Friday, January 15, 2016

" महामण्डल का स्वरुप एवं कार्य "

' महामण्डल के आविर्भूत होने की अनिवार्यता'  
महामण्डल किस प्रकार की संस्था है ? क्या यह कोई धार्मिक संगठन है ? या फिर यह सांस्कृतिक, समाज- सेवी या कोई शैक्षणिक संस्थान है ? इस संस्था के साथ स्वामी विवेकानन्द का नाम क्यों जोड़ा गया है? जब पहले से स्वयं स्वामी विवेकानन्द के द्वारा स्थापित 'रामकृष्ण मिशन ' है ही, जो उन्हीं के बताये आदर्शों  के अनुरूप कार्य करता है, तो उसी तरह के किसी दूसरे संगठन की आवश्यकता ही क्या थी ? आज तो कई राज्यों में इसके कितने सारे आश्रम हैं, जिनमें से कुछ आश्रम मिशन के द्वारा अनुमोदित हैं, और कुछ अनुमोदित नहीं हैं; किन्तु वहाँ भी नित्य-नियमपूर्वक श्रीरामकृष्ण देव, माँ सारदा देवी और स्वामी विवेकानन्द की पूजा-अर्चना होती है, संध्या में श्रीरामकृष्ण -आरात्रिक भजन गाये जाते हैं। उन आश्रमों से उनके भावों को प्रचारित करने के लिये नाना प्रकार के प्रयास होते ही रहते हैं, इसके साथ साथ उनके द्वारा कई प्रकार के समाजसेवा कार्य भी चलते रहते हैं। अधिकतर आश्रमों के साथ बहुत से वयस्क लोग तो जुड़े हैं हैं, और युवा लोग वहाँ नहीं हैं, ऐसी बात भी नहीं है। इतना कुछ होने के बाद भी महामण्डल को स्थापित करने की क्या आवश्यकता थी ? 
अभी से ५० वर्ष पूर्व, १९६७ में महामण्डल की स्थापना क्यों हुई होगी ...? इस प्रश्न का उत्तर, आज महामण्डल के स्वर्ण-जयन्ती वर्ष २०१६ में  हमारे सदस्यों के जीवन को देखकर समझा जा सकता है, जिनमें से कुछ तो इसकी स्थापना के समय से जुड़े हैं और कुछ ३०-४० वर्ष से तो कुछ ५-१० वर्षों से जुड़े हैं! इस महामण्डल से जुड़ने के बाद और जुड़ने के पहले के जीवन में तुलना करने पर सभी अपने-आप को भाग्यवान समझते हैं, और सोचते हैं, यदि यहाँ नहीं आये होते तो दूसरे कई लोगों की तरह हमारा जीवन भी व्यर्थ में (आहार-निद्रा-भय-मैथुन में) नष्ट हो गया होता। जब यह संस्था १९६७ में स्थापित हुई थी, उस समय तक सम्पूर्ण भारतवर्ष के युवाओं के जीवन को गठित करने के उद्देश्य से, विशेष कर स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त चरित्र-निर्माण की पद्धति के अनुरूप और कोई दूसरा 'युवा-संगठन' भी बना हो, इसकी जानकारी हमें नहीं है। आज हम सुनते हैं सम्पूर्ण विश्व में युवाओं की सबसे अधिक आबादी भारत में है - लगभग ८० करोड़ युवा हैं, किन्तु उन्हें मन को एकाग्र करने और चरित्र-निर्माण करने की व्यवहारिक पद्धति को सरल भाषा में समझा देने के लिये भारत के १२ राज्यों में महामण्डल के ३१६ केन्द्र कार्य रत हैं। किन्तु जब हमलोग युवा थे, हमारे युवा आदर्श कौन हैं और (बापू और चाचा क्यों थे ), इसका हमें कुछ पता नहीं था, पर आज के युवाओं के समक्ष वैसी असमंजस की स्थिति नहीं है। आज तो स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस -१२ जनवरी, राष्ट्रीय युवा दिवस है। 
यह सब देखकर यह स्पष्ट हो जाता कि -" एक ऐतिहासिक अनिवार्यता थी, जिसके कारण महामण्डल को आविर्भूत होना पड़ा ! " इसे प्रमाणित करने के लिये इतिहास के किसी विशेष तथ्य को स्वीकार करने का प्रश्न बहुत ज्यादा है, वैसा भी प्रतीत नहीं होता। किन्तु, इस तथ्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि, ऐतिहासिक अनिवार्यता जैसी कोई वस्तु होती अवश्य है !! यदि हम अपनी स्मरण शक्ति पर थोड़ा जोर डालें तो यही ध्वनि हमें गीता से निकलती हुई सुनाई देगी  - 
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
           अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४/ ७ ॥ 
हे भारत ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूपको रचता हूँ (अर्थात् साकाररूपसे प्रकट होता हूँ) । ठीक इसी तरह की बात दुर्गा सप्तशती में भी कही गयी है -
