🔱🕊 🏹 🙋*परिशिष्ट -2 *
[(आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2]
*सुरेन्द्र के मकान पर श्रीरामकृष्ण*
(१)
राम, मनोमोहन, त्रैलोक्य तथा महेन्द्र गोस्वामी आदि के साथ
आज श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ सुरेन्द्र के घर पधारे हैं । १८८१ ई., आषाढ़ महीना है । सन्ध्या होनेवाली है । श्रीरामकृष्ण ने इसके कुछ देर पहले श्री मनोमोहन के मकान पर थोड़ी देर विश्राम किया था ।
[One day during the rainy season of 1881 Sri Ramakrishna and a number of devotees visited Surendra's house. It was about dusk.
আজ শ্রীরামকৃষ্ণ ভক্তসঙ্গে সুরেন্দ্রের বাড়িতে আসিয়াছেন। ১৮৮১ খ্রীষ্টাব্দ, আষাঢ় মাসের একদিন। সন্ধ্যা হয় হয়। শ্রীরামকৃষ্ণ কিয়ৎক্ষণ পূর্বে বৈকালে শ্রীযুক্ত মনোমোহনের বাড়িতে একটু বিশ্রাম করিয়াছিলেন।
सुरेन्द्र के दूसरे मँजले के बैठकघर में अनेक भक्तगण बैठे हुए हैं । महेन्द्र गोस्वामी, भोलानाथ पाल आदि पड़ोसी भक्तगण उपस्थित हैं । श्री केशव सेन आनेवाले थे, परन्तु आ न सके । ब्राह्मसमाज के श्री त्रैलोक्य सान्याल तथा अन्य कुछ ब्राह्म भक्त आये हैं ।
The Master entered the drawing-room on the second floor, where several of Surendra's neighbours had already, gathered. Keshab had also been invited but could not come. Trailokya and a few Brahmo devotees were present.
সুরেন্দ্রের দ্বিতলের বৈঠকখানার ঘরে ভক্তেরা আসিয়াছেন। মহেন্দ্র গোস্বামী, ভোলানাথ পাল ইত্যাদি প্রতিবেশীগণ উপস্থিত আছেন। শ্রীযুক্ত কেশব সেনের আসিবার কথা ছিল কিন্তু আসিতে পারেন নাই। ব্রাহ্মসমাজের শ্রীযুক্ত ত্রৈলোক্য সান্যাল ও আরও কতকগুলি ব্রাহ্মভক্ত আসিয়াছেন।
बैठकघर में दरी और चद्दर बिछायी गयी है - उस पर एक सुन्दर गलीचा तथा तकिया भी है । श्रीरामकृष्ण को ले जाकर सुरेन्द्र ने उसी गलीचे पर बैठने के लिए अनुरोध किया । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “यह तुम्हारी कैसी बात है ?" ऐसा कहकर महेन्द्र गोस्वामी के पास बैठ गये ।
A mat covered with a white sheet was spread on the floor, and on it had been placed a beautiful carpet with a cushion. Surendra requested the Master to sit on the carpet; but Sri Ramakrishna would not listen to him and sat on the mat next to Mahendra Goswami, one of Surendra's neighbours.
বৈঠকখানা ঘরে সতরঞ্চি ও চাদর পাতা হইয়াছে — তার উপর একখানি সুন্দর গালিচা ও তাকিয়া। ঠাকুরকে লইয়া সুরেন্দ্র ওই গালিচার উপর বসিতে অনুরোধ করিলেন।শ্রীরামকৃষ্ণ বলিতেছেন, একি তোমার কথা! এই বলিয়া মহেন্দ্র গোস্বামীর পার্শ্বে বসিলেন।
महेन्द्र गोस्वामी - (भक्तों के प्रति ) - मैं इनके (श्रीरामकृष्ण के) पास कई महीनों तक प्रायः सदा ही रहता था । ऐसा महान् व्यक्ति मैंने कभी नहीं देखा । इनके भाव साधारण नहीं हैं ।
MAHENDRA (to the devotees): "For several months I spent most of my time with him [meaning Sri Ramakrishna]. I have never before seen such a great man. His spiritual moods are not of the ordinary kind."
