Tuesday, July 21, 2015

पंचम वेद -३ " सिद्धार्थ का बुद्ध में रूपांतरित हो जाना -' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया ' की व्याख्या है ! "

'भगवान जगन्नाथ विशाल नेत्रों से हमें निरन्तर ऑब्जर्व कर रहे हैं - कौन मेरे निकट आ रहा है ?'
पिछले ब्लॉग में हमलोग श्रीरामकृष्ण और मास्टर महाशय के बीच प्रथम दर्शन के समय हुए वार्तालाप पर चर्चा कर रहे थे। कुछ देर बाद मास्टर ने प्रणाम किया और चलना चाहा। श्रीरामकृष्ण ने कहा फिर -"फिर आना  ! " यहाँ इस- " फिर आना "  (कम अगेन )  को समझने के लिये श्री रामकृष्ण की जीवनी पर लौटना होगा।
एक बार श्रीरामकृष्ण माँ काली के सामने प्रार्थना कर रहे थे, कि माँ विषयी लोगों से बातें करके मेरी जिह्वा जली जा रही है, इसलिये हे माँ , तुम मेरे साथ हर समय उसी प्रकार रहो जैसे किसी छोटे बच्चे साथ उसकी माँ रहती है ! बच्चा नहीं समझता कि उसकी माँ को और भी काम हो सकता  है, वह तो बस अपने साथ ही रहने की ज़िद करता है। श्रीरामकृष्ण भी उसी भाव से प्रार्थना कर रहे थे। तब जगतजननी माँ काली श्रीरामकृष्ण को गारंटीकृत (आश्वस्त) करते हुए कहती हैं -- " तुई  आर आमी ऐक, तुई भक्ति निये थाक - जीवेर मंगलेर जन्य। भक्तरा सकले आसबे। तोर तखन केवल विषयीदेर देखते होबे ना; अनेक शुद्ध कामनाशून्य भक्त आचे, तारा आसबे !"

 
" तूँ और मैं बिल्कुल एक हैं, तूँ जीवों के कल्याण के लिये भक्ति को लेकर रह। एक एक करके सारे भक्त लोग चले आयेंगे। तब तुम्हें केवल विषयी लोगों को देखना नहीं पड़ेगा; बहुत से कामनाशून्य शुद्ध भक्त (केवल सत्य को चाहने वाले) हैं, वे लोग आयेंगे !" 
उसके बाद से दक्षिणेश्वर की कालीमाता (भवतारिणी)के मंदिर में जब कभी शाम की आरती के समय, काँसे का घंटा-घड़ियाल बज उठता; उस समय श्रीरामकृष्ण अपने कमरे की छत पर चढ़ कर, गंगा की और मुँह करके (क्योंकि तब कोलकाता शहर गंगा के उस पार वाले हिस्से को कहा जाता था, जो भारत की राजधानी थी, जहाँ भारत के प्रबुद्ध लोग रहते थे।) जोर से पुकार कर कहते थे-" उरे भक्तरा, तोरा के कोथाय आचिस,शीघ्र आय!" -- " हे भक्तों, तुमलोग कौन कहाँ हो, शीघ्र चले आओ !"
भगवान आज भी अपने भक्तों को पुकार रहे है, किन्तु बहुत थोड़े से लोग ऐसे जो उनकी पुकार को सुन पाते हैं। अधिकांश लोग भगवान की पुकार क्यों नहीं सुन पाते ? क्योंकि वे सांसारिक कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रहते हैं । जिनको पेट भरने की चिन्ता नहीं रहती है, वे भी नाम-यश-धनदौलत जमा करने की अनेक इच्छाओं से ग्रस्त रहते हैं। उधर भगवान लगातार हमारे हृदय के द्वार को खटखटाते रहते हैं, क्योंकि हमलोग भगवान से आये हैं, जब तक उनमें लौट नहीं जाते चक्र पूरा नहीं होगा। और तब तक सुख-दुःख का चक्र भी लगातार चलता रहेगा। जब हम भगवान में पहुँचेंगे तभी यह चक्र रुकेगा। उपनिषद में (कठोपनिषद् ३/१/१-२ ) एक कहानी है -
द्वा  सुपर्णा   सयुजा   सखाया   समानं  वृक्षं  परिषस्वजाते ।
  तयोरन्य: पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाक शीति ।
  समाने   वृक्षे  पुरुषो  निमग्नो  नीशया  शोचति   मुह्यमान: ।
  जुष्टं  यदा  पश्यत्यन्यमीशमस्य  महिमानमिति   वीतशोक: ।

एक साथ रहने वाले तथा परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी, जीवात्मा एवं परमात्मा, एक हि वृक्ष शरीर का आश्रय लेकर रहते हैं । उन दोनों में से एक जीवात्मा तो उस वृक्ष के फल, कर्मफलों का स्वाद ले-लेकर खाता है । किंतु दूसरा, ईश्वर उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ।
एक ही वृक्ष पर दो पक्षी हैं, दोनों देखने बिल्कुल एक समान हैं, इसीलिये दोनों में मित्रता है।  एक चोटी पर रहता है दूसरा नीचे की डालियों पर । चोटी पर रहने वाला पक्षी शान्त, मौन, महिमाशाली और अपने ही ऐश्वर्य में मग्न है । नीचे की शाखाओं पर रहने वाला पक्षी, बारी-बारी से, मधुर और कटु फल खाता हुआ सुखी और दु:खी होता रहता है । 
कुछ काल के पश्चात् अत्यन्त कटु फल खाता है और ऊपर बैठे स्वर्ण पंख वाले पक्षी को देखता है जो कोई फल नहीं खाता । कभी अत्यंत कटु फल खाकर वह त्रस्त हो जाता है, तब नीचे वाला पक्षी ऊपर वाले पक्षी के समीप पहुँचने का प्रयत्न करता है । ऊपर वाले पक्षी के पास पहुँच कर नीचे वाले पक्षी को ज्ञात होता है कि वह केवल छाया मात्र है । वास्तविक पक्षी एक ही है । ऊपर वाला पक्षी इस विश्व का प्रभु ईश्वर है और नीचे वाला पक्षी इस संसार के मधुर और कटु फलों का भक्षक जीवात्मा है । इन्द्रिय सुखों से ऊपर उठकर जीवात्मा को पता चलता है कि वह भी स्वरूपत: ब्रह्म ही है । 
ज्ञान योग की व्याख्या उपनिषदों में की गयी है । इसीलिए इस योग के तीन ही सोपान हैं-(१)श्रवण- (उपनिषदों में कही गयी बातों को सुनना या पढ़ना); (२)- मनन (श्रवण किये गये मन्तव्य पर चिन्तन करना (३) निदिध्यासन (सभी वस्तुओं से अपना ध्यान हटाकर साक्षी पक्षी की तरह बन जाना) । स्वयं को तथा संसार को ब्रह्ममय समझने से ब्रह्म से एकत्व स्थापित हो जाता है ।
हमलोग सोचते हैं, एक नई कार आ जाने से हम सुखी हो जायेंगे, एक बढ़िया फ्लैट लेकर सुखी हो जायेंगे, इसी प्रकार भोग के वस्तुओं को जमा करते-करते जब वह परेशान हो जाता है, तब ऊपर वाले पक्षी को देखकर सोचता है -यह इतना शान्त कैसे है ? 
ऐसी घटना हम सिद्धार्थ गौतम के जीवन में देखते हैं। वे राजकुमार थे, २५ वर्ष की उम्र में राजकुमारी यशोधरा से विवाह हुआ। एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर शहर भ्रमण के लिये निकले थे तो उन्होंने मार्ग में जो कुछ भी देखा उसने उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली। उन्होंने एक वृद्ध दुर्बल व्यक्ति को, एक रोगी को और एक शव को देख कर वे, सोचने लगे क्या एक दिन मेरी भी यही अवस्था होगी ? हर प्रश्न पर भीतर से उत्तर आया - अवश्य ! वे संसार से और भी अधिक विरक्त तथा उदासीन हो गये। फिर उन्होंने एक प्रसन्नचित्त संन्यासी को देखा। वह भी एक मनुष्य था किन्तु उसके चेहरे पर शांति और तेज की अपूर्व चमक विराजमान् थी। सिद्धार्थ उस प्रसन्न-चित्त संन्यासी को देख कर अत्यधिक प्रभावित हुए।
उन्होंने भी सांसारिक बंधनों को छिन्न-भिन्न करने और गृहत्याग करने का निश्चय किया।  एक रात्रि को २९ वर्ष के युवक सिद्धार्थ ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिये,सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़ा। 

 
गृहत्याग के बाद सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में भटकने लगे। वे गया के निकट एक वटवृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गये और निश्चय कर लिया कि भले ही प्राण निकल जाए, मैं तब तक समाधिस्त रहूँगा, जब तक ज्ञान न प्राप्त कर लूँ।  सात दिन और सात रात्रि व्यतीत होने के बाद, आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और उसी दिन वे तथागत बुद्ध हो गये।  जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह आज भी 'बोधिवृक्ष' (बनारस के निकट ऊँच ?? ) के नाम से विख्यात है।  ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी अवस्था ३५ वर्ष थी।
सिद्धार्थ गौतम की इस कहानी से हमें यह बोध होता है कि भगवान सुख-दुःख भेजकर लगातार हमें पुकार रहे हैं। सिद्धार्थ ने उसे सुना, उसे समझ लिया फिर उसका प्रतिउत्तर भी दिया; और वे सिद्धार्थ गौतम से गौतम बुद्ध में रूपान्तरित हो गए । बुद्ध उसे कहते हैं जिसे आत्मज्ञान प्राप्त हो गया हो। किन्तु अधिकांश लोग भगवान की पुकार को सुन ही नहीं पाते, क्योंकि वे अत्यंत बीजी हैं।
 एक भक्त सभी प्रकार की जोग-तप साधना से थक कर अंत में माँ सारदा के पास पहुंचे, श्रीचरणों में प्रणाम करने के बाद उन्होंने कहा -" माँ मुझे संसार-चक्र (जन्म-मृत्यु) में घूमने मत देना।" माँ बोलीं, 'बच्चे तुम स्वयं कितने दिनों से मुझे भूल कर यहाँ-वहाँ घूम रहे थे, कभी मुझे याद नहीं किया ? अब तुम मेरे पास आये हो ? ' बहुत धक्के खा लेने के बाद ही हम भगवान के शरणागत हो पाते हैं। एक बंगला गाना है- बल्कि हमारे हृदय से निकली एक प्रार्थना है, जो गीत बन कर निकली है -

आमि सकल काजेर पाई हे समय तोमारे डाकिते पाई ने। 
आमि चाहि दारा सूत सुख सम्मिलन तव संग सुख चाई ने॥ 
आमि कतई ये करि वृथा पर्यटन तोमार काछे तो जाई ने। 
आमि कत कि जे खाई भस्म आर छाई तव प्रेमामृत खाई ने॥ 
आमि कत गान गाहि मनेर हरषे तोमार महिमा गाई ने । 
आमि बाहिरेर दूटो आँखि मेले चाई ज्ञान आँखि मेले चाई ने॥ 
आमि कार तरे देई आपना विलाये ओ पदतले बिकाई ने । 
आमि सबारे शिखाई कत नीति कथा मनेरे शुधू शिखाई ने ॥