“ॐ इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
                                     तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्ॐ।।”
(अ॰११, श्लो॰५५)
इसका अर्थ है, जब-जब दानवों द्वारा जगत को बाधा पहुंचेगी, तब-तब मैं अवतार धारण कर शत्रुओं का नाश करूंगी। इसी को कहते हैं -ऐतिहासिक अनिवार्यता ! जिस समय धर्म अपने स्थान से च्युत हो जाता है, तामसी, आसुरी एवं दुष्ट लोग प्रबल होकर, सात्त्विक, उदार एवं धर्मनिष्ठ व्यक्तियों को अर्थात साधकोंको कष्ट पहुंचाते हैं, तब इस प्रकार के एक आविर्भाव की आवश्यकता होती है। भारतवासी यह जानते हैं कि ऐतिहासिक समयचक्र के घूर्णन पथ में इस तरह की अनिवार्यता बार-बार दृष्टिगोचर हुई है। जिस समय धर्म अपने स्थान से च्युत हो जाता है, अधर्म का सिर ऊँचा उठ जाता है, उस समय धर्म को पुनः स्थापित करने के लिये एक महान आविर्भाव अनिवार्यता बन जाती है। 
वह चाहे अवतार के द्वारा हो या जैसे भी हो, एक विशिष्ट भाव मूर्तमान होता अवश्य है। इस युग में श्रीरामकृष्णदेव, माँ सारदा देवी और स्वामी विवेकानन्द के रूप में वही भाव मूर्तमान हुआ है । हमारी दृष्टि में श्रीरामकृष्णदेव ही इस युग के प्रथम युवा नेता हैं, जननेता हैं, मानवप्रेमी हैं -जो मानवमात्र को हृदय से प्रेम करते हैं । जिनके जीवन में पूर्ण साम्य प्रतिष्ठित हुआ है, जो समस्त पृथ्वी के मनुष्यों को हृदय के अन्तस्तल से प्रेम करते हैं, समस्त जीवों यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं के साथ भी जिन्होंने अभिन्नता का साक्षात्कार किया है। उनके जीवन में प्रतिष्ठित पूर्ण साम्य राजनैतिक दलों के मंच पर खड़े होकर साम्यवाद पर भाषण देने वाला साम्य नहीं है। अपितु उन्होंने इस साम्य को उन्होंने अपने आचरण से भी उतार कर दिखा दिया है। उन्होंने इन्हीं जनसाधारण दिन-दुःखियों के दारुण दुःख से द्रवित होकर जनसाधारण की मुक्ति के लिये युवाओं को संगठित करने की चेष्टा की है। इस तथ्य को समझने के लिये श्रीरामकृष्णदेव के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द के उद्गारों का विशेषरूप से अध्यन करना आवश्यक है। 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि अब भी श्रीरामकृष्णदेव ही युवाओं को संगठित करने की चेष्टा कर रहे हैं, सभी लोगों को अनुप्रेरित कर रहे हैं, किन्तु युवाओं को अधिक संख्या में आकर्षित कर रहे हैं। उनका लक्ष्य युवाओं को, विशेष कर छात्रों को आकर्षित करना था। स्वामी विवेकानन्द तब का नरेंद्र स्वयं इस बात के प्रमाण हैं । इसको स्वीकार भी करते हैं, हमलोग भी देख सकते हैं। अपनी व्यक्तिगत इच्छा की परिपूर्ति हेतु नरेन्द्र कालीमाता के मंदिर में गये। मंदिर की पवित्रता, तेजस्विता, उदात्तता का प्रभाव ऐसा रहा की सब कुछ भूलकर मुख से शब्द निकले, ‘माँ, मुझे भक्ति दो, विवेक दो, वैराग्य दो, ज्ञान दो ' महामण्डल  का भी ऐसा ही प्रभाव अनेकों की अनुभूति का विषय है। 
ठाकुर ने स्पष्ट रूप से अनुभव किया था कि मेरे अति अल्प जीवनकाल में मैं जितना कर सकता था, कर दिया। किन्तु अब उसके बाद जो वास्तविक कार्य है, वह यही है कि जितना शीघ्र हो सके कुछ युवाओं के जीवन को इस प्रकार गठित कर देना होगा कि वे इस नवनी-दृष्टी (मैं नहीं, आप ) को थोड़े समय में ही सारे विश्व में दावानल की तरह फैला देने में सक्षम हो जायेंगे। और वैसा करने के बाद उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया और स्वामी जी ने भी उनके द्वारा सौंपे हुए कार्य को पूरा कर दिखाया।