शुक्रवार, 26 जून 2009

' १२ दुर्गुण जिन्हें चरित्र से निकालना होगा ' " नेति से ईति "

भूमिका:-
श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय; अद्यक्ष, "अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल " द्वरा रचित इस पुस्तिका- " नेति थेके ईति " में, उन १२ निबंधों को संकलित किया गया है, जो महामण्डल की द्विभाषी मासिक पत्रिका 'Vivek-Jivan' में बंगला भाषा प्रकाशित किए गए थे। ये सभी निबंध पत्रिका के विभिन्न अंकों में, विभिन्न समय पर प्रकाशित होते हुए भी विचार की दृष्टि से एक सामान प्रतीत होते हैं। सभी निबंधों का शीर्षक ' नेति-वाचक ' होते हुए भी, आप इनके पार्श्व में स्वामी विवेकानन्द के ' ईति-वाचक ' भावों को ही देख सकते हैं। आशा है यह पुस्तिका युवावर्ग को स्वामीजी के आदर्श भावों के अनुरूप अपना सुंदर चरित्र गठित करने में, बहुत सहायक सिद्ध होगी।
यहाँ इसी महामण्डल पुस्तिका को, ' नेति से ईति ' नाम देकर हिन्दी में प्रस्तुत कर रहा है, " झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल" का हिन्दी प्रकाशन विभाग। इसके पहले " चरित्र-निर्माण पद्धति " नामक पुस्तिका में आपने पढा था कि ' Aouto suggestion ' या ' स्व परामर्श ' की विधि को सीख कर चरित्र के- " २४ सद्गुणों " को जीवन में धारण करना है, और चरित्र में विद्यमान १२ दुर्गुणों को अपने दैनन्दिन व्यवहार से बाहर निकाल देने से ही जीवन- गठन होना सम्भव है। वे "२४ सद्गुण" कौन-कौन हैं ? उन्हे आप महामण्डल पुस्तिका " चरित्र के गुण " में पढ़ चुके है। अब यहाँ पढ़िये चरित्र में विद्यमान उन १२ दुर्गुणों के बारे में, जिन्हें हमें अपने जीवन से बाहर निकाल देना है।


1.जीवन-स्तर के मानदण्ड में वृद्धि नहीं।

वर्तमान युग में मनुष्य के जीवन को सुख-सुविधा पूर्ण बनाने के लिए न जाने कितने नये-नये रास्ते ढूंढ़ लिए गए हैं। यन्त्र और शिल्प विद्या से समृद्ध विज्ञान, अपने असंख्य आविष्कारों के साथ हमारी सेवा में तत्पर खड़ा है। विज्ञान की कृपा से न केवल इस विराट भूमंडल पर दूर-दुरांतर में अवस्थित विभिन्न देश एक-दूसरे के बिल्कुल निकट आ चुके हैं, बल्कि विभिन्न ग्रहों के बीच का अन्तर भी मिटता जा रहा है। विज्ञान ने प्रकृति द्वारा मुक्त हस्त से वितरित उपहारों का सदुपयोग करके, उन्हें मनुष्यों के लिए उपयोगी बना दिया है। विज्ञान की कृपा से आज हमलोगों को दिवश-अवसान के बाद अस्ताचलगामी सूर्य के विरह में, कातर हो कर अंधेरे में समय नहीं बिताना पड़ता है। विद्युत की शक्ति ने रात और दिन के अन्तर को मिटा दिया है।
आज का मनुष्य किसी भी प्रकार के प्राण-घातक व्याधियों का शिकार बन कर, असहाय की तरह मर जाने को विवश नहीं है। क्योंकि विज्ञान ने आज लगभग उन समस्त रोगों का प्रतिरोधक टीका या प्रतिकारक औषधि का निर्माण कर लिया है। भोजन-सामग्रियों को जुटाने के लिए भी आज हमलोग केवल प्रकृति के मन-मर्जी पर निर्भर हो कर बैठे नहीं रहते। कृषि उत्पादन के क्षेत्र में भी विज्ञान ने बहुत हद तक प्रकृति को नियंत्रित कर लिया है।
इस वैज्ञानिक उन्नति और यांत्रिक-सभ्यता की अग्रगति ने, निःसंदेह हमारे लिए सुख-भोगों को प्राप्त करने के सूयोग को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। किन्तु पर यांत्रिक-सभ्यता की यह प्रगति कुल-मिलाकर मानव जाती के लिए भी कितनी कल्याणप्रद हुई है, थोड़ा उस पर भी विचार करना आवश्यक है। कहाँ, साधारण मनुष्य आज बहुत सुखपूर्वक अपना जीवन बिता रहे हों, उनकी अवस्था को देखने से तो ऐसा महसूस नहीं होता। दुःख, कष्ट, दारिद्र्य सब कुछ तो यथा-वत् दीखता है। इसके उत्तर में कहा जाता है- ' हमारे इस दरिद्र देश में आर्थिक-वैषम्य इस सीमा तक बढ़ चुका है कि, साधारण जनता इस वैज्ञानिक और यांत्रिक अग्रगति के सुफल को भोगने से वंचित रह जाती
है, अतः यदि आर्थिक-दृष्टि से राष्ट्र को और उन्नत बना कर जन-साधारण के जीवन-स्तर के मानदण्ड को ऊँचा उठा दिया जाय तभी सारे लोग विज्ञान के आशीर्वाद का भरपूर उपभोग करने में सक्षम हो जायेंगे।' यह तर्क बिल्कुल ग़लत है, ऐसा कहने का मेरा अभिप्राय नहीं है। यह ठीक है कि देश के आर्थिक बुनियाद को और सुदृढ़ बना देने, तथा वितरण व्यवस्था को और न्यायसंगत बना देने से, हमलोग आज के वैज्ञानिक तथा यान्त्रिक प्रगति के सुफल को अधिक मात्रा में भोग करने में सक्षम हो जायेंगे। किन्तु मूल प्रश्न यह है कि, वैज्ञानिक और यान्त्रिक उन्नति के फलस्वरूप उपलब्ध भोगों कि मात्रा में वृद्धि, हमलोगों के जीवन को और अधिक सुखप्रद तथा शांतिमय बना पायेगी या नहीं ?
हो सकता है हमारा देश भौतिक दृष्टि से उन्नत न बन सका हो, यहाँ के जन-साधारण के जीवन-स्तर का मानदंड बहुत निम्न-श्रेणी का हो, किन्तु पृथ्वी पर ऐसे कई देश हैं जहाँ की आम-जनता के जीवन-स्तर का मान हमलोगों की तुलना में बहुत उन्नत है। उन देशों की आम-जनता की जीवन यात्रा में सुख-सुविधाओं का प्राचुर्य भरा है, वहाँ के नागरिकों को वैज्ञानिक और यान्त्रिक अग्रगति के समस्त सुफल आसानी से उपलब्ध हैं। अच्छा, तब तो वहाँ के सभी मनुष्य बड़े सुख-शान्ति से अपना जीवन व्यतीत करते होंगे ? आज हमलोगों के समाज में जो
अशांति- अस्थिरता दिखाई देती है, वे लोग तो इन बातों से जरुर मुक्त हो चुके होंगे ? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमलोगों को बहुत अधिक दूर नहीं जाना होगा। निःसंदेह उन्नत देशों के नागरिकों के जीवन-स्तर का मान बहुत ऊँचा है। हमलोगों कि तुलना में उनलोगों के सुख-भोग कि मात्रा अवश्य ही बहुत ज्यादा है। किन्तु इन सब के बावजूद वहाँ के जन-साधारण भी सामग्रिक रूप से ज्यादा सुखी नहीं हैं। मोटे तौर पर देखने से भी यह पता लग जाता है कि उनलोगों का जीवन भी अस्थिरता से परिपूर्ण है, इस विषय में कोई संदेह नहीं है। कष्टपूर्ण जीवन की ग्लानी और हताशा से मुक्ति पाने के लिए वहाँ के नागरिकों की छटपटाहट, आज जग-जाहिर हो चुकी है। किन्तु क्यों ? वहाँ नागरिक सब सुख-सुविधा उपलब्ध रहने पर भी सुख-चैन की नींद क्यों नहीं सो पा रहे हैं ?( स्लीपिंग पील की खपत वहीं सबसे ज्यादा क्यों है?)
निःसंदेह विज्ञान; वाह्य जगत् के अन्धकार को दूर हटा कर प्रकाश के आभाव को तो मिटा सकता है, किन्तु हमलोगों के मन पर जो गहरा अंधकार छाया हुआ है, उस अंधेरे को मिटा सकने की क्षमता उसमे नहीं है। दूरसंचार एवं सूचना प्रद्द्योगिकी के क्षेत्र में हुई महान प्रगति ने देश-देशांतर के बीच के फासले को बिल्कुल मिटा दिया है, किन्तु जड़ विज्ञान के पास यह क्षमता नहीं की वह पुरी दुनिया के मनुष्यों के दिलों के बीच के फासले को भी मिटा सके। पुरी दुनिया के मनुष्य, मन से भी एक-दूसरे के निकट आ जायें ऐसा करने की क्षमता विज्ञान में नहीं है। वाह्य जगत् के ऊपर हमलोगों का नियंत्रण चाहे जितना अधिक क्यों न हो जाय, किन्तु अपने-अपने मन के ऊपर हमलोगों का नियंत्रण क्रमशः कम से कमतर होता जा रहा है; तभी तो इतनी अशांति और अस्थिरता चहुँ ओर दृष्टिगोचर हो रही है।
तो फ़िर मनुष्यों का सुख-चैन किस वस्तु पर निर्भर करता है ? आख़िर क्या उपाय करने से मनुष्य थोडी सी शान्ति भी प्राप्त कर सकता है ? इसके लिए प्रयोजनीय है, अपनी सारी चेतना को केवल वाह्य भौतिक जगत की ओर न लगाकर, अपने अन्तर्निहित मनोजगत की ओर भी नियोजित करने की चेष्टा की जाय। जीवन-स्तर के मान को और ऊँचा से ऊँचा उठाते जाने के संग्राम में ही, अपनी समस्त उर्जा को न खर्च कर जीवन-मूल्यों के मान को बढाने की ओर भी समान रूप से ध्यान दिया जाय। जन-साधारण के भौतिक जीवन-स्तर के मान को चाहे जितना भी उन्नत क्यों न कर लिया जाय, उनके सुख-भोग की मात्रा को चाहे जितना भी क्यों न बढ़ा दिया जाय, जबतक हमलोग अपने ह्रदय को विशाल बनाने में अक्षम हैं, स्वार्थपरता की संकीर्ण परिधि को तोड़ कर, स्वार्थशुन्य बन जाने की साधना को प्रारम्भ नहीं करते, तबतक हमारे भीतर, हमारे ह्रदय में शान्ति नहीं आ सकती।

२ " कपटता नहीं "

वर्तमान युग मुख्यतः केवल बातें बनाने वालों का युग है। दुसरे शब्दों में कहें तो- यह युग 'कथनी और करनी' में कोई ताल-मेल नहीं रखने का युग है। हमारे 'मन' और 'मुख' एक ही सुर में बात नहीं करते, हमलोग मन ही मन कुछ और सोंचते हैं, मुख से कुछ और कहते हैं। मुख से निकलते मधुर-वाणी की आड़ में हम अपने मन की तिक्तता को बड़ी चतुराई से छिपा लेते हैं। हमलोग अपने मन में जैसा सोंच रहे होते हैं, मुख से ठीक उसका उल्टा कहते हैं। किन्तु एक सच्चाई यह भी है कि हम मुख से चाहे जितना भी 'मधु' उड़ेल दें, परन्तु हमारे व्यवहार के द्वारा हमारा असली मनोभाव प्रकट हो ही जाता है। इसी 'झूठी-विनयशीलता' या कपटता को वर्तमान युग का एक- " वैशिष्ट " भी कहा जा सकता है।यह 'कपटता'- भी आधुनिक 'यांत्रिक-सभ्यता' का एक अँग हो सकता है, या है ! आधुनिक समाज के अधिकांश मनुष्यों के लिए, " सरलता और सदाचार " - मानो 'निर्बुद्धिता' (बेवकूफी) का ही पर्यायवाची शब्द बन चुके हैं। आज के समाज में जो जितना अधिक 'कपटी' और 'गाल-बजाने में माहिर'- होता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान समझा जाता है।
आज हमलोग मुख से तो नीति और आदर्शों पर चलने की बातें कहते हैं, किन्तु अपने कार्यों से शायद ही कभी नीतिबोध या आदर्शवाद का परिचय देते हैं।यहीं देख लीजिये न, बड़े-बड़े जनसभाओं में हमलोग, या हम लोगों में से ही जो लोग 'नेता' बन गए हैं- वे माइक पकड़ लेने के बाद, शोषित, वंचित, जिन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं, वैसे मनुष्यों के लिए कितनी माया ममता सहानुभूति प्रकट करते हैं, आखों से आंसू भी निकाल देते हैं। किन्तु हम में कितने लोग ऐसे हैं, जो अपने प्राचुर्य भरे जीवन में भोग की मात्रा में से थोड़ी कटौती कर के इन सब हतभाग्य मनुष्यों को थोड़ी भी सहायता करते हों ?
हमलोगों में जो लोग वेतन-भोगी कर्मचारी हैं, अपने अभियोजकों से वेतन में बढोत्तरी कराने तथा अन्य अधिकारों बढ़वाने के लिए जिन-जिन तर्कों का सहारा लेते हैं, उन्ही तर्कों के आधार पर अपने घर में काम करने वाले धोबी, आया, या अन्य कर्मियों को वही सब सुविधा देने की मांग को मंजूर करने को राजी नहीं होते। हमलोग बढ़ती हुई महँगाई के कारण वेतन-वृद्धि का आन्दोलन करते हैं, किन्तु आन्दोलन के बाद जब वेतन में वृद्धि हो जाती है, स्वतः प्रेरित हो कर घर में काम करने वाले कर्मियों का वेतन नहीं बढ़ाते, जबकि महँगाई असर समान रूप से उन पर भी पड़ रहा होता है,या हो सकता है कि, वे हमसे भी अधिक असुविधा-ग्रस्त हों। हमलोग ऊँच-नीच का भेद मिटाकर, साम्यवाद लाने कि बात करते हैं, किन्तु वास्तव में हम स्वयं और अधिक ऊँच-स्तर में पहुँच जाने कि बात सोंचते हैं, या जो ऊँच स्तर पर हैं, उन्हें वहाँ से खींचकर अपने स्तर में उतार देने की जुगाड़ भिड़ाते रहते हैं।किसी भी हाल में निम्न-स्तर के लोगों को ऊपर उठाकर, अपने समान आसन पर बैठाना नहीं चाहते है।दुनिया के समस्त शोषित मनुष्यों के ऐक्य बात कहता हूँ, किन्तु वह केवल जन-समूह की सम्मिलित शक्ति का प्रदर्शन कर अपने लिए और अधिक सुविधा पाने का उपाय मात्र है। वास्तविकता तो यह है कि हमारे मन में अपने निकटतम सहयोगी के लिए भी ऐक्यानुभूती नहीं होती।मुख से विशेषाधिकार या विशेष सुविधा को समाप्त बातें करने पर भी, भीतर-भीतर हमलोग अपने लिए और अधिक सुख-सुविधा प्राप्त करने कि जुगत में लगे रहते हैं। सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि, कथनी और करनी में अथवा मन और मुख में- आधुनिक युग के मनुष्यों में ताल-मेल खोज पाना बहुत कठिन है।मुख से हमलोग चाहे जितने भी बड़े-बड़े आदर्शों कि बातें क्यों न कहते हों, किन्तु वास्तव में हमलोग घोर स्वार्थी हैं। मुख से निकलने वाली आदर्श कि बातें, हमलोगों के अपने-अपने स्वार्थ-साधने कि चालाकी के सिवा और कुछ भी नहीं है।
आज के समाज में हमलोग जितनी भी समस्याओं से अपने को घिरा हुआ पा रहे हैं, उनका विश्लेषण करने पर पता चलेगा कि, स्वार्थबोध का प्राधान्य,कपटाचार ही उन सबका मूल कारण है। केवल वर्तमान युग में ही नहीं, वरन सर्वकाल के सर्वयुगों में मनुष्यों कि समस्त समस्याओं और अशांति का मूल कारण यही कपटता या चालाकी ही है। कपटता के पथ पर चलने वालों का कभी कल्याण नहीं होता, क्योंकि इस पथ का जन्म घोर-स्वार्थबुद्धि से होता है। जहाँ प्रेम का आभाव, जहाँ सत्य-निष्ठा नहीं, आत्म-शक्ति में आस्था नहीं होती, वहीं पर मनुष्य कपटता और चालाकी का आश्रय ग्रहण करता है। व्यक्तिगत तौर पर हो सकता है कि कोई-कोई व्यक्ति चालाकी करके, सामयिक भाव से अपना स्वार्थ सिद्ध करने में सफल भी हो जाता हो, किन्तु सामग्रिक भाव से सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में यह पथ कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता।
युगनायक विवेकानन्द ने अपनी गम्भीर प्रज्ञा और स्पष्ट-धारणा कि शक्ति से राष्ट्रीय पतन के इस मूल कारण का पता लगा लिया था। इसीलिए उन्होंने हमें सतर्क करते हुए कहा था-
 " चालाकिर द्वारा कोन महत काज होय ना। "
- चालाकी के द्वारा कोई महान कार्य सम्पन्न नहीं होता ।
 उन्होंने हमलोगों को सत्यनिष्ठा,निःस्वार्थपरता और अकपटता के पथ पर चलने का निर्देश दिया है। उन्हीं के निर्देशानुसार हमलोगों के मन को मुख से निकले वचनों का अनुसरण करना होगा। अपने कार्यों के माध्यम से, अपने घोषित आदर्श को बिल्कुल सही रूप में साकार करना होगा। इस प्रकार कथनी और करनी में सामंजस्य ला सकने पर ही, आदर्श हमारे चरित्र में मूर्त रूप धारण कर लेगा। कपटजात दुर्बलता से मुक्त हो कर सत्यनिष्ठा के फलस्वरूप हमलोग असीम शक्ति के अधिकारी बन जायेंगे। स्वार्थशून्य मनुष्यों के उसी प्रचंड शक्ति के आघात से, समाज की समस्त शक्तियों को परास्त होना ही पड़ेगा।

३ " जंग(मोर्चा) लग कर मरना ठीक नहीं "

