Thursday, January 20, 2011

अष्टांग-योग के पाँच सोपानों में सम्पूर्ण शिक्षा का सार है !

शिक्षा शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘शिक्ष्’ धातु से हुयी है, जिससे अभिप्राय है, सीखना- अर्थात गुरु-वाक्य में निहित भावों य़ा सिद्धान्तों को आत्मसात कर लेना. स्वामी विवेकानन्द चरित्र-निर्माणकारी एवं मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा पर बल देते हुए वे कहते हैं- " क्या तुमने इतिहास में नहीं पढ़ा है कि देश के मृत्यु का चिन्ह अपवित्रता (भ्रष्टाचार) य़ा चरित्रहीनता के भीतर से होकर आया है- जब यह किसी जाति में प्रवेश कर जाति है, तो समझना कि उसका विनाश निकट आ गया है....इस समय हम पशुओं की अपेक्षा कोई अधिक नीतिपरायण नहीं हैं. यदि समाज आज कह दे कि चोरी करने से अब दण्ड नहीं मिलेगा, तो हम इसी समय दूसरे की सम्पत्ति लूटने को दौड़ पड़ेंगे. पुलिस का डण्डा ही हमें सच्चरित्र बनाये रखता है, य़ा सामाजिक प्रतिष्ठा के लोप की आशंका ही हमें नीतिपरायण बनाती है, और वास्तविकता तो यही है कि हम पशुओं थोड़ा अधिक बेहतर हैं." (ज्ञान-योग :३२,२७५)  
अन्यत्र वे कहते हैं- " Education is assimilation of ideas  - भावों (पढने के बाद गाय जैसा पागुर करके भावों को पचा लेना) का आत्मसातीकरण ही शिक्षा है." 
और गुरु-वाक्य में निहित भावों को तबतक आत्मसात नहीं किया जा सकता जब तक मन को एकाग्र करने का कौशल न सीख लिया जाय.शिक्षा के लिये मनः संयोग य़ा एकाग्रता का कितना महत्व है, इसे स्पष्ट करते हुए स्वामीजी कहते हैं-" मेरे विचार से तो शिक्षा का सार मन की एकाग्रता प्राप्त करना है, तथ्यों का संकलन नहीं. यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्यन कदापि न करूँ. मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति की सामर्थ्य बढ़ाता और उपकरण के पूर्णतया तैयार होने पर उससे इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता." 
हम यह भी समझ सकते हैं कि मन में अनन्त शक्ति है जिसका प्रयोग करके नये-नये आविष्कारों द्वारा मानव-सभ्यता ने इतनी आश्चर्य जनक प्रगति की है. किन्तु उसके अत्यधिक चंचल हो जाने के कारण हम उसका अपनी इच्छानुसार प्रयोग करके जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं. अतः मन को अतिरिक्त चंचल बना देने वाले - काम, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या आदि रिपुओं को अपना सबसे बड़ा शत्रू समझ कर उनके साथ युद्ध करके सबसे पहले उनको ही परास्त कर देना होगा. असली वीरता बाहर के शत्रुओं को जीत लेने में नहीं है, अपने मन में छुपे शत्रुओं को पहचान कर उनको खत्म करने में है. जिनके रहने के कारण मन इतना अधिक चंचल हो जाता है कि उसको एकाग्र करना बहुत कठिन जान पड़ता है; और हम मन कि असीम शक्ति को अपने उपयोग में लाकर अपने जीवन के चरम लक्ष्य (अमृतत्व ) की प्राप्ति करने से वंचित रह जाते हैं.
इन्ही सब कारणों को ध्यान में रख कर बहुत प्राचीन काल में ही महर्षि पतंजली ने आठ सोपान में मन को एकाग्र करने की एक वैज्ञानिक पद्धति का आविष्कार किया था- जिसे ' अष्टांग योग ' कहा जाता है. इस पद्धति को उन्होंने संस्कृत-सूत्र के रूप लिख कर संग्रहित किया था, साधारण मनुष्य उन सूत्रों को बिल्कुल नहीं समझ पाते थे. प्राचीन ऋषि लोग ऐसा मानते थे कि जो मनुष्य उच्च विद्या ग्रहण करने का योग्य अधिकारी होगा वह इन इन सूत्रों को पढ़ कर स्वयं ही समझ जायेगा.