যদু মল্লিকের বাগানে যখন পারায়ণ হয় শ্রীরামকৃষ্ণ সর্বদা যাইতেন। কয়মাস ধরিয়া পারায়ণ হইয়াছিল। মহেন্দ্র গোস্বামী (ভক্তদের প্রতি) — আমি এঁর নিকট কয়েক মাস প্রায় সর্বদা থাকতাম। এমন মহৎ লোক আমি কখনও দেখি নাই। এঁর ভাব সকল সাধারণ ভাব নয়।
श्रीरामकृष्ण - (गोस्वामी के प्रति) - यह सब तुम्हारी कैसी बात है ? मैं छोटे से छोटा, दीन से भी दीन हूँ । मैं प्रभु के दासों का दास हूँ । कृष्ण ही महान् हैं ।
MASTER (to Mahendra): "How dare you say that? I am the most insignificant of the insignificant, the lowliest of the lowly. I am the servant of the servants of God. Krishna alone is great.
শ্রীরামকৃষ্ণ (গোস্বামীর প্রতি) — ও-সব তোমার কি কথা! আমি হীনের হীন, দীনের দীন; আমি তাঁর দাসানুদাস; কৃষ্ণই মহান।
[(आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2]
🏹 परम् सत्य (नित्य=ब्रह्म) और सापेक्षिक सत्य (लीला=जीव)
एक ही सिक्के के दो पहलू (aspect) हैं ! 🏹
(जीवो ब्रह्मैव नापरः !)
"जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं । दूर से देखने पर समुद्र नीला दिखता है, पर पास जाओ तो कोई रंग नहीं । जो सगुण हैं, वे ही निर्गुण हैं । जिनका नित्य है, उन्हीं की लीला है ।
"Krishna is none other than Satchidananda, the Indivisible Brahman. The water of the ocean looks blue from a distance. Go near it and you will find it colourless. He who is endowed with attributes is also without attributes. The Absolute and the Relative belong to the same Reality.
[निर्गुण निराकार सच्चिदानन्द , परम् सत्य या अचल इन्द्रियातीत सत्य या 'ब्रह्म' - तथा सापेक्षिक सत्य या नाम-रूप सहित परिवर्तनशील इन्द्रियगोचर जगत ('शक्ति') दोनों एक ही सत्यता (Reality-काली?? सिक्का) के दो पहलू हैं!]
"श्रीकृष्ण त्रिभंग क्यों हैं ? - राधा के प्रेम से ।
"Why is Krishna tribhanga, bent in three places? Because of His love for Radha.
[ब्रह्म सगुण ईश्वर अवतार वरिष्ठ ठाकुर क्यों बने ? - राधा के (जीव के या मेरे ?) प्रेम से।]
“শ্রীকৃষ্ণ ত্রিভঙ্গ কেন? রাধার প্রেমে।
"जो ब्रह्म हैं, वे ही काली, आद्याशक्ति हैं, सृष्टि-स्थिति-प्रलय कर रहे हैं । जो कृष्ण हैं, वे ही काली हैं । " मूल एक है - यह सब उन्हीं का खेल है, उन्हीं की लीला है ।
"That which is Brahman is also Kali, the Adyasakti, who creates, preserves, and destroys the universe. He who is Krishna is the same as Kali. The root is one — all these are His sport and play.
