*परिच्छेद- ४*
*राजेन्द्र (राम और मनोमोहन के मौसा) के घर पर श्रीरामकृष्ण*
(१)
राम, मनोमोहन आदि के संग में*
राजेन्द्र मित्र का घर ठनठनिया में बेचु चटर्जी की गली में है । मनोमोहन के घर पर उत्सव के दिन श्री केशव ने राजेन्द्र बाबू से कहा था, 'आपके घर पर इसी प्रकार एक दिन हो तो अच्छा है ।' राजेन्द्र आनन्दित होकर उसी की तैयारी कर रहे हैं ।
At Keshab's request Rajendra Mitra arranged a religious festival at his home in Calcutta and invited Sri Ramakrishna and the devotees, including the members of the Brahmo Samaj.
রাজেন্দ্র মিত্রের বাটী ঠনঠনে বেচু চাটুজ্যের গলি। মনোমোহনের বাটীতে উৎসবের দিন শ্রীযুক্ত কেশব রাজেন্দ্রবাবুকে বলিয়াছিলেন, আপনার বাড়িতে এইরূপ একদিন উৎসব হয়, বেশ হয়। রাজেন্দ্র আনন্দিত হইয়া তাহার উদ্যোগ করিতেছেন।
आज शनिवार है, 10 दिसम्बर 1881 ई.। आज उत्सव होना निश्चित हुआ है । अनेक भक्त पधारेंगे - केशव आदि ब्राह्म भक्तगण भी आयेंगे । इसी समय उमानाथ ने राजेन्द्र को ब्राह्मभक्त भाई अघोरनाथ की मृत्यु का समाचार सुनाया । अघोरनाथ ने लखनऊ शहर में रात्रि के दो बजे शरीर-त्याग किया है, उसी रात को तार द्वारा यह समाचार आया है । (8 दिसम्बर, 1881 ई.) । उमानाथ दूसरे ही दिन यह समाचार ले आये हैं । केशव आदि ब्राह्मभक्तों ने अशौच ग्रहण किया है। यह सोचकर कि शनिवार को वे कैसे आयेंगे, राजेन्द्र चिन्तित हो रहे हैं ।
Two days before, Aghorenath, a prominent member of the Brahmo Samaj, had suddenly passed away in Lucknow. Keshab and the other Brahmo devotees were in mourning, and Rajendra thought they could not possibly join in the festival at his house. This worried him.
আজ শনিবার, ১০ই ডিসেম্বর, ১৮৮১ খ্রীষ্টাব্দ, ২৬শে অগ্রহায়ণ, ১২৮৮। আজ উৎসব হইবে স্থির হইয়াছে। খুব আনন্দ — অনেক ভক্ত আসিবেন — কেশব প্রভৃতি ব্রাহ্মভক্তগণও আসিবেন। মন সময় ব্রাহ্মভক্ত ভাই অঘোরনাথের মৃত্যুসংবাদ উমানাথ রাজেন্দ্রকে জানাইলে। অঘোরনাথ লক্ষ্ণৌ নগরে রাত দুটার সময় শরীরত্যাগ করিয়াছেন, সেই রাত্রেই তারযোগে এই সংবাদ আসিয়াছে। ৮ই ডিসেম্বর, ২৪শে অগ্রহায়ণ। উমানাথ পর দিনেই ওই সংবাদ লইয়া আসিয়াছেন। কেশবাদি ব্রাহ্মভক্তগণ অশৌচ গ্রহণ করিয়াছেন — শনিবারে তাঁহারা কেমন করিয়া আসিবেন, রাজেন্দ্র চিন্তিত হইলেন।
राम राजेन्द्र से कह रहे हैं, "आप क्यों सोच रहे हैं ? केशव बाबू नहीं आयेंगे तो न आये । श्रीरामकृष्ण तो आयेंगे । आप तो जानते ही है कि वे सदा समाधिमग्न रहा करते हैं । उनकी कृपा से दूसरे को भी ईश्वर का दर्शन हो सकता है । उनकी उपस्थिति से यह उत्सव सफल हो जायगा।"
But Ram, the Master's devotee, said to him: "Why are you so sad? If Keshab can't come, let him stay away. Our Master will be here. He is always in communion with God. He enables one to see God. And his presence will make the festival a success."