किन्तु समस्त मानवता से प्रेम करने वाले आधुनिक ऋषि स्वामी विवेकानन्द अपने ' भारत का भविष्य' नामक अपने Lecture में कहते हैं- " मेरा विचार है, पहले हमारे शास्त्र में भरे पड़े आध्यात्मिकता के रत्नों को, जो कुछ ही व्यक्तियों के अधकार में मठों और अरण्यों में छिपे हुए हैं, बाहर लाना है. जिन मठाधीशों के अधिकार में ये छिपे हुए हैं, केवल उन्हीं से इस ज्ञान का उद्धार करना नहीं, वरन उससे भी दुभेद्य पेटिका अर्थात जिस भाषा (संस्कृत य़ा बंगला भाषा) में ये सुरक्षित हैं, उन शताब्दियों के पर्त खाए हुए संस्कृत शब्दों से उन्हें निकालना होगा. तात्पर्य यह कि मैं उन्हें सबके लिये सुलभ कर देना चाहता हूँ. मैं इन तत्वों को निकलकर सबकी, भारत के प्रत्येक मनुष्य की, सामान्य सम्पत्ति बनाना चाहता हूँ, चाहे वह संस्कृत जानता हो य़ा नहीं...अतः मनुष्यों की बोलचाल की भाषा (हिन्दी) में उन विचारों की शिक्षा देनी होगी. साथ ही संस्कृत की भी शिक्षा अवश्य होती रहनी चाहिये, क्योंकि संस्कृत शब्दों की ध्वनी मात्र से ही जाति को एक प्रकार का गौरव, शक्ति और बल प्राप्त हो जाता है." (५:१८३-८४) 
 अष्टांग-योग को 'योग-सूत्र '-अर्थात ‘योग के सूत्रों का संग्रह या संकलन' के नाम से भी जाना जाता है.
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोः – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, अष्टौ – ये आठ, अङ्गानि— (योग के) अंग हैं।
  किन्तु अपने गुरु श्रीरामकृष्ण से प्राप्त निर्देश के अनुसार स्वामी विवेकानन्द युवाओं को यह परामर्श देते हैं कि अष्टांग-योग के तीन सोपान - प्राणायाम, ध्यान और समाधि का अभ्यास इस समय करने कि जरूरत नहीं है, इसके सेष बचे पाँच चरणों - 'यम,नियम, आसान, प्रत्याहार, धारणा' तक का अभ्यास करने से ही मन को एकाग्र किया जा सकता है. 
उसमे से पहले दो सोपान - 'यम और नियम' का अभ्यास अपने दैनन्दिन जीवन में प्रतिदिन प्रति मुहूर्त करना है. सेष तीन-' आसन, प्रत्याहार, धारणा ' का अभ्यास प्रतिदिन दो बार निर्दिष्ट समय पर प्रातः और संध्या के समय करना है.
यम का अर्थ है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह. इस यम से चित्तशुद्धि होती है. शरीर,मन, वचन के द्वारा किसी को क्लेश न देना -यह अहिंसा कहलाता है. अहिंसा से बढ़ कर कोई धर्म नहीं है. सत्य के द्वारा हम कर्म-फल के भागी होते हैं, सत्य से सबकुछ मिलता है; सत्य में सबकुछ प्रतिष्ठित है. यथार्थ कथन को ही सत्य कहते हैं. चोरी से य़ा धमकी देकर दूसरों की चीज न लेने का नाम है अस्तेय. कभी भी संयम को त्याग कर पशु अस्तर में नहीं गिरना, शरीर मन से पवित्र रहने को ब्रह्मचर्य कहते हैं. अत्यन्त कष्ट के समय भी किसी मनुष्य से कोई उपहार (रिश्वत) ग्रहण न करने को अपरिग्रह कहते हैं.अपरिग्रह साधना का उद्देश्य यह है कि किसी से कुछ gift य़ा घूस लेने से ह्रदय अपवित्र हो जाता है, वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है और बद्ध एवं आसक्त हो जाता है. अतः ये 5 do not doe's हैं, इन सबसे विरत रहना है. 