जिसके पास जो कुछ है, उसको अपने उपयोग में न लाना बुद्धिमानी का काम नहीं है। जितना हमारे पास हो, उसका व्यवहार करने से हमे बहुत लाभ पहुँचता है। किन्तु किसी भी वस्तु का यथोचित व्यवहार न करने से लाभ के बजाय हानी भी उठानी पड़ सकती है। उपलब्ध संसाधनों का यथोप्युक्त व्यवहार करना जरुरी है। वैसा व्यवहार निश्चित रूप से तभी हो सकता है, जब हमारे समस्त कार्यों पर विवेक का नियंत्रण हो। यहाँ उपयुक्त समय का भी ध्यान रखना आवश्यक है। उपयुक्त समय पर व्यवहार न करने से- या जो कुछ है उसको जब-तब व्यहार करते रहने से, बहुत बार दुष्परिणाम ही भुगतना पड़ता है, लाभ होना तो दूर की बात है। इसीलिए जो है, उसको उपयोग में न लगाकर यूँ ही बेकार पड़े रहने देना जिस प्रकार निर्बुद्धिता है, उसी प्रकार उपयुक्त समय का बिना विचार किए, जब तब उसका व्यवहार किया जाय तो वह लाभ दायक सिद्ध होने के बजाय , हानिकारक भी हो सकता है। जैसे बीज को घर में ही पड़े रहने दिया जाय तो किसी काम में नहीं आ सकता। उसी प्रकार असमय में यदि उसको बो दिया गया तो भी वह नष्ट ही हो जाएगा,साथ साथ खेत जुताई-बोआई करने में जितना खर्च और परिश्रम लगेगा वह सब भी व्यर्थ हो जाएगा।
अक्सर हमलोग बच्चों जैसी बुद्धि रखकर अपने कार्य करते हैं। हमारे चारो ओर भाँति-भाँति के खेलने कि सामग्रियाँ बिखरी हुई हैं। कभी इस वस्तु से खेलने कि इच्छा होती है तो कभी उस वस्तु को उठा कर खेलने लग जाते हैं। और कभी खेल कि तरफ मन जाता ही नहीं। यह या वह कोई भी वस्तु अच्छी नहीं लगती। कभी हठात एक को फेंक कर दूसरी किसी वस्तु उठा लेते हैं। जब वह भी अच्छा नहीं लगता तो, उसे फेंक कर कोई तृतीय वस्तु उठा लेते हैं। इसी प्रकार जीवन व्यतीत होता रहता है।
जब बुद्धि थोडी विकसित होती है, तब विवेक-विचार करने से यह बात समझ में आती है कि ऐसे खेल का तो कोई लक्ष्य है ही नहीं, इसीलिए अब किसी एक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ही कार्य करने की इच्छा होती है। इसको ही यथार्थ कार्य कहते हैं। लक्ष्य या एक उद्देश्य न रहने से भी कुछ-कुछ करते रहते हैं, जिस-तिस कार्य में स्वयं को व्यस्त रखते हैं- वह वास्तव में 'कार्य' नहीं, खेल करना है। किन्तु जब परिस्थितियाँ कन्धों पर जिम्मेवारी का बोझ डाल देतीं हैं, जब परिश्रम किए बिना अपना अस्तित्व ही अनिश्चित दिखाई देने लगता है, उस समय लगता है कि वह कार्य नहीं बल्कि, सर के ऊपर बड़ा भारी वजन रखा हुआ है। सर्वदा मन में विचार उठता है, न जाने कब इस बोझ से रिहाई मिलेगी ? उस समय खेल का सुर सुनने पर भी मन आनन्दित नहीं होता, बार-बार 'कच्चा पापड़ - पक्का पापड़, कच्चा-पापड़,पक्का-पापड़....' का खेल बड़ा नीरस जैसा लगने लगता है।
किन्तु, क्या केवल ज़िन्दा रहना ही यथेष्ट है ? भीतर से आवाज आती है- नहीं। जीवन का सर्वस्व, उसका लक्ष्य, उसका उद्देश्य कहाँ प्राप्त हो सका ? हम लोग मन के घोड़े पर सवार हो कर परम-आनन्द या परम-सत्य को वाह्य जगत में ढूंढने के लिए दौड़ पड़ते हैं। किन्तु परम-सुख तो कहीं बाहर में है ही नहीं, इसी लिए पाते भी नहीं हैं।उसे तो अपने भीतर खोजने से ही प्राप्त किया जाता है। अपने जीवन का सर्वस्व कहने से जो कुछ समझा जाता है, 'वह' हमारे ही ह्रदय गुफा में ही छुपा हुआ है। 'वही' तो सभी मनुष्यों का, सर्वस्व है। इसीलिए जब उसको अन्य सभी मनुष्यों से अलग मानकर, केवल अपने मन के एकाकी कोने में लालन करके सुखी करने कि चेष्टा करता हूँ, तब सैंकडो तरह के कार्यों में अपनी सारी शक्ति लगा देने के बाद भी, मेरी जो यथार्थ सत्ता है, उसे आनन्दित नहीं कर पाता,वहाँ तो केवल क्लान्ति, हताशा, निरानन्द का ही अनुभव होता है।
हमलोग यह समझ नहीं पाते कि, हमारी समस्त चाहना-पाना, सारी सार्थकता, जीवन का अज्ञात लक्ष्य, जिसका आविष्कार हम अब तक नहीं कर सके हैं, वह हमारी आन्तरिक सत्ता में,अन्तरात्मा में उद्घाटित हुए बिना ही मर रही है। जिस परम-वस्तु को- 'केवल मेरा है' ऐसा सोंचकर अपने छोटे ह्रदय के पाषाण कारागार में कैद कर के रखा हूँ, जिसके स्वांस-प्रस्वांस को बिल्कुल रुद्ध करने पर उतारू हो गया हूँ, वही तो वास्तव में सबकुछ है, वह केवल मेरा ही नहीं है वह तो सभी का है, इसीलिए वह सबों को अपने आलिंगन में बाँध लेना चाहता है, उसका विराट प्राण केवल एक से प्रेम पाकर तृप्त नहीं होता है, वही अपने- आप को विस्तृत करना चाह रहा है ( 'वह' पहले बिल्कुल अकेला था, तब उसे अच्छा नहीं लग रहा था, उसने सोंचा कि, 'मैं अकेला हूँ - बहुत हो जाऊं !' - और लो यह 'सृष्टि' हो गई !! - " एको अहम् बहु-श्याम " ) इसी तथ्य को समझ नहीं पा रहा हूँ।
उसको यदि अपने ह्रदय संकीर्ण कारागार से मुक्त कर के विश्वव्यापी बना सकते तो अपनी मुक्ति का स्वाद भी पा लेते, वही हम समझ न सके। इसीलिए बन्दी आत्मा के सुख के लिए वाह्य जगत के नाना खेल-खिलौनों को संग्रहित करने के संग्राम ने- मुझे क्लान्ति,हताशा और निरानन्द से भर दिया है।
जिसको हमलोग अपना व्यक्तित्व समझते हैं, जिसको ' मैं ' समझते हैं, अपने शरीर, अपने मन, अपने सुख, अपने भोग के लिए कितना कुछ कर डालने में दिन-रात व्यस्त रहते हैं- इन सब में मेरी सार्थकता कहाँ है ? मैं वास्तव में जो हूँ, मेरे भीतर की जो यथार्थ सत्ता है ,उसीको मैंने सबकी नजरों से छुपा कर, घोर एकाकिपने में बन्दी बना रखा है, इसीलिए जीवन में आनन्द नहीं है, इसीलिए जीवन-संग्राम किसी भारी पत्थल की तरह सर के ऊपर लदा हुआ है।किन्तु, इन सब बातों को बिना जाने-समझे ही उस परम-आनन्द की खोज में न जाने क्या-क्या करते चले जा रहे हैं।
हमलोग सब कुछ (शरीर-मन ) का उपयोग जीवन की सार्थकता के संधान करने में न करके , केवल भोग-सुख की खोज में कर रहे हैं। ऐसा करने को सही उपयोग नहीं कहा जा सकता। विवेक-विचार के आभाव, तथा उपयुक्त समय पर उपयुक्त कार्य नहीं करने के कारणही हमलोग यह भूल कर रहे हैं। जीवन-व्यापार को, मनुष्य जीवन के उद्देश्य को, ठीक ढंग से समझ नहीं पाया, इसिलए जीवन-संग्राम इतना कष्टपूर्ण लग रहा है। भौतिक वस्तुओं के अलावा हमारे पास यह शरीर है, मन है- इनका उपयोग यथा-समय, यथोचित रूप से न करने के कारण, जगातिक वस्तुओं को भी सही ढंग से उपयोग में नही ला पाता हूँ।
तथा यह भी भूल जाता हूँ की जगत के अन्य वस्तुओं के अलावा हमारे ही समान अन्य मनुष्य भी हैं, उनका भी शरीर है, मन है। वे लोग भी मेरे ही समान कार्य करते हैं, चिंतन करते हैं, जगत की वस्तुओं को लेकर आमोद-प्रमोद करते हैं। हो सकता है कि हमलोगों की ही तरह, मनुष्य-जीवन के उद्देश्य के प्रति सीमित दृष्टि रखने के कारण, वे लोग भी अपने जैविक स्वाछन्द्य, इन्द्रियग्राह्य सुखों के अन्वेषण में लगे रहने, या केवल अपने भोग-सुख के लिए ज़िन्दा रहने को ही अपने जीवन का लक्ष्य समझते हों, तथा अपने आवश्यक उद्देश्यों की सिद्धि के लिए हमलोगों को भी अपने उपयोग में लाना चाहते हों।
मैं या मेरे ही समान दूसरे सभी लोग, जिसका जो क्षूद्र उद्देश्य है उसको प्राप्त करने की होड़ में दौड़े चले जा रहे हैं, इस दौड़ में कौन कहाँ गिरा, इस बात की चिन्ता किसी को नहीं है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति एक हृदयहीन प्रतिस्पर्धा में उन्मत्त हो चुके हैं, हमसबों की एक ही चेष्टा है कि जीवित बचे रहने के इस संग्राम में कौन 'योग्यतम' बन कर ज़िन्दा बचा रहेगा ? काश हम यह समझ पाते कि शरीर और मन का उपयोग केवल इन्द्रिय सुखो को भोगने में ही नहीं है, उनका वास्तविक कार्य शरीर-मन के परे जो हमारी यथार्थ सत्ता है, उस सत्ता को इस जीवन यात्रा के पथ में चलते समय भी पकड़े रहना है। उस सत्ता को पूर्ण विकसित होने में सहायता करना ही शरीर-मन का वास्तविक कार्य है।
काश हम यह समझ जाते कि हमारे जीवन कि सार्थकता- हमारे शरीर को सुख पहुँचाने में नहीं है, मन को भी सुखी करने में नहीं है-उसी सत्ता कि सार्थकता में निहित है। और उस सत्ता कि सार्थकता - व्यक्ति ह्रदय की बद्धावस्था से मुक्त होकर सर्वत्र फ़ैल जाने में है, अनेको सत्ताओं के साथ घुल-मिल कर एक सार्वभौमिक सत्ता में परिणत होकर, सारे जगत को अपने ह्रदय में समाहित कर, सारी संकीर्णताओं की सीमा का अतिक्रमण करके ' भूमा ' बन जाने में है।
यदि हमलोग इन बातों को पहले ही समझ जाते तो, हमलोग चेष्टा करते -एवं यथा समय चेष्टा करते, यह सीखने की चेष्टा करते कि, शरीर और मन को उचित ढंग से कैसे व्यवहार किया जाता है, जिससे हमारी दक्षता बढ़ सके, श्रेय-प्रेय का विवेक करने की शक्ति बढ़ सकती है, तथा किस प्रकार सांसारिक जीवन में प्राप्त वुस्तुओं का सदुपयोग किया जाता है? यह सीखने की भी चेष्टा करते कि, किस प्रकार कार्य करने से हमलोगों का सारा श्रम- जीवन की सार्थकता लाभ करने की चेष्टा में रूपान्तरित हो सकता है ?
ऐसी दृष्टि प्राप्त हो जाने पर, प्रतियोगिता का स्थान लेगी सहयोगिता, एवं सब कामों का उद्देश्य केवल जीवित बचे रहना न होकर, जीवन को सार्थक बनाने में सहायता पहुँचाने का होगा।इसके साथ ही दिखाई देने लगेगा वह 'सार्वजनिक उद्देश्य' या लक्ष्य, जो सभी मनुष्यों के जीवन की सार्थकता के लिए एक साथ मिलकर कार्य करने के लिए उत्साहित करेगी। तब पदार्थविदों की हृदयहीन लाखों-कड़ोरों पदार्थ-कणों के उद्देश्य-विहीन शाश्वत उन्मत्त नृत्य के समान अर्थहीन व्यस्तता में ,मनुष्य अपने इस महामुल्यवान जीवन को पंगु बना कर नहीं रखेगा।
यदि हम ऐसा करपाने में समर्थ हो गए तो, दिन-हीन जैसा जीवन बिता देने की यंत्रणा का अवसान हो जाएगा। एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य के लिए ही कार्य करने में सक्षम हो जायेंगे। कितना भी कर्म करने से थकान का अनुभव नहीं होगा। क्रमशः सार्थकता के नैकट्य शक्ति को योगदान देते रहेंगे। उस समय सभी कार्य खेल के जैसा आनन्ददायक मालूम पड़ेगा। तभी हमलोग जीवन-खेल को ठीक ठीक खेल सकेंगे, और जीवन-युद्ध का विजय-तिलक अपने ललाट पर लगा सकेंगे।
निद्रा, आलस्य, प्रमाद ने हमलोगों को मोहग्रस्त कर रखा है। जंग लगकर समाप्त होने की अपेक्षा, घिस कर समाप्त होना अच्छा है। जहाँ तक हमारे वाह्य परत पर खाद चढ़ा हुआ है, वहाँ तक घिस जाने के बाद खांटी सोना बाहर निकल आएगा। उसके बाद जगत की कलुषित हवा लगने से भी, पुनः जंग( मोर्चा) नहीं लगता। खांटी सोना बन जाना ही जीवन का उद्देश्य है।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " तुम्हारी आत्मा में विराजमान ईश्वर ही तुम्हे अपना अनुसन्धान करने को अपनी उपलब्धि करने को प्रेरित कर रहा है। यहाँ, वहाँ, मन्दिर में, गिरिजाघर में, स्वर्ग में, मर्त्य में, विभिन्न स्थानों में, अनेक उपायों से अन्वेषण करने के बाद अंत में ..... देखते हैं कि जिसकी हम समस्त जगत् में खोज करते फ़िर रहे थे,......जिसको हम सुदूर आकाश में बादलों के पीछे छिपा हुआ अव्यक्त और रहस्यमय समझते रहे, वह हमारे निकट से भी निकट है, प्राणों का प्राण है, हमारा (यथार्थ) शरीर है, हमारी आत्मा है- तुम्हीं 'मैं' हो, मैं ही 'तुम' हूँ। " (वि० सा० ख० २:१४)

४." स्वर्ग नहीं "