রাম রাজেন্দ্রকে বলিতেছেন — আপনি কেন ভাবছেন? কেশববাবু নাই বা এলেন। ঠাকুর আসিতেছেন — আপনি কি জানেন না তিনি সর্বদা সমাধিস্থ, ঈশ্বরকে প্রত্যক্ষ করিতেছেন, — যাঁর আনন্দে জগৎ আনন্দ আস্বাদন করছে।
राम, राजेन्द्र, राजमोहन व मनोमोहन केशव से मिलने गये । केशव ने कहा "कहाँ, मैंने ऐसा तो नहीं कहा कि मै नहीं आऊँगा । श्रीरामकृष्णदेव आयेंगे और मैं न आऊँगा ? - अवश्य आऊँगा; अशौच हुआ है तो अलग स्थान पर बैठकर खा लूँगा ।"
Rajendra, accompanied by Ram and a few others, paid Keshab a visit to express their condolence for the death of Aghorenath. Keshab said to Rajendra: "Why, I haven't said I shall not join in the festival at your house. Sri Ramakrishna will be there; so how can I stay away? I am in mourning, it is true, but I shall come."
রাম, রাজেন্দ্র, রাজমোহন, মনোমোহন কেশবের সঙ্গে দেখা করিলেন। কেশব বলিলেন, “কই, আমি এমন কথা বলি নাই যে আমি যাব না। পরমহংস মহাশয় আসবেন আর আমি যাব না? অবশ্য যাব; অশৌচ হয়েছে, তা আলাদা জায়গায় বসে খাব।”
केशव राजेन्द्र आदि भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । कमरे में श्रीरामकृष्ण का समाधि-चित्र टँगा हुआ है ।
On the wall in Keshab's room hung a picture of Sri Ramakrishna absorbed in samadhi.
কেশব রাজেন্দ্র প্রভৃতি ভক্তদের সহিত কথা কহিতেছেন। ঘরে শ্রীরামকৃষ্ণের সমাধিচিত্র টাঙ্গান ছিল।
राजेन्द्र - (केशव के प्रति) - श्रीरामकृष्णदेव को अनेक लोग चैतन्य का अवतार कहते हैं ।
RAJENDRA (to Keshab): "Many people say that he (pointing to the picture) is an incarnation of Chaitanya."
রাজেন্দ্র (কেশবের প্রতি) — পরমহংস মহাশয়কে অনেকে বলে চৈতন্যের অবতার।
केशव - (समाधि-चित्र को देखकर) - इस प्रकार की समाधि प्रायः नहीं देखी जाती । ईसा मसीह, मुहम्मद, चैतन्य इनको हुआ करती थी ।
KESHAB (looking at the picture): "One doesn't see such samadhi. Only men like Christ, Mohammed, and Chaitanya experienced it."
কেশব (সমাধিচিত্র দেখিয়া) — এরূপ সমাধি দেখা যায় না। যীশুখ্রীষ্ট, মহম্মদ, চৈতন্য এঁদের হত।
दिन के तीन बजे के समय मनोमोहन के घर पर श्रीरामकृष्ण पधारे । वहाँ पर विश्राम करके थोड़ा जलपान किया । फिर सुरेन्द्र उन्हें गाड़ी पर चढ़ाकर 'बेंगाल फोटोग्राफर' के स्टुडिओ में ले गये । फोटोग्राफर ने कैसे फोटो लिया जाता है दिखा दिया । काँच के पीछे सिलवर नाइट्रेट (Silver Nitrate) लगायी जाती है, उस पर फोटो उतरता है - यह सब बतला दिया । श्रीरामकृष्ण का फोटो लिया जा रहा है, उसी समय वे समाधिमग्न हो गये ।
About three o'clock in the afternoon Sri Ramakrishna arrived at Manomohan's house. He rested there awhile and had some refreshments. Surendra took the Master in a carriage to the studio of the Bengal Photographer. The art of photography was explained to him, and he was shown how glass covered with silver nitrate takes the image. As the Master was being photographed he went into samadhi.