नियम- अर्थात नियमित अभ्यास और व्रत परिपालन. शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणीधान- इन्हें नियम कहते हैं. बाह्य और आन्तरि दोनों ही शुद्धि आवश्यक है. तृष्णा कि पूर्ति कभी नहीं हो सकती, अतः जितना आवश्यक है, उतना मिल जाने पर संतुष्ट रहना चाहिये.स्वाध्याय -सद्ग्रंथों का पाठ करना.ईश्वरप्रणीधान- यह विश्वास करना कि सृष्टि के पीछे एक स्रष्टा जरुर है, वही सत्य हमारी आत्मा में हैं, जिसके कारण यह स्थूल शरीर -चलता,बोलता है. 'माटी के पुतलो कैसे नचत हैं ?' अपने अन्तर्निहित सत्य को जानने के लिये सतत प्रयत्नशील रहना. और उस सत्य तक पहुँचने के लिये किसी भी कष्ट को सहने के लिये- तप के लिये तत्पर रहना. य़ा लक्ष्य तक पहुँचने के लिये कष्ट उठाने को तत्पर रहना. प्रातः काल उठना स्वाध्याय नित्य करना.  ये हैं 5 doe's इनका तथा उपरोक्त 5 do not doe's का अभ्यास प्रति मुहूर्त करना है. यह तो यम और नियम के बारे में हुआ. उसके बाद है आसन. 2.46    स्थिरसुखम् स्थिर पूर्वक तथा सुखयुक्त (बैठने की स्थिति) आसनम् आसन है।
आसन के आन्तरिक महत्व को समझना-इस प्रकार बैठना जिससे शरीर में कष्ट न हो. मेरुदण्ड और गर्दन सीधा रख कर straight बैठना है. परिवेश को स्वच्छ, सुगन्धित बना लेने से मन आनन्दित रहता है. अतः ऐसा नहीं समझना चाहिये की संख बजाना, घंटी-चंवर डोलना, होम-हवन करना य़ा पद्मासन में बैठने से ही एकाग्रता का अभ्यास किया जा सकता है. यह सब बाह्य-अनुष्ठान य़ा rituals है, इसको ही महत्व नहीं देना है. अर्धपद्मासन में बैठ कर य़ा सुखासन में बैठ कर भी एकाग्रता का अभ्यास किया जा सकता है. 
किसी आश्रम में साधुजी सुबह में जब अपने शिष्यों को प्रवचन देते थे, तो उसी समय उनकी एक पालतू बिल्ली आ कर उन्हें disturb करती थी. उन्होंने अपने प्रधान शिष्य को यह आदेश दिया कि प्रवचन के समय इस बिल्ली को एक खूंटे से बांध देना. कालान्तर में बूढ़े होकर वह साधुजी, उनका प्रधान शिष्य भी मर गये और वह बिल्ली भी मर गयी. जो नये साधु गद्दी पर बैठे- उन्होंने सोंचा कि जब तक एक काली बिल्ली को खोज कर उस खूंटे से न बंधा जाये तबतक प्रवचन का प्रारम्भ ही नहीं हो सकता. इसी तरह बाह्य अनुष्ठान को ही सबकुछ नहीं मान लेना है.
प्रत्याहार - अब कोई पूछे,कि एकाग्रता का अभ्यास करने के लिये फिर आसान में बैठने की भी क्या आवश्यकता है? "अनुभव-शक्तियुक्त इन्द्रियाँ लगातार बहिर्मुखी हो कर काम कर रही हैं और बाहर की वस्तुओं के सम्पर्क में आ रही हैं. उनको अपने वश में लाने को प्रत्याहार कहते हैं. अपनी ओर खींचना अर्थात अन्तर्यामी गुरु, विवेक-शक्ति की ओर आहरण करना- यही प्रत्याहार शब्द का प्रकृत अर्थ है."   चुपचाप silence में बैठ कर मन का पर्यवेक्षण करना है- मन में उठने वाले विचारों, दृश्यों को देखने के लिये- अपने मन में उठ रहे विचारों के बुलबुलों का पर्यवेक्षण करने से अन्तरदृष्टि विकसित हो जाति है. इसके लिये बहिर्मुखी मन को अन्तर्मुखी य़ा गुरुमुखी बना कर इसे दो भाग में मानो बाँट दिया जाता है- और द्रष्टा मन से दृश्य मन में उठने वाले विचारों य़ा उभरते हुए चित्रों का अवलोकन करना है. 