सभ्यता में विकास के प्रारम्भ से ही सभी समाजों में- 'स्वर्ग' या ऐसे ही किसी स्थान ( ज़न्नत, हेभेन....आदि) की कल्पना और कामना देखी जा सकती है। इसके कारण को समझना बिल्कुल आसान है। इस जगत में कोई भी व्यक्ति उम्र के अन्त तक अपने को सदा-सुखी नहीं समझ पाता। जिसके पास भोग्य पदार्थों कि प्रचूरता रहती है, उसको भी और अधिक-भोग करने कि आकांक्षा असुखी बना देती है। इसीलिए अनन्त और अबाध सुख भोगने की कामना ने मानव को काल्पनिक-स्वर्ग रचने पर विवश कर दिया है।
विभिन्न धर्मों ने भी मानव-मन की इस दुर्बलता का सदुपयोग करते हुए, उसके मंगल के लिए स्वर्ग की अति सुंदर लुभावने दृश्यों के चित्र खींचे हैं, और स्वर्ग-प्राप्ति के विविध उपायों का वर्णन भी किया है। मनुष्य को कूमार्ग पर चलने से बचाकर सन्मार्ग पर आरूढ़ कराने के उद्देश्य से, सभी धर्मों में आमतौर पर यही व्यवस्था दी गई है कि -
" अच्छा काम करने से स्वर्ग और बुरा काम करने से नरक प्राप्त होता है।" किन्तु उपनिषदों से लेकर सभी शास्त्रों ने यह बात भी स्पष्ट रूप से स्मरण करा दिया है कि- " स्वर्ग-सुख भी अनन्त नहीं है "। पुण्य- बल क्षीण होते ही पुनः इस मृत्यु-लोक ( जगत ) में आना पड़ता है। फ़िर यह भी कहा गया है कि, स्वर्ग या नरक नामक अलग से कोई स्थान नहीं है, वह सब यहीं( पृथ्वी ) पर ही है। हमलोगों का मन और आचरण ही स्वर्ग- नरक कि सृष्टि करता है। इसीलिए स्वर्ग में जाने की कामना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।
आजकल स्वर्ग जाने की कामना करने वाले मनुष्य भी विशेष दिखाई नहीं देते। अभी तो सब को तुरन्त, इसी समय भोग चाहिए, वह भी अल्प होने से नहीं चलेगा, भरपूर मिलना चाहिए। आजकल बहुत हुआ तो किसी के मर जाने के बाद ' स्वर्गीय ' या 'स्वर्गवास कर गये हैं' - ऐसा लिख दिया जाता है; पर इसे भी पुराना फैशन कह कर त्यागा जाने लगा है, अभी फैशन चल रहा है ' प्रयात' लिखने का, अर्थात 'गुजर गए हैं' या ' चल बसे हैं '- परन्तु जा कर कहाँ बसे हैं ? मैं नहीं जानता । मुर्दे की चिंता यहाँ और ज्यादा करने की आवश्यकता नहीं है। जनसंख्या का स्टॉक मिलाने के लिए इतना ही पर्याप्त है !
किन्तु जन साधारण के लिए स्वर्ग जाने की कामना ही श्रेष्ठ कामना है, इसी को देखते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- " भगवान से किसी भी वस्तु को पाने के लिए प्रार्थना करना, एक भक्त की दृष्टि में बहुत बड़ा अपराध है। सच्चा भक्त भगवान से कभी आरोग्य या ऐश्वर्य तो क्या, वह कभी स्वर्ग पाने की कामना भी नहीं करता। यदि हम भक्त होना चाहते हैं तो हमारा पहला काम यही होना चाहिए कि स्वर्ग आदि कि कामना को सदा के लिए अपने मन से विसर्जित कर दें। यह जो स्वर्ग में जाने कि वासना है, वास्तव में यह सुख भोग कि ही कामना है। इस वासना का त्याग करना होगा। अपने लिए इहलोक के या परलोक के किसी भी वस्तु को पाने कि आकांक्षा का त्याग करना होगा । " स्वामीजी आगे यह भी कहते हैं कि, " यदि स्वर्ग नामक कोई स्थान कहीं होता भी हो, तो वह इसी मर्त्यलोक का पुनरावृत्ति मात्र होगा- हो सकता है कि यहाँ कि अपेक्षा वहाँ थोड़ा अधिक सुख या थोड़ा अधिक भोग मिल जाता हो। वैसा होने से तो और बुरा होगा। हमारे शास्त्र कहते हैं- ' श्रेष्ठ स्वर्ग में भी तुम केवल प्रकृति के दास मात्र हो'। किन्तु तुम्हे तो प्रकृति पर विजय प्राप्त करनी है। उसे पैरों से कुचल कर, उसका अतिक्रमण कर स्वाधीन और मुक्त रूप में तुम्हे निज महिमा में प्रतिष्ठित होना होगा। तब तुम जन्म के अतीत हो जाओगे अर्थात मृत्यु के भी पार चले जाओगे। तब तुम्हारा सुख चला जाएगा इसीलिए तब तुम दुःख के भी अतीत हो जाओगे। तभी तुम सर्वातीत अव्यक्त अविनाशी आनन्द के अधिकारी हो जाओगे। जिनको हमलोग यहाँ पर सुख और कल्याण कहते हैं, वह उसी आनन्द का एक कण मात्र है। यह अनन्त आनन्द ही हमारा लक्ष्य है। "
इसीलिए स्वर्ग की कामना बहुत साधारण बात है, यहाँ तक की स्वामीजी इसको मन्द कहे हैं। तब चरम लक्ष्य क्या है ? वे कहते हैं, " परमाणु से लेकर मनुष्य तक, अचेतन प्राणहीन जड़ कणों से लेकर पृथ्वी पर विद्यमान सर्वोच्च सत्ता- मानवात्मा पर्यन्त सभी मुक्ति के लिए चेष्टा कर रहे हैं। समस्त धर्म एवं साधना-प्रणाली हमलोगों को उसी एक चरम लक्ष्य तक ले जाती है। वह चरम लक्ष्य क्या है ? - वह है मुक्ति।"
किन्तु मनुष्य क्या आसानी से इस मुक्ति को पाने की इच्छा या उसके लिए चेष्टा करता है ? नहीं करता, इसीलिए तो वह बद्ध अवस्था में रहते हुए असंख्य यंत्रणा भोगता रहता है। अतृप्त भोगाकांक्षाओं की परितृप्ति के लिए तभी तो वह स्वर्ग जाने की कामना करता है। यदि वहाँ पहुँच भी जाता हो तो भी एक दिन बोलना पड़ता है, " पुण्यबल तो हो गया क्षीण, आज मेरा स्वर्ग से है विदा लेने का दिन !" उसे पुनः इसी जगत् में जन्म लेकर बद्ध-जीव की दुर्गति भोगनी पडती है। मुक्ति, हमे इस आवागमन (जन्म-मृत्यु ) के चक्र से छुटकारा दिलाकर, दुःखभोग के मूल को ही उखाड़ फेंकती है। इसीलिए मुक्ति ही चरम लक्ष्य है। इसीलिए मनुष्यों के लिए श्रेष्ठ उपदेश है, मुक्ति का उपदेश ! आचार्य शंकर भी कहते हैं कि, ईश्वर कि कृपा के बिना तीन चीजें नहीं मिलतीं- " मनुष्यत्व, मुक्ति कि इच्छा, और महापुरुष का संसर्ग। " मनुष्य शरीर हमलोगों ने प्राप्त कर लिया है, किन्तु मुक्ति की इच्छा हममे से कितने लोगों में जगती है ? फ़िर महापुरुष का संग मिलना तो और भी दुर्लभ है।
किन्तु हमलोगों के लिए महापुरुषों का संग भी सुलभ हो गया है। श्री रामकृष्ण, माँ सारदा, स्वामी विवेकानन्द के जीवन और उपदेश का अनुध्यान करके हमलोग श्रेष्ठ सत्संग या महापुरुष का संसर्ग हमलोग प्राप्त कर सकते हैं। सत्संग करने से ही मुक्ति की इच्छा जाग्रत होती है। ' त्रै दुर्लभं-मनुष्यत्वं , मुमुक्षूत्वं, महापुरुषसंश्रयः ' - इन तीन दुर्लभ चीजों के एकत्र होने पर ही मनुष्य जीवन यथार्थ सार्थकता प्राप्त कर पाती है। इसीलिए हमारा लक्ष्य स्वर्ग नहीं, मुक्ति ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए तथा उसी को प्राप्त करने की कामना करनी चाहिए।
किन्तु स्वामी विवेकानन्द का सर्वोच्च उपदेश, या उनका अन्तिम निर्देश केवल, अपने लिए मुक्ति प्राप्त करना ही नहीं है। वे तो मुक्ति को भी एक छोटी वस्तु मानते थे, उससे भी श्रेष्ठ अवस्था है। स्वामीजी स्वयं उस अवस्था में पहुँच चुके थे तथा उसी भाव को दूसरों के भीतर भी संचारित करना चाहते थे। इसीलिए कहते हैं, " तुम यदि अपनी मुक्ति के लिए सर्वस्व भी त्याग देते हो तो उसमे फ़िर त्याग कहाँ हुआ ? तुम जगत् के कल्याण के लिए, क्या अपनी निजी मुक्ति की कामना का भी त्याग कर देने के लिए तैयार हो ?" पूरे विश्व के कल्याण के लिए, जो किसी व्यक्ति के जीवन का चरम लक्ष्य है- उस 'मुक्ति' की इच्छा का भी त्याग कर देने के लिए हमलोगों को दिन-रात अनुप्रेरित कर रहे हैं, स्वामीजी !
यही शिक्षा ऋग्वेद में भी दी गई है। किन्तु आज कल टीवी पर जो अपने को वेदज्ञ पण्डित होने का दावा करते हुए गर्व करते हैं, वे लोग क्या यह बात कहते हैं ? आजकल टीवी पर 'भागवत-कथा' कहने वालों की मानो बाढ़ सी आ गयी है, यही शिक्षा भागवत में भी दी गई है, किन्तु भागवत पण्डित लोग क्या कभी श्रोताओं के मन को उस ओर आकृष्ट कराने की चेष्टा करते हैं ? पाठक और श्रोतागण दोनों, राधाकृष्ण की प्रेम कथा सुन कर गदगद हो कर आंखों से जल निकालते हैं।( टीवी पर तो श्री कृष्ण-जन्म या श्री राम-जन्म का प्रसंग आने पर मोटे-मोटे, सेठ-सेठानी अपने पोतों को फैंसीड्रेस में सजा कर 'बापू' लोग के सामने खूब नाचते हैं।) किन्तु आज का साधारण मनुष्य कामना- वासना का गुलाम बन कर जन्म-जन्मान्तर से आखों के जल को नाक से निकाल रहे हैं, उधर कौन देखता है ? इसीलिए आज पूर्व-पूर्व मनीषी, महापुरुष, और आचार्यों को प्रणाम करके, इस युग के आचार्य स्वामी विवेकानन्द से शिक्षा ग्रहण करना अत्यन्त आवश्यक है, यदि हमलोग सचमुच समाज के सभी मनुष्यों का कल्याण करने की इच्छा रखते हों तो ! स्वामीजी की निजी उपलब्धि तो थी ही, इसके अलावा वे सकल-शास्त्रों के ज्ञाता भी थे, साथ ही आधुनिक विज्ञान पर भी अच्छी पकड़ थी, अर्थनीति के ज्ञाता थे, राष्ट्र-विज्ञान जानते थे, इतिहास जानते थे, देश-विदेश के मनुष्यों को नजदीक से देखे थे, उनके ब्द्धाव्स्था के दैन्य ने उनको व्यथित कर दिया था, तभी तो वे उनकी मुक्ति का अभ्रांत पथ दिखाने में समर्थ हो सके थे। वैसा ही कल्याणकारी पथ और किसी के लिए दिखा पाना संभव नहीं है। किसी अन्य द्वारा दिखाए पथ पर चलना, अन्धे का अनुशरण करने जैसी बात होगी।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, " जाती-वर्ण का विचार छोड़ कर, जब तुम्हारे भीतर इस सम्पूर्ण विश्व के प्रति मंगल कामना जाग्रत हो सके, तभी समझूंगा कि तूँ आदर्श कि ओर अग्रसर हो रहा है।" "लोक-हित, जगत का कल्याण करो - इसके लिए स्वयं नरक में भी जाना पड़े तो चले जाओ ! दूसरों की मुक्ति हो ! मेरी मुक्ति की चौदह पीढ़ी निरवंश हो ! अपनी मुक्ति की फिक्र मत करो ! नरक स्वर्ग, भक्ति या मुक्ति इन सबको-don't care ! इनकी कुछ परवाह न करो। अपना भला- केवल दूसरों का भला करने से होता है। अपनी मुक्ति और भक्ति भी, दूसरों को मुक्ति और भक्ति प्राप्त करने में सहायता पहुँचाने से स्वतः प्राप्त हो जाती है। - उसी कार्य में लग जाओ, मतवाले हो जाओ, उन्मत्त हो जाओ !"
आगे कहते हैं, " जिस साधन-भजन या अनुभूति द्वारा दूसरों का उपकार नहीं होता, महामोहग्रस्त जीवों का कल्याण साधित नहीं होता, काम-कांचन की दीवार को तोड़ कर बाहर निकल आने में मनुष्यों को कुछ भी सहायता प्राप्त नहीं होती, ऐसे साधन-भजन से क्या लाभ ?....क्या तूँ यह समझता है कि, एक भी जीव के बंधन में रहने तक, तूँ स्वयं मुक्त हो जाएगा ? जितने दिन और जितने जन्मों तक उनका उद्धार नहीं होता,उनकी सहायता करने तथा उन्हें भी ब्रह्म का अनुभव कराने के लिए,उतने बार तुझे भी जन्म ग्रहण करना पड़ेगा ! क्योंकि प्रत्येक जीव भी तो तेरा ही अंग है। इसीलिए तूँ केवल दूसरों के निमित्त कर्म कर। अपने स्त्री-पुत्र आदि को अपना जान कर, जिस प्रकार तूँ उनके सभी प्रकार के मंगल की कामना करता है, उसी प्रकार जब प्रत्येक जीव के प्रति तेरा वैसा ही आकर्षण होगा, तब समझूंगा कि तेरे भीतर ब्रह्म जाग्रत हुए हैं, उससे एक मिनट भी पहले नहीं। "(वि० सा० ख० ६:२००)

यही है सभी धर्मों, सभी शास्त्रों की शिक्षा का सार ! आध्यात्मिकता के सर्वोच्च अनुभूति की वांग्मय अभिव्यक्ति ! इस सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाने के बाद-सारे दर्शन, सारा तात्विक ज्ञान, सारे मत-वाद मौन या निःशब्द हो जाते हैं। अगर इसे किसी 'वाद' से जोड़ कर देखना ही हो तो, इसे ' सर्वमुक्तिवाद ' का नाम दिया जा सकता है। जो मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेता है, जो सत्य में पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता है- वही मनुष्य अपने व्यक्तिगत स्वर्ग, मुक्ति, भक्ति से ऊपर उठ कर आध्यात्म के इस सर्वोच्च शिखर तक पहुँच सकता है।

५. " असन्तोष नहीं "

'संतोष'- शब्द का उपयोग हमलोग अपने जीवन में लगभग नहीं के बराबर करते हैं, या नहीं ही करते हैं। जिसका उपयोग करते हैं वह है- असन्तोष। इसके बावजूद आज भी भारत के लोग अपने लड़के का नाम रखते हैं- संतोष। हम अपने बच्चों के नाम यदि , ' विप्लव', ' प्रलय ' ' सैलाब' आदि रख सकते हैं तो, ' असन्तोष प्रसाद '- नाम क्यों नहीं रख सकते ? हमलोगों का जीवन-दर्शन अब पहले से काफी बदल चुका है, तथा और भी द्रुत गति से बदलता जा रहा है। अमेरिका में छात्र लोग स्कूल की अपेक्षा, टी-वी के सामने बैठ कर अधिक समय बिता रहे हैं, इसे देख कर उस देश की सरकार चिन्तित है, तथा छात्रों के लिए कोई नीयम बनाने की व्यवस्था कर रही हैं। हमारे देश में ८५ कड़ोर भारतियों के लिए टी-वी उपलब्ध है, किन्तु हमलोगों की जीवन के सम्बन्ध में पहले वाली ध्यान-धारणा को यथा शीघ्र बदल देने के उद्देश्य से निजी चैनलों को सरकारी प्रोत्साहन देने की जोरदार चेष्टा की जा रही है। इस चेष्टा के पीछे उद्देश्य यह है कि, मनुष्यों में असन्तोष की भावना बढ़ाने के लिए, उसके रहे-सहे संतोष को भी छीन लिया जाय।
विज्ञापन दिखाने से काफी आय होती है। इसीलिए विज्ञापन बढ़ाने के लिए होड़ लगी है। विज्ञापनों को देख-देख कर, नए-नए जरुरी, गैर जरुरी उत्पादों को खरीदने की चाहत बढ़ जाए। चाहत बढ़ जाय, और उसे पूरा करने के लिए पैसे न हों तो मनुष्यों में असन्तोष बढ़ जाय। संतोष पाने की खोज में, कहीं से और कैसे भी तुंरत धन जुगाड़ करने के चक्कर में मनुष्य भ्रष्टाचार का शिकार बन जाय। मनुष्य का चरित्र नष्ट होता हो तो हो जाय। उससे क्या ? कम-से कम हमलोग पाश्चात्य देशों के साथ सभी विषयों में टक्कर तो दे पाएंगे ! इसी तरह से हमलोग ड्रग लेने में, ऐड्स- रोग फैलाने में भी, उनको बराबरी का टक्कर देने के लिए आगे बढ़ते जा रहे हैं।
किन्तु हम सबों को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि, जीवन में यदि संतोष न रहे तो शान्ति भी नहीं मिल सकती। संतोष मनुष्य चरित्र का अनमोल आभूषण है। जिसमे संतोष नहीं रहता उसे जीवन भर दुःख उठाना पड़ता है। इसीलिए कहा गया है-
 " सन्तोषः सुख-मूलम् हि,दुःख मुलं विपर्ययः ।" 
 -अर्थात संतोष हि सब सुखों का मूल है, और उसका विपरीतार्थक शब्द- 'असन्तोष' सब दुखों का कारण है। वाह्य जगत की बहुत सी सामग्रियों को एकत्र कर, उसका भोग करने से संतोष प्राप्त नहीं होता। क्योंकि सारे भोग सामयिक ही होते हैं। भोग का समय समाप्त होते ही पुनः उस विषय-सुख का अभावबोध और असंतोष उठ खड़ा होता है। वास्तव में सन्तोष एक मानसिक अवस्था है। जिसके मन में सन्तोष है, उसको किसी प्रकार के आभाव का बोध नहीं होता- जिसके फलस्वरूप दुःख भी नहीं होता। भागवत में बड़े सुंदर ढंग से कहा गया है :
" सर्वाः संपत्त्यास्तस्य सन्तुष्टम् यस्य मानसम्।
 उपानद् गूढ़पादस्य सर्वा चर्मावृतैव भूः ॥ "

- सभी प्रकार की संपत्तियों का अधिकारी वही मनुष्य है, जिसका मन सन्तुष्ट है। जिस प्रकार जिसने अपने पैर में जूता पहन रखा हो, उसके लिए समस्त पृथ्वी की धूल-मिट्टी मानो चमड़े से ढँकी हुई रहती है। रविन्द्रनाथ की लघु-कथा ' जूता आविष्कार ' का स्मरण कीजिये। (....एक राजा के पैरों में मिट्टी लग जाती थी,उसने आदेश दिया कि सारे रास्ते को चमड़े से ढँक दिया जाय, बरसात में जब चमड़ा भिंग कर दुर्गन्ध करने लगा तब उसके मंत्री ने उसे जूता बना कर दिया, ..... इस प्रकार जूते का आविष्कार हो गया।) हमलोग सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लेने के बाद सन्तुष्ट होने की चेष्टा करते हैं। किन्तु किसी भी मनुष्य के लिए पूरी पृथ्वी को जीत पाना लगभग असम्भव है। उस चेष्टा में अपनी शक्ति का क्षय न करके, यदि हमलोग अपने मन को जीत लेने की चेष्टा करें, मन की कामना - वासना को संयम में रखने की चेष्टा करें, तो उसके फलस्वरूप महा संतोष प्राप्त होगा; जिसके परिणाम स्वरूप यथार्थ सुखबोध और आनन्द से हमारा मन सदा भरा रहेगा। किन्तु यदि हमारे मन में सर्वदा नाना प्रकार के विषय-भोगों की आकांक्षा बनी रहे, और अधिक सब कुछ पा लेने की वासना की आंधी मन में सदा बहती रहे, तो हमारे मन में सुख-शान्ति या आनन्द भला कैसे रह सकता है ? इसीलिए महाभारत में कहा गया है:
" यत् यत् त्यजति कामानाम् तत् सुखस्याभिपूर्यते। 
कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते ॥ "


- जितना जितना कामनाओं का त्याग करते जाओगे उतना उतना सुख का आस्वादन करोगे। कामना के वशवर्ती होने से सर्वदा दुःख ही पाना पड़ता है।
जगत् में मनुष्य जिसको सुख समझता है, वह वास्तविक सुख नहीं है, वह तो किसी उपाय से दुःख को थोड़ी देर के लिए अलग रखना मात्र है। भागवत में कहा गया है :
" कूर्वन् दुःख प्रतिकारम् सुखवन्मन्यते गृही ॥ "

- ' अर्थात सामयिक रूप से दुःख का प्रतिकार कर पाने से जो अनुभूति होती है, गृहस्थ लोग उसी को सुख समझ लेते हैं।' आचार्य नरहरी एक बड़े मजे की बात कहे हैं :
" क्नडूयनेन यत् कंडूसुखम् तत् किं भवेत सुखम् । पश्चादत्र महापीड़ा तथा वैषयिक सुखम् ॥ "


- 'अर्थात दाद खुजलाने से जो सुख मिलता है, उसको क्या वास्तव में सुख कहा जा सकता है ? क्योंकि खुजलाने के बाद महा यन्त्रणा भुगतनी पड़ती है। इन्द्रिय-विषयों को भोगने से जो अनुभव होता है, उसे हमलोग सुख कहते हैं, किन्तु वह तो दाद खुजलाने से मिलने वाले सुख जैसा है।सन्तोष किसे कहते हैं, यदि हम इसको ठीक से समझ लेना चाहते हों तो, माँ सारदा के जीवन को थोड़ा देख लेना चाहिए। उनको कितनी घोर दरिद्रता और आभाव में कितना लम्बा समय बिताना पड़ा था। यहाँ तक कि दक्षिणेश्वर में रहते समय भि, उनके रहने का स्थान कितना असुविधा पूर्ण था। क्या हम आज इस बात कि कल्पना भी कर सकते हैं कि नह्बत-घर के छोटे से दरवाजे के भीतर श्री श्री माँ सारदा असूर्यम्पस्या हो कर किस प्रकार रह पातीं होंगी ! ' जयरामवाटी' के घर में रहते समय या श्री रामकृष्ण के चले जाने के बाद - 'कामारपूकूर' में कितने कष्टों के बीच 'माँ ' को अपना जीवन बिताना पड़ता था ! किन्तु, उनके जीवन में सन्तोष का आभाव, किसी भी रूप में किसी भी समय- थोड़ा भी देखा नहीं जा सकता है। उस समय की अपनी स्थिति का वर्णन करते हुए वे स्वयं कहतीं हैं- " भीतर में आनन्द का कलश सर्वदा पूर्ण होकर रहता था। वह 'आनन्द -कलश' केवल स्वयं ही पूर्ण होकर ही नहीं रहता था, बल्कि छलक- छलक कर दूसरों को भी महा आनन्द के सागर में डुबो देता था। " इसी अवस्था को सन्तोष की पराकाष्ठा कहते हैं।सन्तोष का अर्थ केवल नेतिवाचक ही नहीं है। सन्तोष के ईतिवाचक पक्ष को समझना आवश्यक है।मन में सन्तोष का भाव लाने का अर्थ , केवल कामना-वासना का त्याग करना ,केवल तृष्णा को कम करना ही नहींहै, भोगों को कम करना ही नहीं है। सन्तोष हमे बहुत कुछ दे भी सकता है, इसके द्वारा हम बहुत कुछ पा भी सकते हैं। भागवत में कहा गया है :-
" दयया सर्व भूतेषू संतुष्टो येन केन वा।
  सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तूष्यत्याश्तु जनार्दनः ॥ "

