Saturday, November 29, 2014

१५.' परीक्षा और परिणाम ' १६." सीपियों की तरह होना होगा " [ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

 १५. परीक्षा और परिणाम

 (धारणा -२)
हम यह कैसे जानेंगे कि मन की दृष्टि उसी ध्येय वस्तु (आराध्य-आदर्श) पर पड़ रही है या नहीं ? इसकी पहचान यही है कि मन जब किसी वस्तु पर पुर्णतः एकाग्र रहता है तो-उस समय मन में अन्य कोई विचार उठेगा ही नहीं। पहले से चयनित वह आदर्श ही मन के चिन्तन का एक मात्र विषय बन जाएगा। उस मूर्त आदर्श में जो उच्च-भाव हैं बस उन्हीं का चिन्तन चलता रहेगा। धीरे धीरे उनके विचार स्पष्ट से स्पष्टतर होते चले जायेंगे। अन्य किसी भी तरह के विचार मन में नहीं उठेंगे। उस चयनित आदर्श के चिंतन में ही मन इतना तल्लीन हो जायेगा कि कितनी अवधि तक धारणा की गयी है, उसका पता भी नहीं चलेगा। नियमित रूप से इसी प्रकार थोड़ी देर तक लगातार एक ही विषय पर मन को तल्लीन रखने में समर्थ होने से ही मनःसंयोग का अभ्यास करना हो जायेगा । 
प्रतिदिन इसी प्रकार अभ्यास करते रहने से धीरे-धीरे अपनी इच्छानुसार मन को किसी भी वस्तु पर धारण किये रखने की क्षमता बढ़ती ही जाएगी। इसके साथ ही साथ किसी भी इन्द्रिय विषय से मन को खींच लेने की क्षमता भी प्राप्त होगी, क्योंकि मैं अनवरत मन के ऊपर अपनी इच्छा का प्रयोग (विवेक-प्रयोग) करने का अभ्यास करता रहता हूँ । इसीलिये इच्छामात्र से मन को बहुत सारी चीजों से खींच कर (किसी अर्दली के समान) हमेशा अपने समक्ष खड़ा रख सकता हूँ,अब वह मेरी आज्ञा के बिना किसी भी विषय में नहीं जाता है।  
'धारणा' के अभ्यास को -अर्थात बार बार मन को इन्द्रियविषयों से खींच कर,थोड़ी देर तक पूर्व-निर्धारित मूर्त आदर्श में तल्लीन रखने की चेष्टा को मन का व्यायाम भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार शरीर के व्यायाम से शारीरिक शक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है, उसी प्रकार मन के व्यायाम से मानसिक शक्ति भी बलवती होती जाती है। जिस प्रकार शरीर को शक्तिशाली बनाने का पौष्टिक आहार होता है, उसी प्रकार मन को भी शक्तिशाली बनाने का पौष्टिक आहार होता है। पवित्र विचार या शुभ-संकल्प ही मन को हृष्ट-पुष्ट बनाये रखते हैं। श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने, अच्छी संगति में रहने, शास्त्रार्थ या रचनात्मक विचार-विमर्श तथा उच्च भावों का चिन्तन करने से मन को पौष्टिक आहार प्राप्त होता है। उसके साथ-ही-साथ मन का व्यायाम अर्थात 'प्रत्याहार और धारणा' का नियमित अभ्यास करने से मन को भी उन्नत और शक्तिशाली बनाया जा सकता है। 
ऐसे शक्तिशाली मन को यदि संयमित करके वशीभूत कर लिया जाय तो उसके द्वारा सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। जिस व्यक्ति ने मन की गुलामी करनी छोड़ दी हो, जो स्वयं अपने मन का प्रभु हो गया हो,अर्थात जिसने अपने मन को जीत लिया हो, उसने वस्तुतः जगत को भी जीत लिया है। वह कभी भी और कहीं भी पराजित नहीं होता, क्योंकि वह मन की अनन्त शक्ति का अधिकारी बन जाता है। अब वह जिस किसी विषय में अपना मनोनिवेश करगा, वह विषय उसे पुरी तरह ज्ञात हो जाएगा। ऐसे मन को जिस कार्य में लगाया जायेगा, वह कार्य सिद्ध हो जायेगा। इसी वशीभूत मन की शक्ति की सहायता से हम अपने जीवन के उद्देश्य या लक्ष्य का चयन कर सकते हैं, तथा उस लक्ष्य को प्राप्त करने के उपयुक्त उपायों पर मनोनिवेश कर, अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं। अपने वशीभूत मन की शक्ति का प्रयोग कर अपने चरित्र और जीवन को सुंदर रूप से गढ़ सकते हैं। इस प्रकार मनः संयोग का अभ्यास करने से कोई भी व्यक्ति इसी जीवन में यथार्थ सुख, शान्ति और आनन्द का अधिकारी बन सकता है।
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[एक विचार लो . उस विचार को अपना जीवन बना लो - उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस विचार को जीओ ।  अपने मस्तिष्क , मांसपेशियों , नसों , शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो , और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है. ---स्वामी विवेकानन्द
 ।।देशबंधश्चितस्य धारणा।।-पतंजलि - अर्थात चित्त का देश विशेष में बँध जाना (perception या अनुभूति जन्य अभिज्ञता ) ही धारणा  है। धारणा से ही कठिन परीक्षा और सावधानी की शुरुआत होती है। यहीं से धर्म मार्ग का कठिन रास्ता शुरू होता है, जबकि साधक को हिम्मत करके और आगे रहस्य के संसार में कदम रखना होता है। कहते हैं कि यहाँ तक पहुँचने के बाद पुन: संसार में पड़ जाने से दुर्गति हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को योगभ्रष्ट कहा जाता है, अब पीछे लौटना याने जान को जोखिम में डालना ही होगा। कहते हैं कि छोटी-मोटी जगह से गिरने पर छोटी चोट ही लगती है, लेकिन पहाड़ पर से गिरोगे तो भाग्य या भगवान भरोसे ही समझो। इसलिए 'जरा बच के'। यह बात उनके लिए भी जो योग की साधना कर रहे हैं और यह बात उनके लिए भी जो जाने-अनजाने किसी 'धारणा सिद्ध योगी' का उपहास उड़ाते रहते हैं। कहीं उसकी टेढ़ी नजर आप पर न पड़ जाए।
जिसे धारणा सिद्ध हो जाती है, कहते हैं कि ऐसा योगी अपनी सोच या संकल्प मात्र से सब कुछ बदल सकता है। ऐसे ही योगी के आशीर्वाद या शाप फलित होते हैं।इस अवस्था में मन पूरी तरह स्थिर तथा शांत रहता है। जैसे क‍ि बाण के कमान से छूटने के पूर्व लक्ष्य पर कुछ देर के लिए निगाहें स्थिर हो जाती हैं, ठीक उसी तरह योगी के मन की अवस्था हो चलती है।  जबकि उसके एक तरफ संसार होता है तो दूसरी तरफ रहस्य का सागर रूपी लक्ष्य पर नजर है । यह मन से मुक्ति की शुरुआत भी है। धारणा सिद्ध व्यक्ति की पहचान यह है कि उसकी निगाहें स्थिर रहती है। ऐसे चित्त की शक्ति बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है। ]
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१६." सीपियों की तरह होना होगा "