“যিনিই ব্রহ্ম তিনিই কালী, আদ্যাশক্তি সৃষ্টি-স্থিতি-প্রলয় করছেন। যিনি কৃষ্ণ তিনিই কালী।“মূল এক — তাঁর সমস্ত, লীলা।”
[(आषाढ़ महीना, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत- परिच्छेद- 2]
🏹 भगवान के दर्शन करने का उपाय 🏹
"उनका दर्शन किया जा सकता है । शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि से उनका दर्शन किया जा सकता है । कामिनी-कांचन में आसक्ति रहने से मन मैला हो जाता है ।
"God can be seen. He can be seen through the pure mind and the pure intelligence. Through attachment to 'woman and gold' the mind becomes impure.
তাঁকে দর্শন করা যায়। শুদ্ধ মন, শুদ্ধ বুদ্ধিতে দর্শন করা যায়। কামিনী-কাঞ্চনে আসক্তি থাকলে মন মলিন হয়।
"मन पर ही सब कुछ निर्भर है । मन धोबी के यहाँ का धुला हुआ कपड़ा जैसा है; जिस रंग में रँगवाओगे उसी रंग की हो जायगा । मन से ही ज्ञानी, और मन से ही अज्ञानी है । जब तुम कहते हो कि अमुक आदमी खराब हो गया है, तो अर्थ यही है कि उस आदमी के मन में खराब रंग आ गया है ।"
"The mind is everything. It is like a white cloth just returned from the laundry. It will take any colour you dye it with. Knowledge is of the mind, and ignorance is also of the mind. When you say that a certain person has become impure, you mean that impurity has coloured his mind."
“মন নিয়ে কথা। মন ধোপা ঘরের কাপড়; যে রঙে ছোপাবে, সেই রঙ হবে! মনেতেই জ্ঞানী, মনেতেই অজ্ঞান। অমুক লোক খারাপ হয়ে গেছে অর্থাৎ অমুক লোকের মনে খারাপ রঙ ধরেছে।”
শ্রীযুক্ত ত্রৈলোক্য সান্যাল ও অন্যান্য ব্রাহ্মভক্ত এইবার আসিয়া আসন গ্রহণ করিলেন।
सुरेन्द्र माला लेकर श्रीरामकृष्ण को पहनाने आये । पर उन्होंने माला हाथ में ले ली, और फेंककर एक ओर रख दी । इससे सुरेन्द्र के अभिमान में धक्का लगा और उनकी आँखें डबडबा गयीं । सुरेन्द्र पश्चिम के बरामदे में जाकर बैठे - साथ राम तथा मनोमोहन आदि हैं ।
सुरेन्द्र प्रेमकोप करके कह रहे हैं, “मुझे क्रोध हुआ है; राढ़ देश # का ब्राह्मण है, इन चीजों की कद्र क्या जाने ? कई रुपये खर्च करके यह माला लायी । मैं गुस्से में आकर कह बैठा ‘और सब मालाएँ दूसरों के गले में डाल दो ।’
[#लाल मिट्टी का देश]
"अब समझ रहा हूँ मेरा अपराध, भगवान पैसे से खरीदे नहीं जा सकते । वे अहंकारी के नहीं हैं । मैं अहंकारी हूँ, मेरी पूजा क्यों लेने लगे ? मेरी अब जीने की इच्छा नहीं है ।" कहते कहते आँसू की धाराएँ उनके गालों और छाती पर से बहती हुई नीचे गिरने लगीं ।
Surendra approached the Master with a garland and wanted to put it around his neck. But the Master took it in his hand and threw it aside. Surendra's pride was wounded and his eyes filled with tears. He went to the west porch and sat with Ram, Manomohan, and the others.
In a voice choked with sadness he said: "I am really angry. How can a poor brahmin know the value of a thing like that? I spent a lot of money for that garland, and he refused to accept it. I was unable to control my anger and said that the other garlands were to be given away to the devotees. Now I realize it was all my fault. God cannot be bought with money; He cannot be possessed by a vain person. I have really been vain. Why should he accept my worship? I don't feel like living any more." Tears streamed down his cheeks and over his chest.