-अर्थात ' सर्व भूतों के प्रति दया, सर्व भूतों की सेवा, अपने लिए जो मिल जाए उसी में सन्तोष करने, तथा सभी ईन्द्रीयों को वश में रखने- में समर्थ हो जाने पर जनार्दन शीघ्र ही सन्तुष्ट हो जाते हैं।यथार्थ सुख को पाने के लिए ही मन में सन्तोष का भाव रखना होता है। किस प्रकार यह प्राप्त होता है ? भागवत में कहा गया है :-
" यदा न कूरुते भावम् सर्वभूतेष्वमंगलम्। 
        समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ "
- 'जब किसी का अमंगल हो- ऐसा विचार भी मन में कभी, किसी के लिए नहीं उठता, जब मनुष्य सभी को समान दृष्टि से देखने की अवस्था में पहुँच जाता है, तब उस मनुष्य के लिए चारो दिशायें सुखमय हो उठतीं हैं।' - सन्तोष का ईतिवाचक पक्ष यही है। इस दिशा में अग्रसर होने के लिए, अपने "क्षुद्र मैं" की तरफ़ से, अपनी कामनाओं, अपने भोगों इत्यादि की तरफ से मन को हटाना ही होगा।

६." आत्मसंतुष्टि नहीं "

संतोष जहाँ एक महत्वपूर्ण गुण है, वहीं आत्मसंतुष्टि एक घातक दुर्गुण है।संतोष किसे कहते हैं, जिस प्रकार इसे समझ पाना आसन नहीं है; उसी प्रकार आत्मसंतुष्टि किसे कहते हैं, इसको भी हमलोग आसानी से समझ नहीं पाते हैं।या कहना चाहिए कि इसे हम समझना चाहते ही नहीं हैं। क्योंकि जैसे ही समझ लूँगा, उसी समय से स्वयं को इससे बचाने का प्रयास शुरू करना पड़गा। और अभी तक आत्मसंतुष्ट बने रहने से जो एक मिथ्या सुख का एहसास बना हुआ था, वह समाप्त हो जाएगा। जिस प्रकार कोई रोग, 'मुझे हुआ है'- इस बात को हम बहुत दिनों तक समझ ही नहीं पाते हैं, जबकि उसके कारण हमारी जीवनी शक्ति नष्ट होती रहती है, यह 'आत्मसन्तुष्टि' भी उसी प्रकार का एक रोग है। हमलोगों को भी आत्मसन्तुष्टि का रोग लगा हुआ पर हम इसे समझ नहीं पा रहे हैं। तभी तो, प्राप्त जिम्मेवारियों को पूरा करने के लिए जितना उद्यम हमे करना चाहिए था- उतना नहीं करते हैं, उपयुक्त मात्रा में प्रयत्न करने का आभाव या टाल-मटोल करने की आदत जाती ही नहीं है। जिसके फलस्वरूप हमारा जीवन सुंदर ढंग से गठित नहीं हो पा रहा है, जिस कार्य को पूरा करने की सारी जिम्मेवारी मेरे ऊपर थी उसे मैं सही समय पर और सही ढंग से, निष्पादित नहीं कर पाता हूँ।
आत्मसन्तुष्टि दो प्रकार से क्षति पहुँचा सकती है- व्यक्तिगतरूप से या सामूहिकरूप से। व्यक्ति के क्षेत्र में आत्मसन्तुष्टि जिस प्रकार उसे सुंदर ढंग से जीवन गठित करने में या जीवन में सफलता प्राप्त करने में बाधास्वरूप हो जाती है, उसी प्रकार सबों के सहयोग से जिस कार्य को पूरा करने का संकल्प सम्मिलित रूप से सबों ने लिया था- उसको मन्थर, प्राणहीन, निष्ठाहीन, गतिहीन करके 'सामूहिक-उद्देश्य' की सिद्धि को दुर्लभ बना देती है। इसीलिए यदि अपने व्यक्तिगत-जीवन या किसी महान उद्देश्य को पाने के लिए ' संगठित-चेष्टा ' को सफलता के पथ पर ले जाने का संकल्प है, तो इस रोग के विषय में ठीक से जान लेना, इसके लक्षणों के बारे में सतर्क रहना तथा अपने को या संगठन के प्रत्येक सदस्य को इस आत्मसन्तुष्टि के रोग से मुक्त रखना-अत्यन्त आवश्यक है।
व्यक्तिगत या सामूहिक उद्देश्य के प्रति निष्ठा और चेष्टा के विषय में अपनी-अपनी जिम्मेवारियों को पूरा किए बिना भी - सन्तुष्ट बने रहने को,या स्वयं को धोखे में रख कर एकप्रकार की सन्तुष्टि के भाव का पोषण करने को -'आत्मसन्तुष्टि' कहा जाता है। इस प्रकार आत्मसन्तुष्टि के द्वारा हमलोग स्वयं ही स्वयं को ठगते रहते हैं। जिसके फलस्वरूप सबसे से पहले तो व्यक्तिगत-जीवन में सफलता के आभाव से अपनी क्षति करते हैं, उसके बाद किसी महान उद्देश्य को संगठित-प्रयास से को पूर्ण कर लेने पर दूसरों को जो लाभ पहुँचता- उससे उनको भी वंचित कर देते हैं।
नैतिकता की दृष्टि से देखते हुए ठिक-ठिक विचार किया जाय तो इस रोग से पीड़ित रहकर हम केवल अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य के साथ ही खिलवाड़ नहीं कर रहे हैं, बल्कि आत्मसन्तुष्टि के रोग से ग्रस्त रहना एक सामजिक अपराध भी है; और इस अपराध का दण्ड-विधाता दूसरा कोई नहीं है। इस क्षेत्र में आत्म-दण्ड का दाता और भोक्ता हमलोग स्वयं ही हैं। इसीलिए आत्मसन्तुष्टि एक प्रकार का आत्म-हनन है। अपने जीवन को विकसित करके, अपना जीवन गठित करके, जीवन को सार्थक बना कर, अपने परिवार के सभी सदस्यों की यथा-योग्य सेवा किए बिना; तथा मेरे जीवन से समाज के जितने अधिका-धिक लोगों के कल्याण के लिए जितनी निष्ठापूर्वक मुझे चेष्टा करनी चाहिए थी, वैसा किए बिना ही अपने को- 'महान-समाजसेवी 'या ' महान राष्ट्रभक्त ' समझते रहना ही आत्म-सन्तुष्टि है।
इस रोग के विषाणु किसी एक व्यक्ति पर या अनेक व्यक्तियों पर एक साथ आक्रमण कर सकते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत जीवन में असफलता तो मिलेगी ही, समष्टि जीवन भी प्रभावित होगा, इसीलिए इस विषय में सतर्क रहना विशेष प्रयोजनीय है।
स्वाधीन भारत आज भी जो इतना पिछड़ा नजर आ रहा है, इसका कारण यह आत्म-सन्तुष्टि का रोग ही है,जिसने पूरे राष्ट्र को आपाद-मस्तक (कश्मीर से कन्याकुमारी तक) संक्रमित कर दिया है। 'राजा' बन जाने के आनन्द से हमसभी लोग विभोर हैं, किन्तु ' राजा ' के कर्तव्य का पालन हम में से कोई व्यक्ति करना नहीं चाहता है। जिस किसी भी क्षेत्र में यह जो ' क्षद्म राजा ' का वेश धारण की तृप्ति है, वही है आत्म-सन्तुष्टि। एकबार यदि आत्मसन्तुष्टि का रोग लग जाए, तो जीवन में उन्नति या प्रगति नहीं हो पाती। किसी प्रकार से थोड़े समय तक प्राण तो टिम-टिम करता रहता है,किन्तु बाद में किसी तीव्र झोंके से वह स्मित दीपक भी बुझ जाता है। इसीलिए महाभारत का प्रेरक वाक्य है :-
" मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयो न तू धुमायितं चिरम्। " - अर्थात लम्बी उम्र तक टिम-टिम करते हुए जलते रहने की अपेक्षा, एक क्षण के लिए भी 'महा-उज्जवल प्रकाश' से प्रज्वलित हो उठना श्रेयस्कर है।
किसी महान उद्देश्य के लिए किए जाने वाले सामूहिक प्रयास के क्षेत्र में- जैसे कोई संघ,समिति इत्यादि में, आत्म-सन्तुष्टि का यह रोग- बड़े प्रछन्न रूप में रहती है, अतः उस क्षेत्र में खतरा अधिक मालूम पड़ता है। इन सब क्षेत्रों में यह रोग बहुत धीरे-धीरे प्रविष्ट होता है, और प्रविष्ट होने के बाद इतना छुप कर बैठ जाता है, कि बहुत दिनों तक उसका पता भी नहीं चलता। किन्तु इस रोग का प्रभाव 'क्षय-रोग' (टीबी) के जैसा पड़ता है। इसका रोगी खता-पीता रहता है, घूमता-फिरता है ठिक ही, किन्तु दिन- पर- दिन दुबला होता जाता है। यहाँ पर और एक दूसरी कठिनाई आती है- रोग के आविष्कार को लेकर। एकाधिक व्यक्ति के मन का आश्रय लेकर, आत्म-सन्तुष्टि का विषाणु परस्पर-परस्पर को प्रभावित करता है। संघ कि बैठकों में सबों के सामने तो सभी सदस्य खूब उत्साह दिखाते हैं, किन्तु जिसको जो कर्तव्य जिस निष्ठा से निभाना चाहिए था, उसमे फाँकी रहने के फलस्वरूप सामूहिक-प्रचेष्टा कि तेज धार कुन्द पड़ जाती है, उद्देश्य कि ओर बढ़ने का वेग धीमा पड़ जाता है।
व्यक्ति या सांसारिक जीवन में जिस प्रकार प्राण-उर्जा के ज्वार से उत्साहित होकर कर्म करने के बदले कई बार, ' कालवशप्राप्त पापक्षय ' करते हुए लाचारी में कर्म करना पड़ता है, संघ के जीवन में भी धीरे-धीरे ऐसी ही एक अवस्था दिखाई पड़ने लगती है। किसी किसी केन्द्र के संचालक उद्यम खो देने के बाद भी, मूख्य धारा के साथ संपर्क बनाये रखते हैं, जबकि कई अन्य लोग उद्देश्य भी भूल जाते हैं, और उतना संपर्क भी नहीं रखते। बहुत थोड़े से व्यक्ति ही किसी प्रकार अधिक परिश्रम कर के महान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संघ द्वारा किए गए प्रचेष्टा कि गति को अक्षुन्न रखने कि चेष्टा करते हैं। और जो लोग आलस्य के कारण अपने ऊपर ली गई जिम्मेवारी को नहीं निभा पाते हैं, वे बैठकों में उपस्थित हो कर, सबों के सामने उन थोड़े से लगनशील उद्देश्य के प्रति निष्ठावान कर्मियों के द्वारा किए अथक प्रयास से बनी उसी अबाध गति का श्रेय- स्वयं लेकर गर्व का प्रदर्शन करते हैं, और दूसरे सभी सहकर्मियों के बीच उसी मिथ्या सन्तुष्टि का रोग-विषाणु प्रविष्ट कर देते हैं। जिसके फलस्वरूप कुछ अन्य सहकर्मियों में भी मिथ्या संगठित आत्म-प्रसाद की आड़ में अपनी जिम्मेवारी निभाने के प्रति उदासीनता और आलसीपन बढ़ने लगती है। प्राण-उर्जा से भरकर सम्मिलित प्रयास करने का उत्साह कम हो जाता है, निष्ठा की नदी में भाटा पड़ जाता है, संघ का जो महान आदर्श और उद्देश्य है, वही धुंधला होने लगता है। उत्साहाग्नी मन्द होती जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप संघ का वह महान उद्देश्य-" Be & Make "उस स्थान विशेष में अनुपलब्ध ही रह जाता है, वहाँ का केन्द्र अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता ।
जिस किसी भी संगठन या महान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए चलाये जा रहे सम्मिलित प्रचेष्टा में सफलता प्राप्त कर लेना सहज नहीं, अत्यन्त कठिन है। और जिस संगठन का उद्देश्य जितना महान होगा, सफलता की प्राप्ति उसी अनुपात में कठिनतर होगी। यह कार्य मानो उत्ताल तरंगों को चीरते हुए, नौका को खेते हुए तट पर पहुँचा देना जैसा कठिन कार्य है। तरंगें सर्वदा नौका को डुबो देने की चेष्टा करेंगी, तेज हवाएँ उसे कुमार्ग में धकेल देने की चेष्टा करेगी। नौका के हाल को यदि सख्ती से लक्ष्य की दिशा में ही खींचे रखा जाय, पूरे प्राणपण से लगातार चप्पुओं को चलाते रहा जाए, सभी तूफानी थपेडों को एक-एक कर काटते हुए सतत् आगे बढ़ते जाने से ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।जिस किसी भी संगठन पर खतरा दो तरफ से आ सकता है, बाहर से या भीतर से । बाहरी खतरा भी दो रूपों में आता है- ' आक्रमण ' और ' अनुप्रवेश '। इस प्रकार के कुछ ढोंगी लोग संस्था में घुस गए कि, संगठन का महान उद्देश्य- " Be & Make " तो पीछे छूट गया और पद को लेकर ही खीँच-तान चलने लगी, और संस्था की सारी गरिमा नष्ट हो गई। आक्रमण भी कई तरह के होते हैं। शक्ति या युक्ति-तर्क से उत्साह को मारने का प्रयास होगा, या फ़िर झूठी निन्दा फैला कर आपसी मन-मुटाव बढाने की चेष्टा चलाई जायेगी। बाहर से होने वाले आक्रमण के पीछे कारण भी अवश्य है। सामान्य रूप से जैसे ही कोई नया संघ या नई संस्था किसी शहर या गाँव में गठित होती है, कुछ लोग या कोई-कोई दल सन्देह करने लगता है, यह क्या है ? यह दुर्बल मानसिकता का परिचायक है। शक्तिमान किसी के ऊपर अकारण ही सन्देह नहीं करता। कहा गया है :-
' कायर या डरपोक व्यक्ति को ही झुरमुठ में भयानक भूत दिखाई पड़ता है। '- वे लोग सोंचने लगते हैं, कहीं ये लोग हमलोगों के प्रभाव को कम तो नहीं कर देंगे ? या ये लोग कहीं हमारे ही प्रतिद्वन्द्वी तो नहीं बन बैठेंगे ? या उनके मन में शंका होने लगती है, कहीं हमारे दल से जुड़े सदस्य इनकी तरफ तो नहीं चले जायेंगे ? बिल्कुल प्रारंभिक अवस्था में ये लोग उदासीन बने रहते हैं।किंतु संस्था की शक्ति या समाज के ऊपर उसके बढ़ते प्रभाव को देखलेने के बाद वे इस प्रकार का आघात करने लगते हैं। जब युक्ति-तर्क से नव-गठित संस्था का कुछ नहीं बिगड़ता, तब बल-प्रयोग या शक्ति का प्रदर्शन कर भी नुकसान पहुँचाने की चेष्टा करते है। किन्तु पूरी निष्ठा के साथ आदर्श पर अटल रहने से, संस्था के आदर्श-उद्देश्य के विषय में कहीं किसी प्रकार का भ्रम न रहे तो ऐसे आक्रमण स्वतः पराभूत हो जाते हैं। इसके बाद शक्ति या युक्ति प्रयोग किए बिना, झूठी निन्दा या संस्था के बारे में ग़लत-सलत अफवाहें फैला कर भी आक्रमण हो सकता है। किन्तु संस्था यदि पूरी निष्ठा के साथ अपने महान उद्देश्य को कार्य-रूप देती रहती है तो सारे दुष्प्रचार भी अपने-आप निष्क्रिय हो जाते हैं।
इसके बाद भी आन्तरिक दुर्बलता वश भीतर से खतरा बना रहता है। संस्था के सभी सदस्य नीयम पूर्वक स्वाध्याय आदि पाँचो दैनिक कर्म नहीं करते हों, आदर्श-उद्देश्य के प्रति स्पष्ट धारणा न हो; उनमे यदि निष्ठा, अध्यवसाय, श्रमशीलता, अनुशासन, आज्ञाकारिता आदि का आभाव हो तथा पहले ही आलोचित व्याधि- 'आत्मसंतुष्टि' से भीतरी खतरा बना रहता है। या बाकि सारे गुण हों किन्तु यदि आत्संतुष्टि का विषाणु कहीं प्रविष्ट हुआ की अन्त में संस्था का कार्य ही ध्वस्त हो जाएगा, और कहा गया है :-
' कार्यध्वंसे हि मुर्खता '- इसीलिए अन्य सभी चारित्रिक गुणों पर ध्यान रखते हुए, आत्म-संतुष्टि रूपी व्याधि पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।क्योंकि किसी भी संगठन या संस्था में कभी न कभी, आत्म-संतुष्टि का भाव प्रविष्ट हो ही जाता है। सामान्य तौर से कुछ वर्षों तक संघर्ष झेल लेने के बाद जब, थोड़ी आसानी से काम चलने लगता है-ठीक उसी समय इस रोग का आक्रमण होता है, जैसे खूब घी-चर्बी खा लेने के बाद ह्रदय-रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। संघ के भीतर आत्म-संतुष्टि के विषाणु प्रविष्ट हो जाने के बाद- आदर्श धूमिल होने लगता है, महान उद्देश्य को प्राप्त करने के प्रति पहले वाली व्याकुलता मन्द पड़ जाती है, निष्ठा में कमी आ जाती है, अनुशासन का भाव तथा आज्ञा पालन में शिथिलता आने लगती है। फलस्वरूप संघ के सभी क्रियाकलापों में शैथिल्य आ जाता है, और संघ के प्रति आमजनता की श्रद्धा में ह्रास होने लगता है। अन्तिम रूप से संघ अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल हो जाता है।
इसीलिए संघ के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य है की वह इस व्याधि के लक्षणों पर विशेष रूप से सतर्क रहें, सावधानी बरतें, एवं सम्मलित प्रयास से इस व्याधि को दूर करके, संघ के प्राण-प्रवाह को सर्वदा अक्षुन्न बनाये रखने के लिए जी-जान से प्रयत्नशील रहें। चाहे कोई सदस्य जितना भी जानता हो, आदर्श-उद्देश्य के ऊपर बार बार संघ में चर्चा होती रहनी चाहिए, अपने अपने जीवन को गठित करने के लिए अविराम अध्यवसाय करते रहना चाहिए, तथा 'आदर्श' के जीवन और उपदेश का निरन्तर स्मरण-मनन प्रयोजनीय है। स्वामी विवेकानन्द के इस प्रेरक-संदेश : " उठो ! जागो ! और जब तक तुम चरम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते, तब-तक विश्राम मत करो ! "- का सर्वदा स्मरण करते रहना प्रत्येक सदस्य का परम कर्तव्य है।