अर्धपद्मासन में बैठ कर पहले टकटकी बांध कर अपने पहले से चयनित युवा-आदर्श (Role -Model) के चित्र को थोड़ी देर तक देखने के बाद आँखों को मूंद कर पहले मन को उसकी इच्छानुसार किसी भी इन्द्रिय विषयों में जाने की छूट देंगे. जब मन किसी मतवाले हाथी की तरह उन्मत्त दिखाई देने लगेगा तो उसे वस में करने के लिये विवेक रूपी अंकुश मार कर, श्रेय-प्रेय का विचार करके एक ओर, श्रेय की ओर खींचेंगे.
धारणा - इन्द्रिय विषयों से खींच कर अन्तर्मुखी बने मन को अपने शरीर में किसी विशिष्ट स्थान- ह्रदय कमल में धारण करना होगा. किसी निराकार आदर्श के बारे में चिन्तन करना कठिन होता है, तथा किसी मूर्तमान पवित्र आदर्श पर मन को टिकाये रखना य़ा साकार नाम-रूप का चिन्तन करना सरल होता है. अतः अपने ह्रदय कमल पर बैठाने के लिये पहले से ही किसी मूर्त आदर्श का चयन कर लेना अच्छा होगा. हमारा परामर्श है कि अपने ह्रदय कमल पर मूर्त आदर्श के रूप में स्वामी विवेकानन्द की मूर्ति स्थापित कर- उनके ऊपर मन को धारण करना - Concentrate  करना  उचित होगा. अर्थात उस समय मन को past-future के बारे में बकबक करने से रोक कर अपने इष्ट के नाम-रूप-वाणी के ऊपर चिन्तन करना है - मानो वे कह रहे हों - " तुम हो मेरे भाई निरंजन, शुद्ध-बुद्ध-निष्पाप! उठो, जाग्रत हो जाओ. हे महान, यह नींद तुम्हें शोभा नहीं देती. उठो, यह मोह तुम्हें भाता नहीं. तुम अपने को दुर्बल और दुखी समझते हो ?
हे सर्वशक्तिमान, उठो, जाग्रत होओ, अपना स्वरुप प्रकाशित करो. तुम अपने को पापी समझते हो, यह तुम्हें सोभा नहीं देता.
तुम अपने को दुर्बल समझते हो, यह तुम्हारे लिये उचित नहीं है. जगत से यही कहते रहो, अपने से यही कहते रहो- देखो इसका क्या शुभफल होता है; देखो, कैसी विद्युत् की चौंध जैसा सबकुछ प्रकाशित हो जाता है, और क्षण मात्र में सबकुछ कैसे परिवर्तित हो जाता है. 
मनुष्यजाति से यही कहते रहो - उसे उसकी शक्ति दिखा दो. " (व्यवहारिक जीवन में वेदान्त-२०)   
व्यास के द्वारा महर्षि पतञ्जलि के योग सूत्र पर दी गयी व्याख्या य़ा ' व्यास-भाष्य' 1.12॥ में कहा गया है-
चित्तनदी नामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च।या तु,
 कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। 
संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा।तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते।

विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्धाटयत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
-अर्थात चित्तनदी (मन) का प्रवाह दोनों तरफ हो सकता है, वह कल्याण की दिशा य़ा पाप की दिशा में भी प्रवाहित हो सकती है. जब उसका प्रवाह विवेक के तली से, अन्तर्मुखी दिशा में होता है, तो वह कल्याण की दिशा है. जब मन बहिर्मुखी होकर इन्द्रियविषयों के भोगों के लोभ वश संसार की ओर अधिक दौड़ने लगे तो, उस 'पापवहा'-प्रवाह को वैराग्य का फाटक लगा कर, अर्थात लालच कम करके, अन्तर्यामी गुरु 'विवेक' का दर्शन करने का अभ्यास करने से 'विवेकस्रोत' उदघाटित हो जाता है. 
 चित्त की वृत्तियों का निरोध- अर्थात 'योग' इन्हीं दो प्रवाहों पर निर्भर है." अतः हमलोग पवित्रता और प्रेम के मूर्त रूप चिर-युवा स्वामी विवेकानन्द के चित्र पर ही मन को एकाग्र करने का प्रयास करेंगे, शायद इसी लिये भारत सरकार ने भी १२ जनवरी को युवा दिवश घोषित किया है. 