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवन के उद्देश्य के विषय में कई स्थानों पर कई प्रकार से कहा है। एक स्थान पर वे कहते हैं, " युवाओं को संगठित करना ही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। " किन्तु आजीवन प्रयत्न करने पर भी वे केवल मुट्ठी भर युवाओं को ही श्रीरामकृष्णदेव के झण्डे तले एकत्र कर सके थे। किन्तु, उसी समय भविष्यवाणी करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - "a few have jumped into the breach they are only a few. a few thousands are necessary and they will come." यही जो " They will come." की भविष्यवाणी है -वैसे युवा कहाँ से आयेंगे ? यह युवा दल तो रामकृष्ण मिशन के माध्यम से भी संगठित हो सकता है किन्तु जो युवा रामकृष्ण मिशन में अपना योगदान देंगे, उनके जीवन का ध्येय होगा - 'आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च ' (अपने मोक्ष और संसार के हित के लिये) किन्तु, कितने युवा अभी ऐसे हैं जो चार पुरुषार्थों में से अंतिम पुरुषार्थ 'मोक्ष' का चयन कर मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं ? और इसी कारण वैसे अधिकांश युवा जिन्हें स्वामी विवेकानन्द श्रीरामकृष्णदेव के झण्डे तले एकत्रित करना चाहते थे, वे इस चरित्र-निर्माण और मनुष्य बनो और बनाओ आन्दोलन  के बाहर ही छूट जायेंगे। 
किन्तु स्वामीजी का कहना था कि 'मानवमात्र ही अव्यक्त ब्रह्म है' -इसलिये चरित्र के गुण-दोष या प्रोपेन्सिटीज के आधार पर जो युवा गृहस्थ-आश्रम में जाना चाहते हों, उन्हें वे इस आन्दोलन से बहिष्कार (exclusion) करने योग्य  नहीं मानते थे । सभी तरह के लोगों को अंगीकार करना होगा। यही जो सभी तरह की प्रकृति (प्रोपेन्सिटी) रखने वाले व्यक्तियों को उनकी दुर्बलता के साथ ग्रहण करके , उन्हें भी प्राथमिक रूप से सरलभाषा में स्वामी जी की शिक्षाओं को सुनाने का काम  है, उस काम को करेगा कौन ?  
दावानल की तरह कोने कोने में सर्वत्र जा-जाकर ग्रामों, शहरों, शिक्षितों, अशिक्षितों, छात्रों, नौकरी पेशा में संलग्न या बेरोजगार युवाओं के पास स्वामी जी के उपदेशों को लेकर जायेगा कौन ? जिनको धर्म, मंदिर, मठ तथा संन्यासी की छाया भी देखने को नहीं मिलती उन्हें सुनायेगा कौन ? केवल सुनायेगा ही नहीं उन्हें स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं से प्रभावित कर इस आदर्श को पूरा करने के काम में खींचेगा कौन ? क्योंकि इस 'बनो और बनाओ' आन्दोलन में उतरने से ही तो अपना चरित्र गठित होगा, और लोकशिक्षकों (नेता ) का निर्माण लाखों की संख्या में करना होगा जो चरित्र-निर्माण की पद्धति (खुली आँखों से ध्यान ओपन-आइड मेडिटेशन करने की विद्या) को भारत के गाँव-गाँव तक पहुँचा देंगे और देश की उन्नति होगी।
इसी प्राथमिक कार्य को करने की जिम्मेदारी को महामण्डल ने आगे बढ़ कर स्वयं अपने कन्धों पर उठा लिया है। इसीलिये बार बार कहा जाता है कि महामण्डल एक प्राथमिक-पाठशाला है। जो लोग आध्यात्मिक जीवन में उन्नत होते जायेंगे, उनके लिये उच्च विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि तो पहले से बने हुए हैं। स्वामी विवेकानन्द की कल्पना के अनुसार रामकृष्ण मिशन इसी प्रकार का एक विश्वविद्यालय है। किन्तु विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से पहले महाविद्यालय की पढाई पूरी करनी होगी, महाविद्यालय की डिग्री पाने के लिये, एन्ट्रेंस की परीक्षा होती है, जिसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता का प्रवेश-प्रमाणपत्र कहा जाता है, उसको भी पाना अनिवार्य है। किन्तु एन्ट्रेंस में दाखिला लेने से पहले वर्णमाला से परिचय होना भी तो आवश्यक होता है, और उसी वर्णमाला से युवाओं को परिचित करा देना महामण्डल का दायित्व है। अतः कहा जा सकता है कि महामण्डल वह प्राथमिक पाठशाला है, जहाँ 'मनुष्य जीवन' को प्राप्त करने के लिये -अ-आ, क-ख  सीखा जाता है। अ-आ,क-ख (प्रार्थना, मनःसंयोग, व्यायाम , स्वाध्याय, विवेक-प्रयोग) समाप्त कर लेने के बाद महामण्डल की जिम्मेवारी समाप्त हो जाती है। उसके बाद शास्वत-नश्वर का विवेक और आत्मश्रद्धा जाग्रत हो जाने के बाद शाश्वत-जीवन को पाने के अनेक मार्ग हैं। जो जिस मार्ग से होकर शाश्वत जीवन को प्राप्त करना चाहें, वे उस राह से जा सकते हैं। 
