13.स्वामी अभेदानन्द के प्रिय नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग लीला पार्षदों में स्वामी अभेदानन्दजी एक प्रमुख स्थान रखते हैं. भारतीय शाश्वत-सनातन ' सार्वभौमिक-धर्मादर्श ' के जिस विजय-विजयन्ती को उनके गुरु-भाई विवेकानन्द ने पाश्चात्य भूमि पर लहराया था, उस प्रवाह को अक्षुण्ण बनाये रखने का उत्तरदायित्व उन्होंने अपने अनुज अभेदानन्द को सौंपा था. स्वामी अभेदानन्दजी ने पूरी निष्ठा के साथ इस भारी उत्तरदायित्व का पालन सुदीर्घ २५ वर्षों (१८९६-१९२१) तक किया एवं पाशचतय भूमि पर, इसकी एक सूदृढ़ बुनियाद खड़ी कर दी थी.
उनहोंने भारत के ' सर्वजनीन- वेदान्त ' के उदार और सर्वलौकिक सनातन धर्म-दर्शन के सूतीक्ष्ण यूक्ति-तर्क पूर्ण व्याख्या के आलोक में ही इस पाश्चात्य-विजय अभियान में सफलता प्राप्त की थी.
पाश्चात्यवासी उनकी उस प्रबल तर्कपूर्ण
शाशत्रार्थ को सुन कर मुग्ध हो गये थे, तथा उनको स्वामीजी के योग्य
उत्तराधिकारी के रूप में पहचाना था. कहना न होगा कि उन्हीं की प्रबल
प्रचेष्टा से पाश्चात्य में वेदांत-प्रचार के कार्य में सफलता मिली थी.
तत्पश्चात वे १९२१ ई० में भारतवर्ष लौट आए थे, एवम् यहाँ भी विभिन्न
प्रदेशों में श्रीरामकृष्ण भावप्रचार कार्य में आजीवन रत रहे थे.
प्रचारक स्वामी अभेदानन्दजी महाराज इधर आध्यात्म-साम्राज्य के
अधिपति थे. श्रीरामकृष्ण के लीलासहचारों में से प्रायः सभी एक एक कर इस
धरा-धाम को छोड़ कर लीला-संवरण कर लिए थे. उनमें से केवल अभेदानन्दजी ही
कोलकाता में रह रहे थे. यह २५ अगस्त १९३८ की बात है. उस समय अभेदानन्दजी रामकृष्ण वेदान्त मठ के संस्थापक अध्यक्ष थे. और देशनायक सुभाषचन्द्र
बोस राष्ट्रीय कांग्रेस के सभापति थे. दोनों अपने अपने क्षेत्रों में
मुख्य-भूमिका को निभा रहे थे. उन दोनों का कार्य-क्षेत्र अलग होने पर भी,
निर्माणकारी सार्वभौमिक कल्याण-कारी कार्यों, - ' बहुजनहिताय बहुजनसूखाय '
व्रत में दोनों का मन-प्राण समर्पित था. उनलोगों की हृदय-वीणा मानो
एक ही लय के समस्वर में मुक्ति-आन्दोलन का अनुकंपन बन कर गूँज रहे हैं.
दोनों एक दूसरे के आत्मा के आत्मीय थे.
एक की आत्मा दूसरे से जुड़ी हुई थी. एक का दूसरे पर जब स्नेह बिल्कुल सच्चा
था, तो उन दोनों में भेंट होना भी अनिवार्य रूप से आवश्यम् भावी था.
स्वामी अभेदानन्दजी तब थोड़ा अस्वस्थ थे. कोलकाता के रामकृष्ण वेदान्त मठ
के दूसरे तल्ले पर रह रहे थे, डाक्टर ने उनको नीचे चढ़ने-उतरने को मना कर
दिया था. एक दिन अपने सेवक संन्यासी को बुला कर महाराज ने कहा- ' देखो, राष्ट्र-गौरव सुभाषचन्द्र को
देखने की बहुत इच्छा हो रही है, क्या उनको इसकी सूचना दे सकते हो?' महाराज
की इच्छा और निर्देश को सुभाषचन्द्र के पास पहुँचा दिया गया.
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सूचना मिलते ही, सुभाषबाबू ने संदेश भिजवाया
कि वे यथा शीघ्र महाराज को देखने और श्रद्धा प्रकट करने के लिये आएँगे. यह
खबर मिलते ही, अभेदानन्दजी आनन्द से भर उठे, और सुभाषचन्द्र से मिलने के
लिये हर क्षण अधीर हो कर प्रतीक्षा करने लगे. २५ अगस्त १९३८ को रात ८ बजे
धोती-कुर्ता धारण किये एक सज्जन व्यक्ति को मठ में देखते ही, महाराज बोल
पड़े- ' सुभाष, आओ मैं तुम्हें अपने सीने से लगा लूँ.' वे उनको पहले कभी देखे नहीं थे, किन्तु कैसे उन्हें पहचान लिये, कोई नहीं जानता.
उन दोनों के आपस में मिलने का दृश्य बड़ा विलक्षण और असाधारण था. वैसे
आश्चर्य-पूर्ण मिलन दृश्य को देखने मात्र से दोनों आखें जुड़ा जातीं हैं.
वह दिव्य आलिंगन-दृश्य केवल हृदय से हृदय से अनुभव करने की वस्तु है. दोनों
की आँखों से स्नेह, प्रेम और श्रद्धा की अमृत धारा झर-झर कर बहती जा रही
थी. वह मानो जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध रहा हो. प्रत्यक्ष दर्शी के
मानस-पटल पर अंकित उस मिलन-दृश्य की जो छवि अंकित हुई थी उसका वर्णन करते
हैं- ' आज भी वह दृश्य ह्मलोगों के हृदय पर स्वर्णक्षरों में खुदी हुई
है.वे सब बातें याद आने पर सारा शरीर रोमांचित हो उठता है. ...उनका
(सुभाषचन्द्र का ) कैसा रूप था, उनकी कैसी भक्ति थी !...वीर- महावीर थे.
भारतमाता के सच्चे सपूत ' नेताजी सुभाष ' के उपर महाराज के हृदय में बहुत
आशाएँ थीं, तथा वे विश्वास करते थे कि भारतवर्ष को यदि स्वाधीनता प्राप्त
होगी, तो वह सुभाषचन्द्र के माध्यम से ही प्राप्त होगी. इसीलिये
सुभाषचन्द्र में भारतमाता के प्रति आत्म-त्याग की भावना और सेवा-निष्ठा (
जीवन के भोगों के प्रति मोह का त्याग और सेवाव्रत ) में परम अनुराग से
संतुष्ट होकर अभेदानन्द जी ने पूछा था- ' सुभाष, भारत की स्वाधीनता कबतक वापस आएगी?
( संपूर्ण भारतवर्ष चरित्र-निर्माण कारी आन्दोलन की अनिवार्यता को कब तक समझ सकेगा ?) इसके उत्तर में भारत-सेवक (देशभक्त) सुभाषचन्द्र ने आवेगपूर्ण हृदय से कहा था- ' महाराज, जगद्डल पत्थर को खिसकाना क्या कोई आसान काम है ?....फिर भी आशा है महाराज. आशा नहीं होती तो मैं इतनी मिहनत क्यों कर रहा हूँ? भारत स्वाधीन होकर ही रहेगा ! '
जब भारतमाता के वीर-सपूत सुभाषचन्द्र, ने
भारत-प्रेमी अभेदानन्द महाराज को आश्वासन दे दिया था, तो क्या वह बात कभी
मिथ्या हो सकती थी! क्योंकि, सुभाषचन्द्र के मन की धधकति हुई इच्छा के साथ
महाराज की प्रचंड इच्छा भी जुड़ी हुई थी. इसीलये वैसी सम्मिलित इच्छा (एक
मन-प्राण होकर लिया गया संकल्प) एकदिन फलदायी होने को बाध्य है.
नेताजी सुभाष की इच्छा और आशापूर्ण वचनों को
सुन कर अभेदानन्दजी आनन्द से भर उठे, और गदगद होकर आशीर्वाद दिये- '
विजयी-भव !, तुम्हारा स्वास्थ्य सदैव अक्षुण्ण बना रहे. जब तुमको समय मिले
तो तुम फिर आना.' मधुर-भाषी सुभाषचन्द्र ने झुक कर पूरी विनम्रता के साथ
महाराज की पवित्र चरण-धूल और आशिर्वचनों को सिर-माथे धारण किया, एवम् उसीके
साथ देश और देश की विभिन्न समस्याओं के उपर लंबे समय तक सलाह-मशविरा भी
किया.
उनकी देशभक्ति और देशप्रीति से अत्यन्त प्रसन्न हो कर आनन्द के साथ जयकारा लगाये- ' जय राष्ट्रपति सुभाषचन्द्र बोस की जय !
तुम राष्ट्रपति बन गये हो, तुम्हें देखने की बड़ी इच्छा थी, इसीलिए आज मैं
अत्यन्त आनन्दित हूँ. ..तुम बांगलादेश और बंगाली जाति के सिरमौर तो हो
ही, किन्तु तुमने समग्र भारत के मुख को भी उज्ज्वल कर दिया है !'
उसदिन अभेदानन्द महाराज सुभाषचन्द्र की स्वदेशप्रेम की आकुलता को देख कर
विस्मित और मुग्ध हो गये थे, और नहीं नहीं करके भी उस समय के भारतवर्ष की
वर्तमान परिस्थितियों पर लगभग घंटा भर से अधिक देर तक बातचीत किए थे.
सुभाषचन्द्र इस बात को जानना चाहते थे कि भारत की समस्याओं का निदान कैसे
किया जा सकता है? उसके उत्तर में महाराज ने कहा था-
' देखो, इस जगाद्दल पत्थर को हटाने का एक उपाय है, - एकता के द्वारा, भारत
का नागरिक-समाज संगठित हो कर कार्य करना सीख सके इसकी चेष्टा में जुट जाओ! '
उसके बाद महाराज के श्रीचरणों में प्रणाम
निवेदित करके तथा उनके आशीर्वाद को ग्रहण कर, अपने घर वापस लौट गये थे.
किन्तु इधर महाराज हर समय सुभाष की ही यादों में खोये रहे, एवं रात्रि के
समय अपने सेवक सन्यासी (पी. ए) से हंसते हुए बोले- ' तुमने सुभाष बाबू के प्रसन्न-चित्त मुख पर ध्यान दिया?
बहुत ही प्रसन्न-वदन फिर भी कितना गंभीर शान्त हृदय पुरुष. भीतर में त्याग
का भाव है न, यह अपना जीवन किसी सन्यासी की तरह व्यतीत करता है- माहत्यागी
है.
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