परन्तु किसी के इष्ट पहले से ही पवित्रता और प्रेम के मूर्ति कोई अन्य महापुरुष - ईसा, नानक, बुद्ध, राम, कृष्ण , य़ा काबा का पवित्र पत्थर हो, तो वह उनके ऊपर भी मन को एकाग्र करने का अभ्यास कर सकते हैं. य़ा यदि कोई नास्तिक हो, तो वह कैंडल के लौ पर भी मन को एकाग्र रखने का अभ्यास कर सकता है. यही है धारणा.
किन्तु चेष्टा करने से भी मन तुरन्त दास नहीं बन जाता. वह बिगड़ा हुआ बच्चे जैसा है, उसकी आदतें खराब हैं- वह हाथ से लगाम खींच कर पुनः रूप,रस, गंध, शब्द, स्पर्श आदि इन्द्रिय विषयों में भाग जाता है, बहिर्मुखी हो जाता है. उसकी भाग-दौड़ से हार माने बिना, पुनः खींच कर सामने लाना है, उसको आदेश देना है, साथ साथ बालक जैसा समझाना है- ' तू क्या मुझे पशु बनाना चाहता है? तू मेरा यंत्र है, मैं तुम्हारा प्रभु हूँ, अभी मेरे सामने बैठ कर चुपचाप स्वामीजी की वाणी य़ा त्रिदेवों की वाणी पर चिन्तन करना है- थोड़ी देर तक भूत-भविष्य के बारे में बकबक करना बन्द करके इनकी वाणी सुनो!
कुछ लोग इस भाग-दौड़ से घबडा कर प्रश्न करते हैं- ६ महिना से तो मनः संयोग का अभ्यास कर रहा हूँ, पूर्ण तौर पर मन को नियन्त्रण करने में अभी और कितना दिन लग जायेगा ? यह कोर्स कितने  दिनों का है ? स्वामी विवेकानन्द इसी बात पर एक कथा कहते थे-
."नारद नामक एक महान देवर्षि थे. जैसे मनुष्यों में ऋषि य़ा बड़े बड़े योगी रहते हैं, वैसे ही देवताओं में भी बड़े बड़े योगी हैं नारद भी वैसे ही एक अच्छे और अत्यन्त महान योगी थे वे सर्वत्र भ्रमण किया करते थे.नारदजी प्रभु के परम-भक्त थे, श्रीहरी के पास उनका आना-जाना लगा रहता था. वे जब कभी चाहें नारायण के पास आ-जा सकते थे. नारद के लिये भगवान के पास जाने, य़ा इस दृष्टिगोचर जगत के परे जाने य़ा beyond time and space जाने में कोई बाधा नहीं थी. 
एक दिन नारदजी वीणा बजाते हुए हरी-नाम करते हुए प्रभु के यहाँ (बैकुण्ठ-लोक) जा रहे थे, वन में से जाते हुए उन्होंने देखा कि एक मनुष्य ध्यान में इतना मग्न है, और इतने दिनों से एक ही आसन पर बैठा है कि उसके चारों ओर दीमक का ढेर लग गया है. उसने नारद से पूछा, ' प्रभो, आप कहाँ जा रहे हैं'? नारदजी ने उत्तर दिया, 'मैं बैकुण्ठ जा रहा हूँ.' तब उसने कहा,'अच्छा,आप भगवान से पूछते आयें, वे मुझ पर कब कृपा करेंगे, मैं कब मुक्ति प्राप्त करूँगा.' फिर कुछ दूर और जाने पर नारदजी ने एक दूसरे मनुष्य को देखा. वह कूद-फांद रहा था, कभी नाचता था तो कभी गाता था. उसने भी नारदजी से वही प्रश्न किया. उस व्यक्ति का कंठस्वर, वागभ्न्गी आदि सभी उन्मत्त के समान थे. नारदजी ने उसे भी पहले के समान उत्तर दिया. वह बोला, 'अच्छा, तो भगवान से पूछते आयें, मैं कब मुक्त होऊँगा.' 
 लौटते समय नारदजी ने दीमक के ढेर के अन्दर रहनेवाले उस ध्यानस्थ योगी को देखा. उस योगी ने पूछा, ' देवर्षे, क्या आपने मेरी बात पूछी थी ?' नारदजी बोले, 'हाँ, पूछी थी.' योगी ने पूछा, 'तो उन्होंने क्या कहा ?' नारदजी ने उत्तर दिया,' भगवान ने कहा- ' अभी जितनी कठोर तपस्या कर रहा है, ऐसी ही कठोर तपस्या और चार जन्मो तक करेगा, इस प्रकार बार बार तपने और मरने के बाद उसे मुक्ति प्राप्त होगी.' तब तो वह योगी घोर विलाप करते हुए कहने लगा, ' हे भगवान तुम कितने निष्ठूर हो ! तुमने मुझ पर थोड़ी भी दया नहीं की ?मैंने इतना ध्यान किया है कि मेरे चारों ओर दीमक का ढेर लग गया, फिर भी मुझे और चार जन्म लेने पड़ेंगे!!' 