महामण्डल किसी प्रकार की संकीर्णता का पक्षधर नहीं है। स्वामी जी किसी प्रकार की  धार्मिक कट्टरता या संकीर्ण मतवाद में विश्वास नहीं करते थे, हमलोग भी सभी धर्म-सम्प्रदायों के साथ अविरोध की भावना रखते हैं, और सभी धर्म-जाति के मनुष्यों को स्वीकार करने की इच्छा रखते हैं। ठाकुर,माँ, स्वामी जी भी यही चाहते थे कि किसी व्यक्ति को उसके खान-पान या चारित्रिक -गुणदोषों के आधार पर कमतर समझकर उसका वहिष्कार नहीं करना चाहिये। श्रीरामकृष्ण से प्राप्त शिक्षा के आलोक में स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं कहा है, 'मुझे ही देखलो , मैं मुसलमानों के प्रति कोई घृणा नहीं रखता, क्रिश्चियन लोगों से भी घृणा नहीं करता, मैं तो सबको ग्रहण करता हूँ; कहो तो क्यों ? क्योंकि मैंने श्रीरामकृष्णदेव के चरणों में बैठकर शिक्षा प्राप्त की है। ' इसी धारणा के अनुसार उन्होंने अन्यत्र कहा है, ' मेरे पास जो कोई आयेगा मैं उसके धर्म को लेकर कोई भेद नहीं रखूँगा। चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान हो, पारसी हो या क्रिश्चियन हो, जैन हो या बौद्ध हो -मैं किसी भी धर्म के प्रति भेद-भाव नहीं रखता हूँ। ' किन्तु स्वामीजी इतना कहकर ही रुक नहीं गये, यदि वे रुक जाते तो हमलोग सोच सकते थे कि शायद स्वामीजी की दृष्टि में कुछ अन्य मनुष्य जो किसी धर्म को नहीं मानते, वहिष्कार करने योग्य होंगे। वे आगे कहते हैं, ' तुम यदि ईश्वर में विश्वास नहीं भी रखते हो, तब भी तुम मेरी बातों को सुन सकते हो। ' इसी बिन्दु पर पहुँच कर स्वामी जी --'स्वामी जी ' हो जाते हैं। 'तुम बौद्ध हो, क्रिश्चियन हो, कि मुसलमान हो, जो भी हो वही रहो, वही होने के बावजूद मैं तुम सबको ग्रहण करूँगा। केवल इतना ही नहीं तुम यदि किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखते हो तो भी तुम्हारे लिये मेरे हृदय में स्थान है।
 ' जो सभी को अपने भीतर ग्रहण कर सकती है, उसीका नाम है-वेदान्त। वह वेदान्त क्या है ? इसके ऊपर भी महामण्डल में कई बार चर्चा हो चुकी है। क्योंकि स्वामी जी उसी धर्म, उसी वेदान्त की भित्ति पर, सम्पूर्ण विश्व के सभी मनुष्यों को ग्रहण करना चाहते हैं, और महामण्डल भी यही प्रयास कर रहा है कि यहाँ सभी जाति-सम्प्रदाय के युवाओं को ग्रहण कर लिया जाय। इसीलिये यहाँ प्रवेश पाने के लिये अलग अलग प्रकार के धर्मों का पालन करने की कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींची गयी है, और छोटे छोटे धार्मिक आचार-अनुष्ठानों का पालन करने की भी कोई बाध्यता नहीं है।
 किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि यदि कोई किसी प्रकार के धार्मिक आचार-अनुष्ठान का पालन करता है, तो हम उसको बुरा कहकर उसकी निन्दा करते हैं। किन्तु, विचारणीय प्रश्न यह है कि  जो युवा किसी भी धार्मिक कर्म-काण्ड में विश्वास नहीं रखते हैं, वे कहाँ जायेंगे? क्या स्वामी जी के पास उन्हें देने के लिये कोई सन्देश नहीं है ? उनके प्रति क्या स्वामी जी का कोई उपदेश नहीं है ? उनके प्रति क्या कोई उत्साहवर्धक उपदेश स्वामी जी ने नहीं दिया है ? सर्वत्र सभी प्रकार के विचार रखने वाले मनुष्यों के पास , यदि स्वामी जी की शिक्षाओं को नहीं फैलाया जायेगा, यदि सबों में अन्तर्निहित अनंत-शक्ति और असीम संभावनाओं को विकसित करने की पद्धति उन्हें नहीं बताई जाएगी तो सभी के हृदय में जो प्रेम की ज्योति जल रही है, उसका प्रकाश बाहर कैसे आएगा ? स्वामीजी तो मानव-मात्र को मोह-निद्रा से जगाना चाहते थे, वे सभी अपनी अंतर्निहित दिव्यता के संबंध में जाग्रत कैसे होंगे ? सभी प्रकार के युवा एक साथ सम्मिलित और संगठित होकर एक निश्चित स्थान और समय पर सबों को मोहनिद्रा से जाग्रत करने का प्रयास करें-इसी प्रयास को फैलाते जाने महामण्डल के साप्ताहिक पाठचक्र का उद्देश्य है। 