সুরেন্দ্র অশ্রুপূর্ণ লোচনে পশ্চিমের বারান্দায় গিয়া বসিলেন; সঙ্গে রাম ও মনোমোহন প্রভৃতি। সুরেন্দ্র অভিমানে বলিতেছেন; — আমার রাগ হয়েছে; রাঢ় দেশের বামুন এ-সব জিনিসের মর্যাদা কি জানে! অনেক টাকা খরচ করে এই মালা; ক্রোধে বললাম সব মালা আর সকলের গলায় দাও। এখন বুঝতে পারছি আমার অপরাধ; ভগবান পয়সার কেউ নয়; অহংকারেরও কেউ নয়! আমি অহংকারী, আমার পূজা কেন লবেন। আমার বাঁচতে ইচ্ছা নাই। বলিতে বলিতে অশ্রুধারা গণ্ড বহিয়া পড়িতে লাগিল ও বুক ভাসিয়া যাইতে লাগিল।
इधर कमरे के अन्दर त्रैलोक्य गाना गा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण मतवाले होकर नृत्य कर रहे हैं । जिस माला को उन्होंने फेंक दिया था, उसी को उठाकर गले में पहन लिया । वे एक हाथ से माला पकड़कर तथा दूसरे हाथ से उसे हिलाते हुए गाना गा रहे हैं और नृत्य कर रहे हैं ।
सुरेन्द्र यह देखकर कि श्रीरामकृष्ण गले में उसी माला को पहनकर नाच रहे हैं, आनन्द में विभोर हो गये । मन ही मन कह रहे हैं, 'भगवान गर्व का हरण करनेवाले हैं । जरूर, परन्तु (दीनों के, निर्धनों के धन भी हैं) !"
In the mean time Trailokya was singing inside the room. The Master began to dance in an ecstasy of joy. He put around his neck the garland that he had thrown aside; holding it with one hand, he swung it with the other as he danced and sang. Now Surendra's joy was unbounded. The Master had accepted his offering. Surendra said to himself, "God crushes one's pride, no doubt, but He is also the cherished treasure of the humble and lowly."
এদিকে ঘরের মধ্যে ত্রৈলোক্য গান গাহিতেছেন। শ্রীরামকৃষ্ণ মাতোয়ারা হইয়া নৃত্য করিতেছেন। যে মালা ফেলিয়া দিয়াছিলেন, সেই মালা তুলিয়া গলায় পড়িলেন। এক হাতে মালা ধরিয়া, অপর হাতে দোলাতে দোলাতে গান ও নৃত্য করিতেছেন। —(জগৎ-চন্দ্র-হার পরেছি!)সুরেন্দ্র আনন্দে বিভোহৃদয় পরশমনী আমার —আখর দিতেছেন —(ভূষণ বাকি কি আছে রে!)র — ঠাকুর গলায় সেই মালা পরিয়া নাচিতেছেন! মনে মনে বলিতেছেন, ভগবান দর্পহারী। কিন্তু কাঙালের অকিঞ্চনের ধন!
শ্রীরামকৃষ্ণ নিজে গান ধরিলেন:
যাদের হরি বলতে নয়ন ঝুরে
তারা তারা দুভাই এসেছে রে।
(যারা মার খেয়ে প্রেম যাচে)
(যারা আপনি মেতে জগৎ মাতায়)
(যারা আচণ্ডালে কোল দেয়)
(যারা ব্রজের কানাই বলাই)
श्रीरामकृष्ण अब स्वयं गाने लगे, -
जादेर हरि बोलते नयन झरे,
तारा तारा दूभाई ऐसेछे रे।
(जारा मार खेये प्रेम याचे)
(जारा आपनि मेते जगत माताय)
(जारा आचाण्डाले कोल देय)
[जारा व्रजेर कानाई (कन्हैया) बलाई (बलराम)]
गाना - (भावार्थ) –
"हरिनाम लेते हुए जिनकी आँखों से आँसू बहते हैं, वे दोनो भाई आये हैं ! - वे, जो मार खाकर प्रेम देते हैं, जो स्वयं मतवाले बनकर जगत् को मतवाला बनाते हैं, जो चाण्डाल तक को गोद में ले लेते हैं, जो दोनों ब्रज के कन्हैया-बलराम थे ।"
The Master now sang:Behold, the two brothers have come, who weep while chanting Hari's name, The brothers who, in return for blows, offer to sinners Hari's love !Behold them, drunk with Hari's love, who make the world drunk as well, Embracing everyone as brother, even the outcaste shunned by men. Behold, the two brothers have come, who once were Kanai and Balai of Braja. . . .