[আমি সকল কাজের পাই হে সময় তোমারে ডাকিতে পাই নে,
আমি চাহি দারা সুত সুখ সম্মিলন তব সঙ্গ সুখ চাই নে।।]
 'मेरे पास अन्य सभी काम के लिये समय है, किन्तु तुम्हें स्मरण करने के लिये मेरे पास समय नहीं है'- - अधिकांश लोगों के जीवन को देखिये आप उन्हें पाठ चक्र में आने के लिये कहिये, वे कहते हैं उनके पास दूसरे बहुत से कार्य हैं। किन्तु अगर उनसे कहें कि -रोटरी क्लब का इंस्टालेशन समारोह हो रहा है, उसमें फिल्म के हीरो-हीरोइन आ रही है, वहाँ का निमंत्रण भी है।  तुम उनके साथ बात कर सकते हो और खाना भी खा सकते हो। तो क्या वे समय की कमी का बहाना बनायेंगे ? बहुत थोड़े से लोग वहाँ जाने में असमर्थता जताएंगे, अधिकांश लोग यह सुनकर ख़ुशी से उछल पड़ेंगे। क्योंकि उनके लिये वहीं पर आकर्षण है। इन्द्रिय भोगों के पांचो विषय -रूप,रस,शब्द,गंध,स्पर्श आदि हमारे मन को निरन्तर बहिर्मुखी बनाये रखते हैं।
इसीलिये यह स्वाभाविक है कि अधिकांश लोग भगवान के आह्वान -'फिर आना, कम अगेन' की अनसुनी कर देते हैं। 
किन्तु जब मास्टर महाशय को श्रीरामकृष्ण ने कहा -" फिर आना । " यही वह आह्वान है, जिसे भगवान हर भक्त  से करते रहते हैं ! श्रीरामकृष्ण की यह विशेषता थी, कि जैसे ही मास्टर महाशय उनसे मिलते हैं, वे उनसे इस प्रकार वार्तालाप करना प्रारम्भ करते हैं, मानो वे उन्हें काफी लम्बे समय से जानते हों ! 
मास्टर लौटते समय चकित से होकर सोचने लगे- "हू  इज दिस श्रेन-लुकिंग मैन हू इज  ड्राइंग मी बैक टू हिम? 'ये प्रशान्त से दिखने वाले पुरुष कौन हैं ? मेरा मन बार बार उनके पास लौट जाना क्यों चाहता है? क्या बिना पुस्तकों को पढ़े भी मनुष्य महान बन सकता है ? ' इज इट पॉसिबल फॉर अ मैन टु बी ग्रेट विदाउट बीइंग अ स्कॉलर? कितना आश्चर्य है, मुझे यहाँ फिर आने की इच्छा हो रही है, इन्होने भी कहा- 'फिर आना ' कल या परसों सबेरे फिर आऊँगा।
जिसको हम प्रेम करते हैं, उससे मिलने की इच्छा होती है। हमलोग भगवान से प्रेम नहीं करते हैं, इसलिये उनके निकट जाने की इच्छा नहीं होती। जीवन में जब कोई समस्या आती है, तो उस प्रॉब्लम को सौल्भ करने बाबाधाम चले जाते हैं।
दूसरे दर्शन के समय जब श्रीम जाते है, तो श्रीरामकृष्ण मास्टर से पूछते हैं -क्यों जी, तुम्हारा घर कहाँ है ?
मास्टर - जी कलकत्ते में।
[वराहनगर उस समय कोलकाता में नहीं था,वराहनगर तब एक छोटा सा शहर था। बागबाजार तक कोलकाता था, जहाँ मायेर बाड़ी है, उसके आगे नहीं । हालाँकि अब कोलकाता में आ गया है, मास्टर कोलकाता में रहते थे ]
श्रीरामकृष्ण -यहाँ कहाँ आये हो ?
मास्टर- यहां वराहनगर में बड़ी दीदी के यहाँ आया हूँ -ईशान कविराज के यहाँ।
श्रीरामकृष्ण -ओहो, ईशान के यहाँ।
अर्थात वे ईशान को जानते थे,श्रीरामकृष्ण एक धार्मिक मनुष्य होकर भी समाज के प्रबुद्ध लोगों को जानते थे। समाज के प्रमुख अगुआ लोगों से जाकर मिलते भी थे -क्योंकि उनका एक मिशन था। वह मिशन क्या था ? ' टू अवेकेन पीपल दैट दे वेयर नॉट आर्डिनरी पीपल दे वेयर डिभाइन '  उनका एकमात्र मिशन लोगों को उनकी अन्तर्निहित दिव्यता के प्रति जाग्रत करना था, उन्हें बताना था कि तुम कोई मरणधर्मा साधारण जीव मात्र नहीं हो, तुम तो अनन्त आनन्द के भागीदार हो, सच्चिदानन्द स्वरूप हो ! उस दिव्यता को जाग्रत करने के उद्देश्य से भगवान (ठाकुर) स्वयं उनके घर जाते थे, उनसे प्रश्न पूछते थे , बातें करते थे, उन्हें अपने ब्रह्मत्व को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करते थे ।
इसीलिये अगला प्रश्न करते हैं - क्यों जी, केशव अब कैसा है -बहुत बीमार था ।
मास्टर -जी हाँ, मैंने भी सुना था कि बीमार हैं, पर अब शायद अच्छे हैं।
मास्टर महाशय कोलकाता के रहने वाले थे, और केशव वहाँ के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, इसीलिये ठाकुर ने अनुमान लगाया कि म भी उनके संबंध अवश्य जानते होंगे। आज के शहरी जीवन में एक ही अपार्टमेन्ट में रहने वाले भी एक दूसरे को नहीं जानते हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था।
श्रीरामकृष्ण - मैंने तो केशव के लिये माँ के निकट -'नारियल (डाभ ) और चीनी की पूजा' मानी थी।
भारत की प्रथा है, यदि भगवान कोई मनोकामना पूर्ण कर दें, तो प्रसाद चढ़ाते हैं। सीर्फ डाभ का पानी पीने से उतना अच्छा नहीं लगेगा, उसमें थोड़ा चीनी मिला देने से मीठा लगेगा। केशव के प्रति भगवान को इतना प्रेम क्यों था ? वे उस ब्राह्म समाज के नेता थे, जो लोगों को हमारे सनातन धर्म या हिन्दू धर्म का परित्याग करके ब्राह्म बन जाने के लिये प्रोत्साहित करते थे। फिर भी श्रीरामकृष्ण उनके स्वास्थ्य के लिये इतने चिंतित क्यों थे ? 
उस समय भारत में अंग्रेज लोग काफी थे किन्तु थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल आल्काट (Colonel Alcott: 1832–1907) तब भारत में रहने वाले एकमात्र अमेरिकन थे। जब विवेकानन्द अमेरिका जाने का निश्चय किये तो उनसे मिलने उनके घर गए थे, ताकि वे उनको वहाँ के किसी प्रसिद्द व्यक्ति के नाम पत्र दें जो उन्हें वहाँ कुछ सहायता दे सके। तब उन्होंने कहा था -'यदि तुम मेरे धर्म में धर्मान्तरित हो जाओगे, तभी मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।' स्वामीजी ने मना कर दिया था। उससे क्रोधित होकर उन्होंने अपने थिओसोफी के मित्रों को पत्र में लिखा -' लेट द डेविल डाई ऑफ़ हंगर एंड कोल्ड, एंड आवर कॉज इस सेफ.’ स्वामीजी ने कहा -'दिस डेविल इज नोट बॉर्न टू डाई लाइक दैट'। इस प्रकार हम देखते विश्वबंधुत्व की बात करने वाले थिओसोफी के धार्मिक व्यक्ति होकर भी  कर्नल आल्काट कितने संकीर्ण मानसिकता वाले रोगी थे। 
दूसरी तरफ एक अन्य धार्मिक व्यक्ति श्री रामकृष्ण हैं, जो अपनी ईष्टदेवी से उस व्यक्ति को निरोगी कर देने का 'मनता' माँग रहें हैं, जो उनके धर्म का अनुयायी नहीं था। वैसा व्यक्ति जो हिन्दू धर्म का परित्याग करके ब्राह्म बन जाने के लिये प्रोत्साहित करते थे, उसके लिये भी श्रीरामकृष्ण कहते थे -   " कभी कभी जब रात को नींद उचट जाती थी, तब माँ के पास रोकर प्रार्थना करता था,--'माँ, केशव की बीमारी अच्छी कर दे। केशव अगर न रहा तो मैं कलकत्ते जाकर बातचीत किससे करूँगा ?'- मदर, प्लीज मेक केशब वेल अगेन.' इसी से तो डाभ-चीनी मानी थी।
प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह साइंटिस्ट हो, डॉक्टर हो, लेखक हो या साहित्यकार हो उसे अपने स्तर के व्यक्ति से बातचीत करने में आनन्द आता है, और जी खोल कर, उसके साथ घंटों बातचीत कर सकता है। नहीं तो १०-१५ मिनट तक बातचीत करने में ही मन ऊब जाता है। फिर धार्मिक व्यक्ति होकर भी समाज में होने वाली प्रमुख घटनाओं से पूर्ण परिचित हैं, इसका परिचय देते हुए; मास्टर से पूछते हैं -'क्यों जी, कलकत्ते में क्या कोई कुक साहब आया है ? 'इज इट ट्रू दैट ही इज गिविंग लेक्चर्स? क्या यह सच है कि वह व्याख्यान आदि देता है ? एक बार केशब मुझे स्टीमर पर चढ़ाकर ले गया था, और यह कुक साहब भी साथ में था।' 
जबकि अधिकांश धार्मिक-नेता अपने को देश-विश्व की सम-सामयिक सूचनाओं से दूर रहने को ही वैराग्य समझते हैं; देश में समाज में अभी क्या हो रहा है, इससे भला मुझे क्या मतलब ? मैं तो बस राम से ही मतलब रखता हूँ !  
श्री रामकृष्ण चाहते थे, धार्मिक नेता या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता को सर्वदा ऐक्टिव रहना चाहिये उसके साथ साथ अनासक्त भी रहना चाहिये। माँ सारदा भी समस्त वर्तमान मुद्दों की जानकारी रखती थीं, स्वामीजी भी ऐसा ही कहते थे। ठाकुर भी यह सब प्रश्न पूछ कर जानना चाह रहे थे कि म में लीडरशिप क्वालिटी थी या नहीं ? मास्टर उस समय एक साधारण विद्यालय में शिक्षक थे, और केशव, कुक साहब आदि हाई सोसाइटी के विख्यात लोग थे। यह स्वाभाविक ही था कि श्रीम ने उनका नाम सुना था,किन्तु उनसे कभी मिले नहीं थे। वे बोले -'उनके विषय में ज्यादा कुछ मैं नहीं जानता'। 
हठात विषयान्तर करते हुए, किसी भावी गृहस्थ नेता को पहले अपने गृहस्थ एवं पिता के उत्तरदायित्व को निभाना - स्वधर्म का पालन अवश्य आना चाहिये। उसकी अनिवार्यता पर बल देते हुए श्री रामकृष्ण कहते हैं -" प्रताप का भाई आया था। कुछ दिन यहाँ रहा। कुछ काम-धाम करता नहीं था, कहता है मैं यहीं रहूँगा। ' आई केम टू नो दैट ही हैड लेफ्ट हिज वाइफ एंड चिल्ड्रन विथ हिज फादर-इन-लॉ.' मैंने सुना कि उसने अपनी स्त्री और बच्चों के अपने ससुर के यहाँ ही छोड़ रक्खा है। उन सबकी पूरी चिंता उसके ससुर को ही करनी पड़ती है। मैंने उसे खूब डाँटा ! भला देखो तो, लड़के-बच्चे हुए हैं, उनकी देख-रेख. उनका पालन-पोषण तुम न करोगे तो क्या कोई गाँववाला करेगा ? शर्म नहीं आती, बीबी बच्चों को ससुर के यहाँ रख दिया है, उन्हें कोई और पाल रहा है !' आई स्कोल्डेड हिम वेरी हार्ड ऐंड आस्क्ड हिम टू लुक फॉर अ जॉब.' मैंने उसे कस कर डांट लगाई और काम-काज खोज लेने को कहा, तब वह यहाँ से जाने को तैयार हुआ । " 
यदि 'तुम विवाहित हो, और सिद्धार्थ (किसी राजा का पुत्र ) नहीं हो'- तो तुम्हें पहले स्वधर्म का पालन करना ही होगा। बच्चा-बीबी ससुर के यहां छोड़ कर जंगल में सन्यासी बनने मत जाओ ! श्रीरामकृष्ण द्वारा प्रतिपादित धर्म-साधना की शिक्षा यहाँ बिल्कुल आश्चर्यजनक तरीके से प्रारम्भ होती है। 
 भगवान बुद्ध ने कहा है, चार आर्य सत्य हैं -
 १. दुख: इस दुनिया में सबकुछ दुःख है। जन्म, जरा (बुढ़ापा), बीमारी, मौत- मृत्यु, या इच्छित वस्तुओं का न मिलना -- सब दुख है।

२. दुख प्रारंभ : तृष्णा या चाहत ही दुख का कारण है।

३. दुख निरोध : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है।

4. दुख निरोध का मार्ग : तृष्णा से मुक्ति आर्य अष्टांग मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है।

किन्तु इस 'दुनिया में सबकुछ दुःख है' - यह बात किसके लिये सत्य है ? फॉर दोज हू हैज अंडरस्टुड ऐंड नॉट फॉर ऑल ! जिनको अपने जीवन में इसका अनुभव हो गया है, और वे समझ चुके हों। यदि किसी व्यक्ति को संसार के दुःखमय स्वरूप का अनुभव नहीं हुआ हो, और उसे तुम जबरन बुलाओ, इसी विचार को जबरन उसके ऊपर थोप दो, तो क्या होगा ? वे लोग वैरागी होने का केवल दिखावा ही नहीं करेंगे, बल्कि उच्च आदर्श से उनका पतन भी हो जायेगा। बौद्ध धर्म में वैसा हुआ भी था, बिना पात्रता की जाँच किये, जबरन गेरुआ वस्त्र पहना देने से हजारों लोग मठ के संन्यासी नहीं बन सकते । श्रीरामकृष्ण ठीक इसके विपरीत कह रहे हैं । 
मास्टर तो अनजान व्यक्ति थे, उनसे ठाकुर यह क्यों कह रहे थे कि प्रताप का भाई यहीं रहना चाहता था, मैंने उसे खूब डाँटा ? वास्तव में श्री'म' ठाकुर के लिए अपरिचित व्यक्ति नहीं थे, इस बात को हम आगे समझेंगे। ठीक इसी प्रकार जब वे श्रीकृष्ण थे तो अर्जुन को भी गीता २/३ में डाँटा था - 
क्लैव्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ।।
 हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। तुम एक क्षत्रिय हो, तुम्हारा स्वधर्म है युद्ध करना, हे परन्तप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिये खड़ा हो जा ।  
श्री रामकृष्ण ने माँ सारदा को शिक्षा देते हुए कहा था, तुम कभी किसी के सामने कुछ माँगने के लिये अपना हाथ मत पसारना ! उसके बदले अपने हाथ को ऊपर रखते हुए किसी के हाथों में कुछ डालने की ही चेष्टा करना। क्यों ? क्योंकि इससे तुम्हारा आत्मविश्वास नष्ट हो जायेगा, तुम दूसरों पर निर्भर रहने लगोगे। गृहस्थ लोगों को धन का उपार्जन करना चाहिये, कभी भीख नहीं माँगनी चाहिये !
वही श्रीरामकृष्ण स्वामी विवेकानन्द को सिखाते हैं -जाओ कुछ घरों से भिक्षा माँग कर लाओ ! क्यों ? क्योंकि मधुकरी भिक्षा माँगना संन्यासियों का दिव्य कर्तव्य है। उन्हें नौकरी या बिजनेस करके धन उपार्जन नहीं करना है। जिस प्रकार भँवरा हर फूल से थोड़ा थोड़ा मधु इकट्ठा करता है, कुछ घर से माँग कर लाओ। और बदले तुम्हें कुछ ऐसा कार्य करना होगा, जो समाज के लिये कल्याणकारी हो ! 
कहीं कहीं हम देखते हैं, कुछ संस्थायें भक्तों से दान लेकर, किसी राजा या बड़े बड़े व्यापारियों जैसे बहुत विशाल सुन्दर भवनों का निर्माण करते हैं। इसके बदले उन्हें दान से मिले एक एक पैसे को समाज के कल्याण में, जीवित ईश्वर की पूजा में खर्च करना चाहिये। यही शिक्षा श्री रामकृष्ण यहाँ दे रहे हैं, और मास्टर महाशय से कुछ प्रश्न पूछते हैं - क्या तुम्हारा विवाह हो गया है ? 
उन दिनों १५-१६ की आयु में लड़कों की शादी हो जाती थी, वयस्क हो जाने के बाद गौना होता था। उनकी भी शादी इसी प्रकार हुई थी। मास्टर -जी हाँ। 
श्रीरामकृष्ण (चौंक कर)-अरे रामलाल, अरे अपना विवाह तो इसने कर डाला ! रामलाल श्रीरामकृष्ण के भतीजे और काली जी के पुजारी हैं, उनकी शादी भी हो चुकी है। मास्टर घोर अपराधी जैसे सिर नीचा कर चुपचाप बैठे रहे। सोचने लगे, विवाह करना क्या इतना बड़ा अपराध है ?
श्रीरामकृष्ण ने फिर पूछा -"क्या तुम्हारे लड़के-बच्चे भी हैं ? 
मास्टर का कलेजा काँप उठा। डरते हुए बोले - " जी हाँ, लड़के-बच्चे हुए हैं । "
श्रीरामकृष्ण ने फिर दुःख के साथ कहा -" अरे लड़के भी हो गए ! "
इस तरह तिरस्कृत होकर मास्टर चुपचाप बैठे रहे। उनका अहंकार चूर्ण होने लगा। म सोचते थे कि यही तो जीवन का सबकुछ है। वे एक स्कूल में प्रधान शिक्षक थे। कुछ देर बाद श्री रामकृष्ण सस्नेह कहने लगे - " देखो, तुम्हारे लक्षण अच्छे हैं, यह सब मैं किसी के ललाट, आँखे आदि को देखते ही जान लेता हूँ !' -यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। श्रीरामकृष्ण के पास समुद्रविद्या का आश्चर्यजनक ज्ञान था। कभी कभी वे ऊँगली से लेकर केहुनी तक के हाथ को तौल कर भी समझ लेते थे कि यह किस प्रकार का व्यक्ति है। यह एक आश्चर्यजनक विद्या है, एक जगह श्रीरामकृष्ण कहते हैं, " मैंने तुमको चैतन्य के दल में देखा है। " चैतन्य महाप्रभु तो पाँच सौ साल पहले हुए थे ? श्री रामकृष्ण कैसे चैतन्य महाप्रभु को देखे ? लोगों को आश्चर्य होगा ही! केवल उनको ही नहीं उनके दल में जितने लोग थे, उन सबको वे जानते थे। कैसे जानते थे ? 
पूरी में भगवान जगन्नाथ का मन्दिर है। जगत मतलब विश्वब्रह्माण्ड के नाथ ! नाथ का अर्थ है रचयिता -रचना करने वाले भगवान। किन्तु विशेष बात यह है कि इस भगवान के हाथ नहीं हैं। उनको पैर भी नहीं हैं। उनको केवल दो बहुत बड़ी बड़ी ऑंखें हैं। दो बड़ी बड़ी ऑंखें क्यों हैं ? वे हमें निरंतर बड़े गौर से -साक्षी भाव से देखते रहते रहते हैं, कौन मेरे निकट आ रहा है ? यहीं पर कर्मफल के सिद्धान्त का जन्म होता है। विदेशियों को भगवान जगन्नाथ की ऐसी मूर्ति देखने से बड़ा आश्चर्य होता है।
 
