प्रतीयमान या जगातिक अस्तित्व, जगातिक ज्ञान, और भौतिक प्रेम के रूप में अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक मनुष्य का अस्तित्व है, प्रत्येक मनुष्य अवश्य जानता है, और प्रत्येक मनुष्य प्यार के लिए पागल है ! मनुष्य प्रेम किये बिना नहीं रह सकता। उच्चतम से लेकर निम्नतम सभी जीव अवश्य प्रेम करते हैं। 'ख' अथवा 'अन्तःवस्तुरूप' "the internal thing-in-itself" - जिसे वेदान्ती लोग सच्चिदानन्द (Existence absolute, Knowledge absolute, Bliss absolute.) कहते हैं, मन के साथ संयुक्त होकर ससीम सत् (जीवन या existence), ज्ञान और प्रेम का निर्माण करता है। यद्द्पि वह 'वास्तविक जीवन' (real existence) असीम, अमिश्रित, अयौगिक, अविकारी -मुक्तात्मा है; जब वह मिश्रित या यौगिक बन जाता है, मन के साथ घुलमिल जाता है, तब उसे व्यष्टि-जीवन, या जीवात्मा कहते हैं। वही पूर्णसत् (अनन्त जीवन)---- वनस्पति-जीवन, पशु-जीवन, मानव-जीवन बन जाता है, जैसे ब्रह्माण्डीय अंतरिक्ष (महाकाश) ही एक घड़े के भीतर बन्द होकर घटाकाश बन जाता है, या अन्य किसी वस्तु के भीतर खण्डित जैसा प्रतीत होता है।
और जिसे हम अंतःप्रज्ञा ( intuition), तर्कशील बुद्धि (reason) या सहज-वृत्ति (instinct) कहते हैं, वह --'पूर्णज्ञान' नहीं है। जब वह 'ज्ञानस्वरुप' कुछ विकृत होकर भ्रम में पड़ जाता है तब उसी को अन्तःप्रज्ञा (intuition) कहते हैं, जब यह और अधिक विकृत हो जाता है, हम उसे तर्कशील बुद्धि (reason) कहते हैं, और जब उससे भी अधिक विकृत होता है हम उसे सहज-वृत्ति (instinct) कहते हैं। ज्ञानस्वरूप वास्तव में विज्ञान है-न वह अन्तःप्रज्ञा है, न तर्कशील बुद्धि है, और न सहज-वृत्ति है। उसकी निकटतम अभिव्यंजना है "सर्वज्ञत्व" (all-knowingness)। उस पूर्णज्ञान की कोई सीमा नहीं है, यह यौगिक नहीं 'विशुद्ध बुद्धि' है- इसमें कोई मिलावट नहीं है। 
उसी प्रकार आनन्दस्वरुप या परमानन्द जब आवरण में फँसकर थोडा मलिन हो जाता है, तो उसे स्थूल शरीरों के प्रति आकर्षण, या सूक्ष्म शरीरों के प्रति आकर्षण, अथवा भावनाओं के प्रति प्रेम या आकर्षण कहते हैं। यह भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण भी उसी परमानन्द की विकृत अभिव्यक्ति है। पूर्ण सत्, पूर्ण चित्, पूर्ण आनन्द आत्मा के गुण नहीं हैं, बल्कि सारतत्व हैं, आत्मा के साथ उनका कोई प्रभेद नहीं है। और ये तीनों एक ही तत्व हैं, उस एक ही तत्व--- 'तदेकं' को हम तीन विभिन्न पहलुओं से देखते हैं। वे सभी पहलु सापेक्ष ज्ञान (relative knowledge) के परे हैं। आत्मा का वही शाश्वत ज्ञान, मनुष्यों के मस्तिष्क के माध्यम से अनुश्रवित होकर अंतःप्रज्ञा, तर्कशील बुद्धि, आदि बनता है। वह अनन्त ज्ञान - चित्त, मन, बुद्धि, अहंकार आदि गुणवत्ता के तारतम्य के अनुसार ही स्वयं भासमान करता है। आत्मा के रूप में मनुष्य और निम्नतम पशुओं में कोई अन्तर नहीं है, केवल पशुओं का अंतःकरण कम विकसित हुआ है, और उनके कमविकसित अंतःकरण के माध्यम से होने वाली अभिव्यक्ति, जिसे हम सहज-वृत्ति (आहार-निद्रा-भय-मैथुन या instinct) कहते हैं, वह बहुत भोथरा (dull) है। मनुष्य का अन्तःकरण पशुओं की अपेक्षा अधिक परिष्कृत या तीक्ष्ण है, इसीलिये उसके माध्यम से आत्मा की अभिव्यक्ति भी अधिक स्पष्ट होती है, और उच्चतम अन्तःकरण वाले मनुष्य में यह पूर्ण रूप से चमकने लगती है। 
अस्तित्व या सत् के बारे में भी यह कहा जा सकता है। सीमित अस्तित्ववान देश (घटाकाश) या व्यष्टि-
जीव के रूप में हम जिसे जानते हैं, वह असीम अस्तित्व का एक प्रतिबिम्ब है, वह उसी आत्मा की प्रकृति है। परमानन्द के साथ भी यही घटित होता है। जिसे हम शारीरिक आकर्षण या प्रेम कहते हैं, वह आत्मा के अनन्त परमानन्द का प्रतिबिम्ब मात्र है। असीम जब स्वयं को ससीम के माध्यम से अभिव्यक्त करता है, तो वह उस आवरण से ढँक जाता है। लेकिन अनभिव्यक्त आत्मा का यथार्थ स्वरुप अनन्त है, अनन्त होकर भी जो सान्त में छिपा हुआ है, उस परमानन्द की कोई सीमा नहीं है। लेकिन मानवीय प्रेम में सीमा बंधन है। किसी दिन मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, और दूसरे दिन घृणा। मेरा प्रेम एक दिन बढ़ता है और दूसरे दिन घटता है; क्योंकि वह किसी माध्यम