বেলা ৩টার সময় মনোমোহনের বাটীতে শ্রীরামকৃষ্ণ আসিয়াছেন। সেখানে বিশ্রাম করিয়া একটু জলযোগ করিলেন। সুরেন্দ্র বলিতেছেন — আপনি কল দেখবেন বলেছিলেন — চলুন! তাঁহাকে গাড়ি করিয়া সুরেন্দ্র বেঙ্গল ফটোগ্রাফারের ষ্টুডিওতে লইয়া গেলেন। ফটোগ্রাফার দেখাইলেন কিরূপে ছবি তোলা হয়। কাঁচের পিছনে কালী (Silver Nitrate) মাখান হয়; তারপর ছবি উঠে। ঠাকুরের ছবি লওয়া হইতেছে — অমনি তিনি সমাধিস্থ হইলেন।
अब श्रीरामकृष्ण राजेन्द्र मित्र के मकान पर आये हैं । राजेन्द्र मित्र (राम और मनमोहन के मौसा) रिटायर्ड डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं । श्री महेन्द्र गोस्वामी आँगन में भागवत का प्रवचन कर रहे हैं । अनेक भक्तगण उपस्थित हैं - केशव अभी तक नहीं आये । श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं ।
A little later Sri Ramakrishna arrived at Rajendra Mitra's house. Keshab had not yet come, and Mahendra Goswami was reading from the Bhagavata. The Master conversed with the devotees.
এইবার ঠাকুর রাজেন্দ্র মিত্রের বাটীতে আসিয়াছেন। রাজেন্দ্র পুরাতন ডেপুটি ম্যাজিস্ট্রেট।শ্রীযুক্ত মহেন্দ্র গোস্বামী বাটীর প্রাঙ্গণে ভাগবত পাঠ করিতেছেন। অনেক ভক্ত উপস্তিত — কেশব এখনও আসিয়া পৌঁছান নাই। শ্রীরামকৃষ্ণ কথা কহিতেছেন।
श्रीरामकृष्ण - (भक्तों के प्रति ) - गृहस्थी में धर्म (=भक्ति) होगा क्यों नहीं ? परन्तु है बड़ा कठिन। आज बागबाजार के पुल पर से होकर आया । कितने जंजीरों से उसे बाँधा है ! एक जंजीर के टूटने से भी पुल का कुछ न होगा, क्योंकि वह और भी अनेक जंजीरों से बँधा हुआ है । वे सब उसे खींचे रहेंगे । उसी प्रकार गृहस्थों के अनेक बन्धन हैं, ईश्वर की कृपा के बिना उन बन्धनों के कटने का उपाय नहीं है ।
MASTER: "Why shouldn't one be able to lead a spiritual life in the world? But it is extremely difficult. While coming here I passed over the bridge at Baghbazar. How many chains it is tied with! Nothing will happen if one chain is broken, for there are so many others to keep it in place. Just so, there are many ties on a worldly man. There is no way for him to get rid of them except through the grace of God.
শ্রীরামকৃষ্ণ (ভক্তদের পতি) — সংসারে হবে না কেন? তবে বড় কঠিন। আজ বাগবাজারের পুল হয়ে এলাম। কত বন্ধনেই বেঁধেছে। একটা বন্ধন ছিঁড়লে পুলের কিছু হবে না। আরও অনেক শিকল দিয়ে বাঁধা আছে — তারা টেনে রাখবে। তেমনি সংসারীদের অনেক বন্ধন। ভগবানের কৃপা ব্যতিরেকে সে বন্ধন যাবার উপায় নাই।
“उनका दर्शन #होने पर फिर कोई भय नहीं है । उनकी माया में विद्या और अविद्या दोनों ही हैं; पर दर्शन के बाद मनुष्य निर्लिप्त हो जाता है । परमहंस-स्थिति प्राप्त होने पर यह बात ठीक तरह से समझ में आती है । दूध में जल है, हंस दूध लेकर जल (देह-मन इन्द्रियों की गुलामी) को छोड़ देता है, पर केवल हंस ही ऐसा कर सकता है, बतख नहीं ।”
(#ठाकुर-माँ -स्वामीजी की कृपा से आत्मसाक्षात्कार ? सच्चिदानन्द स्वरुप का दर्शन होने पर.)
"One need not be afraid of the world after one has had the vision of God. Both vidya and avidya exist in His maya; but one becomes indifferent to them after realizing God. One understands it rightly after attaining the state of a paramahamsa. Only a swan can discard the water and drink the milk from a mixture of milk and water. A robin cannot do so."
“তাঁকে দর্শন করলে আর ভয় নাই; তাঁর মায়ার ভিতর বিদ্যা-অবিদ্যা দুই আছে; — দর্শনের পর নির্লিপ্ত হতে পারে। পরমহংস অবস্থায় ঠিক বোধ হয়। দুধে জলে আছে, হাঁসে যেমন দুধ নিয়ে জল ত্যাগ করে। হাঁস পারে কিন্তু শালিক পারে না।”
एक भक्त - फिर गृहस्थ के लिए क्या उपाय है ?