  श्री सुदर्शन भगवान, बलभद्र, देवी सुभद्रा
 जो विश्व-ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता हैं, उनकी ऐसी बिना हाथ-पैर की मूर्ति क्यों ? ऐसी मूर्ति बनाने के पीछे रहस्य है उ उपनिषदों के ज्ञान को सरलता से समझाना है। ईशावास्‍योपनिषद् ५ में कहा गया है -विश्वास रखिए, ‘ईश है, और उसका साक्षात्कार होगा।’ 
 तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।। 
अन्‍वय: - तत् एजति, तत् न एजति ।  तत् दूरे, तत् उ अन्तिके तत् अस्‍य सर्वस्‍य अन्‍त:, तत् अस्‍य सर्वस्‍य उ बाह्यत: ।
 सरलार्थ - तत् ( वह परमेश्वर- नॉट ही ऑर शी, आत्मा का लिंग नहीं होता, वह तो सर्वव्याप्त चेतना है ) एजति (गतिं करोति, विश्व का संचालन करता है,चलता है) तत् (वह स्वयं) न एजति (कहीं आता-जाता नहीं है)  तत् दूरे ( वह दूर से भी दूर स्थान में है- स: दूरादपि दूरमस्ति)  तत् उ ( वह ही निकट से भी निकट में है,स: निकटादपि सन्निकटमस्ति) । तत् (वह) अस्य सर्वस्य अन्तः (इस जगत में सबके अन्दर वही व्याप्त है, अस्‍य जगत: अन्‍त: सर्वत्र व्‍याप्‍तमस्ति )। तत् उ (वह ही) अस्य सर्वस्य बाह्यतः ( इस गो-गोचर जगत के परे भी है)। 
क्योंकि भगवान सर्वव्याप्त हैं, इसीलिये भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में पैर नहीं बने हैं। वे एक ही समय में बिना पैरों के हर जगह पहुँचे हुए हैं । हमलोगों को कार्य करने के लिये हाथों की जरूरत होती है, वे संकल्प मात्र से सृष्टि करते हैं ! तथा वे ही बिल्कुल हमारे जैसे मानव-शरीर धारण करके धरती पर अवतरित भी होते हैं, इसी तथ्य को साधारण व्यक्ति को समझाने के लिये कई दारू-ब्रह्म भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के ऊपर कई कहानियाँ भी हैं। बलराम जीव के प्रतिक, देवी सुभद्रा योगमाया हैं, जो जीव को भगवान श्रीकृष्ण से मिलवा देती हैं । 
इस बार १८ जुलाई २०१५ को आयोजित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि १९ साल बाद दारू-ब्रह्म (काष्ठ प्रतिमाओं) को बदला जा रहा है। इसे नव कलेवर महोत्सव कहा जाता है। शास्त्रों में वर्णन आता है कि भगवान कृष्ण ने आषाढ़ अधिमास के दौरान बहेलिये का बाण लगने से देह त्यागा था। इसीलिये जिस वर्ष दो आषाढ़ आता है, उस वर्ष भगवान जगन्नाथ के काष्ठ विग्रहों (लकड़ी की मूर्तियों) को नए रूप में पुनः निर्मित किया जाता है। यह इस बात का सूचक है कि भगवान भी बदलाव से बचे नहीं हैं। जब उन्हें भी बदलाव प्रिय है, तो क्यों न हम भी अपने जीवन में आने वाले हर परिवर्तन को स्वीकार करें।
कहा जाता है कि जगन्नाथ जी की दिव्य लीलाओं में नवकलेवर भी एक मानवधर्मी लीला है। देश के अन्य मंदिरों में स्थापित पाषाण विग्रहों के विपरीत भगवान जगन्नाथ आम मानव शरीर की भांति ही पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करते हैं। यह प्रक्रिया नवकलेवर महोत्सव के रूप में जानी जाती है। इस बात का वर्णन स्कन्दपुराण में मिलता है। महाभारत युद्ध में अपने परिजन और कुटुंबीजनों के वध से विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने यह कहते हुए समझाया था कि आत्मा नित्य है, शरीर अनित्य। जैसे वस्त्र पुराना होने पर लोग उसे त्यागकर नया वस्त्र धारण कर लेते हैं, वैसे ही जीवात्मा जीर्ण शरीर त्यागकर नूतन शरीर में प्रवेश करती है। भगवान जगन्नाथ का नवकलेवर महोत्सव भी गीता के इस संदेश की ही पुष्टि करता दिखाई देता है। 
इसिलये श्रीरामकृष्ण जैसे ही मास्टर महाशय को देखते हैं, उन्हें पहचान लेते हैं, कहते हैं -" मैंने तुमको चैतन्य के दल में देखा है। " केवल उनको ही नहीं जब वे नरेन्द्रनाथ को देखते ही, दोनों हाथ जोड़ कर कहते हैं -" मैं जानता हूँ प्रभु, आप वही नर ऋषि हैं, नारायण के अवतार हैं; लोगों के दुःख और कष्ट दूर करने के लिये जगत में आये हैं। " आई नो यू आर, माई लार्ड. यू आर  'नर', द एन्सिएंट   सेज, द इंकार्नेशन ऑफ़ नारायणा.यू हैव कम टू अर्थ टु  टेक अवे द सफरिंग्स ऐंड  सौरोज  ऑफ़ मैनकाइंड." 
(" Then with folded hand he said: "I know who you are, my Lord. You are Nara, the ancient sage, the incarnation of Narayana. You have come to earth to take away the sufferings and sorrows of mankind.") 
 स्वयं नरेन्द्र को ही उनकी इस बात पर सन्देह हुआ था, तब  श्रीरामकृष्ण कहते हैं - तुममें १८ वैसी शक्तियाँ हैं, जिनमें से सिर्फ एक शक्ति रहने के कारण केशव इतना विख्यात हो गया है। जबकि तुम्हारे भीतर १८ शक्तियाँ हैं ! नरेन्द्र बोले महाशय आप ऐसी बातें क्यों करते हैं ? केशव कितने विद्वान हैं  उनके सामने मैं अभी केवल एक छात्र हूँ । आपको ऐसा नहीं बोलना चाहिये नहीं तो लोग आपको पागल कहेंगे ' मैं क्या करूँ ? माँ मुझे ऐसा ही दिखला रही है ! उसी प्रकार जब उन्होंने राखाल महाराज (स्वामी ब्रह्मानन्दजी) को देखा तो वे तुरन्त पहचान गए कि यह श्रीकृष्ण के साथ रहता था।  बाबुराम महाराज के विषय में कहा वे राधा के अंश से जन्मे हैं। 
( "If Keshab possesses one virtue which has made him world famous, Naren is endowed with eighteen such virtues. I have seen in Keshab and Vijay the divine light burning like a candle flame, but in Naren it shines with the radiance of the sun."
Narendra later vehemently protested to the Master: "Sir, people will think you are mad if you talk like that. Keshab is famous all over the world. Vijay is a saint. And I am an insignificant student. How can you speak of us in the same breath? Please, I beg you, never say such things again."

"I cannot help it," replied the Master. "Do you think these are my words? The Divine Mother showed me certain things about you, which I repeated. And she reveals to me nothing but the truth."

"How do you know it was Mother who told you?" Narendra objected. "All this may be fiction of your own brain. Science and philosophy prove that our senses often deceive us, especially when there is a desire in our minds to believe something. You are fond of me and you wish to see me great – that may be why you have these visions."

The Master was perplexed. He appealed to the Divine Mother for guidance, and was told: " Why do you care what he says? In a short time he will accept every word of yours as true."

श्री रामकृष्ण वचनों को सुन कर जैसा सन्देह नरेन्द्र के मन में उठा था, वैसा ही सन्देह अर्जुन के मन भी उठा था जब उन्होंने गीता ४/१ में कहा था -
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।

मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु  से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु  से कहा । अर्जुन के मन सन्देह हुआ कि आप और मैं तो लगभग एक ही उम्र हैं, फिर यह कैसे सम्भव है कि हजारों वर्ष पूर्व जन्में लोगों को भी आपने ही योग सिखाया था ? तब श्रीकृष्ण गीता ४/५ में उत्तर देते हैं-
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ।

हे परन्तप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ । इन बातों से यह सिद्ध होता है कि ईश्वर ने ही हमारी रचना की है, 'बाई चांस ' संयोगवश हमारा जन्म नहीं हो गया है! उनके साथ हमारा प्रगाढ़ संबंध है, फिर यहाँ कोई सुखी कोई दुःखी क्यों है ? अच्छी-बुरी तरह तरह के गुण विभिन्न मनुष्यों में कैसे आ जाते हैं ? 
हमलोगों के भीतर जो भी अच्छे या बुरे गुण हैं उनका संबन्ध हमारे पूर्वजन्मों से है। पूर्वजन्मों में हमने जैसे कर्म किये हैं, वैसी आदत हो गयी, उसी प्रवृत्ति से कर्म करने से हमारा भला या बुरा चरित्र निर्मित हो गया है। अतः हम केवल सतकर्म करके अपने चरित्र को बदल भी सकते हैं ! इसीलिये हमारे सभी धर्मशास्त्रों, गीता, उपनिषद आदि में रमणीयचरणा - अर्थात रमणीय आचरण या प्रशंसा-योग्य आचरण पर बल दिया गया है।  छान्दोग्य उपनिषद [५.१०.७] की श्रुति प्रसिद्ध है- 
" रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते । कपूयचरणाः कपूयां योनिमापद्यन्ते "
 अर्थात- शास्त्रविहित आचरण करने वाले व्यक्ति उत्तम योनियों को प्राप्त होते हैं और पापाचारी पाप योनियों को प्राप्त होते हैं। यही कर्मानुसार जीवन की विविध गतियों का रहस्य है। 
रमणीय आचरण क्या है ? किसी भी मनुष्य को वाणी से या हाथों से कष्ट नहीं पहुँचाना । किसी भी व्यक्ति से चाहे वह अपरिचित ही क्यों न हो, उसे देखकर चेहरे पर मुस्कान और आँखों में प्रसन्नता लाने का अभ्यास करना चाहिए। यही मानवोचित गुण है, हमें दूसरों से व्यवहार करते समय विनम्रता और शिष्टाचार  का अभ्यास करना चाहिये। जबकि हमलोग दूसरों को ऐसी नजर से घूरते हैं, या कुछ पूछने से ऐसा उत्तर देते हैं कि वह डर जाता है। 
दूसरा है कपूअ  आचरण - यह क्या है ? बुरा कर्म करने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है, गीता २/२२ में भगवान ने कहा है - 
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।