७." नैराश्य नहीं "

जिस प्रकार 'आत्म-सन्तुष्टि' के रोग से ग्रस्त होने पर विकास की गति धीमी हो जाती है, उसी प्रकार यदि मन के ऊपर ' नैराश्य' छा जाए तो भी, तब भी कार्य करने का उत्साह जाता रहता है। स्वामी विवेकानन्द कहते थे :
 ' भागवत संसारियों के लिए उपयुक्त ग्रन्थ नहीं है, अर्थात- वे लोग इसके मर्म को नहीं समझ पाते हैं, भागवत केवल त्यागियों को ही आलोक प्रदान करता है।' इसिलए उनकी वाणी और रचनाओं में भागवत से लिया गया उद्धरण बहुत कम ही दिखाई पड़ता है, फ़िर भी भागवत के नाम का उल्लेख किए बिना ही उसके एक श्लोकांश को कभी कभी उधृत किया करते थे। वह है : [पिंगला नामकी एक वेश्या थी । वह बड़ी प्रसिद्ध थी । बहुत-से भोगी, धनी उसके यहाँ आया करते थे और उसे धन दिया करते थे, किंतु एक दिन रात्रिको वह राह देखती ही रह गयी, पर कोई धन देनेवाला आया ही नहीं । इससे वह बड़ी उद्विग्न थी । इतनेमें ही उसने देखा कि उधरसे दत्तात्रेयजी अपनी मस्तीमें घूमते हुए चले आ रहे हैं । उनको देखकर वह विचारने लगी कि ‘इस जनक राजाकी विदेहनगरी में मैं ही एक ऐसी मूर्खा हूँ, जो दूसरे पुरुषोंसे सुख और तृप्ति चाहती हूँ । वे मुझे क्या सुख देंगे, मेरी क्या तृप्ति करेंगे । यदि उनके पास सुख होता और वे मुझे सुख दे सकते तो मेरे पास उसे लेने क्यों आते ? जो स्वयं अपनी प्यास नहीं बुझा सकता, वह दूसरेकी क्या बुझायेगा । जो स्वयं टुकड़ेके पीछे कुत्तेकी तरह सुखके लिये दर-दर भटकता है, वह औरोंको क्या सुख देगा ?’ दत्तात्रेयजीकी मस्ती देखकर उसके मनमें ऐसे विचार आये और उसे वैराग्य हो गया । उसने सोचा—‘अबतक मैंने बड़ी भूल की, अब मैं अपना अमूल्य समय नष्ट नहीं करुँगी ।’ उसके विषयमें श्रीशुकदेवजीने कहा है—
 आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम् ।
यथा संछिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिंगला ॥
(श्रीमद्भागवत ११/८/४४)
बलवती आशा कष्टप्रद है। नैराश्य परम सुख है। ‘आशा ही सबसे बड़ा दुःख और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है । पिंगला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी ।’किन्तु यहाँ 'आशा' और ' नैराश्य ' का प्रयोग कामना- वासना तथा उसके अभाव के सन्दर्भ में किया गया है।
नैराश्य को लेकर किसी कार्य का प्रारम्भ करने से उसमें सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती। स्वामीजी ने इस जगत, " जो तीन काल में नहीं है " - की ओर से अपना मुँह फेर लेने की जितनी चेष्टा की थी, इस संसार ने- इस तापदग्ध संसार ने, उनको उतना हि अधिक अपनी ओर खींचा था। कुत्ते की टेढ़ी ' दुम ' कभी सीधी नहीं होती- इस तथ्य को जानने और कहने के बाद भी, उसे सीधी करने के कार्य में किस प्रबल आशा के साथ स्वयं तो कूद हि पड़े थे, साथ-साथ दूसरों को भी इस परमार्थ के काम में जुट जाने के लिए न जाने कितने प्रकार से उत्साहित करते रहते थे ! क्योंकि वे जानते थे कि इस कार्य के लिए उत्साहित नहीं करने से, मनुष्य व्यर्थ के कार्यों में हि उलझा रहेगा और एक दिन संसार के तापों से दग्ध हो कर मर जाएगा।
ताप-दग्ध मनुष्यों को मुक्ति का पथ दिखाने के लिए ही वे इस जगत में आए थे। इसीलिए उनके मुख से 'समाधी के आनन्द में डूबे रहने कि कामना'- की बात सुनकर ठाकुर ने उनकी भर्त्सना करते हुए उन्हें ' लोकमुखी ' - बनाने की चेष्टा की थी। क्योंकि, ' कुत्ते की टेढ़ी दूम सीधी न होने पर भी ' जो मनुष्य इस- 'संसार रूपी कुत्ते की टेढ़ी दूम' को सीधी करने की चेष्टा में लगा रहता है, उसके स्वयं के भीतर की सारी वक्र्तायें स्वतः सीधी हो जातीं हैं। स्वभाव का टेढापन जाता रहता है, उसके अपने ह्रदय की सारी मलिनता दूर हो जाती है। जीवन पूर्णता की दिशा में अग्रसर होता रहता है, सार्थक बनता जाता है।
इसीलिए महान उद्देश्य रखने वाले संगठन के बाहरी क्रिया- कलापों में आडम्बर की दीनता देख कर, या अन्य लौकिक संस्थाओं के दिखावटी कार्यों के परिमाण से इस कार्य की तुलना करके, कार्य की सफलता- विफलता का हिसाब-किताब न कर, जो लोग इस कार्य में लगे हुए हैं उनके मन कभी भी नैराश्य आना उचित नहीं है। यदि किसी में नैराश्य का भाव दिखाई दे तो समझना होगा कि, उसने कर्म के रहस्य को अभी तक ठीक से समझा नहीं है। अभी तक केवल ऊपर-ऊपर से कार्य कर रहा है, वास्तविक कार्य से न परिचय है न किया गया है।
निराश होने के मनोभाव को नैराश्य कहा जाता है। आख़िर हमलोग निराश होते ही क्यों हैं ? इसके कई कारण हो सकते हैं। हो सकता है, खूब उत्साह के साथ काम में जुट गया। उसके बाद सारा उत्साह ठंढा पड़ गया। सोचने लगा यह सब करके मुझे क्या लाभ होगा ? जिस काम से लाभ हो सकता है, उसी तरफ़ ध्यान दिया जाय। दुसरे तरह कि निराशा तब आती है, जब मैं सोंचता हूँ काम तो अच्छा है, किन्तु यह करना क्या हमलोगों द्वारा सम्भव होगा ? अपनी शक्ति में अविश्वास करने के कारण निराश हो गया। या ऐसा विचार मन में आया कि, हमलोग थोड़ा-बहुत तो कर देते, किन्तु आज जैसा परिवेश बन चुका है, उसमे हमलोग चेष्टा करके भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकते- निराश हो गए। या ऐसा सोंचने लगा कि, केवल हमलोगों की चेष्टा से क्या होने वाला है ? यदि सरकार, या अन्य दूसरी संस्थाएं इस कार्य में कूद पड़तीं, काफी रुपया रहता, आलिशान भवन, गाड़ी, मासिक वेतन पर कुछ लोगों की भर्ती करके सदा इसी कार्य में लगाये रखा जाता तब शायद कुछ हो सकता था। हमलोगों की यह छोटी सी मण्डली जिसमे मुश्किल से दस-पाँच लोग हैं, और अर्थ-बल भी अल्प है, हमलोग और कितना कर सकते हैं ? निराश हो गया।
सबसे खतरनाक किस्म की निराशा तो तब आती है, जब मन में ऐसे विचार उठने लगें कि -शायद इस पद्धति से समाज में परिवर्तन लाना सम्भव ही नहीं- और यही विचार मन में कुछ दिनों तक बना रह गया, तो निराशा के सागर में डूब मरना होगा। उत्साह में कमी, अपनी शक्ति में अविश्वास, बाहरी सहायता का आभाव, परिवेश के प्रभाव का भय, तथा उद्देश्य में अनास्था - इन सब में कोई एक या एकाधिक कारण दिखाई दे, तो नैराश्य अवश्यम्भावी है। और नैराश्य आने के बाद कार्य में सफलता पाना सम्भव नहीं है। इसीलिए उत्साह को सर्वदा तीव्र रखने का प्रयत्न करना अनिवार्य है। जिस उद्देश्य को एकबार निश्चित कर चुका हूँ, वह जब तक सिद्ध नहीं हो जाता, तबतक इस कार्य में लगा रहूँगा- अपने संकल्प में इस प्रकार कि दृढ़ता रखनी होगी। तभी तो स्वामीजी बार-बार कहते हैं - " Stop not till the goal is reached! " लक्ष्य तक तक पहुँचे बिना विश्राम मत करो !
प्राचीन कवि भर्तरिहरी (को स्वामीजी काफी सम्मान देते थे) ने एक सुन्दर उदाहरण दिया है :-
रत्नैः महा-अर्हैः तुतुषुः न देवाः ।
न भेजिरे भीम-विषेण भीतिम् ।
सुधाम् विना न प्रययुः विरामम् ।
न निश्चितार्थात् विरमन्ति धीराः ।। 
[अन्वयाः अनुवादाः च | देवाः महा-अर्हैः रत्नैः न तुतुषुः | = Gods were not feel pleased with great jewels.
 (ते) भीम-विषेण भीतिं न भेजिरे | = (They) did not resort to (succumb to) fear even by frightful poison सुधां विना विरामं न प्रययुः | = (They) did not rest until they got nectar. धीराः निश्चितार्थात् न विरमन्ति | = Those who have capacity to stay focused do not rest away from predetermined objectives.]
 - अर्थात जब समुद्र-मन्थन करते समय उसमे से मणि-माणिक्य आदि निकलने लगे तो देवता लोग उतने से ही सन्तुष्ट हो कर बैठ नहीं गये। और जब उसमे से 'महाभयानक-विष' निकला तब वे उससे भी भयभीत नहीं हुए। जब तक उसमे से अमृत-सुधा नहीं निकला तबतक वे लोग रुके नहीं। ठीक इसी तरह धीर-व्यक्तिगण भी एक बार जब कोई महान उद्देश्य निश्चित कर लेते हैं तो उसे सिद्ध कर लेने कि चेष्टा से कभी विरत नहीं होते।जो लोग स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श मानते हैं, तथा उनके भावों को अपने जीवन में रूपायित करने का प्रयास करते हैं, वे लोग विचार करते हैं- ' मैं केवल मरण-धर्मा शरीर ही तो नहीं, वस्त्तुतः मैं आत्मा हूँ। मैं कौन सा कार्य नहीं कर सकता ? ठान लूँ तो आकाश के नक्षत्रों का चर्वण कर सकता हूँ, एक ही चुल्लू में समुद्र पान कर सकता हूँ। ' इसीलिए, हमलोगों कि शक्ति से इतना महान उद्देश्य कैसे पूरा हो पायेगा- ऐसा हीन विचार उनके मन को कभी आछन्न नहीं कर सकता !
आत्मविश्वास से बलवान बन जाने के बाद भी, क्या कोई परमुखापेक्षी हो कर बैठा रह सकता है ? दुसरे लोग अगर सहायता करें तभी हो पायेगा- ऐसा दीन-हीन भाव तो कायरों में होता है, आत्मविश्वासहीन लोगों में होता है। और रुपया से क्या होता है ? ' मनुष्य रुपया पैदा करता है, रुपया मनुष्य पैदा नहीं करता।' रुपया रहने न रहने से कुछ फर्क नहीं पड़ता, मनुष्य की ईच्छाशक्ति के द्वारा असंभव को भी सम्भव बनाया जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- ' ईच्छा बलवती होने पर अर्थ मनुष्य का दास बन जाता है।'
ऐसा भी सम्भव है कि परिवेश केवल अनुकूल न हो कर प्रतिकूल भी हो जाय। ऐसा होना तो बिल्कुल स्वाभाविक है। इसी भय से यदि शुभकर्म से मुख मोड़ लिया जाय, तो मंगल कि सम्भावना कहाँ रह जाती है ? समस्त बाधाओं का अतिक्रमण करते हुए उद्देश्य कि दिशा में अग्रसर रहना ही मनुष्य का कर्तव्य है। इस विषय में भर्तरिहरी ने कहा है :-
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचै : |
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ||
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः |
प्रारभ्य तूत्त्मजना न परित्यजन्ति ||
- निम्न श्रेणी के लोग विघ्नों के डर से कार्य शुरू नहीं करते हैं, मध्यम श्रेणी के लोग कार्य शुरू कर के विघ्न आने पर कार्य छोड़ देते हैं | लेकिन उत्तम श्रेणी के लोग बार-बार नाना बाधाओं- विघ्नो आने से भी जिस कार्य का प्रारम्भ किए हैं, उसका परित्याग कभी नहीं करते। 
ठीक इसी तरह हमलोग भी समस्त नैराश्य को पैरों तले कुचलते हुए, उद्देश्य की दिशा में दृष्टि को एकाग्र रख कर, उत्साहाग्नी की उत्तुंग शिखा को सर्वदा उर्ध्वमुखी बनाते हुए, आलस्यरहित हो कर लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे; हमलोगों का हुँकार है- " चरैवेति, चरैवेति !" श्री रामकृष्ण एक कहानी कहते थे- ' ब्रह्मचारी ने लकड़हारे को उपदेश दिया था, आगे बढ़ते जाओ। आगे बढ़ने पर लकड़हारे को क्रमशः चन्दन का पेड़ मिला, चाँदी का का खान मिला,सोना आदि पाते हुए अन्त में उसे हीरे का खान मिल गया था। ' हमलोग भी जब तक वह लक्ष्य नहीं प्राप्त कर लेते, कोई भी नैराश्य हमें उद्यमहीन नहीं बना सकता। यदि ऐसा मनोबल विवेकानन्द-चर्चा करके भी प्राप्त न कर सके तो, अब तक हमने किया क्या ?

८ ." कर्म विमुखता नहीं "