थोड़ी दूर जाने पर फिर वही भजनानन्दी साधु मिले, जो नाचते-गाते भजन कर रहे थे.उसने भी पूछा, ' क्या आपने मेरी बात भगवान से पूछी थी?' नारदजी बोले, ' भगवान ने कहा है, 'उसके सामने जो इमली का पेड़ है, उसके जितने पत्ते हैं, उतनी बार उसको जन्म ग्रहण करना पड़ेगा.' यह बात सुन कर, वह व्यक्ति हताश होने के बजाय और जोर जोर से नाच-गा कर प्रभु का नाम कीर्तन करने लगा और बोला,' हे प्रभु, तुम कितने दयालु हो ! तुमने मुझ जैसे अकिंचन का भी ध्यान रखा है ! और मैं इतने जन्मो तक तेरा नाम कीर्तन करता रहूँगा तो मेरी मुक्ति अवश्य होगी.' वह बड़े आनन्द से नृत्य करने लगा.'
मैं इतने कम समय में मुक्ति प्राप्त करूँगा !' तब एक आकाशवाणी सुनाई पड़ी, एक देववाणी हुई- 'वत्स, मैं तुम पर अति प्रसन्न हूँ, तुम इसी क्षण मुक्ति प्राप्त करोगे.' ईश्वर का यह वरदान उनको अपने अध्यवसाय-शीलता, य़ा अटूट धैर्य का पुरष्कार के रूप में प्राप्त हुआ. 
कथा का मर्म यह है कि,
वह दूसरा व्यक्ति इतना अध्यवसाय सम्पन्न था ! उसने ठान लिया था कि परम वस्तु को पाने के लिये मैं लाख जन्मों तक भी साधना करने को तैयार हूँ! उसे यह दृढ विश्वास था, कि यदि एकाग्रता का अभ्यास लगातार करता रहूँगा- पूरे अध्यवसाय के साथ तो मुझे अवश्य सफलता मिलेगी. परन्तु जो योगी चार जन्मों की बात सुनकर ही घबड़ा गया, और धैर्य छोड़ दिया उसको फल नहीं मिला. परन्तु जो व्यक्ति नारद जी के वचन को सत्य मान कर उनकी आज्ञानुसार लाख जन्मों तक साधना करने को प्रस्तुत था- उसको उसी क्षण मुक्ति मिल गयी." (१:१०५-६) 
सार बात यही है कि एकाग्रता की विद्या अर्जित करने के लिये हमे भी - अष्टांग के ५ अंगों का अभ्यास पूरे अध्यवसाय के साथ करते रहना होगा, तथा इस देह के नाश होने के बाद जब दूसरा देह प्राप्त होगा- तो उस देह से भी पुनः इसी अभ्यास को करूँगा और सिद्धि प्राप्त किये बिना नहीं रुकुंगा. ' लक्ष्य तक पहुँचे बिना विश्राम नहीं लूँगा ! इसी को दृढ संकल्प कहते हैं. 
हमे भी अष्टांग योग के ५ अंगों- 'यम,नियम, आसन, प्रत्याहार, धारणा ' को दो भागों में विभक्त कर, प्रथम दो अंग- ' यम-नियम' पर बहुत जोर देना होगा. महामण्डल के वरिष्ठ सदस्य लोग कई जगहों पर जाते हैं, उन्हें अक्सर सुनने को मिलता है- ' भैया जी, इतने दिनों से तो अभ्यास कर रहा हूँ, पर मनः संयोग कहाँ हो पाता है?' 