 
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जब यह शरीर बूढ़ा और दुर्बल जाता है, तो वह आत्मा जो इस शरीर में रहती है, वह जीवात्मा जो परमात्मा का ही अंश है - पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है ।  
अगर पुनर्जन्म सत्य है, तो फिर पिछले जन्म की बातें याद क्यों नहीं रहती हैं ? क्या तुम्हें अपने बचपन के दिनों में, जब तुम अपनी माँ की गोद में रहते थे, उस समय घटित हुई सभी बातों का स्मरण है ? भूख लगने पर या कोई तकलीफ होने पर कौन तुम्हारा ध्यान रखता था ? याद है ? नहीं, तो क्या हम यह कह सकते हैं, कि शैशव अवस्था होती ही नहीं है ? 
भगवान श्रीरामकृष्ण जब गले के कैंसर से कष्ट पा रहे थे, और उनके कष्ट को देखकर उनके शिष्य नरेन्द्रनाथ सोंच रहे थे -कि क्या इस समय वे कह सकते हैं कि मैं अवतार हूँ ? उन्होंने तत्क्षण उनके मन को देख लिया और कहा, 'पहले जो राम बनकर आये थे, कृष्ण बनकर आये थे वे ही अभी इस शरीर में रामकृष्ण के रूप में हैं !' इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर हर युग में विभिन्न नाम और रूप धारण कर के मानवता के कल्याण हेतु अवतरित होते रहते हैं ! 
माँ सारदा मणि देवी भी जब रामेश्वरम तीर्थ गयी थीं, वहाँ बालू द्वारा निर्मित शिवलिंग  देखकर बोली थीं , सीता बनकर जब वे आयीं थी और वह शिवलिंग बनाई थी, ' जेमोन टी रेखे गेची तेमन टी आचे ' जैसा मैंने बनाया था, अभी भी ठीक उसी तरह रखा हुआ है। लंका युद्ध के पहले भगवान श्रीराम भगवान शिव की पूजा करना चाहते थे, हनुमान जी शिवलिंग लाने गए थे, किन्तु उनको आने में देरी हो रही थी, तब माता सीता ने बालू से शिवलिंग का निर्माण किया था। माँ जब वृंदावन गयीं थी, तो उन्हें अनुभव हुआ कि वे ही राधा थीं। यह विश्वास हम में दृढ भाव से गूँथ जाये ! 
कभी कभी हमलोग भी किसी नए व्यक्ति को देखते हैं, तो ऐसा लगता है, इसे कभी देखा जरूर है ! किसी वस्तु को देखते ही हम समझ लेते हैं कि यह अमुक वस्तु ही है, क्योंकि पहले हमने उसे देखा हुआ होता है। एक हिन्दू शिशु, के रूप में हमारा व्यवहार, शिक्षक के रूप में हमारा व्यवहार - अलग ही ढंग का होता है। क्योंकि पूर्वजन्म की बातें हमारे चित्त में संचित रहती हैं ।  एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के गुणों में जो अंतर रहता है, वह उसके पूर्व जन्म कृत कर्मों के फलस्वरूप होता है।  विभिन्न मनुष्यों में अलग अलग कार्यों के प्रति जो झुकाओ होता है, वह पुनर्जन्म के सिद्धान्त को प्रमाणित करता है। 
"Has He endowed some with more power and others with less?"
श्रीरामकृष्ण एक बार ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के यहाँ गए थे, वे इतने ज्ञानी मनुष्य थे कि उन्हें विद्यासागर- 'ओशेन ऑफ़ नॉलेज' का सर्टिफिकेट मिला था। उन्होंने श्रीरामकृष्ण से पूछा - 'क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति दी है और किसी को कम ? 
श्रीरामकृष्ण, जो कभी स्कूल नहीं गये थे- तुरन्त कहते हैं, " फिर मैं विशेष कर तुमसे ही मिलने क्यों आया हूँ?  ऐज द ऑल परभेडिंग स्पिरिट ही  एग्झिस्ट्स इन ऑल बीइंग्स, इभेन इन द ऐन्ट। एक सर्वव्यापी सत्ता के रूप में परमेश्वर सब प्राणियों में है - चींटियों तक में है। पर शक्ति का तारतम्य होता है; नहीं तो क्यों कोई दस आदमियों को हरा देता है, और कोई एक ही आदमी से भागता है ? ' ऐंड व्हाई डू ऑल पीपल रेस्पेक्ट यू? हैव  यू ग्रोन अ पेयर ऑफ़ हॉर्न्स? यदि ऐसा नहीं तो इतने लोग तुम्हें ही इतना सम्मान क्यों देते हैं ? क्या तुम्हारे सिर में दो सींग निकले हैं ? 
(हास्य  तुम दूसरों से भिन्न हो, क्यों अलग हुए ? कर्मफल के कारण !) औरों की अपेक्षा तुममें अधिक दया है, विद्या है, इसीलिये तुमको लोग मानते हैं और देखने आते हैं। क्या तुम यह बात नहीं मानते हो ? 
इस प्रकार हम देखते हैं कि पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्वाभाविक रूप से कर्मफल के सिद्धान्त का समर्थन करता है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत अच्छे होते है, जीवनभर केवल शुभ कर्म ही करते हैं, किन्तु आत्मानुभूति या आत्मसाक्षात्कार होने के पहले ही मर जाते हैं। 
आजीवन उन्होंने उच्च आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास किया है, फिर भी वे अपने चरम लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सके हैं, उनका क्या होता है ? वे लोग ब्रह्मलोक में जाते हैं, मोक्ष के अत्यन्त निकट पहुँच जाते हैं, वहाँ से धरती पर आकर यदि वे पुनः सद्कर्म करेंगे तो उन्हें मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। पुनः सद्कर्म ही करना होगा नहीं तो निम्नतर योनियों में भी जा सकते हैं। मुण्डको उप० १।२।१० में कहा गया है -
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
 नाकस्य माने स्वर्ग जाने की इच्छा से, रुग्णालय बनवाना, गरीबों को भोजन कराना, आदि स्मृति-विहित कर्म ’पूर्त’ कर्म कहाते हैं । पूर्त कर्मों को ही आजकल ’परोपकार’ समझा जाता है ।  इन पुण्यकर्मों के कारण, वे स्वर्ग के उच्चतम पद को प्राप्त कर वहां के सुखों का अनुभव करके, पुन: इस लोक में पूर्व की मनुष्य योनि में, या उस से भी हीन योनियों में प्रवेश करते हैं ।
जैसे कोई व्यक्ति बैंक में रखे सारे धन को क्रेडिट कार्ड से खर्च करता रहे, तो एक दिन बैंक नोटिस भेज देगा आपका अकाउंट बंद किया जाता है। उसी प्रकार प्रत्येक धर्म में कुछ 'फोर्बिडन ऐक्शन' निषिद्ध कर्म बतलाया गया है, जिसे करने से दण्ड मिलेगा। 
अभी आप भले किसी मठ के सेक्रेटरी हों, निषिद्ध कर्म करने से आपको भी निम्न योनि का शरीर मिलेगा, कुत्ता, बिल्ली में जन्म हो सकता है। मठ में एक कुत्ता रहता था, स्वामी जी उसको प्यार करते थे। एक दिन किसी बात से नाराज होकर उन्हों सेवक से  कहा इस कुत्ते को गंगा के उस पार छोड़ आओ ! ताकि वो दुबारा नहीं आ सके, लोग उसको नाव से उस पार लेजाकर कोलकाता में छोड़ दिए। पर वह कुत्ता स्वयं तैर कर दुबारा मठ में लौट आया और स्वामी जी के पास बैठकर उन्हें देखने लगा। उसी तरह मंदिर में कुछ बिल्लियाँ भी रहती हैं, जो भगाने से भी लौट आती हैं। इसकी व्याख्या कैसे करेंगे ? पूर्व जन्म में वे भी मनुष्य रहे होंगे, कोई बहुत जघन्य कर्म किये होंगे इसीलिये उनको इस जन्म में निम्न योनि मिला है। इसीलिये धार्मिक मनुष्य को भी सदा सतर्क रहना चाहिये। उससे भी जघन्य अपराध करने से 'जायस्व-मृयस्य ' मच्छड़-खटमल रोज पैदा होने और मरने की योनि में जन्म होता है। जैसा हम बोते हैं वैसा ही काटना पड़ता है। यही कर्म का सिद्धान्त है। 
इसलिये मास्टर महाशय ने पूर्व जन्म में अच्छे कर्म किये थे, जिसके फल स्वरुप उन्हें भगवान श्रीरामकृष्ण के सानिध्य में रहने का सौभाग्य मिला था। कब, जब वे अपने सांसारिक जीवन बिल्कुल अनासक्त हो गए थे, तब वे ठाकुर के पास पहुंचे थे। और श्री रामकृष्ण देख रहे थे, कि उनमें कुछ बहुत अच्छे गुण हैं, यदि वह अपने सांसारिक कर्तव्य से बंधा हुआ न रहेगा, तो मैं उन गुणों का उपयोग मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन के प्रचार-प्रसार में करूँगा, जिससे बहुत से मनुष्यों का कल्याण होगा। 
एक बार श्रीरामकृष्ण को यह सुनने में आया कि नरेन्द्रनाथ की शादी हो सकती है ,कोई बहुत धनी व्यक्ति यह प्रयास कर रहा था कि यदि ये मेरी पुत्री से शादी कर लेंगे तो मैं इनके लंदन जाने का पूरा खर्च दूंगा। ताकि वे वहाँ बैरिस्टर बन सकें। जब ठाकुर ने यह सुना तो दौड़ कर माँ काली के पास गए और उनसे प्रार्थना किये, ' माँ ओके बाँधीस ने ' माँ काली ही श्रीरामकृष्ण हैं, और श्रीरामकृष्ण ही भगवान हैं,  फिर वे वैसा क्यों किये ? लोगों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने के लिये,  ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति यदि  संन्यास ग्रहण करने की सोचे तो कोई उसे बुरा-भला न कहने लगें, कि ठाकुर स्वयं विवाहित थे, मास्टर महाशय भी विवाहित थे इसको क्यों संन्यास लेना चाहिये ? चाहे कोई व्यक्ति विवाहित हो या अविवाहित हो, यदि वह संसार के किसी विषय-भोगों में थोड़ा भी आसक्त न हो, तभी वह श्रीरामकृष्ण के मिशन - ' BE AND MAKE ' आंदोलन का नेता बन सकता है। गृहस्थ या संन्यासी होने से फर्क नहीं पड़ता  इसीलिये प्रत्येक संध्या आरती के समय हमलोग ' त्याजी -रिनाउंसिंग व्हाट? ' जाती, कुल और मान' उच्च जाती का गर्व, ऊँची फैमिली का गर्व, मान अर्थात अहंकार--- इन तीन चीजों को बिल्कुल निंदनीय वस्तु समान त्याग देना होगा। 
 यह प्रार्थना स्वयं स्वामीजी के शब्द हैं, जो श्रीरामकृष्ण से बिल्कुल एक थे, वे हमें शिक्षा दे रहे हैं अतः प्रार्थना के समय एक एक शब्द के अर्थ पर मनन करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए नहीं तो संध्या-आरती भी तबले हारमोनियम के साथ एक इन्टरटेर्मेंट संगीत बन जायेगा। क्योंकि प्रार्थना के समय वे शब्द अत्यंत तीव्र गति से निकलते हैं - ' खण्डन भव बंधन - सांसारिक बंधन,  कट द बॉन्डेज ऑफ़ जाती, कुल मान  ! 
बहुत से लोग कहते हैं, मैं तो बंगाली नहीं हूँ, इस आरती को कैसे समझूँ ? किसी भक्त के मुख से ऐसे शब्द नहीं निकलने चाहिये। जो भी श्रीरामकृष्ण  का नाम लेता है, वह मेरा गुरु है ! स्वामी विवेकानन्द कहते हैं , जो कोई भी मनुष्य श्रीरामकृष्ण का नाम ले रहा है, मैं उसके दास के दास का भी दास हूँ ! क्यों ? क्योंकि जब तक आप इस साधारण से दिखने वाले मनुष्य को साक्षात् भगवान के रूप में नहीं देखते, पुरे हृदय से ठाकुर, माँ, स्वामीजी की शिक्षा पर विश्वास नहीं करते ; आप कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकेंगे। उनके उपदेश भी सुनने में अत्यंत सरल हैं, पर उनका अर्थ बहुत गहरा है, तुम्हें ईश्वर लाभ करने के लिए कुछ नहीं करना है, बस इतना समझ लेना है कि - ' तुम कौन हो, और मैं कौन हूँ ? ' इस पंचम वेद श्री रामकृष्ण वचनामृत में हम इन बातों को बार बार सुनेंगे कि भगवान जब स्वयं मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं तो किस प्रकार मनुष्यों को अपना सच्चा स्वरूप जानने के लिये प्रोत्साहित करते है ! स्वामी अभेदानन्द जी महाराज द्वारा रचित प्रणाम मंत्र है - शब्दों पर ध्यान दें  -
ॐ निरंजनं नित्यमनन्तरूपं
भक्तानुकम्पा धृतविग्रहं वै ।
ईशावतारं परमेशमिड्यं
  त्वं रामकृष्णं शिरसा नमामि ।। 
[फॉर स्टडी सर्कल : सार संक्षेप - रमणीय आचरण, कपूअ  आचरण ! सद्कर्म ही करना होगा नहीं तो निम्नतर योनियों में भी जा सकते हैं। 'फोर्बिडन ऐक्शन' निषिद्ध कर्म बतलाया गया है, जिसे करने से दण्ड मिलेगा। बुरा कर्म करने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है, लोग तुम्हें ही इतना सम्मान क्यों देते हैं ? क्या तुम्हारे सिर में दो सींग निकले हैं ?   तुम दूसरों से भिन्न हो, क्यों अलग हुए ? कर्मफल के कारण !
  श्रीरामकृष्ण जैसे ही मास्टर महाशय को देखते हैं, उन्हें पहचान लेते हैं, कहते हैं -" मैंने तुमको चैतन्य के दल में देखा है। " केवल उनको ही नहीं जब वे नरेन्द्रनाथ को देखते ही, दोनों हाथ जोड़ कर कहते हैं -" मैं जानता हूँ प्रभु, आप वही नर ऋषि हैं, नारायण के अवतार हैं; लोगों के दुःख और कष्ट दूर करने के लिये जगत में आये हैं। "  ' माँ ओके बाँधीस ने '' पहले जो राम बनकर आये थे, कृष्ण बनकर आये थे वे ही अभी इस शरीर में रामकृष्ण के रूप में हैं !'  ' खण्डन भव बंधन - सांसारिक बंधन,  कट द बॉन्डेज ऑफ़ जाती, कुल मान  !  
जो भी श्रीरामकृष्ण  का नाम लेता है, वह मेरा गुरु है ! मैं उसके दास के दास का भी दास हूँ ! भगवान जगन्नाथ आम मानव शरीर की भांति ही पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करते हैं। ' 
सिद्धार्थ का बुद्ध में रूपांतरित हो जाना -' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया 'की कथा है ! 'दुनिया में सबकुछ दुःख है' - यह बात किसके लिये सत्य है ? फॉर दोज हू हैज अंडरस्टुड  ऐंड नॉट फॉर ऑल ! 
 जब तक आप इस साधारण से दिखने वाले मनुष्य को साक्षात् भगवान के रूप में नहीं देखते, पुरे हृदय से ठाकुर, माँ, स्वामीजी की शिक्षा पर विश्वास नहीं करते ; आप कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकेंगे।]
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Friday, July 17, 2015

पंचम वेद- [2] ' सब अवतारों में श्रेष्‍ठ, हे रामकृष्‍ण, तुम्‍हे प्रणाम।'

" स्वामी विवेकानन्द के गुरु- 'अवतारवरिष्ठ' श्रीरामकृष्ण परमहंस "    

ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे।
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः॥

-Salu­ta­tions to you, O Rama­kri­shna, the estab­lisher of dharma, the embod­i­ment of all reli­gions, and the paragon of avataras.
 अर्थात 'धर्म के प्रतिष्‍ठाता, सर्वधर्मस्‍वरूप, सब अवतारों में श्रेष्‍ठ, हे रामकृष्‍ण, तुम्‍हे प्रणाम।'
 