किसी धर्मविशेष की वेशभूषा या चिन्ह में विश्वास, भक्ति या श्रद्धा के आधार पर भेदभाव किये बिना स्वामी विवेकानन्द की अमोघ वेदान्त वाणी को जनसाधारण के द्वार द्वार तक पहुँचाये बिना क्या हमारी मातृभूमि अपनी खोई हुई गरिमा को पुनः प्राप्त कर सकती है ? क्या हमारे देश के युवा वेदान्त के जयघोष को समझे बिना आत्मविश्वासी बनकर कभी अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं ? आज हमारे देश के युवा उच्च डिग्रियाँ प्राप्त करके भी रीढ़-विहीन क्यों दिखाई पड़ते हैं ? देशवासियों की नैतिकता के मापदण्ड में अधोगति जिस तीव्रता से घटित होती दिख रही है, शिक्षा को मूल्यपरक बनाकर शिक्षापद्धति में चरित्र-निर्माण और नैतिक मूल्यों को प्रविष्ट कराने प्रबल अनिवार्यता को देखकर भी जीवन के चार पुरुषार्थ एवं चार आश्रमों के ऊपर एक भी चैप्टर स्कूल के कोर्स में नहीं पढ़ाया जाता है। उसके परिणाम को देखकर भी सरकार द्वारा कोई प्रयास होता दिख नहीं रहा है। पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति को अपना लेने से 'कामिनी-कांचन ' भोग की स्पर्धा की जो सर्वग्रासी छाया युवा-वर्ग को निगल लेने को आतुर है, इन सबसे युवाओं को बचा लेने का जो एकमात्र पथ -'BE AND MAKE ' है, उस पथ की जानकारी ,लोकशिक्षकों का निर्माण किये बिना -उनतक कौन पहुँचायेगा ? 
हो सकता है, सभी युवा प्रचलित धर्मों में विश्वास नहीं भी रखते हों, पूजा-पाठ नहीं समझते हों (शनिदेव पर तेल नहीं भी चढ़ाते हों)। किन्तु, जो लोग धार्मिक होने का दावा करते हैं, पूजा-पाठ में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, उनमें से भी क्या सभी लोग पूजा तथा धर्म के अर्थ को ठीक ठीक समझते हैं ? आज के समाज में तो ईश्वर विद्वेषी, धर्म विद्वेषी लोगों को भी पूजा-कमेटी का सेक्रेटरी बनते और और लोगों से जबरन चन्दा माँगकर पूजा करते देखा जा रहा है, क्या इसको हम पूजा कह सकते हैं ? इस तरह की हठधर्मिता को धर्म मानकर स्वामीजी की शिक्षाओं को किसी वर्ग-विशेष तक ही क्यों सीमित रखना चाहिये ? जिसके भी हृदय में यह दृढ विश्वास हो कि स्वामी विवेकानन्द की शक्तिदायी वाणी को जो कोई भी एक बार सुन और समझ लेगा, वह व्यक्ति अपनी अन्तर्निहित अनंत शक्ति और सम्भावना के विषय में अवश्य जागृत हो जायेगा; वह मनुष्य कैसे स्वामी जी की शिक्षाओं को किसी वर्ग-विशेष या गोष्ठी की सामग्री बनाकर कैसे रख सकेगा ? वह किस प्रकार पञ्चांग से विशेष-तिथि को देखकर स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस पर उनकी शिक्षाओं और उपदेशों पर एक विचार-गोष्ठी का दिन तय करेगा, और वर्ष के बाकि दिनों में येन-केन प्रकाररेण संसार के भोगों को अर्जित करने की होड़ में लगा रहेगा ? इस प्रकार के दिखावटी धर्म में जिन की आस्था नहीं होगी, वे युवा निश्चित रूप से महामण्डल के चरित्र-निर्माण आन्दोलन में अपना सहयोग देने के लिये आगे आयेंगे। 
