Thursday, March 22, 2012

हनुमान के जीवन से दास-नेतृत्व (Servant-Leadership Concept ) का उदाहरण !

चतुर्थ दर्शन 
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
                यस्मिन स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।। (गीता ६/२२)

यस्मिन् स्थितः  दुःखेन गुरुणा अपि विचाल्यते  [All the desires are fulfilled when one attains Self-realization. The Gain or the realization of the the immortal Soul. Wherein in the all-blissful Self which is free from delusion and sorrow. 
When one is under chloroform influence he feels no pain even when his hand is amputated! Because under chloroform influence the mind is withdrawn from the body.
One can experience pain and sorrow when he identifies himself with the body and the mind. If there is no mind there cannot be any pain. If one gets himself established in the Supreme Self within. he cannot be shaken every by heavy sorrow and pain. Because he is mind-less and he is identifying himself with the sorrow-less and pain-less Brahman.
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते यहाँ भगवान् कहते हैं कि आत्यन्तिक सुख की अवस्था = 'उस' तुरीय अवस्था में स्थित होने पर योगी को बड़े से बड़े दुःख भी विचलित नहीं कर सकता। जैसे जब कोई व्यक्ति क्लोरोफॉर्म के प्रभाव में  (अफीमची मोर) रहता है, तब उसके हाथ को काटकर अलग कर देने से भी उसे किसी प्रकार के दर्द का अनुभव नहीं होता। क्योंकि क्लोरोफॉर्म के प्रभाव ने उसके मन को शरीर से वापस खींच लिया है। ठीक वैसे ही तुरीय अवस्था में पहुँचे हुए योगी को विचलित नहीं किया जा सकता, 
क्योकि  जितने भी दुःख आते हैं, वे सभी प्रकृति के राज्यमें अर्थात् नश्वर शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि में ही आते हैं जब कि आत्यन्तिक सुख स्वरूप-बोध प्रकृति से अतीत तत्त्व है। इसीलिये जब वह प्रकृति से सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूपभूत सुख (देश-काल-निमित्त से परे सत्य) का अनुभव कर लेता है, और 
उसमें स्थित हो जाता है; तो फिर यह प्राकृतिक दुःख वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता, उसका स्पर्श ही नहीं कर सकता। इसलिये शरीरमें कितनी ही आफत आनेपर भी वह अपनी स्थिति से विचलित नहीं किया जा सकता। 
किन्तु जब तक पुरुष प्रकृतिस्थ रहता है, अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, और स्वयं को केवल शरीर-मन ही मानता रहता है, तब तक वह प्रकृतिजन्य अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति में अपने को सुखी-दुःखी मानता रहता है ! प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह प्रकृतिस्थ पुरुषके रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है, जिसको अहम् (कच्चा मैं ) कहते हैं। इस अहम् में जड और चेतन दोनों हैं। सुखदुःखरूप जो विकार होता है, वह जड अंश में ही होता है, पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतन पर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुखदुःखरूप विकार को चेतन अपने में मान लेता है कि मैं सुखी हूँ या  'मैं' दुःखी हूँ। जैसे घाटा लगता है दूकान में, पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है, पर मान लेता है कि मेरे में ज्वर आ गया। 
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते (गीता 3। 27)। प्रकृतिका कार्य बुद्धि (महत्तत्त्व) है और बुद्धिका कार्य अहंवृत्ति (अहंकार) है। यह अहंवृत्ति है तो बुद्धिका कार्य, पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं, वे सब प्रकृति से ही होती हैं, किन्तु अहंकार वश मनुष्य सोचता है मैं ही कर्ता और भोक्ता हूँ । परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है, तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है -- शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31)। फिर कर्तृत्व-भोक्तृत्व-रहित पुरुष के शरीर द्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं, उसमें वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता और दास भाव प्रभु के संतानों की अपने भाइयों की सेवा करता है ! जैसे कोई माँ अपने शिशु की सेवा उसकी दासी बनकर उसके मलमूत्र को भी बड़े- प्रेम से परिष्कृत करती है।
माँ सारदा देवी की कृपा से महामण्डल के भावी नेताओं को भी उसी अवस्था का अनुभव  प्राप्त हो जाता है। और वह तब सहज रूप में 'शिव ज्ञान से जीव सेवा ' करने वाला सच्चा नेता (भगवान विष्णु ) बनने की दिशा में अग्रसर होने लगता है। वैसे मानवजाति के मार्गदर्शक नेता का नेतृत्व को ही 'दास के जैसा नेतृत्व ' कहते हैं। 