अनेक भक्त श्रीरामकृष्ण के साथ-साथ नृत्य कर रहे हैं ।कीर्तन समाप्त होने पर सभी बैठ गये और ईश्वर की बातें करने लगे । श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र से कह रहे हैं, "मुझे कुछ खिलाओगे नहीं ?" यह कहकर वे उठकर घर के भीतर चले गये । स्त्रियों ने आकर भूमिष्ठ हो भक्तिभाव से उन्हें प्रणाम किया । भोजन करने के बाद थोड़ी देर विश्राम करके वे दक्षिणेश्वर लौट आये ।
Many of the devotees danced while Sri Ramakrishna sang this song. When the kirtan was over, everyone sat around the Master and became engaged in pleasant conversation. Sri Ramakrishna said to Surendra, "Won't you give me something to eat?" Then he went into the inner apartments, where the ladies saluted him. After the meal Sri Ramakrishna left for Dakshineswar.
অনেকগুলি ভক্ত ঠাকুরের সঙ্গে নৃত্য করিতেছেন।সকলে উপবিষ্ট হইলেন ও সদালাপ করিতেছেন।শ্রীরামকৃষ্ণ সুরেন্দ্রকে বলিতেছেন, “আমায় কিছু খাওয়াবে না?”এই বলিয়া গাত্রোত্থান করিয়া অন্তঃপুরে গমন করিলেন। মেয়েরা আসিয়া সকলে ভূমিষ্ঠ হইয়া অতি ভক্তভরে প্রণাম করিলেন।আহারান্তে একটু বিশ্রাম করিয়া দক্ষিণেশ্বরে যাত্রা করিলেন।
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[ राढ़ देश # ‘राढ़’ शब्द को लेकर सामान्य जनमानस में कई तरह की भ्रांतियां हैं। जबकि, इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है। प्राचीन आष्ट्रिक भाषा में ‘राढ़’ या ‘राढ़ी’ शब्द का अर्थ है- रक्त मृत्तिका का देश, रांगामाटी या लाल मिट्टी का देश।
बताया गया है कि ‘राढ़’ अथवा ‘राढ़ी’ प्राचीन और मध्य काल में (विशेषकर सेनवंशीय नरेशों के शासन काल में) बंगाल के चार प्रांतों में से एक था. ये प्रांत थे- ‘वरेंद्र’, ‘बागरा’, ‘बंग’ और ‘राढ़’. वरेंद्र उत्तर बंगाल का प्राचीन व मध्य युगीन नाम था. वंग या ‘बंग’ बंगाल का प्राचीन नाम है। राढ़ क्षेत्र को दो भागों में बांटा गया- पूर्वी राढ़ और पश्चिमी राढ़।
1856 में जब सौंताल परगना जनपद बना, तब वीरभूम से पाकुड़ और राजमहल महकमा को काट कर सौंताल परगना तथा कांदी महकमा को मुर्शिदाबाद को दे दिया गया। पंचकोट या पांचेट या मानभूम में वर्त्तमान पुरुलिया जनपद, दामोदर का दक्षिणांश (चास, चंदनकियारी, बोकारो), पूर्व हजारीबाग जनपद (वर्त्तमान बोकारो जनपद) का जरीडीह, पेटरवार, कसमार तथा रांची का रामगढ़ अंचल शामिल था.