जब-जब धर्म का हास होता है, तब-तब धर्म के पुन:स्‍थापन के लिए भगवान की विशेष शक्ति का आविर्भाव होता है। श्रीरामकृष्‍ण परमहंस भी एक ऐसे ही अवतार हैं, जो धर्म की पुर्नस्‍थापना के लिए इस धरती पर आए थे। वे किसी विशेष धर्म, जाति या राष्‍ट्र के लिए नहीं आए थे वरन् समग्र मानवता की भलाई के लिए इस धरा पर अवतरित हुए थे। किन्तु जब स्वामी विवेकानन्द अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस को 'अवतारवरिष्ठ' कहकर उनकी उपरोक्त पूजा मंत्र लिखते हैं - तो कई लोग 'अवतारवरिष्ठ' को पढ़कर भ्रम में पड़ जाते हैं।  
किसी भी पेशे में, या ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में चाहे वह मेडिकल (चिकत्साविज्ञान) का क्षेत्र हो या वकालत का हो, कोर्स पूरा करने के बाद कुछ वर्षों तक किसी सीनियर के अंडर प्रशिक्षण लेना (internship ) बहुत अनिवार्य माना जाता है। फिर स्वतंत्र प्रैक्टिस करने का सर्टिफिकेट मिल जाता है। किन्तु ज्ञान के साथ साथ अनुभव का रहना भी आवश्यक होता है, डिग्री तो सभी डॉक्टर के पास रहती है, किन्तु मनुष्य किसी अनुभवी डॉक्टर से ही इलाज करवाना चाहता है। अनुभवी डाक्टरों या वकीलों को अधिक योग्य माना जाता है।  हम देखते हैं कि जिस प्रकार हर पेशे में श्रेणी-निर्धारण करना आवश्यक होता है, और मनुष्य सर्वोत्तम के पास जाने की इच्छा रखता है। उसी प्रकार ईश्वर-अवतार के क्षेत्र में भी 'श्रेणी-निर्धारण' करने के बाद ही हमें किसी सर्वश्रेष्ठ अवतार को अपने आदर्श या इष्टदेव के रूप में चयन करना चाहिये। 
विगत एक हजार वर्षों में बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम आदि विभिन्न धर्मों के अभ्युदय और प्रधानता के कारण तथा विभिन्न देवताओं की उपासना, तंत्र आदि के मार्गों के प्रचलन के कारण भारतवर्ष में एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी। अनेक धर्म- मतों के अनुयायी राजशक्ति की सहायता से अपने- अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए परस्पर संघर्षरत हुए थे। ‘‘केवल मेरा धर्म ही सत्य है’’-  इस भाव से बहुत कुछ रक्त इस धरती पर बहा है। 
ऐसे में भगवान श्री रामकृष्ण की जीवन- साधना अवतरित हुई व उसने बता दिया कि सभी धर्म- मत सत्य हैं, जितने मत- उतने पथ हैं।  इसीलिए तो श्री रामकृष्ण के संबंध में भाव- विभोर होकर स्वामी विवेकानंद कह उठते हैं, ‘‘उनका जीवन एक असाधारण प्रकाश स्तंभ है, जिसके तीव्र प्रकाश से लोग हिंदू धर्म के समस्त अंग और आशय को समझ सकेंगे। ऋषि और अवतार (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) जिस यथार्थ शिक्षा को देना चाहते थे, वह उसे अपने जीवन से दे गए हैं। शास्त्र-मत वाद मात्र हैं, परंतु वह थे उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति। श्री रामकृष्ण ने इंक्यावन वर्षों के जीवन से पाँच हजार वर्षों का जातीय- आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करके भावी वंशधरों के लिए अपने को दृष्टांत रूप बना गए हैं।’’
जिसने ब्रह्म को केवल जाना है, उसे ब्रह्मविद् कहते हैं। किन्तु जिसने ब्रह्म को अच्छी तरह से जान लिया हो, उसे ब्रह्मविदोत्तम कहा जाता है। कुछ लोग आत्मसाक्षात्कार करके ब्रह्मज्ञ तो हो सकते हैं, किन्तु कोई मनुष्य अपने मुँह से यह दावा नहीं कह सकता, " कि मैंने ब्रह्म को अच्छी तरह से जान लया है- वे ऐसे (निराकार) ही हैं, वैसे (साकार) नहीं हो सकते!"
किन्तु 'धर्म एवं हठधर्मिता ' के अंतर को बहुत सरल भाषा में स्पष्ट करते हुए अवतारवरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्ण ( किसी वैष्णव गोस्वामी से)  कहते हैं - " यदि आन्तरिकता हो तो सभी धर्मों से ईश्वर मिल सकते हैं। वैष्णवों को भी मिलेंगे तथा शाक्तों, वेदान्तिओं और ब्राम्हों को भी, मुसलमानों और ईसाईयों को भी। कोई कोई झगड़ा कर बैठते हैं। वे कहते हैं कि-हमारे श्रीकृष्ण को भजे बिना कुछ न बनेगा, या हमारी काली माता को भजे बिना कुछ न होगा; अथवा हमारे ईसाई बपतिस्मा ग्रहण किये बिना कुछ न होगा। इसी बुद्धि का नाम हठधर्मिता (मतुआर बुद्धि - dogma)है। -अर्थात मेरा ही धर्म ठीक है और बाकि सबका गलत। यह बुद्धि खराब है| ईश्वर के पास हम बहुत से रास्ते से पहुँच सकते हैं। " 

ठाकुर की घोषणा है - सत्य का अन्वेषण किसी भी मार्ग से किया जा सकता है ! "विथ सिन्सेरिटी ऐंड अर्नेस्टनेस वन कैन रियलाइज गॉड थ्रू ऑल रिलीजन्स"। ' ब्रह्मज्ञ और भगवान' में क्या अंतर है, उसे समझाने के लिए ठाकुर 'अन्धे और हाथी ' का दृष्टान्त :  
कुछ अन्धे एक हाथी के पास गये थे। एक ने बता दिया, इस चौपाये का नाम हाथी है। तब अंधों से पूछा गया, हाथी कैसा है ?  वे हाथी का देह छूने लगे। एक ने कहा, हाथी खम्भे के आकार का है ! उसने हाथी का पाँव ही छुआ था। दूसरे ने कहा हाथी सूप की तरह है, उसके हाथ हाथी के कान पर पड़े थे। 
 Interpretation of 'Blind Men and the Elephant'

किसी ने उसके दाँतों को पकड़ा, तो कहा हाथी भाले के जैसा होता है । इसी तरह किसी ने पेट पकड़ कर कुछ (दीवार) कहा, किसी ने सूंड़ पकड़कर कुछ (अजगर) कहा, तो किसी ने पूँछ पकड़ कर कहा हाथी रस्सी के आकार का होता है।
उसी प्रकार सत्य के विषय में आंशिक रूप से सभी ठीक ही कह रहे हैं, किन्तु क्या वे पूर्ण सत्य को समझ सके हैं ? नहीं, क्यों ? क्योंकि उनके ज्ञान में अंतर अवश्य था। 

 

लगभग ऐसा दिखेगा अंधों के द्वारा देखा गया सम्मिलित हाथी

ऐसे ही ईश्वर के संबन्ध में जिसने जितना देखा है, उसने यही सोचा है कि ईश्वर बस ऐसे ही हैं, और कुछ नहीं। उसी प्रकार ईश्वर, अपरिवर्तनशील सत्ता या सत्य के विषय में भी सभी सत्य ही कह रहे हैं, किन्तु आंशिक सत्य ही कह रहे हैं।  
तो क्या कोई व्यक्ति ऐसा है, जो पूर्ण सत्य के विषय में बता सकता है ? वो तो वही हो सकता है, जो स्वयं भगवान ईश्वर हो किन्तु मनुष्य के रूप में अवतरित हुआ हो ! एक बार (११ मार्च १८८२ को) साकार-निराकार ईश्वर का उल्लेख करते हुए श्री'म' गॉस्पेल ऑफ़ श्रीरामकृष्ण में लिखते हैं -  श्रीरामकृष्ण के सामने दक्षिणेश्वर के कोई सज्जन जो अपने घर पर वेदान्त पर चर्चा कर रहे हैं,  शब्दब्रह्म पर चर्चा करते हुए केदार चटर्जी से बोलते हैं - 

" दिस इटरनल वर्ड -यह अनाहत शब्द (ॐ) सदैव अपने भीतर और बाहर हो रहा है। "  

श्रीरामकृष्ण - " केवल ॐ कार शब्द (स्फ़ोट-बिग बैंग) होने से ही तो सब कुछ नहीं हुआ। ' देयर मस्ट बी समथिंग इंडीकेटेड बाई द वर्ड.' उस शब्द का द्योतक कोई साकार वस्तु भी तो होनी चाहिये। - तुम्हारा केवल नाम सुन लेने से ही क्या मुझे पूरा आनन्द हो सकता है ? बिना तुमको देखे सोलहों आने आनन्द नहीं होता।"
[ 'कैन योर नाम अलोन मेक मी हैप्पी ? कम्पलीट हैप्पीनेस इस नोट पॉसिबल फॉर मी अन्लेस आई सी यू.']
 सज्जन बोले - (मेरे लिये) वह शब्द ही ब्रह्म है -अनाहत शब्द। 
श्रीरामकृष्ण (केदार से) - अहा, समझे तुम ? इनका ऋषियों का सा मत है। ऋषियों ने श्रीरामचन्द्र से कहा -'राम,हम जानते हैं कि तुम दशरथ के पुत्र हो। भरद्वाज आदि ऋषि भले ही तुम्हें अवतार जानकर पूजें, पर हम तो अखण्ड सच्चिदानन्द को चाहते हैं। यह सुनकर राम हँसते हुए चल दिए। 
केदार - ऋषियों ने राम को अवतार नहीं जाना। तो वे नासमझ थे। 
श्रीरामकृष्ण (गंभीर भाव से)- तुम ऐसा मत कहना ! जिसकी जैसी रूचि ! और जिसके पेट में जो चीज पचे! 
" ऋषि ज्ञानी थे, इसीलिये वे अखण्ड सच्चिदानन्द को चाहते थे। पर भक्त अवतार को चाहते हैं, भक्ति का स्वाद चखने के लिये। ईश्वर के दर्शन से मन का अन्धकार (अहंकार) हट जाता है। पुराणों में लिखा है, 'जब श्रीरामचन्द्र सभा में पधारे, तब वहाँ मानो सौ सूर्यों का उदय हो गया ! तो प्रश्न उठता है कि सभा में बैठे हुए लोग जल क्यों नहीं गये। इसका उत्तर यह है कि उनकी ज्योति (ब्रिलिएंस ऑफ़ रामा) जड़ ज्योति नहीं है । जिस प्रकार सूर्य के निकलने से कमल खिल जाते हैं, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्र को देखने मात्र से सभा में बैठे हुए सभी लोगों के हृदयकमल खिल उठे ! " ये शब्द कहते ही आप समाधिमग्न हो गये ! 
बड़ी देर बाद समाधि टूटी। श्रीरामकृष्ण लम्बी साँस छोड़कर बारम्बार रामनाम उच्चारण कर रहे हैं। नाम के प्रत्येक वर्ण से मानो अमृत टपक रहा है। श्रीरामकृष्ण बैठे। भक्त भी चारों तरफ बैठकर उनको एकटक देख रहे हैं। 
श्रीरामकृष्ण -" अखण्ड सच्चिदानन्द (इंडीभिजीबुल एक्सिस्टेंस-नॉलेज-ब्लिस) को सब कोई थोड़े ही समझ सकता है ! परन्तु भक्ति उसी की पक्की है, जो नित्य को पहुँचकर विलास के उद्देश्य से लीला लेकर रहता है।.…… ईश्वर को सिर्फ साकार कहने से क्या होगा ? वे श्रीकृष्ण की तरह मनुष्यरूप धारण करके आते हैं, यह भी सत्य है; अनेक रूपों से भक्तों को दर्शन देते हैं, यह भी सत्य है ; और फिर वे निराकार अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, यह भी सत्य है। वेदों ने उनको साकार भी कहा है, निराकार भी कहा है, सगुण भी कहा है निर्गुण भी। "
भक्त निर्वाक् होकर यह अवतार-तत्व सुन रहे हैं। कोई कोई सोच रहे हैं, ' क्या आश्चर्य है ! वेदोक्त अखण्ड सच्चिदानन्द -जिन्हें वेद ने 'मन-वचन' से परे बताया है-क्या वे ही हमारे सामने साढ़े-तीन हाथ का मनुष्य-शरीर लेकर आते हैं ? जब श्रीरामकृष्ण स्वयं कह रहे हैं, तो वैसा अवश्य ही होगा। ' क्यों ? 
किसी साधारण ब्रह्मविद् (ब्रह्मज्ञ) के कथन के अपेक्षा ब्रह्मविदोत्तम भगवान श्रीरामकृष्ण का कथन क्यों अधिक विश्वसनीय लगता है ? इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता ७/२६ में कहा है -