A DEVOTEE: "Then what is the way for a householder?"
একজন ভক্ত — তবে সংসারীর উপায় কি?
श्रीरामकृष्ण – गुरु-वाक्य में विश्वास । उनकी वाणी का सहारा लेकर, उनका वाक्यरूपी खम्भा पकड़कर घूमो, गृहस्थी का काम करो ।
MASTER: "Faith in the guru's words. You should depend on his instruction. Do your duties in the world, holding fast to his words, like a person whirling round and holding fast to a pillar.
শ্রীরামকৃষ্ণ — গুরুবাক্যে বিশ্বাস। তাঁর বাক্য অবলম্বন; তাঁর বাক্যরূপ খুঁটি ধরে ঘোরো, সংসারের কাজ করো।
“गुरु को मनुष्य नहीं मानना चाहिए । सच्चिदानन्द ही गुरु के रूप में आते हैं । गुरु की कृपा से इष्ट का दर्शन होता है । उस समय गुरु इष्ट में लीन हो जाते हैं ।
"One must not look on one's guru as a mere human being: it is Satchidananda Himself who appears as the guru. When the disciple has the vision of the Ishta, through the guru's grace, he finds the guru merging in Him.
“গুরুকে মানুষবুদ্ধি করতে নাই। সচ্চিদানন্দই গুরুরূপে আসেন। গুরুর কৃপায় ইষ্টকে দর্শন হয়, তখন গুরু ইষ্টতে লীন হয়ে যান।
"सरल विश्वास से क्या नहीं हो सकता ? एक समय किसी गुरु के यहाँ अन्नप्राशन हो रहा था । उस अवसर पर शिष्यगण, जिससे जैसा बना, उत्सव का आयोजन कर रहे थे । उनमें एक दीन विधवा भी शिष्या थी । उसके एक गाय थी । वह एक लोटा दूध लेकर आयी । गुरुजी ने सोचा था कि दूध-दही का भार वही लेगी, किन्तु एक लोटा दूध देखकर क्रोधित हो उन्होंने उस लोटे को फेंक दिया और कहा, 'तू जल में डूबकर मर क्यों नहीं गयी ?' स्त्री ने गुरु का यही आदेश समझा और नदी में डूबने के लिए गयी ।
"What can one not achieve through simple faith! Once there was an annaprasana ceremony2 in a guru's house. His disciples volunteered, according ing to their powers, to supply the different articles of food. He had one disciple, a very poor widow, who owned a cow. She milked it and brought the guru a jar of milk. He had thought she would take charge of all the milk and curd for the festival. Angry at her poor offering, he threw the milk away and said to her, 'Go and drown yourself.' The widow accepted this as his command and went to the river to drown herself.
“সরল বিশ্বাসে কি না হয়। গুরুপুত্রের অন্নপ্রাশনে — শিষ্যেরা যে যেমন পারে, উৎসবের আয়োজন করছে। একটি গরীব বিধবা সেও শিষ্যা। তার একটি গরু আছে, সে একঘটি দুধ এনেছে। গুরু মনে করছিলেন যে দুধের ভার ওই মেয়েটি লবে। বিরক্ত হয়ে সে যা এনেছিল ফেলে দিলে আর বললে — তুই জলে ডুবে মরতে পারিস নি? মেয়েটি এই গুরুর আজ্ঞা মনে করে নদীর ধারে ডুবতে গেল।
उस समय नारायण ने दर्शन दिया और प्रसन्न होकर कहा, 'इस बर्तन में दही है, जितना निकालोगी उतना ही निकलता जायगा । इससे गुरु सन्तुष्ट होंगे ।' वह बर्तन जब गुरु को दिया गया तो वे दंग रह गये और सारी कहानी सुनकर नदी के किनारे पर आकर उस स्त्री से बोले - 'यदि मुझे नारायण का दर्शन न कराओगी तो मैं इसी जल में कूदकर प्राण छोड़ दूँगा ।' नारायण प्रकट हुए, परन्तु गुरु उन्हें न देख सके । तब स्त्री ने कहा, 'प्रभो, गुरुदेव को यदि दर्शन न दोगे और यदि उनकी मृत्यु हो जायगी तो मै भी शरीर छोड़ दूँगी ।' फिर नारायण ने एक बार गुरु को भी दर्शन दिया ।
But God was pleased with her guileless faith and, appearing before her, said: 'Take this pot of curd. You will never be able to empty it. The more curd you pour out, the more will come from the pot. This will satisfy your teacher.' The guru was speechless with amazement when the pot was given to him. After hearing from the widow the story of the pot, he went to the river, saying to her, 'I shall drown myself if you cannot show God to me.' God appeared then and there, but the guru could not see Him. Addressing God, the widow said, 'If my teacher gives up his body because Thou dost not reveal Thyself to him, then I too shall die.' So God appeared to the guru — but only once.