इस दृश्य-मन या जड़ चित्त में संग्रहीत वृत्तियां, वासनाएं, संस्कार ही मानस-पटल पर प्रक्षेपित होते रहते हैं। इन चित्त-वृत्तियों का प्रवाह प्रतिक्षण बिना विराम चलता रहता है। चेतना (शुद्ध-बुद्धि या द्रष्टा-मन) दर्शक है, साक्षी है- किन्तु वह इस वृत्ति-चित्रों के प्रवाह से तादात्म्य करके स्वयं को भूल जाती है। यह विस्मरण अज्ञान है। यह अज्ञान, मूल है संसार का, देहान्तरण का,जन्म-मरण के चक्र का। इस अज्ञान से जागना चित्त-वृत्तियों के निरोध में होता है। चित्त जब वृत्ति-शून्य होता है, सिनेमा के परदे पर जब चित्रों का प्रवाह रुकता है - और पर्दे पर 'दी इन्ड ' लिख दिया जाता है, तब ही दर्शक को अपनी याद आती है, और वह अपने गृह को लौट जाता है। चित्त-वृत्तियों के इस निरोध को ही पतंजलि ने योग कहा है। यह साधते ही सब सध जाता है।"

विवेकानन्द जी कहते हैं - " जब मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते करते ऐसी एक वस्तु के साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल में नाश नहीं, जो स्वरूपतः नित्यापूर्ण और नित्यशुद्ध है, तब उसको फ़िर दुःख नहीं रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है। भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दुखों का मूल है। पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि उसकी मृत्यु किसी काल में नहीं है, तब उसे फ़िर मृत्यु-भय नहीं रह जाता। अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएं फ़िर नहीं रहतीं। पूर्वोक्त कारणद्वय का आभाव हो जाने पर फ़िर कोई दुःख नहीं रह जाता। उसकी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है।"(१:४० ) 

" भारतवर्ष में एक सुंदर किंवदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के तुन्गस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूंद किसी सीपी में चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियों को यह बात मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूंद की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही एक बूंद पानी उनके पेट में जाता है, त्यों ही उस जलकण को लेकर मुंह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं।"
हमें भी उन्हीं सीपियों की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फ़िर समझना होगा, अन्त में बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर, सब प्रकार की विक्षेपकारी बातों से दूर रहकर हमें अन्तर्निहित सत्य-तत्त्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। 

एक भाव को पकडो, उसी को लेकर रहो। उसका अन्त देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव को लेकर उसी में मत्त रहते हैं, उन्हीं के ह्रदय में सत्य तत्त्व का उन्मेष होता है।...एक विचार लो उसी विचार को अपना जीवन बनाओ उसी का चिंतन करो, उसी का स्वप्न देखो और उसी में जीवन बिताओ। सब प्रकार की बकवास छोड़ दो। जिन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है, केवल उन्हीं के लिखे ग्रन्थ पढो। यदि हम सचमुच स्वयं कृतार्थ होना और दूसरों का उद्धार करना (Be and Make?)  चाहें, तो हमे मन की गहराई तक जाना पड़ेगा। पुरी लगन के साथ, कमर कसकर साधना में लग जाओ- फ़िर मृत्यु भी आये, तो क्या ! मन्त्रं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि - काम सधे या प्राण ही जायें। फल की ओर आँख रखे बिना साधना में मग्न हो जाओ! " (१:८९-९०)

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ओशो कहते हैं - " वही आदमी प्रेम करता है, जो बस प्रेम करता है और किसका कोई सवाल नहीं है। क्योंकि जो आदमी ‘किसी से’ प्रेम करता है, वह शेष से क्या करेगा? वह शेष के प्रति घृणा से भरा होगा। जो आदमी ‘किसी का ध्यान’ करता है, वह शेष के प्रति क्या करेगा?" 

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