 श्रीरामकृष्ण वचनामृत के रिकॉर्डर श्री 'म'  (मास्टर ) उसी अवस्था को प्राप्त करने की प्रेरणा देते हुए गीता के उपरोक्त श्लोक का उद्धरण देते हुए, चतुर्थ-दर्शन के समय अपनी अवस्था का वर्णन करते हुए  यहाँ कह रहे हैं -  " ६ मार्च १८८२ को भी छुट्टी थी. दिन के तीन बजे मास्टर फिर आये... श्रीरामकृष्ण नरेंद्रादि भक्तों से कहने लगे, " देखो, एक मोर को किसी ने चार बजे अफीम खिला दी.दूसरे दिन से वह अफीमची मोर ठीक चार बजे आ जाता था ! यह भी अपने समय पर आया है." सब लोग हँसने लगे...श्रीरामकृष्ण आनन्द कर रहे हैं और बीच बीच में मास्टर को देख रहे हैं. मास्टर को सविस्मय बैठा देखकर उन्होंने रामलाल से कहा - " इसकी उम्र कुछ ज्यादा हो गयी है न, इसीसे कुछ गम्भीर है. ये सब हँस रहे हैं; पर यह चुचाप बैठा है." मास्टर की उम्र उस समय सत्ताईस साल की होगी.
बात ही बात में (दास्यभाव के) परम भक्त हनुमान की बात चली. " Sri Ramakrishna said: "Just imagine Hanuman's state of mind. He didn't care for money, honor, creature comforts, or anything else. He longed only for God.) हनुमान का एक चित्र श्रीरामकृष्ण के कमरे की दीवार पर टँगा था. श्रीरामकृष्ण ने कहा," देखो तो, हनुमान का भाव कैसा है ! धन, मान, शरीरसुख कुछ भी नहीं चाहते, केवल भगवान को चाहते हैं. 
[श्री'म' ठाकुर के उपदेश में गीता ६/२२ से नेता का गुण को बता रहे हैं - " श्री रामकृष्ण ने कहा, जरा हनुमान की (उस -जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति से परे मन की अतिचेतन अवस्था या तुरीय अवस्था) मानसिक अवस्था की कल्पना तो करो! हनुमान में दास नेतृत्व कैसे आया होगा ? इसको समझो। उन्होंने तुरीय अवस्था में पहुँचकर प्रभु श्रीरामचन्द्र के चरण-कमलों का साक्षात्कार कर लिया था। उस लाभ को प्राप्त कर लेने के बाद वे खुली आँखों से ध्यान करने अर्थात हर मनुष्य शरीर को श्रीराम का मंदिर देखने में समर्थ थे।]  
 जब हनुमान स्फटिक-स्तम्भ के भीतर से ब्रह्मास्त्र निकाल कर भागे, तब मन्दोदरी नाना प्रकार के फल लेकर लोभ दिखाने लगी. उसने सोचा कि फल के लोभ से उतरकर शायद ये ब्रह्मास्त्र फेंक दें; पर (ज्ञानिनाम अग्रगण्यम) हनुमान इस भुलावे में कब पड़ने लगे ?
  (When he was running away with the heavenly weapon that had been secreted in the crystal pillar, Mandodari began to tempt him with various fruits so that he might come down and drop the weapon. But he could not be tricked so easily.) तब हनुमान ने यह गीत गाया-
Am I in need of fruit?I have the Fruit that makes this lifeFruitful indeed. Within my heartThe Tree of Rama grows,Bearing salvation for its fruit.
-मुझे क्या फलों का आभाव है ?
मुझे जो फल (यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।) प्राप्त हुआ है,
 उससे मेरा जन्म सफल हो गया है. मेरे हृदय में मोक्षफल के वृक्ष श्रीरामचन्द्रजी है.
Under the Wish-fulfilling Tree
Of Rama do I sit at ease,
Plucking whatever fruit I will.
But if you speak of fruit --
No beggar, I, for common fruit.
Behold, I go,
Leaving a bitter fruit for you."
  
श्रीराम-कल्पतरु के नीचे बैठा रहता हूँ; जब जिस फल की इच्छा होती है,
वही फल (यस्मिन स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।।) खाता हूँ .
किन्तु तुम यदि फल दिखा कर ललचाना चाहती हो, तो मैं तेरे सामान्य फल को 
चाहने वाला कोई भिखारी नहीं हूँ.
तू मुझे फल न दिखा, मैं इसका प्रतिफल दे जाऊंगा. "
  इसी भाव का एक गीत श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं. फिर वही समाधि; देह निश्चल, नेत्र स्थिर. बैठे हैं, जैसी मूर्ति फोटोग्राफ में देखने को मिलती है. भक्तगण अभी इतना हँस रहे थे पर अब सब एक दृष्टि से श्रीरामकृष्ण की इस अद्भुत अवस्था का दर्शन करने लगे. मास्टर दूसरी बार यह समाधि-अवस्था देख रहे थे.
(श्रीरामकृष्णवचनामृत/प्रथम भाग/पृष्ठ २०)         

         

Master and Disciple
Fourth Visit - March 1882.

Hanuman's devotion to Rama
Sri Ramakrishna was having great fun with the young devotees; now and then he glanced at M. He noticed that M. sat in silence. The Master said to Ramlal: "You see, he is a little advanced in years, and therefore somewhat serious. He sits quiet while the youngsters are making merry." M. was then about twenty-eight years old.
The conversation drifted to Hanuman, whose picture hung on the wall in the Master's room.
    Sri Ramakrishna said: "Just imagine Hanuman's state of mind. He didn't care for money, honor, creature comforts, or anything else. He longed only for God. When he was running away with the heavenly weapon that had been secreted in the crystal pillar, Mandodari began to tempt him with various fruits so that he might come down and drop the weapon. But he could not be tricked so easily. In reply to her persuasions he sang this song:
  Am I in need of fruit?I have the Fruit 
  that makes this life Fruitful indeed.
 (The story referred to here is told in the Ramayana. Ravana had received a boon as a result of which he could be killed only by a particular celestial weapon. This weapon was concealed in a crystal pillar in his palace. One day Hanuman, in the guise of an ordinary monkey, came to the palace and broke the pillar. As he was running away with the weapon,he was tempted with fruit by Mandodari, Ravana's wife, so that he might give back the weapon. He soon assumed his own form and sang the song below.)
================

No comments: