Thursday, December 22, 2016

महामण्डल का " प्रतीक-चिन्ह " (Emblem)

आज जब, इस युवा महामण्डल के संस्थापक, चरित्र-निर्माण आंदोलन के पुरोधा, तथा 'स्वामी जी' के जीवन्त 'भाष्य' स्वरुप पूज्य 'नवनी दा' शरीर में नहीं हैं; तब -इस नई परिस्थिति में जो लोग नवनी दा के भावी सक्सेसर्स, क्रमानुयायि,भावी प्रशिक्षक, वुड बी लीडर्स, या भावी मार्गदर्शक नेता का उत्तरदायित्व ग्रहण करेंगे उन्हें, रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित-BE AND MAKE- लीडरशिप ट्रेनिंग मेथड या - महामण्डल का आदर्श,उद्देश्य और कार्यक्रम को एक बार पुनः स्पष्ट रूप से समझ लेना आवश्यक होगा।
बहुत संक्षेप में कहा जाय तो,
१. महामण्डल का उद्देश्य है -भारत का कल्याण 
२.उपाय है -मनुष्य निर्माण या चरित्र निर्माण 
३.आदर्श हैं- स्वामी विवेकाननन्द
४.आदर्श-वाक्य या मोटो है - ' Be and Make ' मनुष्य बनो और बनाओ ! 
५. महामण्डल की कैम्पेन पॉलिसी, समर नीति या अभियान मन्त्र है - 'चरैवेति चरैवेति !' -आगे बढ़ो ! आगे बढ़ो ! 
महामण्डल के इस प्रतीक-चिन्ह (Emblem) में सारी बातें समाहित हैं। (आप जब महामण्डल का वेब-पेज खोलेंगे तो दाहिनी तरफ महामण्डल का यह प्रतीक-चिन्ह (Emblem) दिखाई देगा।) नवनी दा अपनी आत्मसंस्मरणात्मक-पुस्तक 'जीवन नदी के हर मोड़ पर' में कहते हैं - " महामण्डल के आविर्भूत हो जाने बाद, सोंच-विचार कर के सर्वप्रथम इसका एक " प्रतीक-चिन्ह " निर्धारित किया गया। उसमे जो गोलाई है, वह पृथ्वी है; और सुदूर दक्षिणी भाग में स्थित कन्याकुमारी के ऊपर से शुरू होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है, जिसके भीतर दण्डधारी स्वामी विवेकानन्द को एक भ्रमणकारी संन्यासी, (दादा बोलते थे 'छन्नछाड़ा गोष्ठिर पुरोधा' - ऐन आइटिनेरेन्ट मोंक,Itinerant monk रमता योगी) के रूप में दर्शाया गया है। एक भ्रमणकारी युवा संन्यासी, के रूप में स्वामी विवेकानन्द ही महामण्डल के आदर्श हैं।  जिस प्रकार किसी शिल्पकार को मूर्ति को गढ़ने के लिये एक साँचे की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार युवाओं को भी अपना जीवन-गठन करने के लिये किसी जीवन्त और ज्वलन्त आदर्श को एक साँचे (Role Model) के रूप में अपने सामने रखना आवश्यक है। 
किसी महापुरुष के निजी जीवन में संचित कुछ महान चारित्रिक गुणों के संकलन-फल को आदर्श (model-प्रतिमान या नमूना) कहते हैं। किसी वैसे जीवन्त आदर्श स्वरूप व्यक्ति को देखकर सीखा जा सकता है, उनसे प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है, उनके हृदय के जोश और उत्साह से प्रेरणा लेकर अपने ह्रदय को भी जोश और उत्साह से भर लेना संभव हो जाता है। युवा पीढ़ी के सामने ऐसा ही एक जीवन्त आदर्श रहना बहुत आवश्यक है। आधुनिक युग के युवा पीढ़ी के लिये स्वामी विवेकानन्द ही वह श्रेष्ठ आदर्श (Role Model) हैं! क्योंकि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। जिस व्यक्ति के अपने आचरण में वैसे महान गुण परिलक्षित नहीं होते हों, उनके मुख से केवल कुछ रटे-रटाये बेजान शब्दों के संयोजन का श्रवण करने से उन महान सत्यों (अहम् ब्रह्मास्मि जैसे महावाक्यों) की वास्तविक अवधारणा नहीं हो सकती है। जब किसी महापुरुष के व्यक्तिगत जीवन में समस्त गुण पूर्ण मात्रा में विकसित हो जाते हैं, तभी उस जीवन से आदर्श का जीवन्त-ज्वलन्त प्रतिफलन प्राप्त किया जा सकता है। 
महामण्डल का आदर्श वाक्य या मोटो -" Be and Make " !  उस गोलाई के नीचे लिखा है  स्वामीजी का यह आह्वान " बनो और बनाओ "। यही साधन और साध्य भी है ! इसका सरल अर्थ है -" स्वयं मनुष्य बनो दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो ! किन्तु उपनिषदों में कहे गये " ४ महावाक्यों " के जैसा " Be and Make" का वास्तविक अर्थ भी अत्यन्त सारगर्भित है। मनुष्य बनो ! सुनकर लगता है, हम तो मनुष्य हैं ही -कैसा मनुष्य बनने के लिए कहा जा रहा है ? 

यहां मनुष्य जीवन के दुहरे उद्देश्य, व्यक्तिगत पूर्णता (ब्रह्म तेज) तथा सामाजिक कार्यक्षमता (क्षात्रवीर्य) का संकेत किया गया है। हमारे वैदिक ऋषिओं ने " ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य "  का बहुत गुणगान किया है। वेदों में कहा गया है," जहाँ ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य एक साथ रहते हैं, केवल वहीँ पर पुण्याग्नि के साथ समस्त देवता निवास करते हैं। " 
"ब्रह्मतेज" का अर्थ है आध्यात्मिक ज्ञान या मुक्ति- वह तेज जो कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं की भावना से प्रेरित -सन्तसुलभ सर्व प्रेमी बुद्धि-(ऑल लविंग इन्टेलिजेन्स ऑफ़ सेंटलीनेस को) या श्री ठाकुर की भाषा में ' मान- होश' तो मानुष - को प्राप्त कर के साम्यभाव में स्थित हो जाने से होती है। अर्थात सभी एक है - वन हैज बिकम मेनी, आत्मा ही परमात्मा है, इस बोध से जो तेज या शक्ति उत्पन्न होती है, उसे ब्रह्मतेज कहते हैं। और "क्षात्रवीर्य" का अर्थ है -  वैसा स्वतः स्फूर्त पौरुष, या वह लौकिक सार्मथ्य जो अधोपतित समाज के भीतर भी सदाचार को स्थापित कर देने में समर्थ हो ! या वह डायनामिक गुडनेस ऑफ़ मैनलीनेस, जो 'बनो और बनाओ आंदोलन' को भारतवर्ष के प्रत्येक राज्य में प्रसारित करने में सक्षम हो। 
अपने इस क्षुद्र  'स्वार्थी काचा आमी' (देहाध्यास, नाम-रूप या M /F  का मैं बोध) को त्याग करते हुए , 
डीहिप्नोटाइज्ड होकर साम्यभाव में स्थित पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य या 'पाका आमी' बन जाने से (ससीम से असीम बन जाने या बून्द से सागर बन जाने ) को हमें क्यों भयप्रद मानना चाहिए ? यह भय केवल अपनी जड़ावस्था को अचल रखने के दुराग्रहवश उत्पन्न होता है। इसीलिये स्वामीजी युवाओं से आह्वान करते हैं-'चरैवेति चरैवेति','ऑन्वर्ड ऑन्वर्ड', 'आगे बढो, आगे बढो '! 
 महामण्डल की 'कैम्पेन पॉलीसी ' समर-नीति या अभियान मन्त्र है- " चरैवेति चरैवेति !" जो इस प्रतीक चिन्ह के ऊपर लिखा है। दादा कहते थे- इस मन्त्र में इतनी शक्ति है, कि जो भी इस चरित्र-निर्माण आंदोलन को भारत के गाँव-गाँव तक पहुँचा देने के कार्य में  निष्ठा पूर्वक जुड़ा रहेगा वह स्वयं यथार्थ मनुष्य बन जायेगा ! उसे मोक्ष (मुक्ति-भक्ति) तक की प्राप्ति स्वतः हो जायेगी, उसके लिये अलग से अन्य कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी। 
अतः चरित्र-निर्माण आंदोलन को भारत के गॉंव-गाँव तक प्रचारित कर देने की महामण्डल नीति-योजना है -'चरैवेति चरैवेति!' इस मन्त्र को ऐतरेय ब्राह्मण (७.१५) से लिया गया है। इस वैदिक गीत में मनुष्य एवं समाज के विकास के केन्द्र में मनुष्य के श्रम या पुरुषार्थ के महत्व को उजागर किया गया है। 
 कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् । चरैवेति चरैवेति॥
इस मंत्र के ऋषि ने बताया है कि - जो मनुष्य (मोहनिद्रा में ) सोया रहता है और यथार्थ मनुष्य बन जाने के लिए पुरुषार्थ नहीं करता उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है,  जो पुरुषार्थ करने के लिये खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है. जो आगे चलना शुरू कर देता है , उसका भाग्य भी आगे आगे चलने लगता है, इसीलिये- " हे मनुष्यों- चरैवेति चरैवेति ! "आगे बढो ,आगे बढ़ते रहो !" 
सोये रहने का तात्पर्य है, जो मनुष्य अभी तक 'देहाध्यास ' में फँसा है और अपने नश्वर शरीर को (सापेक्षिक सत्य को) ही मैं 'अमुक' नाम वाला/वाली स्त्री/पुरुष शरीर समझ रहा है, वह मोह-निद्रा में सोया हुआ है, अतः अभी उसके लिये ' कलिकाल' चल रहा है, या वह 'कलियुग'  में ही वास कर रहा है! नेता स्वामीजी की ललकार - उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्नी बोधत ! सुनने से, जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, वह द्वापर युग में वास कर रहा है। " उत्तिष्ठ्म स्त्र्रेता भवति "- जो जो पुरुषार्थ करने के लिये- अर्थात 
महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास करने के लिये आलस्य छोड़कर, और कमर कस कर उठ खड़ा होता है, -  या वह 'त्रेता युग' में वास कर रहा है। और " कृतं संपद्यते चरन् "- अर्थात जो मनुष्य प्रति मुहूर्त अपने ' क्षुद्र स्वार्थी-मैं ' (काचा आमी -देहाध्यास) को निष्ठुरता के साथ त्याग करते हुए 'पूर्ण निःस्वार्थी बृहद-मैं' (वज्र या थंडरबोल्ट के जैसा पाका आमी) बनने का प्रयत्न निरन्तर करता रहता है, वह तो मानो 'सत्य युग' में वास कर रहा होता है! 
हमें अपने जीवन-दीपक को प्रज्वलित करके दूसरों के जीवन-दीप को भी प्रज्वलित करा देने का प्रयत्न करना होगा। इसीलिये स्वामीजी ने कहा था- ' चरैवेति चरैवेति '-चलते रहना ही जीवन है, और थम जाना ही मृत्यु है।' फिर कहते हैं- ' उठो, जागो ! अब और स्वप्न मत देखो ! ' यही है स्वामीजी का जीवन-प्रद मन्त्र, जो जड़-पिण्डों (मुर्दों) में भी जान डाल सकता है। युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ' तुम्हें भी अपने जीवन में ' क्षात्र-वीर्य और ब्रह-तेज ' इन दो आपात परस्पर विरोधी भावों का समावेश करके, संसार में नये युग की शुरुआत करनी होगी। भविष्य के गौरवशाली भारत के निर्माण का प्रारम्भ तभी होगा, जब हमारे देश के युवाओं के जीवन में ' क्षात्रवीर्य ' और' ब्रह्मतेज ' (जोश और होश ) साथा-साथ एवं एक सामान आभा बिखेरेंगे। महामण्डल के प्रयास से एवम होली ट्रायो के आशीर्वाद से भविष्य के गौरव- शाली भारत में एक ऐसे समाज की स्थापना होगी जहाँ 'क्षात्रवीर्य' और 'ब्रह्मतेज' साथासाथ एवं एक सामान आभा बिखेरेंगे। इसीलिये " Be and Make" अर्थात  उन्नततर मनुष्य (निःस्वार्थी मनुष्य) बनने और बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहो, तथा " चरैवेति चरैवेति "-अर्थात अपने जीवन-दीपक को प्रज्वलित करके दूसरों के जीवन-दीप को भी प्रज्वलित करा देने का आजीवन प्रयत्न करते रहो ! स्वामी विवेकानन्द द्वारा उद्धरित  इन्हीं  दोनों आह्वानों या महावाक्यों को महामण्डल के प्रतीक-चिन्ह में उकेरा गया है ! 
स्वामी जी ने कहा था - "विश्व का कल्याण करना ही भारत की नियति है !" इसीलिये महामण्डल का उद्देश्य है -'भारत का कल्याण!' और केवल साम्यभाव में प्रतिष्ठित मनुष्य ही जगत को ब्रह्मरूप में देखकर -अपने पराये का, भाषा-जाति-धर्म का भेदभाव छोड़ कर, भारतवासियों के सेवा या शिवज्ञान से जीव सेवा कर सकता है। अतः भारत का कल्याण केवल ब्रह्मविद् मनुष्य, या साम्यभाव में प्रतिष्ठित पूर्ण निःस्वार्थपर युवाओं की संख्या बल की वृद्धि पर ही निर्भर है। और यही चुनौती- हमारे युवाओं के समक्ष, (भारत के भावी मार्गदर्शक नेताओं के समक्ष) है। 
यह चुनौती सबसे ज्यादा कठिन भी है,क्योंकि चुनौती से प्राप्त होने वाला -'जय या पराजय' ही हमारे भविष्य का स्वरूप निश्चित करेगा। इसका सारा उत्तरदायित्व युवाओं के कन्धों पर ही है। अपनी तथा अपनी प्यारी मातृभूमि को संकट में डालने का जोखिम उठा कर ही वे चाहें तो,इस चुनौती को अनदेखा कर सकते हैं।
इस महा-जागरण की वाणी को भारत के खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, स्कुल-कालेजों, ऑफ़िस-अदालतों, व्यापारियों की गद्दीयों, राष्ट्र-चालकों के मसनदों (सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेताओं ) तक, सर्वत्र फैला देना होगा।
स्वामीजी ने कहा था- ' भारत झोपड़ियों में वास करता है। ' उसके जनसाधारण की उन्नति से ही भारत की उन्नति होगी। भारत को महान बनाने के लिये यहाँ की साधारण जनता को महान भावों से अनुप्राणित करना होगा। और जो मनुष्य, किसी भ्रमणकारी यात्री की तरह (ड्रॉपआउट्स की तरह या छन्नछाड़ा गोष्ठी के पुरोधा की तरह) एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूम घूम कर मनुष्य बनने और बनाने BE AND MAKE के लिए महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यासों के प्रचार-प्रसार में लगा रहता है, एक दिन अवश्य उसके हृदय के बन्द कपाट को फोड़ कर प्रेम-मन्दाकिनी प्रवाहित होने लगती है! 
और तब वह मनुष्य जो मन (अहं) के बन्धन से मुक्त - या डीहिप्नोटाइज्ड हो कर ,साम्यभाव में स्थित हो जाता है समदर्शी हो जाता है, तब अपने -पराये का भेद मिट जाता है, वह किसी को पराया नहीं मानता, सभी को अपना मानता है। मनुष्य की इसी अवस्था का वर्णन रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी कविता ' निर्झ्रेर स्वप्नभंग' में करते हुए कहते हैं - 
 'हेशे खोलो खोलो गेये कोलो कोलो ताले ताले दिबो ताली' 
(হেসে খলখল গেয়ে কলকল/তালে  তালে দিব তালি।) 
जब उस उन्मुक्त झरने का स्वप्न भंग हो जाता है, -वह अपने छोटे छोटे स्वार्थ और लालच को त्याग करते हुए, सम्पूर्ण रूप से निःस्वार्थ जीवन-समुद्र के साथ एक हो जाता है। इसीलिये महामण्डल के एम्ब्लम में गोलाई के बाकी बचे हिस्से को छोटे छोटे 'वज्र' अर्थात इसी प्रकार के थण्डर बोल्ट तुल्य निःस्वार्थी मनुष्य की शृंखला से सम्पुटित (एनकेप्स्युलेट-encapsulate) किया गया है।   
महामण्डल का ध्वज : बंगाल में आविर्भूत हुए इस निःस्वार्थी-मनुष्य निर्माणकारी आंदोलन को, भारतवर्ष के सभी राज्यों तक फैला देने के लिये एक ऐसे ध्वज की आवश्यकता महसूस हुई,जो भारत-वासियों को भारत के राष्ट्रिय आदर्श -'त्याग और सेवा' के लिए अनुप्रेरित करने में समर्थ हो। ऐसे पताका के बारे में विचार करते करते नवनी दा के मन में विचार आया कि (भगिनी) निवेदिता ने तो स्वाधीन भारत के लिये एक पताका का निर्माण किया था। और उसी गेरुआ कपड़े के बीच दधीचि के हड्डी से बने वज्र के निशान वाले पताका को हमलोगों ने महामण्डल ध्वज के रूप में ग्रहण कर लिया! इसीलिये महामण्डल का जय-घोष है : " निवेदिता वज्र हो अक्षय ! "
ये सारे कार्यक्रम इस समय भारत के १२ राज्यों में ३१५ से भी अधिक केन्द्रों के माध्यम से चल रहे हैं। क्या यही कम बड़ी उपलब्धी है! यही तो है स्वामीजी का कार्य ! दादा ने 'जीवन नदी के हर मोड़ पर ' पुस्तक में लिखा है, " इस ध्वज के निर्मित होने के पीछे भी स्वामीजी की एक उक्ति का स्मरण हो उठता है! एक बार स्वामीजी से किसी ने प्रश्न किया था- स्वामीजी, आपने इतना कुछ किया है, किन्तु भारत की स्वाधीनता के लिये आपने क्या किया है ? स्वामीजी कहते हैं- " मैं तिन दिनों के भीतर ही भारतवर्ष को स्वाधीनता दिला सकता हूँ।  किन्तु चरित्रवान मनुष्य भारत में कहाँ हैं रे ?  उस स्वाधीनता को अक्षुण कौन रखेगा ? पहले (निःस्वार्थी) मनुष्य तैयार करो !" (भारतवर्षेर स्वाधीनता आमी  तीन दिनेर मध्येई एने फेलते पारि| किन्तु भारते मानुष कोथाय रे ? से स्वाधीनता राखबे के?)  दादा ने लिखा है, "यह मुझे नहीं पता कि , स्वामी जी की उसी उक्ति से प्रेरणा प्राप्त करके निवेदिता ने स्वाधीन भारत के लिए, भारत के राष्ट्रीय-आदर्श के अनुरूप  पताका की रुपरेखा तैयार की थी य़ा नहीं ? " 
महामण्डल का ऐन्थम : महामण्डल का 'संघ-मन्त्र' है- " हे जना:! सं गच्छध्वम्, सं वदध्वम् !" जिसका हिन्दी भाव है- (हे मनुष्यों) मिलकर चलो । मिलकर बोलो । तुम्हारे मन एक प्रकार के विचार करें । जिस प्रकार प्राचीन देवगण (विद्वान् लोग) एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, (उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग ग्रहण करो) ।इस प्रकार हम अपने सारे निर्णय एक मन हो कर ही करेंगे,क्योंकि देवता लोग एक मन रहने के कारण ही असुरों पर विजय प्राप्त कर सके थे । 
अर्थात एक मन बन जाना ही समाज-गठन का रहस्य है ......कैसा अनोखा मन्त्र है.' संजयान ' हो उठना का तात्पर्य है, 'साम्य-भाव' में जाग उठना, और एकमत (अविरोध में स्थित) हो जाना ! यह एन्थम भी स्वामीजी ने ही ऋग्वेद से उद्धृत किया था ! 
 सं गच्छध्वं सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम् ।
                    देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ।।- ऋग्. १०.१९१.२
हिंदी अर्थ- (हे मनुष्यों) मिलकर चलो । मिलकर बोलो । तुम्हारे मन एक प्रकार के विचार करें । जिस प्रकार प्राचीन देवगण (विद्वान् लोग) एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग ग्रहण करो। यही वैदिक साम्यवाद है ! 
महामण्डल की दृष्टि: में आधुनिक युग में इस वैदिक साम्यवाद को स्थापित करने प्रथम युवा नेता, 'अवतार वरिष्ठ'  श्रीरामकृष्ण परमहंस हैं। वे आधुनिक युग के वैसे पहले जन-नेता हैं, जो मानवमात्र को, सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों को अपने हृदय के अन्तस्तल से प्रेम करते हैं। उनके जीवन में सम्पूर्ण साम्य प्रतिष्ठित हुआ है, इसी लिये वे समस्त मानव-जाति, समस्त जीवों, यहाँ तक की जड़ वस्तुओं के साथ भी अभिन्नता का साक्षात्कार करते हैं । उनके जीवन में प्रतिष्ठित पूर्ण साम्य -पोलिटिकल पार्टीज के द्वारा मंच पर खड़े होकर, भाषण में कहने वाला साम्य नहीं है, अपितु उन्होंने इसे अपने आचरण में उतार कर दिखा दिया है। (देवघर का उदाहरण, दो माँझी के झगड़े का उदाहरण, दूब पर चलने से छाती लाल) उन्होंने जन-साधारण के, दीन-दुःखीयों के दारुण दुःख से द्रवित होकर -जनसाधारण की मुक्ति के लिए प्रयास किया है, उन्हें संगठित करने की चेष्टा की है।
रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के अनुसार महामण्डल भी किसी प्रकार के संकीर्ण-मतवाद या धार्मिक कट्टरता का पक्षधर नहीं है। क्योंकि, स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस  कहते थे - " जितने मत उतने पथ'! संसार के सारे धर्म उसी एक अल्ला-ईश्वर या गॉड तक पहुँचने के अलग-अलग मार्ग हैं ! जिसको जो मार्ग अच्छा लगता है, वह उसी मार्ग से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। जैसे एक तालाब के चार घाट से पानी लेकर अपनी अपनी रूचि के अनुसार कोई वाटर कोई एक्वा, कोई पानी या कोई जल भी कह सकता है।" 
इसीलिये महामंडल भी किसी प्रकार की संकीर्णता या मतान्धता-- अर्थात मुझे केवल अमुक विशेष नाम (ब्रांड) वाले धर्म को चुनना पड़ेगा, दूसरे नाम वाले को नहीं;-- में विश्वास नहीं करते थे।  स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं कहा था कि -' मुझे ही देख लो, मैं मुसलमानों के प्रति कोई घृणा नहीं रखता, क्रिश्चियन लोगों से भी कोई घृणा नहीं करता, मैं तो सबों को ग्रहण करता हूँ ! कहो तो क्यों ? क्योंकि मैंने श्रीरामकृष्ण देव के चरणों में बैठकर शिक्षा प्राप्त की है। ' 
और ठीक उसी वेदान्त धर्म की शिक्षा के अनुसार वे कहते हैं -'मेरे पास जो कोई भी आयेगा, मैं उसके धर्म को लेकर कोई भेद-भाव नहीं रखूँगा। चाहे वह हिन्दू, हो मुसलमान हो, या पारसी हो, क्रिश्चियन हो, जैन हो, बौद्ध हो या सिक्ख हो - मैं किसी भी धर्म के प्रति विद्वेष का भाव नहीं रखता।' किन्तु, आधुनिक वैज्ञानिक युग में कुछ लोग विज्ञान की कसौटी पर कसे बिना किसी अज्ञात ईश्वर में विश्वास नहीं भी कर सकते हैं; इसीलिये स्वामी जी इतना ही कह कर नहीं रुकते, वे आगे कहते हैं,  " यदि तुम ईश्वर में विश्वास नहीं भी रखते हो, तब भी तुम मेरे सन्देशों को सुन सकते हो ! तुम बौद्ध हो, क्रिश्चियन हो कि मुसलमान हो -जो भी हो वही रहो, वही होने के बाद भी मैं तुम सबों को ग्रहण करूँगा। केवल इतना ही नहीं यदि तुम किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखते हो, तब भी मेरे हृदय में तुम्हारे लिए स्थान है !'

 स्वामी जी कहते हैं - वह कौन सी वस्तु है जो सभी मनुष्यों को अपना मानकर स्वीकार कर लेती है, किसी को पराया नहीं समझती ?' जो वस्तु सबों को अपना मानकर ग्रहण कर सकती हो, उसी का नाम है - वेदान्त ! वह वेदान्त क्या है ? स्वामी जी कहते हैं -" एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है- मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरुप में जानना, और उनका सन्देश है कि यदि तुम अपने भाई मनुष्य की, उपासना नहीं कर सकते तो उस ईश्वर की कल्पना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है ? " ( ८/३४) 
स्वामी जी एक पत्र में कहते हैं - " वेदान्त -केसरी गर्जना करे, सियार अपने बिलों में छिप जायेंगे !" 
'लेट दी लायन ऑफ़ वेदान्ता रोर, ऐंड दी फॉक्सेज विल फ्लाई टू देयर होल्स!'

-अर्थात अपनी अन्तर्निहित दिव्यता (निःस्वार्थपरता) को प्रकट करो, सारे भारत के विस्तृत क्षेत्र में उसे ढाल दो, और उसके चारो ओर सब कुछ समन्वित होकर विन्यस्त हो जायेगा। श्री ठाकुर, माँ सारदा देवी और स्वामी जी से यही प्रार्थना है, कि इस शिविर में उपस्थित २००० युवाओं में से कम से कम १०० युवा ब्रह्म तेज और क्षात्रवीर्य से सम्पन्न वेदांत केसरी बनें ! 
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