कर्मविमुख मनुष्य अपने जीवन को नष्ट करता है, घर-संसार को भी सुखी नहीं बना पाता, और अपनी कर्मठता की शक्ति से उत्पन्न फल, से देश को वन्चित करके अपने सामजिक दायित्त्व की भी अवहेलना करता है। इस प्रकार कर्मविमुखता- देश की प्रगति में बाधक होने के कारण एक प्रकार का देशद्रोह भी है।
आर्थिक-मन्दी के जमाने में एक बात पर हर जगह चर्चा सुनाई पड़ती है कि, कर्मसंस्थानों में वृद्धि नहीं हो रही है, किन्तु बेरोजगारों कि संख्या में क्रमशः वृद्धि होती जा रही है। तथा विभिन्न राजनैतिक दल इसके विरुद्ध, अपने जीभ (जिह्वा) रूपी दुधारी-तलवार लेकर आधुनिक भाषा में सरकार पर- ' हल्ला बोलने के लिए गोलबन्द ' हो गए हैं। उनका मानना है कि- सारा दोष केन्द्रीय सरकार का है। क्योंकि देश का आर्थिक बजट वे लोग ही तैयार करते हैं, अतः इस अवस्था के लिए उनकी आर्थिक नीतियाँ ही उत्तरदायी हैं। जबकि राज्य सरकारें अपने सारे कर्तव्यों- जैसे शिक्षा, सिंचाई, विद्युत, प्रशासन, लघु-कुटीर उद्दोग, कानून-व्यवस्था- सबकुछ का निर्वहन बड़े सुचारू ढंग से कर रहे हैं। केवल केन्द्र सरकार द्वारा सौतेला व्यवहार किए जाने के फलस्वरूप ही,राज्यों में बेरोजगारी कि समस्या ने ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया है।
किन्तु राज्य सरकारों के इस तर्क का थोड़ी गहराई से विश्लेष्ण किया जाए तो पता चलता है कि उनके तर्क में कोई खास दम नहीं है। जिस किसी भी राज्य में जिस किसी दल या निर्दलीय संयुक्त मोर्चे की सरकारें हैं, उनका प्रधान कार्य इतना ही है कि जिस किसी दल में या ' गठबन्धन ' के साथ वे हैं, उस दल के पास जो सत्ता की शक्ति है, उसका जितना व्यवहार करके जितना अधिक से अधिक संभव हो लाभ उठाकर दुबारा गद्दी पर बैठने को सुनिश्चित कर लिया जाय। जन-हित की बातें तो बिल्कुल गौण हैं।
केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच थोड़ा अन्तर है। केन्द्र के द्वारा जिन मंत्रालयों को चलाया जाता है, वे सभी बहुत विशाल और जटिल होते हैं। नीतियों में साधारण सी भूल से भी सम्पूर्ण देश को विराट क्षति होने की सम्भावना रहती है। किन्तु राज्य सरकार को संचालित करने में उतनी बड़ी जवाबदेही नहीं रहती है। केन्द्र सरकार के पास किसी राज्य को पिछड़ा रखने के लिए बहुत अधिक उपाय नहीं होते। किन्तु कोई राज्य अपनी गलत नीतियों के कारण रसातल में भी जा रहा हो, तो भी राज्य सरकार को बर्खास्त करने की कोई जवाबदेही केन्द्रीय सरकार लेने को तैयार नहीं होती। राज्यों के विधान सभा को भंग किए बिना राष्ट्रपति शासन लगा कर, पुनः लाभ-दायक सरकार के गठन का खेल चलता रहता है। किन्तु केंद्रीय सरकार को ग़लत दिशा में जाते देखने पर उसको सताच्युत करना काफी आसन होता है।
किन्तु यह प्रश्न तो उठेगा ही कि आख़िर बेरोजगारी कि समस्या ने इतना विकराल रूप धारण कैसे किया ? पहली बात जनसंख्या वृद्धि का दर-कर्मसंस्थानों से सम्पर्कित अन्य समस्त उपायों के वृद्धि के दर से सर्वदा आगे रही है। कृषि के क्षेत्र में कृषि-उत्पादन कि नई-नई पद्धति बढ़ने के बाद भी, इस क्षेत्र में रोजगार प्रदान कि क्षमता में कभी उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो सकी। कृषि-योग्य भूमि के परिमाण में सामान्य या कहीं-कहीं अल्प वृद्धि होने पर भी, ग्रामीण-उद्दोग, सड़क, विद्युत, सिंचाई आदि व्यवस्थाएं क्रमशः घटती जा रहीं हैं।
 स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 'भारी-उद्दोग ', बड़े-बड़े कल-कारखाने बढ़ाने का जो रंगीन स्वप्न देखा गया था, उनकी वर्तमान संख्या पर गहराई से नजर डालने पर पता चलेगा कि, उनकी संख्या पहले कि तुलना में काफी कमी आई है। एवं आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन को स्वचालित करते रहने के साथ-साथ वहाँ पर भी नौकरी के दर में कटौती क्रमशः बढ़ी है। इसके आलावा पूर्वी भारत में बड़े-बड़े कल-कारखाने विगत कई वर्षों से बन्द होते जा रहे हैं।
सरकारी उद्यम से किसी भारी-प्रकल्प लगाये जाने की घोषणा होते ही सर्वत्र बड़े जोर का हो-हल्ला मच जाता है। किन्तु कितने घोषित सरकारी उपक्रम वास्तव में खुल पाते हैं, इसका हिसाब कौन रखता है ? रुपये के मूल्य में क्रमशः गिरावट आने या महंगाई बढ़ जाने के कारण जितना रुपया लगाने से वह उपक्रम पहले बन पाता, अभी उतने रुपये से उसका एक-चौथाई भी पुरा हो सकेगा या नहीं संदेह है। राज्यों में बाहरी देशों से आगन्तुकों की संख्या भी अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाने के कारण भी बेरोजगारी बढ़ती है। राज्य-परिवहन जैसे एक-दो प्रकल्प इस समस्या का समाधान नहीं कर पाते हैं। इतना ही नहीं, समस्या का मुकाबला और राजनैतिक स्वार्थ दोनों तरफ दृष्टि रखने के कारण इन सब सरकारी उपक्रमों में आवश्यकता से ५०% से १००% तक अधिक कर्मचारियों को नियुक्त कर दिया गया है, इसके साथ-साथ वहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रचंड तांडव ने सरकारी उपक्रमों को रुग्न बना दिया है।
अब ' स्वर्ण- करमर्दन ' से डर कर भी क्या लाभ ? यदि राजनैतिक गुट-बाजी में समय बर्बाद न करके सरकारी कर्मचारी काम में मन लगते, कर्मविमुख नहीं हुए होते तो यह दिन देखना नहीं पड़ता। आज थोड़ा इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि जो सरकारी उपक्रम अब तक घाटे में चल रहे थे, वे अचानक ' करमर्दन ' के भय से मुनाफा कमाने कि दिशा में कैसे जाने लगे ? राजनैतिक पताका वहन करने के बजाय यदि थोड़ा काम में भी मन लगाये होते तो अनेक क्षेत्रों में यह सम्भावना उठती ही नहीं।
किन्तु इस समस्या का एक दूसरा पहलु भी है, जिसके तरफ प्रायः हमलोगों कि दृष्टि नहीं जाती। वह है हमलोगों की कर्मविमुखता (विशेष कर बंगाली कि कर्मविमुखता)। हमलोगों को सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती है, जब बिना परिश्रम किए, ऑफिस में उंघते हुए-निठल्ले बैठे रहने से भी, बढ़िया खाना-पहनना चलता रहता है। ' खट कर खाना पडेगा'- यह बात हमें बिल्कुल पसन्द नहीं है। तास- कैरम खेलूँगा, सड़क की हर मोड़ पर अड्डेबाजी करूँगा, सिनेमा-टीवी में पॉप म्यूजिक सुनूंगा,सड़क केकिनारे खाद्य-कुखाद्य खाऊँगा, मुफ्त में नशा का सुयोग मिला तो वह भी नहीं छोडूंगा, किंतु समय के अनुकूल एक नौकरी तो मिल ही जाना चाहिए। मैं शारीरिक परिश्रम भी नहीं कर सकूँगा; इसीलिए मुझे कागज- कलम चलाने वाली नौकरी ही मिलनी चाहिए। किन्तु एक बात और बताता चलूं, कागज पर सुंदर अक्षरों में लिखा कैसे जाता है, उसका उतना प्रैक्टिस नहीं है। चार पंक्तियों में साधारण सा दरखास्त भी मुझे अंग्रेजी में लिखना नहीं आता, उतना ही नहीं शुद्ध हिन्दी या बंगला में भी नहीं लिख सकता, किन्तु मुझे तो एक अच्छी सी बाबुओं वाली नौकरी ही मिलनी चाहिए।.... कौन देगा ? वहीं जो लोग शारीरिक परिश्रम करने के लिए प्रस्तुत हैं, या जिनके हाथों में हुनर है, वे लोग आज भी बेरोजगार बैठे नहीं मिलेंगे। स्कुल- कालेज में पढ़ते समय जिन लोगों ने मन लगा कर पढ़ाई की है तथा सचमुच कुछ सिखा है, उनलोगों को भी अक्सर कुछ न कुछ कमाई का साधन जुट ही जाता है। किन्तु हमलोगों को तो मन-पसन्द नौकरी ही चाहिए। इसीलिए वह आसानी से नहीं मिलती है।
जिनको नौकरी मिल भी जाती है तो वे कार्य करने से जी चुराते हैं। किसी काम को भली-भांति करने में भी सक्षम नहीं होते। क्योंकि स्वाधीन भारत में राजनैतिक आन्दोलनों की बाढ़ तथा इसमे जो लोग दल का झंडा उठाएंगे उनको सब सुविधा दी जायेगी का आश्वासन दे दे कर युवाओं के मन से- ' कोई भी कार्य करके रोजगार पाया जा सकता है ' की भावना को पूरी तरह से बाहर कर दिया है। स्कुल-कालेज में भी यही हाल चल रहा है। वहाँ भी छात्र गण विशेष कुछ सीख नहीं पाते हैं। इस समय के कालेज के छात्र या ग्रेजुएट बहुत थोड़े से हैं जो सही ढंग से चिट्ठी- पत्री लिख कर, प्रेषक और प्रेषित का सही पता लिख कर उचित भार के लिए सही टिकट चिपका कर डाक से भेजने की योग्यता रखते हों।
नौकरी न कर के जो लोग व्यवसाय या लघु-उद्योग शुरू करते हैं, वे लोग पहले से उस क्षेत्र में स्थापित उद्यमिओं के साथ प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते हैं। उनके जितना परिश्रम करना भी सहन नहीं होता। बैंक से उद्योग के लिए कार्यशील पूंजी का जो ऋण मिला था उसका आधे से अधिक तो साहबी ठाठ-बाट दिखाने में ही खर्च हो गया। आजकल ईमानदारी का घोर आभाव है। सरकारी आपूर्ति का आदेश पाना हो तब तो राज्य के बाहर से आए संवेदकों को टक्कर देने के लिए परचेज कमिटी के साहबों को मोटे अंकों में घुस की रकम गिनते-गिनते मूलधन भी चला जाता है। उसके बाद कम पूंजी रहने के कारण थोड़ा-थोड़ा करके ही कच्चा-माल महानगरों से खरीद कर मंगाना पड़ता है, जिसमे परिवहन पर अस्वाभिक रूप से व्यय करना पड़ता है। बार-बार विद्युत आपूर्ति में बाधा (लोड-शेडिंग ) के कारण कम उत्पादन तथा लागत में वृद्धि होती है, कर्मचारियों की आलसी मनोवृत्ति आदि अन्यान्य कारणों से पश्चिम बंगाल के २,२५,००० लघु उद्योगों में से ७० % रुग्न हो गए हैं और ३० % का कोई चिन्ह नहीं बचा है, वे कहाँ चले गये कोई नहीं जानता।
इन समस्त कारणों से बड़ा और एक कारण है- हमलोगों के लिए तात्विक महत्व को अक्षुन्न बनाये रखना, देश की प्रगति से भी अधिक महत्वपूर्ण है। जबकि कई देश समय की मार खा-खा कर तत्त्व-फ़त्व को बिल्कुल दूर फेंक कर नई बुनियाद काटना शरू भी कर चुके हैं। चीन ने कुछ ही वर्षों पूर्व घोषित किया है कि- समय कि कसौटी पर खरे न उतरने वाले तत्त्व या खोखले सिद्धान्तों में कुछ नहीं रखा है, देश की आर्थिक अवस्था की उन्नति ही आमजनता का कल्याण कर सकती है। नई आर्थिक नीति देश के भले के लिए हो या नुकसानदेह हो, किन्तु भारत सरकार ने हाल तक चली आ रही परम्परागत दलीय आर्थिक नीति के तत्त्व को सम्पूर्ण विसर्जित कर के नये पथ पर चलने का साहस जरुर दिखाया है। राज्य सरकारें भी वाम-पन्थी विचार धारा को स्पष्ट रूप से विसर्जित करने की घोषणा किए बिना भी धीरे-धीरे उसी पथ का अनुशरण करने की चेष्टा कर रहे हैं। इसका परिणाम क्या होगा यह तो भविष्य ही बताएगा।
किन्तु देश की आर्थिक उन्नति के लिए चिन्तित दलों के नेतागण- दो मुख्य बाधक कारणों को दूर करने पर भी कुछ बयान दे देते तो ज्यादा खुशी होती; किन्तु अभी तक किसी भी नेता ने इस पर कुछ कहा नहीं है। पहला यह, कि जब तक सारे देश-वासी मिलजुल कर कठोर परिश्रम नहीं करेंगे कोई भी आर्थिक नीति फलदायक सिद्ध नहीं होगी। दूसरा यह कि देश के हर क्षेत्र में ईमानदार मनुष्यों कि संख्या में वृद्धि किए बिना नई आर्थिक नीति भी ज्यादा कारगर सिद्ध नहीं हो सकती। 'घूसखोरी'- की क्या धूम मची है ! बोफर्स काण्ड तो बहुत छोटी और पुरानी बात हो चुकी है, आज भी घुस देकर क्या नहीं कार्य जा सकता है ? इस मामले में केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार में कोई पार्थक्य नहीं रह जाता, ' को बड़-छोट कहत अपराधू ' - जैसी हालत है। तभी तो देश में काले- धन का मान १४००,००० कड़ोर रुपये तक जा पहुँचा है। इसी से धार्मिक संस्थानों में रूपये आयेंगे, इसी से पृथ्वी के वृहत्तम लोकतन्त्र में ग्राम-पंचायत से लेकर पार्लियामेन्ट तक का निर्वाचन शान्तिपूर्वक सम्पन्न हो जाएगा। यही धन निर्धारित करेगा कि अब यह देश किस पथ पर चलेगा। जिसके हाथों में यह धन है, वे लोग ही नेशनल हाई वे का निर्माण और देख-रेख करेंगे एवं टोल-टैक्स वसूलेंगे। ये लोग ही विद्युत उत्पादन और वितरण व्यवस्था के क्षेत्र में आयेंगे, सिद्धान्तों के सूखे पत्तियों को रुपये के वजन से दबाकर, ये लोग ही सरकार के साथ साझा में कल-कारखाने स्थापित करेंगे। बंगाल में लगभग दो दशक पहले हल्दिया पेट्रोकेमिकल में एक लाख लोगों को रोजगार देने का वादा बड़े जोर-शोर से किया गया था। किन्तु जून १९८९ तक पश्चिम बंगाल के रोजगार-दफ्तर में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या ४३ लाख हो चुकी थी। अपना नाम केवल पंजीकृत करा देने से भी क्या होने वाला है ? सुभाष चाँद ने १९६२ में उच्च माध्यमिक पास करने के बाद एक किरानी की नौकरी पाने के लिए एम्प्लोयमेंट एक्स्चेंज में नाम दर्ज कराया था। नाम दर्ज कराने के ३० वर्ष बाद उसको तिहाड़ जेल में वार्डेन के पद के लिए आवेदन करने का एक पत्र प्राप्त हुआ,जिसमे अधकतम आयु सीमा २५ वर्ष थी, किन्तु उसकी उम्र तबतक ४८ वर्ष हो चुकी थी । वहाँ के प्रभारी अधिकारी को जब उसकी वर्तमान आयु का पता चला तो उन्होंने अपनी लाचारी प्रकट करते हुए कहा - " इसमे हमलोगों की कोई गलती नहीं है, हमारे यहाँ तो बहुत सारे नाम प्रतीक्षा की सूचि में भरे पड़े हैं न, हमलोग ठीक उसी क्रमानुसार एक के बाद एक भेजते जा रहे हैं ।" बेरोजगारी हटाने के लिए इस सरकारी अध्यवसाय को तो साधुवाद मिलना ही चाहिए।
शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती राजनैतिक दखलंदाजी के फलस्वरूप, शिक्षा के स्तर में भारी गिरावट आ गयी है। संस्कृत भाषा की पढ़ाई बन्द हो जाने की कारण देश की सन्तानों ने अपने गौरवशाली राष्ट्रिय विरासत का सूत्र ही खो दिया है।वहीं अंग्रेजी भाषा नहीं सीख पाने के कारण जन साधारण के बच्चे अखिल भारतीय स्तर पर नौकरी पाने या विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ते जा रहे हैं। इस अवस्था को देख-सुन कर भी यदि यहाँ का युवा समुदाय अपनी जड़ता त्याग कर उठ खड़े नहीं होते तो कोई उपाय नहीं बचेगा। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कहते थे- ' अब और सोने का समय नहीं है, देखो दुसरे देश किस प्रकार प्रगति के मार्ग पर बढे जा रहे हैं।' टाटा नगर के संस्थापक जमशेदजी टाटा को स्वामी विवेकानन्द ने ही स्वदेशी उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया था। युवाओं के लिए उनका संदेश था- ' स्वावलंबी बनो ! अपने पैरों पर खड़े हो जाओ ! किन्तु- चाकूरी गुखूरी करे नय '। नौकरी न करके अपना उद्योग-व्यवसाय करने के लिए स्वामीजी युवाओं को प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने युवाओं को जापान जाने का परामर्श दिया था, वे लोग कितना परिश्रमी हैं, जा कर अपनी आंखों से देख आने के लिए कहा था। भारत की नई आर्थिक नीति का समर्थन विश्व के कई देशों ने भी किया है। किन्तु कई देश अभी भी पुरे मन से यहाँ पूंजी निवेश करने में अनिक्षुक हैं। उनके मन में यहाँ की आन्तरिक सुरक्षा को ले कर भय व्याप्त है। कई राज्यों में व्याप्त नक्सली हिंसा और कर्मियों में कर्म न करने की आदत से वे शंकित हैं की उनकी पूंजी कहीं फंस तो नहीं जायेगी ?
कोई भी सरकार इन सब बातों पर विशेष ध्यान नहीं देती। वास्तव में सरकारें पंगु हो गई हैं। स्वाधीनता के बाद राजनैतिक वातावरण को हमलोगों ने विषाक्त बना दिया है, तथा यहाँ कि भावी पीढ़ी को अशिक्षा-कुशिक्षा दे कर मनुष्य को ' अमानुष ' बना दिया है, उसी का फल भोगना पड़ रहा है। किन्तु इसके बावजूद हमें जीना तो पड़ेगा ही। जीवित बचे रहने का उपाय क्या है ? प्रत्येक युवा को इन समस्त प्रतिकूल अवस्थाओं के बीच भी, मनुष्यत्व अर्जित करके सर उठा कर जीना सीखना होगा। देशवासियों के प्रति ह्रदय में प्रेम रख , ईमानदारी से श्रम करने का संकल्प लेना होगा। Be & Make के सिद्धांत का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। किसी मूर्ख के उपदेश का अनुशरण करके युवा यदि चरित्र-निर्माण के आन्दोलन को छोड़ कर तोड़-फोड़ करने वाले आन्दोलन का हिस्सा बनेंगे, तो देश की दुर्गति घटने के बजाय बढ़ती ही जायेगी। स्वामी विवेकानन्द के आह्वान को याद रखना होगा- " तुमलोग क्या अपने देश से प्यार करते हो, तुमलोग क्या मनुष्य से प्रेम करते हो ? तो आओ ! मनुष्य बनो ! "

९." ज्योतिष नहीं "