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ।।
[अर्जुन = हे अर्जुन ; समतीतानि = पूर्व में व्यतीत हुए ; च = तथा ; भविष्याणि = आगे होनेवाले ; भूतानि = सब भूतों को ; अहम् = मैं ; वेद = जानता हूं ; च = और ; वर्तमानानि = वर्तमान में स्थित ; तु = परन्तु ; माम् = मेरे को ; कश्र्चन = कोई भी (श्रद्धाभक्तिरहित पुरुष) ; न = नहीं ; वेद = जानता है ]
हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परंतु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्ति रहित पुरुष नहीं जानता ।
भगवान ही भगवान के विषय में जब बतलायेंगे तो वह विश्वसनीय लगेगा ही, क्योंकि परमसत्य या ईश्वर जो देश-काल-निमित्त () से परे रहते हैं, वे स्वयं जब योगमाया की सहायता से अवतीर्ण होते हैं, तो उन्हें जन्म के समय से ही यह स्मरण रहता है कि वे कौन हैं ! किन्तु अन्य सभी प्राणी-
 'सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ।। गीता ७/२७ ।। 
क्योंकि स्थूल देह की उत्पत्ति के साथ ही साथ जीव मायामुग्ध या अविद्या माया से ग्रस्त हो जाते हैं, अनात्म वस्तु (शरीर,मन,इन्द्रिय) में आत्मबुद्धि (मैं M/F शरीर हूँ )करते हैं, इसी कारण वे भगवान को नहीं जान सकते। मोह-रहित होना, अर्थात विद्यामाया की कृपा से अविद्यामाया को दूर हटाना ही उसका एकमात्र उपाय है। इसी कारण श्रीरामकृष्ण कहते हैं - " महामाया का द्वार पार हो सकने से ईश्वर का दर्शन होता है। अतः महामाया की दया आवश्यक है। इसी कारण शक्ति की उपासना है। महामाया प्रसन्न होकर जीव को मोह-रहित करदें तो ईश्वर का दर्शन सम्भव है ! " विद्या और अविद्या माया को श्रीरामकृष्ण ने अपने और श्री'म' के बीच हुए वार्तालाप में स्पष्ट रूप से समझाया है ।
यहाँ जो स्वयं ईश्वर हैं सत्यस्वरूप "ठाकुर" हैं; वे भी जब उस ब्रह्म के बारे में बतलाना चाह रहे हैं, जो सत्यस्वरूप हैं और देश-काल-निमित्त के परे हैं, तो स्वयं देश-काल-निमित्त के अंर्तगत रहने के कारण पूर्ण रूप से उनका वर्णन करने में अपने को असमर्थ पाते हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, " मैं तुमलोगों को ईश्वर के बारे में जगतजननी जगदम्बा के बारे में सब कुछ बताना चाहता हूँ, पर लगता है कोई मेरा गला दबा देता है, और मैं बोल नहीं पाता। टाइम-स्पेस और कॉजेशन के भीतर रहते हुए कोई मनुष्य अपने मुख से नहीं कह सकता कि मैं ईश्वर को अच्छी तरह से जानता हूँ ! तुम्हें स्वयं ईश्वर की अनुभूति करनी होगी !"
 इसके लिये पहले तुम्हें शास्त्रों और गुरुवाक्य पर श्रद्धा रखनी होगी, उनके वचनों पर विश्वास करना होगा।
किन्तु जैसे ही विश्वास करने की बात आती है, आधुनिक मन चीत्कार कर उठता है ! जब तक मैं परीक्षा करके स्वयं नहीं जान लूँ, तो मैं भगवान पर विश्वास कैसे कर सकता हूँ ? ठीक है, उच्च पदस्थ और उच्च डिग्री के लोगों की बातों का सीधा-सीधा विरोध कर देना उचित नहीं है, किन्तु उनके विचारार्थ कुछ न्यायोचित तर्क तो रखे ही जा सकते हैं। जैसे - जब आप सफ़ेद वर्दी पहने किसी पॉयलट द्वारा चालित जहाज में सफर करते हैं तो क्या आप स्वयं उसका क्रेडेंशियल -जहाज उड़ाने का सर्टिफिकेट देखते हैं ? नहीं आप विश्वास कर लेते हैं कि जब यह व्यक्ति पॉयलट की कुर्सी पर बैठा है, तो किसी अधिकृत व्यक्ति ने अवश्य उसका क्रेडेंशियल जाँच लिया होगा। चूँकि आप विश्वास करते हैं कि उस पाइलट को जहाज उड़ाने का अनुभव अवश्य होगा, इसलिये आप बिना कोई शंका किये-बहुत आराम से शांतिपूर्वक आगे की सीट पर जाकर बैठ जाते हैं। जो एयर होस्टेस आपको खाने-पीने का समान देती है, तो क्या आप उसको पहले मिलावट टेस्ट करने को कहते हैं, उस पर भी आप विश्वास करके बिना जाँचे खा लेते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में, हर कदम पर हम विश्वास करने के बाद ही आगे बढ़ते हैं, जिनको हम अपना पिता मानते हैं, हो सकता है अपने न हों, किन्तु हम उन पर बिना डीएनए टेस्ट किये विश्वास कर लेते हैं। उस मानव-मूर्ति को जिसे हम अपना पिता कहते हैं,उस पर भी हम विश्वास करते हैं।
किन्तु जैसे ही भगवान पर विश्वास करने की बात आती है, हमोग इतने अधिक साइंटिफिक माइंड वाले बन जाते हैं, और उन पर विश्वास करना नहीं चाहते हैं। क्यों ? इसे भी गीता में समझाया गया है, क्योंकि हमलोगों को अपने अतीत का जीवन या पूर्व जन्म का कोई ज्ञान नहीं हैं । धीरे धीरे हम वह सब भी समझ सकेंगे। अर्जुन को भी, जबकि वे सदा भी श्रीकृष्ण के साथ रहते थे, वे इस बात पर विश्वास नहीं था कि श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान हैं! किन्तु आगे चलकर गीता के विभूतियोग अध्याय में (गीता १०/१२-१३ में) अर्जुन कहते हैं - 

परं ब्रह्रा परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ।।
आहुस्त्वामृषय: सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यास: स्वयं चैव ब्रवीषि मे ।।

आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी वैसा ही कहते हैं, और उनका जीवन ऐसा है कि वे कभी झूठ नहीं कह सकते हैं। क्यों ? क्योंकि उनका जीवन एक स्वच्छ दर्पण के समान है। और- 'स्वयं चैव ब्रवीषि मे' -- स्वयं आप ने भी मुझसे यही कहा है, इसीलिये मैं आप पर विश्वास करता हूँ ! 
कोई कहते हैं कि अपनी आँखों से देखे बिना मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता , किन्तु क्या हमने कभी स्वयं  कभी अपनी आँखों से अपनी आँखों को देखा है ? तब तो तुम्हें यह भी नहीं मानना चाहिये कि तुम्हारे पास ऑंखें हैं। क्योंकि तुमने स्वयं अपनी आँखों से कभी अपनी आँखों को नहीं देखा है। दर्पण के माध्यम से ही देख सकते हो, तुम अपनी आँखों को डायरेक्टली कभी नहीं देख सकते। किसी फोटो में भी देख सकते हैं, किन्तु कोई न कोई मिडिया- या माध्यम तो आवश्यक है। 
उसी प्रकार हमलोग भगवान बुद्ध, श्रीचैतन्य, प्रभु ईसामसीह, गुरु नानक, श्रीरामकृष्ण के जीवन रूपी दर्पण के माध्यम से भगवान को क्यों नहीं देख सकते ? उनके जीवन रूपी दर्पण से भगवान ही प्रतिबिंबित होते हैं। किन्तु कभी कभी दर्पण दूर में रहने से वस्तु स्पष्ट नहीं दिखती, इसीलिये सदा किसी वैसे ही जीवन्त जीवन के सानिध्य में रहने से विश्वास होता है - 'स्वयं चैव ब्रवीषि मे' -- स्वयं आप ने भी मुझसे यही कहा है, इसीलिये मैं आप पर विश्वास करता हूँ !  
श्रीरामकृष्ण में अहं बिल्कुल नहीं था, वे कभी 'मैं ' नहीं कहते थे- 'यह' कहते थे। उनमें अहंकार लेशमात्र नहीं था। किन्तु वे कभी कभी यह भी कहते थे कि दिन भर में कुछ समय 'मुझे' भी स्मरण कर लिया करना। तब तुम्हें ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त हो जायेगा, मुक्ति मिल जाएगी ! अपने अंतरंग भक्तों से अपने विषय में उन्होंने यहाँ तक कहा है -
" जो कुछ भी तुम देख रहे हो, सब कुछ मेरे भीतर ही है। जो राम हैं, जो कृष्ण हैं -इस समय वे ही रामकृष्ण हैं ! " इसका अर्थ क्या हुआ ? यहाँ मानो गीता १८/६६ के श्रीकृष्ण के समान वे भी कह रहे हैं - 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।
 सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर ! 
किन्तु यहाँ भी हठधर्मिता से सावधान रहना चाहिये- आज से पाँच सौ वर्ष पहले असम में शंकरदेव (१४४९ -१५६८ ई ०) ने "एक देव (वन गॉड), एक हेव (वन बुक), एक बिना नेई  केव" अर्थात एक भगवान, एक शास्त्र के आलावा दूसरा कोई भगवान नहीं है । वह एक देव कौन हैं ? वे केवल श्रीकृष्ण को ही - भगवान मानते हैं, क्योंकि गीता में उन्होंने कहा है - 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' ! वे कृष्ण के आलावा, भगवान के अन्य रूप में पूजा करने के कट्टर विरोधी हैं । उन्होंने श्रीकृष्ण को ही एकमात्र देव मानकर 'एकशरण सम्प्रदाय' की स्थापना की थी। वे लोग भी वैष्ण हैं, किन्तु श्रीकृष्ण के मूर्ति की पूजा नहीं करते, वे अपने मंदिरों के वेदी पर श्रीमद्भागवत को श्रद्धापूर्वक रख कर उसी पुस्तक की पूजा करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण के कथन-'केवल मेरे शरण में आओ,केवल मुझपर विश्वास करो ' के व्यापक अर्थ को पूर्णतः नहीं समझ पाने के कारण, दूसरे धर्म और भगवान के प्रति एक असहिष्णु और संकीर्ण मत तैयार हो गया। आमतौर पर ऐसा भ्रम हो ही जाता है।  किन्तु स्वयं वही भगवान श्रीकृष्ण,जिनकी पूजा वे करते हैं, उन्होंने ने ही गीता ४/११ में कहा है - 
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ।।
हे अर्जुन ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, कहीं भी किसी भी रूप में मुझे भजता है, मैं उसकी पूजा को स्वीकार करता हूँ ! मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं । 
जब वही योगेश्वर कृष्ण कह रहे हैं कि मनुष्य जिस भाव से भगवान् को अपनाते, उनसे प्रेम करते और आनंदित होते हैं, भगवान् उन्हें उसी तरह अपनाते, उनसे प्रेम करते और आनंदित होते हैं। तो भी हमलोग उनके कथन का संकीर्ण अर्थ ही क्यों लेते हैं ?  जैसे किसी छोटे लड़के को पिता आदेश दे कि तुम कल से सुबह में दो घंटे पढ़ाई करोगे, और केवल शाम को एक घंटे खेलोगे। किन्तु लड़का अपनी माँ से कहता है, मैं पिताजी की सभी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता, मैं तो शाम को दो घंटा पढूंगा और सुबह में खेलूंगा ! मेरे लिए यही ठीक होगा। इसी प्रकार लोग, सदगुरु या भगवान के वचनों की अनदेखी करके अक्सर संकीर्ण मन से सोचने लगते हैं। क्यों ?  सिर्फ 'अहंकार' के कारण - चाहे शास्त्रों मैं जो लिखा हो, भगवान ने चाहे जो भी कहा हो, जब मैं कह रहा हूँ कि मेरा मत ही श्रेष्ठ है, तो सबको उसे ही मानना पड़ेगा, यही अहं-केंद्रित मानसिकता हमें संकीर्ण बना देती है ।
जिस प्रकार देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास जैसे महान गुरु, असाधारण ऋषि जब यह कहते हैं कि श्रीकृष्ण ही ब्रह्म हैं, तो अर्जुन उन्हें भगवान के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। उसी प्रकार जब वर्तमान युग के एक्सलेंट, असाधारण, उत्कृष्ट ऋषि - स्वामी विवेकानन्द, स्वामी ब्रह्मानन्द, स्वामी तुरियानन्द, स्वामी अभेदानन्द, स्वामी शिवानन्द के अतिरिक्त हमारे समकालीन युग के ऋषि - श्रीनवनीहरण मुखोपाध्याय, अध्यक्ष, अखिल भारत विवेकानन्द युवामहामण्डल;  भी यही घोषणा कह रहे हैं कि श्रीरामकृष्ण परमहंस ही परमब्रह्म हैं ! आप जब इन आधुनिक ऋषियों के जीवन को देखेंगे तो आपको ज्ञात होगा उनका जीवन, पूर्णतः भारत के राष्ट्रीय आदर्श ' त्याग और सेवा ' के बल से ही गठित हुआ है। जब वे कह रहे हैं कि श्रीरामकृष्ण केवल अवतार ही नहीं अवतारवरिष्ठ हैं, तब आप उन्हें भगवान क्यों नहीं मान रहे हैं ? 
जब स्वयं श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, जिनमें -'iota of ego'  अहंकार का लेशमात्र नहीं था, (माँ सारदा के साथ उनके दाम्पत्य जीवन को देखें) तो भी हम उनको ब्रह्म मानने में असमर्थ क्यों हैं ? सिर्फ अपने अहंकार के कारण। हम कहते हैं - मेरा ईश्वर, मेरे गुरु, मेरे अपने लोग जिसे भगवान समझते हैं, बस वे ही एकमात्र प्रभु हैं, उनका कोई दूसरा रूप हो ही नहीं सकता। 
इस पंचम वेद 'श्रीरामकृष्ण वचनामृत' में ठाकुर ने केवल आध्यात्मिकता का उपदेश दिया है। जब श्री'म', इस पुस्तक के लेखक श्रीरामकृष्ण से पहली बार मिलते हैं, उस समय तक श्रीरामकृष्ण तात्कालीन भारत की राजधानी कोलकाता के प्रबुद्ध समाज के बीच फेमस हो चुके थे। किन्तु प्रथम भेंट के समय मास्टर महाशय तैयार नहीं थे, उनका एक मित्र और रिश्तेदार उन्हें श्रीरामकृष्ण के पास ले गया था, क्योंकि तब उनका मन पारिवारिक कारणों से बहुत चंचल था। वे मन की शांति पाने के उद्देश्य- से गए थे,जब उन्होंने वहाँ श्रीरामकृष्ण को भक्तों के साथ भगवत चर्चा करते सुना, तो उनका मन बिल्कुल शांत हो गया, वे उनके प्रति इतने अधिक आकृष्ट हो गए कि उस मीटिंग का सही डेट नहीं लिख सके। किन्तु उस समय तक कलकत्ते का प्रबुद्ध समाज और कई ज्ञानी-ध्यानी लोग उनके अनुयायी बन चुके थे। उनसे मिलने के केवल तीन दिन पहले कलकत्ते के उच्चशिक्षा प्राप्त,अत्यंत ज्ञानी श्रीकेशवचन्द्र सेन एवं एक अमेरिकन पादरी जोसेफ कुक के साथ श्रीरामकृष्ण जहाज में बैठकर घूमने गए थे। उनके पूर्व ही श्रीरामकृष्ण के दूसरे कई प्रख्यात व्यक्ति शिष्य बन चुके थे।
 १८७९ ई० में डॉक्टर राम दत्त एवं मनमोहन ठाकुर के पास आये थे। इसके बाद हम देखते हैं कि ठाकुर १९८० से १९८६ तक मात्र छः वर्षों तक शरीर में रहकर अपने विशाल ज्ञान को प्रचारित किया था, फिर उनके महान पुत्र स्वामी विवेकानन्द केवल १० वर्षों में उसी ज्ञान को सम्पूर्ण विश्व में प्रचारित कर दिया था। १८८० में केदार, सुरेन्द्र, चुनी, लाटू, ननिगोपाल, तारक आये थे, ठाकुर केवल श्रीसुरेन्द्र से ही आर्थिक सहायता लेना स्वीकार करते थे, किसी माड़वाड़ी भक्त ने १०,००० देने चाहे तो ठाकुर और माँ दोनों ने अस्वीकार कर दिया था। दूसरे भक्त बलराम बोस थे, जिनके घर जाकर ठाकुर उनका भोजन ग्रहण कर सकते थे। वे कहते थे, बलराम का अन्न शुद्ध अन्न है।वे अन्न या दान ग्रहण करने में चूज़ी क्यों थे, देने वाले का चयन करने में सावधान क्यों रहते थे, इसकी व्याख्या हम नहीं कर सकते, किन्तु यह सत्य है। 
१८८१ में नरेन्द्र, राखाल, भवनाथ, बाबुराम, श्री 'म' आदि आये थे, और १६ अगस्त १८८६ में ठाकुर का शरीर चला गया था। श्री'म' भगवान श्री रामकृष्ण द्वारा कथित केवल एक वाक्य को सुनकर ही उनकी ओर अत्यंत आकृष्ट हो गए थे, और वह वाक्य था -" जब एक बार हरिनाम या रामनाम लेते ही रोमांच होता है, आँसुओं की धारा बहने लगती है, तब निश्चित समझो कि संध्यादि कर्मों की आवश्यकता नहीं रह जाती। तब कर्मत्याग का अधिकार प्राप्त हो जाता है- कर्म आप ही आप छूट जाते हैं । उस अवस्था में केवल रामनाम, हरिनाम या केवल ॐ का जप करना ही पर्याप्त है। "
' ये आँसू तब बह निकलते हैं, जब ह्रदय आनन्द से भर जाता है ' - श्रीरामकृष्ण इन शब्दों को पूरे अथॉरिटी के साथ या 'चपरास प्राप्त' व्यक्ति के स्वाभाविक प्रभुत्व के साथ कह रहे थे। इसी को आध्यात्मिकता कहते हैं, ईश्वर प्राप्ति या आध्यात्मिकता प्राप्ति के तीन चरण हैं, पहला है रिलिजन या मजहब-धर्म नहीं, जिसका अर्थ होता है केवल धार्मिक अनुष्ठान या रिचुअल्स करते रहना। प्रारम्भ में इसका पालन करना भी बहुत आवश्यक होता है, इसके बिना ईश्वर तक पहुँचने की यात्रा करना बहुत कठिन हो सकती है। इसके पालन के समय भक्त को बहुत अधिक सावधान रहना चाहिये। हाथ-पैर धोकर या स्नान करके पवित्र वस्त्र पहन कर पूरी भक्ति के साथ धार्मिक क्रियापद्धति (अनुष्ठान) को पूरा करना चाहिए। भगवान के लिये सुन्दर, सुगन्धित फूल लाने होंगे, भगवान के लिये भोग को भी बहुत निष्ठा के साथ तैयार करने होंगे। भगवान श्रीरामकृष्ण के गले में हार पहनाते हुए आनन्द होना चाहिये। इसको ही रिचुअल्स कहते हैं, जिसे पूरी भक्ति के साथ करना चाहिए। किन्तु जीवन भर यहीं रुके नहीं रहना चाहिये। यहीं रुके रहे तो समस्या हो जाएगी। धार्मिक कर्मकांड तो केवल भक्ति का सूत्रपात (बिस्मिल्लाह) है, जैसे हम शिक्षा प्राप्त करने के लिये पहले स्कूल में जाते है, फिर कॉलेज में जाते है, विभिन्न वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिये लेब्रोटरी में जाकर प्रैक्टिकल करते हैं। जैसे धीरे धीरे, क्रमशः विभिन्न स्तर का ज्ञान प्राप्त होता जाता है, उसी तरह आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति का भी प्रथम सोपान रिचुअल्स या विधिशास्त्रों का पालन करना है। 
दूसरा सोपान है नैतिकता या चरित्रवान मनुष्य बनना, ईसाई धर्म में कहा गया है- 'लभ दाई नेबर ऐज दाई सेल्फ ' अर्थात मनुष्य को अपने पड़ोसी से उसी प्रकार प्रेम करना चाहिए, जैसा कि वह अपने से करता है। इस्लाम में भी कहा गया है,"ज़कात तुम्हारी कमाई में गरीबों और मिस्कीनों का हक है।" हमलोगों में भी योग के प्रथम चरण में यम-नियम अर्थात ५ डूज़ एंड ५ डोंट्स -ऐसा करो, वैसा मत करो कहा है। फिर दान की बड़ी महिमा बताई गयी है। क्यों ? क्योंकि केवल वे लोग ही दान दे सकते हैं जिन्होंने समझ लिया हो कि ईश्वर क्या हैं ? सभी लोग दान नहीं दे सकते। स्वामीजी कहते थे -' नील डाउन एंड गीव !' देने वाले को मांगने वाले के सामने बहुत विनम्रता के साथ घुटनों के बल बैठकर, दान देना चाहिए, क्योंकि माँगने वाला तुम्हें तुम्हारे हृदय को बड़ा करने का अवसर दे रहा है,शिव ज्ञान से जीव सेवा करने का अवसर दे रहा है। इसलिये माँगने वाला देने वाले से अधिक श्रेष्ठ है ! 
डॉक्टर,लॉयर,टीचर या सरकारी कर्मचारी यदि यही सोचकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करें कि -स्वयं भगवान मेरे पास आये हैं, और मैं उनकी सहायता करने जा रहा हूँ, तो उनका कर्म ही पूजा बन जायेगा। किन्तु यदि वे कहना शुरू कर दें, हे मरीज रूपी ईश्वर तुम मेरे पास आओ ताकि मैं तुम्हारी सेवा कर सकूँ तो समस्या उठ खड़ी होगी। क्योंकि मरीज तो यह नहीं जानता, कि वह ईश्वर है। एक कुत्ता किसी लड़के का पीछा कर रहा था, और लड़का भाग रहा था, कुत्ता भी उसके पीछे भौंकता हुआ दौड़ रहा था। यह देखकर उसके किसी दोस्त ने दूर से कहा क्यों दौड़ रहे हो ? क्या तुमने वह कहावत नहीं सुनी कि भौंकने वाले कुत्ते काटते नहीं हैं ? उस लड़के ने कहा -मैंने तो सुना है, किन्तु क्या उस कुत्ते ने भी सुना है ? उसी प्रकार आप जानते हैं कि वे ईश्वर हैं, किन्तु वे तो नहीं जानते। इसलिये दिल ही दिल में जानते हुए शिव ज्ञान से जीव सेवा करें, बोलते हुए नहीं। 
यहाँ भक्तों के बीच श्रीरामकृष्ण केवल भगवद्-चर्चा कर रहे हैं, और मास्टर महाशय आकृष्ट हो रहे हैं। माँ काली के ऊपर बंगला भाषा में एक अनूठा गीत है - "  যারে না দেখে নাম সুনে কানে, মন গিয়ে তায়ে দীপ্ত হলো, মায়ের ভাব কি ভেবে প্রাণ যায় " मैंने नहीं देखा है कि माँ काली वास्तव में कैसी हैं ? मैं उनको नहीं जानता, किन्तु कान द्वारा उनका नाम सुनते ही पता नहीं कैसे मेरा मन उनमें आकृष्ट हो जाता है?  इसी अवस्था में पुनर्जन्म को स्वीकार करना पड़ता है। मास्टर महाशय के साथ सिद्धू (सिद्धेश्वर मजूमदार ) भी गए थे, किन्तु उन्होंने नहीं कहा कि मैं दुबारा श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर उपदेश सुनुँगा। किन्तु एक बार मिलते ही श्री'म' को दुबारा कब श्रीरामकृष्ण से मिलूं, इसकी व्यग्रता होने लगी। सिद्धू उतना अधिक आकर्षण क्यों नहीं महसूस किये ? वे  फिर कभी श्रीरामकृष्ण के पास गए या नहीं, उसका उल्लेख नहीं मिलता है। केवल भगवान के प्रति आकर्षण होना ही पर्याप्त नहीं है, संसार के सुखों के प्रति वैराग्य का भाव होना भी आवश्यक है। 
जब तक ये दोनों भाव साधक में नहीं होगा, उसकी प्रगति नहीं होगी। राम और काम एक साथ होना सम्भव नहीं है, जैसे रवि-रजनी एक साथ नहीं रह सकते। किन्तु एक मात्र जनक ही ऐसे थे जो राजर्षि थे, वे ऋषि होने के साथ साथ राजा भी थे। जनक को राजर्षि इसलिए कहा जाता है कि वे राजा होते हुए भी अर्थात राजनेता होते हुए भी ऋषि जैसे वीतराग थे। उनमें सांसारिक सुखों के प्रति थोड़ी भी आसक्ति नहीं थी। जब एक बार राजदरबार में बैठकर वे अध्यात्म चर्चा में लीन थे, तो किसी ने उन्हें सूचना दी कि महाराज आपकी राजधानी मिथिला में आग लग गई है तो राजा जनक का जवाब था -’ मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्याति कश्चन ’ यानी अगर मिथिला जल रही है तो इसमें मेरा भला क्या जल रहा है? वहाँ मेरे लोग हैं, वे जल्दी ही आग को काबू में कर लेंगे। 
किन्तु जब कोई हमारे लिये कोई छोटा सा उपहार भी लाता है, एक पेन बॉक्स, और निकालते वक्त यदि पेन हाथ से छूट गया, तो हम कूद कर उसे पकड़ लेते हैं, जबकि वह पेन अभी तक मेरा हुआ भी नहीं था। जैसे ही कोई कहता है, यह मैं आपको दूँगा उसके प्रति हमारी आसक्ति जाग्रत हो जाती है। आप अपने बच्चे से कह दीजिये मैं तुम्हें एक नया गेम ला दूँगा, वह रोज शाम को पूछेगा -वह गेम आप कब दे रहे हैं ? क्योंकि उसमें उस वस्तु के प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। वैराग्य हुए बिना हम ईश्वर की ओर नहीं बढ़ सकते। और वैराग्य भी कैसा होना चाहिये ?
एक व्यक्ति बड़ा कंजूस था, किसी को कुछ देता नहीं था, एक बार वह मूढ़ी खा रहा था, जोर का आवाज सुनकर मुढ़ी बिखर गयी, वैसे से उसने कहा -' विष्णवे ददाम्यहम् '! कोई बात नहीं, मैंने भगवान विष्णु को दान कर दिया, मैं नीचे गिरे मुढ़ी को तो खा नहीं सकता। यदि वह विष्णु को मिल जाय, तो मुझे कुछ पुण्य मिल सकता है। ऐसे ही लोगों को संसारी कहा जाता है । वे किसी से अपनी कोई चीज शेयर नहीं करते, फिर भी वे अपने को धार्मिक कहते हैं। 
जबकि श्रीम में वैसा कोई अहंकार नहीं था, उन्होंने श्रीरामकृष्ण की वाणी को जस का तस उतार दिया है, कहीं भी वे अन्य संपादकों की भाँति स्वयं कहीं नजर नहीं आते। क्यों ? क्योंकि उन्होंने नाम-यश के प्रति आसक्ति को पूर्णतः त्याग दिया था। सांसारिक सुखों  प्रति उनमें पूर्ण वैराग्य था। इसीलिये उनमें भगवान के प्रति उतना तीव्र आकर्षण था। अधिकांश लोग मंदिर में तो जाते हैं, किन्तु श्रीरामकृष्ण के सत्संग में नहीं जाते हैं। क्योंकि संत के पास शांत होकर १० मिनट बैठने का धैर्य नहीं होता, हिन्दू मंदिरों कई देवी -देवताओं की मूर्तियाँ होतीं हैं, वहां का वातावरण हमारे चंचल मन समानांतर होता है, वहां आप चढ़ावा चढ़ा सकते हैं। फिर भी पहला सोपान मंदिर जाना, पूजा अर्चना करना जरुरी है। कभी तो प्रवचन सुनने की इच्छा होगी। 
दूसरा चरण है, नैतिकता यथार्थ मनुष्य बनने की साधना। कैसे मनुष्यत्व विकसित होगा ? दूसरों से अपने समान प्रेम करके। उस प्रेम का विकास कैसे करोगे ? साधुसंग (=नेतासंग ?) या सत्संग सुनकर, किसी पवित्र ऋषि जैसे नेता के सानिध्य में रहने से। 
इसी सन्दर्भ में श्रीरामकृष्ण कहते हैं - "  जो संसार-त्यागी है वह तो ईश्वर का नाम लेगा ही। उसको तो और दूसरा काम ही नहीं। वह यदि ईश्वर का चिंतन करता है तो उसमें आश्चर्य की बात क्या है ? वह यदि ईश्वर की चिंता न करे, यदि ईश्वर का नाम न ले, तो लोग उसकी निन्दा करेंगे। 
" संसारी मनुष्य यदि ईश्वर का नाम जपे, तो समझो उसमें बड़ी मर्दानगी है। देखो, राजा जनक बड़े ही मर्द थे। वे दो तलवारें चलाते थे, एक ज्ञान की और एक कर्म की। एक ओर पूर्ण ज्ञान था, और दूसरी ओर वे संसार का कर्म कर रहे थे। बदचलन स्त्री घर के सब कामकाज बड़ी खूबी से करती है, परन्तु वह सदा अपने यार की चिंता में रहती है। 
"साधुसंग की सदा आवश्यकता है। साधु (स्वामी विवेकानन्द जैसे यमार्गदर्शक नेता) ईश्वर (विष्णु सहस्रनाम वाले नेता श्रीरामकृष्ण ) -से मिला देते हैं। " 
केदार - जी हाँ, महापुरुष (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) साधारण मनुष्यों के उद्धार के लिए आते हैं। जैसे रेलगाड़ी इंजन के पीछे कितने डब्बे बंधे रहते हैं, परन्तु वह उन्हें घसीट ले जाता है। अथवा जैसे नदी या सरोवर कितने ही जीवों के प्यास बुझाते हैं ! 
मास्टर महाशय सिधू के साथ बारह शिवमन्दिर, श्रीराधाकान्त- मन्दिर और भवतारिणी के मन्दिर में आरती देखने के बाद पुनः श्रीरामकृष्ण के कमरे में प्रवेश करते हैं। इतना अधिक आकर्षण क्यों था ? एक बार श्रीरामकृष्ण माँ काली के सामने प्रार्थना कर रहे थे, कि माँ तुम मेरे साथ हर समय उसी प्रकार रहो जैसे किसी छोटे बच्चे साथ उसकी माँ रहती है ! बच्चा नहीं समझता कि उसकी माँ को और भी काम हो सकता  है,वह तो बस अपने साथ ही रहने की ज़िद करता है। श्रीरामकृष्ण भी उसी भाव से प्रार्थना कर रहे थे। तब माँ उनको आश्वस्त करते हुए कहती हैं - ' तुमि आर आमी ऐक'  मैं और तुम दोनों बिल्कुल एक हैं ! 