(आवरण या नाम-रूप) से होने वाली अभिव्यक्ति मात्र है। 
पहले तो ईश्वर विषयक धारणा में कपिल के साथ हमारा विवाद है। जैसे व्यष्टि बुद्धि से आरम्भ करके व्यष्टि-शरीर (पिण्ड) तक इस प्रकृति के रूप-परिवर्तनों की श्रृंखला के पीछे उसके नियन्ता और शासक के रूप में 'पुरुष' को स्वीकार करने की आवश्यकता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डीय बुद्धि, ब्रह्माण्डीय अहंभाव, --समष्टि-मन, समष्टि-बुद्धि, समष्टि-सूक्ष्म और समष्टि स्थूल पदार्थों के पीछे उनके नियन्ता और शास्ता के रूप में किसी न किसी को अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। इस  ब्रह्माण्डीय श्रृंखला के पीछे इसके नियन्ता-शास्ता के रूप में एक ब्रह्माण्डीय पुरुष (universal Purusha) को स्वीकार न करने पर यह ब्रह्माण्ड सृष्टि-क्रम पूर्ण कैसे होगा ? यदि तुम ब्रह्माण्डीय रचना-क्रम के कुशल-संचालन के पीछे यदि किसी ब्रह्माण्डीय पुरुष को अस्वीकार करते हैं, तो हमें व्यष्टि-जीवन श्रृंखला के पीछे भी उस पुरुष को अस्वीकार करना होगा। अतएव यदि यह सत्य है कि इस अभिव्यक्त व्यष्टि-क्रम के पीछे ऐसा पुरुष विद्य्मान है, जो समस्त प्रकृति के परे है, जो किसी प्रकार के जड़ उपादान से निर्मित नहीं है, तो यही तर्क समष्टि-ब्रह्माण्ड पर भी लागू होगी। जो सर्वव्यापी आत्मा (Universal Self) प्रकृति के समस्त विकारों के परे है, उसे प्रधान नियन्ता, ईश्वर कहते हैं। 
अब अधिक महत्वपूर्ण मतभेद उठता है। क्या एक से अधिक पुरुष हो सकते हैं ? हमने देखा कि पुरुष सर्वव्यापी और असीम है। सर्वव्यापी और असीम दो नहीं हो सकते। यदि 'क' और 'ख' दो असीम वस्तुएँ हैं, तो असीम 'क' असीम 'ख' को सीमाबद्ध करेगा। क्योंकि असीम 'क' असीम 'ख' नहीं है, तथा असीम 'ख' असीम 'क' नहीं है। अभेद में भेद का अर्थ है, पृथक्करण और पृथक्करण का अर्थ है-परिसीमन।  अतः 'क' और 'ख' एक दूसरे को सीमाबद्ध करने से असीम नहीं रह सकते। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि केवल एक ही असीम वस्तु--एक ही 'पुरुष' विद्य्मान है। 
अब हम कथित 'क' एवं 'ख' की सहायता से यह दिखलाने का प्रयास करेंगे कि ये दोनों एक हैं। हमने पहले ही देखा है कि जिसे हम बहिर्जगत कहते हैं, वह 'क' + मन है, तथा अन्तर्जगत 'ख' + मन है।  'क' और 'ख', ये दोनों अज्ञात और अज्ञेय राशियाँ हैं। समस्त विभेद देश, काल और निमित्त के कारण हैं। ये सब चित्त के गठन तत्व है। इनके (देश-काल-निमित्त रूपी चित्त) के बिना कोई मनोवृत्ति सम्भव नहीं है।  तुम काल का परित्याग करके कदापि विचार नहीं कर सकते, देश को को छोड़कर किसी वस्तु की धारणा नहीं कर सकते, एवं निमित्त अर्थात कार्य-कारण (बीज-वृक्ष) का सम्बन्ध छोड़कर किसी वस्तु की कल्पना नहीं कर सकते। ये सब मन के ही रूप हैं। इन्हें हटा लो, और मन का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। अतः सब विभेद का कारण है-मन। 
वेदान्त के अनुसार मन या इसके रूपों ने ही 'क' और 'ख' को आपतदृष्टी से सीमाबद्ध कर लिया है , और उन्हें बाह्य जगत और अन्तर्जगत के रूप में प्रतीयमान  होने को बाध्य करते हैं। किन्तु 'क' और 'ख' दोनों ही मन के परे होने के कारण भेदरहित हैं और इसलिये एक हैं। हम उन पर किसी गुण का आरोप नहीं कर पाते, क्यों की गुण मन के द्वारा उत्पन्न होते हैं। जो गुण रहित है, वह अवश्य ही एक है। 'क' गुणरहित है, यह केवल मन के ही गुणों को ग्रहण करता है, इसी प्रकार 'ख' भी; अतः ये 'क' और 'ख' एक हैं। समग्र ब्रह्माण्ड एक है। जगत् में केवल एक आत्मा है, एक सत्ता है, और वही एक सत्ता जब देश-काल-निमित्त के माध्यम से गुजरती है, उसे बुद्धि, अहंज्ञान, तन्मात्रा, इन्द्रिय, स्थूल पदार्थ आदि की संज्ञाएँ दी जाती है। 