आजकल जिस प्रकार ' डाक्टरखाना ' और ' दवाखाना ' आपस में घुल-मिल कर एक हो गए हैं, उसी प्रकार 'ज्योतिष- कार्यालय ' एवं ' जेवर-दुकान ' ( जुएलरी शॉप ) भी एक हो चुके हैं। ज्योतिषाचार्यजी के नाम के ऊपर -' भाग्यं फलति सर्वत्र ' लिख कर, लेटर पैड पर निचे में जेवर दुकान का नाम और पता भी छापा रहता है; जिनके पास बार-बार नहीं, 'एक बार' जाने से ही आगन्तुक के भाग्य को बदल देने का दावा किया जाता है। कोई यह नहीं पूछता कि, यदि भाग्य को बदला जा सकता है, तो शाइन बोर्ड में ' भाग्य ही सर्वदा फलित होता है ' - लिखना कहाँ तक उचित है ? सत्य बात तो यह है कि भाग्य खुल जाता है इन व्यवसायियों का, उन हैरान-परेशान लोगो का नहीं, जो अपना भाग्य बदलवाने वहाँ जाते हैं। इसिलए आज चिकित्सा, ज्योतिष, शिक्षा, साहित्य, संगीत, धर्म, राजनीती- आदि समस्त विषयों का व्यवसायीकरण हो चुका है। आधुनिक युग में भी कुछ दिनों के लिए कहीं-कहीं 'शुद्रप्राधान्य '- दिखने पर भी, सम्पूर्ण पृथ्वी पर अभी तक ' वैश्य- राज्य ' ही कायम है।
जिस प्रकार डाक्टर का प्रेस्क्रिप्सन दिखा कर दुकान से दवा खरीदने पर डाक्टर को भी कमिशन मिल जाता है, उसी प्रकार ज्योतिषी के व्यवस्थापत्र में भी किसी खास ग्रह कि वक्र-दृष्टि का उल्लेख करते हुए, ग्रहशान्ति कवच और ग्रह-रत्न या पत्थर का नाम और वजन भी लिख दिया जाता है। जौहरी भी उतने रत्ती का शुद्ध पत्थर अंगूठी या ताबीज में भर कर ग्राहक को देने के बाद, ज्योतिषीजी को उनका लाभांश पुरी ईमानदारी के साथ पहुँचा देते हैं। एक ही कवच का विभिन्न नाम रख कर, ग्राहकों के पौकेट के अनुसार ५१ रूपये से लेकर २१०० रूपये तक में विक्री किया जाता है। इस प्रकार ग्रह-रत्न या कवच क्रेताओं का भाग्य तो फूट जाता है, परन्तु व्यवसाइयों का भाग्य खुल जाता है।
आजके तथाकथित आधुनिक मनुष्य ईश्वर को मानने के लिए राजी नहीं हैं, किन्तु भाग्य पर विश्वास करते हैं तथा भाग्य बदलवाने की कामना से ज्योतिषियों की चौखट पर नाक रगड़ते हुए जो भी बची-खुची आत्मशक्ति थी, उसको भी धन के साथ गँवा देते हैं। इस विषय पर स्वामी विवेकानन्द क्या कहते थे उसे सुनने से हमलोगों का भला हो सकता है- " निर्बल व्यक्ति, जब सब गँवाकर अपने को कमजोर महसूस करते हैं,तब पैसे बनाने के लिए बेसीर-पैर की तरकीबें अपनाते हैं और ज्योतिष एवं इन सब चीजों का सहारा लेते हैं। संस्कृत में कहावत है : ' जो कापुरुष और मूर्ख है, वह कहता है यह भाग्य है।' लेकिन वह बलवान पुरूष है, जो खड़ा हो जाता है और कहता है, ' मैं अपने भाग्य का निर्माण करूँगा।' हम लोग ग्रहों के प्रभाव में हो सकते हैं, लेकिन इसका हमारे लिए अधिक महत्व नहीं है।नक्षत्रों को आने दो, हानि क्या है ? यदि कोई नक्षत्र मेरे जीवन में उथल-पुथल करता है, तो उसका मूल्य एक कौड़ी भी नहीं है। तुम अनुभव करोगे कि ज्योतिष और ये सब रहस्यमयी वस्तुएँ बहुधा दुर्बल मन की द्योतक हैं। " ( वि० सा० ख० ९ : १५५)
इसी तथ्य की व्याख्या और भी तार्किक ढंग से करते हुए स्वामीजी आगे कहते हैं- " यदि किसी गोचर घटना की व्याख्या उसकी प्रकृति के घटकों से हो जाती है, तो बाहर से कोई व्याख्या ढूँढना मूर्खता है। अगर संसार स्वयं ही अपनी व्याख्या कर दे, तो व्याख्या के लिए बाहर जाना मूर्खता है। क्या तुमने किसी मनुष्य के जीवन में कोई भी ऐसी घटना घटती देखी है, जिसकी व्याख्या स्वयं मनुष्य के सामर्थ्य के भीतर न हो ? इसीलिए ग्रह- नक्षत्रों या दुनिया की अन्य किसी वस्तु को टटोलने से क्या लाभ ? मेरी वर्तमान अवस्था के स्पष्टीकरण के लिए मेरा निज का कर्म ही पर्याप्त है। इसकी व्याख्या के लिए ग्रह-नक्षत्रों के पास जाने की क्या आवश्यकता है ? उनका कुछ प्रभाव हो सकता है, किन्तु उनकी उपेक्षा कर देना हमारा कर्तव्य है, न कि उनकी सुनना और अपने को उद्विग्न करना। " (वि० सा० ख० ९: १५५)साधारण मनुष्य, विशेष कर जब किसी संकट में फंस जाता है, तब ज्योतिषी के पीछे दौड़ता है, और अपनी दुर्गति को और भी अधिक बढ़ा लेता है, पहले कि अपेक्षा अधिक निर्बल हो जाता है। इसका एकमात्र कारण यही है कि उन्हें अपने अन्तर्निहित अनन्त शक्ति का ज्ञान नहीं है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " मैं जो भी शिक्षा देता हूँ, उसके लिए यह मेरी पहली अनिवार्य शर्त है - जिस किसी वस्तु से आध्यात्मिक, मानसिक, या शारीरिक दुर्बलता उत्पन्न हो, उसे पैर की अँगुलियों से भी मत छुओ। मनुष्य में जो स्वाभाविक बल है, उसकी अभिव्यक्ति धर्म है। असीम शक्ति का स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुंडली मारे विद्यमान है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। " बहुत स्पष्ट तौर से कहते हैं- " फलित ज्योतिष जैसी समस्त कल्पनाओं को, यद्दपि उनमे सत्य का एक कण हो सकता है, दूर ही रखना चाहिए। "
इस विषय में स्वामीजी एक कहानी कहे थे- " किसी ज्योतिषी ने एक राजा के दरबार में पहुँच कर उससे कहा, ' छः महीने में आपकी मृत्यु हो जायेगी ।' राजा डर कर हतबुद्धि हो गया और भयवश वहीं तत्काल प्रायः मरणासन्न हो गया। किन्तु उसका मंत्री चतुर व्यक्ति था। उसने राजा से कहा कि ये ज्योतिषी मूर्ख होते हैं। उस पर राजा का विश्वास नहीं जमा। इससे मंत्री को इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न सूझा कि वह ज्योतिषी को राजप्रासाद में पुनः बुलाये और राजा को समझाए कि ये ज्योतिषी मूर्ख होते हैं। तब उसने ज्योतिषी से पूछा कि क्या तुम्हारी गणना सही है ? ज्योतिषी ने कहा कि कोई गलती नहीं हो सकती। परन्तु मंत्री को संतुष्ट करने के लिए उसने पूरी गणना फ़िर से की और तब कहा कि वह बिल्कुल ठीक है। राजा का चेहरा फीका पड़ गया। मंत्री ने ज्योतिषी से पूछा, " और आपकी मृत्यु कब होगी, इसके बारे में आप क्या सोचते हैं ?" ' बारह वर्ष में ' , जवाब मिला। मंत्री ने अपनी तलवार खींच ली और ज्योतिषी का सिर धड़ से अलग कर दिया। और राजा से कहा, " इस मिथ्यावादी को तो आप देख रहे हैं ? यह इसी क्षण मर गया । " और राजा के सामने यह प्रमाणित कर दिया कि ये सब बातें सुनने योग्य भी नहीं होतीं।
इसी लिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " यदि तुम अपने राष्ट्र को जीवित रखना चाहते हो, तो इन सब चीजों से दूर रहो। " जबकि हमारे( हम मतदाता रूपी राजा के ) मंत्री लोग पञ्चांग देखने के बाद ही भोट- युद्ध में उतरते हैं, शपथ- ग्रहण की तिथी का निर्धारण करते हैं, जिस-तिस बाबा-टाबा के पैरों में मत्था टेकते हैं, ताकि कुर्सी कहीं बीच में ही हिल न जाय। स्वामीजी कहते हैं- " दुखी न हो; किसी का जी दुखाना मेरा अभिप्राय नहीं है, लेकिन सत्य मुझे कहना है। दार्शनिक का कर्तव्य है कि वह तुमको अन्धविश्वास से ऊपर उठाये। यहाँ तक कि यह संसार, यह शरीर और मन अन्धविश्वास हैं। मेरे जीवन की अवधि जितनी अधिक होती जाती है, दिनानुदिन उतना ही मेरा यह विश्वास दृढ़तर होता जा रहा है कि प्रत्येक मानव दिव्य है। किसी भी स्त्री या पुरूष में, चाहे वह कितना भी जघन्य क्यों न हो, वह दिव्यता विनष्ट नहीं होती। उस स्त्री या पुरूष को केवल इतना ही नहीं मालूम है कि वहाँ तक कैसे पहुँचा जाय और वह सत्य कि प्रतीक्षा में है। ...तुम हो कितनी असीम आत्मा ! और टिमटिमाते हुए तारों से छले जाना ! यह लज्जास्पद दशा है। तुम दिव्य हो; टिमटिमाते हुए तारों का अस्तित्व तो तुम्हारे कारण है। यदि तुम चाहो तो मुट्ठीयों नक्षत्र चबा सकते हो। बलवान बनो, सब अंधविश्वासों से ऊपर उठो और मुक्त हो जाओ। " (वि० सा० ख० ९ : १५८ )

१०." भय नहीं "

यदि जीवन में विजयी होना चाहते हों, या जगत पर विजय पाना चाहते हों, तो भय के ऊपर विजय प्राप्त करना ही होगा। जो व्यक्ति भय के सामने पराजय स्वीकार कर लेता है, उसे जीवन में कदम-कदम पर पराजय का मुख देखना पड़ता है। अदृष्ट का भय हमलोगों की सत्ता को सन्कुचित कर देता है। जिसके फलस्वरूप उसका प्रस्फुटन, विकास और विस्तार बाधित हो जाता है, जीवन व्यर्थ हो जाता है। यदि हम अपने मनुष्य जीवन को सार्थक करना चाहते हों, तो चाहे जैसे भी हो इस भय को मन से निकाल बाहर करना ही पड़ेगा।
भय नामक वस्तु का निवास मनुष्य के मन में ही रहता है। घने बादलों के बिच कड़कती हुई बिजली में, गहरे समुद्र में, जंगल की निर्जनता में, पशुओं की हिंसा में, आतंकवादियों की बन्दूकों में, व्याधि की यन्त्रणा में, या काली अंधियारी रात्रि में- इन में से किसी भी जगह पर भय नामक वस्तु छुप कर बैठी नहीं रहती। ये सभी परिस्थितियां, केवल हमारे मन में छिपे भय को जगा देतीं हैं। अतः भय के साथ युद्ध करने का मैदान, हमलोगों का मन ही है। इस रणभूमि में विवेक सेनाध्यक्ष है, मनोबल सैनिक है, संकल्प की दृढ़ता धनुष है, तथा प्रचेष्टा ही भयघाती वाण है ! इन्हीं वाणों से जब भय को मन की रणभूमि में मार गिराया जाता है, तब त्रिभुवन भयशून्य हो जाता है।
जब तक यह भय मन में बना हुआ है, तबतक जगत की समस्त वस्तुएं हमलोगों के लिए भय का कारण बन जातीं हैं।
दार्शनिक कवि भरतृहरी ने कहा है- " इस जगत में समस्त वस्तुएं भय के साथ जुड़ी हुई है, भोग में रोग का भय है, उच्च कूल में च्युत होने का भय है, वित्तवान को राजा का भय है, मान-सम्मान में मान हानी का भय है, बल रहने पर शत्रु का भय है, रूपवान को बुढ़ापे का भय है, शास्त्रज्ञान रहने पर बहस में उलझने का भय, गुणवान को निन्दकों का भय, शरीर के साथ मृत्यु का भय सदा जुडा रहता है। " आगे कहते हैं- " किसी कार्य को आरम्भ करने के पहले ही विघ्न पड़ जाने का भय " - मनुष्य को कार्य से विरत कर देता है। तो फ़िर इस भय से बचने का उपाय क्या है ?बंगला कहावत है- ' करिते पारी ना काज, सदा भय सदा लाज, संशये संकल्प सदा टले ' । यदि संकल्प पर अटल रहने के लिए भय से बचना चाहते हों, तो सबसे पहले भय को ही ठीक से समझने की चेष्टा करनी होगी। मन में अज्ञात अनागत अदृष्ट के प्रति एक प्रकार की आशंका बोध जाग्रत हो जाता है- कहीं मुझे कष्ट तो नहीं होगा, या मेरा जो कुछ है उसे कहीं खोना तो नहीं पड़ेगा ? इस आशंका से ही भय उत्पन्न हो जाता है। इसीलिए जिस वस्तु से कष्ट पाने की सम्भावना होती है, या जिस किसी व्यक्ति को देखने से लगता है कि वह मेरी कोई वस्तु हरण कर सकता है, उन्ही को हमलोग भय का कारण मानते हैं। इसीलिए कनगोजर, साँप, बिच्छा, या हिंसक पशुओं को देखते ही उसे मार डालने की बात सोचने लगता हूँ, शत्रुओं के मारे जाने की कामना करता हूँ।यदि वाह्य जगत में भय के कारणों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर उनका नामों- निशान मिटा देना चाहते हों, तो सम्पूर्ण जगत का ही विध्वंश करना होगा। किन्तु वह असम्भव है। इसीलिए वाह्य जगत में चेष्टा न करके, मन के भीतर छुपे भय को कैसे मार डाला जाए इस पर गहन चिन्तन करना आवश्यक है।
हमलोगों ने पहले देखा है कि, भय के साथ युद्ध करने वाली सैन्य-टुकड़ी 'मनोबल' है, और ' विवेक ' उसका सेनाध्यक्ष है। अतः इस मनोबल को विवेक के अधीन रखना होगा। भय पर विजय प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प करना होगा। जैसे ही किसी भय के सम्मुखीन होऊंगा उसी समय मनोबल का नियोग कर उसपर विजय प्राप्त करने की चेष्टा करनी होगी। मनोबल के साथ चेष्टा करने पर एकदिन भूत का भय समाप्त हो जाता है तथा कुछ समय बाद -मृत्यु भी डराने में नाकाम हो जाती है। (यथार्थ स्वरूप को जान लेने के बाद ) शारीरिक कष्ट सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा कोई बहुमूल्य वस्तु खो जाने से भी कातर नहीं होना पड़ता। विघ्न आने की आशंका से किसी कार्य को पूर्ण करने की चेष्टा में प्रवृत होने में कोई बाधा नहीं आती।
भय के तात्विक सिद्धांत के सम्बन्ध में भी थोड़ा जान लेना अच्छा है। उपनिषद में कहा गया है-
सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन॥9॥

यह विश्व ही 'ब्रह्म' है, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है-" नेह नानास्ति किंचन , द्वितीयाद्वै भयं भवति "
 - अर्थात यहाँ जरा भी नानत्व नहीं है, अपने अतिरिक्त दूसरे का बोध रहने से ही भय होता है, द्वैत में निश्चय ही भय है। 'हमलोगों ने देखा है कि, हमलोग अपने से भिन्न किसी वस्तु या व्यक्ति से भय पाते हैं। हमलोगों कि सामान्य बुद्धि यह समझा देती है कि, जिससे डर लग रहा है वह - मेरे सिवा कोई अन्य चीज है। इसीलिए कहा जाता है कि, द्वैत-बोध से ही भय कि उत्पत्ति होती है। यदि कोई व्यक्ति अपने अनुभव से यह जान ले कि, यहाँ दूसरा कोई नहीं है- मैं ही सब कुछ बना हूँ, या मैं ही सब में हूँ, उसका द्वैत-बोध बिल्कुल ही समाप्त हो जाए, तब निश्चय ही उसको किसी चीज का भय नहीं होगा। जिसके मन में मित्र-शत्रु का भेद नहीं रहता, जो सभी को अपना मित्र समझता है, उसे किसी से भय नहीं होता। इसीलिए मित्रता बढ़ाते जाने से भय कम होता है, और शत्रुता बढ़ने से भय बढ़ता है।
अब अगर ' भयभीत ' होने की प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाय तो देखते हैं कि- ' कष्ट पाउँगा या कुछ खो दूँगा ' इस आशंका से ही भय होने लगता है। डाक्टर के इंजेक्सन से भय क्यों होता है ? सुई लगने से कष्ट तो शरीर को होता है। अब यदि हम यह सोचें कि हमलोग तो केवल यह शरीर मात्र हैं- तब कष्ट पाने कि आशंका से मुझे भय अवश्य होगा। परन्तु हमलोग यदि अपनी अनुभूति के आधार पर यह दृढ़ निश्चय करने में समर्थ हो जायें कि- ' मैं शरीर नहीं हूँ ' ( अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हूँ ) ! तो फ़िर हमें शारीरिक कष्ट का बोध भी नहीं होगा। हमलोग भी यह कह पाने में समर्थ हो जायेंगे- ' देह जाने, दुःख जाने, तुमि मन आनन्दे थाक। '
फ़िर इस आशंका से भी भय होता है कि, जो कुछ मेरा है, उसे कहीं खो न दूँ। इस भय का विश्लेषण करने पर हम क्या देखते हैं ? " मैं " और " मेरा " - की यही भावना जब तक मुझमे बनी हुई है, तब तक भय भी बना रहेगा। अपने जिस मिथ्या ' नाम-रूप ' को हमलोग देहाध्यास नहीं दूर होने के कारण ' मैं ' कह रहे हैं और इससे जुड़ी वस्तुओं को ' मेरा ' समझ रहे हैं- (अपने सच्चिदानन्द- स्वरूप का बोध हो जाने के बाद ) जब बुद्धि का यह भ्रम सदा के लिए नष्ट हो जाता है, तो ' मेरा कुछ खो जाएगा की आशंका से होने वाला भय ' - भी सदा के लिए दूर हो जाता है। आत्मसाक्षात्कार के बाद जब द्वैत-बोध नहीं रहता, तब 'मैं-मेरा ' की बुद्धि भी नहीं रहती, इसीलिए विवेक की दृष्टि से देखने पर ये दोनों चीजें वस्तुतः एक ही हैं।
किन्तु इस अद्वैत- वेदान्त को समझ पाना तो बहुत कठिन लगता है, न ? कठिन तो है, किन्तु चेष्टा करते जाने से भी अपने यथार्थ स्वरूप का बोध, किसी को न नहीं होता हो- यह भी ठीक नहीं है। मनुष्य बनने और बनाने - की साधना में निष्ठा के साथ लगे रहने से, धीरे-धीरे ह्रदय का विस्तार होते रहने से, मानव-मात्र के प्रति मैत्री का भाव बढ़ाते रहने से, मैं-मेरा की संकीर्णता का अतिक्रमण कर लेने से, ' पराया को भी अपना बोध करना '- असम्भव नहीं है। (और यही तो अद्वैत ज्ञान है !) जीवन-गठन के इस निरन्तर चलने वाले संग्राम में हम जितना अग्रसर होते रहेंगे, भय भी हमसे उतना ही दूर होता जाएगा। जीवन-गठन या चरित्र-निर्माण के पथ को ही- ' इश्वराभिमुखी पथ' कहते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने बार-बार कहा है, ' मनुष्य ही ईश्वर बन सकता है '। उसी भगवान की व्याख्या करते हुए भागवत में कहा गया है, ' यद् विभेति स्वयं भयम् ' - अर्थात जिससे स्वयं भय को भी भय होता है। अतः जब हमलोग भी अपने जीवन को किसी ' मनुष्य रूपी भगवान ' ( श्री रामकृष्ण, माँ सारदा,स्वामी विवेकानन्द ) के साँचे में ढाल कर गठित कर लेंगे तो, हम निर्भय हो जायेंगे। स्वामीजी कहते हैं न ! एकमात्र हमारे शास्त्रों में ही ईश्वर को ' अभिः ' कहा गया है। कहते हैं, " यदि तुमलोग वेदों (उपनिषदों )का अध्यन करो, देखोगे कि वहाँ ' अभय ' शब्द का उल्लेख बार-बार आता है। तुमलोग कभी किसी चीज से भय मत करना- भय तो दुर्बलता का चिन्ह है। " इसीलिए अथर्व वेद में प्रार्थना है : 
अभयं मित्राद् अभयम् अमित्राद् अभयं ज्ञाताद् अभयं पुरो यः | 
अभयं नक्तम् अभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु ||6||
- हे प्रभु ! मित्रों से,शत्रु से, ज्ञात वस्तु से, अज्ञात वस्तु से- मुझे भय शून्य बना दो। हमलोगों के दिन और रातें भयशून्य हों। समस्त दिशाएँ मेरे लिए मानो मैत्री-भाव से परिपूर्ण हो उठें !