४४ साल के अनुभव के आधार पर जब वे उनसे पूछते हैं- ' मनः संयोग की पद्धति को जानते हो? तब वह भाई योग सूत्र के केवल ५ अंग बोलने के बजाय आठो सोपान फटाफट बोल जाता है. परन्तु जब वे उनसे पूछते हैं- ' क्या तुम सर्वदा झूठ बोलने से बचते हो और सत्य बात ही कहते हो ? लोभ कम हुआ है? संतोष आया है? परम तत्व को पाने के लिये, ' तपः ' - कुछ कष्ट उठाकर भी अभ्यास की दिनचर्या का पालन करते हो? काम,लोभ,ईर्ष्या, परदोष दर्शन य़ा पर-चर्चा में ही तो समय नहीं बिताते? अहंकार आदि मन के विकार कम हुए ? ईर्ष्या तो नहीं करते? 
आचरण में यदि यम-नियम का पालन २४ घन्टा प्रर्ति मुहूर्त करते रहा जाय- तो मन की अतिरिक्त चंचलता अवश्य दूर हो जाएगी. अगर हम मन को पूरीतरह से वशीभूत करके उसको अपना दास न भी बना सके तो कोई हर्ज नहीं, किन्तु 5 do not doe's और 5 doe's का अभ्यास करने से इतना लाभ तो अवश्य हगा कि मन कि अतिरिक्त चंचलता अवश्य दूर हो जाएगी, जीवन में संयम आयेगा हमारा चरित्र भी क्रमशः सुन्दर होने लगेगा. अधिकांश व्यक्ति मनः संयोग के दूसरे अंग,'आसन-प्रत्याहार-धारणा' का अभ्यास दिन भर में दो बार कर लेना यथेष्ट समझते हैं, और शिकायत करते हैं- कहाँ कुछ हो रहा है ? इसके साथ साथ ५ यम और ५ नियम का प्रति मुहूर्त अभ्यास करने से ही चरित्र गठित होता है. स्वामी विवेकानन्द कहते थे, ' यम-नियम का पालन करना केवल मनः संयोग का ही नहीं, वरन चरित्र-गठन का भी प्रथम सोपान है.' 
  इसी बात को रेखांकित करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " असत अभ्यास (भ्रष्टाचार) का एकमात्र प्रतिकार है- उसका विपरीत अभ्यास. हमारे चित्त में जितने असत अभ्यास (रिश्वतखोरी आदि)  संस्कारबद्ध हो गये हैं, उन्हें सत अभ्यास द्वारा नष्ट करना होगा. केवल सत्कार्य कार्य(यम-नियम का पालन) करते रहो, सर्वदा पवित्र चिन्तन करो; असत संस्कार (भ्रष्टचार) रोकने का बस, यही एक उपाय है. ऐसा कभी मत कहो कि अमुक (आयेदिन छापे में पकड़ने वाले भ्रष्ट नेताओं और पदाधिकारियों) के उद्धार की कोई आशा नहीं है. क्यों? इसलिए कि वह व्यक्ति केवल एक विशिष्ट प्रकार के चरित्र का - कुछ अभ्यासों की समष्टि मात्र है, और ये अभ्यास नये और सत अभ्यास से दूर किये जा सकते हैं.चरित्र बस, पुनः पुनः अभ्यास की समष्टि मात्र है और इस प्रकार (यम-नियम) का पुनः पुनः अभ्यास ही चरित्र का सुधार (य़ा भ्रष्टाचार मुक्त) कर सकता है."
अष्टांग योग के केवल ५ सोपानों, 'यम-नियम-आसन-प्रत्याहार- धारणा ' के अभ्यास को शिक्षा का अंग बना लेने से भारत की समस्त समस्याओं का निदान हो सकता है, क्योंकि पतंजलि वैज्ञानिक भाषा में बात करते हैं।
     अष्टांग-साधना के बारे में इस वैज्ञानिक पद्धति के आविष्कारक महर्षि पतंजलि स्वयं कहते हैं- 2.31    जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः – (उपरोक्त संयम) जाति, देश, काल और समय की सीमा से रहित, सार्वभौमा सार्वभौम होने पर, महाव्रतम् महाव्रत (के स्वरूप वाले) हैं।
अतः इसका अभ्यास किसी भी धर्म-संप्रदाय के अनुयायी य़ा नास्तिक भी कर सकते हैं." अष्टांग-योग " कोई धर्म-ग्रन्थ नहीं बल्कि एक विज्ञान है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। योग एक विज्ञान है, विश्वास नहीं है। जो कोई भी व्यक्ति इसका अभ्यास करेगा, सब को एक ही परिणाम प्राप्त होगा- उसका चरित्र अवश्य निर्मित हो जायेगा.
 

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