তখন নারায়ণ দর্শন দিলেন; আর প্রসন্ন হয়ে বললেন — এই পাত্রটিতে দধি আছে, যতই ঢালবে ততই বেরুবে, গুরু সন্তুষ্ট হবেন। এবং সেই পাত্রটি দেওয়া হলে গুরু অবাক্। আর সমস্ত বিবরণ শুনে নদীর ধারে এসে মেয়েটিকে বললেন — নারায়ণকে যদি আমাকে দর্শন না করাও তবে আমি এই জলেতে প্রাণত্যাগ করব। নারায়ণ দর্শন দিলেন, কিন্তু গুরু দেখতে পেলেন না। মেয়েটি তখন বললে, প্রভু গুরুদেবকে যদি দর্শন না দেন আর তাঁর শরীর যদি যায় তো আমিও শরীরত্যাগ করব; তখন নারায়ণ একবার গুরুকে দেখা দিলেন।
"देखो, गुरु-भक्ति रहने से अपने को भी दर्शन हुआ, फिर गुरुदेव को भी हुआ । "इसलिए कहता हूँ –
यद्यपि आमार गुरु शुण्डी बाड़ी जाय ,
तथापि आमार गुरु नित्यानन्द राय।
‘यदि मेरे गुरु शराबखाने में भी जाते हों तो भी मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं ।'
[वे सच्चिदानन्द - परमसत्य -इन्द्रियातीत शाश्वत आनंद के अवतार हैं।']
"Now you see, because of faith in her guru the disciple herself had the vision of God and also showed Him to her teacher. Therefore I say, 'Even though my guru frequents a grog-shop, still to me he is the embodiment of Eternal Bliss.'
“দেখ গুরুভক্তি থাকলে নিজেরও দর্শন হল আবার গুরুদেবেরও হল। “তাই বলি —
যদ্যপি আমার গুরু শুঁড়ীবাড়ি যায়,
তথাপি আমার গুরু নিত্যানন্দ রায়।
“सभी गुरु बनना चाहते हैं । चेला बनना कदाचित् ही कोई चाहता है । परन्तु देखो, ऊँची जमीन में वर्षा का जल नहीं जमता, वह तो नीची जमीन में - गढ़े में ही जमता है ।
"All want to be the guru, but very few indeed want to be the disciple. But you know that rain-water doesn't collect on a high mound; it collects in low land, in a hollow.
“সকলেই গুরু হতে চায়, শিষ্য হতে বড় কেহ চায় না। কিন্তু দেখ উঁচু জমিতে বৃষ্টির জল জমে না। নিচু জমিতে — খাল জমিতে জমে।
"गुरु जो नाम दें, विश्वास करके उस नाम को लेकर साधनभजन करना चाहिए । "जिस सीप में मुक्ता तैयार होता है, वह सीप स्वाति नक्षत्र का जल लेने के लिए तैयार रहती है । उसमें वह जल गिर जाने पर फिर एकदम अथाह जल में डूब जाती है, और वहीं चुपचाप पड़ी रहती है । तभी मोती बनता है ।"
"One should have faith in the holy name given by the guru and with it practise spiritual discipline. It is said that the pearl oyster makes itself ready for the rain that falls when the star Svati is in the ascendant. Taking a drop of that rain, it dives into the fathomless depths of the ocean and remains there until the pearl is formed."
“গুরু যে নামটি দেবেন বিশ্বাস করে সে নামটি লয়ে সাধন-ভজন করতে হয়।”“যে শামুকের ভেতর মুক্তা তয়ের হয়, এমনি আছে, সেই শামুক স্বাতী-নক্ষত্রের বৃষ্টির জলের জন্য প্রস্তুত হয়ে থাকে। সেই জল পড়লে একেবারে অতল জলে ডুবে চলে যায়, যতদিন না মুক্তা হয়।”
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