भारत को उसकी कुम्भ-कर्णी निद्रा जाग्रत करना होगा, किन्तु उसे कोसते हुए नहीं, बल्कि उसे जगाना होगा -प्राणप्रद, अशाप्रद, जीवनप्रद, शक्तिप्रद, कर्मदक्षताप्रद -वेदान्त की अमोघ वाणी को सुनाकर। महामण्डल से लीडरशिप ट्रेनिंग प्राप्त युवा लोक-शिक्षकों को वह वेदान्त वाणी जनसाधारण को केवल सुनाना ही नहीं होगा बल्कि अपने जीवन को ही उदाहरण रूप में गठित कर के उन्हें मनन और निदिध्यासन करने के लिये भी अनुप्रेरित करना होगा। अपने जीवन को सार्थक करने और दूसरों को भी अपना जीवन सार्थक बनाने के लिये अनुप्रेरित करना -इसी एकमात्र कर्म में लग जाने के लिये महामण्डल को आविर्भूत होना पड़ा है। विशेषकर युवाओं को इस कार्य  उदबुद्ध करने के लिये  महामण्डल का जन्म हुआ है। इसीलिये महामण्डल का आदर्श वाक्य है -" स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्यत्व अर्जित करने में सहायता करो। " स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त भारत निर्माण-सूत्र 'BE AND MAKE' को दावानल की तरह भारत के कोने कोने तक पहुँचा देना ही महामण्डल का लक्ष्य है। क्योंकि जब तक देश में सच्चे और निःस्वार्थी मनुष्यों का अभाव रहेगा, तब तक राष्ट्र निर्माण की कोई भी परिकल्पना पूर्णतया सफल नहीं होगी। राजीव गाँधी कहते थे केवल १५ % ही सफलता मिलती है। अतः एक सार्थक मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी युवा-आन्दोलन को निरन्तर जारी रखना ही महामण्डल का मुख्य कार्य है। 
किसी बड़े अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के द्वारा स्वामी विवेकानन्द के जीवन और सन्देशों को देश में सर्वत्र छोटे-छोटे ग्रामों, कस्बों, और शहरों तक पहुँचा देना सम्भव नहीं है; इसीलिये महामण्डल छोटे- छोटे केन्द्र स्थापित कर सर्वत्र फ़ैल जाना चाहता है। इस महान कार्य को करने में हमारी भूमिका श्रीरामचन्द्र के 'सेतु-बान्ध रामेश्वरम ' में उस छोटी सी गिलहरी के सदृश है, जो अपनी छोटी सी अंजलि में बालू भर-भर कर बाँध पर डालती जाती थी। अन्य सामाजिक संगठनों में समान उद्देश्य रहने से भी संगठन की समस्त शाखाओं के सदस्यों के बीच भावनात्मक बन्धन का अभाव होता है, किन्तु महामण्डल के केन्द्रों में चाहे वे भारत के किसी भी कोने में क्यों न हों भ्रातृत्व का ऐसा भावनात्मक बन्धन रहता है, जिससे सभी सदस्यों को सिद्धान्त और व्यवहार में समन्वय बनाये रखने का विशेष सुयोग प्राप्त होता है। जहाँ अन्य कोई संस्था विशेष रूप से युवाओं के लिये ही गठित नहीं हुई है, वहाँ युवा-महामण्डल विशुद्ध रूप से युवकों का ही संगठन है। और यह युवकों से, उन्हीं की भाषा में स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को सुनाना चाहता है। यहाँ भी वही आध्यात्मिकता है, वही वेदान्त है, वही सेवा है, वही श्रीरामकृष्ण, माँ सारदा देवी और स्वामी विवेकानन्द हैं, किन्तु महामण्डल युवकों के पास उनकी शिक्षाओं को बहुत सरल और बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत करता है। 
उन्हें इन बातों को इतने सरल ढंग से कहा जाता है, जिसे सुनकर उन्हें समझने में तो कोई कठिनाई हो ही नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानन्द के समस्त उपदेश उन्हें अपने जीवन और आचरण में उतारने योग्य लगें, महामण्डल इन बातों को युवाओं के समक्ष उतनी ही सरल भाषा में प्रस्तुत करना चाहता है। इस दृष्टि से विचार करने पर यह देखा जा सकता है कि विगत ५० वर्षों से श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त भावधारा को राष्ट्र के कल्याण के लिये चरित्र-निर्माण के कार्य को एक आन्दोलन का रूप देने  में बहुत अल्प ही सही, किन्तु महामण्डल की भी एक भूमिका अवश्य रही है। इस लघु भूमिका द्वारा प्राप्त बीज की परिणति जब एक दिन विराट वृक्ष के रूप में दिखाई देगी, तब महामण्डल सभी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। 
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'महामण्डल' की अन्य शाखायें :  'सारदा नारी संगठन' एवं 'विवेक-वाहिनी'  
(बचपन से बालक-बालिकाओं ‘मैं नही, तू' का अनोखा संस्कार देते हैं !)