मास्टर महाशय श्रीरामकृष्ण के माध्यम से उसी काली के प्रति आकृष्ट हो रहे थे। इसीलिये वे श्रीरामकृष्ण के कमरे के सामने पुनः आ पहुँचे। 
वे लिखते हैं -" मास्टर अंग्रेजी पढ़े लिखे आदमी थे अर्थात इंग्लिश मैनर जानते थे, इस लिये दरवाजे को खटखटाने के बाद ही अंदर जाना चाहते थे। और इंडियन मैनर - सिम्पली गो इनसाइड, बिना पूछे घुस जाओ। किन्तु वहाँ द्वार पर एक सेविका खड़ी थी - वृन्दे (वृन्दा) उसका नाम था। मास्टर ने पूछा -साधु महाराज क्या इस समय कमरे के भीतर हैं ? उसने कहा, 'हाँ वे भीतर हैं।'
[परम पूज्य स्वामी ईष्टात्मानन्द जी महाराज इस वक्तृता में जिस प्रकार श्रीरामकृष्ण की सेविका बृन्दे (वृन्दा) एवं मास्टर महाशय को गुरु-शिष्य के रूप में प्रस्तुत कर भगवान के पास पहुँचने का वर्णन किया है; वह अभूतपूर्व है।]
श्रीम - ये यहाँ कब से हैं ?
वृन्दा -ये बहुत दिनों से हैं। 
गदाधर के रूप में ये १६ वर्ष की उम्र में अपने बड़े भाई के साथ यहाँ आये थे। लिलाप्रसंग में पूरा विवरण मिलेगा। फिर श्रीम ने एक आश्चर्यजनक प्रश्न पूछा-
म - क्या वे ढेर सारी पुस्तकें पढ़ते हैं ?
इंग्लिश मीडियम में पढ़ा-लिखा व्यक्ति तो 'पुस्तकीय- ज्ञान' को ही सच्चा ज्ञान समझता है। कॉलेज के लड़के आजकल इंटरनेट को ज्ञान का भण्डार समझते हैं, या पुस्तकों में ही ज्ञान है ऐसा सोचते हैं । म ने सोचा क्योंकि इनको हमेशा बोलना पड़ता है, तो ये भी बड़े बड़े विद्वानों को अवश्य उद्धृत करते होंगे। तभी तो लोग इनको विद्वान समझते होंगे।
किन्तु वृन्दा एक बहुत सुन्दर उत्तर देती है।
बृन्दे: "बुक्स? ओह, डिअर नो ! दे आर ऑल ऑन हिज टंग."
बृन्दा - पुस्तकें ? अरे नहीं, मेरे बच्चों, वे सब उनके मुँह में है (उनके जिह्वा पर है)। 
वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। अर्थात किसी व्यक्ति ने उसे अपनी बुद्धि से सोचकर नहीं लिखा है। हमलोग बुद्धि से बहुत कुछ लिख लेते हैं। किन्तु उसे ज्ञान नहीं कहते -ज्ञान उससे बिल्कुल भिन्न वस्तु है। वह तो ऋषियों के द्वारा आविष्कृत होता है !
वृन्दा ने अनपढ़ होकर भी बिल्कुल सत्य कहा था - " सब कुछ उनकी जिह्वा पर है"! क्योंकि 'ज्ञान' बाहर से नहीं आता, ईश्वर के पास से आता है, भीतर से आता है। इसीलिये वह दूसरों के हृदय को भी स्पर्श कर लेता है।
म. हैड जस्ट फिनिश्ड हिज स्टडीज इन कॉलेज. इट अमेज्ड हिम टू हियर दैट - ' श्री रामकृष्ण रीड नो बुक्स?  मास्टर ने हाल में ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी, श्रीरामकृष्ण पुस्तकें नहीं पढ़ते यह सुनकर तो और भी आश्चर्य से भर गए। क्योंकि स्टूडेन्ट लाइफ़ में बड़े बड़े राइटर की पुस्तकें अपने अलमारी में रखना फैशन होता है, भले उसे आपने खोलकर भी न देखा हो,पन्ने सटे ही रहते हैं। इसीलिये उनको आश्चर्य होता है।
म कहते हैं - "परहैप्स इट इज टाइम फॉर हिज इवनिंग वरशिप. मे वी वे गो इनटू द रूम? विल यू टेल  हिम वी आर इगर टू सी हिम?"
 फिर वे एक दूसरी बात पूछते हैं -अब तो शायद वे संध्या करेंगे ? क्या हम भीतर जा सकते हैं ? एक बार उनसे कहोगी कि हमलोग उनसे मिलने के लिये बहुत उत्सुक हैं। 
क्या इस समय हम भीतर जा सकते हैं ? एक बार खबर कर दो न। शायद वे अभी वेद पढ़ रहे होंगे या ध्यान आदि कर रहे होंगे ? किन्तु ठाकुर तो उस समय तक सब कुछ समाप्त कर चुके थे। ज्ञानस्वरूप भगवान ही स्वयं वहाँ बैठे थे। बहुत से लोग भय वश साधना का एक रूटीन बनाकर साधना करते हैं। भक्त होना अच्छा है -पर केवल एक रूटीन की तरह साधना नहीं करनी चाहिये। इसीलिये वे सोच रहे थे इनका भी शाम के लिये कुछ अलग रूटीन रहता होगा? किन्तु जब कोई नया भक्त श्रीरामकृष्ण के पास आता था और उनको प्रसन्न करने के लिए शाम होने के बाद, जप की माला निकाल कर उनके सामने बैठकर जप-ध्यान या मनःसंयोग करने लगता था। किन्तु भगवान श्रीरामकृष्ण कहते थे -' एखाने आवा; वो शब कैनो ?' - यहाँ आकर वो सब करना आवश्यक नहीं है। जब हम भगवान के पास पहुँच चुके हैं - तब उनतक पहुँचने का रास्ता पूछना उचित नहीं है, जैसे कार में एक रास्ता बताने वाला मशीन रहता  है, किन्तु भगवान के पास पहुँचने के बाद भी भगवान का पता क्यों पूछना चाहिये ?  किन्तु श्रीरामकृष्ण के समकालीन अधिकांश लोग उन्हें भगवान (ठाकुर ) के रूप में ग्रहण नहीं सकते थे, क्योंकि वे लोग उन्हें ठाकुर के रूप में पहचानते नहीं थे, इसीलिये उन्हें 'परमहंस' कहा जाता था।
किन्तु आज तो हमलोग बेलुड़ मठ के मंदिर श्रीरामकृष्ण की पूजा होते देख रहे हैं,फिर भी ऑंखें मूँद कर उनका ध्यान करते हैं, उस समय भी जब लोग जीवंत भगवान के सामने बैठते थे तो उन्हें पहचान नहीं पाते थे। यही माया है -यही भ्रम है ! 
सामान्य उच्च पदस्थ व्यक्ति अपने पास आने के लिए कई प्रकार की औपचारिकता पूरी करवाता है, क्योंकि उसकी अनेक इच्छायें होती हैं जिसे वह दूसरों से छुपाना चाहता है। क्योंकि उसमें पद का अहंकार होता है, इसलिए वह दूसरों अपनी बड़ाई सुनना चाहता है। जिसके पास कुछ छुपाने को होता है, वही शर्तें लगाता है-आने के पहले भिजिटिंग कार्ड देना होगा, और मिलने का उद्देश्य और गाड़ी का नंबर आदि गेट पर ही लिखवा देना होगा। किन्तु जो भगवान हैं, उनका जीवन तो खुली किताब की तरह होता है, उनके पास जाने में कोई रुकावट नहीं होती। जब मैं जानता हूँ कि मैं कुछ गलत नहीं करता तो कोई भी व्यक्ति कभी भी मेरे पास आ सकता है। यदि सचमुच मुझमें कुछ बुराई है, और कोई मेरी आलोचना करता है तो उसमें मुझे डर क्यों लगना चाहिये ? क्या हम लोग अपने बारे में ऐसा सोच भी सकते हैं ? इसीको सरलता कहते हैं, जब हम इस प्रकार सोचने लगते हैं तो कोई तनाव नहीं रहता। हमलोग फुसफुसा कर जब बात करते हैं, तो नवनी दा को इसीलिए अच्छा नहीं लगता, क्योंकि हमलोग अपने बारे में बहुत कुछ छुपाना चाहते हैं। जब हम अपनी बड़ाई सुनना चाहते हैं तभी हमें खुली किताब होने में डर लगता है। 
किन्तु वृन्दा श्रीरामकृष्ण के बारे में सबकुछ जानती थी, इसीलिये हम यहाँ 'बृन्दे' (वृन्दा) को हम सदगुरु या मानवजाति का मार्ग दर्शक नेता कह सकते हैं ! क्योंकि वह भगवान श्रीरामकृष्ण को अच्छी तरह से जानती है, इसीलिये वह उनको निःशंकोच भाव से भगवान के पास जाने की अनुमति दे रही है।  क्योंकि जब तक हम किसी भगवान जैसे महापुरुष (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता या सदगुरु ) के सानिध्य में वर्षों तक रह नहीं लेते, हम भगवान को पहचान नहीं पाते। क्योंकि हमलोग दिग्भ्रमित रहते हैं, क्या ये ही ब्रह्म हैं ? क्या हमें ऐसे मनुष्य रूपी भगवान के पास जाना चाहिये ? वृन्दा श्रीरामकृष्ण की एक सेविका थी, किन्तु उसने म को महाशय या महोदय कहकर सम्बोधित नहीं किया, आप कृपया भीतर जाइये, ऐसा नहीं कहा। जबकि म उस ज़माने में एम.ए पास थे और आई.सी.एस की परीक्षा देने के लिये लंदन जाने की बात सोच रहे थे । 
उनसे वृन्दा ने कहा - " बच्चे, तुम लोग भीतर क्यों नहीं जाते ? जाओ, भीतर बैठो । "  उनका जीवन तो खुली हुई किताब है, सीधे भीतर चले जाओ, जाकर उनके चरणों बैठो और उनकी बातों को सुनो ! वृन्दे उनको किसी माता जैसे प्रेम को अभिव्यक्त करते हुए सम्बोधित करती हैं -'बच्चे' सर या महाशय नहीं! माँ हमेशा चाहती है कि उसके बच्चे किसी होली पर्सन या 'धर्मात्मा' व्यक्ति के सानिध्य में रहें। ताकि उनका भी सुन्दर चरित्र विकसित हो सके। 
बहुत से माता-पिता इसीलिये अपने बच्चों को महामण्डल द्वारा आयोजित युवा प्रशिक्षण शिविर में भेजना चाहते हैं क्योंकि वहाँ ऋषि (श्रीनवनिहरन मुखोपाध्याय) लोग एक दादा या बड़े भैया के रूप में उनका मार्ग दर्शन करते हैं। फिर महामण्डल से नेतृत्व प्रशिक्षण प्राप्त कुछ चुने हुए युवा अपने अपने क्षेत्रों में जाकर संडे क्लास या पाठचक्र में महामण्डल पुस्तिका 'नेतृत्व का अर्थ एवं गुण' पर कक्षायें लेते हैं। ठीक उसी प्रकार एक बिल्कुल साधारण सी दिखने वाली सेविका -वृन्दे (महामण्डल के केदारदा, बासुदेव बाघ ?) जिज्ञासु को ठाकुर के पास भेज देती है। 
वृंदा ने कहा -  "गो राइट इन, चिल्ड्रन. गो इन एंड सीट डाउन."  
इसिलिये वृन्दा को यहाँ हम एक गुरु कह सकते हैं, क्योंकि गुरु भगवान तक पहुँचने में सरल तरीके से हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं, किन्तु उसके बाद उनके निदेशानुसार साधना हमें स्वयं करनी होगी। गुरु हमारे साथ भीतर तक (भगवान तक) नहीं आ सकते ।
आइये देखते हैं कि श्रीरामकृष्ण के पास कोई नया भक्त जाता है, तो वे उससे कैसे मिलते थे ? यहाँ श्री'म' श्रीरामकृष्ण के कमरे में नहीं जा रहे हैं, वे तो जीवंत भगवान के मंदिर में जा रहे हैं, जहाँ भगवान स्वयं बिराज रहे हैं! म लिखते हैं - " श्रीरामकृष्ण अकेले तखत पर बैठे हैं। कमरे में धूप की सुगंध भर रही है। मास्टर ने अन्दर आते ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण द्वारा बैठने की आज्ञा पाकर वे और सिधू फर्श पर बैठ गए। रामकृष्ण ने पूछा, कहाँ रहते हो, क्या करते हो, वराहनगर क्यों आये हो इत्यादि। 
रामकृष्ण आस्क्ड देम -  " व्हयेर डू यू लीव ? व्हाट इज योर ऑक्यूपेशन? व्हाई हैव यू कम टु वराहनगर ? यहाँ भी ध्यान देने योग्य एक विशेष बात है, श्रीरामकृष्ण यह प्रश्न सिधू से नहीं कर केवल मास्टर से कर रहे हैं? क्यों ? जैसे ही ठाकुर ने म के चेहरे को देखा तो समझ गए कि यह व्यक्ति स्वयं नहीं आया है, इसे लाया गया है । इसलिये वे पूछते हैं -तुम कहाँ रहते हो ? तुम वराहनगर क्यों आये हो ? वराहनगर और दक्षिणेश्वर के ठीक आमने-सामने है - इन बातों पर अगले ब्लॉग में चर्चा होगी ! 
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