इस समग्र ब्रह्माण्ड में सब कुछ वह एक वस्तु है, जो विभिन्न रूपों में प्रतिभासित हो रही है। जब उसका कुछ अंश मानो इस देश-काल-निमित्त के जाल में पड़ता है, तब यह विभिन्न रूप ग्रहण करती है। " take off the network,(चित्त) and it is all one." उस जाल को हटा दो, सभी एक हैं। अतः अद्वैत दर्शन के अनुसार समग्र विश्व आत्मा में एक है, और यह आत्मा ही ब्रह्म है। वह ब्रह्म जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की पृष्ठभूमि पर प्रतीयमान होने लगता है, तब उसे हम ईश्वर कहते हैं। वही ब्रह्म जब इस क्षुद्र ब्रह्माण्ड या पिण्ड के पीछे प्रतीयमान होने लगता है, तब उसे आत्मा कहते हैं। अतः यह आत्मा ही ससीम मनुष्य में अन्तर्निहित असीम ईश्वर है। इसलिये सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड में केवल एक ही 'पुरुष' है, जिसे वेदान्त ब्रह्म कहता है। ईश्वर और मनुष्य दोनों के स्वरुप का विश्लेषण करने पर, ब्रह्मस्वरूप में दोनों एक हो जाते हैं। यह ब्रह्माण्ड स्वयं 'तुम' है, अविभक्त तुम ( The universe is you yourself, the unbroken you)। तुम इस विश्व-ब्रह्माण्ड में ओतप्रोत हो। ' समस्त हाथों से तुम कार्य कर रहे हो, समस्त मुखों से तुम खा रहे हो, समस्त नासा-ग्रंधों से तुम श्वसन कर रहे हो, समस्त मन से तुम विचार कर रहे हो।'
सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
                  सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।गीता/१३/ १३।।
तत् = वह (तुम); सर्वत:पाणिपादम् = सब ओरसे हाथ पैरवाला (एवं) ; सर्वतोकक्षि शिरोमुखम् = सब ओर से नेत्र सिर और मुखवाला (तथा) ; सर्वत:श्रुतिमत् = सब ओर से श्रोत्रवाला ; अस्ति = है ; यत: = क्योंकि (वह) ; लोके = संसार में ; सर्वम् = सबको ; आवृत्य = व्याप्त करके ; तिष्ठति = स्थित है ; 
वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है ।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ।।१३/१४ ।।
सर्वेन्द्रियगुणाभासम् = संपूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जाननेवाला हो परन्तु वास्तव में तुम (अतीन्द्रिय-बुद्धि शुद्ध बुद्धि, Intuition ) ; सर्वेन्द्रियविवर्जितम् = सब इन्द्रियों से रहित हो  ; च = तथा ; असक्तम् = आसक्तिरहित (और) ; निर्गुणम् = गुणों से अतीत (हो गये हो ) ; एव = भी (अपनी योगमाया से) ; सर्वभृत् = सबको धारणपोषण करनेवाले हो ; च = और ; गुणभोक्तृ = गुणों को भोगनेवाला भी तुम्हीं हो ; 
(वह तुम ही हो !) तुम्हीं सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाले  हो, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित हो, तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाले हो, और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाले  हो।  समग्र जगत् ही तुम हो, यह ब्रह्माण्ड तुम्हारा शरीर है। तुम्हीं व्यक्त (साकार) और अव्यक्त (निराकार) दोनों  हो। तुम्हीं जगत् की आत्मा हो तथा तुम्हीं उसका शरीर भी हो। तुम्हीं ईश्वर हो, तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं मनुष्य हो, तुम्हीं पशु हो, तुम्हीं उद्भिद (plants) हो, तुम्हीं खनिज (minerals) हो, तुम्हीं सब हो -समग्र व्यक्त जगत् ही तुम हो।  
जो कुछ है, सब तुम हो। तुम असीम (Infinite) हो।  असीम को विभक्त नहीं किया जा सकता।  इसका कोई अंश नहीं हो सकता, क्यों तब प्रत्येक अंश असीम होगा, और तब अंश और पूर्ण या ससीम और असीम में कोई भेद नहीं रह जायगा, जो एक असंगत या तर्कशीलबुद्धि के विरुद्ध ( absurd) बात है। इससे यह सिद्ध हो जाता है, कि बुद्धि के सामान्य धरातल पर (Intellect और Instinct के धरातल पर) खड़े होकर, अतीन्द्रिय-बुद्धि (Intuition) को जाने बिना ही, तुम जो अपने को (सीमित या मरणशील देह) 