स्वामी विवेकानन्द माँ सारदा देवी को माता सीता के रूप में और अपने गुरु श्रीरामकृष्ण देव को भगवान श्रीराम के रूप में देखते थेउनका दृढ़ विश्वास था कि सीता जैसी स्त्री के सहयोग जीवन से ही श्री राम की निर्मिती हुई थी, ठीक उसी प्रकार माँ सारदा देवी के सहयोग से ही श्रीरामकृष्ण देव जगदगुरु रूप में निर्मित हो सके थे अतः महिलाओं-युवतियों को अपने सामने सदैव प्राचीन युग की माता सीता और वर्तमान युग की माँ सारदा को ही नारी-जाति का आदर्श मानना चाहिए। 
महामण्डल तथा उसकी सहयोगी संस्थाओं में भी यही सिखाया- समझाया जाता है कि 'माँ सारदा देवी, श्रीरामकृष्ण देव और स्वामी विवेकानन्द ' को भी केवल श्रीराम और माता सीता और हनुमान जी की मंदिर में मत बंद करो, उन्हें भी उन्हीं की तरह भगवान समझकर केवल उनकी पूजा ही मत करते रहो।  बल्कि 'ठाकुर' को राष्ट्रीयपुरुष-शक्ति, माँ को राष्ट्रीयस्त्री-शक्ति, और स्वामीजी को राष्ट्रीय युवाशक्ति के आदर्श उदहारण हैं , वे तीनों बेलपत्र के तीन पत्ते के सदृश हैं, उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, हमें तीनों को केवल पूजना नहीं चाहिये, हमें उन तीनों का यथासंभव -अनुसरण और अनुकरण करना चाहिये । 
महिलाओं की स्थिती, उनके ऊपर लादे गये बंधन, अपहरण, अत्याचार के समाचार आये दिन टीवी और पेपर में हमलोग स्वयं देख सकते हैं। किन्तु महामण्डल के संपर्क में आने के बाद धीरे-धीरे जीवन पद्धती में परिवर्तन होने लगता है । स्त्री-परुष शरीर की ओर देखने का दृष्टीकोण बदलने लगती है, उन्हें पढने-लिखने के साथ साथ यथार्थ मनुष्य बनने, अपने अपने सच्चे स्वरूप को 'डिटेक्ट' करने और मनुष्य बनाने, अर्थात दूसरों को भी अपना सच्चा स्वरूप जानने के लिये, 'ओपेन आइड मेडिटेशन' का प्रशिक्षण प्राप्त होता है
‘चंदन है इस देश की माटी' - महामण्डल शिविर की यह मिट्टी, श्रद्धा, देशप्रेम, राष्ट्रीय-संस्कृती निर्माण धर्म की संजीवनी है।- उससे मन के घाव भर जाते हैं, मोच जाती रहती है, वेदना मिटती है। ‘इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है हिन्दूस्तान की' हमें यहाँ अपने शरीर, मन और हृदय का समन्वित विकास करना है जिससे हमलोग केवल राष्ट्र-सेवा,समाज-सेवा के लिए योग्य बन सकें, ऐसा सहज संकल्प करने का स्थान है, महामण्डल का युवा प्रशिक्षण शिविर स्लीप नो मोर अराइज अवेक, कॉल स्वामी जी बी ऐंड मेक,' और  "जान लिया है, हमने राज चरित्र से बनता देश-समाज ' आदि सत्य सिद्धान्तों की अनुभूति का स्थान, या प्रयोग शाला है महामण्डल का युवा प्रशिक्षण शिविर। 
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल द्वारा आयोजित वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर शाखा में आते ही - मन का अवसाद, उद्विग्नता, निराशा, अपने शिविरार्थी युवा भाइयों को देख कर ही भाग जाती है। खेल, व्यायाम, योगासन, मनःसंयोग के साथ साथ जीवन में अनुशासन, समय-पालन, आज्ञा-पालन, नेतृत्व के गुणों का विकसन हमारे जीवन का अंग स्वभाव बन जाता है। राष्ट्र धर्म के प्रेरक गीत, कहानियाँ, विषय प्रतिपादन, नित्य-नैमित्तिक कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने हेतु नियोजन, व्यवस्थापन-कुशलता, आत्मविश्वास, सर्वधर्म-समन्वय और समरसता के भाव और बहुत कुछ हमलोग ग्रहण कर लेते है।