राढ़ क्षेत्र विश्व के अति प्राचीनतम क्षेत्रों में एक है। पश्चिमी राढ़ क्षेत्र में बहने वाली राढ़ नदी भी राढ़ शब्द के औचित्य को दर्शाती है।
पूर्वी राढ़ के अंतर्गत पश्चिमी मुर्शिदाबाद, बीरभूम जिले का उत्तरी भाग, पूर्वी बर्धमान, हुगली, हावड़ा क्षेत्र, पूर्वी मेदिनीपुर तथा बांकुड़ा जनपद का इंदास थाना क्षेत्र आते हैं। पश्चिमी राढ़ में संथाल परगना, बीरभूम के अन्य क्षेत्र, बर्धमान का पश्चिमी भाग, बांकुड़ा (इंदास थाना क्षेत्र को छोड़कर), पुरुलिया, धनबाद, बोकारो व हजारीबाग के कुछ इलाके, रांची के कुछ इलाके, सिंहभूम तथा मेदिनीपुर के कुछ क्षेत्र सम्मिलित हैं। मोटे तौर पर कहें तो झूमर और भगता (चड़क, गाजान) परब जहां तक मूल रूप से प्रचलित है, वह राढ़ क्षेत्र है। विश्व का सबसे प्राचीनतम क्षेत्र है ‘राढ़’ यानी अबुआ झारखंड। इस सभ्यता सिद्धांत का प्रतिपादन वर्ष 1981 में हुआ है। महान दार्शनिक व मैक्रो हिस्टोरियन प्रभात रंजन सरकार इसके प्रतिपादक हैं. यह मानव सभ्यता के विकास से संबंधित नवीनतम सिद्धांत है। झारखंड का एक बड़ा भूभाग राढ़ भूमि का एक हिस्सा है और यहां के मूल में भी राढ़ी सभ्यता-संस्कृति का इतिहास रहा है।
मुगलों के जमाने में समग्र राढ़ कई स्वशासित जनपदों में विभक्त हो गया. उनमें वीरभूम, गोपभूम, सामंतभूम, शेखरभूम, मल्लभूम, सोनभूम, सिंहभूम, धवलभूम, भज्जभूम, सप्तमी परगना, भूरिश्रेष्ठ या भूरशूट परगना, बराहभूम तथा पंचकोट या पांचेट या मानभूम का नाम शामिल है। वीरभूम राज्य पूर्व में सौंताल परगना जनपद के पाकुड़ और राजमहल महकमा, वर्तमान वीरभूम जनपद के रामपुर हाट महकमा, मुर्शिदाबाद जनपद के कांदी महकमा और भागीरथी नदी के पश्चिमवर्ती अंश को लेकर बना था।
ऐसी मान्यता है कि राजा मानसिंह देव के नाम पर इस राज्य का नामकरण मानभूम हुआ था. इसकी राजधानी मानबाजार थी. इस राज्य के उत्तर में दामोदर, दक्षिण में बराहभूम, पूरब में शुशुनिया पहाड़ तथा पश्चिम में चुटिया-नागपुर था. अंगार के समीप जहां पर पहाड़ शेष होकर रांची का समतल प्रारंभ होता है, वही मानभूम की पश्चिम दिशा थी।
सिंहभूम का मतलब सिर्फ झारखंड का सिंहभूम न होकर एक विस्तृत इलाका है। इसमें ओडिशा के धालजोरी, क्योंझर, महागिरि और सिमलीपाल जैसी जगहें भी शामिल हैं। ’ उन्होंने यह भी कहा है कि ‘यहां मिले खास तरह के अवसादी चट्टानों से उनकी उम्र का पता लगाकर यह जाना जा सका है कि ये 310 से 320 करोड़ साल पुराने हैं। यहां मिले बलुआ पत्थर से शोध में मदद मिली। ]