११." क्रोध नहीं "

इस जगत में शायद ही कोई मनुष्य ऐसा होगा, जो यह न जानता हो कि- ' क्रोध करना अच्छी बात नहीं, षड्-रिपुओं में से एक है, हमलोगों का शत्रु है, हमें क्षति पहुँचाता है।' किन्तु जिसमे क्रोध न हो, ऐसे मनुष्य भी विरले होते हैं। बहुत से लोगों में क्रोध कि मात्रा बहुत अधिक रहती है, बहुतों में कम होती है। किन्तु जिन्हें कभी क्रोध न आता हो, ऐसे मनुष्यों की संख्या बहुत कम है। इसके बावजूद यदि जीवन को सुन्दर ढंग से गठित करना हो, इसे सार्थक बनाना हो, तो चरित्र के कई गुणों (२४ चरित्र के गुण ) को अर्जित करने के साथ-साथ, चरित्र में जन्म-जात रूप से विद्यमान कतिपय दुर्गुणों ( नेति से ईति में कहे गए १२ चरित्र के दुर्गुण ) का त्याग कर देने के लिए भी विशेष रूप से प्रयत्नशील रहना आवश्यक है।
इन जन्म-जात दुर्गुणों में से- क्रोध भी एक बहुत बड़ा दोष है, जिसके रहने से कई बार अच्छे गुण भी व्यर्थ हो जाते हैं।क्रोध के वशीभूत होने पर मनुष्य अपना विवेक खो देता है।जब क्रोध से अँधा होने पर विवेक काम करना बन्द कर देता है, तब मनुष्य के लिए मन,वचन और कर्म में सामन्जस्य रख पाना असम्भव हो जाता है। और उसकी अवश्यमभावी परिणति अपनी क्षति में होती है। इसीलिए कहा गया है- ' बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय।'
हमलोगों ने इसके पहले भय किसे कहते हैं, क्यों होता है, उस पर विजय कैसे प्राप्त किया जाता है, आदि के विषय में अच्छी तरह समझ लिया है। किन्तु केवल भय को जीत लेना ही काफी नहीं है। हो सकता है कि, भय चला गया। किन्तु मन में इच्छाओं का उठाना तो बन्द नहीं होता। हो सकता है भय रहित हो जाने के बाद ही, मन में कई प्रकार कि इच्छाओं को पूर्ण करने संकल्प-विकल्प उठने लगे।
हमलोग निजी जीवन में जिन सब विषयों का भोग करते हैं, उससे जो विभिन्न प्रकार के सुखों का अनुभव होता है, उसके फलस्वरूप उन भोग-सुख प्रदायक ' उपकरणों ' के प्रति मन में गहरी आसक्ति उत्पन्न हो जाती है, एवं उन्ही चीजों को फिरसे , एवं और अधिक मात्रा पाना चाहते हैं। इसी इच्छा को कामना या काम कहते हैं।किसी प्रिय वस्तु को पाने कि, कामना या काम या इच्छा मन में बलवती हो जाय और जब किसी कारण वश उसको पूरा करने में बाधा पड़ जाय, तब उस कारण के प्रति उसी समय हमलोगों के मन में क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अर्थात उस कारण के प्रति विद्वेष का भाव उत्पन्न हो जाता है। इसीलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है:-
" काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धि येनमिह वैरिणम्॥ (३:३७)
- वस्तुतः काम और क्रोध दोनों एक ही हैं एवं उनको अपना महाशत्रु समझना चाहिए। वैसे तो षड् रिपु हमारे शत्रु हैं, किन्तु क्रोध महाशत्रु है।(-' यह काम है, यह क्रोध दोनों एक ही चित्तवृत्ति है, जो रजोगुण से उत्पन्न है। यह काम भोगों से कभी तृप्त न होने वाला और महापापी है। इस संसार में इसे शत्रु जानो।' यहाँ ' काम क्रोध ' शब्दों से छः रिपुओं का संकेत किया गया है क्योंकि आत्मोन्नति के मार्ग में ये सभी शत्रु हैं; रूप, रस, आदि विषयों के प्रति इन्द्रियों के आकर्षण के फलस्वरूप - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य ये छः रिपु प्रकट होते हैं। छहों रिपु आत्मोन्नति के मार्ग में समान रूप से बाधक हैं। अतः इनका त्याग आवश्यक है। इसीलिए शास्त्रकारों ने उन्हें षड् रिपु कहा है। ये साधन मार्ग के कंटक हैं।)
इसीलिए भगवान गीता में ही अन्यत्र कहते हैं :-
" विगतेच्छा भय क्रोधो यः सदा मुक्त एव सः। " (गीता:५:२८)- ' जो महानुभाव (अपने मन और इन्द्रियों को वश में रख कर) सर्वदा इच्छा, भय और क्रोधशून्य होकर रहते हैं, वे तो मुक्त ही हो चुके हैं।' क्रोध कितनी खराब चीज है उसे ' बाल्मीकि -रामायण ' में एक कहानी के माध्यम वर्णन किया गया है। जो इस प्रकार है :-राज्यसभा में एक कुत्ता श्री रामचंद्र के सामने उपस्थित होकर, धर्म के सम्बन्ध में बहुत सुन्दर व्याख्यान देने के बाद, न्याय पाने की गुहार करते हुए आरोप मढ़ता है कि - उनके राज्य में एक ब्रह्मण ने उसे बिना कोई अपराध के, उसे लाठी से मारा है। रामचंद्र ब्रह्मण को बुलवा भेजते हैं। ब्राह्मण कहते हैं, भिक्षा न मिलने के कारण भूख से व्याकुल होकर, अतृप्त कामना वश विवेक खो बैठा और क्रोध से भर कर रास्ते के किनारे बैठे इस कुत्ते को अकारण ही एक लाठी जमा दिया। क्रोध कैसा होता है , इसके बारे में समझाते हुए रामचंद्र कहते हैं :- 

क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्र मुखो रिपुः । 
क्रोधो ह्योसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति ॥ 
 (उत्तरकाण्डः २/२१)
 - ' देखो, क्रोध जीव का प्राणहारी शत्रु है। यह वैसा शत्रू है, जो ऊपर से तो मित्र भाव दिखाता है किन्तु परोक्ष रूप में शत्रुता हि निभाता है। क्रोध सूतिक्ष्ण तलवार जैसा है जो मनुष्य के समस्त सद्-गुणों को नष्ट कर देता है। ' अब उस ब्राह्मण को क्या दण्ड मिलना चाहिए ? इस विषय में कई सुझाव और तर्क सुनने के बाद, रामचन्द्रजी की अनुमति से कुत्ता ब्राह्मण के लिए दण्ड सुनाते हुए विधान करता है - इनको कालंजर-पर्वत पर निर्मित मठ का ' महन्त ' बना दिया जाय ! सभा पार्षदगण इस अनोखे दण्ड-विधान को सुन कर आर्श्चय-चकित हो गए ! यह कैसा सा दण्ड है ? तब श्री राम ने कुत्ते को अपनी बात को समझा कर बताने का आदेश दिया। तब वह कुत्ता रहस्य पर से पर्दा हटाते हुए कहता है, पूर्व जन्म में वह स्वयं हि उस मठ का महन्त था। और उसमें अक्रोध आदि अनेक सद्-गुणों के रहने पर भी महन्त-गिरी के अंहकार से भरा रहता था, जिसके फलस्वरूप उसको ऐसी अधोगति प्राप्त हुई है। और जब ऐसा क्रोधी ब्राह्मण वहाँ का महन्त हो कर रहेगा तो इतना क्रोध करेगा कि उसके आगे-पीछे के सप्त सप्त , अर्थात चतुर्दश कुल पतित हो जायेंगे।
हमलोग अपराधी के ऊपर क्रुद्ध होते हैं और उसे किसी न किसी प्रकार से दण्ड अवश्य देना चाहते हैं। किन्तु यह ' क्रोध ' स्वयं कितना बड़ा अपराधी है, उपरोक्त कथा से यह बात बिल्कुल स्पष्ट है ! माघ कवि ने कहा है-
  “क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणाम” – मनुष्य का प्रथम शत्रु क्रोध है.
अतः सबसे पहले हमें अपने इस महाशत्रु ' क्रोध ' पर हि क्रुद्ध होना चाहिए और इसको दण्ड देना चाहिए। इसीलिए कहा गया है :-
“अपकारिणि चेत कोपः कोपे कोपः कथं न ते” (पाराशर संहिता) -

 हमारा अपकार करनेवाले पर क्रोध उत्पन्न होता है फिर हमारा अपकार करने वाले इस क्रोध पर क्रोध क्यों नहीं आता?"- 'अर्थात अपराधि के ऊपर तुम अगर क्रुद्ध हुए बिना रह नहीं सकते, तो इस 'क्रोध' के ऊपर हि क्रोध क्यों नहीं करते ?' क्रोध जैसे महाशत्रू के लिए सबसे उपयुक्त दण्ड होगा- ' मृत्यु-दण्ड ' ! क्रोध को बिल्कुल विनष्ट करदेने की आवश्यकता है, क्योंकि यह हमारा साधारण शत्रू नहीं महाशत्रू है।
किन्तु क्रोध का विनाश कैसे हो सकता है ? क्योंकि यह तो मन की एक ऐसी वृत्ति है, जो मन की किसी इच्छा को पूर्ण करने में बाधा पैदा करने से, उस बाधक कारण से द्वेष करने लगती है। अब यदि मन में क्रोध के प्रति ही विद्वेष का भाव लाना हो, तो समस्त क्रोध वृत्तियों को समेट कर क्रोध के ऊपर ही प्रयोग करना होगा। वैसा करने में समर्थ होने पर जिस प्रकार भगवान शिव की क्रोधाग्नि से मदन ( काम) ही भ्ष्मीभूत हो गया था, उसी प्रकार हमलोगों का क्रोध भी विनष्ट हो जाएगा। आग्नेयास्त्र जिस प्रकार लक्षित वस्तु का विध्वंश करके स्वयं भी ध्वंश हो जाती है, उसी प्रकार हमलोगों की क्रोधाग्नि भी क्रोध को ध्वंश कर देने के बाद स्वयं भी सदा के लिए बुझ जायेगी।
चरित्र के समस्त गुणों को अर्जित करने का जो उपाय है, उसी उपाय से क्रोध को भी निष्क्रिय किया जा सकता है। इस उपाय का कठिन भाग केवल इसके लिए संकल्प और मनोबल को अटूट रखना है। यदि संकल्प पर दृढ़ रहते हुए पूरे मनोबल के साथ अभ्यास किया जाय तो धीरे धीरे क्रोध का वेग कम होने लगेगा और, एक समय पर पुरी तरह से वश में आ जाएगा। सर्वदा सतर्क रहकर देखना होगा कि यह महाशत्रू मन के भीतर प्रविष्ट होने का पथ न पा सके। हल्का सा क्रोध भी अगर उठने लगे, तो तुरन्त विवेक-विचार करना होगा- यह कौन आ रहा है ? यदि दिख जाय कि यह तो क्रोध है, तब उसी क्षण साक्षी बन कर देखना होगा- किस वस्तु को पाने कि आशा कर रहा था, ऐसी कौन सी इच्छा है, जो पूर्ण नहीं हुई ? जिसके चलते क्रोध उत्पन्न होना चाहता है? तत्काल लाभ-हानि का हिसाब वहीं फेंक कर, क्रोध कि दृष्टि को 'क्रोध' पर ही डाल देना होगा। चरित्रगठन के दृढ़ संकल्प व्यक्ति कि दृष्टि जैसे ही इस महाशत्रू के ऊपर पड़ेगी, वह भागने का रास्ता ढूँढ़ने लगेगा। स्वामी विवेकानंद के बन्दरों के झुंड की तरफ मुड़ कर खड़े होने के फलस्वरूप उनके भागने की घटना का स्मरण किया जा सकता है। यदि हम भी तुरन्त पलट कर खड़े न हुए तो क्रोध भी बन्दरों जैसा नाखून से हमारा सर्वांग क्षत-विक्षत का डालेगा। बार-बार इसी प्रकार करते रहने से क्रोध फ़िर आसानी से हमारे मन में प्रविष्ट होने की चेष्टा नहीं करेगा। किसी भी कारण से क्रोध उठने के साथ-साथ इस प्रकार उसको भष्म करने की चेष्टा में थोडी भी देर न हो तो हम अवश्य इस महाशत्रू को जीत लेंगे।
बंगला भाषा की लोकोक्ति है- ' साधुर राग (क्रोध) जलेर दाग '। इसका अर्थ क्या हुआ ? इसका अर्थ समझने के लिए क्रोध और मनुष्य के बीच के अन्तर को ठीक से समझ लेना होगा। अन्तर यही है कि, विवेक शक्ति मनुष्य में होती है, क्रोध के पास विवेक- विचार करने कि शक्ति नहीं होती। जिसके परिणाम स्वरूप क्रोध को यदि मन में एक बार फुंफकार मारने का मौका मिलगया, तो वह डसेगा जरुर। अर्थात वह मनुष्य को अपने वश में अवश्य कर लेगा। इसी लिए उसको मन में घूंस कर फुंफकार मारने का मौका देना ही नहीं है। जबकि मनुष्य आवश्यकता पड़ने पर क्रोध के ऊपर फुंफकार जरुर मार सकता है, किन्तु विवेक-विचार जाग्रत रखने से कभी डसेगा नहीं। अर्थात क्रोधान्ध हो कर कभी अनर्थ नहीं कर बैठेगा। एक मात्र सत् (साधू) व्यक्ति ही ऐसा करने में समर्थ हैं। उनका क्रोध एक बार फुफकार मारते ही शान्त हो जाता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी अंगुली से जल कि सतह पर लकीर डाले तो वह अगले ही क्षण मिट जाती है। इसी लिए कहा जाता है कि, ' सत् (साधू-स्वभाव ) व्यक्ति का क्रोध जल पर खिंची हुई लकीर है।' और - ' असत् (दुश्चरित्र ) व्यक्ति का क्रोध पत्थर पर खिंची लकीर है।'

१२." विद्वेष नहीं "

साम्प्रदायिकता मनुष्य समाज के लिए बहुत प्राचीन व्याधि है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर धार्मिक साम्प्रदायों के बीच चलने वाले युद्धों में जितना मानव-रक्त बहाया गया है, सम्भवतः उतना रक्त-पात अन्य किसी कारण से नहीं हुआ है। इसके लिए प्रमाण-स्वरूप और अधिक उदाहरण न देकर, केवल मध्ययुग में इसाई और इस्लाम धर्मों के अनुयायिओं के बीच धर्मयुद्ध (क्रूसेड) के नाम पर जोरजुलूम के अधिकार के लिए, जो दीर्घकालव्यापी रक्तपात चलता रहा था, उसका स्मरण कर लेना ही पर्याप्त है। पृथ्वी पर ऐसा राष्ट्र या धार्मिक सम्प्रदाय ढूंढ़ पाना दुर्लभ है जो साम्प्रदायिकता के कलंक से कलंकित न हुआ हो। किन्तु केवल स्वामी विवेकानंद ही शिकागो धर्म महासभा के स्वागतभाषण पर दिए अपने उत्तर में यह कह पाने में समर्थ थे कि, " मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सर्वधर्म-स्वीकृति, दोनों कि ही शिक्षा दी है। हमलोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। " (वि० सा० ख० १: ३ )
जब समस्त धर्मों का लक्ष्य एक ही है, तब यह बात समझ पाना सचमुच बहुत कठिन है कि, क्यों कोई एक धर्म दूसरे के मूल्य पर अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता है ? थोड़ा नजर उठा कर देखने से ही यह पता चल जाता है कि, जिस प्रकार धर्म के क्षेत्र में यह बात सत्य है, भाषा, राजनीती आदि क्षेत्रों में भी यही सब घटित होता है। वस्तुतः पहले तो साम्प्रदायिकता का केवल एक ही चेहरा दिखाई पड़ता था- धार्मिक। किन्तु अभी उसके कई रूप दीखते हैं, भाषागत, स्वर्ण-अस्वर्ण जातिगत, राजनीतीक तथा अन्य कई प्रकार के रूपों में दिखाई देती है। इन समस्त प्रकार की साम्प्रदायिकता के मूल में एक ही कारण है- वह है संकीर्णता ! जिस समय हमलोगों की विवेक- विचार शक्ति अन्धविश्वास से ढँक जाती है, जब हमारी शुद्धबुद्धि के ऊपर हिंसात्मक मनोवृत्ति हावी होने लगती है, उसी समय किसी न किसी प्रकार की साम्प्रदायिक अशान्ति का घना कोहरा भी छाने लगता है। साम्प्रदायिक अशान्ति का कारण यदि किसी एक क्षेत्र में धार्मिक विश्वास के प्रति कट्टरता है, तो दूसरे क्षेत्र में राजनैतिक मतान्धता भी हो सकती है।
स्वामी विवेकानन्द का जीवन और उपदेश इसी संकीर्णता और मतान्धता के अन्धकार में, आशा की किरण बन कर हमारे पथ को आलोकित कर रहा है। जिन्होंने ब्रह्म से लेकर कीट परमाणु, सर्वभूतों में उसी 'एक' का अस्तित्व देखा हो उनके लिए, संकीर्णता का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वामीजी ने अन्य धर्म या मतवादों के प्रति केवल सहिष्णु रहने का उपदेश ही नहीं दिया था, सभी के प्रति श्रद्धावान होकर सबों के आन्तरिक सत्य को ग्रहण करने का उपदेश दिया था। जब सारे पथ एक ही लक्ष्य की दिशा में जाते हैं, तब पारस्परिक सहयोगिता का भाव रखते हुए उस साधारण लक्ष्य की दिशा में क्यों नहीं अग्रसर हुआ जाए ? एक दूसरे की निन्दा करने या विरोधिता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
आजके राष्ट्रीय जीवन में, असहिष्णुता और मतान्ध्ताजात ह्निसक मनोवृत्ति का जो उन्माद चारोओर दिख रहा है, उससे मुक्त होकर पृथ्वी को यदि शान्ति के निवासभूमि में परिणत करना चाहते हों, तब दूसरों के मतवादों के प्रति सहिष्णु और श्रद्धाशील बनने के आदर्श का जो उपदेश स्वामीजी ने हमलोगों को सुनाया है, भारत के उसी चिरन्तन आदर्श को न केवल ग्रहण करना होगा, बल्कि उसे कार्य रूप में परिणत करना होगा। हमलोगों के पथ भिन्न भिन्न हैं, तो- रहें न ! हम सभी लोग यदि- ' जीव रूपी शिव ' की सेवा में अपने जीवन को न्योछावर कर दें, तब विरोधिता का प्रश्न ही नहीं रह जाएगा।
भागवत में भगवान कपिल ने कहा है : 
अहं सर्वेषु भुतेषु भुतात्मावस्थितः सदा ।
तमवज्ञाय मा मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम ॥२१॥
यो मं सर्वेषु सन्तमात्मानमीश्वरम ।
हित्वार्चां भजते मौढ्याद्भसमन्येव जुहोति सः ॥२२॥
 

" मैं सभी प्राणियों में विद्यमान हूँ, सबों का आत्मा एवं ईश्वर हूँ। जो व्यक्ति मूढ़तावश सर्वभूतों में विद्यमान मेरे स्वरूप की उपेक्षा कर, केवल मूर्ति में ही मेरी पूजा करता है, उसकी पूजा मानो भष्म में आहूति डालने जैसी है। " आगे कहते हैं,
द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः ।
भुतेषुः बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति ॥२३॥
 

- अर्थात जो दूसरों के शरीर में मुझसे द्वेष करता है एवं अभिमानी है, वह भेद-दर्शी है और सभी के साथ वैरता करता है, इसीलिए वह स्वयं भी कभी शान्ति से नहीं रह पाता। आज से लगभग १०० वर्ष से भी पहले शिकागो धर्म महासभा के अन्तिम भाषण में, स्वामीजी ने इसी भागवत वाणी को प्रतिध्वनित करते हुए कहा था - " शीघ्र ही, सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा रहेगा _ ' सहायता करो, लड़ो मत।' ' पर भाव ग्रहण, न कि पर-भाव- विनाश '; 'समन्वय और शान्ति ' न कि विद्वेष और कलह ! ( वि० सा० ख० १ : २७)
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