 जो लोग ५-१० साल 'महामण्डल' या उसके सहयोगी संस्था 'नारी-संगठन', 'विवेक-चमू ' (विवेक-वाहिनी) के प्रशिक्षण शिविरों और पाठचक्र से जुड़े रहते हैं, उन्हें स्वयं आश्चर्य होता है, वही हूँ मैं- जो पहले मुख-दुर्बल,दब्बू या संकोची था /थी? महामण्डल के प्रशिक्षण से जो संजीवनी प्राप्त होती है, उससे आत्म- श्रद्धा रूपी क्षीण प्राणशक्ति का पुनरूज्जीवन हो जाने के कारण ही शरीर-मन और हृदय, मनुष्य के '3H' सभी अंगोपांग संपूर्ण सामंजस्य से काम करने लगते हैं । यह ऊर्जा हृदय से निकलनेवाली रक्तवाहिनियों से मिलकर शरीर के आखरी छोर तक पहूँचा जाती ती है- और मनुष्य को चैतन्य (विवेक-प्रयोग करने की शक्ति) प्रदान करती है। व्यक्तिगत जीवन में शरीर में प्राणशक्ति (विवेक-प्रयोग) का संचार रूकना याने मृत्यू। राष्ट्र जीवन में प्राणशक्ति है विवेक-प्रयोग की क्षमता से निर्मित हुई संस्कृति अर्थात जीवनदृष्टी अर्थात जीवनमूल्य। उसकी अनुभूती-विचार, उच्चार व्यवहार का प्रवाह खंडीत होना राष्ट्र की चेतना लुप्त होने जैसा ही है। भारत सनातन राष्ट्र है। जो केवल मानव के नही, अपितु चराचर सृष्टि के कल्याण का विचार संस्कार देता है।
भगिनी निवेदिता ने कहा था, " एक निर्धारित स्थान पर, निर्धारित समय में , सामुहिक रुपसे, संघमन्त्र और स्वदेशमन्त्र का पाठ  श्रद्धाभाव से करने से उस स्थान से शक्ति का मंगल अविरत स्त्रोत निर्माण होगा। " वर्तमान की एक लोकप्रिय लहर है- ‘व्यक्तित्व विकास' ! इसके लिए कितने 'श्रीश्री १०८ जी' (गुरुगिरी करने वाले लोग) के द्वारा प्रकार के शिबिर उद्बोधन के खर्चीले औपचारिक आयोजन या स्प्रिचुअल रिट्रीट- वर्ग  होते है। 
किन्तु इन समस्त आयोजनों के केन्द्र में, "मैं नहीं, आप " की भावना नहीं रहती, इसके आयोजकों के विचार-केंद्र में रहता है-'मैं', और केवल 'मैं'। किन्तु महामण्डल का शिशु-विभाग -'विवेक-वाहिनी' के खेलों में बच्चे सीखते हैं कि " विवेक-वाहिनी (Brigade, व्यूह,टीम) के जीतने-हारने का कोई सुख-दु:ख नही होना चाहिये ।" यही श्रद्धा (आत्म-श्रद्धा)  वह संस्कार-बीज है जिसे बच्चों में आसानी से अंकुरित किया जा सकता है। इसीलिये महामण्डल बिना जाति -धर्म का भेद किये, अपने देशवासियों की खोयी हुई श्रद्धा को वापस लौटने के लिये, साप्ताहिक शिशु-पाठचक्र, व्यायाम एवं खेल आदि के माध्यम से, सभी बच्चों के हृदय में ‘मैं नही, तू' का अनोखा संस्कार भरने का प्रयत्न करता है। ताकि ये बच्चे बड़े होने के बाद स्वामी विवेकानन्द द्वारा बार बार कहे गए उदहारण के सिंह-शावक जैसा 'मनुष्य बनो और बनाओ ' आन्दोलन के समर्थ लोक-शिक्षक या नेता बन सकें !
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की सहयोगी संस्था है -'सारदा नारि संगठन '; जो केवल स्त्रियों की संस्था है। पश्चिम बंगाल के भोगपुर में उसकी स्थापना होकर सर्वभारतीय स्तर पर उसका कार्य प्रारंभ हुआ। वहाँ महिलाएँ-लडकिया  प्रति-सप्ताह किसी निश्चित दिन और समय पर एकत्रित होती हैं , और मातृभूमी के प्रति अपने दायित्व के रूपमें स्वामी विवेकानन्द का जागरण मंत्र 'BE AND MAKE' का प्रचार करने में समर्थ लोक-शिक्षिकाओं का निर्माण करने के लिये युवतियों को चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा पद्धति का प्रशिक्षण देती हैं। 
उन्हें प्रतिदिन सर्वमंगल प्रार्थना, मनःसंयोग, विवेक-प्रयोग, व्यायाम, स्वाध्याय, का नियमित अभ्यास करती हैं, जिससे मनुष्यत्व का उन्मेष हो जाता है, शरीर स्वस्थ और सबल, मन की शक्ति विकसित, देशप्रेम से हृदय का विकास, जिससे स्त्री-शक्ति चरित्रबल से सम्पन्न सुशीला, सुधीरा और समर्थ बन जाती हैं। इस तरह महिलाओं का वार्षिक शिविर में एकत्रित होना, श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में अनुशासन और नेतृत्व पद्धति से प्रशिक्षण लेना उन्हें अनुशासित, और देशभक्त बना देता है। गृहस्थी के साथ-साथ यह कार्य (युवा महामण्डल,सारदा नारी संगठन और विवेक-वाहिनी ) करना रस्सी-खेच स्पोर्ट्स जैसा खेला जा सकता है  
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