" श्री या श्रीमती अमुक " मान रहे थे; कभी सत्य नहीं हो सकता, वह (गो-गोचर जगत्) केवल दिवा-स्वप्न (day-dream-मुंगेरी लाल के हसीन सपने मात्र) है !! " Know this and be free." यह जान लो और मुक्त हो जाओ !! यही अद्वैत का निष्कर्ष (conclusion) है--"निर्वाण षटकम्"
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे
न च व्योमभूमि-र्न तेजो न वायुः ,चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति (देश-काल-निमित्त) नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥१॥

न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः, न वा सप्तधातु-र्न वा पञ्चकोशाः
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्  

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में  कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥२॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्  
न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की  भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥३॥ 
पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् , न मंत्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥४॥ 
न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥४॥ 
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः, चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥५ 
न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य,  मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥५॥ 
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपः,विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः,चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् 
यही यथार्थ ज्ञान है, " मैं न तो देह हूँ, न इन्द्रिय और न मन ही; मैं अखण्डित सच्चिदानन्द हूँ, मैं ही वह हूँ, मैं ही वह हूँ ! " {I am neither the body, nor the organs, nor am I the mind; I am Existence, Knowledge, and Bliss absolute; I am He. जिसको पहले ' तदेकं ' जो अकेला बिना हवा के भी अपने दम पर श्वसन कर रहा था ! समझ कर आश्चर्य जनक कोई वस्तु 'अजूबा ' समझता था, किन्तु शुद्ध बुद्धि (प्रज्ञा या 'Intuition' ) जान लेती है मैं ही वह हूँ ! } यही यथार्थ ज्ञान है, तर्क तथा बुद्धि तथा अन्य सब अज्ञान है। मैं तब कौन सा ज्ञान-लाभ करूँगा ? मैं स्वयं ज्ञानस्वरूप हूँ। मैं कौन सा जीवन प्राप्त करूँगा ? मैं स्वयं ही शाश्वत जीवन हूँ ! मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि मैं नहीं मरूँगा ! क्योंकि मैं ही जीवन-स्वरुप हूँ, मैं ही वह ' ब्रह्म ' हूँ (जिससे देश-काल-निमित्त या चित्त निकला है, जिसमें अवस्थित है, और जिसमें लीन हो जाता है।) और ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो मेरे द्वारा प्रकाशित नहीं है, जो मुझमें नहीं है या जो मेरे स्वरुप में अवस्थित नहीं है। मैं ही भूतसमूह के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा हूँ, किन्तु मैं इन सब से परे भी हूँ, क्योंकि मैं मुक्तस्वरुप  हूँ ! (अब अन्तःप्रज्ञ हो जाने के बाद ) मुक्ति कौन चाहता है ? अब चाहने वाला तो है ही नहीं ! 

" चाह गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह
                 जिनको कुछ न चाहिए, वे शाहन के शाह "
~ कबीर
यदि तुम अपने को बद्ध सोचो, तो बद्ध ही रहोगे, तुम स्वतः ही अपने बन्धन के कारण होओगे। यदि तुम अनुभव करो कि तुम मुक्त हो, तो इसी क्षण तुम मुक्त हो!
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
                         किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवे
त्
 
    अष्टावक्र गीता: १-१
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है यही ज्ञान है --मुक्तिप्रद ज्ञान ! Freedom is the goal of all nature. समग्र प्रकृति का लक्ष्य ही मुक्ति है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ! 
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